Thursday, May 14, 2026

गंभीर से गंभीर रोग में शीघ्र स्वस्थ होने की विधि – प्राण और संकल्प का अद्भुत समन्वय

 गंभीर से गंभीर रोग में शीघ्र स्वस्थ होने की विधि – प्राण और संकल्प का अद्भुत समन्वय


मित्रो, आज हम एक ऐसी विधि पर बात करेंगे जो गंभीर से गंभीर रोग में भी शीघ्र स्वस्थ होने में सहायक है। यह कोई जादू नहीं – यह प्राण, संकल्प और चित्त की शक्ति का शुद्ध विज्ञान है।


पहला चरण – दिनचर्या को साधो


प्रतिदिन रात को समय से सो जाओ, लगभग रात्रि 10 बजे अथवा जैसे ही सहज नींद आए। प्रातः जल्दी उठो – अपने आलस को सहजता मत समझ लेना। लगभग 7 घंटे की नींद लेना उचित है। सुबह उठकर ताजा जल 2-3 गिलास बैठकर पियो। फिर नित्य कर्म से निवृत्त होकर टहलने जाओ और व्यायाम करो – हल्का पसीना आना चाहिए।


दूसरा चरण – गहरी साँस का अभ्यास


गहरी, लंबी, धीमी साँस नाभि तक लेना और छोड़ना जरूर करो। दिन के समय भी, जब भी याद आए – गहरी, लंबी साँस लो और छोड़ो। ज्यादा से ज्यादा गहरी, लंबी, धीमी साँस की आदत डालो। जिससे शरीर में प्राण की मात्रा बढ़े।


तीसरा चरण – साँस के साथ ध्यान और ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव


जब साँस ले रहे हो, आँखें धीरे से बंद कर लो। आती-जाती साँस को पहले कुछ दिन नाक के नथुनों से बाहर आते-अंदर जाते महसूस करो। अपना पूरा ध्यान इस बात पर रहे – कैसे साँस धीरे-धीरे अंदर ले रहे हो, उस साँस के स्वाद को महसूस करो, कैसे धीरे-धीरे बाहर निकाल रहे हो।


शुरू-शुरू में 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम – ताजी, स्वच्छ हवा में – बैठकर या खड़े होकर, जिस स्थिति में सहज हो, अपनी गहरी साँस के आने-जाने का ध्यान करो।


जब साँस ले रहे हो, ध्यान पूरा नाक के नथुनों से अंदर प्रवेश करती और बाहर निकलती प्राणवायु पर रहे। और साथ ही, हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव करो।


चौथा चरण – नाक के नथुनों से आज्ञा चक्र तक


कुछ दिन इस तरह ध्यान करने से तुम नाक के नथुनों से लेकर आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य माथे) तक कुछ शीतलता, खिंचाव, और वायु के घर्षण को महसूस करोगे। तब अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य माथे पर ही ले जाओ। वहाँ साँस की शीतलता को महसूस करते हुए, हर आती-जाती साँस के साथ अपने भाव को दोहराओ – ‘स्वस्थ हूँ’।


ऐसा सिर्फ भाव ही नहीं करना है – अपने स्वास्थ्य को महसूस करो, उसके घटने को महसूस करो। प्राण के रूप में जो संजीवनी तुममे प्रवेश कर रही है, वह लगातार तुम्हें स्वस्थ बनाए हुए है। बार-बार हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ, स्वस्थ हूँ’ दोहराओ, अपने भाव को प्रगाढ़ करो।


पाँचवाँ चरण – ‘स्वस्थ हूँ’ ही तुम्हारा मंत्र है


‘स्वस्थ हूँ’ – यही तुम्हारा मंत्र है। इसको हर साँस के साथ जोड़ देना है। जो कार्य तुमने 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम किया, उसे अपने पूरे 24 घंटे पर फैला दो। ध्यान के समय के अलावा जब तुम यह कर रहे हो, आँखें बंद करने की भी जरूरत नहीं। एक धारा सतत चित्त में प्रगाढ़ होती रहे – ‘स्वस्थ हूँ’। और परमात्मा के प्रति धन्यवाद के भाव से भरे रहो। रात को सोने से पूर्व इसी भाव के साथ सो जाओ, जिससे रात भर यह मंत्र काम करता रहे।


छठवाँ चरण – हथेलियाँ टकराओ (विशेष विधि)


यदि तुम किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो और शीघ्र स्वस्थ होना चाहते हो, तो अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में टकराओ। यह एक दिन में कम से कम 500 बार – जोर-जोर से हथेलियाँ टकराकर बजाओ। हर टकराहट के साथ एक ही भाव रखो – ‘स्वस्थ हूँ’। यह मंत्र बन जाए। तुम्हारा अंतस इस जगत में फैले प्राण प्रवाह (संजीवनी) को तुममें तीव्रता से प्रवेश के लिए तैयार होगा। वे सभी ग्रन्थियाँ जो मन और शरीर के स्तर पर गलत जीवनशैली से पैदा हो गई थीं, टूट जाएँगी।


सातवाँ चरण – चित्त ही मंत्र है (शिव सूत्र)


यह शिव सूत्र है – ‘चित्त ही मंत्र है’। तुम जो भी मन से दोहराते हो, वही घटने लगता है। तुम जो भी दोहराओगे, वही घटेगा। तुम्हारे मन के द्वारा जो भी बार-बार पुनरुक्ति की जाती है, वह चित्त की धारा में प्रवाह बन जाती है, वही शक्ति बन जाती है। मन और शरीर दो नहीं – एक ही हैं। मन पर जो घटेगा, शरीर पर लक्षण आने शुरू हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे से गहरे में जुड़े हैं।


आठवाँ चरण – प्रगति की निगरानी रखो


तुम कितनी भी गंभीर या लाइलाज बीमारी से ग्रसित हो, इस सूत्र को समझकर उपयोग करो। साधना शुरू होने के उपरांत 15 दिन में एक बार चेकअप जरूर कराओ। सतत लगे रहो। धीरे-धीरे यह बात प्रगाढ़ होने लगेगी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो। एक क्रम तेजी से तुम्हें स्वस्थ करने में विकसित होने लगेगा। जब तक पूर्ण स्वस्थ न हो जाओ, सतत इस प्रक्रिया में लगे रहना है।


नौवाँ चरण – परमात्मा के प्रति अनुग्रह और धन्यवाद का भाव


परमात्मा के प्रति एक अनुग्रह, धन्यवाद के भाव से भरे रहो। यह बहुत सहायक होगा। पूरा अस्तित्व तुम्हें स्वस्थ किए जाने के प्रवाह से भर उठेगा।

Tuesday, May 12, 2026

त्रिकाल सन्ध्या त्याग का दारुण परिणाम

 त्रिकाल सन्ध्या त्याग का दारुण परिणाम


द्विज जीवन में आध्यात्मिक, मानसिक एवं कर्मगत पतन

द्विज के लिए त्रिकाल सन्ध्या केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, अपितु आत्मिक शुद्धि, प्राण-संतुलन और वैदिक जीवन का आधार मानी गई है। शास्त्रों में इसके त्याग को अत्यन्त गंभीर दोष बताया गया है। इसके परिणामों को तीन स्तरों पर समझना उचित होगा:


● १. आध्यात्मिक हानि :---


• तेज (आभा) का नाश – सन्ध्या से उत्पन्न ब्रह्मतेज धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है।

• गायत्री माता की कृपा से वंचित – सन्ध्या न करने वाला गायत्री उपासना से दूर होकर आध्यात्मिक उन्नति खो देता है।

• पुण्य क्षय और पाप वृद्धि – शास्त्रों में कहा गया है कि सन्ध्या न करने वाला व्यक्ति अनजाने में भी पाप का भागी बनता है।

• देवऋण की वृद्धि – सूर्य, अग्नि, वायु आदि देवताओं के प्रति कर्तव्य न निभाने से ऋण बढ़ता है।


● २. मानसिक और प्राणिक हानि :---


• मन की चंचलता और अशुद्धि – सन्ध्या का जप-ध्यान मन को स्थिर करता है; इसके अभाव में मानसिक अस्थिरता बढ़ती है।

• प्राणशक्ति का असंतुलन – प्राणायाम और अर्घ्य न देने से नाड़ी-संतुलन बिगड़ता है।

• निर्णय क्षमता में कमी – बुद्धि पर तमोगुण और रजोगुण का प्रभाव बढ़ता है।


● ३. सामाजिक और कर्मगत हानि :---


• द्विजत्व का पतन – शास्त्रों में कहा गया है:

“सन्ध्याहीनः अशुचिर्नित्यं अनर्हः सर्वकर्मसु”

अर्थात् सन्ध्या न करने वाला द्विज शुद्ध नहीं रहता और वैदिक कर्मों के योग्य नहीं रहता।

• कर्मों का निष्फल होना – यज्ञ, पूजा, जप आदि भी पूर्ण फल नहीं देते।

• समाज में आदर की हानि – वैदिक आचरण छोड़ने से प्रतिष्ठा घटती है।


● ४. सूक्ष्म (गूढ़) हानि :---


• आत्मिक जागरण में बाधा – सन्ध्या कुण्डलिनी और चक्रों के सूक्ष्म संतुलन में सहायक है; इसके अभाव में उन्नति रुकती है।

• दैवी संरक्षण में कमी – सन्ध्या के मन्त्र और अर्घ्य एक प्रकार का सूक्ष्म कवच बनाते हैं, जो कमजोर पड़ जाता है।


● शास्त्रीय निष्कर्ष :---

• सन्ध्या त्यागने वाला द्विज शनैः शनैः मात्र जन्म से द्विज रह जाता है, गुण और कर्म से नहीं।

• यह स्थिति दीर्घकाल में आध्यात्मिक पतन का कारण बनती है।


Thursday, May 7, 2026

श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन

 *श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन*

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1-श्री गणेश की मूर्ति 1फुट से अधिक बड़ी (ऊंची) नहीं होना चाहिए।


2-एक व्यक्ति के द्वारा सहजता से उठाकर लाई जा सके ऐसी मूर्ति हो।


3-सिंहासन पर बैठी हुई, लोड पर टिकी हुई प्रतिमा सर्वोत्तम है।


4-सांप,गरुड,मछली आदि पर आरूढ अथवा युद्ध करती हुई या चित्रविचित्र आकार प्रकार की प्रतिमा बिलकुल ना रखें।

 

5-शिवपार्वती की गोद में बैठे हुए गणेश जी कदापि ना लें. क्येंकि शिवपार्वती की पूजा लिंगस्वरूप में ही किये जाने का विधान है. शास्त्रों में शिवपार्वती की मूर्ति बनाना और उसे विसर्जित करना निषिद्ध है।


6-श्रीगणेश की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर घरपर ना लाएं।


7-श्रीगणेश की जबतक विधिवत प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती तब तक देवत्व नहीं आता. अत: विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा करें।


8-परिवार मेंअथवा रिश्तेदारी में मृत्युशोक होने पर, सूतक में पडोसी या मित्रों द्वारा पूजा, नैवेद्य आदि कार्य करायें. विसर्जित करने की शीघ्रता ना करें।


9-श्रीगणेश की प्राणप्रतिष्ठा होने के बाद घर में वादविवाद, झगड़ा, मद्यपान, मांसाहार आदि ना करें।


10-श्रीगणेशजी को ताजी सब्जीरोटी का भी प्रसाद नैवेद्य के रूप में चलता है केवल उसमें खट्टा, तीखा, मिर्चमसाले आदि ना हों।


11-दही+शक्कर+भात यह सर्वोत्तम नैवेद्य है।


12-विसर्जन के जलूस में झांज- मंजीरा,भजन आदि गाकर प्रभु को शांति पूर्वक विदा करें. डी. जे. पर जोर जोर से अश्लील नाच, गाने, होहल्ला करके विकृत हावभाव के साथ श्रीगणेश की बिदाई ना करें. 

ध्यान रहे कि इस प्रकार के अश्लील गाने अन्यधर्मावलंबियों केउत्सवों पर नहीं बजाते. 

13-यदि ऊपर वर्णित बातों पर अमल करना संभव ना हो तो श्रीगणेश की स्थापना कर उस मूर्ति का अपमान ना करें। अंत में-जो लोग 10दिनों तक गणेशाय की झांकी के सामने रहते हैं, अगर वो नहीं सुधर सकते, तो हम आप भीड़ में धक्के खाकर 2,4 सेकिंड का दर्शन कर सुघर जायेंगे??? 


कितने अंधेरे में हैं हम लोग.!!

इस अंधेरे में क्षणिक प्रकाश ढूंढने की अपेक्षा, घर में रखी हुई गणेशमूर्ति के सामने 1घंटे तक शांत बैठे. अपना आत्मनिरीक्षण करें, अच्छा व्यवहार करें.. घरपर ही गणेश आपपर कृपा बरसायेंगे.

श्रीगणेशजी एक ही हैं.... 

उनकी अलग अलग कंपनियां नहीं होती... अपनी सोच अलग हो सकती है. 

एकाग्रचित्त हों, शांति प्राप्त करें।


शुभम

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Monday, May 4, 2026

सन्ध्या-विहीन ब्राह्मण

 सन्ध्या-विहीन ब्राह्मण: घोर दोषों का प्रहार, ब्राह्मणत्व का पतन एवं सनातन धर्म से विच्छेद का भीषण परिणाम।


त्रिकाल सन्ध्या के लोप से ब्राह्मण पर आरोपित ५१ दोष—


१. ब्रह्मतेज-क्षय दोष — सन्ध्या-अनुष्ठान के अभाव से आध्यात्मिक तेज क्षीण हो जाता है।

२. गायत्री-अनादर दोष — गायत्री-जप के त्याग से दैवी कृपा दूर हो जाती है।

३. अशुचिता दोष — नित्य शुद्धि के अभाव से अशुद्धि बनी रहती है।

४. कर्म-अफलता दोष — अन्य वैदिक कर्म पूर्ण फल प्रदान नहीं करते।

५. देवऋण-वृद्धि दोष — सूर्य आदि देवताओं का ऋण बढ़ता है।

६. चित्त-अशान्ति दोष — मन में अस्थिरता एवं अशान्ति बढ़ती है।

७. द्विजत्व-पतन दोष — आचरण से ब्राह्मणत्व का ह्रास होता है।

८. मन्त्र-शक्ति-क्षय दोष — जप का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

९. ऋषि-ऋण-उपेक्षा दोष — ऋषियों के प्रति कर्तव्य का उल्लंघन होता है।

१०. काल-अनादर दोष — पवित्र सन्धि-काल व्यर्थ व्यतीत हो जाते हैं।

११. प्राणाग्नि-मन्दता दोष — प्राणशक्ति का प्रवाह मन्द हो जाता है।

१२. वाक्-अशुद्धि दोष — वाणी में असत्य एवं कटुता आ जाती है।

१३. सूक्ष्म पाप-संचय दोष — लघु-लघु पाप संचित होते जाते हैं।

१४. दैविक अनुकूलता-ह्रास दोष — दैवी सहयोग कम हो जाता है।

१५. निद्रा-अशान्ति दोष — स्वप्न अशान्त एवं भययुक्त हो जाते हैं।

१६. चक्र-असन्तुलन दोष — सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र असन्तुलित हो जाते हैं।

१७. आयुष्य-गुणवत्ता-ह्रास दोष — जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

१८. संकल्प-दुर्बलता दोष — इच्छाशक्ति दुर्बल हो जाती है।

१९. सत्त्व-क्षय दोष — सत्त्वगुण घटता है, रजस एवं तमस बढ़ते हैं।

२०. आत्मिक-प्रगति-अवरोध दोष — आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है।

२१. ध्यान-अयोग्यता दोष — मन ध्यान में स्थिर नहीं रह पाता।

२२. इन्द्रियनिग्रह-दुर्बलता दोष — इन्द्रियों पर नियन्त्रण कम हो जाता है।

२३. विवेक-क्षय दोष — सद्-असद् का विवेक दुर्बल हो जाता है।

२४. श्रद्धा-क्षीणता दोष — धर्म में आस्था क्षीण होने लगती है।

२५. आचार-विचलन दोष — वैदिक अनुशासन से विचलन बढ़ता है।

२६. स्मरण-शक्ति-ह्रास दोष — स्मरण एवं अध्ययन क्षमता घटती है।

२७. आत्मविश्वास-ह्रास दोष — आन्तरिक निर्बलता का अनुभव होता है।

२८. अन्तःकरण-मलिनता दोष — हृदय की शुद्धता का अभाव हो जाता है।

२९. दैहिक-जड़ता दोष — शरीर में आलस्य एवं भारीपन बढ़ता है।

३०. प्रेरणा-अभाव दोष — सत्कर्मों के प्रति उत्साह कम हो जाता है।

३१. धर्म-विमुखता दोष — धीरे-धीरे धर्म से दूरी बढ़ती है।

३२. सत्संग-विरक्ति दोष — सत्संग में रुचि कम हो जाती है।

३३. अहंकार-वृद्धि दोष — विनम्रता घटकर अहंकार बढ़ता है।

३४. क्रोध-प्रवृत्ति दोष — क्रोध एवं चिड़चिड़ापन बढ़ता है।

३५. लोभ-वृद्धि दोष — भौतिक इच्छाएँ प्रबल हो जाती हैं।

३६. मोह-बन्धन दोष — आसक्ति एवं मोह बढ़ते हैं।

३७. दृष्टि-अशुद्धि दोष — दृष्टिकोण नकारात्मक हो जाता है।

३८. श्रवण-दोष — शुभ वचनों के श्रवण में अरुचि होने लगती है।

३९. सत्कर्म-विघ्न दोष — सत्कर्मों में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।

४०. अशुभ-संयोग दोष — प्रतिकूल परिस्थितियाँ बार-बार बनती हैं।

४१. आत्मिक-दुर्बलता दोष — आध्यात्मिक बल क्षीण हो जाता है।

४२. दैवी-कवच-क्षीणता दोष — सूक्ष्म सुरक्षा (आभामण्डल) दुर्बल हो जाता है।

४३. प्राण-विक्षेप दोष — प्राण ऊर्जा अस्थिर हो जाती है।

४४. कर्म-बन्धन-वृद्धि दोष — कर्मों का बन्धन बढ़ता जाता है।

४५. संकट-आकर्षण दोष — जीवन में संकट अधिक आकर्षित होते हैं।

४६. गुरु-कृपा-अवरोध दोष — गुरु-कृपा सहज प्राप्त नहीं होती।

४७. संस्कार-क्षय दोष — शुभ संस्कार नष्ट होने लगते हैं।

४८. धैर्य-क्षीणता दोष — धैर्य एवं सहनशक्ति कम हो जाती है।

४९. शुभ-संकल्प-बाधा दोष — शुभ संकल्प स्थिर नहीं रह पाते।

५०. आध्यात्मिक-विस्मृति दोष — आत्मस्वरूप का स्मरण घटता है।

५१. परम-लक्ष्य-विस्मरण दोष — जीवन के परम उद्देश्य से भटकाव हो जाता है।

Thursday, April 30, 2026

पीपल पूर्णिमा व्रत विशेष

 पीपल पूर्णिमा व्रत  विशेष

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वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन मृत्यु के देवता धर्मराज के निमित्त प्रातः स्नान के उपरांत व्रत का संकल्प रख भक्ति भाव से व्रत रखने का विधान है। इस वर्ष पीपल पूर्णिमा का व्रत आज शुक्रवार 1 मई को रखा जाएगा इस दिन जल से भरा हुआ कलश, छाता, जूते, पंखा, सत्तू, पकवान आदि दान करना चाहिए। इस दिन किया गया दान गोदान के समान फल देने वाला होता है और ऐसा करने से धर्मराज प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। मनुष्य को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। ऐसा शास्त्र मानते हैं।    


हिदु धर्म में पीपल का महत्त्व

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पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:-

मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,

सखा शंकरमेवच ।

पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,

वृक्षराज नमोस्तुते ।।


हिदु धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है।


पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ।


पुराणो में उल्लेखित है कि

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मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः।

 अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।। 

अर्थात इसके मूल में भगवान ब्रह्म, मध्य में भगवान श्री विष्णु तथा अग्रभाग में भगवान शिव का वास होता है।


शास्त्रों के अनुसार पीपल की विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। कहते है पीपल से बड़ा मित्र कोई भी नहीं है, जब आपके सभी रास्ते बंद हो जाएँ, आप चारो ओर से अपने को परेशानियों से घिरा हुआ समझे, आपकी परछांई भी आपका साथ ना दे, हर काम बिगड़ रहे हो तो आप पीपल के शरण में चले जाएँ, उनकी पूजा अर्चना करे , उनसे मदद की याचना करें  निसंदेह कुछ ही समय में आपके घोर से घोर कष्ट दूर जो जायेंगे।


धर्म शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन में पीपल का पेड़ अवश्य ही लगाना चाहिए । पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार संकट नहीं रहता है। पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे रविवार को छोड़कर नियमित रूप से जल भी अवश्य ही अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ेगा आपके घर में सुख-समृद्धि भी बढ़ती जाएगी।  पीपल का पेड़ लगाने के बाद बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान भी अवश्य ही रखना चाहिए, लेकिन ध्यान रहे कि पीपल को आप अपने घर से दूर लगाएं, घर पर पीपल की छाया भी नहीं पड़नी चाहिए।


मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है तो उसके जीवन से बड़ी से बड़ी परेशानियां भी दूर हो जाती है। पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नित्य पूजा भी अवश्य ही करनी चाहिए। इस उपाय से जातक को सभी भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है।


सावन मास की अमवस्या की समाप्ति और सावन के सभी शनिवार को पीपल की विधि पूर्वक पूजा करके इसके नीचे भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना / आराधना करने से घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है।


यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर रविवार को छोड़कर नित्य हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।


पीपल के नीचे बैठकर पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर चन्दन से भगवान श्रीराम का नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बनाकर उसे प्रभु हनुमानजी को अर्पित करें, सारे संकटो से रक्षा होगी।


पीपल के चमत्कारी उपाय

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शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः 10 बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे । इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है ।


पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा। 


व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे । ऐसा 7 शनिवार तक लगातार करें फिर 8वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी ।


जो मनुष्य पीपल के वृक्ष को देखकर प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है 

जो इसके नीचे बैठकर धर्म-कर्म करता है, उसका कार्य पूर्ण हो जाता है।


पीपल के वृक्ष को काटना 

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जो मूर्ख मनुष्य पीपल के वृक्ष को काटता है, उसे इससे होने वाले पाप से छूटने का कोई उपाय नहीं है। (पद्म पुराण, खंड 7 अ 12)


हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है

यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।


शनि दोष में पीपल 

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शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर कर,शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। 


यदि रोज (रविवार को छोड़कर) पीपल पर पश्चिममुखी होकर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है l


शनिवार की सुबह गुड़, मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है।


ब्रह्म पुराण' के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा  उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।'


शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है।


हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।


 ग्रहों के दोषों में पीपल 

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ज्योतिष शास्त्र में पीपल से जुड़े हुए कई आसान किन्तु अचूक उपाय बताए गए हैं, जो हमारे समस्त ग्रहों के दोषों को दूर करते हैं। जो किसी भी राशि के लोग आसानी से कर सकते हैं। इन उपायों को करने के लिए हमको अपनी किसी ज्योतिष से कुंडली का अध्ययन करवाने की भी आवश्यकता नहीं है।


पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है


पीपल में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल अर्पित करने से कुंडली के समस्त अशुभ ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। पीपल की परिक्रमा से कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से भी छुटकारा मिल जाता है। (पद्म पुराण)


असाध्य रोगो में पीपल

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पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है ।

 

यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है

 वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है । 


यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है ।


निसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है । ऐसा लगभग 2-3 माह तक लगातार करना चाहिए ।

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Tuesday, April 28, 2026

 भारतीय इतिहास का महाविनाश कोई बदल नहीं सकता। कई महाशय कहते हैं इतिहास में जो गुजर गया उसे देख कर क्या होगा? वर्तमान में जो हो रहा हैं उसे देखिये।


यह लेख उनकी बातों का उत्तर है। 


“मैक्स-मुलर ने भारत आते ही सर्वप्रथम हिन्दुओ के पराक्रम एवं भुजाओं की शक्ति के बारे में जानना चाहा, जब उसने इतिहास जाना तो उसका सर घूम गया। इतिहास सुनकर उसने कहा यदि यह इतिहास नहीं मिटाया गया तो ये हमें दुनिया से मिटा देंगे क्योंकि पूर्वजो के इतिहास से इन्हें उर्जा मिलती है। इनके इतिहास में इनकी शक्ति छुपी है। उसके बाद इस गोरे सियार को युक्ति सूझी और इसने हिन्दू राजाओ को निर्बल ठहराया।


आक्रमणकारीयों ने लगभग आधा यूरोप जिहाद कर के अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु भारतवर्ष से सनातन धर्म को नही मिटा पाये। इस्लामिक इतिहासकार ने भी माना था हिन्दू योद्धाओ के बाहुबल का लोहा। यह तो मैक्स मुलर की हिंदुओं के प्रति नफरत थी जिसने इतिहास को बदल दिया और मुग़ल, यवन, यूनान को ताकतवर बताया एवं हिन्दू राजाओ को निर्बल, गद्दार, इत्यादि।


बहुत ही शर्म की बात है मैंने कई पेज एवं वामपंथी ब्लॉगर को देखा हैं जो खुदको इतिहासकार कहते हैं परन्तु अपने हिन्दू राजा को जो उनके बिरादरी का नहीं हैं उन्हें बदनाम करने लगते हैं और वो भी बिना ऐतिहासिक जांच किये।


ऐसे तथाकथिक हिंदूवादी हिन्दुओ को तोड़ने का काम करते हैं। इनका मकसद होता हैं इतिहास केवल इनके नाम हो और इसी प्रयास में यह हिन्दू को कमजोर बना देते हैं , जिससे मैक्स मुलर जैसे राक्षस का कार्य और सफल हो जाता हैं । और मैं इतिहास को इसी प्रयास में सामने लेकर आता हूँ जिससे युवा पीढ़ी अपने शौर्य को पहचाने, पूर्वजो के इतिहास से सिख तक लेकर खुदको भी राष्ट्र धर्म भक्त बनाये और धर्म की रक्षा में हर तरह का बलिदान देने में हर दम सक्षम रहे ।


जगतगुरु आदि शंकराचार्य और शिष्य सुधन्वा ऐसे नाम हैं जिनके बिना भारतीय इतिहास का वर्णन अधूरा है। आइये जानते हैं चौहान वंश के दिग्विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान (चाहमान) जिनके बारे में कई अभिलेख मिले हैं ।


दिग्विजय सम्राट सुधन्वा सन ५००-४७० ई. पूर्व दक्षिणी अवन्ति के शासक थे। माहिष्मती नगरी उनकी राजधानी थी जो वर्तमान काल में मध्यप्रदेश के निमाड़ जनपद में महेश्वर नामक स्थान के रूप में ज्ञात हैं । सुधन्वा चौहान को विश्व सम्राट बनाने के पीछे गुरु आदि शंकराचार्य की अशेष कृपा थी।


गुरु आदि शंकराचार्य की शिक्षा एवं सुधन्वा चौहान का पराक्रम एवं शौर्य (शास्त्र और शस्त्र) दोनो के गठबंधन ने सनातन धर्म ध्वजा को विश्व की चारो दिशाओ में लहराकर भारत विश्व विजय का स्वर्णिम इतिहास रचा था।


अभी तक हमे केवल गुरु चाणक्य और चन्द्रगुप्त की कहानी ज्ञात थी पर आदि शंकराचार्य एवं सुधन्वा चौहान के इतिहास से हम अनजान थे। मठाम्नाय – महानुशासनम : यह ग्रन्थ आदिशंकराचार्य द्वारा प्रणीत है तथा श्रृंगगिरी (श्रृङ्गेरी) मठ के लिए प्रमाणभूत है। इसमें भी राजा सुधन्वा चौहान का उल्लेख आदि शंकराचार्य जी ने किया है।


राजा सुधन्वा चौहान ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम यूरोप तक चारों दिशाओं को जीता था। युद्ध कला में पारंगत तलवार से वार की गति बिजली से भी तेज थी । आदि शंकराचार्य से ज्ञान प्राप्त कर रणविद्या में पारंगत हुए थे सुधन्वा सम्राट, साथ ही वेदों से 18 युद्ध कलाओं के विषयों पर ज्ञान अर्जित किया था।


उनको २० प्रकार की घुड़सवारी युद्धकला आती थी। हाथी, अस्त्र-शस्त्र संचालन, व्यूह रचना, युद्ध नेतृत्व, आदि तकनीक के ज्ञाता थे। युद्ध के कई तरीकों में पारंगत थे जैसे मल्ल युद्ध, द्वन्द्व युद्ध, मुष्टिक युद्ध, प्रस्तरयुद्ध, रथयुद्ध, रात्रि युद्ध।


सम्राट सुधन्वा व्यूह रचना में भी पारंगत थे जिससे सेना को व्यवस्थित ढंग से खडा किया जाता था। इसका उद्देश्य अपनी कम से कम हानि में शत्रु को अधिक से अधिक नुकसान पंहुचाना होता था। इनमें से कई तकनीक सुधन्वा महाराज अपने शासनकालीन जीवनकाल में इस्तेमाल में लाये जैसे बाज़, सर्प, बज्र, चक्र, काँच, सर्वतोभद्र, मकर, ब्याल, गरूड व्यूह आदि का इस्तेमाल उन्होंने युद्ध में किया था।


कई मूर्ख अज्ञानी आदि शंकराचार्य को अनर्गल गाली देते है। अगर जगतगुरु आदि शंकराचार्य नहीं होते तो भारत को सुधन्वा चौहान जैसा विश्व विजय करनेवाला भी नहीं मिलता।


सम्राट सुधन्वा चौहान ने विश्व विजय करने के लिए अनंत युद्ध लड़े थे। इनका शौर्य और पराक्रम केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं मिलता जबकि विश्व इतिहास में भी शामिल है। दुःख का विषय है कि भारत में ऐसे सम्राट के इतिहास पर पाबंदी है क्योंकि भारत सरकार के अनुसार यह केवल बुद्ध की धरती है, यहाँ युद्ध का कोई स्थान नहीं।


राजा सुधन्वा चौहान से विश्व विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान -:


सम्राट सुधन्वा चौहान ने सन ४९८ (498) ई.पूर्व ग्रीस के शासक थाईमोएतेस (Thymoetes) से युद्ध किया था। इस युद्ध का वर्णन “Battle of Thunder” के नाम से किया जाता है। कहा जाता हैं इस युद्ध में ग्रीस एथेंस की भूमि में दोनों सेनाओं ने इस तरह युद्ध लड़े थे जैसे बिजली आसमान से गिरकर भूमि से टकराती है।


सुधन्वा चौहान की सेना ने थाईमोएतेस (Thymoetes) को पराजित कर एथेंस ग्रीस पर कब्ज़ा किया एवं थाईमोएतेस (Thymoetes) के अधीन जितने भी राज्य आते थे जैसे बुल्गरिया, मैसिडोनिया, एवं ग्रीस जो उस समय दक्षिण यूरोप की राजधानी हुआ करता था उन सबको जीत लिया था।


दक्षिण यूरोप विजय करने के लिए एथेंस पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था। एथेंस par विजय कर सुधन्वा चौहान ने सनातन वैदिक ध्वज लहरा कर विश्व विजय के लिए मुहिम छेड़ी थी।


सुधन्वा ने धर्म युद्ध के नियमो का पालन कर किसी भी देश की संस्कृति को ध्वस्त नहीं किया। एक हिन्दू राजा की दुश्मनी देश के राजा से होती थी तो प्रजा को हानि नहीं पहुंचाते थे, देश विजय करने के पश्चात वहाँ की नारियों का शील भंग नहीं करते थे। जिस देश को विजय करते थे उस देश की प्रजा के साथ भी संतान तुल्य व्यावहार करते थे।


वहीं दूसरी ओर इतिहास गवाह है कि जो भी आक्रमणकारी भारत लूटने आये उन्होंने प्रजा का मान भंग किया, नरसंघार किया, मंदिर तोड़े एवं संस्कृति को ध्वस्त किया।


सुधन्वा चौहान की सेना से विश्व के सभी शक्तिशाली साम्राज्य भी थर्राते थे। अश्शूर राज नाबोनिदास की ५ लाख की विशाल सेना को परास्त कर सुधन्वा चौहान ने अश्शुरों को यूफ्रेटस नदी के पार तक खदेड़ा। सुधन्वा चौहान ने अब मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, एलाम, फ्रूगिया, पर्शिया एवं यूफ्रेटस नदी एवं मिस्र (Egypt) टाईग्रीस नदी के पार सनातन वैदिक ध्वज को लहराकर इस अश्शूर राज्य को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।


इसके पश्चात अश्शूर साम्राज्य का अंत तो नहीं हुआ परन्तु ३ पीढ़ी के बाद अश्शूर साम्राज्य फिर तैयार हुआ। सुधन्वा चौहान के बाद राजा चाहमान ने अश्शुरों पर विजय पाकर अश्शुरो का समूल नाश कर दिया था।


इस बात का उल्लेख “The History of Archaeology Part 1”, “Babylonia from the Neo-Babylonian empire to Achaemenid rule” इन दो पुस्तकों में लिखा हैं।


इतिहासकार Hurst, K. Kris लिखते हैं “The sword of South Asian King dynasty of Luna defeated Assyrian ruler Nabonidas and the King of South Asia became the reasons for the decline and downfall of Assyrian Kingdom” (चन्द्र का अन्य नाम लूना है। चन्द्रवंशी राजा का उल्लेख किया गया है। दक्षिण एशियाई राज्य का उल्लेख है जो भारतवर्ष है)।


सुधन्वा चौहान ने फ्रांस, रूस, सर्बिया, क्रोएशिया, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी, प्रशिय एवं समूचे यूरोप पर भगवा ध्वज लहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य यूरोप तक फैलाया था।


विश्व विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान ने अफ्रीका, यूरोप, एशिया (चीन, जापान, इत्यादि) समेत समूल धरा पर सनातन धर्म ध्वजा फहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य विस्तार किया था। आदि शंकराचार्य के निर्देषानुसार अश्शुरो, यवनों एवं यूनानीयों के अत्याचारों से भारत एवं पृथ्वीवासियों को मुक्ति दिलाकर सुधन्वा चौहान एक पराक्रमी शौर्यशाली योद्धा बने थे।


सम्राट सुधन्वा ने यूरोप पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया। प्रजाओं की रक्षा एवं सेवा सम्राट सुधन्वा का पहला कर्तव्य था। विश्व विजयी सम्राट होने के बाद भी प्रजाओ पर किसी तरह का कर लगान आदि नहीं लगाया। प्रजा अपनी इच्छानुसार कर देते थे वे राज्य कोष में मूल्य देते थे।


सम्राट सुधन्वा चौहान मूल्य देकर किसान से खाद्य सामग्री लिया करते थे।


सम्राट होते हुए भी अपने पद का दुरूपयोग नहीं किया। राजा होने के नाते वह चाहते तो किसान को बिना मूल्य चुकाए खाद्य सामाग्री ले सकते थे परन्तु ऐसा न करके वे किसान को पारिश्रमिक देकर खाद्य सामग्री लेते थे। यह एक महान सम्राट के गुण हैं यह सीख आदि शंकराचार्य की थी तभी राजा सुधन्वा इतने महान हुए ।


 श्रृंगगिरी (श्रृङ्गेरी) मठ के ग्रन्थों में भी प्रमाणभूत है। इनमें भी राजा सुधन्वा चौहान का उल्लेख आदिशंकराचार्य जी ने किया है )।


आजकल के मैकोले मानसपुत्रों को ऐसा इतिहास इसलिए नहीं पढाया जाता हैं क्योंकि काले अंग्रेजो के प्रोडक्शन हाउस बंद हो जाएँगे एवं भारतीय फिर से छत्रपति महाराज शिवाजी और महाराणा प्रताप बनने लगेंगे। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) ऐसे इतिहास पर रोक लगाये हुए है और चौहान वंशीय एवं अन्य कई राजाओ की लिपि तक को गायब करवा दिया हैं। इसी कारण आज भी तैमूर, बाबर, टीपू, रज़िया सुल्तान जैसे हिन्दू विरोधी, मूर्ति-ध्वंसक तो जन्म ले रहे हैं परन्तु एक भी चौहान राजा, काल्भोज (बप्पा रावल), भोज परमार, छत्रपति शिवाजी, नागनिका, नायिकी देवी, रानी दिद्दा जैसे नायक नायिकाएँ हिन्दू धर्म मैं जन्म नहीं ले पा रहे हैं।


#चक्रवर्ती_सम्राट_सुधन्वा_का_ताम्रलेख_~


श्री महाकालनाथाय नमः 

श्री महाकाली नमः


"""श्री सदाशिव अपरावतार शंकर की चौसंठ कला विलास विहार मूर्ति , बौद्घ आदि दानवों के लिए नृसिंह मूर्ति , वैदिक वर्णाश्रम शिद्धान्त के उद्धारक मूर्ति, मेरे साम्राज्य की व्यवस्थापक मूर्ति, विश्वेश्वर गुरु के पदपर गायी जाने वाली मूर्ति, सम्पूर्ण योगियों के चक्रवर्ती,


●श्री शंकराचार्य के चरण कमलों में (प्रणाम करके) भ्रमर के समान मैं सुधन्वा राजा चंद्रवंश चूड़ामणि महाराज युधिष्ठिर की परम्परा से प्राप्त भारतवर्ष का राजा हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन करता हूँ।


●भगवत्पाद ने दिग्विजय करके सभी वादियों को पराजित किया।


●सत्ययुग के समान चारो वर्ण--आश्रमों को स्थापित करके पूर्णरूप से वैदिक मार्ग पर शास्त्रानुसार (वैदिक धर्म) में नियुक्त किया।


●ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा शक्ति आदि देवताओं के स्थानों को, जो कि सम्पूर्ण देश में स्थित है, उनका उद्धार किया।

◆समस्त ब्राह्मण कुलों का उद्धार किया।


●सम्पूर्ण देश में हमारे जैसे राजकुलों द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रचार प्रसार करके, अध्ययन-अध्यापन द्वारा उन्नत किया।


◆हम जैसे प्रमुख ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि की प्रार्थना से सम्पूर्ण देश के चारों दिशाओं में चार राजधानियों, पूर्व में जगन्नाथ, उत्तर में बदरी नारायण, पश्चिम में द्वारका तथा दक्षिण में श्रृंगी ऋषि के क्षेत्र में श्रृंगेरी के क्रमानुसार भोगवर्धन, ज्योति, शारदा तथा श्रृंगेरी नामक मठ स्थापित किये।

■उत्तर दिशा में योगीजनों की प्रधानता वाले धर्म की मर्यादा की रक्षा सरलता से करने वाले ज्योतिर्मठ में श्री त्रोटकाचार्य जिनका दूसरा नाम प्रतर्दनाचार्य को,

■श्रृंगी ऋषि के आश्रम श्रृंगेरी मठ में उन्ही के समान प्रभाव वाले पृथ्वीधाराचार्य जिनका दूसरा नाम हस्तामलकाचार्य है को,

■भोगवर्धन जगन्नाथपुरी में अत्यंत अभीष्ट, उग्र स्वभाव वाले, सबकुछ जानने में समर्थ, पद्मपादाचार्य जिनका दूसरा नाम सनन्दनाचार्य है को,

■तथा बौद्ध कापालिक आदि सम्पूर्ण वादियों की प्रधानता वाली पश्चिमी दिशा में वादी रूपी दैत्यों को परास्त करके द्वारका शारदा मठ में भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा निर्मित भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर को जैनियों द्वारा ध्वस्त देखकर उसकी दुर्दशा को दूर किया तथा त्रैलोक्य सुंदर नाम का भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर निर्माण करके शास्त्र मर्यादा से प्रतिष्ठित किया।

★सम्पूर्ण वैदिक, लौकिक तथा तांत्रिक मर्यादा के पालक विश्वविख्यात कीर्तिमान, सर्वज्ञान स्वरूप विश्वरूपाचार्य जिनका अपर नाम सुरेश्वचार्य है को, हम सब लोगों की लोकसम्पत्ति से अभिषिक्त किया।

★भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चारों आचार्यों को नियुक्त करके आज्ञा दी, यह चारों आचार्य अपने-अपने पीठ के मर्यादा अनुसार मण्डल की रक्षा करते हुए वैदिक मार्ग को प्रकाशित करें।

◆हम सभी मण्डलस्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मंडलों के अधिकारी आचार्यों की आज्ञा का पालन करते हुए व्यवहार करें।

★भगवान शंकराचार्य जी की आज्ञानुसार वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदिकों का महत् निर्णय करने में परम् समर्थ श्री सुरेश्वचार्य जो कि उक्त लक्षणों से युक्त हैं, वे सबके व्यवस्थापक हों।


■: हमारी राजसत्ता के समान निरंकुश गुरुसत्ता भी ऊपर कही हुई शास्त्र मर्यादा के अनुसार अविचल रूप से कार्य करें।


★मेरे इस पीठ पर परम्पराप्राप्त जन्म से महाकुलीन ब्राह्मण, सन्यासी, सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता आचार्य के विशेषताओं से युक्त ही भगवत्पाद शंकराचार्य के पीठ पर बैठने के अधिकारी हों, इसके विपरीत नही।


◆इसप्रकार भगवत्पाद की आज्ञानुसार नियमों में बंधे हुए हम ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वंश में उतपन्न हुए लोगों को इन आदेशों का परम् प्रेमपूर्वक पालन करना चाहिए।

यही आपलोगों से मेरी भी प्रार्थना है।

विश्व का कल्याण हो।


∆●युधिष्ठिर सम्वत् २६६३ अश्विन शुक्ल १५ """


सभी धर्मपरायण कुलीन आर्यजनों (ब्राह्म, क्षात्र, वैश्य, शूद्र) को शिवावतार भगवत्पाद जगद्गुरु श्री आद्यशङ्कराचार्यजी के प्रकटोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ.......🙏


हर हर शाङ्कर  🚩🚩🚩🚩🚩🚩


#shankarjayanti

Friday, April 24, 2026

જય અંબે

 આ લેખ ડો ભુવન રાવલ દ્વારા લખાયેલો છે. જે નાગર બ્રાહ્મણ છે, મહેસાણા ખાતે એન્જીન્યરીંગ કોલેજમાં પ્રિન્સીપાલ તરીકે ફરજ બજાવે છે અને પીએચ ડી સહિત લગભગ ૬ કરતાં વધારે પ્રોફેશનલ ડિગ્રી ધરાવે છે. 




🙏  જય અંબે🙏


     

         લગભગ 481 વરસ પહેલાની આ વાત છે. સુરતના અંબાજી રોડ પર નાગર ફળિયામાં રાઘવ હરિહર પંડ્યાનું ઘર આવેલું. ‘રામનાથી પંડ્યા’ તરીકે ઓળખાતા આ પરિવારમાં રાઘવને બે પુત્રો હતા. એક વામદેવ અને બીજો સદાશીવ. સમગ્ર પરિવારની શ્રદ્ધા રામનાથ મહાદેવ સાથે જોડાયેલી.


         સદાશીવને 35 વરસની ઉંમર સુધી ખાસ કંઈ આવડતું નહી. કુટુંબમાં કોઈએ સદાશીવને મેણું માર્યુ. સદાશીવને સ્વજનનું મેણું કાળજાળ લાગ્યું. પરિવારના ઇષ્ટદેવના મંદિરે જઈ તેઓ ઉપવાસ પર બેસી ગયા. કેટલાય દિવસોના નામસ્મરણ અને ઉપવાસ બાદ કોઈ સાધુ ત્યાં આવ્યા. જેણે સદાશીવને આશીર્વાદ આપી શક્તિપાત કર્યો. લોકવાયકા મુજબ એ સાધુ બીજા કોઈ નહી પરંતુ સ્વયં દુર્વાસા ઋષિ હતા.


        ઋષિ દુર્વાસાના આશીર્વાદથી સદાશીવ સંસ્કૃતના પ્રખર વિદ્વાન બન્યા. તેઓ શાસ્ત્રજ્ઞ અને મંત્રશાસ્ત્રી થયા. સદાશીવના દાદાએ સંસ્કૃતના નવ ગ્રંથો લખેલા. વિદ્વતાનો એ વારસો સદાશીવે જાળવી રાખ્યો. પરંતુ તેના બંને સંતાનોને સંસ્કૃત અને સાહિત્યમાં બહુ રૂચિ નહોતી. મોટાભાઈ વામદેવના ઘરે ઇ.સ. 1541માં શિવાનંદ નામના અતિ તેજસ્વી પુત્રનો જન્મ થયો. પિતા વામદેવ નાની ઉંમરે મૃત્યુ પામ્યા અને બાળક શિવાનંદના ઉછેરની જવાબદારી સદાશીવજીને સોંપતા ગયા.


       સમય જતા આ કાકા ભત્રીજાની જોડી જામી ગઈ. સદાશીવજીએ પોતાના અંત સમયે પોતાનું સર્વસ્વ ભત્રીજા શિવાનંદમાં ઠાલવી દીધું. દોસ્તો, આ શિવાનંદ એ જ આપણા ‘જય આદ્યાશક્તિ’ આરતીના રચિયતા, *બૈજવાપાસ ગોત્રમાં* નાગર-બ્રાહ્મણ પરિવારમાં 481 વરસ પહેલાં સુરત ખાતે અવતરેલા આ મહાપુરુષની રચેલી આરતી ગાયા વગર ગુજરાતની કોઈ ગરબીના શ્રી ગણેશ થતાં નથી કે વિરામ પણ...!


          આ મહાપુરુષ વિશે બહુ ક્યાંય માહિતી પ્રાપ્ત પણ નથી. હું જ્યારે જ્યારે ‘ભણે શિવાનંદ સ્વામી’વાળી કડી ગાતો ત્યારે મનમાં એક પ્રશ્ન થતો કે કોણ હશે આ શિવાનંદ સ્વામી? ક્યાંના હશે? આ આરતી રચવા પાછળ કઈ ઘટના હશે? આરતીના સાચા શબ્દો ક્યા હશે? સાચા દિલથી કરેલી પ્રાર્થના સદા ફળે છે. તેનો આ લેખ પૂરાવો છે. ગત મહિને સુરતના એક કાર્યક્રમમાં નીતિનભાઈ ભજીયાવાલા નામના વડિલ ચાહકે મારા હાથમાં ગણપતલાલ પંચીગર સાહેબનું નાનકડું અપ્રાપ્ય પુસ્તક મૂક્યુ જેમાં શિવાનંદજીના જીવન-કવનની સુંદર માહિતી મળી જે તમારા સુધી પહોંચાડુ છું.


          શિવાનંદજીએ સંસ્કૃત-ગુજરાતી-મરાઠી-હિન્દીમાં પણ કાવ્યો લખ્યા છે. પરંતુ લોકો સુધી માત્ર તેની આરતી જ કંઠોપકંઠ સ્મૃતિથી જીવે છે. પંચીગરજીના મત મુજબ તેમણે 215 જેટલી કૃતિઓ રચી છે. જેમાં થોડાક ભજનો હનુમાનજીના અને બબ્રીક (બળીયાકાકા)ના અને તાપીમાતાનો ગરબો પણ ખાસ છે.


           પણ ક્યાં છે શિવાનંદજીની બાકી રહેલી અદ્દ્ભુત રચનાઓ? જેનું કોઈ પુસ્તક નથી. સુરત કે દક્ષિણ ક્ષેત્રના વડિલોને કદાચ શિવાનંદજીના કોઈ પદો હૈયે હોય તો જ આ વિરાસત આપણને પાછી મળે. આ લેખ વાંચ્યા પછી કોઈને ‘ભણે શિવાનંદ સ્વામી’વાળી કોઈપણ રચના ક્યાંયથી પણ મળે તો પ્લીઝ મને ઈમેઈલથી મોકલજો. કોઈએ આ વ્યક્તિનું પુસ્તક બહાર પાડવું જોઈએ એવી સુફિયાણી સલાહ આપવા કરતા મને જો પૂરતી રચનાઓ મળશે તો હું જરૂર શિવાનંદજીનું પુસ્તક બહાર પાડીશ. ખેર આગે આગે ગોરખ જાગે;


         એ સમયે શિવાનંદજીના ઘેર પાઠશાળા ચાલતી. ચાલીસથી વધુ વિદ્યાર્થીઓ ત્યાં અભ્યાસ કરતા. તેમના પદો સુરતના મંદિરો અને ઘરોમાં આદરપૂર્વક ગવાતા. શિવાનંદજીની પવિત્રતા અને લોકપ્રિયતા એવી હતી કે સુરતની ટંકશાળામાં જ્યારે જ્યારે કોઈ એકસો તોલા સોનુ ગળાવે ત્યારે તેમાંથી એક આની (1/16 તોલું ) સોનું પ્રેમપૂર્વક શિવાનંદજીને ભેંટ ધરાતું. મજાની વાત એ કે શિવાનંદજીની છઠ્ઠી પેઢીએ ત્રિપુરાનંદજીની દીકરી ડાહીગૌરી સાથે આપણા વીર કવિ નર્મદે બીજા લગ્ન કર્યા. આમ ‘જય જય ગરવી ગુજરાત’નો સૌ પ્રથમ જયઘોષ કરનાર વીર કવિ નર્મદ શિવાનંદજીની પેઢીના જમાઈ હતા. શિવાનંદજીએ જીવનના ઉતરાર્ધમાં 85 વરસે સન્યાસ લીધો જેથી શિવાનંદસ્વામી કહેવાયા અને ઇ.સ. 1626માં સમાધી લઈ આ મહાપુરુષે મહાપ્રયાણ કર્યું.


            ‘જય આદ્યાશક્તિ’ આરતીની કુલ અઢાર કડી જ છે. ત્યારબાદ અમુક ક્ષેપક કડીઓ ભક્તોએ જોડેલી છે. શિવાનંદજીએ શિવશક્તિનું કોઈ પવિત્ર અનુષ્ઠાન કર્યાની ધારણા છે. જે દરમ્યાન તેમણે આ આરતી રચી છે. આ આરતીમાં એકમથી પુનમ સુધીનો તિથિક્રમ છે અને શિવાનંદજીના પોતાના સ્વાનુભવ પણ છે. માતાજીના પરમધામ મણીદ્વીપમાં મણી-માણેકના અઢાર કિલ્લા છે. જેના લીધે તેમણે આ અઢાર કડીની આરતી રચેલી છે. જેમના કેટલાક શબ્દો પાઠ ફેર અને અપભ્રંશ પામ્યા છે. કંઠોપકંઠ સચવાતી કૃતિઓમાં આવી ભરપુર શક્યતાઓ રહે એવું શ્રી ગણપતભાઈ પંચીગર પણ સ્વીકારે છે. તેમ છતાં અમુક શબ્દોના તેમણે ખૂબ સચોટ અર્થ આપેલા છે. જેમ કે ‘જયોમ જયોમ માં જગદંબે’ નો કોઈ અર્થ જ નથી. ‘જય હો - જય હો માં જગદંબે’ જ સાચો શબ્દ છે. એક નજર મારીએ ચાર સદી પહેલાની રચાયેલી અણમોલ કૃતિ તરફ અને જ્યાં જ્યાં આપણો પાઠદોષ કે ઉચ્ચારણદોષ છે તે સુધારીયે. કોઈપણ જાતની ટેક્નોલોજી વગર 400 વરસથી જે આરતી ગુજરાતી-હિન્દીમાં સમગ્ર ભારતના ઘરે ઘરે ગવાય છે એજ આપણા માટે ગૌરવપ્રદ ઘટના છે. અહીં માત્ર અપભ્રંશ થયેલ શબ્દો અને અંતરા પર જ પ્રકાશ પાડ્યો છે.


“જય આદ્યાશક્તિ માં જય આદ્યાશક્તિ, 

અખિલ બ્રહ્માંડ નીપજાવ્યા પડવે પંડે થયા, જય હો જય હો માં જગદંબે”

અહી કેટલાક ‘પડવે પંડિત થ્યા’ બોલે છે જે અશુદ્ધ છે.


“બ્રહ્મા ‘ગુણપતી’ ગાયે હર ગાયે હર માં” 

અહીં કેટલાક ‘ગણપતિ’ ગાયે એમ બોલે છે. જ્યારે કવિએ વિષ્ણુ ભગવાન માટે ‘ગુણપતિ’ શબ્દ પ્રયોજ્યો છે. બ્રહ્મા વિષ્ણુ અને હર ( કહેતા શિવે ) શિવશક્તિના ગુણ ગાયા એ ભાવ છે.


“ત્રય: થકી ત્રિવેણી, તમે ત્રિવેણી માં”

ઘણા ‘તમે તરવેણીમાં’ બોલે છે જે અશુદ્ધ છે. અહીં નવસર્જન, પરિપાલન અને વિસર્જનની ત્રણેય પ્રવૃત્તિને ત્રિભુવનેશ્વરી ‘ત્રિવેણી’ માતા છો એ સંદર્ભ છે.


“ચોથે ચતુરા મહાલક્ષ્મી માં સચરાચર વ્યાપ્યા, 

ચાર ભૂજા ચૌ દિશા પ્રગટ્યા દક્ષિણમાં” 

અહીં શિવાનંદજીને નર્મદા નદીને કાંઠે દક્ષિણ દિશામાં માતાજી દર્શન આપ્યાનો અનુભવ કવિએ લખ્યો છે. જ્યાં ચતુરા મહાલક્ષ્મીનો અર્થ છે જેની પાસે ધન છે તે ચતુર ગણાય.


“પંચમેં પંચઋષિ, પંચમે ગુણપદ માં” 

‘ગુણપદ’ શબ્દનો અર્થ એકબીજાથી વિભિન્ન પ્રકારના લક્ષણો થાય. પાંચ મહાભૂત તત્વો જગદંબાએ ઉત્પન્ન કર્યા અને તેની વ્યવસ્થા સંભાળવા પાંચ બ્રહ્મર્ષિ ઉત્પન્ન કર્યા.


“સપ્તમે સપ્ત પાતાળ, સાંવિત્રી સંધ્યા, 

ગૌ – ગંગા – ગાયત્રી, ગૌરી – ગીતા માં” 

માનવ શરીરમાં રહેલા સાત ચક્રોની આંતર ચેતના વધારવા માટે શિવાનંદજીએ સાત ઉપાયો અહી આપ્યા છે. કેટલાક ‘સંધ્યા સાવિત્રી’ બોલે જે ખોટું છે. 1. સાવિત્રી એટલે સૂર્ય ઉપાસના, 2. સંધ્યા એટલે ત્રિકાળ સંધ્યા અથવા સાંજે ભજન કીર્તન 3. ગૌ સેવા 4. ગંગા સ્નાન 5. ગાયત્રી મંત્ર જાપ 6. ગૌરી અર્થાત પાર્વતી દેવીની સાધના 7. ગીતાજીનો ઉપદેશ. આ કડી માત્ર શબ્દમેળ નથી પણ ગુઢાર્થ સમજવો જરૂરી છે.


“કીધા હરિ બ્રહ્મા’ની જગ્યાએ કોઈ હર બ્રહ્મા બોલે છે. ખરેખર હરિ (વિષ્ણુ) અને બ્રહ્માએ શીવ-શક્તિની પૂજા કરે છે એ સાચો ભાવ છે. 


“કામ દુર્ગા કાલીકા, શ્યામા ને રામા” 

અર્થાત કામદુર્ગા દેવી, કાલિકા અને શ્યામા (રાધાજી), રામા (સીતાજી)ની ભક્તિ તરફ શિવાનંદજીનો અંગુલીનિર્દેશ છે.


“તેરસે તુળજા રૂપ તમે તારૂણી માતા” વાળી કડીમાં હે માં! તમે તુલજા ભવાની રૂપે શિવજીને તલવાર આપી હિંદુ ધર્મને તારનારા છો. તથા જવારાના સેવનથી ચિરકાળ તારુણ્ય બક્ષનારા છો.


         વિક્રમ સંવત 1622માં શિવાનંદજીની સાધના શરૂ થઈ અને 1657માં પૂર્ણ થઈ એવી ધારણા છે. તેમજ ચતુર્ભુજ સ્વરૂપે માતાજીએ કવિને દર્શન આપ્યા. ત્રંબાવટી, રૂપાવટી અને મંછાવટી આ ત્રણ એ વખતની નજીકની નગરીના લોકોએ શિવાનંદજીને આ અનુષ્ઠાનમાં તન-મન-ધનથી મદદ કરી જેથી તેના આશરે ‘સોળ સહસ્ત્ર’ સોળ હજાર લોકો વતી કવિએ પ્રાર્થના કરી વિશિષ્ટ રૂપે આશીર્વાદ માંગ્યા.


અઢારમી કડીમાં ભણે શિવાનંદ સ્વામી પછીના તમામ અંતરા એ ભાવજગતથી ભક્તોએ જોડેલા છે. આગામી દિવસોમાં આપણી આવનારી પેઢી સુધી સાચી ધરોહર સાચા સ્વરૂપમાં પહોંચાડીશું અને સાચી આરતી ગાશું તો ભગવતી અને કવિ શિવાનંદ સ્વામી સ્વર્ગમાંથી રાજી થાશે. ( વિશેષ આભાર શ્રી ગણપતલાલ પંચીગર તથા નિતીનભાઈ ભજીયાવાલા-સુરત. )


લેખક - ડો. ભુવન રાવલ - કલોલ