Sunday, April 19, 2026

क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप ?

 🔸️ क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप❓️

🔸️ क्यों वेद में वर्जित किया है ❓️

🔸️ स्त्री के लिए गायत्री मंत्र जाप❓️


🔹️ समझते हैं आज इस बात के संदर्भ के लॉजिक को संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से :👉


ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली एवं अत्यंत तीव्र वेग ॐ शब्द ही केवल इस शब्द है जो बिना जिव्हा के भी उच्चारण होता है।


जब कुछ व्यवस्थित शब्दों के समूह को ॐ के साथ जोड़ कर उच्चारित किया जाता है तब उसे मन्त्र की संज्ञा दी जाती है।


शास्त्रो में मन्त्रो की ऊर्जा के नियंत्रित अथवा अनियंत्रित वेग होते हैं,जिनका जाप अथवा ॐ शब्द हमारे नाभि चक्र को स्ट्रोक करता है। जिससे उस मन्त्र की ऊर्जा हमारे शरीर के सात चक्रों से हो कर ब्रह्मांड में उस शक्ति को सूचना देती है। जिसका हम जाप करते हैं।


गायत्री मंत्र एक अत्यंत ऊर्जा एवं तीव्र वेग मन्त्र  है। 

उसमे ॐ के तीव्र वेग ओर ऊर्जा के साथ सम्पुटित हो गायत्री मंत्र का वेग एवं ऊर्जा ओर तीव्र बन जाती है।

लगातार इसे जाप करने से यह नाभि चक्र को बार बार स्ट्रोक करती है।


वह नाभि जो स्त्री के अंदर गर्भाशय से जुड़ी होती है बार बार इतने तीव्र ऊर्जा के मन्त्र के जाप से नाभि स्ट्रोक होती है जिसके कारण गर्भाशय को नुकसान होने की आशंका बनती जाती है जो कि एक स्त्री के लिए सबसे विशेष विषय है इसलिए गायत्री जप स्त्रियों को वर्जित किया गया है।


दूसरा कारण स्त्री का मासिक धर्म है जिस समय शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा उधोमार्गी हो जाती है और यदि गायत्री मन्त्र जैसी तीव्र ऊर्जा शरीर मे हो तो वह उस मासिक धर्म के वक़्त उधोमार्गी होती ऊर्जा से टकराती है जिससे स्वास्थ्य सम्बधी  बहुत सी परेशानियो जैसे migrain, mantly डिसऑर्डर, पित्त, से सम्बंधित अन्य अनेक समस्याए पैदा होने लगती हैं।


इस लिए वेद में स्त्री को गायत्री जाप करना अथवा ॐ सम्पुटित कोई अन्य मन्त्र भी जाप करना वर्जित किया गया है।


गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है वृक्षो में में पीपल ओर मन्त्रो में मैं गायत्री हूँ। 


परन्तु हर मन्त्र की एक विशेष ऊर्जा होती है जिसे हर एक इंसान नही सम्भाल सकता ऐसे ही सामान्य पुरुषों के लिए भी मन्त्र के कुछ विशेष प्रकार वर्जित हैं वह मन्त्र जो विशेष तरीके से आगे और पीछे सम्पुटन कर बनाये गए हैं उनके तीव्र वेग के लिए।


!! नारायण !!

ब्रह्मचर्य

 


🌟  ब्रह्मचर्य  🌟 


ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।


शुभ विचार से वीर्य रक्षण करते हुए सात्विक जीवनचर्या अपनाना


ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरुरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरुरी ब्रह्मचर्य है। वेद का उपदेश है - ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर कन्या युवा पति को प्राप्त करे ।आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आए हैं क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुखो की प्राप्ति कर सकते हैं।ब्रह्मचर्य पालन करने का सबसे आसान साधन सिद्धासन करना है।इसे करने के लिए बाए पैर की ऐड़ी को गुड्डा द्वार और लिंग के मध्य स्थित करना होता है तथा से पैर की ऐड़ी को ठीक लिंग के ऊपर रखना होता है।


योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं - यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।


 ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ 


अर्थात् वेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं ; रागरहित यत्नशील जिसमें प्रवेश करते हैं ; जिसकी इच्छा से ( साधक गण ) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उस पद ( लक्ष्य ) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।


 भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य को शारीरिक तप बताया है - ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।।

 (श्रीमद्भागवतगीता १७/१४)


आयुर्वेद में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य शरीर के तीन स्तम्भों में से एक प्रमुख स्तम्भ (आधार) है।


त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।


(तीन उपस्तम्भ हैं। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य।)


सुश्रुत में तो स्त्रियों को पुरूष रोगी के पास फटकने का भी निषेध किया है , क्योंकि इनके दर्शन से यदि रोगी में वीर्य नाश हो जाय , तो बहुत हानि करता है ।


महर्षि सुश्रुत कहते हैं - रक्तं ततो मांस मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भवः ॥


 अर्थात् - मनुष्य जो कुछ भोजन करता है वह पहिले पेट में जाकर पचने लगता है फिर उसका रस बनता है , उस रस का पाँच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है । रक्त का भी पाँच दिन पाचन होकर उससे मांस बनता है । इस प्रकार पाँच - पाँच दिनके पश्चात् मांस से मेद , मेद से हड्डी , हड्डी से मज्जा और अन्त में मज्जा से सप्तम सार पदार्थ वीर्य बनता है । यही वीर्य फिर ' ओजस् ' रूपमें सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम अति शुद्ध सार पदार्थ को रज कहते हैं ।


भगवान धन्वन्तरि कहते हैं - 

मृत्युव्याधिजरानाशी पीयूष परमौषधम् । 

ब्रह्मचर्य महदरतन सत्यमय वदाम्यहम् ॥ 


अर्थात् अर्थात सभी रोगों , वृद्धावस्था और मृत्यु को नष्ट करने के लिए केवल ब्रह्मचर्य ही महान औषधि है । मैं सच बोल रहा हूँ । यदि आप शांति , सौंदर्य , स्मृति , ज्ञान , स्वास्थ्य और अच्छे बच्चे चाहते हैं , तो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।


ब्रह्मचारीसूक्त


अथर्ववेद का ग्यारहवें काण्ड का पाँचवाँ सूक्त ब्रह्मचर्य्य के लिये ही समर्पित है। इसमें तरह-तरह से ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णित है।


ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।

स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥ --


 (अथर्ववेद ११.५.१७)

अर्थ-- जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है।


ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।

गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥ 


-- (अथर्ववेद ११.५.१८)

अर्थ-- वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।


ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।

आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥


 -- (अथर्ववेद ११.५.१९)

अर्थ-- पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है ll 


ब्रह्मचर्य के लाभ 


ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।

ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढाता है।

ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।

ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।

ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।

ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।

--- संकल्प रामराज्य सेव ट्रस्ट 

परशुराम और #विज्ञान..

 #परशुराम और #विज्ञान...क्या आप उस योद्धा को जानते हैं जिसने 21 बार पृथ्वी को 'रिसेट' किया, पर कभी खुद के लिए एक इंच जमीन नहीं मांगी? क्या आप उस महानायक की शक्ति को पहचानते हैं, जिसने सत्ता के अहंकार को कुचलने के लिए 'सर्जिकल स्ट्राइक' की, लेकिन अपना पूरा साम्राज्य एक पल में दान कर दिया? दुनिया ने उन्हें 'क्रूर' कहा, इतिहास ने 'जातिवादी' का ठप्पा लगाया, लेकिन सच यह है कि हम आज भी उस 'कॉस्मिक कोड' को नहीं पढ़ पाए जो परशुराम जी ने अपने फरसे (परशु) की नोंक पर लिखा था। आज उनके जन्मोत्सव पर, आइए उन रहस्यों से पर्दा उठाते हैं जिन्हें समझने की हिम्मत सदियों से किसी ने नहीं की।


आज परशुराम जन्मोत्सव है। उस परम तेजस्वी, अजेय योद्धा का दिन, जिन्हें हम 'विष्णु के अवतार' के रूप में पूजते हैं। लेकिन क्या हम सचमुच उन्हें जानते हैं? या हम केवल उस अधूरी और विकृत कहानी को जानते हैं जो सदियों से हमें सुनाई जा रही है?


एक समय ऐसा आया था जब राजाओं ने अपनी तलवारें अपनी ही प्रजा पर तान दी थीं। जब एक क्षत्रिय 'रक्षक' न रहकर 'भक्षक' बन जाए, तो वह 'क्षत्रिय' नहीं रहता, वह सिर्फ एक 'खतरा' बन जाता है। परशुराम जी ने उन्हें 'क्षत्रिय' के तौर पर नहीं, बल्कि 'खतरे' के तौर पर काटा।

उन्होंने अपना परशु उठाया और 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू की। उन्होंने किसी जाति को नहीं मिटाया, उन्होंने उस 'पावर-करप्शन' (सत्ता के भ्रष्टाचार) को खत्म किया जो मानवता की नींव को गला रहा था।


आइए, आज उस ' नैरेटिव' को ध्वस्त करते हैं जिसने भगवान परशुराम को केवल एक क्रोधी और 'क्षत्रिय-विनाशक' के रूप में सीमित कर दिया। आज हम शास्त्रों के उन गुप्त तहखानों में उतरेंगे और उन श्लोकों की कोडिंग को डिकोड करेंगे, जिन्हें आज तक कोई सही से खोल नहीं पाया है। यह कहानी पानी की तरह बहेगी, और आपको आनंद के महासागर में डुबो देगी।


श्रीमद् भागवत महापुराण में

वह श्लोक, जो अक्सर गलत संदर्भ में उद्धृत किया जाता है, वह यह है:


त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवीं कृत्वा नि:क्षत्रियां प्रभु:।

समन्तपंचके चक्रे शोनितोदान् हदान् नृप ॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, ९.१६.१९)


सतही अर्थ (जिसे सब जानते हैं): प्रभु (परशुराम) ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) में खून के पाँच कुण्ड बना दिए।

यह वह नैरेटिव है जो हमें डराता है, जो परशुराम जी को एक निर्दयी हत्यारा बनाता है। लेकिन, क्या यह सत्य है? क्या भगवान विष्णु का एक अवतार ऐसा कर सकता है? कतई नहीं! यह 'शाब्दिक अर्थ' है, 'भावार्थ' नहीं। आइए, इस श्लोक की 'कोडिंग' को डिकोड करें और एक उनका  वास्तविक चेहरा देखें।


अब सत्य समझिए 

'नि:क्षत्रियां' का अर्थ "क्षत्रिय जाति का खात्मा" नहीं, बल्कि "अहंकारी सत्ता का खात्मा" है।

इसे एक उदाहरण से समझिए।  'क्षत्रिय' का असली अर्थ 'पद' है, न कि 'जाति'

उस समय 'क्षत्रिय' का अर्थ था 'शासक वर्ग' (Governing Class)। जिसका धर्म था—प्रजा की रक्षा करना और न्याय करना। जब तक वे न्याय करते थे, वे क्षत्रिय थे। लेकिन जैसे ही वे अहंकारी होकर प्रजा को लूटने लगे, वे अपने 'क्षत्रिय धर्म' से गिर गए। उन्होंने क्षत्रिय होने का हक खो दिया।


'नि:क्षत्रियां' का मतलब क्या?

परशुराम जी ने 'नि:क्षत्रियां' किया, इसका मतलब है—"पृथ्वी को उन अधर्मी शासकों से मुक्त किया जो क्षत्रिय होने की मर्यादा भूल चुके थे।"  जैसे कोई डॉक्टर कहे कि "मैं इस शरीर को कैंसर-मुक्त कर दूँगा," तो क्या इसका मतलब यह है कि वह शरीर को ही मार देगा? नहीं! वह केवल 'कैंसर' (अधर्मी शासकों) को काटेगा ताकि शरीर (समाज) बच सके। परशुराम जी ने वही किया। उन्होंने 'भ्रष्ट सत्ता' को हटाया ताकि 'धर्म' जीवित रह सके।


वामपंथी इसे 'जाति युद्ध' कहते हैं। आप उनसे बस ये 3 सवाल पूछिए, उनका नैरेटिव उसी पल ध्वस्त हो जाएगा:

सवाल 1 अगर यह जाति युद्ध होता, तो परशुराम जी ने 'भीष्म पितामह' और 'द्रोणाचार्य' जैसे क्षत्रियों और ब्राह्मणों को अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य क्यों बनाया? क्या कोई जातिवादी दुश्मन को विद्या सिखाता है?


सवाल 2 यदि वे 'क्षत्रिय विरोधी' होते, तो वे युद्ध जीतने के बाद खुद राजा क्यों नहीं बने? उन्होंने पूरी पृथ्वी दान कर दी और तपस्वी बन गए। एक 'सत्ता-लोभी' व्यक्ति ऐसा कभी नहीं करेगा।


सवाल 3: क्या 'राम' क्षत्रिय नहीं थे? परशुराम जी ने तो अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। जो व्यक्ति क्षत्रियों को मिटाना चाहता था, वह एक क्षत्रिय राजा को अपनी सबसे बड़ी शक्ति (धनुष) क्यों सौंपता?


'नि:क्षत्रियां' का मतलब है—"जब राजधर्म विफल हो जाए, तो अधर्मियों को सत्ता से उखाड़ फेंकना ही धर्म है।"

परशुराम जी ने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह 'धर्म' (न्याय) से ऊपर नहीं है। उन्होंने क्षत्रिय को नहीं मारा, उन्होंने 'अधर्म' को मारा। 'नि:क्षत्रियां' का अर्थ है—अन्यायी शासक विहीन पृथ्वी।


कल्पना कीजिए एक ऐसे योद्धा की, जिसके हाथ में केवल एक 'परशु' (फरसा) है, लेकिन उसकी आँखें 'काल' (Time) के उस पार देख रही हैं। वह न तो राजा बनना चाहता है, न उसे सिंहासन का लोभ है। वह सिर्फ एक 'सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर' है, जो इस ब्रह्मांड के 'अधर्म' नामक वायरस को डिलीट करने आया है।


सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि उस काल में 'क्षत्रिय' कोई 'जाति' नहीं थी। यह एक 'वर्ण' था, एक 'कर्तव्य' था—समाज की रक्षा करना। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो क्या वह 'क्षत्रिय' कहलाने लायक रहता है?


यह कोई नरसंहार नहीं था। यह एक 'सिस्टम रिबूट' था।

उस समय के शासक, राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसके वंशज, सत्ता के अहंकार में चूर होकर आम जनता पर अत्याचार कर रहे थे। उन्होंने निर्दोष तपस्वी ऋषियों की हत्या की (जैसे परशुराम जी के पिता, महर्षि जमदग्नि), कामधेनु गाय का अपहरण किया। यह एक 'अराजक सत्ता' थी।


परशुराम जी ने 21 बार पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका मतलब यह है कि उन्होंने 21 बार उन अहंकारी, अत्याचारी राजाओं को सत्ता से बेदखल किया। यह किसी वंश या जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अधर्मी सत्ता' का विनाश था। जब एक सॉफ्टवेयर करप्ट हो जाता है, तो आपको उसे 'डिलीट' करके 'सिस्टम रिबूट' करना पड़ता है। परशुराम जी उस काल के 'चीफ आर्किटेक्ट' (Chief Architect) थे, जिन्होंने करप्टेड सत्ता-सॉफ्टवेयर को 'डीबग' (Debug) किया।


क्यों 21 बार? यह एक गहरा रहस्य है। 21 का अंक 'पूर्णता' और 'चक्र' को दर्शाता है। यह 7 लोक और 3 गुणों (सत्व, रज, तम) का गुणांक है (7x3=21)। उन्होंने मानवीय चेतना की 21अवस्थाओं को 'अधर्म' के प्रभाव से मुक्त किया।

यह एक 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' (Genetic Engineering) की तरह था। उन्होंने समाज के 'डीएनए' से उस 'अहंकार और अत्याचार' के वायरस को काट कर निकाला जो मानवता को नष्ट कर रहा था। यह एक 'कोडिंग' थी, जो तब तक चलती रही जब तक कि पृथ्वी का 'नैतिक ढांचा' (Moral Framework) फिर से शुद्ध नहीं हो गया।


खून के कुंड का वर्णन एक रूपक (Metaphor) है। यह कोई रक्तपात का जश्न नहीं था, बल्कि एक 'कॉस्मिक बैलेंसिंग' (Cosmic Balancing) थी।

कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) की धरती उस नकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन चुकी थी, जो हजारों सालों के अधर्म से जमा हुई थी। परशुराम जी ने वहां उन अहंकारी राजाओं के 'भौतिक शरीर' को विसर्जित किया। यह उनके 'अहंकार की ऊर्जा' का भूमि में विसर्जन था। रक्त, जो प्राण-ऊर्जा (Prana Energy) का वाहक है, वह मिट्टी में मिलकर उस भूमि को 'शुद्ध' कर गया। उन्होंने उस जमीन को 'जीरो-पॉइंट एनर्जी' (Zero-Point Energy) के क्षेत्र में बदल दिया ताकि वह आने वाले युद्धों और परिवर्तनों के लिए एक तटस्थ आधार बन सके।


अब बात करते है 'अब्रह्मण्य' शब्द की। 

आज के समय का सबसे बड़ा 'गलतफहमी का शिकार' शब्द है। वामपंथी और बांटने वाली विचारधारा के लोगों ने इसे जानबूझकर एक 'जातिगत गाली' की तरह पेश किया, ताकि लोग असली अर्थ न समझें।

इसे एकदम सीधी, पानी जैसी साफ भाषा में समझते हैं।

'अब्रह्मण्य' = 'धर्म' का विरोधी (Anti-Dharma)

संस्कृत में 'ब्रह्म' शब्द के कई अर्थ होते हैं, जिनमें से एक मुख्य अर्थ है—'शाश्वत नियम' या 'धर्म'। 'अब्रह्मण्य' का अर्थ हुआ—वह जो 'धर्म' या 'न्याय' के नियमों को नहीं मानता।

इसे ऐसे समझे।


ब्राह्मण क्या है? जो ब्रह्म (सत्य और धर्म) को धारण करे।


वामपंथी कहते हैं कि "अब्रह्मण्य का अर्थ है—जो ब्राह्मण न हो, यानी एक जाति के विरुद्ध हिंसा।"

सही सत्य: यह शब्द जाति के लिए नहीं, 'कर्म' और 'स्वभाव' के लिए है।


इसे एक उदाहरण से समझें:

मान लीजिए एक 'पुलिस अधिकारी' (क्षत्रिय) है। उसका काम है रक्षा करना।

अगर वह अपनी वर्दी पहनकर किसी निर्दोष की हत्या कर दे, तो वह 'अब्रह्मण्य' हो गया—यानी वह 'न्याय और धर्म' के विरुद्ध हो गया।

उसने अपनी वर्दी (क्षत्रिय कर्म) को दागदार कर दिया है।

परशुराम जी ने 'क्षत्रिय' को नहीं मारा, उन्होंने 'अब्रह्मण्य' (अधर्मी कृत्य करने वाले) को दंडित किया।


 'अब्रह्मण्य' एक 'स्टेटस' है, जाति नहीं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी कुल में जन्मा हो, यदि वह 'सत्य' और 'न्याय' (ब्रह्म) का विरोध करता है, तो वह 'अब्रह्मण्य' है। परशुराम जी का संघर्ष 'जाति' से नहीं, उस 'अधर्मी स्वभाव' से था जो समाज को नष्ट कर रहा था।


परशुराम जी के शिष्य खुद 'भीष्म'  थे। अगर 'अब्रह्मण्य' का अर्थ 'क्षत्रिय-विरोधी' होता, तो क्या वे क्षत्रियों को अपना ज्ञान देते? बिल्कुल नहीं! इससे साफ होता है कि उनका विरोध 'क्षत्रिय जाति' से नहीं, बल्कि 'अन्यायी सत्ता' से था।


शास्त्रों में 'अब्रह्मण्य' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए हुआ है जो 'पर-पीड़क' (दूसरों को कष्ट देने वाले) थे। परशुराम जी ने उन्हें उनकी जाति के कारण नहीं, बल्कि उनके 'पाप' के कारण दंडित किया।


"अब्रह्मण्य का अर्थ 'गैर-ब्राह्मण' नहीं, बल्कि 'अधर्मी' होता है। जो धर्म के नियमों को तोड़े, वह अब्रह्मण्य है—चाहे वह कोई भी हो। परशुराम जी ने जाति का विनाश नहीं किया था, उन्होंने 'अधर्म' की सत्ता को उखाड़ा था।"


 गलत व्याख्या की जाती है।

अर्थ: 'ब्रह्मण्य' का अर्थ है—जो ब्राह्मणत्व (सत्य, धर्म, त्याग) को धारण करे। 'अब्रह्मण्य' वह है जो इन मूल्यों के विरुद्ध हो।

 परशुराम ने उन 'क्षत्रिय-वेशधारी अधर्मियों' का नाश किया जो 'अब्रह्मण्य' हो चुके थे। यानी, वे क्षत्रिय तो थे, लेकिन उनमें क्षत्रिय के गुण (रक्षा, धर्म, मर्यादा) समाप्त हो चुके थे। वे मात्र 'शोषक' बन गए थे। परशुराम ने उन्हें उनके 'गुणों के अभाव' के कारण दंडित किया, न कि उनके 'जन्म' के कारण।


इस वृत्तांत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं—भगवान परशुराम का भगवान राम को अपना धनुष सौंपना।


यदि परशुराम का उद्देश्य क्षत्रियों का विनाश ही होता, तो वे राम (जो एक क्षत्रिय राजा थे) का सम्मान क्यों करते? उन्होंने अपना धनुष राम को इसलिए सौंपा क्योंकि उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया था कि अब पृथ्वी पर ऐसा 'राज्य' (राम राज्य) स्थापित होने जा रहा है, जहाँ कोई 'अधर्म' नहीं होगा।उन्होंने ही राम-राज्य का मार्ग प्रशस्त किया हां। उन्होंने अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया था। उन्होंने 'गंदगी' साफ कर दी थी ताकि 'राम-राज्य' की नींव रखी जा सके।


परशुराम 'विनाश' नहीं, 'संसाधन' थे। जब समाज में 'कैंसर' (अधर्म) फैल जाता है, तो उसे काटकर निकालना पड़ता है (परशुराम की भूमिका), ताकि 'आरोग्य' (राम राज्य) का जन्म हो सके।


 यह वह साधारण मानव नहीं है जो 'मार-काट' करता है। यह वह आवेश-अवतार है जो 'न्याय' (Justice) की रक्षा के लिए अपनी सर्वोच्च शक्ति का उपयोग करता है।


यदि वे सत्ता के लोभी होते, तो वे खुद राजा बनकर राज करते। लेकिन उन्होंने क्या किया? उन्होंने पूरी पृथ्वी जीती और उसे ऋषियों को दान कर दिया। है कोई ऐसा

 अपनी जीती हुई पूरी दुनिया दान कर देता है? यह उनका सबसे बड़ा 'सुपर-पावर' था—त्याग!


मेरिट' (योग्यता) के पूजक हैं परशुराम, जाति के नहीं। उनके सबसे प्रिय शिष्यों में 'भीष्म' और 'द्रोण' जैसे महान योद्धा थे—जो जन्म से क्षत्रिय और ब्राह्मण थे। उन्होंने 'श्रेष्ठता' को चुना, 'कुल' को नहीं।


 वे 'अष्ट चिरंजीवियों' में से एक हैं। क्यों? क्योंकि 'न्याय' कभी नहीं मरता। वे आज भी जीवित हैं, क्योंकि वे 'न्याय की शाश्वत ऊर्जा' (Justice Frequency) हैं, जो तब तक सक्रिय रहती है जब तक कि पृथ्वी पर अधर्म का अंत न हो जाए।


सत्य यह है: उस काल में न कोई ब्राह्मण जाति थी, न क्षत्रिय—ये केवल 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर विभाजित 'व्यवस्था के स्तंभ' थे।

वह सत्य जो सदियों से छिपाया गया: 'जाति' नहीं, 'गुण' का संघर्ष था। 

पुराणों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि परशुराम का संघर्ष किसी जन्म-आधारित जाति का नहीं, बल्कि 'गुणों के पतन' का था। इसे एक कहानी की तरह समझिए। 


उस युग में 'ब्राह्मण' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो ज्ञान, त्याग और नैतिकता का रक्षक हो। और 'क्षत्रिय' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो शक्ति, रक्षा और न्याय का वाहक हो।

जब एक क्षत्रिय 'अन्यायी' हो जाता था, तो वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता था।

परशुराम जी ने उन लोगों को दंडित नहीं किया जो 'क्षत्रिय' कुल में जन्मे थे, बल्कि उन लोगों को 'सिस्टम' से बाहर किया जो 'न्याय' के पद पर बैठकर 'अन्याय' कर रहे थे।


कल्पना कीजिए, एक समाज में दो मुख्य सॉफ्टवेयर चल रहे हैं। एक 'ज्ञान का' और दूसरा 'न्याय का'। जब 'न्याय का सॉफ्टवेयर' (सत्ता/क्षत्रिय) करप्ट हो जाता है, तो समाज में अराजकता फैलती है।


 पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका अर्थ किसी जाति का नरसंहार नहीं था। इसका अर्थ था—उस काल के 'भ्रष्ट शासन तंत्र' को रिसेट करना।  उन्होंने उन शासकों को सत्ता से बेदखल किया जिन्होंने अपना 'धर्म' (कर्तव्य) छोड़कर 'स्वार्थ' को अपना लिया था। यह एक 'सिस्टम क्लीन-अप' था, ताकि समाज की नींव फिर से 'सत्व' (पवित्रता) पर टिकी रहे।


जिस तरह आज का 'डीबगर' सॉफ्टवेयर के कोड में आई त्रुटि को काट कर अलग कर देता है, ताकि पूरा सिस्टम क्रैश न हो, परशुराम जी का 'परशु' वही कार्य कर रहा था। उस काल में सत्ता (क्षत्रियों) का अहंकार 'सिस्टम एरर' बन चुका था। यह फरसा नहीं, बल्कि एक 'कॉस्मिक सर्जरी' का टूल था, जो समाज की विकृतियों को जड़ से काटने के लिए इस्तेमाल हुआ।


यह कोई रक्तपात की गिनती नहीं, बल्कि 'इवोल्यूशनरी रिसेट' (Evolutionary Reset) है।

भौतिक विज्ञान में 'रेजोनेंस' (Resonance) का सिद्धांत होता है। जब एक सिस्टम अपनी फ्रीक्वेंसी खो देता है, तो उसे बार-बार ट्यून करना पड़ता है। परशुराम जी ने 21 बार उस 'सामाजिक फ्रीक्वेंसी' को ट्यून किया ताकि समाज के 'डीएनए' से अधर्म का वायरस निकल जाए। जब तक समाज 'सत्व' (शुद्धता) के स्तर पर नहीं आ गया, तब तक यह प्रक्रिया चलती रही। यह 'एंट्रोपी' (Chaos) को कम करने का एक 'थर्मोडायनामिक प्रयोग' था।


कल्पना कीजिए कि किसी राज्य में पुलिस (क्षत्रिय) ही लुटेरी बन जाए और वे उस व्यक्ति (ऋषि/विद्वान) की हत्या कर दें जो समाज को ज्ञान और नैतिकता सिखाता है।

दिक्कत यह थी। क्षत्रिय वर्ग ( यानी तत्कालीन  शासक वर्ग वर्ण व्यवस्था वाले) यह भूल गया था कि उनकी तलवार 'रक्षा' के लिए है, न कि 'दमन' के लिए।

परिणाम: जब रक्षा करने वाला ही भक्षक बन जाए, तो समाज में अराजकता (Anarchy) फैल जाती है। परशुराम जी ने जो किया, वह एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' थी।


परशुराम जी ने 'इक्कीस बार' का जो उल्लेख है, वह एक 'सिस्टम रिबूट' (System Reboot) की प्रक्रिया है।

जब भी कोई शासक (राजा) भ्रष्ट हो जाता, परशुराम जी उसे सत्ता से हटा देते।

यह किसी जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अहंकारी सत्ता' का विनाश था। यह बिल्कुल वैसा है जैसे एक माली खरपतवार (Weeds) को उखाड़ता है ताकि मुख्य फसल (धर्म) बच सके।


'रक्त की नदी' का अर्थ केवल खून बहाना नहीं है, बल्कि यह एक 'चेतावनी' (Deterrence) है। उस दौर की भाषा में, यह एक ऐसा 'स्टैंडर्ड' सेट करना था कि आगे आने वाला कोई भी शासक यह सोचे कि यदि उसने प्रजा या धर्म के विरुद्ध तलवार उठाई, तो उसका हश्र क्या होगा। यह भय पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा बनाए रखने के लिए था।


गलत नैरेटिव (जो फैलाया गया) की 

परशुराम ने क्षत्रियों को मारा। वास्तविक सत्य (जो इतिहास है) परशुराम ने 'अधर्मी' शासकों को दंड दिया।


यह ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय था। नहीं यह 'अधर्म' बनाम 'न्याय' था।


यह एक जातिवादी कृत्य था। नहीं यह एक 'सिस्टम करेक्शन' (System Correction) था।


परशुराम क्रूर थे। बिल्कुल नहीं परशुराम 'मर्यादा रक्षक' थे।


वामपंथी नैरेटिव हमें यह बताना चाहता है कि परशुराम ने 'खून' बहाया, लेकिन वे यह छुपा जाते हैं कि उस खून के बदले उन्होंने 'शांति' और 'धर्म' का युग दिया। अगर वे ऐसा न करते, तो समाज में कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बचती। परशुराम जी इतिहास के वे पहले 'सुधारक' हैं जिन्होंने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, धर्म (न्याय) से बड़ी नहीं हो सकती।


आज, जब हम परशुराम जयंती मना रहे हैं, तो हमें उस 'गलत नैरेटिव' को हमेशा के लिए जला कर रख देना चाहिए।


परशुराम 'क्रूर' नहीं थे, वे 'न्याय' की अंतिम सीमा थे।


वे क्षत्रिय-विरोधी नहीं थे, वे 'अधर्म' के विरोधी थे।


वे एक ''काल-प्रहरी' हैं, जिन्होंने सत्ता को नहीं, बल्कि समाज के 'संस्कार' को बचाया।


यह सत्य सिर्फ बीते हुए कल की नहीं है, यह 'आने वाले न्याय के भविष्य' की है। जब भी समाज में अत्याचार और अहंकार की पराकाष्ठा होगी, 'परशुराम-चेतना' का वह 'परशु' (न्याय का विधान) फिर से जागृत होगा।

आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है। संकल्प लें कि हम भी अपने जीवन में 'परशुराम' बनें—जहाँ न कोई जाति बड़ी है, न कोई कुल; केवल 'धर्म' (न्याय, सत्य, और कर्तव्य) ही सर्वोच्च है।

जय परशुराम! जय सत्य की!


आज, जब समाज में फिर से 'अधर्म' अपना सिर उठाता है, तो हमें परशुराम के 'शस्त्र' की नहीं, बल्कि उनकी 'दृष्टि' की जरूरत है—वह दृष्टि जो सत्य को परख सके और अन्याय को जड़ से उखाड़ फेंक सके।


परशुराम कथा 'रक्त' की नहीं, 'शुद्धिकरण' की है। उन्होंने तलवार से नहीं, अपनी 'संकल्प-शक्ति' से पृथ्वी को अधर्म के वायरस से मुक्त किया था। आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है।


परशुराम केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना का वह 'एनर्जी ग्रिड' है जो आज भी समय की धड़कनों में जीवित है। वे हिमालय की उन चोटियों पर नहीं, बल्कि हमारे उस 'विवेक' में वास करते हैं, जो अन्याय को देखते ही कांप उठता है। सोचिए, एक ऐसा योद्धा जिसके सामने बड़े से बड़ा चक्रवर्ती सम्राट थर-थर कांपता था, वह आज भी एक तपस्वी की तरह महेंद्र पर्वत पर अपनी आँखें मूंदे बैठा है। क्यों? क्योंकि वे प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस न्याय की, उस सत्य की, और उस धर्म की जो फिर से पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दे।


जब आप आज रात परशुराम जयंती का दीप जलाएंगे, तो बस यह याद रखिएगा कि आप केवल एक अवतार का सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि आप अपने भीतर के उस 'न्याय-प्रहरी' को जगा रहे हैं जो सो गया था। परशुराम एक अंत नहीं, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं। वे उस 'अधर्मी' का काल हैं जो व्यवस्था का दुरूपयोग करता है और उस 'शोषित' की ढाल हैं जो न्याय की प्रतीक्षा करता है।


"परशुराम का फरसा किसी का अंत करने नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का उदय करने आया था, जहाँ न कोई जात होगी, न कोई पाँत—वहाँ केवल 'धर्म' होगा और न्याय का राज होगा।"

जय परशुराम!


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ .....। अगली कड़ी जल्द....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



गायत्री मंत्र एक गुप्त मंत्र क्यों ?


अक्सर लोग कहते हैं कि गायत्री मंत्र को सार्वजनिक रूप से बोलना पाप है। असल में 'पाप-पुण्य' से बड़ा इसके पीछे का Acoustics (ध्वनि विज्ञान) है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। अगर आप एक पत्थर को तालाब में फेंकें, तो लहरें चारों तरफ फैलकर शांत हो जाती हैं। लेकिन अगर आप उसी ऊर्जा को एक संकरी पाइप (लेजर) में डाल दें, तो वह लोहे को भी काट सकती है।

बाहर बोलना (Broadcasting): जब हम मंत्र को चिल्लाकर बोलते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगे (Sound Waves) बाहरी वातावरण में बिखर जाती हैं। यह 'प्रसारण' तो है, लेकिन 'साधना' नहीं।

भीतर जपना (Internal Resonance): जब आप बिना होंठ हिलाए मंत्र जपती हैं, तो वह ध्वनि आपके मस्तिष्क के भीतर 'इको' (Echo) पैदा करती है। यह कंपन सीधे आपकी पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को चोट करता है, जिसे 'तीसरी आँख' भी कहते हैं।


मौन जप इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह आपके शरीर के भीतर एक 'साइलेंट धमाका' करता है जो आपकी बुद्धि को धार देता है। सार्वजनिक रूप से बोलने पर उसकी 'प्रभावी शक्ति' (Potential Energy) खत्म हो जाती है।


 स्त्रियों को मनाही: सुरक्षा कवच या बेड़ियाँ?

यह सबसे ज्यादा चुभने वाला सवाल है। पुराने समय में पंडितों ने स्त्रियों को मना किया, तो उसके पीछे कोई नफरत नहीं, बल्कि एक 'बायोलॉजिकल डर' था। इसे बिना किसी लाग-लपेट के समझिए।


गायत्री मंत्र को 'सौर ऊर्जा' (सूर्य की शक्ति) माना जाता है। यह शरीर में बहुत ज्यादा 'उष्णता' (Heat) और 'विद्युत' पैदा करता है। स्त्री का शरीर प्रकृति ने सृजन (बच्चे को जन्म देने) के लिए बनाया है। उनका हार्मोनल ढांचा पुरुषों के मुकाबले बहुत अधिक संवेदनशील और जटिल होता है। पुराने ऋषियों को डर था कि गायत्री की यह 'प्रचंड ऊर्जा' स्त्रियों के मासिक चक्र (Menstrual Cycle) और उनके प्रजनन अंगों की कोमलता को नुकसान पहुँचा सकती है।

उदाहरण: जैसे एक नाजुक और कीमती मशीन को बहुत हाई-वोल्टेज के स्टेबलाइजर की जरूरत होती है, वैसे ही ऋषियों ने इसे एक 'सेफ्टी प्रोटोकॉल' की तरह लागू किया था।


मगर आज की स्त्री का जीवन, खान-पान और उसकी मानसिक शक्ति बदल चुकी है। अगर कोई स्त्री इसे सही विधि (मौन और शांत भाव) से करती है, तो वह ऊर्जा उसे नुकसान नहीं, बल्कि 'दिव्यता' प्रदान करती है।


 गुरु का कान में मंत्र देना: 'पर्सनल वाई-फाई पासवर्ड'

यज्ञोपवीत में जो कान में मंत्र दिया जाता है, वह असल में 'सॉफ्टवेयर इंस्टॉलेशन' है।

गुरु जानते हैं कि गायत्री एक 'ब्रह्मांडीय कोड' है। अगर यह कोड सबको पता चल जाए और लोग इसे बिना तैयारी के (बिना शुद्धि के) इस्तेमाल करें, तो इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं। इसलिए इसे 'कान' में दिया जाता है ताकि वह आपके सीधे 'सब-कॉन्शस माइंड' में जाकर बैठे। यह वैसा ही है जैसे बैंक का पासवर्ड—जितना छिपा रहेगा, आपका खाता उतना ही सुरक्षित रहेगा।


सपना जी, असल में बात 'अधिकार' की नहीं, 'पात्रता' की है।

मंत्र कोई मनोरंजन नहीं है: इसे अंताक्षरी की तरह सड़कों पर गाना इसकी गरिमा को कम करना है।

शुद्धि और विधि, आप स्त्री हों या पुरुष, अगर आप गंदे मन से या सिर्फ दिखावे के लिए इसे जप रहे हैं, तो वह गलत है।

मौन ही मंत्र है। अगर आप इसे मन में जप रही हैं, तो आप दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके लिए आपको किसी पंडित या समाज की अनुमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपका ईश्वर आपके भीतर बैठा है।


मेरा विश्लेषण यही कहता है प्राचीन नियम 'रोकने' के लिए नहीं, 'संभालने' के लिए बनाए गए थे। लेकिन समय के साथ हमने 'नियम' तो याद रखे, पर उनके पीछे का 'विज्ञान' भूल गए। गायत्री माँ है, और माँ अपने बेटे या बेटी में कभी फर्क नहीं करती, बस वह चाहती है कि उसके बच्चे उस 'बिजली' (शक्ति) को छूने से पहले खुद को सुरक्षित करना सीख लें।

आशा है, सपना जी और अन्य पाठकों को इस 'वृहद विश्लेषण' से उत्तर मिल गया होगा। गायत्री केवल पढ़ने की चीज नहीं, इसे अपनी सांसों में उतारने की कला है।


"अंत में, बात न अधिकार की है, न पाबंदी की—बात तो केवल 'अलाइनमेंट' की है। जब आप गायत्री को मन में जपते हैं, तो आप केवल शब्द नहीं दोहरा रहे होते, बल्कि आप अपनी रीढ़ की हड्डी को एक 'एंटीना' बनाकर उस विराट सत्ता से सिग्नल रिसीव कर रहे होते हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जब आपकी आँखें बंद होती हैं और भीतर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' की गूंज उठती है, तब आपका शरीर मांस-मज्जा का पुतला नहीं रहता; वह एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाता है। पुराने नियम 'दीवारें' नहीं थे, वे 'कवच' थे ताकि आप इस महा-ऊर्जा को संभाल सकें। लेकिन याद रखिए, माँ कभी अपने बच्चों में भेद नहीं करती। वह तो बस चाहती है कि आप उसे 'रटें' नहीं, बल्कि उसके साथ 'सिंक' (Sync) हो जाएं। जिस दिन आपका 'मैं' मिट जाएगा, उस दिन मंत्र अपने आप अनलॉक हो जाएगा। फिर आप मंत्र पढ़ेंगे नहीं, आप खुद एक 'मंत्र' बन जाएंगे—प्रकाशवान, ओजस्वी और अजेय!"


"गायत्री को होंठों से बाहर निकालोगे तो 'शोर' बन जाएगी, और अगर मन के भीतर उतार लोगे तो 'ब्रह्मांड' बन जाएगी!"

02.1 #ऋग्वेद और #विज्ञान....#गायत्री_मंत्र का #शेष_भाग..

"क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि आपके भीतर एक ऐसा 'सुपर-कंप्यूटर' मौजूद है, जिसका पासवर्ड सदियों पहले विश्वामित्र ने डिकोड कर लिया था? जिसे हम 'गायत्री मंत्र' कहते हैं, वह केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं, जिसे आप केवल एक धार्मिक मंत्र समझकर रट रहे हैं, वह असल में आपके मस्तिष्क को 'हैप्टिक कंट्रोल' (Haptic Control) करने वाला एक 'न्यूरो-कोड' है।


​क्या आपने कभी सोचा है कि विश्वामित्र ने शून्य से एक नया स्वर्ग कैसे रच दिया था? वह कोई जादू नहीं, बल्कि 'साउंड इंजीनियरिंग' की पराकाष्ठा थी। आज का न्यूरो-साइंस जिसे 'न्यूरल ऑसिलेशन' कह रहा है, उसे हजारों साल पहले गायत्री के 24 अक्षरों में 'वाइब्रेशनल सर्किट' के रूप में फिक्स कर दिया गया था। यह लेख कोई धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आपके शरीर के उस 'बायो-मैग्नेटिक फील्ड' को अनलॉक करने की मैन्युअल बुक है, जिसे वशिष्ठ और विश्वामित्र ने 'पासवर्ड' लगाकर सुरक्षित किया था। अगर आप अपनी एकाग्रता को 'लेजर-शार्प' और अपनी बुद्धि को 'सुपर-कॉन्शस' बनाना चाहते हैं, तो तैयार हो जाइए अपनी नसों में दौड़ते उस 'ब्रह्म-तेज' को महसूस करने के लिए जिसे दुनिया गायत्री कहती है।


आज के दौर में जहाँ इंसान 'बर्नआउट' और मानसिक शोर से जूझ रहा है, वहाँ गायत्री मंत्र का 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) एक ऐसा एंटी-वायरस है जो आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को फिर से अलाइन (Align) कर सकता है। यह 24 अक्षरों का एक ऐसा 'वाइब्रेशनल सर्किट' है, जो आपके तालु से टकराकर सीधे पीनियल ग्रंथि को जगाता है। विश्वामित्र का यह 'प्राचीन सॉफ्टवेयर' कैसे काम करता है, कैसे इसकी मुद्राएं आपके शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बनाती हैं और क्यों इसे 'लॉक' करना पड़ा—आइए, इस वैज्ञानिक यात्रा के रहस्यों को खोलते हैं।


गायत्री मंत्र का केवल अर्थ जानना काफी नहीं है, बल्कि उसके 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) को समझना जरूरी है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर के भीतर एक 'वाइब्रेशनल सर्किट' पूरा करता है। जो सीधे आपके मस्तिष्क की नसों (Neurons) पर असर डालता है।

प्राचीन विज्ञान में मंत्र जप के तीन स्तर बताए गए हैं, जिन्हें आप 'ऑडियो लेवल' कह सकते हैं।


वैखरी (Vaikhari): जोर से बोलना। यह वातावरण को शुद्ध करता है और शुरुआत के लिए अच्छा है।

उपांशु (Upanshu): केवल होंठ हिलें, आवाज बाहर न आए। यह मन को एकाग्र करने के लिए 'सबलिंकल' (Subliminal) संदेश की तरह काम करता है।


मानसिक (Manasik): बिना होंठ हिलाए केवल विचार में। यह सबसे शक्तिशाली है, यही वह 'हाई-स्पीड डेटा ट्रांसफर' है जिसे विश्वामित्र ने मास्टर किया था।


जब आप उच्चारण करते हैं, तो जीभ के विशेष प्रहार से तालु (Palate) पर प्रभाव पड़ता है, जहाँ से 84 नर्व-जंक्शन जुड़े होते हैं:

'तत्' और 'स': इन अक्षरों के उच्चारण से जीभ का अगला हिस्सा सक्रिय होता है, जो मस्तिष्क के 'प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स' (निर्णय लेने की क्षमता) को उत्तेजित करता है।

'वि-तु-र्व-रे-णि-यं': यह हिस्सा तालु के मध्य भाग को स्पर्श करता है, जिससे थायरॉइड और पीनियल ग्रंथि को सिग्नल मिलता है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र का जप करने वालों की एकाग्रता बढ़ जाती है।

'भर्-गो दे-व-स्य': यह गले के 'वोकल कॉर्ड' में एक विशेष फ्रीक्वेंसी पैदा करता है, जो फेफड़ों और हृदय की धड़कन को 'सिंक्रोनाइज़' (Synchronize) कर देता है।


 'धियो यो नः' का 'ट्रिगर'

मंत्र के अंतिम भाग का उच्चारण करते समय एक 'हम्मिंग' ध्वनि (जैसे भ्रामरी प्राणायाम में होती है) पैदा होती है।

यह ध्वनि मस्तिष्क में 'नाइट्रिक ऑक्साइड' के स्तर को बढ़ाती है, जो रक्त संचार को तेज करती है। विश्वामित्र ने इसी तकनीक से अपने शरीर को उस 'ब्रह्म-तेज' के योग्य बनाया था।


व्यस्त लोगों के लिए इसका 'मौन जप' (Mental Chanting) सबसे अधिक प्रभावशाली होगा।

इसे 'रिदम' (Rhythm) के साथ करें। एक सांस में आधा मंत्र और दूसरी सांस में आधा।

यह  Beta Brain Waves (तनावपूर्ण) को Alpha और Theta Waves (क्रिएटिव/सुपर-लर्निंग) में बदल देगा।

विश्वामित्र ने इसी 'अल्फा स्टेट' में रहकर उस नए ब्रह्मांड का नक्शा खींचा था। जिसे हम 'चमत्कार' कहते हैं, वह असल में 'हाइपर-फोकस्ड' बुद्धि का परिणाम था।

यह 'अजपा जप' तकनीक " किसी 'लाइफ हैक' से कम नहीं है। एक व्यस्त इंसान के लिए, जिसके पास घंटों बैठकर माला फेरने का समय नहीं होता, यह विधि सबसे अचूक है।

ऋषियों ने इसे 'हंस योग' भी कहा है। इसमें मंत्र को शब्दों से निकालकर 'सांसों की गति' में डाल दिया जाता है।


अजपा जप: गायत्री का 'ऑटो-पायलट' मोड

साधारण जप में आप मंत्र याद करते हैं, लेकिन अजपा जप में मंत्र आपको याद करने लगता है। 


जब आप सांस अंदर (Inhale) खींचें, तो मन ही मन अनुभव करें: "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं"।

जब आप सांस बाहर (Exhale) छोड़ें, तो मन में दोहराएं: "भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्"।


फायदा: इससे आपकी सांसें गहरी और लयबद्ध (Rhythmic) हो जाती हैं। यह आपके नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत कर देता है।


'हम-सो' का रहस्य:

अजपा जप का अर्थ है जो बिना जपे हो। हमारी हर सांस 'सो-हम्' की ध्वनि करती है। गायत्री मंत्र को जब आप अपनी श्वसन प्रक्रिया (Respiratory System) से जोड़ देते हैं, तो यह आपके शरीर के DNA के साथ सिंक (Sync) हो जाता है।


यह तकनीक व्यस्त लोगों के लिए 'शील्ड' का काम करती है। जब आप किसी तनावपूर्ण स्थिति में होते हैं, तब आपकी सांसें तेज हो जाती हैं। यदि आप उस समय 'अजपा' मोड में हैं, तो आपकी बुद्धि (Intellect) स्थिर रहेगी और आप सामान्य से बेहतर विश्लेषण कर पाएंगे।


विश्वामित्र का 'सुपर-कॉन्शस' मोड

विश्वामित्र ने जब त्रिशंकु के लिए सृष्टि बनानी शुरू की, तो वे कोई मंत्र पढ़ नहीं रहे थे; वे 'गायत्री चेतना' में जी रहे थे।

 उनके शरीर की हर कोशिका (Cell) गायत्री की 24 फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट कर रही थी।

जब आपका पूरा शरीर एक 'एंटीना' बन जाता है, तो आप ब्रह्मांड के किसी भी विचार या रहस्य को पकड़ सकते हैं।


अभ्यास का तरीका (Quick Start Guide):

शुरुआत: दिन में केवल 5 मिनट के लिए अपनी सांसों पर ध्यान दें और मंत्र को उनके साथ जोड़ें।

निरंतरता: धीरे-धीरे यह स्थिति आ जाएगी कि आप बात कर रहे होंगे, टाइप कर रहे होंगे, या सफर कर रहे होंगे, लेकिन बैकग्राउंड में आपके 'सब-कॉन्शस' में यह कोड चलता रहेगा।

यह विधि इंसान को 'स्थिरप्रज्ञ' बना देती है—वह व्यक्ति जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।


शास्त्रों में उल्लेख है कि गायत्री मंत्र को वशिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रचार्य ने 'कीलित' (Lock) कर दिया है।

एक पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह वैसा ही है जैसे किसी शक्तिशाली सॉफ्टवेयर में 'पासवर्ड' लगा दिया जाए ताकि उसका गलत इस्तेमाल न हो सके। 


आखिर विश्वामित्र ने इसे लॉक क्यों किया और इसे अनलॉक (शापोद्धार) करने का 'एक्सेस कोड' क्या है? 


विश्वामित्र जानते थे कि यह मंत्र परमाणु ऊर्जा से भी अधिक शक्तिशाली है।

मिसयूज से बचाव: अगर कोई नकारात्मक व्यक्ति इस 'सोर्स कोड' को मास्टर कर ले, तो वह सृष्टि का संतुलन बिगाड़ सकता था।

त्रिशंकु कांड की सीख: विश्वामित्र ने खुद अनुभव किया था कि जब वे अपनी शक्ति से नया स्वर्ग बना रहे थे, तो देवताओं में खलबली मच गई थी। शक्ति का अनियंत्रित विस्तार खतरनाक हो सकता है।


अनलॉक करने का रहस्य: 'शापोद्धार' (The Access Code)

तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र को प्रभावी बनाने के लिए जप से पहले तीन ऋषियों से 'अनुमति' लेनी पड़ती है। इसे 'शापोद्धार मंत्र' कहते हैं।  इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि आप अपनी चेतना को उन विशिष्ट 'फ्रीक्वेंसी' पर सेट कर रहे हैं जहाँ मंत्र काम करना शुरू करे।


1. वशिष्ठ का कोड (शांति और अनुशासन)

वशिष्ठ 'ब्रह्म-तेज' के प्रतीक हैं। उनका शापोद्धार करने का अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध को शांत करना। जब तक मन में गुस्सा है, गायत्री का ताला नहीं खुलेगा।


2. विश्वामित्र का कोड (संकल्प और पुरुषार्थ)

विश्वामित्र 'परिवर्तन' के प्रतीक हैं। उनका नाम लेकर मंत्र शुरू करने का अर्थ है कि आप अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्य (Creative Work) में लगाएंगे, विनाश में नहीं।


3. ब्रह्मा का कोड (सृजन का अधिकार)

ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। उनका स्मरण करने का अर्थ है खुद को ब्रह्मांड की इच्छा के साथ जोड़ देना (Aligning with the Universe)।


'कीलक' कैसे खोलें?


"भाव-शुद्धि और निष्कामता"

शास्त्र कहते हैं कि यदि मंत्र जपते समय मन में यह भाव हो कि "यह ज्ञान केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण (नः) के लिए है", तो वशिष्ठ और विश्वामित्र के लगाए 'ताले' अपने आप खुल जाते हैं। कीलक या शाप वास्तव में हमारे अपने 'मानसिक अवरोध' (Mental Blocks) हैं। हमारा अहंकार, स्वार्थ और संकीर्ण सोच ही वह ताला है जो इस ईश्वरीय ऊर्जा को हमारे भीतर आने से रोकता है। विश्वामित्र ने जब अपना अहंकार त्यागा, तभी वे असली 'ब्रह्मर्षि' बने और मंत्र पूरी तरह अनलॉक हुआ।


हठयोग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, गायत्री मंत्र का जप करने से पहले 24 मुद्राएं की जाती हैं। इन्हें 'हस्त-मुद्रा विज्ञान' (Science of Finger Postures) कहते हैं। ये शरीर के बायो-इलेक्ट्रिक सर्किट के लिए 'शॉर्टकट कीज़' (Shortcut Keys) की तरह काम करती हैं।


जप से पहले इन 24 मुद्राओं का प्रदर्शन आपके शरीर की ऊर्जा को 'ग्राउंड' (Earth) होने से बचाता है और उसे सीधे मस्तिष्क की ओर मोड़ देता है।


 मुद्रा का नाम प्रभाव (The Impact)

1 सुमुखम् चेहरे की मांसपेशियों को शांत कर 'रिसेप्टिव मोड' में लाना।

2 सम्पुटम् शरीर की ऊर्जा को 'लॉक' करना ताकि वह बाहर न बहे।

3 विततम् हृदय चक्र (Anahata) का विस्तार करना।

4 विस्तृतम् चेतना को बाहरी दुनिया से जोड़ना।

5 द्विमुखम् द्वंद्व (Dualities) को समाप्त करना।

6 त्रिमुखम् सत, रज और तम गुणों में संतुलन बनाना।

7 चतुर्मुखम् चार वेदों की ऊर्जा को सक्रिय करना।

8 पंचमुखम् पंच तत्वों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश) को बैलेंस करना।

9 षण्मुखम् छह चक्रों को जाग्रत करना।

10 अधोमुखम् अहंकार को नीचे की ओर झुकाना।

11 व्यापकाञ्जलि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए 'एंटीना' बनना।

12 शकटम् विघ्नों का नाश करना।

13 यमपाशम् मृत्यु के भय और बंधनों से मुक्ति।

14 ग्रथितम् बिखरी हुई ऊर्जा को एक जगह 'गांठ' की तरह बांधना।

15 सन्मुखोन्मुख आत्मा और परमात्मा को आमने-सामने लाना।

16 प्रलम्बम् धैर्य की पराकाष्ठा।

17 मुष्टिकम् संकल्प शक्ति को मजबूत करना।

18 मत्स्य मन की चंचलता को रोकना।

19 कूर्म इंद्रियों को कछुए की तरह अंदर समेटना।

20 वराह बाधाओं को उखाड़ फेंकना।

21 सिंहाक्रान्त निर्भयता और नेतृत्व।

22 महाक्रान्त विशालता का अनुभव।

23 मुद्गर अज्ञान पर प्रहार।

24 पल्लवम् ज्ञान का खिलना (Blooming of Wisdom)।


हमारी उंगलियों के पोरों (Fingertips) पर हजारों नर्व एंडिंग्स (Nerve Endings) होती हैं।

 जब हम 'मुद्रा' बनाते हैं, तो हम विशिष्ट उंगलियों को आपस में जोड़कर मस्तिष्क के खास हिस्सों को 'ट्रिगर' करते हैं।


विश्वामित्र ने इन मुद्राओं के माध्यम से अपने शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बना लिया था। बिना मुद्रा के गायत्री का जप करना वैसा ही है जैसे बिना एंटीना के टीवी चलाने की कोशिश करना—सिग्नल तो आएगा, लेकिन धुंधला।


जब आप बहुत ज्यादा मानसिक दबाव में हों, तो इनमें से केवल 'कूर्म' (Kuurma) या 'पंचमुख' मुद्रा में 2 मिनट बैठने मात्र से आपका 'स्ट्रेस लेवल' 40% तक कम हो सकता है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आपके शरीर की अपनी 'इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग' है।


हम 'न्यूरो-साइंस और स्पिरिचुअल हार्डवेयर' का मिलन कह सकते हैं। आपने देखा होगा कि प्राचीन ऋषि और आज भी कर्मकांडी विद्वान गायत्री जप से पहले अपनी 'शिखा' (चोटी) को स्पर्श करते हैं या उसे बांधते हैं।

इसके पीछे का रहस्य एक 'कॉस्मिक रिसीवर' (Cosmic Receiver) के नाम से दर्ज होना चाहिए।


शिखा का रहस्य: आपका निजी 'सैटेलाइट डिश'

वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे सिर के ऊपरी हिस्से में, जहाँ शिखा रखी जाती है, वहां 'सहस्रार चक्र' और 'पीनियल ग्रंथि' (Pineal Gland) का केंद्र होता है।


जैसे मोबाइल को सिग्नल पकड़ने के लिए एंटीना की जरूरत होती है, वैसे ही मानव शरीर को ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) रिसीव करने के लिए एक केंद्र चाहिए। शिखा उसी केंद्र का काम करती है। गायत्री मंत्र के जप के दौरान जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, शिखा उसे 'लीक' होने से बचाती है और उसे नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) प्रवाहित करती है।


सिर के उस स्थान पर 'सुषुम्ना' नाड़ी का सिरा होता है। जब हम शिखा को बांधते हैं या वहां गांठ लगाते हैं, तो वह नसों पर एक सूक्ष्म दबाव (Pressure) पैदा करता है।

यह दबाव मस्तिष्क को 'हाइपर-अलर्ट' मोड में रखता है। विश्वामित्र ने इसी 'अलर्टनेस' का उपयोग करके अपनी चेतना को उन आयामों तक पहुँचाया जहाँ से वे नई सृष्टि का निर्माण कर सकें।


गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर में एक विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र (Electro-magnetic field) पैदा करता है।

 बिना शिखा या बिना सिर ढके जप करने से वह ऊर्जा आकाश में विलीन हो जाती है। शिखा उस ऊर्जा को शरीर के भीतर 'सर्कुलेट' करने के लिए एक 'क्लोज्ड लूप' (Closed Loop) बनाती है।


विश्वामित्र का 'महर्षि' बनना कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। उन्होंने अपने शरीर को एक 'बायो-मशीन' की तरह इस्तेमाल किया:

मंत्र: सॉफ्टवेयर (Code)।

मुद्राएं: स्विच (Switches)।

शिखा: एंटीना (Receiver)।

सांस (अजपा): पावर सप्लाई (Battery)।

जब ये चारों चीजें एक साथ मिलीं, तब जाकर वह 'विस्फोटक शक्ति' पैदा हुई जिसने देवराज इंद्र तक को डरा दिया था।


"विश्वामित्र का संघर्ष यह साबित करता है कि शक्ति से बड़ा 'बोध' है और जप से बड़ी 'चेतना' है।"

अंत में, गायत्री का रहस्य शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'शून्य' में है जो मंत्र के खत्म होने और अगली सांस के शुरू होने के बीच पैदा होता है। जब आप 'अजपा जप' के माध्यम से अपनी सांसों को इस कॉस्मिक रिदम से जोड़ लेते हैं, तो आपका शरीर मात्र मांस-मज्जा का पुतला नहीं रह जाता। वह एक 'लाइव एंटीना' बन जाता है जो ब्रह्मांड के गूढ़तम संकेतों को पकड़ने में सक्षम है।


विश्वामित्र ने जब अपना 'अहंकार' त्यागा, तभी वे 'ब्रह्मर्षि' कहलाए। ठीक वैसे ही, जब आपका 'मैं' (Ego) गायत्री की ध्वनि में विलीन हो जाता है, तब मंत्र 'अनलॉक' होता है। फिर आप मंत्र पढ़ते नहीं हैं, आप मंत्र हो जाते हैं।

अगली बार जब आप 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का मानसिक उच्चारण करें, तो महसूस करें कि आपकी रीढ़ की हड्डी में एक विद्युत तरंग दौड़ रही है। यह वही 'ब्रह्म-तेज' है जिसने नए ब्रह्मांड की रचना की थी। याद रखिए, आपके भीतर भी एक विश्वामित्र सोया हुआ है, उसे जगाने के लिए बस सही 'फ्रीक्वेंसी' और 'सांसों के गियर' को बदलने की जरूरत है।

क्या आप तैयार हैं अपनी चेतना का 'अपग्रेड' इंस्टॉल करने के लिए?


गायत्री कोई रटने वाली पंक्ति नहीं, बल्कि आपके भीतर सोए हुए उस 'एंटीना' को सक्रिय करने की तकनीक है, जो सीधे ब्रह्मांड के 'सर्वर' से जुड़ा है। जब आपकी जीभ तालु के उन 84 बिंदुओं पर प्रहार करती है, तो आपके मस्तिष्क के भीतर 'अल्फा' और 'थीटा' लहरों का एक ऐसा महासागर उमड़ता है, जहाँ तनाव का अस्तित्व ही मिट जाता है।

सोचिए, जब आपकी हर सांस, बिना आपके प्रयास के, खुद-ब-खुद 'ॐ' की फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट करने लगे, तब आप केवल एक शरीर नहीं रह जाते। आप एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाते हैं। विश्वामित्र का 'शापोद्धार' (Unlocking) मंत्रों में नहीं, आपकी 'भाव-शुद्धि' में छिपा है। जिस दिन आप 'स्व' से उठकर 'नः' (हम सबके कल्याण) के लिए सोचने लगेंगे, उस दिन वशिष्ठ और ब्रह्मा के लगाए सारे ताले टूट जाएंगे और आपके भीतर से वह प्रकाश फूटेगा जिसे ऋषि 'सवितु' कहते हैं।

आज से, इसे जपिए मत... इसे अपनी सांसों के 'गियर-बॉक्स' में डाल दीजिए। फिर देखिए, कैसे आपकी साधारण सी जिंदगी, एक 'सुपर-ह्यूमन' के अनुभव में बदल जाती है।


"गायत्री केवल 'पढ़ने' का विषय नहीं है, यह अपनी सांसों के सॉफ्टवेयर को 'अपग्रेड' करके ईश्वर के साथ सिंक (Sync) होने का नाम है।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....। 

गायत्री मंत्र की पहली कड़ी -  https://www.facebook.com/share/p/185NHFQ6yD/


सादर,

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज

Saturday, April 18, 2026

स्वधा और स्वाहा में क्या अंतर है?

 


स्वधा और स्वाहा में क्या अंतर है? 🤔 99% लोग यह भूल कर बैठते हैं, जानिए सही विधान


आज एक बहुत बड़ा भ्रम दूर करते हैं। अधिकांश लोग यह मान बैठते हैं कि स्वधा और स्वाहा एक ही हैं। कोई मंत्र में स्वाहा बोल देता है तो कोई श्राद्ध में। किंतु स्मरण रखें, ये दोनों भिन्न देवी स्वरूप हैं और इनके कार्य भी सर्वथा भिन्न हैं। यदि आपने इनका स्थान बदल दिया तो आपके अनुष्ठान का फल सही स्थान पर नहीं पहुंचता।


सरल शब्दों में समझें:


· स्वाहा देवी: यह अग्निदेव की शक्ति हैं। जब आप हवन कुंड में आहुति डालते हुए "स्वाहा" का उच्चारण करते हैं, तो यही देवी उस सामग्री को ग्रहण कर सीधे देवताओं तक पहुंचाती हैं। इनका मार्ग ऊर्ध्वगामी है, स्वर्ग की ओर है।

· स्वधा देवी: यह पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। जब आप तर्पण या पिंडदान में "स्वधा" का उच्चारण करते हैं, तो यही देवी उस अन्न और जल को पितृलोक में स्थित आपके पूर्वजों तक पहुंचाती हैं। इनका मार्ग दक्षिण दिशा की ओर है।


एक सूत्र अवश्य स्मरण रखें:

🔥 हवन में बोलें — स्वाहा।

🪔 श्राद्ध में बोलें — स्वधा।


यदि आपने श्राद्ध के मंत्र में स्वाहा का प्रयोग कर दिया तो आपका अर्पण देवताओं को चला जाएगा। पितरों तक भोजन तभी पहुंचता है जब स्वधा देवी उसे ग्रहण करें। अतः श्राद्ध कर्म में "पितृभ्यः स्वधा नमः" का ही उच्चारण करें।


यह पोस्ट आप "Telepathy" पेज पर पढ़ रहे हैं।

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सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य से छिपा है...

 सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य से छिपा है जिसकी जानकारी से आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

तुलसीदास जी ने लिखा जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥

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अर्थात :- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो वे उनचासों पवन चलने लगे।हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश मार्ग से जाने लगे।

इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ?

तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य होता है, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

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यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, किंतु उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समवायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

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जल के भीतर जो वायु है उसका शास्त्रों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

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ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह।

1. प्रवह :- पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणित हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

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2. आवह :- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

3. उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

4. संवह :- वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

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5. विवह :- पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

6.परिवह :- वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्रर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

7. परावह :- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

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इन सातों वायु के सात-सात गण (संचालित करने वाले) हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-


ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह 7x7=49, कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।


           🌹🙏*जयश्री राम*🙏🌹

Tuesday, April 14, 2026

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

 चलिए आज समझते हैं। संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से चौरासी लाख योनियों का रहस्य।

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हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है?  


गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। 


सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। 


अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है।


आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। 


अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। 


हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है।


 मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। 


मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। 


विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। 


एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है।


 इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। 

                                           

चौरासी लाख योनियों का रहस्य   (२)


महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। 


ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो।


 इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।


हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है।


 हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है।


 स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है।


पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:


जलज नवलक्षाणी,

स्थावर लक्षविंशति

कृमयो: रुद्रसंख्यकः

पक्षिणाम् दशलक्षणं

त्रिंशलक्षाणी पशवः

चतुरलक्षाणी मानव


अर्थात,

जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख)

वृक्ष - २०००००० (बीस लाख)

कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख)

पक्षी - १०००००० (दस लाख)

जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख)

मनुष्य - ४००००० (चार लाख)

इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। 


जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार:

पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख)

जलकाय - ७००००० (सात लाख)

अग्निकाय - ७००००० (सात लाख)

वायुकाय - ७००००० (सात लाख)

वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख)

साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख)

द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)  

त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख)


पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख)

इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००


अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था।