Thursday, July 2, 2026

स्नान के सात प्रकार

 🌼 स्नान के सात प्रकार 🌼


१]  मन्त्र स्नान :---

आपो हिष्ठा' इत्यादि मन्त्रों से मार्जन करना।


२]  अग्नि स्नान :---

अग्नि की राख पूरे शरीर में लगाना जिसे भस्म स्नान कहते हैं।


३]  भौम स्नान :---

पूरे शरीर में मिटटी लगाने को भौम स्नान कहा जाता है।


४]  वायव्य स्नान :---

गाय के खुर की धूलि लगाने को वायव्य स्नान कहा जाता है।


५]  मानसिक स्नान :---

आत्म चिन्तन करना एंव निम्न मन्त्र


ऊॅ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्रााभ्यन्तरः शुचि।।

अतिनीलघनश्यामं नलिनायतलोचनम्।

स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्ं।।


मंत्र को पढ़कर अपने शरीर पर जल छिड़कने को मानसिक स्नान कहा जाता है।


६]  वरूण स्नान :---

जल में डुबकी लगाकर स्नान करने को वरूण स्नान कहा जाता है।


७]  दिव्य स्नान :--- 

सूर्य की किरणों में वर्षा के जल से स्नान करना दिव्य स्नान कहा जाता है।


▪️और एक महत्वपर्ण स्नान को एक ही जीवन में सभी कर्मो एक समय में ही भोगा जाता है जिसे आगे की यात्रा सरलता से बढ़े वो है:----- निंदा स्नान । 


🔸️ बहॉत बार ऐसा हमे लगता है मैने जीवन में हर एक कदम धर्म में निष्ठा रख कर संभाल संभाल कर आगे बढ़ाया हे फिर भी समाज में मुझे निंदा का सामना करना पड़ा , हालांकि मेरी कोई क्षति नहीं फिर भी मुझे निदा मिलती है इस समाज से । 


👉 तो ये होता है , कहीं बार होता है , आपने सही में समाज के लिऐ कुछ श्रेष्ठ कार्य किया हो , उत्तम कार्य किया हो , अपना पूरा जीवन  सब की कल्याण की भावना से भी बिताया ही फिर भी आप को वोही समाज आप के पर आरोप लगाते रहते हैं , आप की निंदा भी करेंगे , ये सब स्वाभाविक हे । 

में तो कहूंगा उत्तम फल हे , अगर शांत चित से समझेंगे तो , क्यों की एक साथ हमारे  सारे कर्म बट जाते हे वोही निंदक उस कर्म को अपने सर ले लेते हे और हमे पापो से मुक्ति दिलाते हे , निंदक तो देवता ही हीये जो हमारा कर्म ले जाते है।


बस हमे उस समय शांत हो जाना हे , बिलकुल शांत , हरी स्मरण करते रहते ये समय निकाल देना हे।


[ अगर धैर्य  से , सहजता से , बिना किसी को श्राप देते , बिना कोई प्रतिक्रिया देते निकाल देते हे तब यही निंदा स्नान शाही स्नान बन जाएगा , ये स्नान हर कोई को एक बार करना ही पड़ता है , थोड़ा ज्यादा। ]


🔹️ मगर साधु विविकी इस स्नान का विशेष लाभ ले लेते हे , और हमारे जैसे सामान्य प्रतिक्रिया की आग में जलते रहते है।


।। जय श्री राम  ।।