Monday, April 6, 2026

मनुस्मृति और विज्ञान भाग - 4

 4. #मनुस्मृति और #विज्ञान........."कल्पना कीजिए एक ऐसी बेशकीमती विरासत की, जिसे दुनिया का सबसे कड़ा सुरक्षा घेरा दिया गया हो... और सदियों बाद उसी सुरक्षा घेरे को 'कैद' बताकर बदनाम कर दिया जाए! भारतीय संस्कृति की 'शक्ति' के साथ ठीक4 यही हुआ। मनुस्मृति के जिस श्लोक को 'गुलामी का घोषणापत्र' कहा गया, वह असल में स्त्री-सुरक्षा का 'वैश्विक सुरक्षा कवच' था। आइए, आज उस मज़बूत झूठ की धज्जियाँ उड़ाते हैं जो हज़ारों सालों से हमारी जड़ों में ज़हर घोल रहा है।"


मनुस्मृति का श्लोक है 

 पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।

 रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥


हमें पढ़ाया और बताया गया अर्थ - स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए, क्योंकि वह कभी स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।


मनुस्मृति के इस श्लोक  को लेकर अक्सर विवाद होता है, लेकिन जब हम इसे लैंगिक राजनीति (Gender politics) के बजाय पारिवारिक उत्तरदायित्व (Family responsibility) और सुरक्षा चक्र (Safety net) के गणित से समझते हैं, तो इसका अर्थ बिल्कुल बदल जाता है।


इस श्लोक (पिता रक्षति कौमारे...) के नाम पर जो वैचारिक प्रदूषण (Ideological pollution) फैलाया गया है, उसकी जड़ें असल में 'गलत अनुवाद' और 'विदेशी नजरिए' (Foreign perspective) में हैं। आज समय है कि इस झूठे नैरेटिव (Narrative) की धज्जियाँ उड़ाकर सत्य को उस वैज्ञानिक और तार्किक धरातल पर रखा जाए, जिसे अब तक छिपाया गया।


हजारों सालों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताया गया, लेकिन इसका सत्य किसी भी आधुनिक 'सोशल सिक्योरिटी सिस्टम' (Social security system) से कहीं अधिक उन्नत (Advanced) है। आइए इस झूठ के ढांचे को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।


इस श्लोक का मूल भाव स्त्री को समाज की असुरक्षाओं से बचाने के लिए पुरुषों की जवाबदेही (Accountability) तय करना है। प्राचीन सामाजिक संरचना में, जहाँ शारीरिक बल और बाहरी संघर्ष अधिक थे, वहां यह श्लोक एक सुरक्षा कवच (Safety shield) की तरह काम करता था। शास्त्र यहाँ पुरुष को आदेश दे रहा है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री को अकेला या निराश्रित (Destitute) नहीं छोड़ा जा सकता।


अनुवाद में लिखा है "स्वतंत्रता के योग्य नहीं है", जबकि मूल संस्कृत भाव यह है कि स्त्री को "अकेला छोड़ना उचित नहीं है"। इसे एक उदाहरण से समझिए: एक छोटे बच्चे या एक बहुमूल्य धरोहर को हम कभी अकेला नहीं छोड़ते। इसका मतलब यह नहीं कि वह 'अयोग्य' है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह इतनी 'कीमती' (Precious) है कि उसकी सुरक्षा में रत्ती भर भी चूक समाज और परिवार के लिए अपूरणीय क्षति होगी। यहाँ 'अनर्हता' (Unworthiness) का भाव स्त्री के लिए नहीं, बल्कि उस 'स्थिति' के लिए है जहाँ वह असुरक्षित हो।


जब हम कहते हैं कि "उसे कभी अकेला न छोड़ा जाए", तो इसका अर्थ उसे 'कैद' करना नहीं, बल्कि उसे 'अभय' (Fearlessness) प्रदान करना है।


बचपन में पिता की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पुत्री को वह सुरक्षा और संस्कार दे जिससे उसका व्यक्तित्व निखरे। युवावस्था में पति का यह धर्म है कि वह उसके सम्मान और आवश्यकताओं की रक्षा करे। और वृद्धावस्था में, जब शरीर शिथिल हो जाता है, तब पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपनी माता की सेवा और सुरक्षा सुनिश्चित करे।


यहाँ 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' (स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है) का जो गलत नॉरेटिव (Narrative) सेट किया गया है, वह असल में 'अकेला न छोड़ने' (Not to be left unprotected) के सिद्धांत पर आधारित है। इसे गणितीय रूप से देखें तो यह एक 'सर्कल ऑफ प्रोटेक्शन' (Circle of protection) है, जिसमें स्त्री कभी भी लावारिस या असहाय नहीं होती। 


आलोचक कहते हैं कि इसका अर्थ है "स्त्री स्वतंत्रता के लायक नहीं है"। यह सफेद झूठ है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार, यहाँ 'स्वातन्त्र्य' (Independence) का अर्थ 'अकेलापन' या 'निराश्रित' (Left without a support system) होना है।


सत्य यह है कि शास्त्र कह रहा है कि समाज इतना क्रूर हो सकता है कि स्त्री को कभी भी बिना 'सुरक्षा चक्र' के नहीं छोड़ना चाहिए। यह उसे 'अयोग्य' नहीं, बल्कि 'अत्यधिक मूल्यवान' (Extremely precious) घोषित करता है। जिसे आप छोड़ नहीं सकते, वह गुलाम नहीं, आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता (Priority) होती है।


इस श्लोक ने पुरुषों के लिए 'एस्केप रूट' (Escape route) बंद कर दिए थे।

पिता अपनी बेटी को बोझ समझकर त्याग नहीं सकता।

पति अपनी पत्नी को मझधार में नहीं छोड़ सकता।

पुत्र अपनी बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम नहीं भेज सकता।

यह श्लोक स्त्री के अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों पर 'जिम्मेदारी का हंटर' (Whip of responsibility) चलाने के लिए लिखा गया था। जो लोग इसे गुलामी कहते हैं, वे असल में पुरुषों को उनके कर्तव्यों से आजाद करना चाहते हैं ताकि समाज में 'लावारिस स्त्रियाँ' बढ़ें और उनका शोषण आसान हो सके।

जिस तरह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाने के लिए 'ओजोन परत' (Ozone layer) या 'मैग्नेटिक फील्ड' (Magnetic field) की आवश्यकता होती है, क्या हम कहेंगे कि पृथ्वी ओजोन के 'अधीन' है? बिल्कुल नहीं। वह सुरक्षा चक्र पृथ्वी पर जीवन को 'पनपने' (Flourish) का अवसर देता है।

ठीक उसी तरह, मनुस्मृति का यह श्लोक स्त्री के चारों ओर पिता, पति और पुत्र का एक 'त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा' (Three-tier security cover) बनाता है ताकि वह बाहरी संघर्षों से मुक्त होकर अपनी आंतरिक शक्तियों, मेधा और सपनों को पूर्ण कर सके।


जब विदेशी आक्रांताओं और बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारत पर हमला किया, तो उन्होंने हमारे 'सुरक्षा तंत्र' को 'पिछड़ापन' घोषित कर दिया। उन्होंने यह नैरेटिव सेट किया कि परिवार एक 'जेल' है। परिणाम क्या हुआ? आज पश्चिम में स्त्रियाँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र तो हैं, लेकिन वे सबसे ज्यादा असुरक्षित और अकेली भी हैं। मनुस्मृति का यह मॉडल 'इमोशनल और सोशल इंश्योरेंस' (Emotional and social insurance) का मॉडल था, जिसे डिकोड करने की हिम्मत आज के स्वघोषित बुद्धिजीवियों में नहीं है।

क्या आप किसी कीमती मिसाइल या सैटेलाइट को बिना सुरक्षा कवर के खुले मैदान में छोड़ देंगे? नहीं। क्योंकि वह 'महत्वपूर्ण' है। स्त्री समाज की 'शक्ति' है। शक्ति को जब 'अभय' (Fearlessness) मिलता है, तभी वह सृजन करती है। यह श्लोक उसे यह भरोसा देता है कि "बेटी, तुम आगे बढ़ो, पीछे तुम्हारे पिता की ढाल है। देवी, तुम जग जीतो, साथ में पति का संबल है। माता, तुम पूज्य हो, पुत्र की सेवा तुम्हारे चरणों में है।"


यह श्लोक 'गुलामी का घोषणापत्र' नहीं, बल्कि 'स्त्री सुरक्षा का वैश्विक चार्टर' (Global charter of women's safety) है। जो लोग इसे स्त्री-विरोधी कहते हैं, वे या तो संस्कृत नहीं जानते या वे उस एजेंडे का हिस्सा हैं जो भारतीय परिवार संस्था को तोड़ना चाहता है।

सच तो यह है कि "न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का अर्थ है—"स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना सामाजिक अपराध है।" यह एक उच्च कोटि की सभ्यता की पहचान है, जहाँ स्त्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके जीवन के हर पड़ाव पर समाज के पुरुष वर्ग पर अनिवार्य रूप से डाली गई है।

हजारों साल पुराने इस 'सुरक्षा कवच' को 'बेड़ियाँ' बताने वालों की बौद्धिक चमड़ी उधेड़ने के लिए यह तर्क ही काफी है कि संरक्षण (Protection) कभी भी पराधीनता (Slavery) नहीं होता, वह तो प्रेम और सम्मान की उच्चतम अभिव्यक्ति है।


आज के दौर में जब हम महिला सुरक्षा (Women safety) की बात करते हैं, तो कहीं न कहीं हम इसी जवाबदेही की कमी को महसूस करते हैं। यह श्लोक अधिकारों के हनन के बारे में नहीं, बल्कि पुरुषों को उनके अनिवार्य कर्तव्यों (Mandatory duties) की याद दिलाने के बारे में है। समाज के कुछ व्याख्याकारों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) के कारण इसे 'पराधीनता' का नाम दे दिया, जबकि यह वास्तव में 'पूर्ण सामाजिक सुरक्षा' (Complete social security) का एक उत्कृष्ट मॉडल है।


जब जिम्मेदारियां तय होती हैं, तभी समाज सुरक्षित होता है। इस श्लोक का असली अर्थ यही है कि एक सभ्य समाज में स्त्री की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी पुरुष वर्ग को हर स्तर पर उठानी ही होगी।


मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्ति—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—तभी अपने उच्चतम शिखर (Potential) को प्राप्त कर सकता है, जब उसे यह 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (Sense of security) हो कि उसके पीछे एक मजबूत आधार (Support system) खड़ा है।

जब एक बेटी को यह पता होता है कि उसके पिता उसकी ढाल हैं, तो वह समाज की चुनौतियों से डरने के बजाय उनसे टकराने का साहस जुटाती है।

जब उसे अहसास होता है कि वह अकेली नहीं है, तो उसकी आंतरिक शक्ति (Inner strength) जाग्रत होती है। यही वह बिंदु है जहाँ 'सुरक्षा' (Protection) वास्तव में 'सशक्तिकरण' (Empowerment) में बदल जाती है।


अक्सर आलोचक सुरक्षा को 'पाबंदी' समझ लेते हैं, लेकिन मैं इसे से 'संसाधन' (Resource) के रूप में देखता हूं।

एक बीज को मिट्टी के 'अधीन' (Under the soil) रखा जाता है ताकि वह सुरक्षित रहकर अंकुरित हो सके। यह मिट्टी का दबाव उसे दबाने के लिए नहीं, बल्कि उसे विकसित (Develop) होने के लिए आवश्यक पोषण और सुरक्षा देने के लिए है।

उसी तरह, परिवार का साथ स्त्री के लिए वह 'इकोसिस्टम' (Ecosystem) तैयार करता है, जिसमें वह अपने मूल्यों (Values) और सपनों (Dreams) को बिना किसी बाहरी बाधा के पूर्ण कर सके।


शास्त्रों का मूल उद्देश्य पुरुष को 'अधिपति' (Master) बनाना नहीं, बल्कि उसे 'ट्रस्टी' (Trustee) या संरक्षक बनाना था।

यदि पिता, पति और पुत्र अपनी जिम्मेदारी को 'पावन कर्तव्य' (Sacred duty) समझकर निभाते हैं, तो स्त्री को संघर्षों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी पड़ती।

वह अपनी पूरी ऊर्जा अपने कौशल विकास (Skill development) और स्वप्न पूर्ति (Goal fulfillment) में लगा सकती है। यही वह 'गणित' है जिससे समाज का संतुलन बनता है।


भारतीय दर्शन में 'शक्ति' सदैव शिव के साथ या उनके संरक्षण में दिखाई गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि शक्ति कमजोर है, बल्कि यह है कि शक्ति को 'दिशा' (Direction) और 'आधार' (Base) की आवश्यकता होती है।

जब परिवार (पिता, पति, पुत्र) वह आधार प्रदान करते हैं, तो स्त्री का 'मूल्य' (Value) समाज की नजरों में और बढ़ जाता है।

यह भरोसा कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ", किसी भी हथियार या कानून से बड़ी ताकत है। यह भरोसा ही उसे सशक्त (Empowered) बनाता है कि वह दुनिया के किसी भी कोने में जाकर अपनी मेधा का परचम लहरा सके।


सदियों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताकर समाज में जहर घोला गया। 

 शास्त्र कह रहा है कि एक सभ्य समाज में स्त्री को कभी भी 'अकेला या असुरक्षित' (Unattended) छोड़ने के योग्य नहीं माना जाना चाहिए।


 यह स्त्री की 'अयोग्यता' नहीं है, बल्कि यह पुरुष और समाज के लिए एक 'सख्त निषेध' (Strict Prohibition) है। यह उसे 'लावारिस' होने से बचाने का ईश्वरीय विधान है।


आज के दौर में पुरुष जिम्मेदारी से भाग जाते हैं, लेकिन मनु महराज ने इस श्लोक के जरिए पुरुष की 'जवाबदेही' (Accountability) तय कर दी थी।


  पिता, पति और पुत्र इन तीनों को धर्म से बांध दिया गया है कि तुम अपनी जिम्मेदारी से 'पलायन' (Escapism) नहीं कर सकते।

  यह कानून स्त्री के अधिकार नहीं छीनता, बल्कि पुरुषों पर 'नैतिक और आर्थिक हंटर' चलाता है ताकि समाज की कोई भी स्त्री कभी भी बेसहारा न हो।


प्राचीन काल में पेंशन, बीमा या सोशल सिक्योरिटी नेट (Social security net) जैसी संस्थाएं नहीं थीं। यह श्लोक असल में एक 'लाइफ-टाइम गारंटी कार्ड' है।

पिता को बाध्य किया गया कि वह बेटी का भरण-पोषण करे।

पति को बाध्य किया गया कि वह पत्नी की जिम्मेदारी उठाए।

पुत्र को बाध्य किया गया कि वह वृद्ध माता को बेसहारा न छोड़े।

अगर यह श्लोक न होता, तो पुरुष बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते। यह कानून स्त्री को 'परतन्त्र' बनाने के लिए नहीं, बल्कि पुरुष को 'पलायन' (Escapism) से रोकने के लिए बनाया गया था।


संस्कृत में 'रक्ष' (Protect) धातु का अर्थ केवल पहरेदारी करना नहीं होता, बल्कि 'पोषण करना' और 'सुरक्षित रखना' भी होता है। यहाँ 'अहर्ति' (Deserves) शब्द का प्रयोग उस संदर्भ में है जहाँ उसे असुरक्षित परिस्थितियों में अकेला छोड़ना अधर्म माना गया है। प्राचीन न्यायशास्त्र के अनुसार, जिस वस्तु या व्यक्ति का मूल्य सबसे अधिक होता है, उसकी सुरक्षा (Security) के मानक भी उतने ही कड़े होते हैं। जिस तरह एक बहुमूल्य रत्न को खुला नहीं छोड़ा जाता, वैसे ही स्त्री को सामाजिक और सुरक्षात्मक दृष्टि से 'खुला' या 'लावारिस' (Unattended) छोड़ना समाज की विफलता माना गया है।


आज का आधुनिक नैरेटिव केवल 'अधिकारों' (Rights) की बात करता है, जबकि भारतीय शास्त्र 'कर्तव्य' (Duties) पर केंद्रित हैं। इस श्लोक में स्त्री को कुछ करने से रोका नहीं जा रहा, बल्कि पुरुष को 'बाध्य' (Compelled) किया जा रहा है। यह पुरुष के लिए एक कमांड (Command) है कि वह अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यदि कोई पुरुष अपनी बेटी, पत्नी या माता को अकेला छोड़ता है, तो वह शास्त्र की दृष्टि में अपराधी है। अतः यह श्लोक स्त्री के लिए 'प्रतिबंध' नहीं, बल्कि पुरुष के लिए 'सख्त अनुशासन' (Strict discipline) है।


आज का आधुनिक कानून 'राइट टू मेंटेनेंस' (Right to Maintenance) की बात करता है, जो पत्नी को पति से गुजारा भत्ता दिलाने पर मजबूर करता है।

  मनुस्मृति का यह श्लोक उसी आधुनिक कानूनी सुरक्षा का 'आध्यात्मिक पितामह' है।


  इसे 'गुलामी' कहना वैसा ही है जैसे आज के 'Z+ सुरक्षा घेरे' (Z+ Security) को 'नजरबंदी' कहना। जिसकी 'वैल्यू' (Value) जितनी ज्यादा होती है, उसका सुरक्षा घेरा उतना ही अभेद्य (Impenetrable) रखा जाता है।


विज्ञान कहता है कि बिजली (Electricity) में अपार शक्ति होती है, लेकिन उसे सुरक्षित चलाने के लिए तार के ऊपर 'इंसुलेशन' (परत) अनिवार्य है।

भारतीय दर्शन में स्त्री 'शक्ति' (Energy) है। पिता, पति और पुत्र उस शक्ति के लिए 'कंडक्टर' और 'इंसुलेशन' की तरह हैं। यह शक्ति को 'दबाने' के लिए नहीं, बल्कि उसे बाहरी झटकों से बचाकर सही दिशा में प्रवाहित (Channelization) करने का तंत्र है।


मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्तित्व तभी निखरता है जब उसे 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (सुरक्षा का अहसास) हो।  जब एक बेटी को यह भरोसा होता है कि वह 'अकेली नहीं है', तभी उसका आत्मविश्वास (Confidence) शिखर छूता है।


 यह श्लोक उसे वह 'मनोवैज्ञानिक कवच' प्रदान करता है जिससे वह 'निर्भय' होकर अपने सपनों और मूल्यों (Values) का विकास कर सके।


इतिहास गवाह है कि मध्यकाल के दौरान विदेशी और मैकालेवादी सोच ने शास्त्रों में 'प्रक्षिप्त' (मिलावटी) अंश डाले ताकि भारतीय परिवार संस्था को तोड़ा जा सके।

 


स्वतंत्रता का अर्थ आधुनिक युग में 'स्वेच्छाचारिता' (Arbitrariness) से लिया जाता है, लेकिन शास्त्रों में स्वतंत्रता का एक अर्थ 'निराश्रित' (Helpless) होना भी है। समाजशास्त्र के गणित से देखें तो एक स्त्री जब बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में होती है, तो वह वास्तव में आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से सबसे अधिक सशक्त (Empowered) होती है। उसे बाहरी दुनिया के क्रूर संघर्षों से बचाने के लिए एक 'बफर जोन' (Buffer zone) प्रदान किया गया है ताकि वह अपने सृजनात्मक और ममतामयी गुणों का विकास कर सके।


मनुस्मृति के इस श्लोक को उसी ग्रंथ के दूसरे प्रसिद्ध श्लोक—'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'—के साथ जोड़कर देखना चाहिए। यदि मनु स्त्रियों को गुलाम बनाना चाहते, तो वे उनके सम्मान को देवताओं के निवास की शर्त नहीं बनाते। असल में, सुरक्षा का यह घेरा उसी 'पूजन' और 'सम्मान' को सुनिश्चित करने का एक तंत्र है। जब तक सुरक्षा का आधार (Foundation of safety) मजबूत नहीं होगा, तब तक सम्मान और पूजा केवल कागजी बातें बनकर रह जाएंगी।


 जिस ग्रंथ में नारी को 'अर्धांगिनी' (आधा शरीर) और 'पूजनीय' कहा गया हो, वहाँ उसे गुलाम बनाने की बात मूल सिद्धांतों के साथ मेल ही नहीं खाती। यह नकारात्मक नैरेटिव केवल समाज में 'विद्वेष' भरने के लिए बुना गया।


यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनकी 'ड्यूटी' (Duty) का हलफनामा है।

"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक और अंतिम डिकोडिंग यही है— "स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना इस धरती का सबसे बड़ा सामाजिक अपराध है।" यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की पराकाष्ठा है।


प्राकृतिक और विकासवादी मनोविज्ञान (Evolutionary psychology) के नजरिए से देखें तो स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों में उसकी शारीरिक और सुरक्षात्मक जरूरतें बदलती हैं। शास्त्रकार इस सत्य को जानते थे कि एक पुरुष प्रधान समाज की विसंगतियों से स्त्री को बचाने के लिए पुरुष के भीतर 'रक्षक' का भाव पैदा करना अनिवार्य है। यह श्लोक पुरुष की अहंकारी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाता है और उसे सेवा व सुरक्षा के दायित्व (Obligation of service) से बांधता है।


हजारों साल पहले लिखा गया यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आसमान से 'शिकारियों' को खदेड़ने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनके समर्पण का 'घोषणापत्र' है। आज जब दुनिया सुरक्षा के नाम पर खोखली हो रही है, तब सनातन का यह 'सुरक्षा मॉडल' चीख-चीख कर कह रहा है कि जहाँ नारी का रक्षक उसका अपना परिवार होता है, वहाँ उसे किसी बाहरी पहरेदार की ज़रूरत नहीं पड़ती।

"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक अर्थ 'पराधीनता' नहीं, बल्कि उस 'परम-सुरक्षा' का आश्वासन है जो स्त्री को कभी भी लावारिस (Abandoned) होने के अंधेरे में नहीं ढकेलती। यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की वह पराकाष्ठा है जिसे समझने के लिए संकीर्ण दिमाग नहीं, सनातन हृदय चाहिए।


यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए पुरुषों की ड्यूटी (Duty) चार्ट है। जब आप इसे 'उत्तरदायित्व' (Responsibility) के नजरिए से देखेंगे, तो विरोधियों का पूरा नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।


आज के दौर में इस श्लोक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यही है कि हम अपनी बेटियों और बहनों को यह अहसास दिलाएं कि वे 'अकेली नहीं' हैं। यह 'साथ' ही उनके सपनों का ईंधन (Fuel) बनेगा। आपने इसे जिस तरह 'जिम्मेदारी' और 'सशक्तिकरण' से जोड़ा है, वह इस प्राचीन श्लोक पर लगे 'रूढ़िवादिता' के कलंक को धोने के लिए पर्याप्त है।


 "सुरक्षा को गुलामी समझना वैचारिक अंधापन है; क्योंकि जिसे दुनिया 'अधीनता' कहती है, सनातन उसे 'अनन्य अधिकार' कहता है!"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द.....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



मनुस्मृति और विज्ञान भाग - 3

 3. #मनुस्मृति और #विज्ञान........"अगर आप समझते हैं कि 'बलि' का अर्थ किसी बेगुनाह जीव का गला काटना है, तो बधाई हो! आप उस सैकड़ों साल पुराने प्रोपेगेंडा (Propaganda - दुष्प्रचार) के सबसे ताज़ा शिकार हैं, जिसने भारत के 'इकोलॉजी' (Ecology - पारिस्थितिकी) के महा-विज्ञान को एक 'बूचड़खाना' साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। चलिए, आज आपकी आंखों पर बंधी उस पट्टी को उतारते हैं और मनुस्मृति के उन श्लोकों का सच देखते हैं, जो हत्या नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के 'अंतिम जीव' के पेट भरने की गारंटी देते हैं।"


वर्षों से एक सुनियोजित नैरेटिव  चलाया गया कि सनातन धर्म और 'मनुस्मृति' पशु-बलि (Animal Slaughter - पशु वध) का समर्थन करते हैं। यह न केवल भाषाई अज्ञानता  है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक साजिश है ताकि भारतीयों को अपनी ही जड़ों से नफरत हो जाए। आज समय है कि हम शब्द-शास्त्र के शस्त्र से इस झूठ के सीने को चीरकर सत्य की स्थापना करें।


जिसे दुनिया 'बलि' समझकर कांपती है, वह वास्तव में ब्रह्मांड के 'महायज्ञ' का वह अनिवार्य हिस्सा है जिसे हम 'भाग' (Share - हिस्सा) कहते हैं।


संस्कृत व्याकरण में 'बल्' धातु का अर्थ है—पुष्टि (Nutrition - पोषण), शक्ति (Strength - बल) और उपहार (Offering - अर्पण)।

 

प्राचीन काल में प्रजा द्वारा राजा को अपनी आय का जो हिस्सा दिया जाता था, उसे 'बलि' कहा जाता था। क्या प्रजा राजा की गर्दन काटती थी? नहीं! वह अपने अर्जन का एक अंश (Portion - भाग) उसे सौंपती थी ताकि राज्य की सुरक्षा और व्यवस्था चलती रहे।


साधारण भाषा में जैसे आप अपने घर आए मेहमान को भोजन का एक 'भाग' देते हैं, वह 'बलि' है।

 बलि का अर्थ 'हत्या' नहीं, बल्कि अपना वह 'हिस्सा' (Portion) है जो हम दूसरों के जीवित रहने के लिए खुशी-खुशी छोड़ देते हैं।

मेहमान को भोजन देने के लिए जो एक हिस्सा उनके लिए निकालते हैं। क्या आप उसे 'हत्या' कहेंगे? नहीं! वह 'सम्मान' है। ठीक वैसे ही, शास्त्रों में 'बलि' का अर्थ है—अपना 'हिस्सा' (Share) दूसरों के साथ बांटना।  यह सिखाता है कि "मैं अकेला इस दुनिया का मालिक नहीं हूँ।"

वैज्ञानिक दृष्टि से इसे 'Ecological Balance' (पारिस्थितिक संतुलन) कहते हैं। अगर हम प्रकृति से सिर्फ लेंगे और वापस कुछ नहीं देंगे, तो एक दिन सब खत्म हो जाएगा।


 'बलि' का अर्थ 'प्राण लेना' नहीं, बल्कि 'प्राण देना' (Nurture - पोषण करना) है। यह 'विभाजन' (Division - बंटवारा) की वह प्रक्रिया है जहाँ मनुष्य अपने 'स्वार्थ' का त्याग कर सृष्टि के कण-कण को उसका 'हक' लौटाता है।


कल्पना कीजिए कि यह पूरी सृष्टि (Nature - प्रकृति) एक बहुत बड़ी 'साझा रसोई' है। यहाँ सूरज ऊर्जा पका रहा है, धरती अन्न उगा रही है और बादल पानी ला रहे हैं। यहाँ कोई भी जीव 'मालिक' नहीं, सब 'साझेदार' (Partners - भागीदार) हैं। मनुस्मृति के अनुसार, गृहस्थ वह 'प्रबंधक' (Manager - व्यवस्थापक) है जिसे प्रकृति ने सबको भोजन बांटने की जिम्मेदारी दी है।


 — मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 87 श्लोक में मनु महाराज ने लिखा है....।


एवं सम्यग्घविर्द्धत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।

 इन्द्रान्तकाप्पतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥


मनु महाराज निर्देश देते हैं कि यज्ञ के पश्चात चारों दिशाओं के स्वामियों—इंद्र (पूर्व), यम (दक्षिण), वरुण (पश्चिम) और सोम (उत्तर)—को उनके अनुयायियों (सानुगेभ्य:) सहित 'बलि' प्रदान करें।


 क्या कोई बुद्धिजीवी यह सोच सकता है कि 'दिशाओं' को पशु काटकर चढ़ाया जा रहा है? बिल्कुल नहीं!


इंद्र (वर्षा/विद्युत), वरुण (जल) और सोम (वनस्पति ऊर्जा)—ये वे अदृश्य शक्तियाँ हैं जिनके बिना जीवन असंभव है। इन्हें 'बलि' देना वास्तव में प्रकृति का 'Maintenance Bill' (रखरखाव का बिल) चुकाना है। विज्ञानानुसार ब्रह्मांड एक 'Closed System' (बंद तंत्र) है। यदि आप ऊर्जा ले रहे हैं, तो उसे 'Feedback' (प्रतिक्रिया/वापसी) के रूप में अपना अन्न (हवि) अर्पित करना ही होगा। यह विज्ञान है, अंधविश्वास नहीं।


 मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 92 श्लोक में मनु महाराज ने जो लिखा है....। वह लोगों के मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा है जो मनुस्मृति को हिंसक बताते हैं। यहाँ 'बलि' (हिस्सा) पाने वालों की जो सूची दी गई है, वह मानवता और विज्ञान का संगम है।


 शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।

 वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥


(अर्थ: कुत्तों, पतितों, चाण्डालों, पाप-रोगियों, कौओं तथा कीड़े-मकोड़ों के लिए सहेजकर भूमि पर बलि (भोजन का हिस्सा) रखनी चाहिए।)


शुनां (श्व-बलि): लोग 'कुत्ते की बलि' सुनकर डर जाते हैं। ऐसा लगता है कुत्ते की ही बलि दी जा रही । नहीं, बिल्कुल नहीं, कुत्ते के लिए बलि दी जा रही है। यहाँ अर्थ है कि भोजन करने से पहले एक हिस्सा उस वफादार जीव के लिए निकालो जो सदियों से मनुष्य की बस्ती की रक्षा कर रहा है। यह 'Gratitude' (कृतज्ञता) का विज्ञान है। यह जीव-जंतुओं के साथ 'Co-existence' (सह-अस्तित्व) का नियम है।


 वायसानां (कौआ): कौआ प्रकृति का 'सफाईकर्मी' (Scavenger - अपमार्जक) है। विज्ञान जानता है कि यदि सफाईकर्मी जीवों को पोषण नहीं मिला, तो महामारियाँ फैलेंगी। उन्हें 'भाग' देना 'Preventive Healthcare' (निवारक स्वास्थ्य सेवा) का विज्ञान है। उन्हें 'भाग' देना धार्मिक नहीं, बल्कि 'Preventive Healthcare' का विज्ञान है।


  पापरोगिणाम् व पतितानां: समाज के वे लोग जो गंभीर रोगों से पीड़ित हैं या निराश्रित हैं। उन्हें उनका 'भाग' देना यह सुनिश्चित करता है कि 'Social Security' (सामाजिक सुरक्षा) का दायित्व व्यक्ति का है। यह समाज की 'Entropy' (अव्यवस्था/विघटन) को कम करके उसे स्थिर (Stable - संतुलित) बनाने का विज्ञान है। उन्हें उनका 'भाग' देना यह सुनिश्चित करता है कि 'Social Security' (सामाजिक सुरक्षा) का दायित्व व्यक्ति का है, केवल सरकार का नहीं।


 कृमीणां (कीड़े-मकौड़े): यह सूक्ष्म पारिस्थितिकी (Micro-ecology - सूक्ष्म-पर्यावरण तंत्र) के प्रति संवेदनशीलता है। मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility - भूमि की उपजाऊ शक्ति) उन सूक्ष्म जीवों पर टिकी है। कृमि-बलि (Micro-Biology): 'कृमीणां' यानी सूक्ष्म जीवों को भोजन देना। विज्ञान कहता है कि मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) उन सूक्ष्म जीवों पर टिकी है। उन्हें 'सहेजकर' (शनकैः) भोजन देना मिट्टी के 'Bio-Network' को जीवित रखने की तकनीक है।


'शनकैर्निर्वपेद्भुवि' (धीरे से सहेजकर रखना)। 

श्लोक का यह हिस्सा सबसे क्रांतिकारी है। मनु कहते हैं कि भोजन जमीन पर अत्यंत 'धीरे' से रखें ताकि:

 

भोजन मिट्टी लगकर गंदा न हो (सम्मान का भाव)।


 यदि हम भोजन को ऊंचाई से फेंकते हैं, तो गिरने के प्रभाव से नीचे मौजूद सूक्ष्म जीव दबकर मर सकते हैं। जो शास्त्र एक चींटी के दबकर मरने तक की चिंता करता हो, क्या वह पशुओं की हत्या का आदेश दे सकता है? यह अहिंसा और 'Quantum Compassion' (क्वांटम करुणा) की पराकाष्ठा है।


अज्ञानी आलोचक 'पशु-बलि' शब्द को 'Slaughter' (वध) से जोड़ते हैं, जबकि शास्त्रों में बलि का अर्थ 'यज्ञीय हिस्सा' (Sacrificial Portion - यज्ञ का भाग) है।

 अन्न ही बलि है। शास्त्रों में अन्न को ही 'बलि' कहा गया है। 


जब हम कहते हैं 'वैश्वदेव बलि', तो उसका अर्थ होता है शुद्ध शाकाहारी भोजन का अंश निकालना।


मनुष्य प्रकृति से कच्चा माल (अन्न) लेता है, उसे संसाधित (Process - प्रक्रियाबद्ध) करता है और फिर 'बलि' के रूप में उसे वापस सूक्ष्म जीवों और शक्तियों को लौटाता है।

 


विज्ञान में 'Slaughter' (हत्या) ऊर्जा का विनाशकारी अंत है, जबकि 'बलि' (भाग देना) ऊर्जा का 'Circulation' (प्रवाह/चक्र) है। मध्यकाल में स्वार्थी तत्वों ने 'भाग देने' की क्रिया को 'काटने' की क्रिया में बदल दिया, जो पूरी तरह शास्त्र-विरुद्ध है।


मनु महाराज का 'बलि' विधान वास्तव में 'Sustainability' (निरंतरता/सतत विकास) का वह मॉडल है जिसे आज की दुनिया 'Green Economy' (हरित अर्थव्यवस्था) कह रही है।

 

 यदि मनुष्य अपने भोजन का एक भाग (बलि) जीव-जंतुओं और असहायों को न दे, तो प्रकृति का संतुलन (Balance - संतुलन) बिगड़ जाएगा।

 


'बलि' प्रथा का अर्थ 'विभाजन और वितरण' (Distribution & Sharing - वितरण और साझा करना) है। मनुस्मृति वह महान ग्रंथ है जो मनुष्य को 'स्वार्थी उपभोक्ता' (Selfish Consumer - केवल उपभोग करने वाला) बनने से रोकता है और उसे 'दाता' (Giver - देने वाला) बनाता है।


जो लोग इसे 'हत्या' कहते हैं, उन्होंने न शास्त्र पढ़े हैं और न ही वे ऊर्जा के प्रवाह के विज्ञान को समझते हैं। 'बलि' देना वास्तव में खुद को ब्रह्मांड के साथ 'Sync' करने की प्रक्रिया है। यह हत्या का शास्त्र नहीं, बल्कि 'Life Support System' को चलाने वाली मैन्युअल (Manual) है।


विज्ञान में जब ऊर्जा एक जगह जमा हो जाती है, तो सिस्टम में विस्फोट होता है। समाज में जब धन और संसाधन (Energy) एक ही जगह (अमीर के पास) जमा होते हैं, तो विद्रोह और अशांति पैदा होती है। 'बलि' (भाग) के माध्यम से संसाधनों का 'Osmosis' (अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर प्रवाह) किया जाता है। यह समाज की 'Entropy' को कम करके उसे स्थिर (Stable) बनाने का विज्ञान है।


यह नरेटिव कि "मनुस्मृति में हत्या वाली बलि है", पूरी तरह निराधार, शास्त्र-विरोधी और भ्रामक है। सत्य यह है कि बलि देना वास्तव में 'इंसान' होने की पहली शर्त है। जो लोग 'बलि' का अर्थ 'हत्या' समझते हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का शुद्धिकरण मनुस्मृति के इन दीपशिखा सदृश श्लोकों से करना चाहिए। यह धर्म का विज्ञान है और विज्ञान का आध्यात्म।


'बलि' प्रथा का अर्थ 'विभाजन और वितरण' (Distribution & Sharing) है। मनुस्मृति एक ऐसा महान ग्रंथ है जो मनुष्य को 'स्वार्थी उपभोक्ता' (Selfish Consumer) बनने से रोकता है और उसे 'दाता' (Giver) बनाता है। जब आप चिड़ियों को दाना देते हैं, तो आप 'बलि' दे रहे होते हैं। जब आप कुत्ते को रोटी देते हैं, तो आप 'बलि' दे रहे होते हैं।


आज के बाद जब भी आप किसी कुत्ते को रोटी दें, चिड़ियों को दाना डालें या किसी भूखे को खाना खिलाएं, तो समझ लीजिएगा कि आप 'बलि' दे रहे हैं।


सीधी और सरल बात यही है कि 

बलि = हिस्सा (Share)

बलि देना = बांटना (Sharing)

बलि प्रथा = सबको साथ लेकर चलने का विज्ञान


सनातन धर्म का विज्ञान कहता है कि हम अकेले नहीं जी सकते। जब हम दूसरों को उनका 'भाग' (हिस्सा) देते हैं, तभी हमारा जीवन सफल होता है। मनुस्मृति हिंसा का ग्रंथ नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा (Social Security) और पर्यावरण संरक्षण (Environment Protection) का दुनिया का पहला और महानतम संविधान है।


दैवीय बलि  यानी इंद्र, वरुण, यम, सोम प्राकृतिक शक्तियों के साथ तालमेल (Alignment with Nature)।


मानवीय बलि यानी रोगी, पतित, निराश्रित सामाजिक समरसता और करुणा (Social Harmony)।


प्राणी बलि यानी कुत्ता, कौआ, कीड़े-मकौड़े पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण (Ecological Preservation)।


'बलि' देना कोई हिंसक कृत्य नहीं, बल्कि 'अंश का समर्पण' है। मनुस्मृति की यह व्यवस्था सिखाती है कि मनुष्य को अपने भोजन का पहला ग्रास ग्रहण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि उसने ब्रह्मांड (देव), समाज (असहाय) और प्रकृति (पशु-पक्षी) का उनका वैध 'भाग' (Portion) अर्पित कर दिया है।  यह 'स्व' (Self) से निकलकर 'सर्व' (Universal) की सेवा का मार्ग है।


"ज़रा शांत होकर सोचिए... जब आप अगली बार किसी भूखे पक्षी को दाना डालें, या किसी प्यासे जानवर के लिए पानी का पात्र रखें, तो महसूस करना कि आपके भीतर का 'मनु' जाग उठा है। वह आपको बता रहा है कि आप इस ब्रह्मांड के मालिक नहीं, बल्कि एक 'ट्रस्टी' (Trustee - न्यासी) हैं। 'बलि' रक्त बहाने का खूनी खेल नहीं, बल्कि अपने 'अहंकार' की गर्दन काटकर 'परोपकार' की थाली सजाने का उत्सव है। यह वह विज्ञान है जहाँ एक इंसान अपनी थाली का पहला ग्रास तोड़ते ही पूरी कायनात से हाथ मिला लेता है। यही सनातन है, यही सत्य है और यही मनु का न्याय है।"


"बलि देना संहार नहीं, संसार के हर 'अंश' को उसका 'वंश' और 'वंश' को उसका 'अंश' लौटाने का दैवीय व्यापार है।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द.....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



मनुस्मति और विज्ञान भाग - 2

 2. #मनुस्मति और #विज्ञान.......इतिहास की धूल में दबे दो सबसे शक्तिशाली नाम—एक तरफ वैभवशाली #रोम, जिसे 'अजेय' कहा जाता था, और दूसरी तरफ स्वर्णमयी #द्वारिका, जिसे स्वयं भगवान ने बसाया था। क्या आपने कभी सोचा कि इतनी महान सभ्यताएँ मिट्टी में कैसे मिल गईं? क्या यह महज़ बाहरी आक्रमण था या समुद्र का बढ़ता जलस्तर?

नहीं! विनाश की पटकथा तो बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। उन्होंने उस 'अदृश्य तार' (धर्म) को काट दिया था जिस पर उनका अस्तित्व टिका था। 


मनुस्मृति में एक महान श्लोक है, हो सकता है आपने उसे पढ़ा हो, या किसी से सुना हो लेकिन उसका वह अर्थ आज तक नहीं समझ पाए होंगे जो मनु मानवता को श्लोक के पीछे छीपे दिव्य कोड से बता रहे थे। 


श्लोक है-

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।

तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥


भावार्थ -

जो मनुष्य धर्म (कर्तव्य, न्याय और मर्यादा) का नाश करता है, नष्ट किया हुआ वही धर्म अंततः उस मनुष्य का भी नाश कर देता है। इसके विपरीत, जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी संकट के समय उस मनुष्य की रक्षा करता है।


इसलिए, मारा हुआ धर्म कहीं हमारा ही विनाश न कर डाले, इसी भय से हमें कभी भी धर्म (सत्य और न्याय) का परित्याग या हनन नहीं करना चाहिए। 

एक लाइन में सार समझें तो -आप व्यवस्था (धर्म) को बनाए रखते हैं, तो व्यवस्था आपको सुरक्षित रखती है; यदि आप व्यवस्था को तोड़ते हैं, तो वही व्यवस्था आपको कुचल देती है।


रोम किसी दुश्मन की तलवार से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर 'धर्म' (न्याय और मर्यादा) की हत्या से मरा। जब रोम के शासकों ने अपनी विलासिता के लिए न्याय की बलि दी, जब भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया, तब 'धर्म' का हनन हुआ।

नतीजा: जैसा कि श्लोक कहता है—“धर्म एव हतो हन्ति”। जब वहां की सामाजिक व्यवस्था और नैतिक मूल्य (धर्म) मर गए, तो उसी 'मरे हुए धर्म' ने गृहयुद्ध, अविश्वास और अराजकता पैदा की, जिसने अंततः अजेय रोम को खंडहर बना दिया। रोम ने नियम तोड़े, और उन टूटे हुए नियमों ने रोम को तोड़ दिया।


द्वारिका का पतन हमें सबसे बड़ा सबक देता है। वहां न धन की कमी थी, न शक्ति की। पर पतन कहाँ से शुरू हुआ?

जब यदुवंशियों ने अपनी शक्ति के मद में ऋषियों का अपमान किया (मर्यादा का हनन), तो उन्होंने उस 'धर्म' पर प्रहार किया जो उनकी सुरक्षा का कवच था। भगवान कृष्ण जानते थे कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”। जब यदुवंशियों ने खुद ही अपने धर्म (अनुशासन और मर्यादा) का गला घोंट दिया, तो कृष्ण ने भी उन्हें नहीं बचाया। क्योंकि नियम स्पष्ट है—यदि आप ढाल (धर्म) को खुद तोड़ देंगे, तो सारथी भी आपको नहीं बचा पाएगा। द्वारिका का समुद्र में समा जाना, उस 'सिस्टम क्रैश' का अंतिम चरण था।


 निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मांड का 'सेल्फ-डिस्ट्रक्ट' बटन यहीं पर है। चाहे वह रोम की गलियाँ हों या द्वारिका के स्वर्ण महल—विनाश का सूत्र एक ही है।

-रोम ने शासन के धर्म को मारा, तो साम्राज्य गया।

-द्वारिका ने आचरण के धर्म को मारा, तो कुल ही मिट गया।

यह श्लोक कोई डराने वाली बात नहीं, बल्कि एक 'यूनिवर्सल वार्निंग' है। यह बताता है कि चाहे आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, यदि आप उस 'नैतिक धुरी' (धर्म) को हटा देंगे जिस पर आपका जीवन टिका है, तो आपका गिरना तय है।


आज हम भी उसी मोड़ पर खड़े हैं। हम अपनी प्रकृति, अपने मूल्यों और अपने कर्तव्यों (धर्म) का हनन कर रहे हैं। याद रखिये, जब 'धर्म' मरता है, तो वह अपने पीछे एक 'ब्लैक होल' छोड़ जाता है।

उठो! अपनी मर्यादा को पहचानो। रोम और द्वारिका के अवशेष चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अपनी ढाल की रक्षा करो, इससे पहले कि वह ढाल ही बोझ बन जाए। 


“साम्राज्य ईंटों से नहीं, 'धर्म' से बनते हैं। ईंटें गिरती हैं तो इमारत ढहती है, पर जब धर्म गिरता है, तो इतिहास ही मिट जाता है।”


"इतिहास गवाह है: जिसने धर्म को कुचला, समय ने उसे नक्शे से ही मिटा दिया।"


क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ साम्राज्य रातों-रात धूल में क्यों मिल गए? क्यों शक्तिशाली से शक्तिशाली योद्धा भी अंत में असहाय होकर गिर पड़ा? इतिहास कहता है 'हार' हुई, राजनीति कहती है 'साजिश' हुई, लेकिन प्रयाग फाइल्स की गुप्त कोडिंग कहती है—उन्होंने उस 'अदृश्य तार' को काट दिया था जिस पर पूरा ब्रह्मांड टिका है। 

सावधान! आप जिसे महज़ एक संस्कृत श्लोक समझ रहे हैं, वह दरअसल अस्तित्व का 'सेल्फ-डिस्ट्रक्ट बटन' है। अगर इसे दबाया, तो विनाश निश्चित है; और अगर इसे समझा, तो आप अजेय हैं।


प्रथम अध्याय: “धर्म” — एक जीवित बायो-एंटिटी

धर्म कोई मृत नियम नहीं, एक “जीवित सत्ता” (Living Entity) है। एक ऐसा अदृश्य सॉफ्टवेयर जो देखता है, सुनता है और गणना करता है। जब कोई मनुष्य अन्याय करता है, तो वह केवल अपराध नहीं करता, वह ब्रह्मांड के 'ऑपरेटिंग सिस्टम' पर प्रहार करता है। उस प्रहार से उत्पन्न होती है—“कर्म की गूंज” (Echo of Karma)। यह गूंज एक 'कॉस्मिक जीपीएस' की तरह है, जो सात जन्मों के बाद भी तुम्हें खोज लेती है।


 द्वितीय अध्याय: “कॉस्मिक दर्पण” का घातक रिफ्लेक्शन

यह संसार एक “कॉस्मिक मिरर” है। विज्ञान कहता है—हर क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है। रहस्य कहता है—तुम जो करते हो, वह हजार गुना बढ़कर लौटता है। जब तुम धर्म (न्याय/मर्यादा) को मारते हो, तो तुम अपने ही भविष्य के 'प्रतिबिंब' को तोड़ते हो। याद रखना—आईना टूटेगा, तो उसकी किरचें सबसे पहले उसे चलाने वाले के ही सीने में धंसेंगी। यही है—“धर्म एव हतो हन्ति”।


 तृतीय अध्याय: क्वांटम कवच (Vibrational Shield)

जब आप सत्य के पथ पर होते हैं, तो आपकी चेतना ब्रह्मांड की फ्रीक्वेंसी के साथ 'सिंक' (Sync) हो जाती है। तब हवाएँ आपका मार्ग साफ करती हैं और समय आपके पक्ष में मुड़ जाता है। यही है—“धर्मो रक्षति रक्षितः”। जो व्यवस्था की रक्षा करता है, व्यवस्था (System) उसकी रक्षा के लिए अपनी पूरी कायनात झोंक देती है।


चतुर्थ अध्याय: द ब्लैक होल — मरा हुआ धर्म

सबसे खतरनाक रहस्य: जब किसी समाज से 'धर्म' मर जाता है, तो वह बस खत्म नहीं होता। वह एक “ब्लैक होल” बन जाता है। एक ऐसा अंधकार जो धीरे-धीरे सुख, शांति और अंत में पूरे वंश को ही निगल जाता है। यही वह चेतावनी है—“मा नो धर्मो हतोऽवधीत्” (कहीं हमारा ही मारा हुआ धर्म हमें लील न जाए)।


अब अपनी आँखें बंद करो और महसूस करो… तुम्हारे भीतर एक बिजली दौड़ रही है। वह बिजली 'धर्म' है। तुम मंदिर में उसे ढूंढ रहे हो, जबकि वह तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में सत्य बनकर खड़ा है। तुम डर रहे हो कि दुनिया तुम्हें मिटा देगी, जबकि सच तो यह है कि जब तक तुम अपने 'धर्म' (कर्तव्य) के साथ खड़े हो, तब तक काल भी तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकता।


ब्रह्मांड कोई निर्जीव वस्तु नहीं है, यह एक महासमुद्र है। तुम इसमें जो फेंकोगे, उसकी लहरें लौटकर तुम्हारे ही तट पर आएँगी। आज इस क्षण, तुम जो भी निर्णय लोगे—चाहे वह सत्य का हो या स्वार्थ का—वह तुम्हारे आने वाले कल की पटकथा लिख रहा है।

तुम मिट्टी के पुतले नहीं हो, तुम 'अनंत के रक्षक' हो। उठो! अपनी मर्यादा को पहचानो, क्योंकि जिस दिन तुमने धर्म को अपनी ढाल बना लिया, उस दिन से नियति (Destiny) तुम्हारी दासी बन जाएगी।


“धर्म वह ढाल नहीं है जिसे हाथ में पकड़ा जाए… धर्म वह 'प्राण' है जिससे वह ढाल बनती है। अगर प्राण टूटे, तो ढाल भी चकनाचूर हो जाएगी।”


"धर्म को मत बचाओ, धर्म बन जाओ; फिर मौत भी तुम्हें छूने से पहले तुम्हारी अनुमति माँगेगी।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द....। 


— अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



मनुस्मृति और विज्ञान भाग - 1

 1. #मनुस्मृति और #विज्ञान.....क्या आपने कभी सोचा है कि बड़े-बड़े आलीशान महल रातों-रात खंडहर क्यों बन जाते हैं? क्यों दुनिया के सबसे ताकतवर बादशाहों के भाग्य का सितारा अचानक डूब जाता है? क्या यह सिर्फ वक्त का फेर है, या कोई 'अदृश्य- कोड' (Invisible Code) है जिसे तोड़ते ही तबाही का 'काउंटडाउन' शुरू हो जाता है?


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥


दुनिया को लगता है कि मनुस्मृति ने यह श्लोक नारियों को खुश करने के लिए लिखा। गलत! यह श्लोक पुरुषों को 'विनाश' से बचाने के लिए लिखा गया था।


आज हम उस गुप्त 'सॉफ्टवेयर' को डिकोड करने जा रहे है, जो इस ब्रह्मांड की हर सफलता और विफलता को कंट्रोल करता है। यह कहानी किसी किताब की नहीं, बल्कि उस 'कॉस्मिक सर्किट' की है जिसे हमारे पूर्वजों ने मात्र 12 शब्दों के एक श्लोक में कैद कर दिया था।


आध्यात्म कहता है कि पुरुष 'शिव' (चेतना) है और स्त्री 'शक्ति' (ऊर्जा) है। शिव बिना शक्ति के 'शव' (Dead) के समान हैं।

गूढ़ रहस्य क्या है। मनुस्मृति का यह श्लोक असल में एक 'एनर्जी मैनेजमेंट गाइड' है। जब आप नारी का सम्मान करते हैं, तो आप ब्रह्मांड की 'आदि शक्ति' को अपने घर में आमंत्रित करते हैं।

आध्यात्मिक सत्य: जहाँ नारी अपमानित है, वहाँ 'शिव' की चेतना सो जाती है और केवल 'तामसिक' शक्तियों का उदय होता है। इसीलिए कहा गया—'सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः'। बिना शक्ति के कोई भी मंत्र, कोई भी प्रार्थना 'एक्टिवेट' (Activate) नहीं होती।


धीरे-धीरे… 

आज आपके सामने रखी जा रही है वह "कॉस्मिक चाबी", जो आपके जीवन के तीन सबसे गहरे ताले— ऊर्जा (Energy), चेतना (Consciousness) और भाग्य (Destiny)—एक साथ खोल सकती है।


कल्पना कीजिए कि पूरा ब्रह्मांड एक विशाल संगीत कार्यक्रम (Orchestra) है। हर ग्रह, हर तारा, हर जीव—एक वाद्ययंत्र (Instrument) है। लेकिन इस संगीत को चलाने वाली असली 'कंडक्टर' कौन है?

उत्तर है — “शक्ति”।


आँखें बंद कीजिए और उस शून्य को महसूस कीजिए जहाँ केवल चेतना है। वही चेतना 'शिव' है—निराकार, शांत, अचल। लेकिन अगर उसमें गति न हो, ऊर्जा न हो, तो वही शिव 'शव' के समान हैं। यहीं प्रवेश होता है—शक्ति का।


 मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में श्लोक नंबर 56 में लिखा है


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥


अर्थ - जहाँ नारियों का सम्मान होता है, उनकी गरिमा सुरक्षित रहती है और उन्हें उचित स्थान दिया जाता है, वहाँ साक्षात् देवताओं का वास होता है—अर्थात वहाँ सुख, शांति और समृद्धि स्वतः खिंची चली आती है।

लेकिन, इसके विपरीत जहाँ उनका अपमान होता है या उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, वहाँ व्यक्ति चाहे कितनी भी पूजा-पाठ कर ले, कितने भी महान कार्य या बड़े निवेश (Investments) कर ले, उसके सारे प्रयास और पुण्य निष्फल (Fail) हो जाते हैं।


इस श्लोक को एक सामान्य सा श्लोक समझने की भूल मत करिएगा। यह एनर्जी कोड है। ये श्लोक उपदेश नहीं, एक 'पावर कोड' है। जब आप नारी का सम्मान (पूज्यन्ते) करते हैं, तो आप किसी व्यक्ति का नहीं, ब्रह्मांड की मूल 'काइनेटिक एनर्जी' का स्वागत करते हैं।


  परिणाम: जहाँ नारी अपमानित है, वहाँ दीपक जलते हैं पर रोशनी नहीं होती; मंत्र गूँजते हैं पर कंपन मृत होता है; पूजा होती है पर 'कनेक्शन' टूट चुका होता है।


  निष्कर्ष यही है “सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः” — शक्ति के बिना, हर प्रयास निष्प्राण (Lifeless) है।


 अब समय है इस श्लोक के उस 'मेटा-फिजिकल' (Metaphysical) हिस्से को उजागर करने का, जिसे सदियों से केवल इशारों में बताया गया।आइए, इस रहस्य के तीन गुप्त अंशों (Hidden Segments) से पर्दा उठाते हैं।


रहस्य का पहला अंश 'यत्र': '

.......दुनिया 'यत्र' का अर्थ 'जहाँ' (Where) करती है, लेकिन रहस्यवादी इसे 'स्पेस-टाइम' (Space-Time) मानते हैं। 'यत्र' वह भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि वह 'प्रकट चेतना' (Manifested Consciousness) है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, नारी का शरीर और मन एक 'यंत्र' (Machine) है।

     जब उस 'यंत्र' को सम्मान (सम्मान = उच्च ऊर्जा की तरंगें) मिलता है, तो वह स्थान एक 'पावर ग्रिड' में बदल जाता है। 'पूज्यन्ते' केवल क्रिया नहीं, बल्कि उस ग्रिड को एक्टिवेट (Activate) करने वाला पासवर्ड है। अगर पासवर्ड गलत (अपमान) है, तो ग्रिड 'शॉर्ट-सर्किट' हो जाएगा।


दूसरा अंश: 'नार्यस्तु'.....यहाँ 'नारी' शब्द का अर्थ केवल जेंडर (Gender) नहीं है। रहस्यमयी विज्ञान में इसे 'प्रकृति' (Original Energy) कहा गया है।  पुरुष 'बीज' (Idea) है, तो नारी 'मिट्टी' (Manifestation) है। आप कितना भी अच्छा बीज (योजना/काम) ले आएं, अगर मिट्टी 'बंजर' (अपमानित/दुखी) है, तो फसल कभी नहीं उगेगी।  नार्यस्तु' का गुप्त अर्थ है—वह शक्ति जो शून्य को अनंत में बदल देती है। जिसे दुनिया 'पूजा' कहती है, वह असल में उस 'मिट्टी' को पोषण (Nourishment) देना है। बिना पोषण के सृजन (Creation) असंभव है।


तीसरा अंश: 'सर्वास्तत्राफलाः ......यह इस रहस्य का सबसे गहरा और डरावना हिस्सा है। इसे 'शून्य का सिद्धांत' (The Principle of Zero) कहिए। आपने गौर किया होगा कि कई लोग बहुत मेहनत करते हैं, दान-पुण्य करते हैं, पर उनका पतन (Fall) अचानक और भयानक होता है। 

क्यों?

क्योंकि

 ब्रह्मांड का एक कानून है—'इमोशनल डेबिट' (Emotional Debt)। अगर आपके उत्थान की नींव में किसी नारी के आंसू या उसका कुचला हुआ स्वाभिमान है, तो वह एक 'एंटी-मैटर' (Anti-matter) की तरह काम करता है। आपकी हर सफलता, हर 'क्रिया' (Action) उस आंसू के संपर्क में आते ही 'नलिफाई' (Nullify) यानी शून्य हो जाती है। आप समुद्र भर पुण्य कमा लें, पर एक बूंद आंसू उसे भाप बना देगा।


दुनिया को लगता है कि मनुस्मृति ने यह श्लोक औरतों को खुश करने के लिए लिखा। गलत! यह श्लोक पुरुषों को 'विनाश' से बचाने के लिए लिखा गया था।


अंतिम सत्य: यह श्लोक एक 'अलार्म सिस्टम' (Alarm System) है।

"अगर तुम्हारे जीवन का ग्राफ नीचे गिर रहा है, अगर बीमारियाँ घर नहीं छोड़ रहीं, अगर सफलता हाथ आकर फिसल रही है... तो मंदिर जाने से पहले अपने घर की उस 'शक्ति' की आँखों में देखो जिसे तुमने कमतर आंका है।"


फाइल अपडेट करिए। :देवता (Good Luck) वहां 'रमते' (Enjoy) नहीं हैं, बल्कि वहां 'मजबूर' हो जाते हैं रुकने के लिए, क्योंकि वहां की वाइब्रेशन उनके अनुकूल होती है। और जहाँ अपमान है, वहां देवता 'नाराज' नहीं होते, वे बस वहां 'सांस' नहीं ले पाते और दम तोड़ देते हैं।

यह रहस्य का वह हिस्सा है जिसे दुनिया 'चर्चा' तो करती है, पर 'महसूस' करने से डरती है।


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आइएअब विज्ञान के लेंस से देखते हैं। हर जीवित कोशिका एक सूक्ष्म प्रकाश उत्सर्जित करती है, जिसे 'बायो-फोटोन' (Biophoton) कहते हैं।

       जिस घर में स्त्री सम्मानित और प्रसन्न है, उसके शरीर से निकलने वाली तरंगें संतुलित और 'कोहेरेंट' (Coherent) होती हैं। ये तरंगें घर की दीवारों में समाती हैं, भोजन में उतरती हैं और बच्चों के न्यूरॉन्स को आकार देती हैं। पूरा घर एक 'पॉजिटिव एनर्जी ग्रिड' बन जाता है।


        अपमान और मौन पीड़ा है, वहाँ ये तरंगें 'डिस्ट्रक्टिव' (Destructive) हो जाती हैं। परिणाम? बिना कारण थकान, चिड़चिड़ापन और अस्वस्थता।


विज्ञान कहता है कि हर जीवित कोशिका 'बायो-फोटोन' (प्रकाश के कण) उत्सर्जित करती है।

 एक प्रसन्न और सम्मानित नारी के शरीर से निकलने वाले 'बायो-फोटोन' की वेवलेंथ (Wavelength) घर के वातावरण को 'कोहेरेंट' (Coherent) यानी सुसंगत बनाती है। जब घर की स्त्री तनाव या अपमान में होती है, तो उसके शरीर से 'केओटिक' (Chaotic) तरंगें निकलती हैं। ये तरंगें घर के अन्य सदस्यों के मानसिक स्वास्थ्य और यहाँ तक कि पौधों और भोजन की गुणवत्ता को भी खराब कर देती हैं। 'देवता' का अर्थ यहाँ 'हाई-क्वालिटी बायो-मैग्नेटिक एनवायरनमेंट' है।


 वैज्ञानिक सत्य यही है कि जहाँ नारी प्रसन्न, वहाँ वातावरण की 'वाइब्रेशनल फ्रीक्वेंसी' उच्चतम (Highest) होती है।


अब उस परत में प्रवेश कीजिए जहाँ भौतिक विज्ञान भी ठहर जाता है— 'ईथर' (आकाश तत्व)। यह एक ऐसा आयाम है जो ब्रह्मांड के हर शब्द, हर भावना और हर 'आह' को रिकॉर्ड करता है।

 

मौन पीड़ा का ब्लैकहोल समझते हैं। जब एक नारी बिना बोले सहती है, तो वह पीड़ा शून्य में नहीं खोती। वह ईथर में एक 'कॉस्मिक ग्लिच' (Cosmic Glitch) पैदा करती है।


प्राचीन रहस्यवादी मानते थे कि 'आकाश' (Ether) हर शब्द और हर भावना को रिकॉर्ड करता है।

नारी की 'आह' या 'मौन पीड़ा' ईथर में एक बहुत गहरा 'ब्लैक होल' बनाती है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक 'सॉफ्टवेयर ग्लिच' (Software Glitch) है जो आपके भाग्य की फाइल को 'करप्ट' कर देता है।

दुनिया के महानतम साम्राज्यों (जैसे रावण या कीचक) का पतन तलवारों से नहीं, बल्कि एक नारी के अपमान से पैदा हुई उस 'नकारात्मक तरंग' (Negative Wave) से हुआ, जिसने उनके पूरे भाग्य का 'डेटा' ही डिलीट कर दिया।


 

इतिहास का गवाह है, तलवारें साम्राज्य नहीं गिरातीं, बल्कि एक स्त्री के अपमान से पैदा हुई वह 'ऊर्जा-विकृति' (Energy Distortion) राजाओं को मिटा देती है। इतिहास के हर बड़े पतन के पीछे यही अदृश्य 'भाग्य-त्रुटि' (Destiny Error) रही है।


जब हम ऊर्जा (आध्यात्म), तरंग (विज्ञान) और कंपन (रहस्य) को एक साथ देखते हैं, तो बनता है आपका “जीवन-क्षेत्र” (Life-Field)। और इस क्षेत्र की रिमोट कंट्रोल कुंजी है—घर की नारी की मानसिक और सामाजिक स्थिति।


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यह कोई दर्शन (Philosophy) नहीं, यह एक अटल नियम (Law) है।


  साधना करना चाहते हैं? → शुरुआत घर की शक्ति से करें।


  स्वस्थ रहना चाहते हैं? → घर के 'बायो-फोटोनिक फील्ड' को संतुलित रखें।


  भाग्य बदलना चाहते हैं? → उस 'जीवित प्रतिमा' की दुआएं लें।


अगर आप आध्यात्मिक होना चाहते हैं, तो नारी का सम्मान पहली सीढ़ी है। अगर आप वैज्ञानिक रूप से स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो घर की नारी की प्रसन्नता अनिवार्य है। और अगर आप जीवन के रहस्यों को जीतना चाहते हैं, तो उसकी दुआएं आपका सबसे बड़ा हथियार हैं।


याद रखिए, आप मंदिर में दीप जला सकते हैं, घंटियाँ बजा सकते हैं, लेकिन अगर आपके घर की शक्ति की आँखों में नमी है, तो आपका हर अनुष्ठान सिर्फ एक 'इको' (Echo) है, जिसका कोई उत्तर नहीं आने वाला।


सत्य सरल है, पर भयावह भी: > 

"वह खुश — तो कायनात आपके पक्ष में मुस्कुराती है।

वह व्यथित — तो नियति आपके विरुद्ध खड़ी हो जाती है।"


अब आप जिस कमरे में बैठे हैं, जरा उसकी दीवारों को देखिए। वहां की हवा को महसूस कीजिए। वहां एक 'चुंबकीय ऊर्जा' (Magnetic Energy) तैर रही है। वह ऊर्जा आपसे पूछ रही है—क्या आपके घर की 'शक्ति' (नारी) मुस्कुरा रही है?

अगर जवाब 'हाँ' है, तो बधाई हो! आपने ब्रह्मांड का सबसे बड़ा 'जैकपॉट' (Jackpot) जीत लिया है। आपके घर की ईंटें 'मंत्र' बन चुकी हैं और आपकी मेहनत 'वरदान' में बदलने वाली है।


लेकिन अगर जवाब में 'खामोशी' है, तो सावधान! आप एक ऐसे टाइम-बम (Time Bomb) पर बैठे हैं जिसकी घड़ी आपकी हर 'प्रार्थना' के साथ तेज़ हो रही है। आप चाहे हिमालय पर जाकर तपस्या कर लें या दुनिया की सारी दौलत कदमों में बिछा दें, अगर उस एक दिल में चोट है, तो कुदरत का 'जस्टिस सिस्टम' (Justice System) कभी आपको माफ़ नहीं करेगा।


यह कोई चेतावनी नहीं है, यह 'परम सत्य' है। ब्रह्मांड की पूरी ताकत उस एक आँसू को पोंछने के लिए झुक सकती है, और वही ताकत एक 'आह' के कारण आपके साम्राज्य को धूल में मिला सकती है।


चुनाव आपका है—मंदिर की पत्थर की मूरत को रिझाना है, या घर की 'जीवित प्रतिमा' को सम्मान देना है?

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याद रखिए, वह केवल आपकी पत्नी, माँ, बहन या बेटी नहीं है; वह 'ब्रह्मांड का केंद्र' (The Epicenter of Universe) है। उसे खुश रखना 'संस्कार' नहीं, अपनी खुद की खुशहाली का 'अल्टीमेट इंश्योरेंस' है।


 "नारी का अपमान केवल एक पाप नहीं, बल्कि अपने ही विनाश के दस्तावेज़ पर किया गया 'हस्ताक्षर' है।"


मनुस्मृति के इस श्लोक की व्याख्या आज यहीं तक....।


फाइल क्लोज्ड... पर प्रभाव शाश्वत है।


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....।


 अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज

Saturday, April 4, 2026

दक्ष प्रजापति की कन्याओं के वंश का विवरण संक्षिप्त

 *दक्ष प्रजापति की कन्याओं के वंश का विवरण संक्षिप्त*


ब्रह्माजीके अनुनय विनय करने पर दक्ष प्रजापतिने अपनी पत्नी असिक्नीके गर्भ से ६० कन्याएं उत्पन्न की थी जो अपने पिता को बहुत प्रेम करती थी।। 


दक्ष प्रजापति ने उनमें से १० कन्याएं धर्म को , १३ कश्यप को, २७ चंद्रमा को,२ भूत को , दो अङ्गिरा को, दो कृशाश्व को और शेष ४ तार्क्ष्यनामधारी कश्यप को ही ब्याह दी।।


*धर्म की १० पत्नीया*

 ```भानुर्लम्बाककुब्जाभि

र्विश्वा साध्या मरुत्वती।

वसुर्मुहूर्ता सङ्कल्पा 

धर्मपत्न्य: सुताञ् श्रृणु।।```

            भानु,लम्बा,ककुम्,

जामि, विश्वा,साध्या, मरुत्वती,वसु,मूहुर्ता और सङ्कल्पा।  


भानु के पुत्र - देवऋषभ और उसका इन्द्रसेन था।


लम्बा का पुत्र विधोत और मेघगण।


ककुम् का पुत्र सङ्कट उसका कीकट और कीकट और कीकटके पुत्र हुए पृथ्वी के सम्पूर्ण दुर्गों(किल्लों) के अभिमानी देवता।


जाभिके पुत्र का नाम खर्ग और उसका पुत्र नन्दी।


विश्वा के विश्वेदेव हुए और उनके कोइ संतान नहीं हुई।


साध्या से साध्यगण और उसका पुत्र अर्थसिद्धि।


मरूत्वतीके दो पुत्र हुए मरूत्वान् और जयन्त। जयन्त भगवान वासुदेव के अंश है जिन्हे लोग उपेन्द्र भी कहते हैं।


वसु के पुत्र आठो वसु हुए द्रोण,प्राण,धृव,अर्क,अग्नि,

दोष,वसु और विभावसु। 

-> द्रोण की पत्नी का नाम अभिमति से हर्ष शोक और भय के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए 

-> प्राण की पत्नी उर्जस्वतीके गर्भ से सह,आयु और पुरोजव नामके तीन पुत्र हुए।

-> धृवकी पत्नी धरणीने अनेक नगरों के अभिमानी देवता उत्पन्न किये।

-> अर्ककी पत्नी वासना के गर्भ से तर्ष(तृष्णा) आदि पुत्र हुए।

-> अग्नि नामक वसुकी पत्नी धारा के गर्भ से द्रविणक आदि बहुत पुत्र उत्पन्न हुए। कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्नि से और अग्नि से विशाख आदि का जन्म हुआ।

-> दोष की पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ जो भगवान का कलावतार है।

-> वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके अधिपति विश्वकर्माजी हुए विश्वकर्मा की भार्या कृतीके गर्भ से चाक्षुष मनु हुए जिनके पुत्र विश्वेदेव और साध्यगण हुए।

-> विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र व्युष्ट ,रोचिष और आतप हुए जिनमें आतप के पञ्चयाम (दिवस) नाम का पुत्र हुआ इन्हीं के कारण सब जीव अपने अपने कार्यो में लगे रहते हैं।




मूहुर्तासे अभिमानी देवता हुए जो अपने अपने मूहुर्त में जीवोको उनके कर्मानुसार फल देते हैं।


सङ्कल्पा का पुत्र हुआ सङ्कल्प और उसका पुत्र काम।


भूतकी पत्नी दक्षनन्दिनी सरूपाने कोटिकोटि रुद्रगण उत्पन्न किये। इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्य, बहरूप, और महान् ये ग्यारह मुख्य हैं। भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयंकर भूत और विनायकादि का जन्म हुआ। ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए।। अंगिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वांगिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ।। 


कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए-वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ।।


धिषणायां वेदशिरो 

देवलं वयुनं मनुम् । 

तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च ।। *तार्क्ष्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं- विनता, कद्र, पतंगी और यामिनी।पतंगीसे पक्षियोंका और यामिनीसे शलभों (पतिंगों) का जन्म हुआ।।*


पतङ्ग्यसूत पतगान्यामिनी शलभानथ।


सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद्यज्ञेशवाहनम् ।

सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः।।

*विनताके पुत्र गरुड़ हुए, ये ही भगवान् विष्णुके वाहन हैं। विनताके ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान्सूर्यके सारथि हैं। कद्रूसे अनेकों नाग उत्पन्न हुए ।।*


कृत्तिकादीनि नक्षत्रा-

णीन्दोः पत्न्यस्तु भारत। दक्षशापात्सोऽनपत्य

स्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः।।

*कृत्तिका आदि सत्ताईस नक्षत्रा-भिमानिनी देवियाँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। रोहिणीसे विशेष प्रेम करनेके कारण चन्द्रमाको दक्षने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षयरोग हो गया था। उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई ।।*


पुनः प्रसाद्य तं सोमः 

कला लेभे क्षये दिताः। 

शृणु नामानि लोकानां मातृणां शङ्कराणि च।।

*उन्होंने दक्षको फिरसे प्रसन्न करके कृष्णपक्षकी क्षीण कलाओंके शुक्लपक्षमें पूर्ण होनेका वर तो प्राप्त कर लिया, (परन्त नक्षत्राभिमानी देवियोंसे उन्हें कोई सन्तान न हई) अब तुम कश्यपपत्नियोंके मंगलमय नाम सुनो। वे लोकमाताएँ हैं। उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। उनके नाम हैं-अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनमें तिमिके पुत्र हैं-जलचर जन्तु और सरमाके बाघ आदि हिंसक जीव ।।*


सुरभेर्महिषा गावो ये 

चान्ये द्विशफा नृप। 

ताम्रायाः श्येनगृध्राद्या मुनेरप्सरसां गणाः।।

*सुरभिके पुत्र हैं-भैंस, गाय तथा दूसरे दो खुरवाले पशु। ताम्राकी सन्तान हैं- बाज, गीध आदि शिकारी पक्षी। मुनिसे अप्सराएँ उत्पन्न हईं ||*


दन्दशूकादयः सर्पा राजन्क्रोधवशात्मजाः । इलाया भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्च सौरसाः।।

*क्रोधवशाके पुत्र हुए-साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तु। इलासे वृक्ष, लता आदि पृथ्वीमें उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियाँ और सुरसासे यातुधान (राक्षस)*


अरिष्टायास्तु गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः। 

सुता दनोरेकषष्टि-

स्तेषां प्राधानिकाशृणु ।।

*अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोडे आदि एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। दनुके इकसठ पुत्र हुए। उनमें प्रधान-प्रधानके नाम सुनो।।*


द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः। अयोमखः शङकशिरा स्वर्भान कपिलोऽरुण।।

*द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ||*


स्वर्भानोः सुप्रभां कन्या

मुवाह नमुचिः किल। वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ।।

*स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया ||*


वैश्वानरसुतायाश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः। उपदानवी हयशिरा 

पुलोमा कालका तथा।।

*दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं। इनके नाम थे-उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका।।*


उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप। 

पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः।।

*उपयेमेऽथ भगवान्कश्यपो ब्रह्मचोदितः। पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः।।*


तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता। जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्र प्रियङ्करः।।

*इनमेंसे उपदानवीके साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ। ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान् कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों-पुलोमा और कालकाके साथ विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए। इन्हींका दूसरा नाम निवातकवच था। ये यज्ञकर्ममें विघ्न डालते थे, इसलिये परीक्षित् ! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला। यह उन दिनोंकी बात है, जब अर्जुन स्वर्गमें गये हुए थे ।।*


विप्रचित्तिः सिंहिकायां 

शतं चैकमजीजनत्। राहुज्येष्ठं केतुशतं 

ग्रहत्वं य उपागताः।।

*विप्रचित्तिकी पत्नी सिंहिकाके गर्भसे एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहोंमें हो गयी। शेष सौ पुत्रोंका नाम केतु था ||*


अथातः श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वशः। 

यत्र नारायणो देवः स्वांशेनावातरद्विभुः।।

*अब क्रमशः अदितिकी वंशपरम्परा सुनो। इस वंशमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायणने अपने अंशसे वामनरूपमें अवतार लिया था ।।*


विवस्वानर्यमा पूषा 

त्वष्टाथ सविता भगः। 

धाता विधाता वरुणो 

मित्रः शत्रु उरुक्रमः।।

*अदितिके पुत्र थे- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विवस्वान्की पत्नी महाभाग्यवती संज्ञाके गर्भसे श्राद्धदेव (वैवस्वत) मनु एवं यम-यमीका जोड़ा पैदा हुआ! संज्ञाने ही घोड़ीका रूप धारण करके भगवान् सूर्यके द्वारा भूलोकमें दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया ।।*


छाया शनैश्वरं लेभे 

सावर्णिं च मनुं ततः । 

कन्यां च तपतीं या 

वै वव्रे संवरणं पतिम्।।

*विवस्वान्की दूसरी पत्नी थी छाया। उसके शनैश्वर और सावर्णि मनु नामके दो पुत्र तथा तपती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। तपतीने संवरणको पतिरूपमें वरण किया ।।*


अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः । 

यत्र वै मानुषी जाति

र्ब्रह्मणा चोपकल्पिता।।

*अर्यमाकी पत्नी मातका थी। उसके गर्भसे चर्षणी नामक पुत्र हुए। वे कर्तव्य-अकर्तव्यके ज्ञानसे युक्त थे। इसलिये ब्रह्माजीने उन्हींके आधारपर मनुष्यजातिकी (ब्राह्मणादि वर्गोंकी) कल्पना की ।।*


पूषानपत्यः पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत्पुरा। 

योऽसौ दक्षाय कुपितं 

जहास विवृतद्विजः।।

*पूषाके कोई सन्तान न हुई। प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ।।*


त्वष्टुर्दैत्यात्मजा भार्या 

रचना नाम कन्यका। सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान्।।

*दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी पत्नी थी। रचनाके गर्भसेविधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (वामन)। यही बारह आदित्य कहलाये ||*


पूषानपत्य: पिष्टादो 

भग्नदन्तोऽभवत् पुरा।

योऽसौ दक्षाय कुपितं

जहास विवृतद्विज:।।

*पूषाके कोई सन्तान न हुई। प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ।।*


त्वष्टुर्दैत्यात्मजा भार्या 

रचना नाम कन्यका। सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान्।।

*दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी पत्नी थी। रचनाके गर्भसे दो पुत्र हुए-संनिवेश और पराक्रमी विश्वरूप ।।*


तं वव्रिरे सुरगणा 

स्वस्रीयं द्विषतामपि। विमतेन परित्यक्ता गुरुणाङ्गिरसेन यत्।।

*इस प्रकार विश्वरूप यद्यपि शत्रुओंके भानजे थे- फिर भी जब देवगुरु बहस्पतिजीने इन्द्रसे अपमानित होकर देवताओंका परित्याग कर दिया, तब देवताओंने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था ।।*


श्री कृष्णार्पणमस्तु 🙏 


*पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात*

जगन्नाथ रथयात्रा

 अरे जगन्नाथ जी किसके गंदे कपड़े धो रहे हैं? आइए देखते हैं इस कथा में। बहुत साल पहले पूरी के एक गांव में रहते थे हमारे माधवदास जी। एकदम अकेले ना आगे नाथ ना पीछे पग। बस दिन रात जगन्नाथ जगन्नाथ। समुद्र के किनारे परे रहते थे और मंदिर के सिंह द्वार पर घंटों खड़े होकर बस टुकुर टुर महाप्रभु को देखते रहते। अरे प्रभु आप ही माई हो। आप ही बाप हो। लेकिन हमारे जगन्नाथ जी को भक्तों की परीक्षा लेने में उन्हें थोड़ा सताने में बड़ा आनंद आता है। बैठे-बैठे सोचा माधव का प्रेम तो पक्का है लेकिन थोड़ा और पकाते हैं और दे दी माधवदास जी को भयंकर बीमारी। ऐसी वैसी बीमारी नहीं सीधा अतिसार। अब माधवदास जी अपनी झोपड़ी में पड़े हैं ना हिल पा रहे हैं ना डुल पा रहे हैं। हालत यह हो गई कि जहां लेटे हैं वहीं कपड़े गंदे हो रहे हैं। आसपास के लोग जो कल तक बाबा जी बाबा जी करते थे वह अब नाक पर कपड़ा रख के निकल रहे हैं। बोले अरे राम राम कितनी बदबू आ रही है। उधर मत जाना। माधवदास जी लेटे रो रहे हैं। हे प्रभु अब तो उठा लो। यह शरीर अब चलता नहीं और यह गंदगी मुझसे देखी नहीं जाती और दर्द के मारे एक दिन माधवदास जी बेहोश हो गए। जैसे ही माधवदास जी बेहोश हुए हमारे ठाकुर जी का आसन डोल गया। बोले अरे मेरा माधव बुला रहा है और तुरंत जगन्नाथ जी जो सोने के पलंग पर सोते हैं वो एक सेवक का भेष बना के कमर पर गमछा कस के पहुंच गए माधवदास की झोपड़ी में। और वहां जाकर क्या देखते हैं? माधवदास गंदगी में सने पड़े हैं। जगन्नाथ जी को घिन आएगी। अरे सवाल ही नहीं। उन्होंने अपने पीतांबर को ऊपर खौसा और लग गए काम पे। जिन हाथों से पूरी दुनिया का चक्कर चलता है, उन हाथों से माधवदास के गंदे कपड़े धो रहे हैं। समुद्र से दौड़-दौड़ के पानी ला रहे हैं। झोपड़ी साफ कर रहे हैं। माधवदास को नहला रहे हैं। और तो और जब माधवदास को होश आता तो पूछने लगते। अरे भाई तुम कौन हो? इतनी बदबू में मेरी सेवा क्यों कर रहे हो? ठाकुर जी मंदमंद मुस्कुरा के बोले। अरे बाबा हम तो सेवक हैं। पता चला तुम बीमार हो तो चले आए। तुम चुपचाप पड़े रहो। माधवदास जी सोचे बड़ा भला आदमी है। एक दिन माधवदास जी को थोड़ा आराम मिला तो देखा वो सेवक पैर दबा रहा है। लेकिन उस सेवक के शरीर से जो खुशबू आ रही थी तुलसी, चंदन और कपूर की। माधवदास जी का माथा ठनका। बोले यह खुशबू तो मेरे मंदिर वाले की है। ध्यान से देखा तो वो बड़ी-बड़ी आंखें वही मंद मुस्कान। माधवदास जी ने झट से हाथ पकड़ लिया। बोले पकड़े गए प्रभु यह आप हैं। और फूट-फूट के रोने लगे। हे नाथ आपको शर्म नहीं आती। आप त्रिभुवन के मालिक होके मेरे गंदे कपड़े धो रहे हो। मेरी गंदगी साफ कर रहे हो। मुझे नरक में डाल देते। पर यह पाप क्यों चढ़ा रहे हो मेरे सर पे? जगन्नाथ जी हंस के बोले अरे माधव भक्त और भगवान में काहे का ऊंचनीच? जहां मेरा भक्त वहां मैं। माधवदास जी बोले वो सब तो ठीक है पर आप तो सर्वशक्तिमान हैं। चाहते तो एक चुटकी बजाते मेरी बीमारी गायब हो जाती। खुद गंदे कपड़े धोने की क्या जरूरत थी? अब जगन्नाथ जी बोले अरे माधव तुम नहीं समझोगे। यह कर्म का नियम है। मैंने सृष्टि बनाई है तो नियम तो मुझे भी मानना पड़ेगा। यह तुम्हारे पिछले जन्म का कोई पाप था जो इस बीमारी के रूप में कट रहा है। माधवदास बोले तुम मिटा देते इसे। ठाकुर जी बोले अरे मिटा तो देता पर फिर यह उधारी रह जाती और इस उधारी को चुकाने के लिए तुम्हें फिर से जन्म लेना पड़ता। फिर से मां के पेट में उल्टा लटकना पड़ता और मैं नहीं चाहता कि मेरा भक्त जिसने मुझे इतना प्रेम किया वो सिर्फ एक बीमारी भोगने के लिए फिर से जन्म ले। इसलिए सोचा चलो मैं ही सेवा कर देता हूं। तुम्हारा हिसाब किताब यही बराबर कर देते हैं। माधवदास जी सुन के सन्न रह गए। बोले प्रभु आप मेरे लिए इतना कष्ट सह रहे हैं। नहीं नहीं अब आप यहां नहीं आएंगे। अब आप सेवा नहीं करेंगे। मुझसे यह पाप और नहीं होगा। जगन्नाथ जी बोले, लेकिन माधव, अभी तुम्हारे कर्म के 15 दिन और बचे हैं। 15 दिन तो भुगतना ही पड़ेगा। माधवदास जी जिद पर अड़ गए। 15 दिन क्या? 15 युग भुगत लूंगा। पर आपसे पैर नहीं दबवाऊंगा। अब जाओ यहां से। ठाकुर जी बोले, "अच्छा, बड़ी ज़िद है तुम्हारी।" ठीक है। तुम मेरी सेवा नहीं लेना चाहते ना तो एक काम करते हैं। तुम्हारी 15 दिन की बीमारी हम ले लेते हैं। खुश। इससे पहले कि माधवदास कुछ बोलते ठाकुर जी वहां से गायब और इधर माधवदास के शरीर में बिजली दौड़ी। एकदम चंगे हो गए। खड़े होके नाचने लगे। अरे मैं तो ठीक हो गया। दौड़े-दौड़े मंदिर गए कि प्रभु को धन्यवाद करूं। मंदिर पहुंचे तो देखा सन्नाटा है। पंडा पुजारी मुंह लटकाए बैठे हैं। माधवदास बोले अरे दरवाजा क्यों बंद है? दर्शन करने दो। पुजारी बोले क्या दर्शन करोगे माधव? महाप्रभु को 104 डिग्री बुखार चढ़ गया है। अभी राजा को सपना आया है कि प्रभु ने अपने भक्त की बीमारी ले ली है। अब वह 15 दिन तक रजाई ओढ़ के सोएंगे, काढ़ा पिएंगे। माधवदास जी वहीं सिंह द्वार पर पछाड़ खा के गिर पड़े। हां राम मेरी बला अपने सर ले ली और तभी से यह नियम बन गया। आज भी साल में एक बार स्नान यात्रा के बाद जगन्नाथ जी बीमार पड़ते हैं। इसे अंसर कहते हैं। 15 दिन तक मंदिर बंद रहता है। भगवान को बुखार आता है। वैद्य आते हैं। काढ़ा पिलाया जाता है। फलों का रस भोग लगता है और 15 दिन बाद जब ठाकुर जी ठीक होते हैं तो अंगराई लेकर कहते हैं। अरे बहुत दिन हो गए कमरे में पड़े पड़े। बड़ा मन ऊब गया है। चलो अब रथ निकालो। हम घूमने जाएंगे। और तब निकलती है जगन्नाथ रथ यात्रा। जैसे ही यह उद्घोष होता है पूरी नगरी शंखनाद और जय जगन्नाथ के जयकारों से गूंज उठती है। कहानी का असली रोमांच तब शुरू होता है जब पहांडी रस्म के जरिए तीनों भारी विग्रहों को झूमते हुए मंदिर से बाहर लाया जाता है। राजा द्वारा रास्ते की सफाई करने के बाद लाखों भक्त दीवाने होकर उन विशाल रस्सियों को थाम लेते हैं। रास्ते में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। कोई रथ को छूने की कोशिश करता है तो कोई बस एक झलक पाने को तरसता है। मान्यता है कि इन रथों के पहियों की धूल भी अगर माथे पर लग जाए तो जीवन सफल हो जाता है। जगन्नाथ जी का रथ नंदी घोष सबसे अंत में चलता है। जैसे वह अपने भक्तों की भीड़ को निहारते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हो। बीच रास्ते में भगवान अपनी मौसी के घर के पास रुककर विशेष पोड़ा पीठा का भोग लगाते हैं। 9 दिनों तक मौसी के घर गुंडीचा मंदिर में उत्सव का माहौल रहता है। जहां वे अपने भाई-बहन के साथ विश्राम करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भगवान और भक्त के अटूट मिलन की एक जीवंत दास्तान है। 

स्फटिक माला के फायदे ?

 *स्फटिक माला के फायदे ?*


1. कहते हैं कि इसे पहनने से किसी भी प्रकार का भय और घबराहट नहीं रहती है।


2. इसकी माला धारण करने से मन में सुख, शांति और धैर्य बना रहता है।


3.ज्योतिष अनुसार इसे धारण करने से धन, संपत्ति, रूप, बल, वीर्य और यश प्राप्त होता है।


4.माना जाता है कि इसे धारण करने से भूत-प्रेत आदि की बाधा से भी मुक्ति मिल जाती है।


5.इसकी माला से किसी मंत्र का जप करने से वह मंत्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है।


6.इससे सोच-समझ में तेजी और दिमाग का विकास होने लगता है।


7.इसकी भस्म से ज्वर, पित्त-विकार, निर्बलता तथा रक्त विकार जैसी व्याधियां दूर होती है।


8.स्फटिक किसी भी पुरुष या स्त्री को एकदम स्वस्थ रखता है।


9.स्फटिक की माला को भगवती लक्ष्मी का रूप माना जाता है।


10.स्फटिक की माला धारण करने से शुक्र ग्रह दोष दूर होता है।


11.स्फटिक के उपयोग से दु:ख और दारिद्र नष्ट होता है।


12.यह पाप का नाशक है। पुण्य का उदय होता है।


13.सोमवार को स्फटिक माला धारण करने से मन में पूर्णत: शांति की अनुभूति होती है एवं सिरदर्द नहीं होता।


14.शनिवार को स्फटिक माला धारण करने से रक्त से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।


15.अत्यधिक बुखार होने की स्थिति में स्फटिक माला को पानी में धोकर कुछ देर नाभि पर रखने से बुखार कम होता है एवं आराम मिलता है।