Wednesday, August 26, 2026

विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण

 *विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण*

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जी हाँ! ठीक शीर्षक पढ़ा आपने, पृथ्वी का संपूर्ण लिखित वर्णन सबसे पहले विष्णु पुराण में देखने को मिलता है।

विष्णु पुराण के रचियता है... महान ऋषि पाराशर

ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे। राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की

यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है। 

यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-

*“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया। 

मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।

योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्। 

मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि। 

अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः। 

वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥"*

इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।

ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है

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१. पूर्व भाग-प्रथम अंश

२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश

३. पूर्व भाग-तीसरा अंश

४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश

५. पूर्व भाग-पंचम अंश

६. पूर्व भाग-छठा अंश

७. उत्तरभाग

यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहती... क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है। परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके "पूर्व भाग-द्वितीय अंश" का परिचय देना चाहूँगा इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है।

ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं।

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है। (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि - Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)

ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं 

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१. जम्बूद्वीप

२. प्लक्षद्वीप

३. शाल्मलद्वीप

४. कुशद्वीप

५. क्रौंचद्वीप

६. शाकद्वीप

७. पुष्करद्वीप


ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।

इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है।।

सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।

सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।

मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।

इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,

ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं

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पूर्व में मंदराचल

दक्षिण में गंधमादन

पश्चिम में विपुल

उत्तर में सुपार्श्व

ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।

मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।

मेरु के पूर्व में

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शीताम्भ, 

कुमुद, 

कुररी, 

माल्यवान, 

वैवंक आदि पर्वत हैं।

मेरु के दक्षिण में

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त्रिकूट, 

शिशिर, 

पतंग, 

रुचक और 

निषाद आदि पर्वत हैं।

मेरु के उत्तर में

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शंखकूट, 

ऋषभ, 

हंस,

नाग और 

कालंज पर्वत हैं।

समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।

भारतवर्ष के नौ भाग हैं

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इन्द्रद्वीप, 

कसेरु, 

ताम्रपर्ण, 

गभस्तिमान, 

नागद्वीप, 

सौम्य, 

गन्धर्व और 

वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।

यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन 

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प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:

शान्तहय, 

शिशिर, 

सुखोदय, 

आनंद, 

शिव,

क्षेमक, 

ध्रुव ।

यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे। शान्तहयवर्ष, इत्यादि।

इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं: 

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गोमेद, 

चंद्र, 

नारद, 

दुन्दुभि, 

सोमक, 

सुमना और 

वैभ्राज।

इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन

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इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों

श्वेत, 

हरित, 

जीमूत, 

रोहित, 

वैद्युत, 

मानस और 

सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

इस महाद्वीप में 

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कुमुद, 

उन्नत, 

बलाहक, 

द्रोणाचल, 

कंक, 

महिष, 

ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।

इस महाद्वीप में 

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योनि, 

तोया, 

वितृष्णा, 

चंद्रा, 

विमुक्ता, 

विमोचनी एवं 

निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।

यहाँ 

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श्वेत, 

हरित, 

जीमूत, 

रोहित, 

वैद्युत, 

मानस और 

सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं। 

यहां - 

कपिल, 

अरुण, 

पीत और 

कृष्ण नामक चार वर्ण हैं। 

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन

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इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे। 

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इनके सात पुत्रों 

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उद्भिद, 

वेणुमान, 

वैरथ, 

लम्बन, 

धृति, 

प्रभाकर,

कपिल

इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत 

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विद्रुम, 

हेमशौल, 

द्युतिमान, 

पुष्पवान, 

कुशेशय, 

हरि और 

मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।

नदियां -

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धूतपापा, 

शिवा, 

पवित्रा, 

सम्मति, 

विद्युत, 

अम्भा और 

मही नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष 

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उद्भिद, 

वेणुमान,

वैरथ, 

लम्बन, 

धृति, 

प्रभाकर, 

कपिल नामक सात वर्ष हैं। 

वर्ण - 

~

दमी, 

शुष्मी, 

स्नेह और 

मन्देह नामक चार वर्ण हैं। 

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन 

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इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे। 

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इनके सात पुत्रों 

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कुशल, 

मन्दग, 

उष्ण, 

पीवर, 

अन्धकारक, 

मुनि और 

दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत -

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क्रौंच, 

वामन, 

अन्धकारक, 

घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, 

दिवावृत, 

पुण्डरीकवान, 

महापर्वत 

दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।

नदियां -

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गौरी, 

कुमुद्वती, 

सन्ध्या, 

रात्रि, 

मनिजवा, 

क्षांति और 

पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष -

~~

कुशल, 

मन्दग, 

उष्ण, 

पीवर, 

अन्धकारक, 

मुनि और 

दुन्दुभि ।

वर्ण -

~

पुष्कर, 

पुष्कल, 

धन्य और 

तिष्य नामक चार वर्ण हैं। 


यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन - 

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इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।

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इनके सात पुत्रों : 

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जलद, 

कुमार, 

सुकुमार, 

मरीचक,

कुसुमोद, 

मौदाकि और 

महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। 

यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत - 

~

उदयाचल, 

जलाधार, 

रैवतक, 

श्याम, 

अस्ताचल, 

आम्बिकेय और 

अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।

नदियां - 

~

सुमुमरी, 

कुमारी, 

नलिनी, 

धेनुका, 

इक्षु, 

वेणुका और 

गभस्ती नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष -

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जलद, 

कुमार, 

सुकुमार, 

मरीचक, 

कुसुमोद, 

मौदाकि और 

महाद्रुम । 

वर्ण - 

~

वंग, 

मागध, 

मानस और 

मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन -

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इस द्वीप के स्वामि सवन थे।

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इनके दो पुत्र थे: 

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महावीर और 

धातकि। 

यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।

पर्वत -

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मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।

नदियां - यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।

वर्ष - 

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महवीर खण्ड और 

धातकि खण्ड। 

महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है । 

वर्ण - 

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वंग, 

मागध, 

मानस और 

मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन -

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यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो... हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी...

१. विष्णु पुराण में पारसीक - ईरान को कहा गया है,

२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था, 

३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.

४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.

५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.

६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.

७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है... ये थी हमारे ऋषियों की महानता

अब एक महत्त्वपूर्ण बात - 

महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था। 

महाभारत में कहा गया है कि - यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है- 

उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था- 

"सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। 

परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥ 

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। 

एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ 

द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।

"अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।"

अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है

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विष्णु पुराण अनुसार ये सात महाद्वीपो का वर्णन है।

गौरवमयी आर्यावर्त को नमन 


।। साभार ।।

मंत्र जप माला में दानों की संख्या 108 होती है।

 हिन्दू धर्म में हम मंत्र जप के लिए जिस माला का उपयोग करते है, उस माला में दानों की संख्या 108 होती है। शास्त्रों में इस संख्या 108 का अत्यधिक महत्व होता है । 


माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं, इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतषिक  और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं। आइए हम यहां जानते है ऐसी ही चार मान्यताओ के बारे में तथा साथ ही जानेंगे आखिर क्यों करना चाहिए मन्त्र जाप के लिए माला का प्रयोग।


सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक होता है माला का एक-एक दाना


एक मान्यता के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है।


इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, समाज में मान-सम्मान दिलवाता है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।


माला में 108 दाने रहते हैं। इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि…


*षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।*

*एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।*


इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार।


इसी समय में देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है।


इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।


108 के लिए ज्योतिष की मान्यता


ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 का गुणा किया जाए राशियों की संख्या 12 में तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।


माला के दानों की संख्या 108 संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है।


एक अन्य मान्यता के अनुसार ऋषियों ने में माला में 108 दाने रखने के पीछे ज्योतिषी कारण बताया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल 27 नक्षत्र बताए गए हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है।


         ।। सभार ।।

Monday, August 24, 2026

भारतीय ज्योतिष में योग और ग्रह फलादेश के महत्वपूर्ण आधार हैं।

 भारतीय ज्योतिष में योग और ग्रह फलादेश के महत्वपूर्ण आधार हैं। योग वे विशिष्ट ग्रहीय संयोजन हैं जो कुंडली में बनते हैं और व्यक्ति के जीवन में शुभ या अशुभ प्रभाव डालते हैं। ग्रह इन योगों का निर्माण अपनी स्थिति, दृष्टि, युति, और राशि-भाव के आधार पर करते हैं। नीचे योगों और ग्रहों के संबंध का शास्त्रीय और विस्तृत वर्णन दिया गया है।


✓•1. योग का अर्थ और महत्व:


- परिभाषा: योग ज्योतिष में ग्रहों, राशियों, भावों, और उनकी दृष्टि या युति के विशिष्ट संयोजन को कहते हैं, जो व्यक्ति के जीवन में विशेष परिणाम देते हैं।


- प्रकार:

  - शुभ योग: जैसे गजकेसरी योग, धन योग, राज योग।


  - अशुभ योग: जैसे कालसर्प योग, विष योग।


  - मिश्रित योग: कुछ योग शुभ और अशुभ दोनों प्रभाव दे सकते हैं, जैसे विपरीत राज योग।


- महत्व:

  - योग व्यक्ति के भाग्य, धन, स्वास्थ्य, विवाह, और करियर को प्रभावित करते हैं।


  - ये कुंडली के विश्लेषण में ग्रहों की स्थिति और उनके परस्पर संबंधों को समझने में मदद करते हैं।


- शास्त्रीय आधार: बृहत् पराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, जातक पारिजात,  में योगों के नियम और प्रभाव वर्णित हैं।


✓•2. ग्रहों की भूमिका: ग्रह योगों का निर्माण अपनी स्थिति, बल, दृष्टि, युति, और राशि-भाव के आधार पर करते हैं। प्रत्येक ग्रह की प्रकृति और प्रभाव योग के परिणाम को निर्धारित करते हैं। ग्रहों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है:


- शुभ ग्रह: गुरु, शुक्र, बलवान बुध, और पूर्ण चंद्र।


- अशुभ ग्रह: मंगल, शनि, राहु, केतु, और नीच या कमजोर ग्रह।


- मिश्रित प्रभाव: सूर्य और बुध की प्रकृति कुंडली की स्थिति पर निर्भर करती है।


✓•ग्रहों के सामान्य प्रभाव:


- सूर्य: आत्मविश्वास, नेतृत्व, स्वास्थ्य, और पिता।


- चंद्र: मन, भावनाएँ, माता, और मानसिक शांति।


- मंगल: साहस, ऊर्जा, भाई, और संपत्ति।


- बुध: बुद्धि, संचार, और व्यापार।


- गुरु: ज्ञान, भाग्य, और समृद्धि।


- शुक्र: प्रेम, वैवाहिक सुख, और सौंदर्य।


- शनि: अनुशासन, मेहनत, और दीर्घकालिक परिणाम।


- राहु: भ्रम, अप्रत्याशित परिवर्तन, और विदेश।


- केतु: आध्यात्मिकता, वैराग्य, और मुक्ति।


✓•3. प्रमुख योग और ग्रहों का संबंध:

नीचे कुछ प्रमुख योगों और उनके निर्माण में ग्रहों की भूमिका का वर्णन है:


✓•(i) शुभ योग:

1. गजकेसरी योग:

   - निर्माण: गुरु और चंद्रमा का केंद्र (1, 4, 7, 10) में युति या परस्पर दृष्टि।


   - ग्रहों की भूमिका:


     - गुरु: ज्ञान, समृद्धि, और भाग्य प्रदान करता है।


     - चंद्र: मानसिक शांति और लोकप्रियता देता है।


   - प्रभाव: धन, मान-सम्मान, और बौद्धिक सफलता।


   - उदाहरण: यदि गुरु प्रथम भाव में हो और चंद्र सप्तम भाव में, तो दोनों की परस्पर दृष्टि से गजकेसरी योग बनेगा।


   - शास्त्रीय आधार: फलदीपिका में इसका वर्णन है।


2. धन योग:

   - निर्माण: धन भाव (2, 11) और उनके स्वामियों का केंद्र, त्रिकोण (1, 5, 9), या शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र) की युति/दृष्टि।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - गुरु: समृद्धि और वित्तीय लाभ।

     - शुक्र: विलासिता और धन संचय।

     - बुध: व्यापार और बौद्धिक आय।

   - प्रभाव: आर्थिक समृद्धि और वित्तीय स्थिरता।

   - उदाहरण: यदि द्वितीय भाव में गुरु और शुक्र की युति हो, तो धन योग बनता है।


3. राज योग:

   - निर्माण: केंद्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (5, 9) के स्वामियों की युति, दृष्टि, या परस्पर स्थान परिवर्तन।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - सूर्य, गुरु: उच्च पद और मान-सम्मान।


     - शुक्र, बुध: रचनात्मक और राजनयिक सफलता।

   - प्रभाव: शक्ति, प्रसिद्धि, और नेतृत्व।

   - उदाहरण: यदि लग्नेश (प्रथम भाव का स्वामी) और पंचमेश (पंचम भाव का स्वामी) की युति हो, तो राज योग बनता है।


   - शास्त्रीय आधार: बृहत् पराशर होरा शास्त्र में राज योग के अनेक प्रकार वर्णित हैं।


4. पंचमहापुरुष योग:

   - निर्माण: मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, या शनि का केंद्र में स्वराशि, उच्च राशि, या मूल त्रिकोण में होना।

   - प्रकार और ग्रह:

     - रुचक योग: मंगल (साहस, नेतृत्व)।

     - भद्र योग: बुध (बुद्धि, संचार)।

     - हंस योग: गुरु (ज्ञान, समृद्धि)।

     - मालव्य योग: शुक्र (सौंदर्य, विलासिता)।

     - शश योग: शनि (अनुशासन, दीर्घकालिक सफलता)।

   - प्रभाव: विशिष्ट क्षेत्र में उत्कृष्टता और प्रसिद्धि।

   - उदाहरण: यदि गुरु धनु राशि में प्रथम भाव में हो, तो हंस योग बनता है।


✓•(ii) अशुभ योग:

1. कालसर्प योग:

   - निर्माण: सभी ग्रह राहु और केतु के बीच (एक ही अक्ष पर) हों।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - राहु-केतु: भ्रम, बाधाएँ, और अप्रत्याशित चुनौतियाँ।

     - अन्य ग्रहों की स्थिति इस योग के प्रभाव को संशोधित करती है।


   - प्रभाव: जीवन में बार-बार बाधाएँ, मानसिक तनाव, और देरी।


   - उपाय: कालसर्प शांति पूजा, राहु-केतु मंत्र जाप।


   - शास्त्रीय आधार: यह योग आधुनिक ज्योतिष में अधिक प्रचलित है, लेकिन परंपरागत ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है।


2. विष योग:

   - निर्माण: चंद्रमा के साथ शनि, राहु, या मंगल की युति।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - चंद्र: मन और भावनाएँ प्रभावित।

     - शनि/राहु/मंगल: तनाव, भय, या क्रोध।

   - प्रभाव: मानसिक अशांति, स्वास्थ्य समस्याएँ, या पारिवारिक तनाव।

   - उपाय: शिव पूजा, चंद्र मंत्र जाप ("ॐ सोम सोमाय नमः")।


✓•3. केंद्राधिपति दोष:

   - निर्माण: यदि केंद्र (1, 4, 7, 10) के स्वामी ग्रह स्वाभाविक रूप से अशुभ हों (जैसे मंगल, शनि)।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - मंगल, शनि: केंद्र में होने पर अशुभ प्रभाव दे सकते हैं, खासकर यदि नीच या शत्रु राशि में हों।


   - प्रभाव: करियर, स्वास्थ्य, या संबंधों में बाधाएँ।


   - उपाय: संबंधित ग्रह के मंत्र जाप और दान।


✓•(iii) मिश्रित योग:

1. विपरीत राज योग:

   - निर्माण: त्रिक भाव (6, 8, 12) के स्वामियों की युति या परस्पर दृष्टि।


   - ग्रहों की भूमिका:

     - शनि, मंगल, राहु: शत्रुओं पर विजय और अप्रत्याशित सफलता।


   - प्रभाव: कठिनाइयों के बाद सफलता, विशेष रूप से प्रतियोगिता या संघर्ष में।


   -उदाहरण: यदि षष्ठेश और अष्टमेश की युति हो, तो यह योग बन सकता है।


✓•2. शकट योग:

   - निर्माण: चंद्र और गुरु की परस्पर दूरी 6ठे या 8वें भाव में।

   - ग्रहों की भूमिका:

     - चंद्र: मानसिक अस्थिरता।

     - गुरु: शुभ प्रभाव कम हो सकता है।

   - प्रभाव: आर्थिक उतार-चढ़ाव या पारिवारिक समस्याएँ।

   - उपाय: गुरु और चंद्र के उपाय।


✓•4. योगों का निर्माण और ग्रहों की स्थिति

योगों का प्रभाव ग्रहों की स्थिति, बल, और राशि पर निर्भर करता है:


- स्वराशि/उच्च राशि: यदि ग्रह स्वराशि, मूल त्रिकोण, या उच्च राशि में हो, तो योग का प्रभाव बढ़ता है।


- नीच/शत्रु राशि: नीच या शत्रु राशि में होने पर योग का शुभ प्रभाव कम हो सकता है।


- दृष्टि: ग्रहों की दृष्टि योग को प्रभावित करती है। उदाहरण: गुरु की दृष्टि राज योग को और शुभ बनाती है, जबकि शनि की दृष्टि बाधाएँ डाल सकती है।


- युति: दो या अधिक ग्रहों की युति योग को मजबूत या कमजोर कर सकती है। उदाहरण: सूर्य-शुक्र की युति धन योग को बढ़ा सकती है।


- भाव: योग का प्रभाव उस भाव पर निर्भर करता है जिसमें वह बन रहा है। उदाहरण: पंचम भाव में गजकेसरी योग शिक्षा और संतान में शुभता देता है।


✓•5. गोचर और दशा में योगों का प्रभाव:

- गोचर: जब गोचर में ग्रह योग के स्वामी भावों को प्रभावित करते हैं, तो योग सक्रिय होता है।


  - उदाहरण: यदि गजकेसरी योग है और गोचर में गुरु चंद्र राशि से 5वें भाव में हो, तो शिक्षा या संतान में शुभ परिणाम मिल सकते हैं।


- दशा: योग से संबंधित ग्रहों की महादशा या अंतरदशा में योग का प्रभाव अधिक स्पष्ट होता है।


  - उदाहरण: राज योग में गुरु की महादशा चलने पर उच्च पद या मान-सम्मान की प्राप्ति।


✓•6. योगों के आधार पर उपाय

यदि योग अशुभ प्रभाव दे रहे हों या शुभ योग का प्रभाव कम हो, तो निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

- शुभ योग को मजबूत करने के लिए:

  - गुरु: गुरुवार को पीले वस्त्र, चने की दाल का दान, पुखराज धारण।

  - शुक्र: शुक्रवार को दूध या सफेद मिठाई का दान, हीरा धारण।

  - चंद्र: सोमवार का व्रत, चंद्र मंत्र जाप, मोती धारण।

- अशुभ योग के लिए:

  - कालसर्प योग: कालसर्प शांति पूजा, राहु-केतु मंत्र जाप।

  - विष योग: शिव पूजा, चंद्र मंत्र जाप।

  - केंद्राधिपति दोष: शनि या मंगल के लिए दान और मंत्र जाप।


✓•शास्त्रीय आधार:  ज्योतिष रत्नाकर में योगों के उपाय वर्णित हैं।


✓√7. उदाहरण: योग और ग्रहों का विश्लेषण

मान लें कि एक कुंडली में:

- गजकेसरी योग: गुरु प्रथम भाव (धनु) में और चंद्र सप्तम भाव (मिथुन) में।

  - प्रभाव: बौद्धिक क्षमता, मान-सम्मान, और आध्यात्मिक झुकाव।

  - गोचर प्रभाव: यदि गोचर में गुरु 5वें भाव में हो, तो शिक्षा या संतान में शुभता।

  - उपाय: गुरु की पूजा और पीले रंग का उपयोग।

- कालसर्प योग: सभी ग्रह राहु (प्रथम भाव) और केतु (सप्तम भाव) के बीच।

  - प्रभाव: वैवाहिक जीवन और स्वास्थ्य में बाधाएँ।

  - उपाय: राहु-केतु की पूजा, गोमेद धारण।


✓•8. शास्त्रीय आधार:

- बृहत् पराशर होरा शास्त्र: योगों के निर्माण और प्रभाव।

- फलदीपिका: शुभ और अशुभ योगों का वर्णन।

- जातक पारिजात: पंचमहापुरुष योग और राज योग।


✓•निष्कर्ष:

योग और ग्रह भारतीय ज्योतिष में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, युति, और राशि-भाव के आधार पर योग बनते हैं, जो व्यक्ति के जीवन में शुभ या अशुभ प्रभाव डालते हैं। शुभ योग जैसे गजकेसरी और राज योग समृद्धि और सफलता देते हैं, जबकि अशुभ योग जैसे कालसर्प या विष योग बाधाएँ ला सकते हैं। गोचर और दशा के साथ योगों का विश्लेषण समय-आधारित फलादेश में मदद करता है। शास्त्रीय उपाय योगों के प्रभाव को संतुलित करने में सहायक होते हैं।

#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

Saturday, August 22, 2026

अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया।

 ✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।


✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...


"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां

 ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।

 द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥" 

                 (दुण्डिराज )


✓•जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।


 ✓•दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है। 


✓•२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।


✓•१. अश्विनीनक्षत्र...

 इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है। 


इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।


✓•२. भरणी नक्षत्र...

 इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।


 इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है। 


इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।


✓•३. कृत्तिका नक्षत्र...

यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।


 सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।


✓•४. रोहिणी नक्षत्र...

इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।


 इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है। 


इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।


✓•५. मृगशिरा नक्षत्र...

इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है। 


इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।


✓•६. आर्द्रा नक्षत्र...

यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।


इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।


✓•७. पुनर्व नक्षत्र...

यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।


 नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।


 चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।


✓•८. पुष्य नक्षत्र...

इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।


✓•९. आश्लेषा यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।


✓•१०. मघा नक्षत्र...

यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।


✓•११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...

शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है। 


इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।


✓•१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...

 इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है। 


इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।


✓•१३. हस्त नक्षत्र ...

यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है। 


✓•१४. चित्रा नक्षत्र...

इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।


 इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।


 इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।


✓•१५. स्वानी नक्षत्र...

राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है। 


इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।


✓•१६. विशाखा नक्षत्र...

 इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में  ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।


 शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।


 मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।


✓•१७. अनुराधा नक्षत्र...

वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है। 


इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।


✓•१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....

 यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है। 


इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।


✓•१९ मूल नक्षत्र...

 इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।


 इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।


✓•२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...

 यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।


✓•२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...

सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।


 इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।


✓•२२. श्रवण नक्षत्र....

 इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ये विद्वान् होकर भी दुःखी होते हैं।


✓•२३. धनिष्ठा नक्षत्र...

 इस नक्षत्र का पूर्वार्ध मकर राशि में २३° २०' से लेकर ३०° तक तथा उत्तरार्ध कुम्भराशि में से ६° ४०' पर्यन्त फैला है। नक्षत्र स्वामी मंगल है। घुटना और उसके नीचे का भाग इसके प्रभाव क्षेत्र ० में है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर घुटने में व्रण बोट होने से लंगड़पन होता है। पूर्वार्धजात जातक अधिकांशतः अदूरदर्शी, उन्नति में व्यवधानपाने वाले शोचनीय आर्थिक स्थिति में रहने वाले श्रम एवं संघर्ष से उन्नति को प्राप्त होने वाले, स्त्री प्रेमी, क्रोधी, अभिमानी, लोहकर्मी, वाहन चालक, चालाक, घोर स्वार्थी, अवीर्यवान्, अपशब्दों का प्रयोग करने वाले, असंयत तथा पशुपालक होते हैं। उत्तरार्धजात जातक शीघ्रकोपी, शीघ्र उतेजित होने वाले वादविवाद करने वाले झगड़ालू, कार्य तत्पर, वैज्ञानिक मस्तिष्क, अनुसंधित्सु तकनीकी कार्यों में निपुण, परिश्रमी तथा तीव्र स्वरोच्चार करने वाले होते हैं। ये हृष्टपुष्ट, अध्यवसायी, व्यस्त मनोवृत्ति तथा गम्भीर होते हैं। अपने को धनी दिखाने की चेष्टा में ये दान भी देते हैं।


✓•२४. शतभिषा नक्षत्र ...

इसका स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुम्भराशि में ६° ४०' से लेकर २०° पर्यन्त व्याप्त है। घुटने तथा ऐड़ी के बीच के भाग पर इसका प्रभाव आँका जाता है। इसके दूषित होने पर टाँगों में दर्द या टाँग की क्षति होती है। टोंग की पेशियाँ अशक्त वा ढीली पड़ जाती हैं।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर शनि और राहु का मिश्र प्रभाव होता है। ऐसे जातक अच्छी सूझबूझवाले तेजतर्रार मौलिक विचारधारा के धैर्यवान, अध्यवसायी, अतिवादी, उप, आलसी, अकर्मण्य, तंद्रिल, आरामपसन्द, सुस्त, ऐकान्तिक, प्राचीनता के पोषक, कूटनीतिज्ञ, छिद्रान्वेषी, भुलक्कड़, तृष्णालु होते हैं। अधिकतर ये सेवाकर्मी बिना सोचविचार के कार्य में जुट जाने वाले तथा मशीनी एवं तकनीकी कार्यों में रुचि लेने वाले होते हैं। ये प्रकृतितः उच्चविचार वाले, साधुसेवी, कट्टरपंथी, अहंकारी, हठी तथा अद्भुतकल्पनाशील होते हैं।


✓•२५. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र...

इसनक्षत्र के प्रथम तीन चरण कुम्भराशि में २०° से ३०° पर्यन्त तथा शेष चौथा चरण मीन राशि में ०° से ३°२०' पर्यन्त व्याप्त रहता है। इस नक्षत्र का अधिपति गुरु है। टाँग का निचला भाग, टखने है एवं ऐड़ी का ऊपरी भाग इस के प्रभाव में रहते हैं। इसके दूषित होने पर रखने की हड्डी में मोच, सूजन तथा गतिविक्षेप होता है।


 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक शनि और गुरु के प्रभाव में रहते हैं। प्रथमतीन चरणों के अन्तर्गत जन्मने वाले अधिकांश लोग ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाले, आराम पसन्द, पूजापाठ में लीन रहने वाले होते हैं। ये अनायास सफलता प्राप्त करते हैं, वृद्धावस्था में अकस्मात् धन प्राप्त करते हैं। ये यात्राप्रिय, कवि, लेखक विधिज्ञ एवं सतर्क होते हैं। शिक्षण कार्य में विशेष रुचि होती है। ये मानवतापूर्ण व्यवहार करते हैं, आशावान् दार्शनिक ज्योतिषी वैयाकरण निस्स्वार्थी उदात्त हृदय शास्त्री एवं अनुशासित होते हैं। इस नक्षत्र पर बुरा प्रभाव होने पर ये नास्तिक, वेश्यागामी अशान्त एवं क्रूर जीवन जीते हैं। इस नक्षत्र के चौथे चरण में पैदा होने वाले दया की मूर्ति, महादानी, करुणासागर, ज्ञानी, सत्यव्रती, प्रियदर्शी, विनम्र, शुद्धात्मा तथा शान्तचित्त होते हैं। ये आजीविका के लिये सम्मानप्रद व्यवसाय का चयन करते हैं।


✓•२६. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र...

 इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। इसका अधिकार पाँव के ऊपरी भाग पर है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर नक्षत्रस्वामी शनि से संबंधित शारीरिक विकृतियाँ प्रकट होती हैं। सन्धिवात, स्नायुदौर्बल्य, उदरवायु कोप, आंत्रच्युति, सूखारोग, शीत, नर्सों का उभरना तथा पाँव में चोट लगती है। 


इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक शनि और गुरु के मिश्र गुणों से बने हुए होते हैं। अधिकांश जातक प्रसन्नचित्त, उन्नति के पथ पर अग्रसर होने वाले, स्त्रियों द्वारा मान पाने वाले, अकस्मात् हानि उठाने वाले, शत्रुओं से घिरे हुए, दैनन्दिन कार्यो में तन्द्रालु, विद्याव्यसनी, उच्चाचार युक्त एवं समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। ये दृढ़ चरित्र, उदार, मुक्तहस्त, सुरूप, निरपेक्ष चिन्तक, दीनसेवी होते हैं। धर्मशास्त्र के ज्ञाता, अर्थ सञ्चय में कुशल, बलिष्ठ और मध्यम काय होते हैं। पुरातात्विक खोजों में ये विशेषरुचि रखते हैं। ये शिथिल कर्मी तथा अभियन्त्रविद् होते हैं।


✓•२७. रेवती नक्षत्र...

 यह बुध का नक्षत्र है। मीनराशि में १६° ४०' से लेकर ३०° तक यह फैला है। इसका प्रभाव क्षेत्र पादतल, पादांगुलियाँ, पादांगुष्ठ एवं ऍड़ी का अधोभाग है। यह विकृत वा दूषित होने पर पादतल में बेवाई पैदा करता है, काँटे गड़ते हैं, पैर समाट होता है, जातक तेज दौड़ नहीं पाता। पाँव फूलता है, पाँव टेढ़ा होता है।


  इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक बुध एवं गुरु के मिश्र प्रभाव के कारण सात्विक वृत्ति के होते हैं। सरल स्वभाव, विद्यावान् गुणवान् धनवान् चरित्रवान् तथा द्युतिमान् होते हैं। ये द्विस्वभावी द्वैधी वा संशयी होते हैं। इनमें आध्यात्मिक शक्ति का एकाएक वा शीघ्र प्रस्फुटन होता है। ये चतुरता निकालने वाले, परिपक्व विचार वाले, निर्णय लेने के पूर्व बारम्बार सोचने वाले, तथा शुभेच्छु होते हैं। स्वामीभक्त, राष्ट्र भक्त निर्लज्ज तथा पूर्वानुमान में कुशल होते हैं। लेखन क्रीडन प्रकाशन अध्यापन में इनकी वृत्ति सहज होती है।

#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

Friday, August 21, 2026

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

 पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट 

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भारतीय सनातन परम्परा में काल का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे यहाँ प्रत्येक धार्मिक, आध्यात्मिक एवं मांगलिक कर्म को उचित काल में करने की परम्परा रही है। इसी काल-विचार को समझने और दैनिक जीवन में उपयोग करने का प्रमुख साधन है—पञ्चाङ्ग।


‘पञ्चाङ्ग’ शब्द दो शब्दों से बना है—‘पञ्च’ अर्थात् पाँच और ‘अङ्ग’ अर्थात् अंग। अर्थात् जिस काल-विधान में पाँच प्रमुख अंगों का विचार किया जाता है, उसे पञ्चाङ्ग कहा जाता है।


पञ्चाङ्ग के पाँच अंग हैं :—

१. तिथि

२. वार

३. नक्षत्र

४. योग

५. करण


इन पाँचों के माध्यम से किसी दिन के काल की प्रकृति, शुभाशुभता तथा विभिन्न कर्मों के लिए उसकी अनुकूलता का विचार किया जाता है।


▪︎ १. तिथि :-

सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर कोणीय अंतर के आधार पर बनने वाली काल-इकाई को तिथि कहा जाता है। सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२ अंश का अंतर होने पर एक तिथि पूर्ण होती है।


एक चन्द्रमास में सामान्यतः ३० तिथियाँ मानी जाती हैं—


शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ तिथियाँ तथा

कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या तक १५ तिथियाँ।


तिथियों के नाम हैं :—

प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा/अमावस्या।


तिथियों की पाँच संज्ञाएँ

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तिथियों को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है—

नन्दा — १, ६, ११

प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी।


भद्रा — २, ७, १२

द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी।


जया — ३, ८, १३

तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी।


रिक्ता — ४, ९, १४

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी।


पूर्णा — ५, १०, १५

पंचमी, दशमी और पूर्णिमा/अमावस्या।


मुहूर्त-विचार में इन तिथि-संज्ञाओं का विशेष महत्व है। प्रत्येक तिथि सभी प्रकार के कार्यों के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन, यात्रा, व्यापारारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान आदि में केवल तिथि देखकर निर्णय न करके सम्पूर्ण पञ्चाङ्ग तथा मुहूर्त का विचार किया जाता है।


▪︎ २. वार :-

एक सप्ताह में सात वार होते हैं :—

रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।


प्रत्येक वार का सम्बन्ध एक-एक ग्रह तथा उससे सम्बद्ध देवता और कर्म-प्रकृति से माना गया है। इसलिए विभिन्न कार्यों के लिए वार का चयन भी मुहूर्त-विचार का महत्वपूर्ण अंग है।


उदाहरण के लिए सोमवार का सम्बन्ध चन्द्रमा से, मंगलवार का मंगल से, बुधवार का बुध से, गुरुवार का बृहस्पति से, शुक्रवार का शुक्र से तथा शनिवार का शनि से माना जाता है।


अतः किसी कार्य की सफलता के लिए केवल दिन देखना पर्याप्त नहीं, बल्कि कार्य के अनुरूप वार की अनुकूलता का विचार भी आवश्यक है।


▪︎ ३. नक्षत्र :-

आकाश में चन्द्रमा की गति के मार्ग को २७ प्रमुख नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।


२७ नक्षत्र हैं—

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती।


कुछ परम्पराओं में अभिजित् को विशेष रूप से २८वें नक्षत्र के रूप में भी स्वीकार किया गया है।


नक्षत्रों की प्रकृति के आधार पर मुहूर्तशास्त्र में इन्हें विभिन्न संज्ञाओं में विभाजित किया जाता है—ध्रुव, चर, उग्र, मिश्र, क्षिप्र, मृदु और तीक्ष्ण।


किस नक्षत्र में कौन-सा कार्य करना चाहिए, इसका निर्णय कार्य की प्रकृति के अनुसार किया जाता है। इसलिए किसी नक्षत्र को मात्र ‘शुभ’ या ‘अशुभ’ कह देना पर्याप्त नहीं है।


▪︎ ४. योग :-

सूर्य और चन्द्रमा की गतियों से प्राप्त विशेष कोणीय सम्बन्ध के आधार पर २७ योगों की गणना की जाती है।


इनके नाम हैं :—

विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान्, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृति।


इनमें कुछ योग सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माने जाते हैं, जबकि विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति को सामान्यतः अशुभ अथवा त्याज्य योगों में गिना जाता है।


विशेष बात यह है कि किसी योग को देखकर ही अंतिम निर्णय नहीं किया जाता। कार्य की प्रकृति, तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न आदि का भी विचार आवश्यक है।


▪︎ ५. करण :-

एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है। इस प्रकार एक तिथि में सामान्यतः दो करण होते हैं।


कुल ११ करण माने गए हैं :—

बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न।


इनमें विष्टि करण को भद्रा भी कहा जाता है। सामान्यतः भद्रा में अनेक मांगलिक कार्यों को करने से बचने की परम्परा है।


करण का विचार विशेष रूप से मुहूर्त-निर्णय में किया जाता है।


पञ्चाङ्ग केवल कैलेंडर नहीं है

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आज के समय में बहुत से लोग पञ्चाङ्ग को केवल तिथि अथवा पर्व बताने वाला कैलेंडर समझते हैं। वास्तव में पञ्चाङ्ग इससे कहीं अधिक व्यापक है।


पञ्चाङ्ग हमें यह समझने में सहायता करता है कि :—

कौन-सा दिन है?

कौन-सी तिथि है?

कौन-सा नक्षत्र चल रहा है?

कौन-सा योग है?

कौन-सा करण है?

और किसी विशेष कर्म के लिए काल की स्थिति कैसी है?


इसीलिए सनातन परम्परा में किसी भी महत्वपूर्ण धार्मिक या मांगलिक कर्म के पूर्व तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का विचार किया जाता है।


चन्द्रमास और बारह मास

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भारतीय चान्द्र परम्परा में वर्ष के बारह प्रमुख मास माने जाते हैं—

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।


इन मासों के नामकरण का सम्बन्ध पूर्णिमा के समय चन्द्रमा की नक्षत्र स्थिति से जोड़ा गया है। जैसे—

चित्रा → चैत्र

विशाखा → वैशाख

ज्येष्ठा → ज्येष्ठ

पूर्वाषाढ़ा/उत्तराषाढ़ा → आषाढ़

श्रवण → श्रावण

पूर्वाभाद्रपदा/उत्तराभाद्रपदा → भाद्रपद

अश्विनी/भरणी आदि से सम्बद्ध परम्पराएँ → आश्विन

कृत्तिका → कार्तिक

मृगशिरा → मार्गशीर्ष

पुष्य → पौष

मघा → माघ

पूर्वाफाल्गुनी/उत्तराफाल्गुनी → फाल्गुन।


यह व्यवस्था भारतीय कालगणना की वैज्ञानिक एवं खगोलीय परम्परा को दर्शाती है।


पञ्चाङ्ग का दैनिक जीवन में महत्व

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सनातन धर्म में प्रातःकाल उठकर तिथि, वार आदि का स्मरण करने की परम्परा रही है। पञ्चाङ्ग के माध्यम से व्यक्ति अपने दिन को धार्मिक एवं व्यवस्थित ढंग से प्रारम्भ कर सकता है।


विशेष रूप से :—

व्रत एवं उपवास,

पूजा-पाठ,

जप एवं अनुष्ठान,

संस्कार,

विवाह,

गृहप्रवेश,

यात्रा,

व्यापारारम्भ,

यज्ञ एवं धार्मिक आयोजन


आदि में पञ्चाङ्ग का विचार किया जाता है।


पञ्चाङ्ग हमें केवल शुभ-अशुभ बताने का साधन नहीं देता, बल्कि काल के प्रति जागरूकता प्रदान करता है।


अतः सनातन परम्परा में पञ्चाङ्ग का अध्ययन केवल ज्योतिषियों तक सीमित विषय नहीं है। प्रत्येक गृहस्थ को कम-से-कम अपने दैनिक जीवन की तिथि, वार, नक्षत्र और प्रमुख पर्व-त्योहारों की जानकारी रखने का प्रयास करना चाहिए।


काल का ज्ञान ही कर्म को उचित समय से जोड़ता है और उचित समय में किया गया कर्म ही मुहूर्त-विचार की मूल भावना है।


इसीलिए पञ्चाङ्ग हमारे लिए केवल एक पंचांग-पुस्तिका नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष-विज्ञान और सनातन जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण आधार है।


॥ श्रीसीतारामाभ्यां नमः ॥

जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था

 यह कथा द्वापरयुग की है ,जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था !


बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ! यह कथा इस प्रकार है :~


मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था ! उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे ! यही कारण था ,कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे !


जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं ! उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था !


कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था ! प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उसका वध कर दिया !

 

दामाद की मृत्यु की सुचना सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा !


प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया ! किंतु हर बार श्री कृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे !


एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया !

 

लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया ! जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए !


काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्री कृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया !

 

वह श्री कृष्ण की शक्ति जानता था ! इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा !


भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा ! किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा !


तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले :- 


वत्स ! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी ! लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना !

 

वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा ! यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए !


इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्री कृष्ण सभी मथुरा वासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे ! 


काशीराज ने श्री कृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा !


काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं ! इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई !


उल्टे श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया ! सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा ! प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत हो कर काशी की ओर भागी !


सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा ! काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया ! किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया !


कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा ! वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया !


इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ!

Thursday, August 20, 2026

वैदिक_रक्षासूत्र____|| रक्षाबंधन.रक्षासूत्र.राखी विशेष!!

 #वैदिक_रक्षासूत्र____|| रक्षाबंधन.रक्षासूत्र.राखी विशेष!!

रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है। यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है।

#कैसे_बनायें_वैदिक_राखी

वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें। उसमें

(१) दूर्वा

(२) अक्षत (साबूत अरुणाक्षत)

(३) केसर या हल्दी

(४) शुद्ध चंदन

(५) सरसों के साबूत दाने

इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें। सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं।

कुछ विशिष्ठ पवित्र पदार्थ का प्रयोग करने के लिये अपने आचार्य या पुरोहित से सम्पर्क कर समझे||

#वैदिक_राखी_का_महत्त्व

वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं।

(१) #दूर्वा

जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सद्गुण फैलते जायें, बढ़ते जायें...’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा । दूर्वा गणेशजी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आनेवाले विघ्नों का नाश हो जाय ।

(२) #अरुणाक्षत (साबूत लालचावल)

हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखंड और अटूट हो, कभी क्षत-विक्षत न हो - यह अक्षत का संकेत है । अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं । जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय ।

(३) #केसर या #हल्दी

केसरकेसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो । उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय । केसर की जगह पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं । हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है । यह नजरदोष व नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है 

(४) #चंदन

चंदनचंदन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है । यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो । उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे । उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले ।

(५) #सरसों_पीत

सरसोंसरसों तीक्ष्ण होती है । इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज-द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें ।

अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व-मंगलकारी है। 


रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है :-

#येन_बद्धो_बली_राजा_दानवेन्द्रो_महाबलः ।

#तेन_त्वाम_नुबध्नामि_रक्षे_मा_चल_मा_चल ।।


यहां वैदिक मन्त्र का भी उपयोग किया जा सकता है||

यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:। तन्मSआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।

इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है । यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सद्गुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है  भक्ति बढ़ती है।

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 यज्ञोपवीतः आभूषणं च,शिखा धर्मस्तम्भयः ।

जयतु ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये ----------

-------/आपको इसे पढ़कर निर्माण विधि का ज्ञान हो गया ,लेकिन इसमें रक्षा शक्ति का संचार कैसे करेंगे उन मन्त्रो से  इसे अभिमंत्रित करें जिससे आप इस रक्षासूत्र से स्वयं की एव जिसे यह बांधे उसकी भी रक्षा यह करे।

इसके लिए आचार्य ,पुरोहित से मार्गदर्शन अवश्य लीजिये।।

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रक्षा सूत्रों के विभिन्न प्रकार

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विप्र रक्षा सूत्र- रक्षाबंधन के दिन किसी तीर्थ अथवा जलाशय में जाकर वैदिक अनुष्ठान करने के बाद सिद्ध रक्षा सूत्र को विद्वान पुरोहित ब्राह्मण द्वारा स्वस्तिवाचन करते हुए यजमान के दाहिने हाथ मे बांधना शास्त्रों में सर्वोच्च रक्षा सूत्र माना गया है।

गुरु रक्षा सूत्र- सर्वसामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्य के कल्याण के लिए इसे बांधते है।

मातृ-पितृ रक्षा सूत्र- अपनी संतान की रक्षा के लिए माता पिता द्वारा बांधा गया रक्षा सूत्र शास्त्रों में  "करंडक" कहा जाता है।

भातृ रक्षा सूत्र- अपने से बड़े या छोटे भैया को समस्त विघ्नों से रक्षा के लिए बांधी जाती है देवता भी एक दूसरे को इसी प्रकार रक्षा सूत्र बांध कर विजय पाते है।

स्वसृ-रक्षासूत्र- पुरोहित अथवा वेदपाठी ब्राह्मण द्वारा रक्षा सूत्र बांधने के बाद बहिन का पूरी श्रद्धा से भाई की दाहिनी कलाई पर समस्त कष्ट से रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधती है। भविष्य पुराण में भी इसकी महिमा बताई गई है। इससे भाई दीर्घायु होता है एवं धन-धान्य सम्पन्न बनता है।

गौ रक्षा सूत्र- अगस्त संहिता अनुसार गौ माता को राखी बांधने से भाई के रोग शोक दूर होते है। यह विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है।

वृक्ष रक्षा सूत्र - यदि कन्या को कोई भाई ना हो तो उसे वट, पीपल, गूलर के वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधना चाहिए पुराणों में इसका विशेष उल्लेख है।।

 ध्यान दें ~~ पत्नी भी पति को रक्षासूत्र बांध सकती है इसमें कुछ भी विचारणीय नहीं है,, सूत्र अभिमंत्रित होना चाहिए.!!

विशेष>>> यदि सूत्र अभिमंत्रित नहीं है तो उसकी उपयोगिता मात्र एक सूत्र की रहेगी उस सूत्र से किसी रक्षा या सुरक्षा की कल्पना नहीं करें.. बाजार से निर्मित सूत्र राखी आदि खरीदने से बचना चाहिए..!!

🪷 महादेव🪷

  🌼शुभमस्तु..🌼 कल्याणमस्तु 🪷


#संकलित||

Arun Shastri जबलपुर।।

❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️