Tuesday, April 21, 2026

श्वेतवराहकल्प

 #श्वेतवराहकल्प-


( *सृष्टि* ) का प्रारम्भ १९७२९४९१२० वर्ष पूर्व हुआ था, इतने बृहत्तम इतिहास को भगवान् व्यास नारायण के अतिरिक्त लिखने में कोई अन्य समर्थ नहीं,उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की कृपा से मैं इस *श्वेतवराह  कल्प के ७वें मन्वन्तर के २८ कलियुगों* के सार्वभौम जगदगुरुओं का सङ्केत मात्र में वर्णन करने का प्रयास कर रहा हूँ।


 *भगवान नारायण से चली आ रही हिंदुओं की गुरु शिष्य परम्परा:-* 


 *नारायण-->ब्रह्मा-->वशिष्ठ-->शक्ति-->पराशर-->व्यास-->शुकदेव-->गौड़पाद-->गोविंदपाद-->आदि शंकराचार्य ।* 


आदि शंकराचार्य जी ने चार शांकर पीठों की स्थापना करी। जिनमे प्रथम के चार शंकराचार्य नियुक्त किये गए जिनके नाम थे - पद्मपादाचार्य, तोटकाचार्य , हस्तमालकाचार्य , सुरेश्वराचार्य


श्रीमन्महाराज सार्वभौम युधिष्ठिर जी के २६३१ वर्ष व्यतीत होने पर स्वयं जगद्गुरु भगवान् शङ्कर आद्य शङ्कर भगवत्पाद् के रूप में इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे । पूज्य भगवत्पाद् ने प्राचीन चतुराम्नाय सम्बद्ध चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को जगद्गुरु शङ्कराचार्य के रूप में ख्यापित किया था, यथा:- 


# *सामवेद* से सम्बद्ध पश्चिमाम्नाय *द्वारिका-शारदामठ द्वारिका* ,पर पूज्य जगद्गुरु श्री *सुरेश्वराचार्य* जी का युधिष्ठिर संवत् २६४९ में (वर्तमान से २५०८ वर्ष पूर्व में )अभिषेक किया गया।


# *यजुर्वेद* से सम्बद्ध दक्षिणाम्नाय *श्रीशृङ्गेरी-शारदामठ शृङ्गेरी,* पर पूज्य जगदगुरु श्री *हस्तामलकाचर्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष में ) पूर्व अभिषिक्त किया गया।


 # *अथर्ववेद* से सम्बद्ध उत्तराम्नाय *ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम* पर पूज्य जगद्गुरु श्री *तोटकाचार्यजी* को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष पूर्व) अभिषेक किया ।


 और # *ऋग्वेद* से सम्बद्ध पूर्वाम्नाय श्री *गोवर्द्धनमठ* *श्रीजगन्नाथ पुरी पीठ* पर पूज्य जगद्गुरु *पद्मपादाचार्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५५ में (वर्तमान से २५०१ वर्ष पूर्व में ) अभिषिक्त किया।



 *वर्तमान में* चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर पूज्य जगद्गुरु महाभाग 

पश्चिम में *शारदामठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्तश्रीविभूषित भगवान् स्वामि श्रीसदानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त है।


दक्षिण में *शृङ्गेरी मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री भारती तीर्थ जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।



उत्तर में *ज्योतिर्मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।


पूर्व में *पुरीपीठ में अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती* जी महाभाग अभिषिक्त हैं।


यह सार्वभौम जगद्गुरु की परम्परा अतिप्राचीन ही नहीं अपितु सनातन भी हैं।

कृत,त्रेता,द्वापर आदि युगों में मन्त्र दृष्टा ऋषियों से प्रसारित ज्ञान के द्वारा धर्म की व्यवस्था बनी रहती है।

किन्तु कलियुग में अल्पमेधा वाले,तपोबल और शुद्धता-पवित्रता रहित मनुष्यों को भगवत्साक्षात्कार,देवताओं का साक्षात्कार और ऋषियों का साक्षात्कार प्रत्यक्ष नहीं होता है। क्योंकि दिव्य महापुरुषों के दर्शनों की क्षमता नहीं होती है कलियुग के अल्पशक्ति सम्पन्न लोगों में..ऐसे में ऐसे मनुष्यों पर कृपा करने के लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापर के अंतमें व्यास रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाजन करके पुराणों के द्वारा वेदों का सरलीकरण करके जन-जन तक ज्ञान के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 


उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की सहायताके लिये जगद्गुरु भगवान् साम्ब शिव स्वयं अवतार धारण करते हैं, और व्यास जी के आदेश पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर ख्यापित करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।


श्री श्वेतवराहकल्प के सप्तम मन्वन्तर वैवस्वत का शुभारम्भ १२०५३३१२० वर्ष पूर्व हुआ था। वैवस्वत मन्वन्तरके *आद्य कलियुग* ११६६४५१२० वर्ष पूर्व में जब भगवान् ब्रह्माजी स्वयं व्यासजी के पद पर प्रतिष्ठित थे, तब भगवान् शिव ने उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु श्वेत के रूप में अवतार लिया और चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों श्वेतलोहित, श्वेताश्व, श्वेतशिख और श्वेत को अभिषिक्त किया।

(यह चतुराम्नाय पूर्ववत ऋक्० ,यजु: ,साम और अथर्व के क्रम से है।

पाठक गण कृपया निम्न सूची को स्वयं इसी क्रम से चतुराम्नाय चतुष्पीठों से सम्बन्ध ज्ञात कर सकते हैं। )


 *द्वितीय कलियुग* के प्रारम्भ में ११२३२५१२० वर्ष पूर्व जब प्रजापति सत्य व्यासजी थे तब भगवान् शिव जगद्गुरु सुतार के नाम से अवतरित हुए,उनके चार प्रमुख शिष्य जगद्गुरु हुए ,केतुमान् ,हृषीक ,शतरूप व दुन्दुभि ।


 *तीसरे कलियुग* के प्रारम्भ में १०८००५१२० वर्ष पूर्व महर्षि भार्गव व्यासजी थे तब भगवान् शङ्कर जगद


गुरु दमन के रूप में प्रकट हुए और उनके प्रमुख शिष्य थे ,पापनाशन ,विपाप ,विशेष व विशोक।


 *चतुर्थ कलियुग* के प्रारम्भ में १०३६८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् अङ्गिरा व्यासजी थे और उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु सुहोत्र केरूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए दुरतिक्रय ,दुर्दम ,दुर्मुख व सुमुख ।  


 *पञ्चम कलियुग* के प्रारम्भ में ९९३६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सविता व्यासजी थे (शुक्लयजुर्वेद इन्हीं से प्रकट हुआ ) तब उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु हँस (कङ्क) के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य थे ,सनत्कुमार ,सनन्दन ,सनातन व सनक । 


 *षट् कलियुग* के प्रारम्भ में भगवान् मृत्यु (सूर्यपुत्र- बालक नचिकेता के गुरु) व्यासजी के पद पर थे ,तब भगवान् महेश्वर  उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु लोकाक्षीके रूप में प्रकट हुए,उनके प्रमुख शिष्य हुए,विजय संजय,विरजा व सुधामा।


 *सप्तम कलियुग* के प्रारम्भ में ९०७२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) थे,जो कि महर्षि भरद्वाज और विश्वामित्र के गुरु और प्राचीन व्याकरण के रचयिता थे,उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु जैगीषव्य के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य हुए-सुवाहन ,मेघवाहन ,योगीश व सारस्वत । 


 *अष्टम कलियुग* के प्रारम्भ में ८६४०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वसिष्ठ व्यासजी के पद पर थे (ऋग्वेद सप्तम मण्डल के दृष्टा ऋषि ,वसिष्ठ धर्मसूत्र ,वसिष्ठ शिक्षा व वसिष्ठ स्मृति की रचना इसी समय की ) उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु दधिवाहन के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य थे शाल्वल ,पञ्चशिख ,आसुरि व कपिल । 


 *नवम कलियुग* के प्रारम्भ में ८२०८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सारस्वत व्यासजी थे ,उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगदगुरु ऋषभ के रूप में हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गिरीश ,भार्गव ,गर्ग व पराशर । 


 *दशमें कलयुग* के प्रारम्भ में ७७७६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिधन्वा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,केतुशृङ्ग ,नरामित्र ,बलबन्धु व भृङ्ग , चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता इसी चतुर्युगी में हुए । 


 *एकादश कलियुग* के प्रारम्भ में ७३४४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिवृत व्यासजी थे ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु तप हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रलम्बक ,केशलम्ब ,लम्बाक्ष व लम्बोदर । 


 *द्वादश कलियुग* के प्रारम्भ में ६९१२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शततेजा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु अत्रि हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,शर्व ,साध्य ,समबुद्धि व सर्वज्ञ । 


 *त्रयोदश कलियुग* के प्रारम्भ में ६४८०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् नारायण व्यासजी के पद पर थे ,उस समय उनके सहायक भगवान् शिवजगदगुरु बलि के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,विरजा ,वसिष्ठ ,काश्यप व सुधामा । 


 *चतुर्दश कलियुग* के  आदिमें ६०४८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् ऋक्ष व्यासजी के पद पर थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गौतम थे (गौतमधर्मसूत्रके रचयिता ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,श्नविष्टक ,श्रवण ,वशद व अत्रि । 


 *पञ्चदश कलियुगमें* ५६१६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर त्रय्यारुणि थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु वेदशिरा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हैं ,कुनेत्रक ,कुशरीर ,कुणिबाहु व कुणि । 


 *षोडश कलियुग* में ५१८४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर देव आरूढ़ थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गोकर्ण जी थे (जिन्होंने अपने भाई धुंधकारी को पिशाच योनि से मुक्त किया ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,बृहस्पति (अर्थशास्त्र के रचयिता ) ,च्यवन (आयुर्वेद के प्रवर्तक ) ,उशना(उशनास्मृति अथवा शुक्रनीति के रचयिता ) व काश्यप  ,चक्रवर्ती सम्राट भरत इसी चतुर्युग में हुए ।  


 *सप्तदश कलियुग* में ४७५२५१२० वर्ष पूर्व भगवत् व्यासके पद पर देवकृतञ्जय व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गुहावसी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,महाबल ,महायोग ,वामदेव व उतथ्य । 


 *अष्टदश कलियुग* के आदि में ४३२०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास ऋतञ्जय थे ,व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु शिखण्डी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,यतीश्वर ,श्यावास्य,रुचीक व वाचश्रवा । 


 *एकोन्विंशति कलियुग* में ३८८८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् भरद्वाज व्यासजी थे व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु माली थे ,उनके प्रमुख शिष्य प्रधिमि ,लोकाक्षी ,कौसल्य व हिरण्यनामा थे ,इसी चतुर्युग में भगवान् परशुरामजी हुए । 


 *विंशति कलियुग* के आदि में ३४५६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास गोतम ऋषि थे (गोतम न्यायदर्शन के प्रणेता ) ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु अट्टहास हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए  कुणिकन्धर ,कबन्ध ,वर्वरि व सुमन्त । 


 *एकविंशति कलियुग* के आदि में ३०२४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास जी  वाचाश्रवा थे उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु दारुक थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गौतम ,केतुमान् ,दर्भामणि व प्लक्ष । 


 *द्वाविंशति कलियुग* के आदि में २५९२५१२० वर्ष पूर्व शुष्ययण व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु लाङ्गुली भीम हुए ,उनके प्रमुखं शिष


्य हुए श्वेतकेतु ,पिङ्ग ,मधु व भल्लवी । 


 *त्रविंशति कलियुग* के आदि में २१६०५१२० वर्ष पूर्व महर्षि तृणबिन्दु वेदव्यास जी थे (इन्हीं के दौहित्र महर्षि विश्रवा थे ) ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु श्वेत थे ,उनके शिष्य हुए कवि ,देवल ,बृहदश्व व उशिक । 


 *चतुर्विंशति कलियुग* के आदि में १७२८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वेद व्यास थे ऋषि यक्ष ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु शूली ,उनके प्रमुख शिष्य हुए शरद्वसु ,युवनाश्व ,अग्निवेश (धनुर्वेद के आचार्य -द्रोणाचार्य के गुरु) व शालिहोत्र ,इसी चतुर्युगी में वेदवेद्य जगदीश्वर श्रीरामभद्रका अवतार हुआ । 


 *पञ्चविंशति कलियुग* के आदि में  १२९६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यासके पद पर वसिष्ठ पुत्र शक्ति थे ,उनके सहायक शिवावतार मुण्डीश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रवाहक ,कुम्भाण्ड ,कुण्डकर्ण व छगल । 


 *षड्विंशति कलियुग* के आदि में ८६४५१२० वर्ष पूर्व शक्ति पुत्र पाराशर भगवान् वेदव्यास के पद पर थे (विष्णुपुराण के संकलनकर्ता)  ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु सहष्णु ,उनके प्रमुख शिष्य हुए आश्वलायन (शौनक शिष्य आश्वलायन ऋग्वेद की एक सम्पूर्ण शाखा के प्रवर्तक हैं ),शम्बूक ,विद्युत व उलूक । 


 *सप्तविंशति कलियुग* के आदि में ४३२५१२० वर्ष पूर्व महर्षि जातूकर्ण वेदव्यास थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु सोमशर्मा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए वत्स ,उलूक ,कुमार व अक्षपाद । 


 *अष्टविंशति कलियुग* के आदि में ५१२० वर्ष पूर्व ,जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम को अनाथ करके गोलोक धाम को गये ,भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी ने २८ वे वेदव्यास के पद पर रखकर महाभारत ग्रन्थ सहित १८ पुराणों व ब्रह्मसूत्र की रचना की व वेदोंका विभाजन किया ।  

२८वें भगवान्  वेदव्यास के सहायक शिवावतार जगद्गुरु  आदि शङ्कराचार्य जी ने अपने चार शिष्यों, श्रीपद्मपाद ,श्रीहस्तामलक,श्रीसुरेश्वर व श्रीतोटक को चतुष्पीठों पर जगद्गुरु कर रूप में ख्यापित किया।


जयति लोक शङ्कर: 🙏🙇🏻‍♂️

--- डो भुवन रावल 

नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

 नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

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ब्राह्ममुहूर्त में उठना

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धर्मशास्त्रानुसार ब्राह्ममुहूर्त में उठें । ‘सूर्योदय से पूर्व के एक प्रहर में दो मुहूर्त होते हैं । उनमें से पहले मुहूर्त को ‘ब्राह्ममुहूर्त’ कहते हैं । उस समय मनुष्य की बुद्धि एवं ग्रंथ रचना की शक्ति उत्तम रहती है; इसलिए इस मुहूर्त को ‘ब्राह्म’ की संज्ञा दी गई है ।


अ] ब्राह्ममुहूर्त का महत्त्व:--


‘इस काल में दैवी प्रकृति के निराभिमानी जीवों का संचार रहता है ।


यह काल सत्त्वगुणप्रधान रहता है । सत्त्वगुण ज्ञान की अभिवृद्धि करता है । इस काल में बुद्धि निर्मल एवं प्रकाशमान रहती है । `धर्म’ एवं `अर्थ’ के विषय में किए जानेवाले कार्य, वेद में बताए गए तत्त्व (वेदतत्त्वार्थ) के चिंतन तथा आत्मचिंतन हेतु ब्र्रह्ममुहूर्त उत्कृष्ट काल है।


इस काल में सत्त्वशुद्धि, कर्मरतता, ज्ञानग्राह्यता, दान, इंद्रियसंयम, तप, सत्य, शांति, भूतदया, निर्लोभता, निंद्यकर्म करने की लज्जा, स्थिरता, तेज एवं शुचिता (शुद्धता), ये गुण अपनाना सुलभ होता है ।’


इस काल में मच्छर, खटमल एवं पिस्सू क्षीण होते हैं ।


इस काल में अनिष्ट शक्तियों की प्रबलता क्षीण होती है ।


१. नींद से जागने पर सर्वसाधारणत : 

उबासियां क्यों आती हैं ?

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रात के समय जीव की देह में निर्मित हुई वायु प्रातःकाल जीव के मुख से बाहर निकलती है, इसलिए उबासियां आना : ‘सामान्यतः वायु मुख से बाहर निकलती है, अर्थात मुख वायुतत्त्व बाहर निकलने का द्वार है । जब हम बोलते हैं, तब जीव में सक्रिय सत्त्व-उत्प्रेरक वायु शब्दों के साथ निकलकर शब्द के सूक्ष्म स्वरूप को वायुधारणा की गति प्रदान करती है । (वायुधारणा की गति अर्थात वायुस्वरूप गति, उस प्रकार की गति; धारणा अर्थात क्षमता) रात के समय जीव की देह में निर्मित वायुमुख के माध्यमसे बाहर नहीं निकल पाती । इसलिए इस वायु का जीव की देह में संग्रह होता है । प्रातःकाल यह वायु जीव के मुखसे बाहर निकलती है, इसलिए इस काल में सर्वाधिक उबासियां आती हैं ।


२. नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

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अ》श्रोत्राचमन

---- विष्णु स्मरण

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नींद से जागते ही बिस्तर पर बैठकर श्रोत्राचमन करें ।‘पास में जल न हो, तो भी श्रोत्राचमन अवश्य करें ।’- गुरुचरित्र, अध्याय ३६, पंक्ति १२४


श्रोत्राचमन, अर्थात दाहिने कान को हाथ लगाकर भगवान श्रीविष्णु के ‘ॐ श्री केशवाय नमः ।’ … ऐसे २४ नामों का उच्चारण करें । आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम, अनिल आदि सभी देवताओं का वास दाहिने कान में रहता है, इसलिए दाहिने कान को केवल दाहिने हाथ से स्पर्श करने से भी आचमन का फल प्राप्त होता है । आचमन से अंतर्शुद्धि होती है ।


आ》   श्लोकपाठ

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----- श्री गणेशवंदना

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वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।


अर्थ : दुर्जनों का विनाश करनेवाले, महाकाय (शक्तिमान), करोडों सूर्यों के तेज से युक्त (अतिशय तेजःपुंज) हे श्री गणेश, मेरे सर्व काम सदैव बिना किसी विघ्नके (निर्विघ्नरूपसे) संपन्न होने दें ।

                     

देवता वंदना

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ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारिर्भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।

गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।।


अर्थ : निर्माता ब्रह्मदेव; पालनकर्ता एवं ‘मुर’ नामक दानव का वध करनेवाले श्रीविष्णु; संहारक एवं ‘त्रिपुर’ राक्षस का वध करनेवाले शिव, ये प्रमुख तीन देवता तथा सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु, ये नवग्रह मेरी प्रभात को शुभ बनाएं ।


पुण्य पुरुषों का स्मरण

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पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः ।

पुण्यश्लोको विदेहश्च पुण्यश्लोको जनार्दनः ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक १


अर्थ : पुण्यवान नल, युधिष्ठिर, विदेह (जनक राजा) तथा भगवान जनार्दन का मैं स्मरण करता हूं ।


सप्त चिरंजीवों का स्मरण

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अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च बिभीषणः ।

कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक २


अर्थ : द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, दानशील बलिराजा, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य एवं पृथ्वी को इक्कीस बार दुर्जन क्षत्रियों से निःशेष करनेवाले परशुराम, ये सात चिरंजीवी हैं । (मैं इनका स्मरण करता हूं ।)


पंचमहासतियों का स्मरण

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अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा ।

पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक ४


अर्थ : गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती एवं रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच महासतियों का जो मनुष्य स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं ।


टिप्पणी – यह श्लोक उच्चारित करते समय कुछ लोग ‘पञ्चकन्या स्मरेन्नित्यम्…’ कहते हैं, जो अनुचित है । ‘पञ्चक’ अर्थात पाच लोगों का समूह तथा ‘ना’ अर्थात मनुष्य; इसलिए ‘पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यम्’ का अर्थ होता है ‘मनुष्य इन पांच स्त्रियों के समूह का स्मरण करे’ ।


सात मोक्षपुरियों का स्मरण

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अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ।। 

– नारदपुराण, पूर्वभाग, पाद १, अध्याय २७, श्लोक ३५


अर्थ : अयोध्या, मथुरा, मायावती (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारका, मोक्ष प्रदान करनेवाली सात नगरियां हैं । इनका मैं स्मरण करता हूं ।


प्रातः स्मरण किये जाने वाली पांच महासतियो समेत, सात मोक्षपूरियो व अन्य का विवरण


पंचमहासतियों का स्मरण

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अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा ।

पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक ४


अर्थ : गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती एवं रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच महासतियों का जो मनुष्य स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं ।


टिप्पणी – यह श्लोक उच्चारित करते समय कुछ लोग ‘पञ्चकन्या स्मरेन्नित्यम्…’ कहते हैं, जो अनुचित है । ‘पञ्चक’ अर्थात पाच लोगों का समूह तथा ‘ना’ अर्थात मनुष्य; इसलिए ‘पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यम्’ का अर्थ होता है ‘मनुष्य इन पांच स्त्रियों के समूह का स्मरण करे’ ।


सात मोक्षपुरियों का स्मरण

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अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ।। 

– नारदपुराण, पूर्वभाग, पाद १, अध्याय २७, श्लोक ३५


अर्थ : अयोध्या, मथुरा, मायावती (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारका, मोक्ष प्रदान करनेवाली सात नगरियां हैं । इनका मैं स्मरण करता हूं ।


🤲.. करदर्शन

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दोनों हाथों की अंजुलि बनाकर उस पर मन एकाग्र कर निम्नांकित श्लोक उच्चारित करें ।


कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।

करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ।।


अर्थ : हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का, मध्य में सरस्वती एव मूल में गोविंद का वास है; इसलिए प्रातः उठते ही हाथ के दर्शन करे’ ।


हाथों की अंजुलि से ब्रह्ममुद्रा बनाना, इससे देह की सुषुम्ना नाडी सक्रिय होना तथा रात भर निद्रा के कारण देह में निर्मित हुए तमोगुण के उच्चाटन में यह सहायक होना : ‘हाथों की अंजुलि बनाकर उस पर मन एकाग्र कर ‘कराग्रेवसते लक्ष्मीः …’ यह श्लोक पाठ करने से ब्रह्मांड की देवत्वजन्य तरंगें अंजुलि की ओर आकृष्ट होती हैं । ये तरंगें अंजुलि में ही घनीभूत होती हैं । अंजुलि रूपी रिक्ति में आकाश रूपी व्यापकत्व लेकर वे मंडराती रहती हैं । हाथों की अंजुलि में ब्रह्ममुद्रा निर्मित होती है तथा देह की सुषुम्ना नाडी सक्रिय होती है । यह नाडी जीव की आध्यात्मिक उन्नति के लिए पोषक है । यदि रात भर की तमोगुणी निद्रा के कारण देह में तमोगुण का संवर्धन हुआ हो, तो सुषुम्ना की जागृति उसका उच्चाटन करने में सहायक होती है ।’


ई. भूमिवंदना

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‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः …’ श्लोक पाठ के उपरांत भूमि से प्रार्थना कर, यह श्लोक बोल कर, तदुपरांत भूमि पर पैर रखें ।


समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ।।


अर्थ : समुद्र रूपी वस्त्र धारण करनेवाली, पर्वत रूपी स्तनवाली एवं भगवान श्रीविष्णु की पत्नी  हे पृथ्वीदेवी, मैं आपको नमस्कार करता हूं । आपको  पैरों का स्पर्श होगा, इसके लिए आप हमें क्षमा करें ।


रात्रिकाल में तमोगुण प्रबल होता है । ‘भूमि से प्रार्थना कर ‘समुद्रवसनेदेवि…’ श्लोक कहकर भूमि पर पैर रखने से, रात्रिकाल में देह में फैले कष्टदायक स्पंदन भूमि में विसर्जित होने में सहायता मिलती हैं ।’


संदर्भ पुस्तक : सनातन का सात्विक ग्रन्थ ‘आदर्श दिनचर्या (भाग १) स्नानपूर्व आचार एवं उनका अध्यात्मशास्त्रीय आधार‘

Sunday, April 19, 2026

क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप ?

 🔸️ क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप❓️

🔸️ क्यों वेद में वर्जित किया है ❓️

🔸️ स्त्री के लिए गायत्री मंत्र जाप❓️


🔹️ समझते हैं आज इस बात के संदर्भ के लॉजिक को संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से :👉


ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली एवं अत्यंत तीव्र वेग ॐ शब्द ही केवल इस शब्द है जो बिना जिव्हा के भी उच्चारण होता है।


जब कुछ व्यवस्थित शब्दों के समूह को ॐ के साथ जोड़ कर उच्चारित किया जाता है तब उसे मन्त्र की संज्ञा दी जाती है।


शास्त्रो में मन्त्रो की ऊर्जा के नियंत्रित अथवा अनियंत्रित वेग होते हैं,जिनका जाप अथवा ॐ शब्द हमारे नाभि चक्र को स्ट्रोक करता है। जिससे उस मन्त्र की ऊर्जा हमारे शरीर के सात चक्रों से हो कर ब्रह्मांड में उस शक्ति को सूचना देती है। जिसका हम जाप करते हैं।


गायत्री मंत्र एक अत्यंत ऊर्जा एवं तीव्र वेग मन्त्र  है। 

उसमे ॐ के तीव्र वेग ओर ऊर्जा के साथ सम्पुटित हो गायत्री मंत्र का वेग एवं ऊर्जा ओर तीव्र बन जाती है।

लगातार इसे जाप करने से यह नाभि चक्र को बार बार स्ट्रोक करती है।


वह नाभि जो स्त्री के अंदर गर्भाशय से जुड़ी होती है बार बार इतने तीव्र ऊर्जा के मन्त्र के जाप से नाभि स्ट्रोक होती है जिसके कारण गर्भाशय को नुकसान होने की आशंका बनती जाती है जो कि एक स्त्री के लिए सबसे विशेष विषय है इसलिए गायत्री जप स्त्रियों को वर्जित किया गया है।


दूसरा कारण स्त्री का मासिक धर्म है जिस समय शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा उधोमार्गी हो जाती है और यदि गायत्री मन्त्र जैसी तीव्र ऊर्जा शरीर मे हो तो वह उस मासिक धर्म के वक़्त उधोमार्गी होती ऊर्जा से टकराती है जिससे स्वास्थ्य सम्बधी  बहुत सी परेशानियो जैसे migrain, mantly डिसऑर्डर, पित्त, से सम्बंधित अन्य अनेक समस्याए पैदा होने लगती हैं।


इस लिए वेद में स्त्री को गायत्री जाप करना अथवा ॐ सम्पुटित कोई अन्य मन्त्र भी जाप करना वर्जित किया गया है।


गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है वृक्षो में में पीपल ओर मन्त्रो में मैं गायत्री हूँ। 


परन्तु हर मन्त्र की एक विशेष ऊर्जा होती है जिसे हर एक इंसान नही सम्भाल सकता ऐसे ही सामान्य पुरुषों के लिए भी मन्त्र के कुछ विशेष प्रकार वर्जित हैं वह मन्त्र जो विशेष तरीके से आगे और पीछे सम्पुटन कर बनाये गए हैं उनके तीव्र वेग के लिए।


!! नारायण !!

ब्रह्मचर्य

 


🌟  ब्रह्मचर्य  🌟 


ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।


शुभ विचार से वीर्य रक्षण करते हुए सात्विक जीवनचर्या अपनाना


ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरुरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरुरी ब्रह्मचर्य है। वेद का उपदेश है - ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर कन्या युवा पति को प्राप्त करे ।आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आए हैं क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुखो की प्राप्ति कर सकते हैं।ब्रह्मचर्य पालन करने का सबसे आसान साधन सिद्धासन करना है।इसे करने के लिए बाए पैर की ऐड़ी को गुड्डा द्वार और लिंग के मध्य स्थित करना होता है तथा से पैर की ऐड़ी को ठीक लिंग के ऊपर रखना होता है।


योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं - यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।


 ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ 


अर्थात् वेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं ; रागरहित यत्नशील जिसमें प्रवेश करते हैं ; जिसकी इच्छा से ( साधक गण ) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उस पद ( लक्ष्य ) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।


 भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य को शारीरिक तप बताया है - ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।।

 (श्रीमद्भागवतगीता १७/१४)


आयुर्वेद में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य शरीर के तीन स्तम्भों में से एक प्रमुख स्तम्भ (आधार) है।


त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।


(तीन उपस्तम्भ हैं। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य।)


सुश्रुत में तो स्त्रियों को पुरूष रोगी के पास फटकने का भी निषेध किया है , क्योंकि इनके दर्शन से यदि रोगी में वीर्य नाश हो जाय , तो बहुत हानि करता है ।


महर्षि सुश्रुत कहते हैं - रक्तं ततो मांस मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भवः ॥


 अर्थात् - मनुष्य जो कुछ भोजन करता है वह पहिले पेट में जाकर पचने लगता है फिर उसका रस बनता है , उस रस का पाँच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है । रक्त का भी पाँच दिन पाचन होकर उससे मांस बनता है । इस प्रकार पाँच - पाँच दिनके पश्चात् मांस से मेद , मेद से हड्डी , हड्डी से मज्जा और अन्त में मज्जा से सप्तम सार पदार्थ वीर्य बनता है । यही वीर्य फिर ' ओजस् ' रूपमें सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम अति शुद्ध सार पदार्थ को रज कहते हैं ।


भगवान धन्वन्तरि कहते हैं - 

मृत्युव्याधिजरानाशी पीयूष परमौषधम् । 

ब्रह्मचर्य महदरतन सत्यमय वदाम्यहम् ॥ 


अर्थात् अर्थात सभी रोगों , वृद्धावस्था और मृत्यु को नष्ट करने के लिए केवल ब्रह्मचर्य ही महान औषधि है । मैं सच बोल रहा हूँ । यदि आप शांति , सौंदर्य , स्मृति , ज्ञान , स्वास्थ्य और अच्छे बच्चे चाहते हैं , तो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।


ब्रह्मचारीसूक्त


अथर्ववेद का ग्यारहवें काण्ड का पाँचवाँ सूक्त ब्रह्मचर्य्य के लिये ही समर्पित है। इसमें तरह-तरह से ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णित है।


ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।

स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥ --


 (अथर्ववेद ११.५.१७)

अर्थ-- जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है।


ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।

गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥ 


-- (अथर्ववेद ११.५.१८)

अर्थ-- वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।


ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।

आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥


 -- (अथर्ववेद ११.५.१९)

अर्थ-- पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है ll 


ब्रह्मचर्य के लाभ 


ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।

ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढाता है।

ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।

ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।

ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।

ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।

--- संकल्प रामराज्य सेव ट्रस्ट 

परशुराम और #विज्ञान..

 #परशुराम और #विज्ञान...क्या आप उस योद्धा को जानते हैं जिसने 21 बार पृथ्वी को 'रिसेट' किया, पर कभी खुद के लिए एक इंच जमीन नहीं मांगी? क्या आप उस महानायक की शक्ति को पहचानते हैं, जिसने सत्ता के अहंकार को कुचलने के लिए 'सर्जिकल स्ट्राइक' की, लेकिन अपना पूरा साम्राज्य एक पल में दान कर दिया? दुनिया ने उन्हें 'क्रूर' कहा, इतिहास ने 'जातिवादी' का ठप्पा लगाया, लेकिन सच यह है कि हम आज भी उस 'कॉस्मिक कोड' को नहीं पढ़ पाए जो परशुराम जी ने अपने फरसे (परशु) की नोंक पर लिखा था। आज उनके जन्मोत्सव पर, आइए उन रहस्यों से पर्दा उठाते हैं जिन्हें समझने की हिम्मत सदियों से किसी ने नहीं की।


आज परशुराम जन्मोत्सव है। उस परम तेजस्वी, अजेय योद्धा का दिन, जिन्हें हम 'विष्णु के अवतार' के रूप में पूजते हैं। लेकिन क्या हम सचमुच उन्हें जानते हैं? या हम केवल उस अधूरी और विकृत कहानी को जानते हैं जो सदियों से हमें सुनाई जा रही है?


एक समय ऐसा आया था जब राजाओं ने अपनी तलवारें अपनी ही प्रजा पर तान दी थीं। जब एक क्षत्रिय 'रक्षक' न रहकर 'भक्षक' बन जाए, तो वह 'क्षत्रिय' नहीं रहता, वह सिर्फ एक 'खतरा' बन जाता है। परशुराम जी ने उन्हें 'क्षत्रिय' के तौर पर नहीं, बल्कि 'खतरे' के तौर पर काटा।

उन्होंने अपना परशु उठाया और 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू की। उन्होंने किसी जाति को नहीं मिटाया, उन्होंने उस 'पावर-करप्शन' (सत्ता के भ्रष्टाचार) को खत्म किया जो मानवता की नींव को गला रहा था।


आइए, आज उस ' नैरेटिव' को ध्वस्त करते हैं जिसने भगवान परशुराम को केवल एक क्रोधी और 'क्षत्रिय-विनाशक' के रूप में सीमित कर दिया। आज हम शास्त्रों के उन गुप्त तहखानों में उतरेंगे और उन श्लोकों की कोडिंग को डिकोड करेंगे, जिन्हें आज तक कोई सही से खोल नहीं पाया है। यह कहानी पानी की तरह बहेगी, और आपको आनंद के महासागर में डुबो देगी।


श्रीमद् भागवत महापुराण में

वह श्लोक, जो अक्सर गलत संदर्भ में उद्धृत किया जाता है, वह यह है:


त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवीं कृत्वा नि:क्षत्रियां प्रभु:।

समन्तपंचके चक्रे शोनितोदान् हदान् नृप ॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, ९.१६.१९)


सतही अर्थ (जिसे सब जानते हैं): प्रभु (परशुराम) ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) में खून के पाँच कुण्ड बना दिए।

यह वह नैरेटिव है जो हमें डराता है, जो परशुराम जी को एक निर्दयी हत्यारा बनाता है। लेकिन, क्या यह सत्य है? क्या भगवान विष्णु का एक अवतार ऐसा कर सकता है? कतई नहीं! यह 'शाब्दिक अर्थ' है, 'भावार्थ' नहीं। आइए, इस श्लोक की 'कोडिंग' को डिकोड करें और एक उनका  वास्तविक चेहरा देखें।


अब सत्य समझिए 

'नि:क्षत्रियां' का अर्थ "क्षत्रिय जाति का खात्मा" नहीं, बल्कि "अहंकारी सत्ता का खात्मा" है।

इसे एक उदाहरण से समझिए।  'क्षत्रिय' का असली अर्थ 'पद' है, न कि 'जाति'

उस समय 'क्षत्रिय' का अर्थ था 'शासक वर्ग' (Governing Class)। जिसका धर्म था—प्रजा की रक्षा करना और न्याय करना। जब तक वे न्याय करते थे, वे क्षत्रिय थे। लेकिन जैसे ही वे अहंकारी होकर प्रजा को लूटने लगे, वे अपने 'क्षत्रिय धर्म' से गिर गए। उन्होंने क्षत्रिय होने का हक खो दिया।


'नि:क्षत्रियां' का मतलब क्या?

परशुराम जी ने 'नि:क्षत्रियां' किया, इसका मतलब है—"पृथ्वी को उन अधर्मी शासकों से मुक्त किया जो क्षत्रिय होने की मर्यादा भूल चुके थे।"  जैसे कोई डॉक्टर कहे कि "मैं इस शरीर को कैंसर-मुक्त कर दूँगा," तो क्या इसका मतलब यह है कि वह शरीर को ही मार देगा? नहीं! वह केवल 'कैंसर' (अधर्मी शासकों) को काटेगा ताकि शरीर (समाज) बच सके। परशुराम जी ने वही किया। उन्होंने 'भ्रष्ट सत्ता' को हटाया ताकि 'धर्म' जीवित रह सके।


वामपंथी इसे 'जाति युद्ध' कहते हैं। आप उनसे बस ये 3 सवाल पूछिए, उनका नैरेटिव उसी पल ध्वस्त हो जाएगा:

सवाल 1 अगर यह जाति युद्ध होता, तो परशुराम जी ने 'भीष्म पितामह' और 'द्रोणाचार्य' जैसे क्षत्रियों और ब्राह्मणों को अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य क्यों बनाया? क्या कोई जातिवादी दुश्मन को विद्या सिखाता है?


सवाल 2 यदि वे 'क्षत्रिय विरोधी' होते, तो वे युद्ध जीतने के बाद खुद राजा क्यों नहीं बने? उन्होंने पूरी पृथ्वी दान कर दी और तपस्वी बन गए। एक 'सत्ता-लोभी' व्यक्ति ऐसा कभी नहीं करेगा।


सवाल 3: क्या 'राम' क्षत्रिय नहीं थे? परशुराम जी ने तो अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। जो व्यक्ति क्षत्रियों को मिटाना चाहता था, वह एक क्षत्रिय राजा को अपनी सबसे बड़ी शक्ति (धनुष) क्यों सौंपता?


'नि:क्षत्रियां' का मतलब है—"जब राजधर्म विफल हो जाए, तो अधर्मियों को सत्ता से उखाड़ फेंकना ही धर्म है।"

परशुराम जी ने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह 'धर्म' (न्याय) से ऊपर नहीं है। उन्होंने क्षत्रिय को नहीं मारा, उन्होंने 'अधर्म' को मारा। 'नि:क्षत्रियां' का अर्थ है—अन्यायी शासक विहीन पृथ्वी।


कल्पना कीजिए एक ऐसे योद्धा की, जिसके हाथ में केवल एक 'परशु' (फरसा) है, लेकिन उसकी आँखें 'काल' (Time) के उस पार देख रही हैं। वह न तो राजा बनना चाहता है, न उसे सिंहासन का लोभ है। वह सिर्फ एक 'सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर' है, जो इस ब्रह्मांड के 'अधर्म' नामक वायरस को डिलीट करने आया है।


सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि उस काल में 'क्षत्रिय' कोई 'जाति' नहीं थी। यह एक 'वर्ण' था, एक 'कर्तव्य' था—समाज की रक्षा करना। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो क्या वह 'क्षत्रिय' कहलाने लायक रहता है?


यह कोई नरसंहार नहीं था। यह एक 'सिस्टम रिबूट' था।

उस समय के शासक, राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसके वंशज, सत्ता के अहंकार में चूर होकर आम जनता पर अत्याचार कर रहे थे। उन्होंने निर्दोष तपस्वी ऋषियों की हत्या की (जैसे परशुराम जी के पिता, महर्षि जमदग्नि), कामधेनु गाय का अपहरण किया। यह एक 'अराजक सत्ता' थी।


परशुराम जी ने 21 बार पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका मतलब यह है कि उन्होंने 21 बार उन अहंकारी, अत्याचारी राजाओं को सत्ता से बेदखल किया। यह किसी वंश या जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अधर्मी सत्ता' का विनाश था। जब एक सॉफ्टवेयर करप्ट हो जाता है, तो आपको उसे 'डिलीट' करके 'सिस्टम रिबूट' करना पड़ता है। परशुराम जी उस काल के 'चीफ आर्किटेक्ट' (Chief Architect) थे, जिन्होंने करप्टेड सत्ता-सॉफ्टवेयर को 'डीबग' (Debug) किया।


क्यों 21 बार? यह एक गहरा रहस्य है। 21 का अंक 'पूर्णता' और 'चक्र' को दर्शाता है। यह 7 लोक और 3 गुणों (सत्व, रज, तम) का गुणांक है (7x3=21)। उन्होंने मानवीय चेतना की 21अवस्थाओं को 'अधर्म' के प्रभाव से मुक्त किया।

यह एक 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' (Genetic Engineering) की तरह था। उन्होंने समाज के 'डीएनए' से उस 'अहंकार और अत्याचार' के वायरस को काट कर निकाला जो मानवता को नष्ट कर रहा था। यह एक 'कोडिंग' थी, जो तब तक चलती रही जब तक कि पृथ्वी का 'नैतिक ढांचा' (Moral Framework) फिर से शुद्ध नहीं हो गया।


खून के कुंड का वर्णन एक रूपक (Metaphor) है। यह कोई रक्तपात का जश्न नहीं था, बल्कि एक 'कॉस्मिक बैलेंसिंग' (Cosmic Balancing) थी।

कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) की धरती उस नकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन चुकी थी, जो हजारों सालों के अधर्म से जमा हुई थी। परशुराम जी ने वहां उन अहंकारी राजाओं के 'भौतिक शरीर' को विसर्जित किया। यह उनके 'अहंकार की ऊर्जा' का भूमि में विसर्जन था। रक्त, जो प्राण-ऊर्जा (Prana Energy) का वाहक है, वह मिट्टी में मिलकर उस भूमि को 'शुद्ध' कर गया। उन्होंने उस जमीन को 'जीरो-पॉइंट एनर्जी' (Zero-Point Energy) के क्षेत्र में बदल दिया ताकि वह आने वाले युद्धों और परिवर्तनों के लिए एक तटस्थ आधार बन सके।


अब बात करते है 'अब्रह्मण्य' शब्द की। 

आज के समय का सबसे बड़ा 'गलतफहमी का शिकार' शब्द है। वामपंथी और बांटने वाली विचारधारा के लोगों ने इसे जानबूझकर एक 'जातिगत गाली' की तरह पेश किया, ताकि लोग असली अर्थ न समझें।

इसे एकदम सीधी, पानी जैसी साफ भाषा में समझते हैं।

'अब्रह्मण्य' = 'धर्म' का विरोधी (Anti-Dharma)

संस्कृत में 'ब्रह्म' शब्द के कई अर्थ होते हैं, जिनमें से एक मुख्य अर्थ है—'शाश्वत नियम' या 'धर्म'। 'अब्रह्मण्य' का अर्थ हुआ—वह जो 'धर्म' या 'न्याय' के नियमों को नहीं मानता।

इसे ऐसे समझे।


ब्राह्मण क्या है? जो ब्रह्म (सत्य और धर्म) को धारण करे।


वामपंथी कहते हैं कि "अब्रह्मण्य का अर्थ है—जो ब्राह्मण न हो, यानी एक जाति के विरुद्ध हिंसा।"

सही सत्य: यह शब्द जाति के लिए नहीं, 'कर्म' और 'स्वभाव' के लिए है।


इसे एक उदाहरण से समझें:

मान लीजिए एक 'पुलिस अधिकारी' (क्षत्रिय) है। उसका काम है रक्षा करना।

अगर वह अपनी वर्दी पहनकर किसी निर्दोष की हत्या कर दे, तो वह 'अब्रह्मण्य' हो गया—यानी वह 'न्याय और धर्म' के विरुद्ध हो गया।

उसने अपनी वर्दी (क्षत्रिय कर्म) को दागदार कर दिया है।

परशुराम जी ने 'क्षत्रिय' को नहीं मारा, उन्होंने 'अब्रह्मण्य' (अधर्मी कृत्य करने वाले) को दंडित किया।


 'अब्रह्मण्य' एक 'स्टेटस' है, जाति नहीं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी कुल में जन्मा हो, यदि वह 'सत्य' और 'न्याय' (ब्रह्म) का विरोध करता है, तो वह 'अब्रह्मण्य' है। परशुराम जी का संघर्ष 'जाति' से नहीं, उस 'अधर्मी स्वभाव' से था जो समाज को नष्ट कर रहा था।


परशुराम जी के शिष्य खुद 'भीष्म'  थे। अगर 'अब्रह्मण्य' का अर्थ 'क्षत्रिय-विरोधी' होता, तो क्या वे क्षत्रियों को अपना ज्ञान देते? बिल्कुल नहीं! इससे साफ होता है कि उनका विरोध 'क्षत्रिय जाति' से नहीं, बल्कि 'अन्यायी सत्ता' से था।


शास्त्रों में 'अब्रह्मण्य' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए हुआ है जो 'पर-पीड़क' (दूसरों को कष्ट देने वाले) थे। परशुराम जी ने उन्हें उनकी जाति के कारण नहीं, बल्कि उनके 'पाप' के कारण दंडित किया।


"अब्रह्मण्य का अर्थ 'गैर-ब्राह्मण' नहीं, बल्कि 'अधर्मी' होता है। जो धर्म के नियमों को तोड़े, वह अब्रह्मण्य है—चाहे वह कोई भी हो। परशुराम जी ने जाति का विनाश नहीं किया था, उन्होंने 'अधर्म' की सत्ता को उखाड़ा था।"


 गलत व्याख्या की जाती है।

अर्थ: 'ब्रह्मण्य' का अर्थ है—जो ब्राह्मणत्व (सत्य, धर्म, त्याग) को धारण करे। 'अब्रह्मण्य' वह है जो इन मूल्यों के विरुद्ध हो।

 परशुराम ने उन 'क्षत्रिय-वेशधारी अधर्मियों' का नाश किया जो 'अब्रह्मण्य' हो चुके थे। यानी, वे क्षत्रिय तो थे, लेकिन उनमें क्षत्रिय के गुण (रक्षा, धर्म, मर्यादा) समाप्त हो चुके थे। वे मात्र 'शोषक' बन गए थे। परशुराम ने उन्हें उनके 'गुणों के अभाव' के कारण दंडित किया, न कि उनके 'जन्म' के कारण।


इस वृत्तांत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं—भगवान परशुराम का भगवान राम को अपना धनुष सौंपना।


यदि परशुराम का उद्देश्य क्षत्रियों का विनाश ही होता, तो वे राम (जो एक क्षत्रिय राजा थे) का सम्मान क्यों करते? उन्होंने अपना धनुष राम को इसलिए सौंपा क्योंकि उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया था कि अब पृथ्वी पर ऐसा 'राज्य' (राम राज्य) स्थापित होने जा रहा है, जहाँ कोई 'अधर्म' नहीं होगा।उन्होंने ही राम-राज्य का मार्ग प्रशस्त किया हां। उन्होंने अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया था। उन्होंने 'गंदगी' साफ कर दी थी ताकि 'राम-राज्य' की नींव रखी जा सके।


परशुराम 'विनाश' नहीं, 'संसाधन' थे। जब समाज में 'कैंसर' (अधर्म) फैल जाता है, तो उसे काटकर निकालना पड़ता है (परशुराम की भूमिका), ताकि 'आरोग्य' (राम राज्य) का जन्म हो सके।


 यह वह साधारण मानव नहीं है जो 'मार-काट' करता है। यह वह आवेश-अवतार है जो 'न्याय' (Justice) की रक्षा के लिए अपनी सर्वोच्च शक्ति का उपयोग करता है।


यदि वे सत्ता के लोभी होते, तो वे खुद राजा बनकर राज करते। लेकिन उन्होंने क्या किया? उन्होंने पूरी पृथ्वी जीती और उसे ऋषियों को दान कर दिया। है कोई ऐसा

 अपनी जीती हुई पूरी दुनिया दान कर देता है? यह उनका सबसे बड़ा 'सुपर-पावर' था—त्याग!


मेरिट' (योग्यता) के पूजक हैं परशुराम, जाति के नहीं। उनके सबसे प्रिय शिष्यों में 'भीष्म' और 'द्रोण' जैसे महान योद्धा थे—जो जन्म से क्षत्रिय और ब्राह्मण थे। उन्होंने 'श्रेष्ठता' को चुना, 'कुल' को नहीं।


 वे 'अष्ट चिरंजीवियों' में से एक हैं। क्यों? क्योंकि 'न्याय' कभी नहीं मरता। वे आज भी जीवित हैं, क्योंकि वे 'न्याय की शाश्वत ऊर्जा' (Justice Frequency) हैं, जो तब तक सक्रिय रहती है जब तक कि पृथ्वी पर अधर्म का अंत न हो जाए।


सत्य यह है: उस काल में न कोई ब्राह्मण जाति थी, न क्षत्रिय—ये केवल 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर विभाजित 'व्यवस्था के स्तंभ' थे।

वह सत्य जो सदियों से छिपाया गया: 'जाति' नहीं, 'गुण' का संघर्ष था। 

पुराणों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि परशुराम का संघर्ष किसी जन्म-आधारित जाति का नहीं, बल्कि 'गुणों के पतन' का था। इसे एक कहानी की तरह समझिए। 


उस युग में 'ब्राह्मण' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो ज्ञान, त्याग और नैतिकता का रक्षक हो। और 'क्षत्रिय' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो शक्ति, रक्षा और न्याय का वाहक हो।

जब एक क्षत्रिय 'अन्यायी' हो जाता था, तो वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता था।

परशुराम जी ने उन लोगों को दंडित नहीं किया जो 'क्षत्रिय' कुल में जन्मे थे, बल्कि उन लोगों को 'सिस्टम' से बाहर किया जो 'न्याय' के पद पर बैठकर 'अन्याय' कर रहे थे।


कल्पना कीजिए, एक समाज में दो मुख्य सॉफ्टवेयर चल रहे हैं। एक 'ज्ञान का' और दूसरा 'न्याय का'। जब 'न्याय का सॉफ्टवेयर' (सत्ता/क्षत्रिय) करप्ट हो जाता है, तो समाज में अराजकता फैलती है।


 पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका अर्थ किसी जाति का नरसंहार नहीं था। इसका अर्थ था—उस काल के 'भ्रष्ट शासन तंत्र' को रिसेट करना।  उन्होंने उन शासकों को सत्ता से बेदखल किया जिन्होंने अपना 'धर्म' (कर्तव्य) छोड़कर 'स्वार्थ' को अपना लिया था। यह एक 'सिस्टम क्लीन-अप' था, ताकि समाज की नींव फिर से 'सत्व' (पवित्रता) पर टिकी रहे।


जिस तरह आज का 'डीबगर' सॉफ्टवेयर के कोड में आई त्रुटि को काट कर अलग कर देता है, ताकि पूरा सिस्टम क्रैश न हो, परशुराम जी का 'परशु' वही कार्य कर रहा था। उस काल में सत्ता (क्षत्रियों) का अहंकार 'सिस्टम एरर' बन चुका था। यह फरसा नहीं, बल्कि एक 'कॉस्मिक सर्जरी' का टूल था, जो समाज की विकृतियों को जड़ से काटने के लिए इस्तेमाल हुआ।


यह कोई रक्तपात की गिनती नहीं, बल्कि 'इवोल्यूशनरी रिसेट' (Evolutionary Reset) है।

भौतिक विज्ञान में 'रेजोनेंस' (Resonance) का सिद्धांत होता है। जब एक सिस्टम अपनी फ्रीक्वेंसी खो देता है, तो उसे बार-बार ट्यून करना पड़ता है। परशुराम जी ने 21 बार उस 'सामाजिक फ्रीक्वेंसी' को ट्यून किया ताकि समाज के 'डीएनए' से अधर्म का वायरस निकल जाए। जब तक समाज 'सत्व' (शुद्धता) के स्तर पर नहीं आ गया, तब तक यह प्रक्रिया चलती रही। यह 'एंट्रोपी' (Chaos) को कम करने का एक 'थर्मोडायनामिक प्रयोग' था।


कल्पना कीजिए कि किसी राज्य में पुलिस (क्षत्रिय) ही लुटेरी बन जाए और वे उस व्यक्ति (ऋषि/विद्वान) की हत्या कर दें जो समाज को ज्ञान और नैतिकता सिखाता है।

दिक्कत यह थी। क्षत्रिय वर्ग ( यानी तत्कालीन  शासक वर्ग वर्ण व्यवस्था वाले) यह भूल गया था कि उनकी तलवार 'रक्षा' के लिए है, न कि 'दमन' के लिए।

परिणाम: जब रक्षा करने वाला ही भक्षक बन जाए, तो समाज में अराजकता (Anarchy) फैल जाती है। परशुराम जी ने जो किया, वह एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' थी।


परशुराम जी ने 'इक्कीस बार' का जो उल्लेख है, वह एक 'सिस्टम रिबूट' (System Reboot) की प्रक्रिया है।

जब भी कोई शासक (राजा) भ्रष्ट हो जाता, परशुराम जी उसे सत्ता से हटा देते।

यह किसी जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अहंकारी सत्ता' का विनाश था। यह बिल्कुल वैसा है जैसे एक माली खरपतवार (Weeds) को उखाड़ता है ताकि मुख्य फसल (धर्म) बच सके।


'रक्त की नदी' का अर्थ केवल खून बहाना नहीं है, बल्कि यह एक 'चेतावनी' (Deterrence) है। उस दौर की भाषा में, यह एक ऐसा 'स्टैंडर्ड' सेट करना था कि आगे आने वाला कोई भी शासक यह सोचे कि यदि उसने प्रजा या धर्म के विरुद्ध तलवार उठाई, तो उसका हश्र क्या होगा। यह भय पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा बनाए रखने के लिए था।


गलत नैरेटिव (जो फैलाया गया) की 

परशुराम ने क्षत्रियों को मारा। वास्तविक सत्य (जो इतिहास है) परशुराम ने 'अधर्मी' शासकों को दंड दिया।


यह ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय था। नहीं यह 'अधर्म' बनाम 'न्याय' था।


यह एक जातिवादी कृत्य था। नहीं यह एक 'सिस्टम करेक्शन' (System Correction) था।


परशुराम क्रूर थे। बिल्कुल नहीं परशुराम 'मर्यादा रक्षक' थे।


वामपंथी नैरेटिव हमें यह बताना चाहता है कि परशुराम ने 'खून' बहाया, लेकिन वे यह छुपा जाते हैं कि उस खून के बदले उन्होंने 'शांति' और 'धर्म' का युग दिया। अगर वे ऐसा न करते, तो समाज में कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बचती। परशुराम जी इतिहास के वे पहले 'सुधारक' हैं जिन्होंने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, धर्म (न्याय) से बड़ी नहीं हो सकती।


आज, जब हम परशुराम जयंती मना रहे हैं, तो हमें उस 'गलत नैरेटिव' को हमेशा के लिए जला कर रख देना चाहिए।


परशुराम 'क्रूर' नहीं थे, वे 'न्याय' की अंतिम सीमा थे।


वे क्षत्रिय-विरोधी नहीं थे, वे 'अधर्म' के विरोधी थे।


वे एक ''काल-प्रहरी' हैं, जिन्होंने सत्ता को नहीं, बल्कि समाज के 'संस्कार' को बचाया।


यह सत्य सिर्फ बीते हुए कल की नहीं है, यह 'आने वाले न्याय के भविष्य' की है। जब भी समाज में अत्याचार और अहंकार की पराकाष्ठा होगी, 'परशुराम-चेतना' का वह 'परशु' (न्याय का विधान) फिर से जागृत होगा।

आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है। संकल्प लें कि हम भी अपने जीवन में 'परशुराम' बनें—जहाँ न कोई जाति बड़ी है, न कोई कुल; केवल 'धर्म' (न्याय, सत्य, और कर्तव्य) ही सर्वोच्च है।

जय परशुराम! जय सत्य की!


आज, जब समाज में फिर से 'अधर्म' अपना सिर उठाता है, तो हमें परशुराम के 'शस्त्र' की नहीं, बल्कि उनकी 'दृष्टि' की जरूरत है—वह दृष्टि जो सत्य को परख सके और अन्याय को जड़ से उखाड़ फेंक सके।


परशुराम कथा 'रक्त' की नहीं, 'शुद्धिकरण' की है। उन्होंने तलवार से नहीं, अपनी 'संकल्प-शक्ति' से पृथ्वी को अधर्म के वायरस से मुक्त किया था। आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है।


परशुराम केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना का वह 'एनर्जी ग्रिड' है जो आज भी समय की धड़कनों में जीवित है। वे हिमालय की उन चोटियों पर नहीं, बल्कि हमारे उस 'विवेक' में वास करते हैं, जो अन्याय को देखते ही कांप उठता है। सोचिए, एक ऐसा योद्धा जिसके सामने बड़े से बड़ा चक्रवर्ती सम्राट थर-थर कांपता था, वह आज भी एक तपस्वी की तरह महेंद्र पर्वत पर अपनी आँखें मूंदे बैठा है। क्यों? क्योंकि वे प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस न्याय की, उस सत्य की, और उस धर्म की जो फिर से पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दे।


जब आप आज रात परशुराम जयंती का दीप जलाएंगे, तो बस यह याद रखिएगा कि आप केवल एक अवतार का सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि आप अपने भीतर के उस 'न्याय-प्रहरी' को जगा रहे हैं जो सो गया था। परशुराम एक अंत नहीं, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं। वे उस 'अधर्मी' का काल हैं जो व्यवस्था का दुरूपयोग करता है और उस 'शोषित' की ढाल हैं जो न्याय की प्रतीक्षा करता है।


"परशुराम का फरसा किसी का अंत करने नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का उदय करने आया था, जहाँ न कोई जात होगी, न कोई पाँत—वहाँ केवल 'धर्म' होगा और न्याय का राज होगा।"

जय परशुराम!


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ .....। अगली कड़ी जल्द....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



गायत्री मंत्र एक गुप्त मंत्र क्यों ?


अक्सर लोग कहते हैं कि गायत्री मंत्र को सार्वजनिक रूप से बोलना पाप है। असल में 'पाप-पुण्य' से बड़ा इसके पीछे का Acoustics (ध्वनि विज्ञान) है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। अगर आप एक पत्थर को तालाब में फेंकें, तो लहरें चारों तरफ फैलकर शांत हो जाती हैं। लेकिन अगर आप उसी ऊर्जा को एक संकरी पाइप (लेजर) में डाल दें, तो वह लोहे को भी काट सकती है।

बाहर बोलना (Broadcasting): जब हम मंत्र को चिल्लाकर बोलते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगे (Sound Waves) बाहरी वातावरण में बिखर जाती हैं। यह 'प्रसारण' तो है, लेकिन 'साधना' नहीं।

भीतर जपना (Internal Resonance): जब आप बिना होंठ हिलाए मंत्र जपती हैं, तो वह ध्वनि आपके मस्तिष्क के भीतर 'इको' (Echo) पैदा करती है। यह कंपन सीधे आपकी पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को चोट करता है, जिसे 'तीसरी आँख' भी कहते हैं।


मौन जप इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह आपके शरीर के भीतर एक 'साइलेंट धमाका' करता है जो आपकी बुद्धि को धार देता है। सार्वजनिक रूप से बोलने पर उसकी 'प्रभावी शक्ति' (Potential Energy) खत्म हो जाती है।


 स्त्रियों को मनाही: सुरक्षा कवच या बेड़ियाँ?

यह सबसे ज्यादा चुभने वाला सवाल है। पुराने समय में पंडितों ने स्त्रियों को मना किया, तो उसके पीछे कोई नफरत नहीं, बल्कि एक 'बायोलॉजिकल डर' था। इसे बिना किसी लाग-लपेट के समझिए।


गायत्री मंत्र को 'सौर ऊर्जा' (सूर्य की शक्ति) माना जाता है। यह शरीर में बहुत ज्यादा 'उष्णता' (Heat) और 'विद्युत' पैदा करता है। स्त्री का शरीर प्रकृति ने सृजन (बच्चे को जन्म देने) के लिए बनाया है। उनका हार्मोनल ढांचा पुरुषों के मुकाबले बहुत अधिक संवेदनशील और जटिल होता है। पुराने ऋषियों को डर था कि गायत्री की यह 'प्रचंड ऊर्जा' स्त्रियों के मासिक चक्र (Menstrual Cycle) और उनके प्रजनन अंगों की कोमलता को नुकसान पहुँचा सकती है।

उदाहरण: जैसे एक नाजुक और कीमती मशीन को बहुत हाई-वोल्टेज के स्टेबलाइजर की जरूरत होती है, वैसे ही ऋषियों ने इसे एक 'सेफ्टी प्रोटोकॉल' की तरह लागू किया था।


मगर आज की स्त्री का जीवन, खान-पान और उसकी मानसिक शक्ति बदल चुकी है। अगर कोई स्त्री इसे सही विधि (मौन और शांत भाव) से करती है, तो वह ऊर्जा उसे नुकसान नहीं, बल्कि 'दिव्यता' प्रदान करती है।


 गुरु का कान में मंत्र देना: 'पर्सनल वाई-फाई पासवर्ड'

यज्ञोपवीत में जो कान में मंत्र दिया जाता है, वह असल में 'सॉफ्टवेयर इंस्टॉलेशन' है।

गुरु जानते हैं कि गायत्री एक 'ब्रह्मांडीय कोड' है। अगर यह कोड सबको पता चल जाए और लोग इसे बिना तैयारी के (बिना शुद्धि के) इस्तेमाल करें, तो इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं। इसलिए इसे 'कान' में दिया जाता है ताकि वह आपके सीधे 'सब-कॉन्शस माइंड' में जाकर बैठे। यह वैसा ही है जैसे बैंक का पासवर्ड—जितना छिपा रहेगा, आपका खाता उतना ही सुरक्षित रहेगा।


सपना जी, असल में बात 'अधिकार' की नहीं, 'पात्रता' की है।

मंत्र कोई मनोरंजन नहीं है: इसे अंताक्षरी की तरह सड़कों पर गाना इसकी गरिमा को कम करना है।

शुद्धि और विधि, आप स्त्री हों या पुरुष, अगर आप गंदे मन से या सिर्फ दिखावे के लिए इसे जप रहे हैं, तो वह गलत है।

मौन ही मंत्र है। अगर आप इसे मन में जप रही हैं, तो आप दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके लिए आपको किसी पंडित या समाज की अनुमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपका ईश्वर आपके भीतर बैठा है।


मेरा विश्लेषण यही कहता है प्राचीन नियम 'रोकने' के लिए नहीं, 'संभालने' के लिए बनाए गए थे। लेकिन समय के साथ हमने 'नियम' तो याद रखे, पर उनके पीछे का 'विज्ञान' भूल गए। गायत्री माँ है, और माँ अपने बेटे या बेटी में कभी फर्क नहीं करती, बस वह चाहती है कि उसके बच्चे उस 'बिजली' (शक्ति) को छूने से पहले खुद को सुरक्षित करना सीख लें।

आशा है, सपना जी और अन्य पाठकों को इस 'वृहद विश्लेषण' से उत्तर मिल गया होगा। गायत्री केवल पढ़ने की चीज नहीं, इसे अपनी सांसों में उतारने की कला है।


"अंत में, बात न अधिकार की है, न पाबंदी की—बात तो केवल 'अलाइनमेंट' की है। जब आप गायत्री को मन में जपते हैं, तो आप केवल शब्द नहीं दोहरा रहे होते, बल्कि आप अपनी रीढ़ की हड्डी को एक 'एंटीना' बनाकर उस विराट सत्ता से सिग्नल रिसीव कर रहे होते हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जब आपकी आँखें बंद होती हैं और भीतर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' की गूंज उठती है, तब आपका शरीर मांस-मज्जा का पुतला नहीं रहता; वह एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाता है। पुराने नियम 'दीवारें' नहीं थे, वे 'कवच' थे ताकि आप इस महा-ऊर्जा को संभाल सकें। लेकिन याद रखिए, माँ कभी अपने बच्चों में भेद नहीं करती। वह तो बस चाहती है कि आप उसे 'रटें' नहीं, बल्कि उसके साथ 'सिंक' (Sync) हो जाएं। जिस दिन आपका 'मैं' मिट जाएगा, उस दिन मंत्र अपने आप अनलॉक हो जाएगा। फिर आप मंत्र पढ़ेंगे नहीं, आप खुद एक 'मंत्र' बन जाएंगे—प्रकाशवान, ओजस्वी और अजेय!"


"गायत्री को होंठों से बाहर निकालोगे तो 'शोर' बन जाएगी, और अगर मन के भीतर उतार लोगे तो 'ब्रह्मांड' बन जाएगी!"

02.1 #ऋग्वेद और #विज्ञान....#गायत्री_मंत्र का #शेष_भाग..

"क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि आपके भीतर एक ऐसा 'सुपर-कंप्यूटर' मौजूद है, जिसका पासवर्ड सदियों पहले विश्वामित्र ने डिकोड कर लिया था? जिसे हम 'गायत्री मंत्र' कहते हैं, वह केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं, जिसे आप केवल एक धार्मिक मंत्र समझकर रट रहे हैं, वह असल में आपके मस्तिष्क को 'हैप्टिक कंट्रोल' (Haptic Control) करने वाला एक 'न्यूरो-कोड' है।


​क्या आपने कभी सोचा है कि विश्वामित्र ने शून्य से एक नया स्वर्ग कैसे रच दिया था? वह कोई जादू नहीं, बल्कि 'साउंड इंजीनियरिंग' की पराकाष्ठा थी। आज का न्यूरो-साइंस जिसे 'न्यूरल ऑसिलेशन' कह रहा है, उसे हजारों साल पहले गायत्री के 24 अक्षरों में 'वाइब्रेशनल सर्किट' के रूप में फिक्स कर दिया गया था। यह लेख कोई धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आपके शरीर के उस 'बायो-मैग्नेटिक फील्ड' को अनलॉक करने की मैन्युअल बुक है, जिसे वशिष्ठ और विश्वामित्र ने 'पासवर्ड' लगाकर सुरक्षित किया था। अगर आप अपनी एकाग्रता को 'लेजर-शार्प' और अपनी बुद्धि को 'सुपर-कॉन्शस' बनाना चाहते हैं, तो तैयार हो जाइए अपनी नसों में दौड़ते उस 'ब्रह्म-तेज' को महसूस करने के लिए जिसे दुनिया गायत्री कहती है।


आज के दौर में जहाँ इंसान 'बर्नआउट' और मानसिक शोर से जूझ रहा है, वहाँ गायत्री मंत्र का 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) एक ऐसा एंटी-वायरस है जो आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को फिर से अलाइन (Align) कर सकता है। यह 24 अक्षरों का एक ऐसा 'वाइब्रेशनल सर्किट' है, जो आपके तालु से टकराकर सीधे पीनियल ग्रंथि को जगाता है। विश्वामित्र का यह 'प्राचीन सॉफ्टवेयर' कैसे काम करता है, कैसे इसकी मुद्राएं आपके शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बनाती हैं और क्यों इसे 'लॉक' करना पड़ा—आइए, इस वैज्ञानिक यात्रा के रहस्यों को खोलते हैं।


गायत्री मंत्र का केवल अर्थ जानना काफी नहीं है, बल्कि उसके 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) को समझना जरूरी है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर के भीतर एक 'वाइब्रेशनल सर्किट' पूरा करता है। जो सीधे आपके मस्तिष्क की नसों (Neurons) पर असर डालता है।

प्राचीन विज्ञान में मंत्र जप के तीन स्तर बताए गए हैं, जिन्हें आप 'ऑडियो लेवल' कह सकते हैं।


वैखरी (Vaikhari): जोर से बोलना। यह वातावरण को शुद्ध करता है और शुरुआत के लिए अच्छा है।

उपांशु (Upanshu): केवल होंठ हिलें, आवाज बाहर न आए। यह मन को एकाग्र करने के लिए 'सबलिंकल' (Subliminal) संदेश की तरह काम करता है।


मानसिक (Manasik): बिना होंठ हिलाए केवल विचार में। यह सबसे शक्तिशाली है, यही वह 'हाई-स्पीड डेटा ट्रांसफर' है जिसे विश्वामित्र ने मास्टर किया था।


जब आप उच्चारण करते हैं, तो जीभ के विशेष प्रहार से तालु (Palate) पर प्रभाव पड़ता है, जहाँ से 84 नर्व-जंक्शन जुड़े होते हैं:

'तत्' और 'स': इन अक्षरों के उच्चारण से जीभ का अगला हिस्सा सक्रिय होता है, जो मस्तिष्क के 'प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स' (निर्णय लेने की क्षमता) को उत्तेजित करता है।

'वि-तु-र्व-रे-णि-यं': यह हिस्सा तालु के मध्य भाग को स्पर्श करता है, जिससे थायरॉइड और पीनियल ग्रंथि को सिग्नल मिलता है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र का जप करने वालों की एकाग्रता बढ़ जाती है।

'भर्-गो दे-व-स्य': यह गले के 'वोकल कॉर्ड' में एक विशेष फ्रीक्वेंसी पैदा करता है, जो फेफड़ों और हृदय की धड़कन को 'सिंक्रोनाइज़' (Synchronize) कर देता है।


 'धियो यो नः' का 'ट्रिगर'

मंत्र के अंतिम भाग का उच्चारण करते समय एक 'हम्मिंग' ध्वनि (जैसे भ्रामरी प्राणायाम में होती है) पैदा होती है।

यह ध्वनि मस्तिष्क में 'नाइट्रिक ऑक्साइड' के स्तर को बढ़ाती है, जो रक्त संचार को तेज करती है। विश्वामित्र ने इसी तकनीक से अपने शरीर को उस 'ब्रह्म-तेज' के योग्य बनाया था।


व्यस्त लोगों के लिए इसका 'मौन जप' (Mental Chanting) सबसे अधिक प्रभावशाली होगा।

इसे 'रिदम' (Rhythm) के साथ करें। एक सांस में आधा मंत्र और दूसरी सांस में आधा।

यह  Beta Brain Waves (तनावपूर्ण) को Alpha और Theta Waves (क्रिएटिव/सुपर-लर्निंग) में बदल देगा।

विश्वामित्र ने इसी 'अल्फा स्टेट' में रहकर उस नए ब्रह्मांड का नक्शा खींचा था। जिसे हम 'चमत्कार' कहते हैं, वह असल में 'हाइपर-फोकस्ड' बुद्धि का परिणाम था।

यह 'अजपा जप' तकनीक " किसी 'लाइफ हैक' से कम नहीं है। एक व्यस्त इंसान के लिए, जिसके पास घंटों बैठकर माला फेरने का समय नहीं होता, यह विधि सबसे अचूक है।

ऋषियों ने इसे 'हंस योग' भी कहा है। इसमें मंत्र को शब्दों से निकालकर 'सांसों की गति' में डाल दिया जाता है।


अजपा जप: गायत्री का 'ऑटो-पायलट' मोड

साधारण जप में आप मंत्र याद करते हैं, लेकिन अजपा जप में मंत्र आपको याद करने लगता है। 


जब आप सांस अंदर (Inhale) खींचें, तो मन ही मन अनुभव करें: "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं"।

जब आप सांस बाहर (Exhale) छोड़ें, तो मन में दोहराएं: "भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्"।


फायदा: इससे आपकी सांसें गहरी और लयबद्ध (Rhythmic) हो जाती हैं। यह आपके नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत कर देता है।


'हम-सो' का रहस्य:

अजपा जप का अर्थ है जो बिना जपे हो। हमारी हर सांस 'सो-हम्' की ध्वनि करती है। गायत्री मंत्र को जब आप अपनी श्वसन प्रक्रिया (Respiratory System) से जोड़ देते हैं, तो यह आपके शरीर के DNA के साथ सिंक (Sync) हो जाता है।


यह तकनीक व्यस्त लोगों के लिए 'शील्ड' का काम करती है। जब आप किसी तनावपूर्ण स्थिति में होते हैं, तब आपकी सांसें तेज हो जाती हैं। यदि आप उस समय 'अजपा' मोड में हैं, तो आपकी बुद्धि (Intellect) स्थिर रहेगी और आप सामान्य से बेहतर विश्लेषण कर पाएंगे।


विश्वामित्र का 'सुपर-कॉन्शस' मोड

विश्वामित्र ने जब त्रिशंकु के लिए सृष्टि बनानी शुरू की, तो वे कोई मंत्र पढ़ नहीं रहे थे; वे 'गायत्री चेतना' में जी रहे थे।

 उनके शरीर की हर कोशिका (Cell) गायत्री की 24 फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट कर रही थी।

जब आपका पूरा शरीर एक 'एंटीना' बन जाता है, तो आप ब्रह्मांड के किसी भी विचार या रहस्य को पकड़ सकते हैं।


अभ्यास का तरीका (Quick Start Guide):

शुरुआत: दिन में केवल 5 मिनट के लिए अपनी सांसों पर ध्यान दें और मंत्र को उनके साथ जोड़ें।

निरंतरता: धीरे-धीरे यह स्थिति आ जाएगी कि आप बात कर रहे होंगे, टाइप कर रहे होंगे, या सफर कर रहे होंगे, लेकिन बैकग्राउंड में आपके 'सब-कॉन्शस' में यह कोड चलता रहेगा।

यह विधि इंसान को 'स्थिरप्रज्ञ' बना देती है—वह व्यक्ति जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।


शास्त्रों में उल्लेख है कि गायत्री मंत्र को वशिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रचार्य ने 'कीलित' (Lock) कर दिया है।

एक पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह वैसा ही है जैसे किसी शक्तिशाली सॉफ्टवेयर में 'पासवर्ड' लगा दिया जाए ताकि उसका गलत इस्तेमाल न हो सके। 


आखिर विश्वामित्र ने इसे लॉक क्यों किया और इसे अनलॉक (शापोद्धार) करने का 'एक्सेस कोड' क्या है? 


विश्वामित्र जानते थे कि यह मंत्र परमाणु ऊर्जा से भी अधिक शक्तिशाली है।

मिसयूज से बचाव: अगर कोई नकारात्मक व्यक्ति इस 'सोर्स कोड' को मास्टर कर ले, तो वह सृष्टि का संतुलन बिगाड़ सकता था।

त्रिशंकु कांड की सीख: विश्वामित्र ने खुद अनुभव किया था कि जब वे अपनी शक्ति से नया स्वर्ग बना रहे थे, तो देवताओं में खलबली मच गई थी। शक्ति का अनियंत्रित विस्तार खतरनाक हो सकता है।


अनलॉक करने का रहस्य: 'शापोद्धार' (The Access Code)

तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र को प्रभावी बनाने के लिए जप से पहले तीन ऋषियों से 'अनुमति' लेनी पड़ती है। इसे 'शापोद्धार मंत्र' कहते हैं।  इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि आप अपनी चेतना को उन विशिष्ट 'फ्रीक्वेंसी' पर सेट कर रहे हैं जहाँ मंत्र काम करना शुरू करे।


1. वशिष्ठ का कोड (शांति और अनुशासन)

वशिष्ठ 'ब्रह्म-तेज' के प्रतीक हैं। उनका शापोद्धार करने का अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध को शांत करना। जब तक मन में गुस्सा है, गायत्री का ताला नहीं खुलेगा।


2. विश्वामित्र का कोड (संकल्प और पुरुषार्थ)

विश्वामित्र 'परिवर्तन' के प्रतीक हैं। उनका नाम लेकर मंत्र शुरू करने का अर्थ है कि आप अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्य (Creative Work) में लगाएंगे, विनाश में नहीं।


3. ब्रह्मा का कोड (सृजन का अधिकार)

ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। उनका स्मरण करने का अर्थ है खुद को ब्रह्मांड की इच्छा के साथ जोड़ देना (Aligning with the Universe)।


'कीलक' कैसे खोलें?


"भाव-शुद्धि और निष्कामता"

शास्त्र कहते हैं कि यदि मंत्र जपते समय मन में यह भाव हो कि "यह ज्ञान केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण (नः) के लिए है", तो वशिष्ठ और विश्वामित्र के लगाए 'ताले' अपने आप खुल जाते हैं। कीलक या शाप वास्तव में हमारे अपने 'मानसिक अवरोध' (Mental Blocks) हैं। हमारा अहंकार, स्वार्थ और संकीर्ण सोच ही वह ताला है जो इस ईश्वरीय ऊर्जा को हमारे भीतर आने से रोकता है। विश्वामित्र ने जब अपना अहंकार त्यागा, तभी वे असली 'ब्रह्मर्षि' बने और मंत्र पूरी तरह अनलॉक हुआ।


हठयोग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, गायत्री मंत्र का जप करने से पहले 24 मुद्राएं की जाती हैं। इन्हें 'हस्त-मुद्रा विज्ञान' (Science of Finger Postures) कहते हैं। ये शरीर के बायो-इलेक्ट्रिक सर्किट के लिए 'शॉर्टकट कीज़' (Shortcut Keys) की तरह काम करती हैं।


जप से पहले इन 24 मुद्राओं का प्रदर्शन आपके शरीर की ऊर्जा को 'ग्राउंड' (Earth) होने से बचाता है और उसे सीधे मस्तिष्क की ओर मोड़ देता है।


 मुद्रा का नाम प्रभाव (The Impact)

1 सुमुखम् चेहरे की मांसपेशियों को शांत कर 'रिसेप्टिव मोड' में लाना।

2 सम्पुटम् शरीर की ऊर्जा को 'लॉक' करना ताकि वह बाहर न बहे।

3 विततम् हृदय चक्र (Anahata) का विस्तार करना।

4 विस्तृतम् चेतना को बाहरी दुनिया से जोड़ना।

5 द्विमुखम् द्वंद्व (Dualities) को समाप्त करना।

6 त्रिमुखम् सत, रज और तम गुणों में संतुलन बनाना।

7 चतुर्मुखम् चार वेदों की ऊर्जा को सक्रिय करना।

8 पंचमुखम् पंच तत्वों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश) को बैलेंस करना।

9 षण्मुखम् छह चक्रों को जाग्रत करना।

10 अधोमुखम् अहंकार को नीचे की ओर झुकाना।

11 व्यापकाञ्जलि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए 'एंटीना' बनना।

12 शकटम् विघ्नों का नाश करना।

13 यमपाशम् मृत्यु के भय और बंधनों से मुक्ति।

14 ग्रथितम् बिखरी हुई ऊर्जा को एक जगह 'गांठ' की तरह बांधना।

15 सन्मुखोन्मुख आत्मा और परमात्मा को आमने-सामने लाना।

16 प्रलम्बम् धैर्य की पराकाष्ठा।

17 मुष्टिकम् संकल्प शक्ति को मजबूत करना।

18 मत्स्य मन की चंचलता को रोकना।

19 कूर्म इंद्रियों को कछुए की तरह अंदर समेटना।

20 वराह बाधाओं को उखाड़ फेंकना।

21 सिंहाक्रान्त निर्भयता और नेतृत्व।

22 महाक्रान्त विशालता का अनुभव।

23 मुद्गर अज्ञान पर प्रहार।

24 पल्लवम् ज्ञान का खिलना (Blooming of Wisdom)।


हमारी उंगलियों के पोरों (Fingertips) पर हजारों नर्व एंडिंग्स (Nerve Endings) होती हैं।

 जब हम 'मुद्रा' बनाते हैं, तो हम विशिष्ट उंगलियों को आपस में जोड़कर मस्तिष्क के खास हिस्सों को 'ट्रिगर' करते हैं।


विश्वामित्र ने इन मुद्राओं के माध्यम से अपने शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बना लिया था। बिना मुद्रा के गायत्री का जप करना वैसा ही है जैसे बिना एंटीना के टीवी चलाने की कोशिश करना—सिग्नल तो आएगा, लेकिन धुंधला।


जब आप बहुत ज्यादा मानसिक दबाव में हों, तो इनमें से केवल 'कूर्म' (Kuurma) या 'पंचमुख' मुद्रा में 2 मिनट बैठने मात्र से आपका 'स्ट्रेस लेवल' 40% तक कम हो सकता है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आपके शरीर की अपनी 'इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग' है।


हम 'न्यूरो-साइंस और स्पिरिचुअल हार्डवेयर' का मिलन कह सकते हैं। आपने देखा होगा कि प्राचीन ऋषि और आज भी कर्मकांडी विद्वान गायत्री जप से पहले अपनी 'शिखा' (चोटी) को स्पर्श करते हैं या उसे बांधते हैं।

इसके पीछे का रहस्य एक 'कॉस्मिक रिसीवर' (Cosmic Receiver) के नाम से दर्ज होना चाहिए।


शिखा का रहस्य: आपका निजी 'सैटेलाइट डिश'

वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे सिर के ऊपरी हिस्से में, जहाँ शिखा रखी जाती है, वहां 'सहस्रार चक्र' और 'पीनियल ग्रंथि' (Pineal Gland) का केंद्र होता है।


जैसे मोबाइल को सिग्नल पकड़ने के लिए एंटीना की जरूरत होती है, वैसे ही मानव शरीर को ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) रिसीव करने के लिए एक केंद्र चाहिए। शिखा उसी केंद्र का काम करती है। गायत्री मंत्र के जप के दौरान जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, शिखा उसे 'लीक' होने से बचाती है और उसे नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) प्रवाहित करती है।


सिर के उस स्थान पर 'सुषुम्ना' नाड़ी का सिरा होता है। जब हम शिखा को बांधते हैं या वहां गांठ लगाते हैं, तो वह नसों पर एक सूक्ष्म दबाव (Pressure) पैदा करता है।

यह दबाव मस्तिष्क को 'हाइपर-अलर्ट' मोड में रखता है। विश्वामित्र ने इसी 'अलर्टनेस' का उपयोग करके अपनी चेतना को उन आयामों तक पहुँचाया जहाँ से वे नई सृष्टि का निर्माण कर सकें।


गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर में एक विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र (Electro-magnetic field) पैदा करता है।

 बिना शिखा या बिना सिर ढके जप करने से वह ऊर्जा आकाश में विलीन हो जाती है। शिखा उस ऊर्जा को शरीर के भीतर 'सर्कुलेट' करने के लिए एक 'क्लोज्ड लूप' (Closed Loop) बनाती है।


विश्वामित्र का 'महर्षि' बनना कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। उन्होंने अपने शरीर को एक 'बायो-मशीन' की तरह इस्तेमाल किया:

मंत्र: सॉफ्टवेयर (Code)।

मुद्राएं: स्विच (Switches)।

शिखा: एंटीना (Receiver)।

सांस (अजपा): पावर सप्लाई (Battery)।

जब ये चारों चीजें एक साथ मिलीं, तब जाकर वह 'विस्फोटक शक्ति' पैदा हुई जिसने देवराज इंद्र तक को डरा दिया था।


"विश्वामित्र का संघर्ष यह साबित करता है कि शक्ति से बड़ा 'बोध' है और जप से बड़ी 'चेतना' है।"

अंत में, गायत्री का रहस्य शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'शून्य' में है जो मंत्र के खत्म होने और अगली सांस के शुरू होने के बीच पैदा होता है। जब आप 'अजपा जप' के माध्यम से अपनी सांसों को इस कॉस्मिक रिदम से जोड़ लेते हैं, तो आपका शरीर मात्र मांस-मज्जा का पुतला नहीं रह जाता। वह एक 'लाइव एंटीना' बन जाता है जो ब्रह्मांड के गूढ़तम संकेतों को पकड़ने में सक्षम है।


विश्वामित्र ने जब अपना 'अहंकार' त्यागा, तभी वे 'ब्रह्मर्षि' कहलाए। ठीक वैसे ही, जब आपका 'मैं' (Ego) गायत्री की ध्वनि में विलीन हो जाता है, तब मंत्र 'अनलॉक' होता है। फिर आप मंत्र पढ़ते नहीं हैं, आप मंत्र हो जाते हैं।

अगली बार जब आप 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का मानसिक उच्चारण करें, तो महसूस करें कि आपकी रीढ़ की हड्डी में एक विद्युत तरंग दौड़ रही है। यह वही 'ब्रह्म-तेज' है जिसने नए ब्रह्मांड की रचना की थी। याद रखिए, आपके भीतर भी एक विश्वामित्र सोया हुआ है, उसे जगाने के लिए बस सही 'फ्रीक्वेंसी' और 'सांसों के गियर' को बदलने की जरूरत है।

क्या आप तैयार हैं अपनी चेतना का 'अपग्रेड' इंस्टॉल करने के लिए?


गायत्री कोई रटने वाली पंक्ति नहीं, बल्कि आपके भीतर सोए हुए उस 'एंटीना' को सक्रिय करने की तकनीक है, जो सीधे ब्रह्मांड के 'सर्वर' से जुड़ा है। जब आपकी जीभ तालु के उन 84 बिंदुओं पर प्रहार करती है, तो आपके मस्तिष्क के भीतर 'अल्फा' और 'थीटा' लहरों का एक ऐसा महासागर उमड़ता है, जहाँ तनाव का अस्तित्व ही मिट जाता है।

सोचिए, जब आपकी हर सांस, बिना आपके प्रयास के, खुद-ब-खुद 'ॐ' की फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट करने लगे, तब आप केवल एक शरीर नहीं रह जाते। आप एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाते हैं। विश्वामित्र का 'शापोद्धार' (Unlocking) मंत्रों में नहीं, आपकी 'भाव-शुद्धि' में छिपा है। जिस दिन आप 'स्व' से उठकर 'नः' (हम सबके कल्याण) के लिए सोचने लगेंगे, उस दिन वशिष्ठ और ब्रह्मा के लगाए सारे ताले टूट जाएंगे और आपके भीतर से वह प्रकाश फूटेगा जिसे ऋषि 'सवितु' कहते हैं।

आज से, इसे जपिए मत... इसे अपनी सांसों के 'गियर-बॉक्स' में डाल दीजिए। फिर देखिए, कैसे आपकी साधारण सी जिंदगी, एक 'सुपर-ह्यूमन' के अनुभव में बदल जाती है।


"गायत्री केवल 'पढ़ने' का विषय नहीं है, यह अपनी सांसों के सॉफ्टवेयर को 'अपग्रेड' करके ईश्वर के साथ सिंक (Sync) होने का नाम है।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....। 

गायत्री मंत्र की पहली कड़ी -  https://www.facebook.com/share/p/185NHFQ6yD/


सादर,

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज

Saturday, April 18, 2026

स्वधा और स्वाहा में क्या अंतर है?

 


स्वधा और स्वाहा में क्या अंतर है? 🤔 99% लोग यह भूल कर बैठते हैं, जानिए सही विधान


आज एक बहुत बड़ा भ्रम दूर करते हैं। अधिकांश लोग यह मान बैठते हैं कि स्वधा और स्वाहा एक ही हैं। कोई मंत्र में स्वाहा बोल देता है तो कोई श्राद्ध में। किंतु स्मरण रखें, ये दोनों भिन्न देवी स्वरूप हैं और इनके कार्य भी सर्वथा भिन्न हैं। यदि आपने इनका स्थान बदल दिया तो आपके अनुष्ठान का फल सही स्थान पर नहीं पहुंचता।


सरल शब्दों में समझें:


· स्वाहा देवी: यह अग्निदेव की शक्ति हैं। जब आप हवन कुंड में आहुति डालते हुए "स्वाहा" का उच्चारण करते हैं, तो यही देवी उस सामग्री को ग्रहण कर सीधे देवताओं तक पहुंचाती हैं। इनका मार्ग ऊर्ध्वगामी है, स्वर्ग की ओर है।

· स्वधा देवी: यह पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। जब आप तर्पण या पिंडदान में "स्वधा" का उच्चारण करते हैं, तो यही देवी उस अन्न और जल को पितृलोक में स्थित आपके पूर्वजों तक पहुंचाती हैं। इनका मार्ग दक्षिण दिशा की ओर है।


एक सूत्र अवश्य स्मरण रखें:

🔥 हवन में बोलें — स्वाहा।

🪔 श्राद्ध में बोलें — स्वधा।


यदि आपने श्राद्ध के मंत्र में स्वाहा का प्रयोग कर दिया तो आपका अर्पण देवताओं को चला जाएगा। पितरों तक भोजन तभी पहुंचता है जब स्वधा देवी उसे ग्रहण करें। अतः श्राद्ध कर्म में "पितृभ्यः स्वधा नमः" का ही उच्चारण करें।


यह पोस्ट आप "Telepathy" पेज पर पढ़ रहे हैं।

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सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य से छिपा है...

 सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य से छिपा है जिसकी जानकारी से आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

तुलसीदास जी ने लिखा जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥

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अर्थात :- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो वे उनचासों पवन चलने लगे।हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश मार्ग से जाने लगे।

इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ?

तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य होता है, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

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यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, किंतु उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समवायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

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जल के भीतर जो वायु है उसका शास्त्रों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

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ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह।

1. प्रवह :- पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणित हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

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2. आवह :- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

3. उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

4. संवह :- वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

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5. विवह :- पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

6.परिवह :- वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्रर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

7. परावह :- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

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इन सातों वायु के सात-सात गण (संचालित करने वाले) हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-


ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह 7x7=49, कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।


           🌹🙏*जयश्री राम*🙏🌹

Tuesday, April 14, 2026

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

 चलिए आज समझते हैं। संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से चौरासी लाख योनियों का रहस्य।

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हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है?  


गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। 


सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। 


अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है।


आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। 


अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। 


हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है।


 मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। 


मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। 


विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। 


एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है।


 इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। 

                                           

चौरासी लाख योनियों का रहस्य   (२)


महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। 


ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो।


 इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।


हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है।


 हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है।


 स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है।


पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:


जलज नवलक्षाणी,

स्थावर लक्षविंशति

कृमयो: रुद्रसंख्यकः

पक्षिणाम् दशलक्षणं

त्रिंशलक्षाणी पशवः

चतुरलक्षाणी मानव


अर्थात,

जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख)

वृक्ष - २०००००० (बीस लाख)

कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख)

पक्षी - १०००००० (दस लाख)

जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख)

मनुष्य - ४००००० (चार लाख)

इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। 


जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार:

पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख)

जलकाय - ७००००० (सात लाख)

अग्निकाय - ७००००० (सात लाख)

वायुकाय - ७००००० (सात लाख)

वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख)

साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख)

द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)  

त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख)


पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख)

इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००


अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था।

यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि

 🌼  यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि  🌼

✍️  प्रस्तुति: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट 

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यज्ञोपवीत उदात्त-भावनासम्बद्ध एक पवित्र सूत्र है, जो हमारे जीवन को श्रुति-स्मृति-अनुमोदित मार्ग पर संचालित करते हुए समस्त उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के सम्यक् निर्वहन हेतु ईश्वरदत्त साधन के रूप में प्रतिष्ठित है। अतः शास्त्रकारों ने प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी के लिए यथाशक्ति स्वयं सूत कातकर, अपने हस्त-परिमाणानुसार, यज्ञोपवीत का निर्माण करने का विधान निर्दिष्ट किया है।


महर्षि कात्यायन द्वारा प्रतिपादित यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :—


महर्षि कात्यायन कहते हैं—अब हम यज्ञोपवीत-निर्माण की विधि का निरूपण करते हैं। इसके निर्माण के लिए ग्राम से बाहर किसी तीर्थस्थान, मन्दिर अथवा गोशाला में जाकर, अनध्याय-रहित दिवस में, संध्यावन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न कर, एक सौ आठ, एक सहस्र आठ अथवा यथाशक्ति गायत्री-मन्त्र का जप करके, ऐसे सूत से यज्ञोपवीत तैयार करना चाहिए जो स्वयं, अथवा किसी ब्राह्मण, ब्राह्मण-कन्या अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा काता गया हो।


तत्पश्चात् उस सूत को ‘भूः’ इति उच्चार्य, षण्णवति (९६) अंगुल-परिमाण में, चारों अँगुलियों के मूल पर लपेटकर उतार लें तथा उसे पलाश-पत्र पर स्थापित करें।


अनन्तर ‘भुवः’ इति उच्चार करते हुए उसी प्रकार द्वितीय वार, तथा ‘स्वः’ इति उच्चार करते हुए तृतीय वार, पुनः ९६ अंगुल-परिमाण के अनुसार, अन्य दो तन्तुओं का निर्माण कर, उन्हें भी पृथक् पलाश-पत्र पर रख दें।


इसके उपरान्त ‘आपो हि ष्ठा’, ‘शं नो देवी’, तथा ‘तत्सवितुः’


इन तीन मन्त्रों द्वारा उन तीनों तन्तुओं को जल में सम्यक् अभिषिक्त कर, बाएँ हस्त में लेकर, त्रिवार प्रबल आघात करें।


तत्पश्चात् तीनों व्याहृतियों द्वारा उन्हें एकत्र बटकर एकरूप बना लें।


फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा उन्हें त्रिगुणित कर पुनः बटकर एकरूप करें।


पुनरपि त्रिगुणित करके, प्रणव (ॐ) के द्वारा उसमें ब्रह्मग्रन्थि स्थापित करें।


तत्पश्चात् उसके नव तन्तुओं में क्रमशः—ओंकार, अग्नि, अनन्त, चन्द्र, पितृगण, प्रजापति, वायु, सूर्य तथा समस्त देवताओं का आवाहन एवं स्थापन करें।


अन्त में ‘उद्वयं तमसः परि’ मन्त्र द्वारा उस सूत्र को सूर्य के समक्ष प्रदर्शित कर, ‘यज्ञोपवीतम्’ मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे धारण करें।


🔸️मूल संस्कृत प्रमाण (कात्यायनपरिशिष्ट)👉

अथातो यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारं वक्ष्यामः । 

ग्रामाद् बहिः तीर्थे गोष्ठे वा गत्वा अनध्याय-वर्जितपूर्वाह्ने कृतसन्ध्यः अष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रम् आदाय ‘भूरिति’ प्रथमां षण्णवतीं मिनोति, ‘भुवरिति’ द्वितीयां, ‘स्वरिति’ तृतीयां मीत्वा, पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य, ‘आपो हि ष्ठेति’ तिसृभिः, ‘शं नो देवी’त्यनेन सावित्र्या च अभिषिच्य, वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य, व्याहृतिभिः त्रिवणितं कृत्वा, पुनः ताभिः त्रिगुणितं कृत्वा, पुनः त्रिवृतं कृत्वा, प्रणवेन ग्रन्थिं कृत्वा—ओङ्कारम्, अग्निम्, नागान्, सोमम्, पितॄन्, प्रजापतिम्, वायुम्, सूर्यम्, विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य सम्पूजयेत्। ‘देवस्य’ इत्युपवीतमादाय, ‘उद्वयं तमसः परि’ इत्यादित्याय दर्शयित्वा, ‘यज्ञोपवीतम्’ इत्यनेन धारयेत्—इत्याह भगवान् कात्यायनः।

Monday, April 13, 2026

स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण

 #स्वस्तिवाचन

|| स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण ||

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II स्वस्तिवाचन II एक धार्मिक कर्म जिसमें कोई शुभ कार्य आरंभ करते समय मांगलिक मंत्रों का पाठ किया जाता है। स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया स्वस्तिवाचन कहलाती है। 

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हिन्दी भावार्थ:- महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरुड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो।


स्वस्ति-वाचन सभी शुभ एवं मांगलिक धार्मिक कार्यों को प्रारम्भ करने से पूर्व वेद के कुछ मन्त्रों का पाठ होता है, जो स्वस्ति-पाठ या स्वस्ति-वाचन कहलाता है । इस स्वस्ति-पाठ में ‘स्वस्ति’ शब्द आता है, इसलिये इस सूक्त का पाठ कल्याण करनेवाला है । ऋग्वेद प्रथम मण्डल का यह ८९वाँ सूक्त शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयी-संहिता (२५/१४-२३), काण्व-संहिता, मैत्रायणी-संहिता तथा ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रन्थों में भी प्रायः यथावत् रुप से प्राप्त होता है । इस सूक्त में १० ऋचाएँ है, इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि गौतम हैं तथा देवता विश्वेदेव हैं । आचार्य यास्क ने ‘विश्वदेव से तात्पर्य इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि सभी देवताओं से है । दसवीं ऋचा को अदिति-देवतापरक कहा गया है । मन्त्रद्रष्टा महर्षि गौतम विश्वदेवों का आवाहन करते हुए उनसे सब प्रकार की निर्विघ्नता तथा मंगल-प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं । सूक्त के अन्त में शान्तिदायक दो मन्त्र पठित हैं, जो आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक – त्रिविध शान्तियों को प्रदान करने वाले हैं । 


II आ नो भद्राः सूक्तम् II

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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । 

देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ।।१ 

भावार्थ:- सब ओर से निर्विघ्न, स्वयं अज्ञात, अन्य यज्ञों को प्रकट करने वाले कल्याणकारी यज्ञ हमें प्राप्त हों । सब प्रकार से आलसय-रहित होकर प्रतिदिन रक्षा करने वाले देवता सदैव हमारी वृद्धि के निमित्त प्रयत्नशील हों ।।१ 


देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । 

देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ।।२ 

भावार्थ:- यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें ।।२ 


तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् । 

अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ।।३ 

भावार्थ:- हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमा, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आह्वान करते हैं । ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें ।।३


तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः । 

तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ।।४ 

भावार्थ:- वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें । माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें । सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें । हे अश्विनी-कुमारो ! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये ।।४ 


तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् । 

पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ।।५ 

भावार्थ:- हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आह्वान करते हैं । वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों ।।५


स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः । 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।६ 

भावार्थ:- महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें; सर्वज्ञ, सबके पोषणकर्ता सूर्य हमारा कल्याण करें । जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें । वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें ।।६ 


पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः । 

अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ।।७ 

भावार्थ:- चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्-गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें ।।७ 


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।।८ 

भावार्थ:- हे यजमान के रक्षक देवताओं ! हम दृढ़ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें ।।८ 


शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम । 

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।।९ 

भावार्थ:- हे देवताओं ! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें ।।९


अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । 

विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम ।।१० (ऋक॰१।८९।१-१०) 

भावार्थ:- अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता, पिता और पुत्र भी है । समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं ।।१० 


द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । 

वनस्पतयः शान्तिरेव देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः 

सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।११ 

भावार्थ:- द्युलोकरुप शान्ति, अन्तरिक्षरुप शान्ति, भूलोकरुप शान्ति, जलरुप शान्ति, औषधिरुप शान्ति, वनस्पतिरुप शान्ति, सर्वदेवरुप शान्ति, ब्रह्मरुप शान्ति, सर्व-जगत्-रुप शान्ति और संसार में स्वभावतः जो शान्ति रहती है, वह शान्ति मुझे परमात्मा की कृपा से प्राप्त हो ।।११


यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । 

शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ।।१२ (शु॰यजु॰) 

भावार्थ:- हे परमेश्वर ! आप जिस रुप से हमारे कल्याण की चेष्टा करते हैं, उसी रुप से हमें भयरहित कीजिये । हमारी सन्तानों का कल्याण कीजिये और हमारे पशुओं को भी भयमुक्त कीजिये ।।१२ 


II वैदिक II मङ्गलाचरणम् II 

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श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । ग्रामदेवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । 

ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । 


स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशिं नाशयति विऽघ्नानाम् ॥ 

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः । 

लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः । 

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः । 

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि । 

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ॥ 

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः । 

सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ 

सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । 

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुऽते II

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ । 

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ 

गणेशाम्बिकाभ्यां नमः ॥


मंगलं भगवान् विष्णुः मंगलं गरुडध्वजः । 

मंगलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ।I

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् । 

येषां ह्रदिस्थो भगवान् मंगलायतनं हरिः । 

तदेवं लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । 

विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेंऽघ्रियुगं स्मरामि । 

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । 

येषामिंदीरवश्यामो ह्रदयस्थो जनार्दनः । 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । 

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । 

तेषां नित्याभियुक्ताना योगक्षेमं वहाम्यहम् । 

स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते । 

पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ 

सर्वेष्वारब्धकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । 

देवा दिशंतु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः । 

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् । 

वन्देकाशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥ 


विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः ।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहङ्कारगतिं हरिम् ॥

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 

शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । 

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशांतये । 

हरिर्दाता हरिर्भोक्ता हरिरन्नं प्रजापतिः ।

हरिः सर्वः शरीरस्थो भुङ्क्ते भोजयते हरिः ॥

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।

सर्वदेवनमस्कारान् केशवं प्रतिगच्छति ॥

गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च ।

आगता सुखसम्पत्तिः पुण्याच्च तव दर्शनात् ॥

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।

त्राहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन ॥


नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् । 

करोमि यद्यद् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः। 

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ।।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

पश्येम शरदः शतम् । जीवें शरदः शतम् ।

बुध्येम शरदः शतम् । रोहेम शरदः शतम् ।

पुष्येंम शरदः शतम् । भवेम शरदः शतम् ।

भूषेम शरदं शतम् । भूयसीः शरदः शतात ॥

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। 

मृत्योर्माऽमृतं गमय। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते। 

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी | 

देशोऽयं क्षोभरहितः सज्जनाः सन्तु निर्भयाः ||


॥अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः॥

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ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।

यद् भद्रं तन्नऽआ सुव॥1॥ —यजुः अ॰ 30। मं॰ 3॥

भावार्थ:- हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त, (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (परा सुव) दूर कर दीजिये। (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, (तत्) वह सब हम को (आ सुव) प्राप्त कीजिए॥1॥


हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥2॥

—यजुः अ॰ 13। मं॰ 4॥

भावार्थ:- जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाश करनेहारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध (पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था, जो (अग्रे) सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्तमान था, (सः) सो (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और (द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है। हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए (हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से (विधेम) विशेष भक्ति किया करें॥2॥


यऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्वऽउपासते प्रशिषं यस्य देवाः।

यस्य च्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥3॥

—यजुः अ॰ 25। मं॰ 13॥

भावार्थ:- (यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता, (बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा, (यस्य) जिस की (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते) उपासना करते हैं, और (यस्य) जिस का (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष, सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं, (यस्य) जिस का (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक है, (यस्य) जिस का न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः) मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिये (हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें॥3॥


यः प्राणतो निमिषतो महित्वैकऽ इद्राजा जगतो बभूव।

यऽईशेऽ अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥4॥

—यजुः अ॰ 23। मं॰ 3

भावार्थ:- (यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः) अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव) है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः) गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे परमात्मा के लिये (हविषा) अपनी सकल उत्तम सामग्री से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥4॥


येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।

योऽअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥5॥

—यजुः अ॰ 32। मं॰ 6॥

भावार्थ:- (येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाव वाले (द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढा) धारण, (येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण, और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक (देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिये (हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥5॥


प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव।

यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥

—ऋ॰ म॰ 10। सू॰ 121। म॰ 10॥

भावार्थ:- हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मा ! (त्वत्) आप से (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि) इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़ चेतनादिकों को (न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग (ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्) उस-उस की कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिस से (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें॥6॥


स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।

यत्र देवाऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥7॥

—यजु॰ अ॰ 32। मं॰ 10॥

भावार्थ:- हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों का (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक, (जनिता) सकल जगत् का उत्पादक, (सः) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण करनेहारा, (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि) नाम, स्थान, जन्मों को (वेद) जानता है। और (यत्र) जिस (तृतीये) सांसारिक सुखदुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त (धामन्) मोक्षस्वरूप, धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को (आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग (अध्यैरयन्त) स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु आचार्य राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उस की भक्ति किया करें॥7॥


अग्ने नय सुपथा रायेऽ अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नमऽउक्तिंविधेम ॥8॥

—यजुः अ॰ 40। मं॰ 16

भावार्थ:- हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिस से (विद्वान्)सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्) हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (सुपथा) अच्छे धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय) प्राप्त कराइये। और (अस्मत्) हम से (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त (एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिये। इस कारण हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप (नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें, और सर्वदा आनन्द में रहें॥8॥

॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम्॥

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II अथ स्वस्तिवाचनम् II

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अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।

होतारं रत्नधातमम्॥1॥


स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव।

सचस्वा नः स्वस्तये॥2॥ - ऋ॰म॰ 1। सू॰1। मं॰ 1,9।


स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः।

स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना॥3॥


स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः।

बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः॥4॥


विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये।

देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः॥5॥


स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति।

स्वस्ति न इन्द्रश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि॥6॥


स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।

पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि॥7॥

—ऋ॰ मं॰ 5। सू॰ 51।11-15॥


ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः।

ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥8॥

—ऋ॰ मं॰ 7। सू॰ 35।65॥


येभ्यो माता मधुमत् पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः।

उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्नसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये॥9॥


नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद् देवासो अमृतत्वमानशुः।

ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्ष्माणं वसते स्वस्तये॥10॥


सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्।

ताँ आ विवास नमसा सुवृक्तिभिर्महो

आदित्याँ अदितिं स्वस्तये॥11॥


को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन।

को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये॥12॥


येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः।

त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये॥13॥


य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः।

ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये॥14॥


भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्।

अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये॥15॥


सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्।

दैवी नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥16॥


विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिह्रुतः।

सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये॥17॥


अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः।

आरे देवा द्वेषो अस्मद् युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये॥18॥


अरिष्टः स मर्त्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि।

यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये॥19॥


यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने।

प्रातर्यावाण रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये॥20॥


स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति।

स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन॥21॥


स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वस्त्यभि या वाममेति।

सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा॥22॥

—ऋ॰ मं॰ 10। सू॰ 63॥ [मं॰ 3-16]


इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽआप्यायध्वमघ्न्याऽ इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा व स्तेनऽ ईशत माघशंसो ध्रुवाऽ अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि॥23॥

—यजु॰ अ॰ 1। मं॰ 1


आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽअपरीतासऽउद्भिदः।

देवा नो यथा सदमिद्वृधेऽ असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥24॥


देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।

देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा नऽआयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥25॥


तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।

पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥26॥


स्वस्ति नऽ इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥27॥


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥28॥

—यजु॰ अ॰ 25। मं॰ 14, 15, 18, 19, 21॥


अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।

नि होता सत्सि बर्हिषि॥29॥


त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः।

देवेभिर्मानुषे जने॥30॥ - साम॰ पूर्वा॰ प्रपा॰1। मं॰ 1,2॥


ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः।

वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥31॥

—अथर्व॰ कां॰ 1। सू॰ 1। मं॰ 1॥

॥ इति स्वस्तिवाचनम्॥

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II अथ शान्तिकरणम् II

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[ शान्ति मन्त्र वेदों के वे मंत्र हैं जो शान्ति की प्रार्थना करते हैं। प्राय: हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों के आरम्भ और अन्त में इनका पाठ किया जाता है। ]


शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या।

शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ॥1॥


शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः।

शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु॥2॥


शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः।

शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु॥3॥


शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्।

शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः॥4॥


शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।

शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥5॥


शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः।

शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु॥6॥


शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः।

शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्वः१ शम्वस्तु वेदिः॥7॥


शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु।

शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः॥8॥


शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः।

शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः॥9॥


शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः।

शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥10॥


शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु।

शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः॥11॥


शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः।

शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु॥12॥


शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्यः१ शं समुद्रः।

शं नो अपां नपात् पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्भवतु देवगोपा॥13॥

—ऋ॰मं॰ 7। सू॰ 35। मं॰ 1-13


इन्द्रो विश्वस्य राजति। शन्नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥14॥


शन्नो वातः पवतां शन्नस्तपतु सूर्य्यः।

शन्नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्योऽअभि वर्षतु॥15॥


अहानि शम्भवन्तु नः शं रात्रीः प्रति धीयताम्।

शन्न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्नऽइन्द्रावरुणा रातहव्या।

शन्न इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः॥16॥


शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः॥17॥


द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। 

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः 

सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥18॥


तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। 

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं 

प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥19॥

—यजुः॰ अ॰ 36। मं॰ 8, 10-12, 17, 24॥


यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।

दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥20॥


येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे वृण्वन्ति विदथेषु धीराः।

यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥21॥


यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।

यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥22॥


येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥23॥


यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।

यस्मिँचित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥24


सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव।

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥25॥

—यजुः॰ अ॰ 34। मं॰ 1-6॥


स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते।

शं राजन्नोषधीभ्यः॥26॥ —साम॰ उत्तरा॰ प्रपा॰ 1। मं॰ 3॥


अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे।

अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु॥27॥


अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात्।

अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥28॥

—अथर्व॰ कां॰ 19।15।5, 6


॥ इति शान्तिकरणम्॥

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[ इस स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण की सर्वत्र जहाँ-जहाँ प्रतीक धरें, वहाँ-वहाँ करना होगा।]


II विभिन्न शान्ति मन्त्र II

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बृहदारण्यक उपनिषद् तथा ईशावास्य उपनिषद् :-

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


तैत्तिरीय उपनिषद् :-

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ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नः इन्द्रो वृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वमेव प्रत्यक्षम् ब्रह्म वदिष्यामि। ॠतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ''ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


तैत्तिरीय उपनिषद्, कठोपनिषद्, 

मांडूक्योपनिषद् तथा श्वेताश्ववतरोपनिषद् :-

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ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


केन उपनिषद् तथा छांदोग्य उपनिषद् :-

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ॐ आप्यायन्तु ममांगानि वाक्प्राणश्चक्षुः 

श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। 

सर्वम् ब्रह्मौपनिषदम् माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा 

मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणम् मेऽस्तु।

तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


ऐतरेय उपनिषद् :-

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ॐ वां मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-मावीरावीर्म एधि।

वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्

संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु

तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


मुण्डक उपनिषद्, माण्डूक्य उपनिषद् तथा प्रश्नोपनिषद् :-

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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिः। व्यशेम देवहितम् यदायुः।

स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्माऽमृतं गमय। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

- बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28। इसका अर्थ है, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥


यह मन्त्र मूलतः सोम यज्ञ की स्तुति में यजमान द्वारा गाया जाता था। आज यह सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्रों में है, जिसे प्रार्थना की तरह दुहराया जाता है।

--- नितीश मिश्र