Friday, October 16, 2026

नवरात्रि को देखने का आपका नजरिया

 "सावधान! इसे पढ़ने के बाद नवरात्रि को देखने का आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल जाएगा।" 2016 में जब जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओहसुमी को यह साबित करने के लिए चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया कि "उपवास (Fasting) करने से शरीर की कोशिकाएं अपने ही भीतर मौजूद सड़े-गले, मृत और कैंसरकारी कचरे को खाकर भस्म कर देती हैं", तब पूरी दुनिया आधुनिक विज्ञान की मेधा के आगे नतमस्तक हो गई। वैश्विक शोध पत्रिकाओं ने इसे 'ऑटोफैगी' (Autophagy) नाम देकर चिकित्सा जगत की सबसे क्रांतिकारी खोज घोषित कर दिया। लेकिन आधुनिक जगत यह पूछना भूल गया कि जिस क्रियाविधि को सिद्ध करने में 21वीं सदी के इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप और अरबों डॉलर की प्रयोगशालाएं लग गईं, वही सटीक फॉर्मूला भारत के सनातन पंचांग में उस समय से क्यों दर्ज है जब दुनिया को यह भी नहीं पता था कि कोशिका (Cell) और डीएनए (DNA) की संरचना क्या होती है?


यदि आपको लगता है कि नवरात्रि केवल नौ दिन भूखे रहने, शाम को फलाहारी नमकीन चबाने, गरबा-डांडिया के उल्लास में झूमने और लाउडस्पीकर पर भजन बजाने का एक सामाजिक पर्व है—तो क्षमा कीजिए, आप सनातन के सबसे बड़े, सबसे परिष्कृत वैज्ञानिक अनुसंधान से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। जिसे लोक परंपरा 'त्योहार' समझकर मनाती है, वह वास्तव में खगोल भौतिकी (Astrophysics), काल-गणना, न्यूरोबायोलॉजी (Neurobiology), सेल्युलर डिटॉक्सिफिकेशन और सामाजिक मनोविज्ञान का ऐसा अभेद्य महाप्रयोग है जिसकी मिसाल पूरी मानव सभ्यता में नहीं मिलती।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने इसे 'नव-दिन' कभी नहीं कहा। शास्त्रों का प्रत्येक पन्ना इसे साधिकार 'नव-रात्र' पुकारता है। दिन तो संसार की माया है, दृश्य जगत का कोलाहल है, इंद्रियों का भटकाव और धूप की तपिश है। रात्रि वह अनंत गर्भ है जहां नक्षत्र आकार लेते हैं, जहां बीज की खोल टूटती है, जहां गर्भाशय में भ्रूण का निर्माण होता है और जहां टूटे हुए परमाणु खुद को पुनर्गठित करते हैं। नौ रातों का यह चक्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि मानव देह को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सिंक्रोनाइज़ (Synchronize) करने का छह-माही महायज्ञ है।

1. खगोलीय रणभूमि: जब आकाश में दो युग टकराते हैं

सनातन काल-गणना का आधार सूर्य और चंद्रमा की परस्पर सापेक्ष गतियां हैं। वर्ष में मुख्य रूप से चार नवरात्र आते हैं—दो प्रत्यक्ष (चैत्र और आश्विन) और दो गुप्त (आषाढ़ और माघ)। विचारणीय प्रश्न यह है कि प्रत्यक्ष नवरात्र केवल चैत्र और आश्विन में ही क्यों मनाए जाते हैं?

खगोल विज्ञान (Astronomy) की दृष्टि से देखिए। यह वह समय है जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपने विषुव (Equinoxes) के बिंदु पर पहुंचती है।


वसंत विषुव (Vernal Equinox): मार्च का समय (चैत्र नवरात्र), जब शीत ऋतु विदा होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है।

शरद विषुव (Autumnal Equinox): सितंबर-अक्टूबर का समय (आश्विन नवरात्र), जब ग्रीष्म विदा होती है और शीत ऋतु की देहरी सजती है।

विषुव वह खगोलीय घटना है जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा के ऊपर चमकता है और पृथ्वी के दोनों गोलार्धों में दिन और रात की अवधि लगभग 12-12 घंटे बराबर हो जाती है। इस संधिकाल में पृथ्वी का भू-चुंबकीय क्षेत्र (Geomagnetic Field) और सौर विकिरण (Solar Radiation) का आपतन कोण एकाएक बदलता है।


        शीत ऋतु (Winter) ────────┐

                                 ├── [ऋतु संधिकाल: विषुव (Equinox)] ──► यमदंष्ट्रा (महा-संक्रमण काल)

        ग्रीष्म ऋतु (Summer) ────┘


चरक और सुश्रुत की चेतावनी: 'यमदंष्ट्रा'

आयुर्वेद के प्रणेता महर्षि चरक और शल्यक्रिया के पितामह सुश्रुत ने इस मौसमी बदलाव के कालखंड को सामान्य समय नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इसे कहा—‘यमदंष्ट्रा’। अर्थात साक्षात काल या यमराज की दाढ़!

ऋतु संधि के इस संक्रमण काल में अचानक तापमान घटता-बढ़ता है, वायुमंडल में आर्द्रता (Humidity) का अनुपात अनियंत्रित होता है और परिणामतः अदृश्य सूक्ष्मजीवियों, संक्रामक पैथोजेन्स, बैक्टीरिया और वायरसों का अभूतपूर्व विस्फोट होता है। प्रकृति में चारों ओर दुर्बलता और क्षय का वातावरण पसरता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी पुष्टि करता है कि मौसमी फ्लू, श्वसन तंत्र के संक्रमण और वायरल बुखार सबसे ज्यादा इन्हीं दो संधिकालों में फैलते हैं।


आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी अगर शुरू से ही उदाहरण देते चले तो आसानी से समझ में आएगा तो लीजिए बिल्कुल सरल उदाहरण कार का गियर बदलना से इसे समझिए। 


 जब आप किसी तेज रफ्तार गाड़ी को तीसरे गियर से सीधे पांचवें गियर में डालते हैं, तो आप पहले क्लच दबाकर एक्सीलेटर छोड़ते हैं। यदि क्लच दबाए बिना सीधे गियर का लीवर खींचेंगे, तो गियरबॉक्स के दांत टूट जाएंगे और गाड़ी का इंजन सीज हो जाएगा। ग्रीष्म से शीत में जाना प्रकृति का गियर बदलना है। इस समय यदि आप वही गरिष्ठ भोजन, वही तामसिक दिनचर्या और वही भागदौड़ जारी रखेंगे, तो देह का जैविक इंजन ध्वस्त हो जाएगा। नवरात्रि वह नौ दिन का 'न्यूट्रल गियर' है, जिसमें गति को स्वेच्छा से धीमा करके, क्लच दबाकर, शरीर को आगामी छह महीने के नए मौसम के अनुकूल ढाला जाता है।

2. नौ का अखंड गणित: अंकशास्त्र और कॉस्मिक कोड

नौ दिन ही क्यों? दस क्यों नहीं? सात या पांच क्यों नहीं?

सनातन परंपरा में संख्याओं का चुनाव कभी यादृच्छिक (Random) नहीं होता। गणितीय दर्शन की आंख से देखिए। शून्य से लेकर नौ तक की अंक-प्रणाली में नौ (9) अंतिम और सर्वोच्च पूर्ण अंक (Highest Single-Digit Number) है।


अंकशास्त्र और बीजगणित में 9 को 'अक्षय अंक' या 'दिव्य स्थिरांक' माना जाता है। नौ के किसी भी गुणज (Multiple) के अंकों को परस्पर जोड़िए, परिणाम सदैव नौ ही निकलकर आएगा:

9 \times 2 = 18 \longrightarrow 1 + 8 = 9 


9 \times 5 = 45 \longrightarrow 4 + 5 = 9 


9 \times 13 = 117 \longrightarrow 1 + 1 + 7 = 9


 9 \times 432 = 3888 \longrightarrow 3 + 8 + 8 + 8 = 27 \longrightarrow 2 + 7 = 9


सनातन ब्रह्मांड विज्ञान के काल-चक्र को देखिए:

कलियुग: 4,32,000 वर्ष (4+3+2+0+0+0 = 9)


द्वापर युग: 8,64,000 वर्ष (8+6+4+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


त्रेता युग: 12,96,000 वर्ष (1+2+9+6+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


सत्ययुग: 17,28,000 वर्ष (1+7+2+8+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


महायुग: 43,20,000 वर्ष (4+3+2 = 9)


नौ वह अमर संख्या है जो कभी विकृत नहीं होती, जो किसी भी संख्या के साथ मिलकर अंततः स्वयं को ही प्रकट करती है। यह परब्रह्म और आदिशक्ति की अखंडता का गणितीय प्रमाण है। जब आप नौ दिनों की साधना में प्रवृत्त होते हैं, तो आप वास्तव में शून्य से पूर्णता की उस नौ-चरणीय ज्यामिति को अपनी चेतना में दोहरा रहे होते हैं।

3. घटस्थापना और 'जौ' (यव): वेदी पर स्थापित वैदिक कृषि अनुसंधान

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना होती है। तांबे या मिट्टी के कलश के नीचे बलुई दोमट मिट्टी की एक गोल वेदी बनाई जाती है और उसमें जल छिड़ककर 'यव' यानी जौ के दाने बोए जाते हैं। नई पीढ़ी इसे केवल पंडित जी की बताई पूजा विधि मानकर अनदेखा कर देती है, किंतु एक पत्रकार और खोजी दृष्टि से जब आप इसके मूल में उतरते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन सजीव मृदा-परीक्षण और अंकुरण प्रयोगशाला (Seed Germination & Soil Viability Lab) थी।

                                [घटस्थापना: वेदी निर्माण]

                                           │

                        ┌──────────────────┴──────────────────┐

                        ▼                                     ▼

             [घर/खेत की स्थानीय मिट्टी]              [संग्रहीत बीज: यव (जौ)]

                        │                                     │

                        └──────────────────┬──────────────────┘

                                           ▼

                             [9 दिनों का नियंत्रित संवर्धन]

                                           │

         ┌─────────────────────────────────┼─────────────────────────────────┐

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   [सघन, सीधे, हरे अंकुर]         [पीले, मुरझाए, टेढ़े अंकुर]            [अंकुरण में विफलता]

         │                                 │                                 │

         ▼                                 ▼                                 ▼

[उच्च अंकुरण दर / बंपर फसल]       [सूक्ष्म पोषक तत्वों का अभाव]         [दूषित बीज / अनुपजाऊ मिट्टी]

   (खेत बुवाई हेतु उपयुक्त)            (खाद व जल प्रबंधन आवश्यक)             (बीज परिवर्तन का संकेत)


आश्विन नवरात्र के ठीक बाद पूरे भारतवर्ष में किसान अपनी सबसे मुख्य रबी फसल (गेहूं, जौ, सरसों, चना) बोने खेतों में उतरते हैं। प्राचीन काल में आज जैसी कृषि विज्ञान केंद्र या डिजिटल सॉइल-टेस्टिंग लैब नहीं थीं। ऋषियों ने प्रत्येक गृहस्थ और कृषक कुल के लिए यह अनिवार्य नियम बना दिया कि खेत में लाखों बीजों को झोंकने से पहले, अपने घर के पवित्र ईशान कोण में उस मिट्टी और बीजों का एक छोटा सा 'नमूना' (Sample) वेदी पर स्थापित करो।

नौ दिनों तक आचमन के शुद्ध जल, धूप और दीप के नियंत्रित तापमान में जौ का परीक्षण होता था।


यदि 9 दिनों में जौ की पत्तियां सघन, गहरे हरे रंग की और सीधी आकाश की ओर लहलहाती हुई 6 से 8 इंच तक बढ़ गईं, तो यह इस बात का प्रत्यक्ष बायो-इंडिकेटर (Bio-indicator) था कि बीज की जीवन-क्षमता (Viability) 95% से अधिक है और मिट्टी में कोई रोगाणु नहीं हैं। किसान निश्चिंत होकर बुवाई करता था कि फसल बंपर होगी।


यदि पत्तियां पीली, दुर्बल या मुड़ी हुई निकलती थीं, तो यह चेतावनी थी कि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी है या बीज में फंगस लग चुका है—इसे तुरंत बदलो!


अब प्रयागराज फाइल्स में वक्त हो गया है एक और उदाहरण का तो सरल उदाहरण खेत का लिटमस पेपर से इसे समझने का प्रयास करते हैं। 

आज किसी जल संयंत्र में पानी की शुद्धता जांचनी हो तो केमिस्ट लिटमस पेपर या इलेक्ट्रॉनिक सेंसर का इस्तेमाल करता है। हमारे पूर्वज वैज्ञानिकों ने जौ के दाने को प्रकृति का 'लिविंग लिटमस पेपर' बना दिया था। बिना एक पैसा खर्च किए, धर्म के अनुशासन में बांधकर, पूरे राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा (Food Security) को सुरक्षित रखने की यह कितनी विस्मयकारी व्यवस्था थी!

4. त्रिगुण दर्शन: चेतना के तीन महास्तंभ

दुर्गा सप्तशती और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, ब्रह्मांड का समस्त विस्तार तीन मूल गुणों से संचालित है: तमस् (Inertia/Darkness), रजस् (Kinetic/Passion), और सत्व (Consciousness/Purity)।

मनुष्य का मन भी इन्हीं तीन परतों में कैद है। साधारण अवस्था में व्यक्ति तामसिक वृत्तियों (आलस्य, भय, काम, क्रोध, अवसाद) में आकंठ डूबा रहता है। उसे सीधे ज्ञान या समाधि में नहीं धकेला जा सकता। इसी कारण नवरात्रि के नौ दिनों को तीन-तीन दिनों के तीन वैज्ञानिक चरणों में विभाजित किया गया।


कालखंड

अधिष्ठात्री महाशक्ति

मनोवैज्ञानिक व जैविक स्तर

क्रियात्मक स्वरूप

प्रथम 3 दिन (प्रतिपदा–तृतीया)

महाकाली

तमोगुण संहार: अंतस के विकारों का दमन।

मूलाधार व स्वाधिष्ठान का शोधन; टॉक्सिन्स का निष्कासन।


मध्य 3 दिन (चतुर्थी–षष्ठी)

महालक्ष्मी

रजोगुण परिशोधन: ऊर्जा का रचनात्मक दिशा-परिवर्तन।

मणिपूरक व अनाहत चक्र का सक्रियण; ओज व प्राण संचय।


अंतिम 3 दिन (सप्तमी–नवमी)

महासरस्वती

सत्वगुण प्रतिष्ठा: प्रज्ञा, विवेक और बोध का उदय।

विशुद्धि, आज्ञा व सहस्रार का प्रबोधन; मानसिक स्थिरता।


यह क्रम आकस्मिक नहीं है। जब तक आप किसी गंदे बर्तन से काई और मैल को खुरचकर बाहर नहीं फेंकेंगे (काली), तब तक उसमें शुद्ध स्वर्ण-जल नहीं भर सकते (लक्ष्मी)। और जब तक पात्र स्वच्छ और बहुमूल्य नहीं होगा, तब तक उसमें आत्मज्ञान का अमृत (सरस्वती) टिक ही नहीं सकता।

5. नवदुर्गा और नव-औषधि: मार्कंडेय पुराण का गुप्त चिकित्सा विज्ञान

अधिकांश लोग नवदुर्गा को केवल देवी के नौ काल्पनिक चित्र मानते हैं। किंतु मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत 'कवच' के प्रारंभिक श्लोकों में स्वयं ब्रह्माजी ने महर्षि मार्कंडेय को नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को नौ दिव्य वनस्पतियों और औषधियों के रूप में प्रकट किया था। यह भारत का वह प्रिवेंटिव मेडिसिन चार्ट (Preventive Medicine Chart) है जिसे मौसमी संधिकाल में देह को निरोगी रखने के लिए रचा गया था:

1. शैलपुत्री ➔ हरड़ (हरीतकी)

हिमवान की पुत्री शैलपुत्री आयुर्वेद की प्रधान औषधि 'हरड़' की अधिष्ठात्री हैं। यह सात प्रकार की होती है और त्रिफला का मुख्य घटक है। मौसमी संधिकाल में पेट की जठराग्नि मंद होते ही यह पाचक रसों को संतुलित करती है और आंतों का शोधन करती है।

2. ब्रह्मचारिणी ➔ ब्राह्मी (Bacopa monnieri)

तप और संयम की देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात मेध्य रसायन 'ब्राह्मी' हैं। उपवास के दौरान जब शरीर में शर्करा का स्तर गिरता है और मस्तिष्क में चिड़चिड़ापन या घबराहट होती है, तब ब्राह्मी न्यूरोट्रांसमीटर्स को शांत कर स्मरण शक्ति, एकाग्रता और मानसिक धैर्य को अक्षुण्ण बनाए रखती है।

3. चंद्रघंटा ➔ चंदुसूर (चमसूर / Halim Seeds)

मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी चंद्रघंटा 'चंदुसूर' की प्रतीक हैं। यह औषधि फाइटोएस्ट्रोजेन, आयरन और फोलिक एसिड से भरपूर होती है। यह रक्त को शुद्ध कर शरीर के दुबलेपन और हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करती है।

4. कूष्मंडा ➔ पेठा (कुम्हड़ा / Ash Gourd)

अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली कूष्मंडा देवी साक्षात 'पेठा' हैं। कुम्हड़ा संसार की सबसे क्षारीय (Most Alkaline) सब्जियों में से एक है। यह पेट के अत्यधिक अम्लीय (Acidic) स्राव को सोखकर अल्सर, गैस और मानसिक उन्माद को शांत करता है।

5. स्कंदमाता ➔ अलसी (Flaxseeds)

भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का स्वरूप 'अलसी' है। अलसी ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटी-ऑक्सीडेंट्स का विशाल भंडार है। यह वात, पित्त और कफ के त्रिदोष को शांत कर हृदय धमनियों में रक्त के थक्के जमने से रोकती है।

6. कात्यायनी ➔ माचिका (मोइया / अंबा हल्दी)

महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुई कात्यायनी देवी 'माचिका' या कड़वी अंबा हल्दी का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह शक्तिशाली एंटी-वायरल और एंटी-इन्फ्लेमेटरी औषधि है जो संधिकाल में रक्त के विकारों और गले के संक्रमण का समूल नाश करती है।

7. कालरात्रि ➔ नागदौन (Artemisia / Damanaka)

अंधकार रूपी असुरों का संहार करने वाली कालरात्रि साक्षात 'नागदौन' हैं। यह सभी प्रकार के विषों, वायु विकारों और मानसिक अवसादों को नष्ट करने वाली महा-औषधि है। यह आंतों के कीड़ों (Parasites) को मारकर पाचन तंत्र को निष्कंटक बनाती है।

8. महागौरी ➔ तुलसी (Ocimum sanctum)

शंख और चंद्रमा के समान श्वेत महागौरी जगत्-कल्याणकारी 'तुलसी' हैं। तुलसी संसार की सबसे शक्तिशाली एडेप्टोजेन (Adaptogen) है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी भी बाह्य वायरस से लड़ने के लिए अजेय ढाल प्रदान करती है।

9. सिद्धिदात्री ➔ शतावरी (Asparagus racemosus)

समस्त सिद्धियों को देने वाली माता सिद्धिदात्री 'शतावरी' का साक्षात विग्रह हैं। यह शरीर के अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) को संतुलित कर नवजीवन, बल, वीर्य और प्राणशक्ति का संचार करती है।

6. बायोकेमिस्ट्री और उपवास: देह का सेल्युलर रीबूट

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह बिना रुके 24 घंटे, 365 दिन अपने पाचन तंत्र पर भोजन का असहनीय बोझ लादे रहता है। जब आप लगातार खाते रहते हैं, तो शरीर की 80% ऊर्जा केवल भोजन को पचाने में खर्च होती रहती है। शरीर को अपने आंतरिक अंगों की मरम्मत (Repair), सफाई और ट्यूमर कोशिकाओं को नष्ट करने की कभी फुर्सत ही नहीं मिलती।

नवरात्रि में 9 दिन का उपवास कोई धार्मिक हठयोग नहीं, बल्कि शरीर को 'मेटाबॉलिक रिलीफ' देने की अचूक योजना है:

[उपवास प्रारंभ: 0-24 घंटे] ──► रक्त शर्करा सामान्य; ग्लाइकोजन का उपभोग

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[24-48 घंटे: कीटोसिस मोड]  ──► फैट बर्निंग शुरू; लिवर द्वारा कीटोन्स का निर्माण

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[48-72 घंटे: गहन ऑटोफैगी] ──► मृत कोशिकाओं व क्षतिग्रस्त प्रोटीन्स का भक्षण

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[72-216 घंटे: स्टेम सेल एक्टिवेशन] ──► पुरानी प्रतिरक्षा कोशिकाओं का संहार; नई WBCs व इम्यून रीबूट


ऑटोफैगी (Autophagy): देह का कबाड़ी वाला

जब उपवास के दौरान शरीर को बाहर से ग्लूकोज नहीं मिलता, तो जीवित रहने के लिए कोशिकाएं अपने ही भीतर झांकती हैं। वे वहां जमा प्रोटीन के कचरे, पुराने वायरस, मृत माइटोकॉन्ड्रिया और कैंसर के प्रारंभिक बीजों को पकड़कर अपने लाइसोसोम (Lysosome) में झोंक देती हैं और उन्हें जलाकर ऊर्जा बना लेती हैं।


आपको लग रहा होगा कि यह मनीष जी को कोई उदाहरण देना चाहिए तो परेशान मत होइए बिल्कुल सरल उदाहरण है घर की दिवाली वाली सफाई।

 सोचिए, अगर आप 6 महीने तक घर का कूड़ा बाहर न फेंकें और बाहर से लगातार नया सामान लाकर ड्राइंग रूम में भरते रहें, तो घर का क्या हाल होगा? हर कोने से दुर्गंध उठेगी, चूहे और कीड़े बिलबिलाएंगे। हम 365 दिन तला-भुना, मैदा, प्रिजर्वेटिव्स और चीनी ठूंस-ठूंस कर अपनी आंतों के साथ यही करते हैं। नवरात्रि का उपवास देह की दिवाली वाली सफाई है। जब बाहर से नया सामान (भोजन) आना बंद होता है, तो शरीर झाड़ू उठाकर घर के कोने-कोने में देखता है—'अच्छा, यह कोशिका सड़ रही है? इसे जलाओ! यह प्रोटीन कचरा है? इसे भस्म करो!' जो काम हम घर में कबाड़ी वाले को बुलाकर करते हैं, देह वही काम 9 दिन के उपवास में अपनी विकृत कोशिकाओं के साथ करती है।

आंतों का कायाकल्प (Gut Microbiome Reset)

नवरात्रि के भोजन के नियम देखिए:

सेंधा नमक (Rock Salt): समुद्री नमक प्रोसेस्ड और आयोडीन-सिंथेटिक होता है, जबकि सेंधा नमक शुद्ध क्रिस्टलीय खनिज है जिसमें 84 ट्रेस मिनरल्स (पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम) होते हैं जो सेल्युलर ऑस्मोटिक दबाव को नियंत्रित रखते हैं।


कुट्टू (Buckwheat) और सिंघाड़ा: ये अनाज नहीं, सूखे मेवे और फल हैं। ये 100% ग्लूटेन-फ्री होते हैं। ग्लूटेन आंतों की आंतरिक दीवारों (Villi) पर चिपककर सूजन (Inflammation) पैदा करता है। 9 दिन तक ग्लूटेन बंद होते ही आंतों की आंतरिक परत नई हो जाती है।


आये अब प्रयाग फाइल्स में एक और सरल उदाहरण स्मार्टफोन का 'Factory Reset' विकल्प से समझते हैं। 

जब आपका फोन लगातार ऐप्स चलाने से गर्म होने लगता है, हैंग होता है और स्क्रीन अटकती है, तो आप क्या करते हैं? आप फोन की कैशे मेमोरी साफ करते हैं और उसे Restart या Factory Reset कर देते हैं। साल भर तेल, मसाले और तनाव झेलते-झेलते हमारा पाचन तंत्र 'हैंग' हो चुका होता है। नवरात्रि का सात्विक आहार पाचन तंत्र को 9 दिन के लिए 'सेफ मोड' में डालकर फैक्ट्री रीसेट करना है। कैशे मेमोरी (टॉक्सिन्स) साफ हो जाती है और सिस्टम नए फोन की तरह फर्राटा भरने लगता है।

7. न्यूरोबायोलॉजी और एकॉस्टिक साइंस: मंत्रों का परमाणु परीक्षण

दिन के समय पृथ्वी का वायुमंडल सौर तूफानों, पराबैंगनी किरणों, और लाखों वाहनों व कारखानों के शोर से विक्षुब्ध रहता है। रात्रि में जब सौर विकिरण थम जाता है, तो आयनमंडल (Ionosphere) शांत हो जाता है और पृथ्वी का प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय स्पंदन, जिसे विज्ञान शुमान रेजोनेंस (Schumann Resonance - ~7.83 Hz) कहता है, स्पष्ट और स्थिर हो जाता है।

इसीलिए ऋषियों ने साधना के लिए रात्रि के पहर को चुना।

शंख और पीतल के घंटे का सोनिक प्रहार

आरती के समय जब शंख बजता है और भारी पीतल के घंटे एक ताल में बजाए जाते हैं, तो वह केवल संगीत नहीं होता। शंख की ध्वनि 110 से 130 हर्ट्ज़ की फ्रीक्वेंसी पैदा करती है, जो मानव मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों (Left and Right Hemispheres) को तुरंत एक लय में (Brainwave Synchronization) बांध देती है।

मस्तिष्क की चंचल और तनावग्रस्त 'बीटा तरंगें' (Beta Waves - 14 से 30 Hz) गिरकर शांत, एकाग्र और रचनात्मक 'अल्फा' (8-13 Hz) और 'थीटा' (4-7 Hz) तरंगों में बदल जाती हैं। पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) से मेलाटोनिन और सेरोटोनिन का स्राव उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता है, जिससे तनाव पैदा करने वाला हॉर्मोन 'कॉर्टिसोल' खून से साफ हो जाता है।

[दैनिक जीवन: विक्षिप्त अवस्था]  ──► बीटा तरंगें (14-30 Hz)  ──► तनाव, कॉर्टिसोल, उच्च रक्तचाप

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                              (शंख, घंटा व चंडी पाठ की ध्वनि)

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[नवरात्र साधना: शांत प्रज्ञा]   ──► अल्फा/थीटा तरंगें (4-12 Hz) ──► मानसिक शांति, न्यूरोनल हीलिंग


इसे आप एक और सरल उदाहरण चश्मे की दुकान वाली अल्ट्रासोनिक क्लीनिंग से समझने का प्रयास करें। कभी चश्मे या गहनों की दुकान पर देखा है कि वे मैली घड़ी या चश्मे को पानी के एक छोटे से टब में डालते हैं, बटन दबाते हैं और बिना हाथ लगाए कंपन से सारा मैल सेकंडों में कटकर पानी में तैरने लगता है? इसे विज्ञान अल्ट्रासोनिक क्लीनिंग कहता है। नवरात्रि की रात्रि में आरती का घंटा और शंख की गूंज वही अल्ट्रासोनिक वाइब्रेशन है। जब यह नाद आपकी खोपड़ी की हड्डियों और न्यूरॉन्स से टकराता है, तो नसों में जमा महीनों का तनाव, अवसाद और मानसिक कचरा वैसे ही झड़कर बाहर गिर जाता है जैसे पेड़ हिलाने पर सूखे पत्ते गिरते हैं।

8. कन्या पूजन: जेनेटिक सम्मान और सामाजिक न्यूरोसाइंस

नवरात्रि की पूर्णाहुति अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन (कंजक) के बिना संभव नहीं मानी जाती। 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को घर बुलाकर उनके पांव पखारना, उन्हें तिलक लगाना, भोजन कराना और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना—यह परंपरा सनातन के सिवा दुनिया के किस मजहब या संस्कृति में देखने को मिलती है?

इसके पीछे का विज्ञान दो धरातलों पर काम करता है:

1. जैविक व जेनेटिक शुद्धता (Bio-electric Pure State)

दो से दस वर्ष की आयु (Pre-pubescent age) वह कालखंड है जब बालिका के शरीर में हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव (Sex Hormones) शुरू नहीं हुए होते। उसकी अंतःस्रावी ग्रंथियां पूरी तरह शांत होती हैं, डीएनए म्यूटेशन और मानसिक विकृतियां शून्य होती हैं। इस अवस्था में उसका बायो-इलेक्ट्रिक आभामंडल (Aura) सबसे अधिक स्वच्छ, निर्दोष और स्पंदनशील होता है। ऋषियों ने इसे साक्षात 'अव्यक्त प्रकृति' की शुद्धतम जैविक अभिव्यक्ति माना।


[आयु 2 से 10 वर्ष] ──► हॉर्मोनल विकार शून्य ──► शांत डीएनए ──► शुद्धतम बायो-इलेक्ट्रिक ऊर्जा (Aura)


2. सामाजिक न्यूरोसाइंस: वासना का समूल दहन

मनोविज्ञान कहता है कि समाज में बलात्कार, यौन हिंसा और विकृतियों का जन्म पुरुष के अवचेतन मन में स्त्री को केवल 'मांसपिंड' या 'भोग की वस्तु' समझने से होता है।

सनातन के ऋषियों का मनोवैज्ञानिक मास्टरस्ट्रोक देखिए: समाज के प्रत्येक वयस्क, दाढ़ी-मूंछ वाले पुरुष को वर्ष में दो बार, नौ दिनों के कठिन तप के बाद, अपने घुटनों पर बैठकर एक नन्हीं बालिका के चरणों में अपना मस्तक रगड़ना अनिवार्य कर दिया गया!

जिस क्षण कोई पुरुष अपनी आंखें बंद करके एक अबोध कन्या के पैर छूता है और उसे 'माता' कहकर पुकारता है, उसके मस्तिष्क के अवचेतन (Subconscious) में न्यूरो-प्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) के जरिए एक अमिट संस्कार अंकित हो जाता है—कि 'नारी भोग्या नहीं, साक्षात पराशक्ति की अधिष्ठात्री है'। यह समाज से वासना के दानव को उखाड़ फेंकने का सबसे गहन मनोवैज्ञानिक टीका (Psychological Vaccine) था।


अपनी थाती को पहचानो

नवरात्रि किसी दुर्बल मन का विलाप नहीं है। यह सिंह पर आरूढ़ उस अष्टभुजा महाशक्ति का तांडव है जिसकी आंखों में सूर्य और चंद्रमा चमकते हैं, जिसके हाथों में ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शस्त्र चमक रहे हैं और जिसके पैरों के नीचे काल और अज्ञान का महिषासुर कुचला हुआ तड़प रहा है।

वह महिषासुर कोई बाहर खड़ा सींग वाला दैत्य नहीं था—वह हमारे ही भीतर बैठा हुआ आलस्य, प्रमाद, अनियंत्रित वासना, अस्वस्थ खानपान और अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना का दैत्य था। उस आंतरिक दानव के वध के लिए ही हमारे पूर्वजों ने इस नौ रातों के महाचक्रव्यूह की रचना की थी।

जब अगली बार नवरात्रि पर आपके घर में कलश की वेदी सजे, जब अग्निहोत्र से धूप का धुआं उठे और शंख की गूंज से दिशाएं कांपें—तो स्मरण रखना कि आप किसी दकियानूसी रस्म का निर्वाह नहीं कर रहे। आप अपनी देह को प्रयोगशाला, अपने प्राण को हवि और अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम शक्ति से जोड़ने का वह महायज्ञ कर रहे हैं जिसकी थाती पूरे विश्व में केवल और केवल सनातन के पास है।


जब अगली बार नवरात्रि पर आपके घर में कलश की वेदी सजे, जब अग्निहोत्र से धूप का धुआं उठे और शंख की गूंज से दिशाएं कांपें—तो स्मरण रखना कि आप किसी दकियानूसी रस्म का निर्वाह नहीं कर रहे। आप अपनी देह को प्रयोगशाला, अपने प्राण को हवि और अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम शक्ति से जोड़ने का वह महायज्ञ कर रहे हैं जिसकी थाती केवल और केवल सनातन के पास है। गर्व से अपनी छाती चौड़ी कर लीजिए, मस्तक उठाइए और अंतरात्मा के पूरे वेग से बोलिए—जय माता दी!


लेकिन... वह एक रहस्य जो अभी बंद है!

किंतु रुकिए। देह, कोशिका, खगोल और गट-माइक्रोबायोम का यह गणित तो वह है जिसे आज की आधुनिक मेडिकल साइंस ने माइक्रोस्कोप के जरिए जैसे-तैसे छू लिया है। लेकिन उस रहस्य का क्या, जिसके सामने विज्ञान आज भी अपने हाथ खड़े कर देता है?


क्या आपने कभी विचार किया कि वर्ष में चार नवरात्रों में से दो को 'गुप्त नवरात्र' क्यों कहा गया?

और उससे भी बड़ा अनुत्तरित प्रश्न—दुर्गा सप्तशती के अंत में जब महिषासुर का वध हो जाता है, तब ऋषि किसी मोक्ष या स्वर्ग की बात नहीं करते; वे 'वैश्य और सुरथ' नाम के दो साधारण मनुष्यों के मस्तिष्क की उस गुप्त न्यूरो-प्रोग्रामिंग (Neuro-programming) की बात छेड़ते हैं जिसे 'महामाया का आवरण' कहा गया।

क्या नवदुर्गा का यह नौ रातों का चक्र वास्तव में केवल शरीर को ठीक करने की भट्ठी है, या इसके भीतर मानव मस्तिष्क के 'सबकॉन्शियस माइंड' के उस 90% हिस्से को हैक करने का कोई ऐसा गुप्त तांत्रिक कोड छुपा है, जिसे ऋषियों ने आम जनता की पहुंच से जानबूझकर ओझल कर दिया था?


 वह 10वां द्वार कौन सा है, जो नौ रातों के महाविस्फोट के बाद विजयादशमी की भोर में खुलता है?

सोचिएगा... 'प्रयाग फाइल्स' की दूसरी कड़ी में जब हम इस ताले की चाबी घुमाएंगे, तो शायद आधुनिक न्यूरोसाइंस की बुनियाद हिल जाएगी। तब तक, अपनी रीढ़ को सीधा रखिए और चेतना को जागृत! अगली कड़ी को जल्द से जल्द पढ़ने के लिए कमेंट बॉक्स में जरूर अपनी प्रतिक्रिया दें और लिखे भाग दो या जय माता दी। 


"क्या आपको कभी किसी ने नवरात्रि का यह वैज्ञानिक पक्ष समझाया था, या आज पहली बार यह तथ्य सामने आए हैं? सच बताइएगा—क्या आज के बाद आप और आपके बच्चे नवरात्रि को केवल एक व्रत समझेंगे या हमारे ऋषियों का सबसे बड़ा सेल्युलर साइंस? अपनी राय नीचे जरूर दर्ज करें और अगर गर्व हुआ हो तो 'जय माता दी' लिखकर अपनी हाजिरी लगाएं! 👇🚩”


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ…..। अगली गणित जल्द…..।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



श्राद्ध भाद्रपद मास मे ही क्यों किया जाता है.?

 श्राद्ध भाद्रपद मास मे ही क्यों किया जाता है.?

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हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्र मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और वहाँ अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। ऐसा वर्णन ‘श्राद्ध मीमांसा’ में मिलता है। इस तरह पितृ ॠण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध काल में पितरों का तर्पण और पूजन किया जाता है। भारतीय संस्कृति एवं समाज में अपने पूर्वजों एवं दिवंगत माता-पिता के स्मरण श्राद्ध पक्ष में करके उनके प्रति असीम श्रद्धा के साथ तर्पण, पिंडदान, यक्ष तथा ब्राह्मणों के लिए भोजन का प्रावधान किया गया है। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं। प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और दूसरा पितृ पक्ष में। जिस मास और तिथि को पितृ की मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उनका दाह संस्कार हुआ है, वर्ष में उम्र उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है।


एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिण्ड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथियाँ याद नहीं है, तो वह अमावस्या के दिन ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का विधि-विधान से पिंडदान तर्पण, श्राद्ध कर सकता है। इस दिन किया गया तर्पण करके 15 दिन के बराबर का पुण्य फल मिलता है और घर परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में विशेष उन्नति होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई है, तो पितृदोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्मशांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करना चाहिए। सामर्थ्यनुसार किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ ब्राह्मण से श्रीमद भागवत पुराण की कथा अपने पितरों की आत्मशांति के लिए करवा सकते हैं। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना सारी सुख सुविधाओं के होते भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।

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माँ दुर्गा के 1000 विलक्षण नाम

 माँ दुर्गा के 1000 विलक्षण नाम

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माँ दुर्गा के नाम मांत्र से ही भक्तों का हर दुख दूर हो जाता है। आज हम आपको मां दुर्गा के 1000 नामों के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके जपने मात्र से ही हर मनोकामना पूरी होगी और नई ऊर्जा का संचार होगा। मां दुर्गा के ये 1000 नाम हर विपदा और संकट में रक्षा करते हैं। माता रानी के इन नामों के प्रतिदिन जाप से ऐश्वर्य और सफलता मिलती है।


मां दुर्गा के 1000 नाम

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1.महाविद्या

ॐ महाविद्यायै नम:।

2.जगन्माता

ॐ जगन्मात्रे नम:।

3.महालक्ष्मी

ॐ महालक्ष्म्यै नम:।

4.शिवप्रिया

ॐ शिवप्रियायै नम:।

5.विष्णुमाया

ॐ विष्णुमायायै नम:।

6.शुभा

ॐ शुभायै नम:।

7.शान्ता

ॐ शान्तायै नम:।

8.सिद्धा

ॐ सिद्धायै नम:।

9.सिद्धसरस्वती

ॐ सिद्धसरस्वत्यै नम:।

10.क्षमा

ॐ क्षमायै नम:।

11.कान्तिः

ॐ कान्त्यै नम:।

12.प्रभा

ॐ प्रभायै नम:।

13.ज्योत्स्ना

ॐ ज्योत्स्नायै नम:।

14.पार्वती

ॐ पार्वत्यै नम:।

15.सर्वमङ्गला

ॐ सर्वमङ्गलायै नम:।

16.हिङ्गुला

ॐ हिङ्गुलायै नम:।

17.चण्डिका

ॐ चण्डिकायै नम:।

18.दान्ता

ॐ दान्तायै नम:।

19.पद्मा

ॐ पद्मायै नम:।

20.लक्ष्मी

ॐ लक्ष्म्यै नम:।

21.हरिप्रिया

ॐ हरिप्रियायै नम:।

22.त्रिपुरा

ॐ त्रिपुरायै नम:।

23.नन्दिनी

ॐ नन्दिन्यै नम:।

24.नन्दा

ॐ नन्दायै नम:।

25.सुनन्दा

ॐ सुनन्दायै नम:।

26.सुरवन्दिता

ॐ सुरवन्दितायै नम:।

27.यज्ञविद्या

ॐ यज्ञविद्यायै नम:।

28.महामाया

ॐ महामायायै नम:।

29.वेदमाता

ॐ वेदमात्रे नम:।

30.सुधा

ॐ सुधायै नम:।

31.धृतिः

ॐ धृत्यै नम:।

32.प्रीतिः

ॐ प्रीतये नम:।

33.प्रथा

ॐ प्रथायै नम:।

34.प्रसिद्धा

ॐ प्रसिद्धायै नम:।

35.मृडानी

ॐ मृडान्यै नम:।

36.विंध्यवासिनी

ॐ विन्ध्यवासिन्यै नम:।

37.सिद्धविद्या

ॐ सिद्धविद्यायै नम:।

38.महाशक्ति:

ॐ महाशक्तये नम:।

39.पृथ्वी

ॐ पृथ्व्यै नम:।

40.नारदसेविता

ॐ नारदसेवितायै नम:।

41.पुरुहुतप्रिया

ॐ पुरुहूतप्रियायै नम:।

42.

कान्ताॐ कान्तायै नम:।

43.कामिनी

ॐ कामिन्यै नम:।

44.पद्मलोचना

ॐ पद्मलोचनायै नम:।

45.प्रह्लादिनी

ॐ प्रह्लादिन्यै नम:।

46.महामाता

ॐ महामात्रे नम:।

47.दुर्गा

ॐ दुर्गायै नम:।

48.दुर्गतिनाशिनी

ॐ दुर्गतिनाशिन्यै नम:।

49.ज्वालामुखी

ॐ ज्वालामुख्यै नम:।

50.सुगोत्रा

ॐ सुगोत्रायै नम:।

51.ज्योति:

ॐ ज्योतिषे नम:।

52.कुमुदवासिनी

ॐ कुमुदवासिन्यै नम:।

53.दुर्गमा

ॐ दुर्गमायै नम:।

54.दुर्लभा

ॐ दुर्लभायै नम:।

55.विद्या

ॐ विद्यायै नम:।

56.स्वर्गति:

ॐ स्वर्गत्यै नम:।

57.पुरवासिनी

ॐ पुरवासिन्यै नम:।

58.अपर्णा

ॐ अपर्णायै नम:।

59.शाम्बरीमाया

ॐ शाम्बरीमायायै नम:।

60.मदिरा

ॐ मदिरायै नम:।

61.मृदुहासिनी

ॐ मृदुहासिन्यै नम:।

62.कुलवागीश्वरी

ॐ कुलवागीश्वर्यै नम:।

63.नित्या

ॐ नित्यायै नम:।

64.नित्यक्लिन्ना

ॐ नित्यक्लिन्नायै नम:।

65.कृशोदरी

ॐ कृशोदर्यै नम:।

66.कामेश्वरी

ॐ कामेश्वर्यै नम:।

67.नीला

ॐ नीलायै नम:।

68.भीरुण्डा

ॐ भीरुण्डायै नम:।

69वह्निवासिनी

ॐ वह्निवासिन्यै नम:।

70लम्बोदरी

ॐ लम्बोदर्यै नम:।

71.महाकाली

ॐ महाकाल्यै नम:।

72.विद्याविद्येश्वरी

ॐ विद्याविद्येश्वर्यै नम:।

73.नरेश्वरी

ॐ नरेश्वरायै नम:।

74.सत्या

ॐ सत्यायै नम:।

75.सर्वसौभाग्यवर्धिनी

ॐ सर्वसौभाग्यवर्धिन्यै नम:।

76.सङ्कर्षणी

ॐ सङ्कर्षण्यै नम:।

77.नारसिंही

ॐ नारसिंह्यै नम:।

78.वैष्णवी

ॐ वैष्णव्यै नम:।

79.महोदरी

ॐ महोदर्यै नम:।

80.कात्यायनी

ॐ कात्यायन्यै नम:।

81.चम्पा

ॐ चम्पायै नम:।

82.सर्वसम्पत्तिकारिणी

ॐ सर्वसम्पत्तिकारिण्यै नम:।

83.नारायणी

ॐ नारायण्यै नम:।

84.महानिद्रा

ॐ महानिद्रायै नम:।

85.योगनिद्रा

ॐ योगनिद्रायै नम:।

86.प्रभावती

ॐ प्रभावत्यै नम:।

87.प्रज्ञापारमिता

ॐ प्रज्ञापारमितायै नम:।

88.प्रज्ञा

ॐ प्रज्ञायै नम:।

89.तारा

ॐ तारायै नम:।

90.मधुमती

ॐ मधुमत्यै नम:।

91.मधु

ॐ मधुवे नम:।

92.क्षीरार्णवसुधाहारा

ॐ क्षीरार्णवसुधाहारायै नम:।

93.कालिका

ॐ कालिकायै नम:।

94.सिंहवाहना

ॐ सिंहवाहिन्यै नम:।

95.ओंकारा

ॐ ओंकारायै नम:।

96.वसुधाकारा

ॐ वसुधाकारायै नम:।

97.चेतना

ॐ चेतनायै नम:।

98.कोपनाकृति:

ॐ कोपनाकृत्यै नम:।

99.अर्धबिन्दुधरा

ॐ अर्धबिन्दुधरायै नम:।

100.धारा

ॐ धारायै नम:।

101.विश्वमाता

ॐ विश्वमात्रे नम:।

102.कलावती

ॐ कलावत्यै नम:।

103.पद्मावती

ॐ पद्मावत्यै नम:।

104.सुवस्त्रा

ॐ सुवस्त्रायै नम:।

105.प्रबुद्धा

ॐ प्रबुद्धायै नम:।

106.सरस्वती

ॐ सरस्वत्यै नम:।

107.कुण्डासना

ॐ कुण्डासनायै नम:।

108.जगद्धात्री

ॐ जगद्धात्र्यै नम:।

109.बुद्धमाता

ॐ बुद्धमात्रे नम:।

110.जिनेश्वरी

ॐ जिनेश्वर्यै नम:।

111.जिनमता

ॐ जिनमात्रे नम:।

112.जिनेन्द्रा

ॐ जिनेन्द्रायै नम:।

113.शारदा

ॐ शारदायै नम:।

114.हंसवाहना

ॐ हंसवाहनायै नम:।

115.राज्यलक्ष्मी

ॐ राज्यलक्ष्म्यै नम:।

116.वषट्कारा

ॐ वषट्कारायै नम:।

117.सुधाकारा

ॐ सुधाकारायै नम:।

118.सुधात्मिका

ॐ सुधात्मिकायै नम:।

119.राजनीति:

ॐ राजनीतये नम:।

120.त्रयी

ॐ त्रय्यै नम:।

121.वार्ता

ॐ वार्तायै नम:।

122.दण्डनीति:

ॐ दण्डनीतये नम:।

123.क्रियावती

ॐ कियावत्यै नम:।

124.सद्भूति:

ॐ सद्भूत्यै नम:।

125.तारिणी

ॐ तारिण्यै नम:।

126.श्रद्धा

ॐ श्रद्धायै नम:।

127.सद्गति:

ॐ सद्गतये नम:।

128.सत्परायणा

ॐ सत्परायणायै नम:।

129.सिन्धुः

ॐ सिन्धवे नम:।

130.मन्दाकिनी

ॐ मन्दाकिन्यै नम:।

131.गङ्गा

ॐ गङ्गायै नम:।

132.यमुना

ॐ यमुनायै नम:।

133.सरस्वती

ॐ सरस्वत्यै नम:।

134.गोदावरी

ॐ गोदावर्यै नम:।

135.विपाशा

ॐ विपाशायै नम:।

136.कावेरी

ॐ कावेर्यै नम:।

137.शतद्रुका

ॐ शतहन्दायै नम:।

138.सरयूः।

ॐ सरय्वै नम:।

139.चन्द्रभागा

ॐ चन्द्रभागायै नम:।

140.कौशिकी

ॐ कौशिक्यै नम:।

141.गण्डकी

ॐ गण्डक्यै नम:।

142.शुचिः

ॐ शुचये नम:।

143.नर्मदा

ॐ नर्मदायै नम:।

144.कर्मनाशा

ॐ कर्मनाशाय नम:।

145.चर्मण्वती

ॐ चर्मण्वत्यै नम:।

146.देविका

ॐ देविकायै नम:।

147.वेत्रवती

ॐ वेत्रवत्यै नम:।

148.वितस्ता

ॐ वितस्तायै नम:।

149.वरदा

ॐ वरदायै नम:।

150.नरवाहना

ॐ नरवाहनायै नम:।

151.सती

ॐ सत्यै नम:।

152.पतिव्रता

ॐ पतिव्रतायै नम:।

153.साध्वी

ॐ साध्व्यै नम:।

154.सुचक्षुः

ॐ सुचक्षुषे नम:।

155.कुण्डवासिनी

ॐ कुण्डवासिन्यै नम:।

156.एकचक्षुः

ॐ एकचक्षुषे नम:।

157.सहस्राक्षी

ॐ सहस्राक्ष्यै नम:।

158.सुश्रोणिः

ॐ सुश्रोण्यै नम:।

159.भगमालिनी

ॐ भगमालिन्यै नम:।

160.सेना

ॐ सेना नम:।

161.श्रेणिः

ॐ श्रोण्यै नम:।

162.पताका

ॐ पताकायै नम:।

163.सुव्यूहा

ॐ सुव्यूहायै नम:।

164.युद्धकान्क्षिणी

ॐ युद्धकान्क्षिण्यै नम:।

165.पताकिनी

ॐ पताकिन्यै नम:।

166.दयारम्भा

ॐ दयारम्भायै नम:।

167.विपञ्चीपञ्चमप्रिया

ॐ विपञ्चीपञ्चमप्रियायै नम:।

168.परापरकलाकान्ता

ॐ परापरकलाकान्तायै नम:।

169.त्रिशक्ति:

ॐ त्रिशक्तये नम:।

170.मोक्षदायिनी

ॐ मोक्षदायिन्यै नम:।

171.ऐन्द्री

ॐ ऐन्द्रयै नम:।

172.माहेश्वरी

ॐ माहेश्वर्यै नम:।

173.ब्राह्मी

ॐ ब्राह्मयै नम:।

174.कौमारी

ॐ कौमार्यै नम:।

175.कुलवासिनी

ॐ कुलवासिन्यै नम:।

176.इच्छा

ॐ इच्छायै नम:।

177.भगवती

ॐ भगवत्यै नम:।

178.शक्ति:

ॐ शक्तये नम:।

179.कामधेनुः

ॐ कामधेनवे नम:।

180.कृपावति

ॐ कृपावत्यै नम:।

181.वज्रायुधा

ॐ वज्रायुधायै नम:।

182.वज्रहस्ता

ॐ वज्रहस्तायै नम:।

183.चण्डी

ॐ चण्ड्यै नम:।

184.चण्डपराक्रमा

ॐ चण्डपराक्रमायै नम:।

185.गौरी

ॐ गौर्यै नम:।

186.सुवर्णवर्णा

ॐ सुवर्णवर्णायै नम:।

187.स्थितिसंहारकारिणी

ॐ स्थितिसंहारकारिण्यै नम:।

188. एका 

ॐ एकायै नम:।

189.अनेका

ॐ अनेकायै नम:।

190.महेज्या

ॐ महेज्यायै नम:।

191.शतबाहुः

ॐ शतबाहवे नम:।

192.महाभुजा

ॐ महाभुजायै नम:।

193.भुजङ्गभूषणा

ॐ भुजङ्गभूषणायै नम:।

194.भूषा

ॐ भूषायै नम:।

195.षट्चक्रक्रमवासिनी

ॐ षट्चक्रक्रमवासिन्यै नम:।

196.षट्चक्रभेदिनी

ॐ षट्चक्रभेदिन्यै नम:।

197.श्यामा

ॐ श्यामायै नम:।

198.कायस्था

ॐ कायस्थायै नम:।

199.कायवर्जिता

ॐ कायवर्जितायै नम:।

200.सुस्मिता

ॐ सुस्मितायै नम:।

201.सुमुखी

ॐ सुमुख्यै नम:।

202.क्षामा

ॐ क्षामायै नम:।

203.मूलप्रकृति:

ॐ मूलप्रकृत्यै नम:।

204.ईश्वरी

ॐ ईश्वर्यै नम:।

205.अजा

ॐ अजायै नम:।

206.बहुवर्णा

ॐ बहुवर्णायै नम:।

207.पुरुषार्थप्रवर्तिनी

ॐ पुरुषार्थप्रवर्तिन्यै नम:।

208.रक्ता

ॐ रक्तायै नम:।

209.नीला

ॐ नीलायै नम:।

210.सिता

ॐ सितायै नम:।

211.श्यामा

ॐ श्यामायै नम:।

212.कृष्णा

ॐ कृष्णायै नम:।

213.पीता

ॐ पीतायै नम:।

214.कर्बुरा

ॐ कर्बुरायै नम:।

215.क्षुधा

ॐ क्षुधायै नम:।

216.तृष्णा

ॐ तृष्णायै नम:।

217.जरवृद्धा

ॐ जरावृद्धायै नम:।

218.तरुणी

ॐ तरुण्यै नम:।

219.करुणालया

ॐ करुणालयायै नम:।

220.कला

ॐ कलायै नम:।

221.काष्टा

ॐ काष्ठायै नम:।

222.मुहूर्ता

ॐ मुहूर्तायै नम:।

223.निमेषा

ॐ निमिषायै नम:।

224.कालरूपिणी

ॐ कालरूपिण्यै नम:।

225.सुकर्णरसना

ॐ सुकर्णरसनायै नम:।

226.नासा

ॐ नासायै नम:।

227.चक्षु:

ॐ चक्षुषे नम:।

228.स्पर्शवती

ॐ स्पर्शवत्यै नम:।

229.रसा

ॐ रसायै नम:।

230.गन्धप्रिया

ॐ गन्धप्रियायै नम:।

231.सुगन्धा

ॐ सुगन्धायै नम:।

232.सुस्पर्शा

ॐ सुस्पर्शायै नम:।

233.मनोगति:

ॐ मनोगतये नम:।

234.मृगनाभि:

ॐ मृगनाभये नम:।

235.मृगाक्षी

ॐ मृगाक्ष्यै नम:।

236.कर्पूरामोदधारिणी

ॐ कर्पूरामोदधारिण्यै नम:।

237.पद्मयोनि:

ॐ पद्मयोनये नम:।

238.सुकेशी

ॐ सुकेश्यै नम:।

239.सुलिङ्गा

ॐ सुलिङ्गायै नम:।

240.भगरूपिणि

ॐ भगरूपिण्यै नम:।

241.योनिमुद्रा

ॐ योनिमुद्रायै नम:।

242.महामुद्रा

ॐ महामुद्रायै नम:।

243.खेचरी

ॐ खेचर्यै नम:।

244.खगगामिनी

ॐ खगगामिन्यै नम:।

245.मधुश्री

ॐ मधुश्रियै नम:।

246.माधवीवल्ली

ॐ माधवीवल्लयै नम:।

247.मधुमत्ता

ॐ मधुमत्तायै नम:।

248.मदोद्धता

ॐ मदोद्धतायै नम:।

249.मातङ्गी

ॐ मातङ्ग्यै नम:।

250.शुकहस्ता

ॐ शुकहस्तायै नम:।

251.पुष्पबाणा

ॐ पुष्पबाणायै नम:।

252.इक्षुचापिनी

ॐ इक्षुचापिन्यै नम:।

253.रक्ताम्बरधरा

ॐ रक्ताम्बरधरायै नम:।

254.क्षीवा

ॐ क्षीवायै नम:।

255.रक्तपुष्पावतंसिनी

ॐ रक्तपुष्पावतंसिन्यै नम:।

256.शुभ्राम्बरधरा

ॐ शुभ्राम्बरधरायै नम:।

257.धीरा

ॐ धीरायै नम:।

258.महाश्वेता

ॐ महाश्वेतायै नम:।

259.वसुप्रिया

ॐ वसुप्रियायै नम:।

260.सुवेणिः

ॐ सुवेणये नम:।

261.पद्महस्ता

ॐ पद्महस्तायै नम:।

262.मुक्ताहारविभूषणा

ॐ मुक्ताहारविभूषणायै नम:।

263.कर्पूरामोदनि:श्वासा

ॐ कर्पूरामोदनि:श्वासायै नम:।

264.पद्मिनी

ॐ पद्मिन्यै नम:।

265.पद्ममन्दिरा

ॐ पद्ममन्दिरायै नम:।

266.खड्गिनी

ॐ खड्गिन्यै नम:।

267.चक्रहस्ता

ॐ चक्रहस्तायै नम:।

268.भुसुण्डी

ॐ भुसुण्ड्यै नम:।

269.परिघायुधा

ॐ परिघायुधायै नम:।

270.चापिनी

ॐ चापिन्यै नम:।

271.पाशहस्ता

ॐ पाशहस्तायै नम:।

272.त्रिशुलवरधारिणी

ॐ त्रिशूलवरधारिण्यै नम:।

273.सुबाणा

ॐ सुबाणायै नम:।

274.शक्तिहस्ता

ॐ शक्तिहस्तायै नम:।

275.मयूरवरवाहना

ॐ मयूरवरवाहनायै नम:।

276.वरायुधधरा

ॐ वरायुधधरायै नम:।

277.वीरा

ॐ वीरायै नम:।

278.वीरपानमदोत्कटा

ॐ वीरपानमदोत्कटायै नम:।

279.वसुधा

ॐ वसुधायै नम:।

280.वसुधारा

ॐ वसुधारायै नम:।।

281.जया

ॐ जयायै नम:।

282.शाकम्भरी

ॐ शाकम्भर्यै नम:।

283.शिवा

ॐ शिवायै नम:।

284.विजया

ॐ विजयायै नम:।

285.जयन्ती

ॐ जयन्त्यै नम:।

286.सुस्तनी

ॐ सुस्तन्यै नम:।

287.शत्रुनाशिनी

ॐ शत्रुनाशिन्यै नम:।

288.अन्तर्वत्नी

ॐ अन्तर्वत्न्यै नम:।

289.वेदशक्ति:

ॐ वेदशक्तये नम:।

290.वरदा

ॐ वरदायै नम:।

291.वरधारिणी

ॐ वरधारिण्यै नम:।

292.शीतला

ॐ शीतलायै नम:।

293.सुशीला

ॐ सुशीलायै नम:।

294.बालग्रहविनाशिनी

ॐ बालग्रहविनाशिन्यै नम:।

295.कुमारी

ॐ कुमार्यै नम:।

296.सुपर्वा

ॐ सुपर्वायै नम:।

297.कामाख्या

ॐ कामाख्यायै नम:।

298.कामवन्दिता

ॐ कामवन्दितायै नम:।

299.जालन्धरधरा

ॐ जालन्धरधरायै नम:।

300.अनन्ता

ॐ अनन्तायै नम:।

301.

कामरूपनिवासिनी

ॐ कामरूपनिवासिन्यै नम:।

302.

कामबीजवती

ॐ कामबीजवत्यै नम:।

303.

सत्या

ॐ सत्यायै नम:।

304.

सत्यधर्मपरायणा

ॐ सत्यधर्मपरायणायै नम:।

305.

स्थूलमार्गस्थिता

ॐ स्थूलमार्गस्थितायै नम:।

306.

सूक्ष्मा

ॐ सूक्ष्मायै नम:।

307.

सूक्ष्मबुद्धिप्रबोधिनी

ॐ सूक्ष्मबुद्धिप्रबोधिन्यै नम:।

308.

षट्कोणा

ॐ षट्कोणायै नम:।

309.

त्रिकोणा

ॐ त्रिकोणायै नम:।

310.

त्रिनेत्रा

ॐ त्रिनेत्रायै नम:।

311.

त्रिपुरसुन्दरी

ॐ त्रिपुरसुन्दर्यै नम:।

312.

वृषप्रिया

ॐ वृषप्रियायै नम:।

313.

वृषारूढा

ॐ वृषारूढायै नम:।

314.

महिषासुरघातिनी

ॐ महिषासुरघातिन्यै नम:।

315.

शुम्भदर्पहरा

ॐ शुम्भदर्पहरायै नम:।

316.

दीप्ता

ॐ दीप्तायै नम:।

317.

दीप्तपावकसन्निभा

ॐ दीप्तपावकसन्निभायै नम:।

318.

कपालभूषणा

ॐ कपालभूषणायै नम:।

319.

काली

ॐ काल्यै नम:।

320.

कपालमाल्यधारिणी

ॐ कपालमाल्यधारिण्यै नम:।

321.

कपालकुण्डला

ॐ कपालकुण्डलायै नम:।

322.

दीर्घा

ॐ दीर्घायै नम:।

323.

शिवा दूती

ॐ शिवदूत्यै नम:।

324.

घनध्वनि:

ॐ घनध्वनये नम:।

325.

सिद्धिदा

ॐ सिद्धिदायै नम:।

326.

बुद्धिदा

ॐ बुद्धिदायै नम:।

327.

नित्या

ॐ नित्यायै नम:।

328.

सत्यमार्गप्रबोधिनी

ॐ सत्यमार्गप्रबोधिन्यै नम:।

329.

कम्बुग्रीवा

ॐ कम्बुग्रीवायै नम:।

330.

वसुमती

ॐ वसुमत्यै नम:।

331.

छत्रच्छायाकृतालया

ॐ छत्रच्छायाकृतालयायै नम:।

332.

जगद्गर्भा

ॐ जगद्गर्भायै नम:।

333.

कुण्डलिनी

ॐ कुण्डलिन्यै नम:।

334.

भुजगाकारशायनी

ॐ भुजगाकारशायिन्यै नम:।

335.

प्रोल्लसत्सप्तपद्मा

ॐ प्रोल्लसत्सप्तपद्मायै नम:।

336.

नाभिनालमृणालिनी

ॐ नाभिनालमृणालिन्यै नम:।

337.

मूलाधारा

ॐ मूलाधारायै नम:।

338.

निराकारा

ॐ निराकारायै नम:।

339.

वह्रिकुण्डकृतालया

ॐ वह्रिकुण्डकृतालयायै नम:।

340.

वायुकुण्डसुखासीना

ॐ वायुकुण्डसुखासीनायै नम:।

341.

निराधारा

ॐ निराधारायै नम:।

342.

निराश्रया

ॐ निराश्रयायै नम:।

343.

श्वासोच्छ्वासगति:

ॐ श्वासोच्छ्वासगत्यै नम:।

344.

जीवा

ॐ जीवायै नम:।

345.

ग्रहिणी

ॐ ग्राहिण्यै नम:।

346.

वह्निसंश्रया

ॐ वह्निसंश्रयायै नम:।

347.

वह्नितन्तुसमुत्थाना

ॐ वह्नितन्तुसमुत्थानायै नम:।

348.

षड्रसास्वादलोलुपा

ॐ षड्रसास्वादलोलुपायै नम:।

349.

तपस्विनी

ॐ तपस्विन्यै नम:।

350.

तप: सिद्धि:

ॐ तप:सिद्धये नम:।

351.

तापसी

ॐ तापस्यै नम:।

352.

तप: प्रिया

ॐ तप:प्रियायै नम:।

353.

तपोनिष्ठा

ॐ तपोनिष्ठायै नम:।

354.

तपोयुक्ता

ॐ तपोयुक्तायै नम:।

355.

तपस:सिद्धिदायिनी

ॐ तपस: सिद्धिदायिन्यै नम:।

356.

सप्तधातुमयी मूर्ति:

ॐ सप्तधातुमयीमूर्तये नम:।

357.

सप्तधात्वन्तराश्रया

ॐ सप्तधात्वन्तराश्रयायै नम:।

358.

देहपुष्टि:

ॐ देहपुष्टये नम:।

359.

मनस्तुष्टि:

ॐ मन: तुष्टये नम:।

360.

अन्नपुष्टि:

ॐ अन्नपुष्टये नम:।

361.

बलोद्धता

ॐ बलोद्धतायै नम:।

362.

ओषधिः

ॐ ओषधये नम:।

363.

वैद्यमाता

ॐ वैद्यमात्रे नम:।

364.

द्रव्यशाक्ति:

ॐ द्रव्यशक्तये नम:।

365.

प्रभाविनी

ॐ प्रभाविन्यै नम:।

366.

वैद्या

ॐ वैद्यायै नम:।

367.

वैद्यचिकित्सा

ॐ वैद्यचिकित्सायै नम:।

368.

सुपथ्या

ॐ सुपथ्यायै नम:।

369.

रोगनाशिनी

ॐ रोगनाशिन्यै नम:।

370.

मृगया

ॐ मृगयायै नम:।

371.

मृगमांसादा

ॐ मृगमांसादायै नम:।

372.

मृगत्वक्

ॐ मृगत्वचे नम:।

373.

मृगलोचना

ॐ मृगलोचनायै नम:।

374.

वागुरा

ॐ वागुरायै नम:।

375.

बन्धरूपा

ॐ बन्धरूपायै नम:।

376.

वधरूपा

ॐ वधरूपायै नम:।

377.

वधोद्धता

ॐ वधोद्धतायै नम:।

378.

बन्दी

ॐ बन्द्यै नम:।

379.

वन्दिस्तुताकारा

ॐ वन्दिस्तुताकारायै नम:।

380.

काराबन्धविमोचनी

ॐ काराबन्धविमोचन्यै नम:।

381.

शृङ्खला

ॐ शृङ्खलायै नम:।

382.

खलहा

ॐ खलहायै नम:।

383.

विद्युत

ॐ विद्युते नम:।

384.

दृढबन्धविमोचनी

ॐ दृढबन्धविमोचन्यै नम:।

385.

अम्बिका

ॐ अम्बिकायै नम:।

386.

अम्बालिका

ॐ अम्बालिकायै नम:।

387.

अम्बा

ॐ अम्बायै नम:।

388.

स्वक्षा

ॐ स्वक्षायै नम:।

389.

साधुजनार्चिता

ॐ साधुजनार्चितायै नम:।

390.

कौलिकी

ॐ कौलिक्यै नम:।

391.

कुलविद्या

ॐ कुलविद्यायै नम:।

392.

सुकुला

ॐ सुकुलायै नम:।

393.

कुलपूजिता

ॐ कुलपूजितायै नम:।

394.

कालचक्रभ्रमा

ॐ कालचक्रभ्रमायै नम:।

395.

भ्रान्ता

ॐ भ्रान्तायै नम:।

396.

विभ्रमा

ॐ विभ्रमायै नम:।

397.

भ्रमनाशिनी

ॐ भ्रमनाशिन्यै नम:।

398.

वात्याली

ॐ वात्याल्यै नम:।

399.

मेघमाला

ॐ मेघमालायै नम:।

400.

सुवृष्टि:

ॐ सुवृष्ट्यै नम:। 

401.

सस्यवर्धिनी

ॐ सस्यवर्धिन्यै नम:।

402.

अकारा

ॐ अकारायै नम:।

403.

इकारा

ॐ इकारायै नम:।

404.

उकारा

ॐ उकारायै नम:।

405.

ऐकाररूपिणी

ॐ ऐकाररूपिण्यै नम:।

406.

ह्रींकारी

ॐ ह्रींकार्यै नम:।

407.

बीजरूपा

ॐ बीजरूपायै नम:।

408.

क्लींकारा

ॐ क्लींकारायै नम:।

409.

अम्बरवासिनी

ॐ अम्बरवासिन्यै नम:।

410.

सर्वाक्षरमयी शक्ति:

ॐ सर्वाक्षरमयीशक्तये नम:।

411.

अक्षरा

ॐ अक्षरायै नम:।

412.

वर्णमालिनी

ॐ वर्णमालिन्यै नम:।

413.

सिन्दूरारुणवक्त्रा

ॐ सिन्दूरारुणवक्त्रायै नम:।

414.

सिन्दूरतिलकप्रिया

ॐ सिन्दूरतिलकप्रियायै नम:।

415.

वश्या

ॐ वश्यायै नम:।

416.

वश्यबीजा

ॐ वश्यबीजायै नम:।

417.

लोकवश्यविभाविनी

ॐ लोकवश्यविभाविन्यै नम:।

418.

नृपवश्या

ॐ नृपवश्यायै नम:।

419.

नृपै: सेव्या

ॐ नृपै:सेव्यायै नम:।

420.

नृपवश्यकरी

ॐ नृपवश्यकर्यै नम:।

421.

प्रिया

ॐ प्रियायै नम:।

422.

महिषी

ॐ महिष्यै नम:।

423.

नृपमान्या

ॐ नृपमान्यायै नम:।

424.

नृमान्या

ॐ नृमान्यायै नम:।

425.

नृपनन्दिनी

ॐ नृपनन्दिन्यै नम:।

426.

नृपधर्ममयी

ॐ नृपधर्ममय्यै नम:।

427.

धन्या

ॐ धन्यायै नम:।

428.

धनधान्यविवर्धिनी

ॐ धनधान्यविवर्धिन्यै नम:।

429.

चतुर्वर्णमयी मूर्ति:

ॐ चतुर्वर्णमयीमूर्तये नम:।

430.

चतुर्वर्णैश्च पूजिता

ॐ चतुर्वर्णैः सुपूजितायै नम:।

431.

सर्वधर्ममयी सिद्धि:

ॐ सर्वधर्ममयीसिद्धये नम:।

432.

चतुराश्रमवासिनी

ॐ चतुराश्रमवासिन्यै नम:।

433.

ब्राह्मणी

ॐ ब्राह्मण्यै नम:।

434.

क्षत्रिया

ॐ क्षत्रियायै नम:।

435.

वैश्या

ॐ वैश्यायै नम:।

436.

शूद्रा

ॐ शूद्रायै नम:।

437.

अवरवर्णजा

ॐ अवरवर्णजायै नम:।

438.

वेदमार्गरता

ॐ वेदमार्गरतायै नम:।

439.

यज्ञा

ॐ यज्ञायै नम:।

440.

वेदविश्वविभाविनी

ॐ वेदविश्वविभाविन्यै नम:।

441.अस्त्रशस्त्रमयी विद्या

ॐ अस्त्रशस्त्रमयीविद्यायै नम:।

442.वरशस्त्रास्त्रधारिणी

ॐ वरशस्त्रास्त्रधारिण्यै नम:।

443.सुमेधा

ॐ सुमेधायै नम:।

444.सत्यमेधा

ॐ सत्यमेधायै नम:।

445.भद्रकाली

ॐ भद्रकाल्यै नम:।

446.अपराजिता

ॐ अपराजितायै नम:।

447.गायत्री

ॐ गायत्र्यै नम:।

448.सत्कृति:

ॐ सत्कृतये नम:।

449.सन्ध्या

ॐ सन्ध्यायै नम:।

450.सावित्री

ॐ सावित्र्यै नम:।

451.त्रिपदाश्रया

ॐ त्रिपदाश्रयायै नम:।

452.त्रिसन्ध्या

ॐ त्रिसन्ध्यायै नम:।

453.त्रिपदी

ॐ त्रिपद्यै नम:।

454.धात्री

ॐ धात्र्यै नम:।

455.सुपर्वा

ॐ सुपर्वायै नम:।

456.सामगायनी

ॐ सामगायन्यै नम:।

457.पाञ्चाली

ॐ पाञ्चाल्यै नम:।

458.बालिका

ॐ बालिकायै नम:।

459.बाला

ॐ बालायै नम:।

460.बालक्रीडा

ॐ बालक्रीडायै नम:।

461.सनातनी

ॐ सनातन्यै नम:।

462.ग्रर्भाधारधरा

ॐ ग्रर्भाधारधरायै नम:।

463.शून्या

ॐ शून्यायै नम:।

464.गर्भाशयनिवासिनी

ॐ गर्भाशयनिवासिन्यै नम:।

465.सुरारिघातिनी कृत्या

ॐ सुरारिघातिनीकृत्यायै नम:।

466.पूतना

ॐ पूतनायै नम:।

467.तिलोत्तमा

ॐ तिलोत्तमायै नम:।

468.लज्जा

ॐ लज्जायै नम:।

469.रसवती

ॐ रसवत्यै नम:।

470.नन्दा

ॐ नन्दायै नम:।

471.भवानी

ॐ भवान्यै नम:।

472.पापनाशिनी

ॐ पापनाशिन्यै नम:।

473.पट्टाम्बरधरा

ॐ पट्टाम्बरधरायै नम:।

474.गीति:

ॐ गीतये नम:।

475.सुगीति:

ॐ सुगीतये नम:।

476.ज्ञानलोचना

ॐ ज्ञानलोचनायै नम:।

477.सप्तस्वरमयी तन्त्री

ॐ सप्तस्वरमयीतन्त्र्यै नम:।

478.षड्जमध्यमधैवता

ॐ षड्जमध्यमधैवतायै नम:।

479.मूर्च्छनाग्रामसंस्थाना

ॐ मूर्च्छनाग्रामसंस्थानायै नम:।

480.स्वस्था

ॐ स्वस्थायै नम:।

481.स्वस्थानवासिनी

ॐ स्वस्थानवासिन्यै नम:।

482.अट्टाटहासिनी

ॐ अट्टाटहासिन्यै नम:।

483.प्रेता

ॐ प्रेतायै नम:।

484.प्रेतासननिवासिनी

ॐ प्रेतासननिवासिन्यै नम:।

485.गीतनृत्यप्रिया

ॐ गीतनृत्यप्रियायै नम:।

486.अकामा

ॐ अकामायै नम:।

487.तुष्टिदा

ॐ तुष्टिदायै नम:।

488.पुष्टिदा

ॐ पुष्टिदायै नम:।

489.अक्षया

ॐ अक्षयायै नम:।

490.निष्ठा

ॐ निष्ठायै नम:।

491.सत्यप्रिया

ॐ सत्यप्रियायै नम:।

492.प्राज्ञा

ॐ प्राज्ञायै नम:।

493.लोकेशी

ॐ लोकेश्यै नम:।

494.सुरोत्तमा

ॐ सुरोत्तमायै नम:।

495.सविषा

ॐ सविषायै नम:।

496.ज्वालिनी

ॐ ज्वालिन्यै नम:।

497.ज्वाला

ॐ ज्वालायै नम:।

498.विषमोहार्तिनाशिनी

ॐ विषमोहार्तिनाशिन्यै नम:।

499.विषारिः

ॐ विषारये नम:।

500.नागदमनी

ॐ नागदमन्यै नम:।

501.कुरुकुल्ला

ॐ कुरुकुल्लायै नम:।

502.अमृतोद्भवा

ॐ अमृतोद्भवायै नम:।

503.भूतभीतिहरा रक्षा

ॐ भूतभीतिहरारक्षायै नम:।

504.भूतावेशविनाशिनी

ॐ भूतावेशविनाशिन्यै नम:।

505.रक्षोघ्नी

ॐ रक्षोघ्न्यै नम:।

506.राक्षसी

ॐ राक्षस्यै नम:।

507.रात्रि:

ॐ रात्रये नम:।

508.दीर्घनिद्रा

ॐ दीर्घनिद्रायै नम:।

509.दिवागति:

ॐ दिवागतये नम:।

510.चन्द्रिका

ॐ चन्द्रिकायै नम:।

511.चन्द्रकान्ति:

ॐ चन्द्रकान्तये नम:।

512.सूर्यकान्ति:

ॐ सूर्यकान्तये नम:।

513.निशाचरी

ॐ निशाचर्यै नम:।

514.डाकिनी

ॐ डाकिन्यै नम:।

515.शाकिनी

ॐ शाकिन्यै नम:।

516.शिष्या

ॐ शिष्यायै नम:।

517.हाकिनी

ॐ हाकिन्यै नम:।

518.चक्रवाकिनी

ॐ चक्रवाकिन्यै नम:।

519.सितासितप्रिया

ॐ सितासितप्रियायै नम:।

520.स्वङ्गा

ॐ स्वङ्गायै नम:।

521.सकला

ॐ सकलायै नम:।

522.वनदेवता

ॐ वनदेवतायै नम:।

523.गुरुरूपधरा

ॐ गुरुरूपधरायै नम:।

524.गुर्वी

ॐ गुर्व्यै नम:।

525.मृत्यु:

ॐ मृत्यवे नम:।

526.मारी

ॐ मार्यै नम:।

527.विशारदा

ॐ विशारदायै नम:।

528.महामारी

ॐ महामार्यै नम:।

529.विनिद्रा

ॐ विनिद्रायै नम:।

530.तन्द्रा

ॐ तन्द्रायै नम:।

531.मृत्युविनाशिनी

ॐ मृत्युविनाशिन्यै नम:।

532.चन्द्रमण्डलसङ्काशा

ॐ चन्द्रमण्डलसङ्काशायै नम:।

533.चन्द्रमण्डलवासिनी

ॐ चन्द्रमण्डलवासिन्यै नम:।

534.अणिमादिगुणोपेता

ॐ अणिमादिगुणोपेतायै नम:।

535.सुस्पृहा

ॐ सुस्पृहायै नम:।

536.कामरूपिणी

ॐ कामरूपिण्यै नम:।

537.अष्टसिद्धिप्रदा

ॐ अष्टसिद्धिप्रदायै नम:।

538.प्रौढा

ॐ प्रौढायै नम:।

539.दुष्टदानवघातिनी

ॐ दुष्टदानवघातिन्यै नम:।

540.अनादिनिधना पुष्टि:

ॐ अनादिनिधनापुष्टये नम:।

541.चतुर्बाहु:

ॐ चतुर्बाहवे नम:।

542.चतुर्मुखी

ॐ चतुर्मुख्यै नम:।

543.चतु:समुद्रशयना

ॐ चतु:समुद्रशयनायै नम:।

544.चतुर्वर्गफलप्रदा

ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै नम:।

545.काशपुष्पप्रतीकाशा

ॐ काशपुष्पप्रतीकाशायै नम:।

546.शरत्कुमुदलोचना

ॐ शरत्कुमुदलोचनायै नम:।

547.भूता

ॐ भूतायै नम:।

548.भव्या

ॐ भव्यायै नम:।

549.भविष्या

ॐ भविष्यायै नम:।

550.शैलजा

ॐ शैलजायै नम:।

551.शैलवासिनी

ॐ शैलवासिन्यै नम:।

552.वाममार्गरता

ॐ वाममार्गरतायै नम:।

553.वामा

ॐ वामायै नम:।

554.शिववामाङ्गवासिनी

ॐ शिववामाङ्गवासिन्यै नम:।

555.वामाचारप्रिया

ॐ वामाचारप्रियायै नम:।

556.तुष्टा

ॐ तुष्टायै नम:।

557.लोपामुद्रा

ॐ लोपामुद्रायै नम:।

558.प्रबोधिनी

ॐ प्रबोधिन्यै नम:।

559.भूतात्मा

ॐ भूतात्मने नम:।

560.परमात्मा

ॐ परमात्मने नम:।

561.भूतभाविविभाविनी

ॐ भूतभाविविभाविन्यै नम:।

562.मङ्गला

ॐ मङ्गलायै नम:।

563.सुशीला

ॐ सुशीलायै नम:।

564.परमार्थप्रबोधिनी

ॐ परमार्थप्रबोधिन्यै नम:।

565.दक्षिणा

ॐ दक्षिणायै नम:।

566.दक्षिणामूर्ति:

ॐ दक्षिणामूर्तये नम:।

567.सुदक्षिणा

ॐ सुदक्षिणायै नम:।

568.हरिप्रिया

ॐ हरिप्रियायै नम:।

569.योगिनी

ॐ योगिन्यै नम:।

570.योगयुक्ता

ॐ योगयुक्तायै नम:।

571.योगाङ्गा

ॐ योगाङ्गायै नम:।

572.ध्यानशालिनी

ॐ ध्यानशालिन्यै नम:।

573.योगपट्टधरा

ॐ योगपट्टधरायै नम:।

574.मुक्ता

ॐ मुक्तायै नम:।

575.मुक्तानांपरमागति:

ॐ मुक्तानांपरमागतये नम:।

576.नारसिंही

ॐ नारसिंह्यै नम:।

577.सुजन्मा

ॐ सुजन्मायै नम:।

578.त्रिवर्गफलदायिनी

ॐ त्रिवर्गफलदायिन्यै नम:।

579.धर्मदा

ॐ धर्मदायै नम:।

580.धनदा

ॐ धनदायै नम:।

581.कामदा

ॐ कामदायै नम:।

582.मोक्षदा

ॐ मोक्षदायै नम:।

583.द्युति:

ॐ द्युतये नम:।

584.साक्षिणी

ॐ साक्षिण्यै नम:।

585.क्षणदा

ॐ क्षणदायै नम:।

586.दक्षा

ॐ दक्षायै नम:।

587.दक्षजा

ॐ दक्षजायै नम:।

588.कोटिरूपिणी

ॐ कोटिरूपिण्यै नम:।

589.क्रतु:

ॐ क्रतवे नम:।

590.कात्यायनी

ॐ कात्यायन्यै नम:।

591.स्वछा

ॐ स्वछायै नम:।

592.स्वच्छन्दा

ॐ स्वच्छन्दायै नम:।

593.कविप्रिया

ॐ कविप्रियायै नम:।

594.सत्यागमा

ॐ सत्यागमायै नम:।

595.बहि:स्था

ॐ बहि:स्थायै नम:।

596.काव्यशक्ति:

ॐ काव्यशक्तये नम:।

597.कवित्वदा

ॐ कवित्वदायै नम:।

598.मेनापुत्री

ॐ मेनापुत्र्यै नम:।

599.सतीमाता

ॐ सतीमात्रे नम:।

600.मैनाकभगिनी

ॐ मैनाकभगिन्यै नम:।

601.तडित्

ॐ तडिते नम:।

602.सौदामिनी

ॐ सौदामिन्यै नम:।

603.स्वधामा

ॐ स्वधामायै नम:।

604.सुधामा

ॐ सुधामायै नम:।

605.धामशालिनी

ॐ धामशालिन्यै नम:।

606.सौभाग्यदायिनी

ॐ सौभाग्यदायिन्यै नम:।

607.द्यौ:

ॐ दिवे नम:।

608.सुभगा

ॐ सुभगायै नम:।

609.द्युतिवर्धिनी

ॐ द्युतिवर्धिन्यै नम:।

610.श्रीः

ॐ श्रिये नम:।

611.कृत्तिवसना

ॐ कृत्तिवसनायै नम:।

612.कङ्काली

ॐ कङ्काल्यै नम:।

613.कलिनाशिनी

ॐ कलिनाशिन्यै नम:।

614.रक्तबीजवधोद्दृप्ता

ॐ रक्तबीजवधोद्दृप्तायै नम:।

615.सुतन्तु:

ॐ सुतन्तवे नम:।

616.बीजसन्तति:

ॐ बीजसन्ततये नम:।

617.जगज्जीवा

ॐ जगज्जीवायै नम:।

618.जगद्बीजा

ॐ जगद्बीजायै नम:।

619.जगत्त्रयहितैषिणी

ॐ जगत्त्रयहितैषिण्यै नम:।

620.चामीकररुचिः

ॐ चामीकररुचये नम:।

621.चान्द्रीसाक्षयाषोडशीकला

ॐ चान्द्रीसाक्षयाषोडशीकलायै नम:।

622.यत्तत्पदानुबन्धा

ॐ यत्तत्पदानुबन्धायै नम:।

623.यक्षिणी

ॐ यक्षिण्यै नम:।

624.धनदार्चिता

ॐ धनदार्चितायै नम:।

625.चित्रिणी

ॐ चित्रिण्यै नम:।

626.चित्रमाया

ॐ चित्रमायायै नम:।

627.विचित्रा

ॐ विचित्रायै नम:।

628.भुवनेश्वरी

ॐ भुवनेश्वर्यै नम:।

629.चामुण्डा

ॐ चामुण्डायै नम:।

630.मुण्डहस्ता

ॐ मुण्डहस्तायै नम:।

631.चण्डमुण्डवधोद्धुरा

ॐ चण्डमुण्डवधोद्धुरायै नम:।

632.अष्टमी

ॐ अष्टम्यै नम:।

633.एकादशी

ॐ एकादश्यै नम:।

634.पूर्णा

ॐ पूर्णायै नम:।

635.नवमी

ॐ नवम्यै नम:।

636.चतुर्दशी

ॐ चतुर्दश्यै नम:।

637.अमा

ॐ अमायै नम:।

638.कलशहस्ता

ॐ कलशहस्तायै नम:।

639.पूर्णकुम्भधरा

ॐ पूर्णकुम्भधरायै नम:।

640.धरा

ॐ धरायै नम:।

641.अभीरु:

ॐ अभीरवे नम:।

642.भैरवी

ॐ भैरव्यै नम:।

643.भीरा

ॐ भीरायै नम:।

644.भीमा

ॐ भीमायै नम:।

645.त्रिपुरभैरवी

ॐ त्रिपुरभैरव्यै नम:।

646.महारुण्डा

ॐ महारुण्डायै नम:।

647.रौद्री

ॐ रौद्र्यै नम:।

648.महाभैरवपूजिता

ॐ महाभैरवपूजितायै नम:।

649.निर्मुण्डा

ॐ निर्मुण्डायै नम:।

650.हस्तिनी

ॐ हस्तिन्यै नम:।

651.चण्डा

ॐ चण्डायै नम:।

652.करालदशनानना

ॐ करालदशनाननायै नम:।

653.कराला

ॐ करालायै नम:।

654.विकराला

ॐ विकरालायै नम:।

655.घोरघुर्घुरनादिनी

ॐ घोरघुर्घुरनादिन्यै नम:।

656.रक्तदन्ता

ॐ रक्तदन्तायै नम:।

657.ऊर्ध्वकेशी

ॐ ऊर्ध्वकेश्यै नम:।

658.बन्धूककुसुमारुणा

ॐ बन्धूककुसुमारुणायै नम:।

659.कादम्बरी

ॐ कादम्बर्यै नम:।

660.पटासा

ॐ पटासायै नम:।

661.काश्मीरी

ॐ काश्मीर्यै नम:।

662.कुंकुमप्रिया

ॐ कुंकुमप्रियायै नम:।

663.क्षान्ति:

ॐ क्षान्तये नम:।

664.बहुसुवर्णा

ॐ बहुसुवर्णायै नम:।

665.रति:

ॐ रतये नम:।

666.बहुसुवर्णदा

ॐ बहुसुवर्णदायै नम:।

667.मातङ्गिनी

ॐ मातङ्गिन्यै नम:।

668.वरारोहा

ॐ वरारोहायै नम:।

669.मत्तमातङ्गगामिनी

ॐ मत्तमातङ्गगामिन्यै नम:।

670.हिंसा

ॐ हिंसायै नम:।

671.हंसगति:

ॐ हंसगतये नम:।

672.हंसी

ॐ हंस्यै नम:।

673.हंसोज्ज्वलशिरोरुहा

ॐ हंसोज्ज्वलशिरोरुहायै नम:।

674.पूर्णचन्द्रमुखी

ॐ पूर्णचन्द्रमुख्यै नम:।

675.श्यामा

ॐ श्यामायै नम:।

676.स्मितास्या

ॐ स्मितास्यायै नम:।

677.श्यामकुण्डला

ॐ श्यामकुण्डलायै नम:।

678.मषी

ॐ मष्यै नम:।

679.लेखिनी

ॐ लेखिन्यै नम:।

680.लेख्या

ॐ लेख्यायै नम:।

681.सुलेखा

ॐ सुलेखायै नम:।

682.लेखकप्रिया

ॐ लेखकप्रियायै नम:।

683.शङ्खिनी

ॐ शङ्खिन्यै नम:।

684.शङ्खहस्ता

ॐ शङ्खहस्तायै नम:।

685.जलस्था

ॐ जलस्थायै नम:।

686.जलदेवता

ॐ जलदेवतायै नम:।

687.कुरुक्षेत्रावनि:

ॐ कुरुक्षेत्रावनये नम:।

688.काशी

ॐ काश्यै नम:।

689.मथुरा

ॐ मथुरायै नम:।

690.काञ्ची

ॐ काञ्च्यै नम:।

691.अवन्तिका

ॐ अवन्तिकायै नम:।

692.अयोध्या

ॐ अयोध्यायै नम:।

693.द्वारका

ॐ द्वारकायै नम:।

694.माया

ॐ मायायै नम:।

695.तीर्था

ॐ तीर्थायै नम:।

696.तीर्थकरप्रिया

ॐ तीर्थकरप्रियायै नम:।

697.त्रिपुष्करा

ॐ त्रिपुष्करायै नम:।

698.अप्रमेया

ॐ अप्रमेयायै नम:।

699.कोशस्था

ॐ कोशस्थायै नम:।

700.कोशवासिनी

ॐ कोशवासिन्यै नम:।

701.कौशिकी

ॐ कौशिक्यै नम:।

702.कुशावर्ता

ॐ कुशावर्तायै नम:।

703.कौशाम्बी

ॐ कौशाम्ब्यै नम:।

704.कोशवर्धिनी

ॐ कोशवर्धिन्यै नम:।

705.कोशदा

ॐ कोशदायै नम:।

706.पद्मकोशाक्षी

ॐ पद्मकोशाक्ष्यै नम:।

707.कुसुमा

ॐ कुसुमायै नम:।

708.कुसुमप्रिया

ॐ कुसुमप्रियायै नम:।

709.तोतुला

ॐ तोतुलायै नम:।

710.तुलाकोटि:

ॐ तुलाकोटयै नम:।

711.कूटस्था

ॐ कूटस्थायै नम:।

712.कोटराश्रया

ॐ कोटराश्रयायै नम:।

713.स्वयम्भू:

ॐ स्वयम्भुवे नम:।

714.सुरूपा

ॐ सुरूपायै नम:।

715.स्वरूपा

ॐ स्वरूपायै नम:।

716.रूपवर्धिनी

ॐ रूपवर्धिन्यै नम:।

717.तेजस्विनी

ॐ तेजस्विन्यै नम:।

718.सुभिक्षा

ॐ सुभिक्षायै नम:।

719.बलदा

ॐ बलदायै नम:।

720.बलदायिनी

ॐ बलदायिन्यै नम:।

721.महाकोशी

ॐ महाकोश्यै नम:।

722.महावर्ता

ॐ महावर्तायै नम:।

723.बुद्धि: सदसदात्मिका

ॐ बुद्धिसदसदात्मिकायै नम:।

724.महाग्रहहरा

ॐ महाग्रहहरायै नम:।

725.सौम्या

ॐ सौम्यायै नम:।

726.विशोका

ॐ विशोकायै नम:।

727.शोकनाशिनी

ॐ शोकनाशिन्यै नम:।

728.सात्त्विकी

ॐ सात्त्विक्यै नम:।

729.सत्त्वसंस्था

ॐ सत्त्वसंस्थायै नम:।

730.राजसी

ॐ राजस्यै नम:।

731.रजोवृता

ॐ रजोवृतायै नम:।

732.तामसी

ॐ तामस्यै नम:।

733.तमोयुक्ता

ॐ तमोयुक्तायै नम:।

734.गुणत्रयविभाविनी

ॐ गुणत्रयविभाविन्यै नम:।

735.अव्यक्ता

ॐ अव्यक्तायै नम:।

736.व्यक्तरूपा

ॐ व्यक्तरूपायै नम:।

737.वेदविद्या

ॐ वेदविद्यायै नम:।

738.शाम्भवी

ॐ शाम्भव्यै नम:।

739.शङ्कराकल्पिनी कल्पा

ॐ शङ्कराकल्पिनीकल्पायै नम:।

740.मन: सङ्कल्पसन्तति:

ॐ मन:सङ्कल्पसन्ततये नम:।

741.सर्वलोकमयीशक्ति:

ॐ सर्वलोकमयीशक्तये नम:।

742.सर्वश्रवणगोचरा

ॐ सर्वश्रवणगोचरायै नम:।

743.सर्वज्ञानवतीवाञ्छा

ॐ सर्वज्ञानवतीवाञ्छायै नम:।

744.सर्वतत्त्वानुबोधिनी

ॐ सर्वतत्त्वानुबोधिन्यै नम:।

745.जागृती

ॐ जागृत्यै नम:।

746.सुषुप्ति:

ॐ सुषुप्तये नम:।

747.स्वप्नावस्था

ॐ स्वप्नावस्थायै नम:।

748.तुरीयका

ॐ तुरीयकायै नम:।

749.त्वरा

ॐ त्वरायै नम:।

750.मन्दगति:

ॐ मन्दगतये नम:। 

751.मन्दा

ॐ मन्दायै नम:।

752.मन्दिरामोदधारिणी

ॐ मन्दिरामोदधारिण्यै नम:।

753.पानभूमि:

ॐ पानभूमये नम:।

754.पानपात्रा

ॐ पानपात्रायै नम:।

755.पानदानकरोद्यता

ॐ पानदानकरोद्यतायै नम:।

756.अघूर्णारुणनेत्रा

ॐ अघूर्णारुणनेत्रायै नम:।

757.किञ्चिदव्यक्तभाषिणी

ॐ किञ्चिदव्यक्तभाषिण्यै नम:।

758 आशापूरा

ॐ आशापूरायै नम:।

759.दीक्षा

ॐ दीक्षायै नम:।

760.दक्षा

ॐ दक्षायै नम:।

761.दीक्षितपूजिता

ॐ दीक्षितपूजितायै नम:।

762.नागवल्ली

ॐ नागवल्ल्यै नम:।

763.नागकन्या

ॐ नागकन्यायै नम:।

764.भोगिनी

ॐ भोगिन्यै नम:।

765.भोगवल्लभा

ॐ भोगवल्लभायै नम:।

766.सर्वशास्त्रवतीविद्या

ॐ सर्वशास्त्रवतीविद्यायै नम:।

767.सुस्मृति:

ॐ सुस्मृतये नम:।

768.धर्मवादिनी

ॐ धर्मवादिन्यै नम:।

769.श्रुति:

ॐ श्रुतये नम:।

770.श्रुतिधरा

ॐ श्रुतिधरायै नम:।

771.ज्येष्ठा

ॐ ज्येष्ठायै नम:।

772.श्रेष्ठा

ॐ श्रेष्ठायै नम:।

773.पातालवासिनी

ॐ पातालवासिन्यै नम:।

774.मीमांसा

ॐ मीमांसायै नम:।

775.तर्कविद्या

ॐ तर्कविद्यायै नम:।

776.सुभक्ति:

ॐ सुभक्तये नम:।

777.भक्तवत्सला

ॐ भक्तवत्सलायै नम:।

778.सुनाभि:

ॐ सुनाभये नम:।

779.यातना

ॐ यातनायै नम:।

780.जाती:

ॐ जातये नम:।

781.गम्भीरा

ॐ गम्भीरायै नम:।

782.भाववर्जिता

ॐ भाववर्जितायै नम:।

783.नागपाशधरा मूर्ति:

ॐ नागपाशधरामूर्तये नम:।

784.अगाधा

ॐ अगाधायै नम:।

785.नागकुण्डला

ॐ नागकुण्डलायै नम:।

786.सुचक्रा

ॐ सुचक्रायै नम:।

787.चक्रमध्यस्था

ॐ चक्रमध्यस्थायै नम:।

788.चक्रकोणनिवासिनी

ॐ चक्रकोणनिवासिन्यै नम:।

789.सर्वमन्त्रमयी विद्या

ॐ सर्वमन्त्रमयीविद्यायै नम:।

790.सर्वमन्त्राक्षरावलिः

ॐ सर्वमन्त्राक्षरावलये नम:।

791.मधुस्रवा

ॐ मधुस्रवायै नम:।

792.स्रवन्ती

ॐ स्रवन्त्यै नम:।

793.भ्रामरी

ॐ भ्रामर्यै नम:।

794.भ्रमरालका

ॐ भ्रमरालकायै नम:।

795.मातृमण्डलमध्यस्था

ॐ मातृमण्डलमध्यस्थायै नम:।

796.मातृमण्डलवासिनी

ॐ मातृमण्डलवासिन्यै नम:।

797.कुमारजननी

ॐ कुमारजनन्यै नम:।

798.क्रूरा

ॐ क्रूरायै नम:।

799.सुमुखी

ॐ सुमुख्यै नम:।

800.ज्वरनाशिनी

ॐ ज्वरनाशिन्यै नम:।

801.अतीता

ॐ अतीतायै नम:।

802.विद्यमाना

ॐ विद्यमानायै नम:।

803.भाविन

ॐ भाविन्यै नम:।

804.प्रीतिमञ्जरी

ॐ प्रीतिमञ्जर्यै नम:।

805.सर्वसौख्यवती युक्ति:

ॐ सर्वसौख्यवतीयुक्तये नम:।

806.आहारपरिणामिनी

ॐ आहारपरिणामिन्यै नम:।

807.निदानं पञ्चभूतानाम्

ॐ पञ्चभूतानांनिधानायै नम:।

808.भवसागरतारिणी

ॐ भवसागरतारिण्यै नम:।

809.अक्रूरा

ॐ अक्रूरायै नम:।

810.ग्रहवती

ॐ ग्रहवत्यै नम:।

811.विग्रहा

ॐ विग्रहायै नम:।

812.ग्रहवर्जिता

ॐ ग्रहवर्जितायै नम:।

813.रोहिणी

ॐ रोहिण्यै नम:।

814.भूमिगर्भा

ॐ भूमिगर्भायै नम:।

815.कालभू:

ॐ कालभुवे नम:।

816.कालवर्तिनी

ॐ कालवर्तिन्यै नम:।

817.कलङ्करहिता नारी

ॐ कलङ्करहितानार्यै नम:।

818.चतुष्षष्ट्यभिधावती

ॐ चतुष्षष्ट्यभिधावत्यै नम:।

819.जीर्णा

ॐ जीर्णायै नम:।

820.जीर्णवस्त्रा

ॐ जीर्णवस्त्रायै नम:।

821.नूतना

ॐ नूतनायै नम:।

822.नववल्लभा

ॐ नववल्लभायै नम:।

823.अरजा

ॐ अरजायै नम:।

824.रति:

ॐ रतये नम:।

825.प्रीति:

ॐ प्रीतये नम:।

826.रतिरागविवर्धिनी

ॐ रतिरागविवर्धिन्यै नम:।

827.पञ्चवातगतिर्भिन्ना

ॐ पञ्चवातगतिर्भिन्नायै नम:।

828.पञ्चश्लेष्माशयाधरा

ॐ पञ्चश्लेष्माशयाधरायै नम:।

829.पञ्चपित्तवतीशक्ति:

ॐ पञ्चपित्तवतीशक्तये नम:।

830.पञ्चस्थानविबोधिनी

ॐ पञ्चस्थानविबोधिन्यै नम:।

831.उदक्या

ॐ उदक्यायै नम:।

832.वृषस्यन्ती

ॐ वृषस्यन्त्यै नम:।

833.बहि:प्रस्रविणी त्र्यहम्

ॐ त्र्यहंबहि:प्रस्रविण्यै नम:।

834.रज:शुक्रधराशक्ति:

ॐ रज:शुक्रधराशक्तये नम:।

835.जरायु:

ॐ जरायवे नम:।

836.गर्भधारिणी

ॐ गर्भधारिण्यै नम:।

837.त्रिकालज्ञा

ॐ त्रिकालज्ञायै नम:।

838.त्रिलिङ्गा

ॐ त्रिलिङ्गायै नम:।

839.त्रिमूर्ति:

ॐ त्रिमूर्तये नम:।

840.त्रिपुरवासिनी

ॐ त्रिपुरवासिन्यै नम:।

841.अरागा

ॐ अरागायै नम:।

842.शिवतत्त्वा

ॐ शिवतत्त्वायै नम:।

843.कामतत्त्वानुरागिणी

ॐ कामतत्त्वानुरागिण्यै नम:।

844.प्राची

ॐ प्राच्यै नम:।

845.अवाची

ॐ अवाच्यै नम:।

846.प्रतीची (दिक्)

ॐ प्रतीच्यै नम:।

847.उदीची (दिक्)

ॐ उदीच्यै नम:।

848.विदिग्दिशा

ॐ विदिग्दिशायै नम:।

849.अहङ्कृति:

ॐ अहङ्कृतये नम:।

850.अहङ्कारा

ॐ अहङ्कारायै नम:।

851.बलिमाया

ॐ बलिमायायै नम:।

852.बलिप्रिया

ॐ बलिप्रियायै नम:।

853.स्रुक्

ॐ स्रुचे नम:।

854.स्रुवा

ॐ स्रुवायै नम:।

855.सामिधेनी

ॐ सामिधेन्यै नम:।

856.सश्रद्धा

ॐ सश्रद्धायै नम:।

857.श्राद्धदेवता

ॐ श्राद्धदेवतायै नम:।

858.माता

ॐ मात्रे नम:।

859.मातामही

ॐ मातामह्यै नम:।

860.तृप्ति:

ॐ तृप्तये नम:।

861.पितृमाता

ॐ पितृमात्रे नम:।

862.पितामही

ॐ पितामह्यै नम:।

863.स्नुषा

ॐ स्नुषायै नम:।

864.दौहित्रिणी

ॐ दौहित्रिण्यै नम:।

865.पुत्री

ॐ पुत्र्यै नम:।

866.पौत्री

ॐ पौत्र्यै नम:।

867.नप्त्री

ॐ नप्त्र्यै नम:।

868.शिशुप्रिया

ॐ शिशुप्रियायै नम:।

869.स्तनदा

ॐ स्तनदायै नम:।

870.स्तनधारा

ॐ स्तनधारायै नम:।

871.विश्वयोनि:

ॐ विश्वयोनये नम:।

872.स्तनन्धयी

ॐ स्तनन्धय्यै नम:।

873.शिशूत्सङ्गधरा

ॐ शिशूत्सङ्गधरायै नम:।

874.दोला

ॐ दोलायै नम:।

875.दोलाक्रीडाभिनन्दिनी

ॐ दोलाक्रीडाभिनन्दिन्यै नम:।

876.उर्वशी

ॐ उर्वश्यै नम:।

877.कदली

ॐ कदल्यै नम:।

878.केका

ॐ केकायै नम:।

879.विशिखा

ॐ विशिखायै नम:।

880.शिखिवर्तिनी

ॐ शिखिवर्तिन्यै नम:।

881.खट्वाङ्गधारिणी

ॐ खट्वाङ्गधारिण्यै नम:।

882.खट्वा

ॐ खट्वायै नम:।

883.बाणपुङ्खानुवर्तिनी

ॐ बाणपुङ्खानुवर्तिन्यै नम:।

884.लक्ष्यप्राप्ति:

ॐ लक्ष्यप्राप्तये नम:।

885.कला

ॐ कलायै नम:।

886.अलक्ष्या

ॐ अलक्ष्यायै नम:।

887.लक्ष्या (च)

ॐ लक्ष्यायै नम:।

888.शुभलक्षणा

ॐ शुभलक्षणायै नम:।

889.वर्तिनी

ॐ वर्तिन्यै नम:।

890.सुपथाचारा

ॐ सुपथाचारायै नम:।

891.परिखा

ॐ परिखायै नम:।

892.खनि:

ॐ खनये नम:।

893.वृति:

ॐ वृतये नम:।

894.प्राकारवलया

ॐ प्राकारवलयायै नम:।

895.वेला

ॐ वेलायै नम:।

896.मर्यादा च महोदधौ

ॐ महोदधौमर्यादायै नम:।

897.पोषणी (शक्ति:)

ॐ पोषणीशक्तये नम:।

898.शोषणी शक्ति:

ॐ शोषणीशक्तये नम:।

899.दीर्घकेशी

ॐ दीर्घकेश्यै नम:।

900.सुलोमशा

ॐ सुलोमशायै नम:।

901.ललिता

ॐ ललितायै नम:।

902.मांसला

ॐ मांसलायै नम:।

903.तन्वी

ॐ तन्व्यै नम:।

904.वेदवेदाङ्गधारिणी

ॐ वेदवेदाङ्गधारिण्यै नम:।

905.नरासृक्पानमत्ता

ॐ नरासृक्पानमत्तायै नम:।

906.नरमुण्डास्थिभूषणा

ॐ नरमुण्डास्थिभूषणायै नम:।

907.अक्षक्रीडारति:

ॐ अक्षक्रीडारतये नम:।

908.शारी

ॐ शार्यै नम:।

909.शारिका शुकभाषिणी

ॐ शारिकाशुकभाषिण्यै नम:।

910.शाम्बरी

ॐ शाम्बर्यै नम:।

911.गारुडी विद्या

ॐ गारुडीविद्यायै नम:।

912.वारुणी

ॐ वारुण्यै नम:।

913.वरुणार्चिता

ॐ वरुणार्चितायै नम:।

914.वाराही

ॐ वाराह्यै नम:।

915.मुण्डहस्ता

ॐ मुण्डहस्तायै नम:।

916.दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरा

ॐ दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरायै नम:।

917.मीनमूर्तिधरा

ॐ मीनमूर्तिधरायै नम:।

918.मूर्ता

ॐ मूर्तायै नम:।

919.वदन्या

ॐ वदन्यायै नम:।

920.प्रतिमाश्रया

ॐ प्रतिमाश्रयायै नम:।

921.अमूर्ता

ॐ अमूर्तायै नम:।

922.निधिरूपा

ॐ निधिरूपायै नम:।

923.शालग्रामशिलाशुचिः

ॐ शालग्रामशिलाशुचये नम:।

924.स्मृति:

ॐ स्मृतये नम:।

925.संस्काररूपा

ॐ संस्काररूपायै नम:।

926.सुसंस्कारा

ॐ सुसंस्कारायै नम:।

927.संस्कृति:

ॐ संस्कृतये नम:।

928.प्राकृता

ॐ प्राकृतायै नम:।

929.देशभाषा

ॐ देशभाषायै नम:।

930.गाथा

ॐ गाथायै नम:।

931.गीति:

ॐ गीतये नम:।

932.प्रहेलिका

ॐ प्रहेलिकायै नम:।

933.इडा

ॐ इडायै नम:।

934.पिङ्गला

ॐ पिङ्गलायै नम:।

935.पिङ्गा

ॐ पिङ्गायै नम:।

936.सुषुम्णा

ॐ सुषुम्णायै नम:।

937.सूर्यवाहिनी

ॐ सूर्यवाहिन्यै नम:।

938.शशिस्रवा

ॐ शशिस्रवायै नम:।

939.तालुस्था

ॐ तालुस्थायै नम:।

940.काकिनी

ॐ काकिन्यै नम:।

941.अमृतजीविनी

ॐ अमृतजीविन्यै नम:।

942.अणुरूपा

ॐ अणुरूपायै नम:।

943.बृहद्रूपा

ॐ बृहद्रूपायै नम:।

944.लघुरूपा

ॐ लघुरूपायै नम:।

945.गुरुस्थिरा

ॐ गुरुस्थिरायै नम:।

946.स्थावरा

ॐ स्थावरायै नम:।

947.जङ्गमा

ॐ जङ्गमायै नम:।

948.देवी

ॐ देव्यै नम:।

949.कृतकर्मफलप्रदा

ॐ कृतकर्मफलप्रदायै नम:।

950.विषयाक्रान्तदेहा

ॐ विषयाक्रान्तदेहायै नम:।

951.निर्विशेषा

ॐ निर्विशेषायै नम:।

952.जितेन्द्रिया

ॐ जितेन्द्रियायै नम:।

953.विश्वरूपा

ॐ विश्वरूपायै नम:।

954.चिदानन्दा

ॐ चिदानन्दायै नम:।

955.परब्रह्मप्रबोधिनी

ॐ परब्रह्मप्रबोधिन्यै नम:।

956.निर्विकारा

ॐ निर्विकारायै नम:।

957.निर्वैरा

ॐ निर्वैरायै नम:।

958.विरति:

ॐ विरतये नम:।

959.सत्यवर्धिनी

ॐ सत्यवर्धिन्यै नम:।

960.पुरुषाज्ञा

ॐ पुरुषाज्ञायै नम:।

961.भिन्ना

ॐ भिन्नायै नम:।

962.क्षान्ति: कैवल्यदायिनी

ॐ क्षान्ति:कैवल्यदायिन्यै नम:।

963.विविक्तसेविनी

ॐ विविक्तसेविन्यै नम:।

964.प्रज्ञाजनयित्री

ॐ प्रज्ञाजनयित्र्यै नम:।

965.बहुश्रुति:

ॐ बहुश्रुतये नम:।

966.निरीहा

ॐ निरीहायै नम:।

967.समस्तैका

ॐ समस्तैकायै नम:।

968.सर्वलोकैकसेविता

ॐ सर्वलोकैकसेवितायै नम:।

969.सेवा

ॐ सेवायै नम:।

970.सेवाप्रिया

ॐ सेवाप्रियायै नम:।

971.सेव्या

ॐ सेव्यायै नम:।

972.सेवाफलविवर्धिनी

ॐ सेवाफलविवर्धिन्यै नम:।

973.कलौ कल्किप्रियाकाली

ॐ कलौकल्किप्रियाकाल्यै नम:।

974.दुष्टम्लेच्छविनाशिनी

ॐ दुष्टम्लेच्छविनाशिन्यै नम:।

975.प्रत्यञ्चा

ॐ प्रत्यञ्चायै नम:।

976.धनुर्यष्टि:

ॐ धनुर्यष्टये नम:।

977.खड्गधारा

ॐ खड्गधारायै नम:।

978.दुरानति:

ॐ दुरानतये नम:।

979.अश्वप्लुति:

ॐ अश्वप्लुतये नम:।

980.वल्गा

ॐ वल्गायै नम:।

981.सृणिः

ॐ सृणये नम:।

982.सन्मत्तवारणा

ॐ सन्मत्तवारणायै नम:।

983.वीरभू:

ॐ वीरभुवे नम:।

984.वीरमाता

ॐ वीरमात्रे नम:।

985.वीरसू:

ॐ वीरसुवे नम:।

986.वीरनन्दिनी

ॐ वीरनन्दिन्यै नम:।

987.जयश्री:

ॐ जयश्रियै नम:।

988.जयदीक्षा

ॐ जयदीक्षायै नम:।

989.जयदा

ॐ जयदायै नम:।

990.जयवर्धिनी

ॐ जयवर्धिन्यै नम:।

991.सौभाग्यसुभगाकारा

ॐ सौभाग्यसुभगाकारायै नम:।

992.सर्वसौभाग्यवर्धिनी

ॐ सर्वसौभाग्यवर्धिन्यै नम:।

993.क्षेमङ्करी

ॐ क्षेमङ्कर्यै नम:।

994.सिद्धिरूपा

ॐ सिद्धिरूपायै नम:।

995.सत्कीर्ति:

ॐ सत्कीर्तये नम:।

996.पथिदेवता

ॐ पथिदेवतायै नम:।

997.सर्वतीर्थमयीमूर्ति:

ॐ सर्वतीर्थमयीमूर्तये नम:।

998.सर्वदेवमयीप्रभा

ॐ सर्वदेवमयीप्रभायै नम:।

999.सर्वसिद्धिप्रदाशक्ति:

ॐ सर्वसिद्धिप्रदाशक्तये नम:।

1000.सर्वमङ्गलमङ्गला

ॐ सर्वमङ्गलमङ्गलायै नम:।


॥इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रान्तर्गता श्रीभवानीसहस्रनामावलिः सम्पूर्णा॥

जय माता जी की

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Friday, September 25, 2026

ऋग्वेद और #विज्ञान

 #ऋग्वेद और #विज्ञान ...क्या कभी सोचा है कि जिस मंत्र के एक उच्चारण से हज़ारों साल पहले ब्रह्मांड का मौसम बदल जाता था, उसी मंत्र को आज तुम एक लाख बार भी रट लो, तो सिर का दर्द तक गायब नहीं होता?

दोष मंत्र में है ?

या  उस खोपड़ी में, जिसे तुमने सूचनाओं और वासनाओं का डस्टबिन बना रखा है? रुकिए, रीढ़ सीधी कीजिए और सांस थामकर प्रयाग फ़ाइल्स पढ़िए—क्योंकि जो सच आज आप जानने वाले हैं, वह सनातन विज्ञान के प्रति आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल देगा!

कल्पना कीजिए… आज से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व का आर्यावर्त। त्रिवेणी के पावन तट पर सूर्य की पहली लालिमा फूटी है। न कोई कंक्रीट का जंगल, न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का अदृश्य ज़हर, न मोबाइल स्क्रीन्स की नीली रोशनी से अंधी होती आँखें, और न ही प्रति सेकंड हज़ारों व्यर्थ सूचनाओं से हांफता हुआ कोई मस्तिष्क!

वहाँ शांत, निष्कंप बैठे हैं एक ऋषि। आँखें बंद हैं, लेकिन अंतर्चक्षु खुले हैं। वायुमंडल इतना पवित्र और संतुलित कि प्रकृति का एक-एक परमाणु 'होमियोस्टैसिस' के शिखर पर कंपित हो रहा है।

ऋषि के कंठ से कोई साधारण शब्द नहीं निकलता। उनकी नाभि के गहन अंधकार से एक विस्फोट होता है—नाद का विस्फोट! वह कम्पन रीढ़ के भीतर सुप्त सुषुम्ना को छूता है, हृदय-आकाश में आलोकित होता है और जब ओष्ठों से बाहर फूटता है, तो ब्रह्मांड के कण-कण की फ्रीक्वेंसी से एकाकार हो जाता है। बादलों की गति ठहर जाती है, अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, और मृत्यु तक अपने पाँव पीछे खींच लेती है!


वह ऋग्वेद का युग था। वह सतयुगी चेतना थी!


और आज?


आज उसी त्रिवेणी की पावन माटी पर बैठा आधुनिक मानव, कान में ईयरफोन ठूँसे, सोशल मीडिया के विषैले कचरे को निगलते हुए, मंत्र की किताबें खोलकर रट रहा है—और फिर झुंझलाकर पूछता है:


"ऋग्वेद के मंत्र आज काम क्यों नहीं करते? क्या विज्ञान बड़ा है या वेद?"


सुनिए आधुनिक विज्ञान के दंभी कर्णधारों! वेद कोई काल्पनिक पोथी नहीं, इस ब्रह्मांड का परम क्वांटम कोड है। समस्या कोड में नहीं है, समस्या तुम्हारे सड़े हुए, जंग खाए रिसीवर में है!

यह विज्ञान है, जादू नहीं: जब एंटीना ही पिघल चुका हो!

भौतिकी का अकाट्य नियम है—'नो रेजोनेंस, नो एनर्जी ट्रांसफर' (No Resonance, No Energy Transfer)।

हवा में सैंकड़ों उपग्रहों की अल्ट्रा-हाई-डेफिनिशन 4K तरंगे तैर रही हैं। ब्रह्मांडीय नाद का लाइव प्रसारण हर पल, इसी क्षण तुम्हारे कमरे में, तुम्हारी छाती के आर-पार गुज़र रहा है।


आपके मन में अब एक सवाल होगा कि मनीष जी इसे कोई अगर साधारण उदाहरण से समझाएं तो अधिक समझ में आएगा तो परेशान ना हो इसे एक सीधे उदाहरण से समझिए—मान लीजिए आपके कमरे में 5G की सुपर-फास्ट स्पीड तैर रही है, हवा में 8K का डेटा उड़ रहा है। लेकिन आपके हाथ में बीस साल पुराना 2G का ऐसा फोन है जिसकी स्क्रीन चटक चुकी है, बैटरी फूलकर फटने को है और एंटीना भीतर से गल चुका है। 


क्या उस फोन पर 5G चलेगा? 

कभी नहीं! 

अब क्या आप नेटवर्क प्रोवाइडर को गाली देंगे? 

गलती उस 5G सिग्नल की नहीं है, उस कबाड़ हो चुके मोबाइल की है!

मंत्र वही 5G कॉस्मिक डेटा हैं, और तुम्हारा शरीर वही जंग लगा फोन! अगर तुम्हारे पास रखा टीवी फूटा हो और उसका सर्किट बोर्ड धूल-पानी से शॉर्ट हो चुका हो, तो स्क्रीन पर 4K मूवी नहीं, केवल 'खर-खर' का भयानक, सिरदर्द करने वाला शोर ही दिखेगा।

तुम वही टीवी हो! तुम्हारी नाड़ियों में जंक फूड, केमिकल युक्त तामसिक अन्न और बासी भोजन का ज़हरीला 'आम' (Cellular Toxins) जमा है। तुम्हारा नर्वस सिस्टम, जो कभी ब्रह्मांड के सूक्ष्म इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक संकेतों को पकड़ने वाला 'सुपरकंडक्टर' था, आज तनाव और उत्तेजना के शॉर्ट-सर्किट से जल चुका है।


छान्दोग्य उपनिषद ने कहा है:

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः!

(जब तक हार्डवेयर शुद्ध नहीं होगा, तब तक चेतना का सिग्नल-प्रोसेसर कभी स्थिर नहीं हो सकता!)


प्रयाग फाइल्स को बढ़ाते हुए एक बात आप समझ लीजिए उबलते पानी में आसमान नहीं दिखता: सॉफ्टवेयर की विकृति समझिए।

जरा सोचिए, अगर किसी चौड़े बर्तन में पानी खौल रहा हो, आग पर उबल रहा हो, और आप उसमें अपना चेहरा देखने की कोशिश करें


—तो क्या दिखेगा? 

केवल धुआँ, बुलबुले और विकृत लकीरें! 

जैसे ही आप आग बुझाते हैं, पानी शांत, निष्कंप और स्थिर होता है, तो उसमें आसमान का सबसे छोटा तारा भी आईने की तरह साफ़ झलकने लगता है।

दिनभर ईर्ष्या, तनाव, क्रोध और सोशल मीडिया की आग पर खौलता हुआ तुम्हारा मन वही उबलता हुआ पानी है। जब अंतःकरण की सतह ही उबल रही हो, तो ब्रह्मांडीय सत्य का प्रतिबिंब उसमें कैसे उतरेगा?

और दूसरा सच यह है कि मंत्र केवल अक्षरों का खेल नहीं, भाव का पासवर्ड है!

आप अपने बैंक खाते का पासवर्ड टाइप कर रहे हों; एक-एक स्पेलिंग सही है, संख्या सही है, लेकिन अगर की-बोर्ड का 'Caps Lock' ऑन रह गया, तो क्या सिस्टम आपको लॉगिन करने देगा? कभी नहीं! स्क्रीन पर तुरंत 'Access Denied' का एरर आ जाएगा।


अगर आपके मन में अब सवाल यह है कि मनीष जी क्या मंत्र का भी यही नियम है। तुम्हें हर बार वही कहूंगा कि बिल्कुल हां....।

महामृत्युंजय या गायत्री 'केस-सेंसिटिव पासवर्ड' हैं। जब होंठों से मंत्र सही निकल रहा हो, लेकिन भीतर ईर्ष्या, वासना या अहंकार का 'कैप्स लॉक' ऑन हो—तो पासवर्ड मिसमैच हो जाता है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पोर्टल खुलता ही नहीं! भीतर केवल मानसिक धुआँ उठता है, कोई दिव्य चमत्कार नहीं!


प्रयाग फाइल्स को पढ़ाते हुए अब तक कई लोगों को लगा होगा कि पता नहीं क्या बड़ी-बड़ी बातें मनीष जी कर रहे हैं जिसका कोई लेना-देना आज के समय से नहीं है। उसमें कई वैचारिक रूप से संपन्न लोग भी हो सकते हैं। 

तो क्या तुम्हें लगता है कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे जो इन रहस्यों को पत्थरों में नहीं, ध्वनियों में छुपा गए? नासा आज जिस ध्वनि को अंतरिक्ष में खोज रहा है, उसे हमारे ऋषियों ने हज़ारों साल पहले कागज़ तक पर नहीं, सीधे चेतना के डीएनए में कोड कर दिया था! अब जो श्लोक तुम पढ़ने जा रहे हो, उसे पढ़कर विज्ञान भी नतमस्तक होकर हाथ जोड़ लेगा!


आज से सहस्रों वर्ष पूर्व, जब आधुनिक विज्ञान घुटनों के बल चलना भी नहीं सीखा था, तब ऋग्वेद के द्रष्टा ने मनुष्य जाति के इसी दिवालियापन को देख लिया था। उन्होंने आने वाले युगों के अहंकार पर हँसते हुए वह ऋचा लिखी, जिसे पढ़कर आज भी क्वांटम भौतिकविदों के माठे पर पसीना आ जाए। आई प्रयाग फाइल्स में अब ऋग्वेद की उसे ऋचा को खोलते हैं। 


 उ॒त त्वः॒ पश्य॒न् न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्वः॑ शृ॒ण्वन् न शृ॑णोत्ये॒नाम्।

उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१ वि स॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑॥

 (ऋग्वेद — मण्डल 10, सूक्त 71, मन्त्र 4)


अपनी साँसें रोककर इस ऋचा के एक-एक शब्द के महाविस्फोट को अपनी आत्मा पर उतरते महसूस कीजिए:

  उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचम्:

   "अरे, यह संसार अंधों की भीड़ है! लाखों-करोड़ों लोग आँखों से इस वेद-वाणी के अक्षरों को घूर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, पोथियों के पन्ने पलट रहे हैं—किंतु वे इसे रत्ती भर भी 'देख' नहीं पा रहे हैं!"

   (क्योंकि लिपि दिख रही है, उसके पीछे का ब्रह्मांडीय डायमेंशन बंद है!)


  उत त्वः शृण्वन् न शृणोत्येनाम्:

   "वे कानों से इन मंत्रों के उच्च-स्वर नाद को सुन रहे हैं, लाउडस्पीकरों पर बजा रहे हैं, जीभ से दोहरा रहे हैं—किंतु वे धिक्कार के पात्र हैं, क्योंकि वे इसके असली मर्म, इसके जीवित कंपन को रंच मात्र भी 'सुन' नहीं पा रहे हैं!"

   (स्थूल कान केवल हवा के धक्के सुनते हैं, चेतना की गहराई नहीं!)


और अब… ऋचा के दूसरे चरण पर आइए, जहाँ ऋषि ने ऐसा रहस्योद्घाटन किया है कि चेतना सुन्न हो जाए।


  उतो त्वस्मै तन्वं वि सस्रे जायेव पत्ये उशती सुवासाः:


   "किंतु… इस अनंत ब्रह्मांड में उस विरले, शुद्ध, निष्काम और तपस्वी साधक के सम्मुख—यह परा-वाणी, यह महाशक्ति अपना घूँघट स्वयं हटा देती है! वह अपना संपूर्ण दिव्य, नग्न और परा-ऊर्जा स्वरूप ठीक उसी प्रकार उसके सामने अनावृत कर देती है, जैसे कोई रूपवती, सती, प्रेम से उत्कंठित नववधू एकांत कक्ष में अपने प्राणप्रिय पति के सामने अपने सारे सुंदर वस्त्र उतारकर स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देती है!"


ठहरिए! और इस उपमा की दिव्यता को अपनी रीढ़ में उतरने दीजिए!

वेद-वाणी कोई निर्जीव शब्द नहीं है; वह एक सजीव, चैतन्य, कॉस्मिक सत्ता है! वह बाज़ारू नहीं है कि किसी भी कामुक, लंपट या अहंकारी के सामने अपनी शक्ति लुटा दे। वह केवल उसी के सामने अपनी ऊर्जा का अनंत द्वार खोलती है, जिसका अंतःकरण उसकी तरह ही निष्पाप, समर्पित और पवित्र हो चुका है!

वाणी की वह यात्रा, जो नाभि से ब्रह्मांड तक जाती है

मंत्र कोई गले की कसरत नहीं है। जब एक शुद्ध चेतना वाला साधक बैठता है, तो नाद चार स्तरों पर यात्रा करता है।


 *वैखरी: जो जिह्वा और होंठों से स्थूल ध्वनि बनकर फूटती है (जो दुनिया सुनती है)।


 मध्यमा: जो कंठ और मस्तिष्क में विद्युत-तरंगों की तरह दौड़ती है।


  पश्यन्ती: जो हृदय में आकर 'भाव' का, एक दिव्य प्रकाश का रूप ले लेती है।


 और अंत में 'परा': जहाँ शब्द मिट जाते हैं, ध्वनि शून्य हो जाती है, और केवल नाभि के केंद्र से उठने वाला वह 'महा-स्पंदन' बचता है, जो सीधे परब्रह्म के सर्वर से कनेक्ट होता है!

जब तुम्हारी चेतना 'वैखरी' से फिसलकर 'परा' के उस अथाह शून्य में गिरती है—उस क्षण तुम मनुष्य नहीं रहते; तुम साक्षात वह मंत्र बन जाते हो! उस क्षण यदि तुम 'महामृत्युंजय' का एक स्पंदन भी छोड़ोगे, तो काल का सीना दहल जाएगा!


अब आपके मन में एक बहुत बड़ा प्रश्न होगा कि मनीष जी कलियुग में यह संभव है? 

हाँ, धड़कनें थामिए और प्रयाग फाइल्स में आगे सुनिए, पढ़िए और देखिए!

महर्षि अरविंद ने इस युग के काँपते हुए मनुष्यों को अभयदान दिया था। निराश मत होइए।

यदि तुम्हारा रेडियो धूल और जंग से अटा पड़ा है, तो हताश होकर फेंक मत दो। यह ऋग्वैदिक मंत्र केवल सिद्धों का ऐश्वर्य नहीं, यह तुम्हारे सड़े हुए अंतःकरण का परम डिटॉक्सिफायर (महा-शोधक) भी है!

शुरुआत में जब तुम निष्काम भाव से बैठोगे, तो यह मंत्र तुम्हारे भीतर जमी हज़ारों जन्मों की काई को अपनी प्रचंड फ्रीक्वेंसी से काटना शुरू करेगा। न्यूरॉन्स के टूटे पुल जुड़ेंगे, रीढ़ में फंसी ऊर्जा उर्ध्वगामी होगी, मस्तिष्क की भटकी हुई तरंगें अल्फा और थीटा के महा-सागर में विलीन होने लगेंगी।


उठो! अपने भीतर के उस 'ऋषि' को पुनर्जीवित करो!

काट दो इस डिजिटल कचरे के बंधनों को! फेंक दो उस तामसिक आहार को जो तुम्हारी दिव्यता को पशु बना रहा है!


जप से पहले दस मिनट उस शांत नीरवता में उतरो, जहाँ कोई स्क्रीन नहीं, कोई विचार नहीं। अपने फेफड़ों में उस सनातन प्राणवायु को भरो। और जब उस परम भाव से भरकर तुम्हारे ओंठ कंपित हों

—

तो याद रखना, तुम आज के इस युग के लाचार कीड़े नहीं हो! तुम्हारे भीतर वही रक्त, वही चेतना और वही ऋग्वैदिक डीएनए धड़क रहा है जो विश्वामित्र, वशिष्ठ और भारद्वाज के भीतर धड़कता था।


प्रयाग फाइल्स के हर एक अध्याय का आभार जताते हुए स्क्रीन बंद करो और अपनी आँखें मूँद लो… क्या तुम्हें अपनी रीढ़ के निचले छोर पर एक हल्की सी सिहरन महसूस हो रही है? वह कोई साधारण धड़कन नहीं है—वह 5,000 साल पुरानी उस ऋचा की गूंज है, जो तुम्हारे भीतर जागने के लिए छटपटा रही है! फैसला तुम्हारा है: जिंदगी भर इस जंग लगे रिसीवर में खर-खर सुनते हुए मर जाना है, या इस ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली सर्वर से जुड़कर कालजयी बन जाना है?


 "ब्रह्मांड कभी म्यूट नहीं होता साहब; बस तुम्हारी चेतना ने गलत चैनल ट्यून कर रखा है!"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द.....। 

— अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



जब एक मनुष्य अपनी अंतिम साँस लेता है,

 अपनी उंगली को स्क्रीन से हटा लीजिए। रुक जाइए। अगले तीन मिनट के लिए इस दुनिया के सारे काम छोड़ दीजिए, क्योंकि यदि आपने यह पन्ना पलट दिया, तो आप उस परम सत्य को जानने से चूक जाएँगे जो पिछले पाँच हज़ार वर्षों से समय की गहरी परतों में दबाकर रखा गया था।

क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक मनुष्य अपनी अंतिम साँस लेता है, जब अस्पताल की स्क्रीन पर हृदय की धड़कन एक सपाट, सीधी रेखा बनकर अंतहीन सीटी बजाने लगती है—उस अंतिम शून्य के क्षण में आत्मा के साथ क्या घटित होता है?

विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क की बत्तियाँ एक-एक करके बुझ जाती हैं और केवल सन्नाटा छा जाता है। परंतु सनातन की गुप्त संहिताएँ कहती हैं कि ठीक उसी अंतिम सेकंड में, जब देह का हर दरवाज़ा बंद हो रहा होता है, तब भी चेतना के कमरे की एक गुप्त खिड़की खुली रह जाती है।

और ठीक उसी खिड़की पर आकर खड़े होते हैं स्वयं देवाधिदेव महादेव शिव।

वे उस मरणासन्न आत्मा के दाहिने कान की ओर झुकते हैं। श्मशान की ठंडी राख हवा में उड़ रही होती है। चिता की लपटों के बीच महाकाल उस प्राणी के कान में केवल दो अक्षरों का एक ऐसा पासवर्ड फूँकते हैं, जिसे सुनते ही आत्मा जन्म-मरण के खरबों सालों के चक्रव्यूह को एक झटके में तोड़कर सीधे परब्रह्म के आयाम में विलीन हो जाती है।

वह पासवर्ड कोई रहस्यमयी लंबा अनुष्ठान नहीं, बल्कि वही मंत्र है जिसे आप अब तक केवल पूजा की एक साधारण पंक्ति समझ रहे थे।


‘राम रामेति रमेति, रमे रामे मनोरमे। 

सहस्त्र नाम तत्तुल्यं, राम नाम वरानने॥’

परंतु रुकिए... यहीं से शुरू होता है वह खौफनाक और विस्मयकारी सस्पेंस, जो आपकी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जैसी ठंडी सिहरन दौड़ा देगा:

महादेव ने उस अंतिम विदाई के लिए पूरे ब्रह्मांड के लाखों वेदों, हज़ारों उपनिषदों और स्वयं अपने पंचाक्षरी मंत्र 'नमः शिवाय' को छोड़कर केवल 'राम' नाम को ही क्यों चुना?

आखिर उस दाहिने कान के भीतर वह कौन सा गुप्त न्यूरोलॉजिकल और क्वांटम तार छिपा है, जिसे यह एक नाद छूते ही मस्तिष्क के भीतर 'टाइम डाइलेशन' (समय का रुक जाना) पैदा कर देता है?

और सबसे बड़ा रहस्य—जिसे सुनकर आधुनिक भौतिकी के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों के माथे पर पसीना आ गया है—जब 1000 महा-मंत्रों की आवृत्ति केवल तीन शब्दों में टकराती है, तो वह मानव शरीर के 37 ट्रिलियन सेलों के भीतर किस अदृश्य प्रकाश को विस्फोटित करती है, जो साक्षात् मृत्यु के पंजे को भी निष्प्रभावी कर देता है?

अपनी साँसों को बिल्कुल धीमा कर लीजिए। अपनी आँखें स्क्रीन पर गड़ा लीजिए। क्योंकि जो विच्छेदन अब आप पढ़ने जा रहे हैं, वह आपके अस्तित्व, आपकी मृत्यु और आपके भीतर धड़कती हर एक साँस के ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा...

रहस्य 1: मणिकर्णिका की धधकती चिता और अंतिम द्वार (The Final Frequency)

श्लोक के अंतिम पाद को फिर से देखिए: ‘...राम नाम वरानने॥’

अधिकांश लोग 'वरानने' को केवल एक काव्यात्मक संबोधन समझ लेते हैं कि शिव ने पार्वती को "सुंदर मुख वाली" कहकर पुकारा। परंतु काशी खंड और तंत्र-शास्त्र में 'वरानने' का अर्थ केवल बाह्य सौंदर्य नहीं, बल्कि 'वर' अर्थात् श्रेष्ठतम और 'आनने' अर्थात् मुख-द्वार और संवेदी तंत्रिकाओं का सर्वोच्च शिखर है।

दृश्य की कल्पना कीजिए। अर्धरात्रि का सन्नाटा है। गंगा की काली लहरों के किनारे मणिकर्णिका की चिताएँ धू-धू कर जल रही हैं। हवा में भस्म उड़ रही है। एक देह अपने अंतिम संधिकाल पर है। आधुनिक न्यूरो-क्रिटिकल साइंस और रिससिटेशन बायोलॉजी (Resuscitation Biology) का यह सिद्ध नियम है कि जब किसी मनुष्य की मृत्यु (Clinical Death) होती है, तो शरीर के सभी अंग एक साथ नहीं मरते। सबसे पहले स्वाद की ग्रंथि शिथिल होती है। फिर दृष्टि का पर्दा गिरता है। फिर त्वचा का स्पर्श शून्य होता है। परंतु मस्तिष्क का जो हिस्सा सबसे अंत तक बाहर की दुनिया से संकेत ग्रहण करता रहता है, वह है—ऑडिटरी कॉर्टेक्स (Auditory Cortex—श्रवण तंत्रिका)। जब ईसीजी की रेखा सीधी होने लगती है, तब भी कानों का तंत्र मस्तिष्क के स्टेम तक अंतिम स्पंदन पहुँचा रहा होता है।

अब आपके मन में विचार आ रहा होगा कि मनीष जी ने कोई उदाहरण दिया ही नहीं तो समझ में कैसे आए तो परेशान मत होइए इसे हम सबसे पहले  गहरी नींद में बच्चे को पुकारती माँ के उदाहरण से समझते हैं। ‌

 कभी घर में सोए हुए किसी छोटे बच्चे या दिनभर के थके हुए इंसान को देखिए। आप उसके सामने हाथ हिलाइए—उसे नहीं दिखेगा क्योंकि आँखें बंद हैं। आप उसके ओंठों पर चम्मच से खीर लगाइए—उसे स्वाद नहीं आएगा। आप कमरे की बत्ती बुझा दीजिए—उसे कोई होश नहीं होगा। परंतु जैसे ही माँ उसके सिरहाने जाकर धीमी आवाज़ में फुसफुसाती है—'बेटा, उठो'...


वह तुरंत करवट बदलता है और आँखें खोल देता है! पाँचों इंद्रियों में केवल कान ही वह खिड़की है जिसका पर्दा सोने के बाद भी कभी नहीं गिरता। मृत्यु भी एक महा-निद्रा है। जब शरीर के सारे दरवाज़े एक-एक कर बंद हो चुके होते हैं, तब भी आत्मा के कक्ष की केवल 'कान' रूपी खिड़की खुली रहती है। और महादेव ठीक उसी खुली खिड़की पर आकर खड़े होते हैं!


दाहिना कान क्यों?

 मानव न्यूरोलॉजी के अनुसार, दायाँ कान सीधे मस्तिष्क के बाएँ गोलार्ध (Left Hemisphere) से जुड़ा होता है, जहाँ भाषा और तार्किक चेतना (Wernicke's & Broca's Area) स्थित होती है। मृत्यु के समय जब मस्तिष्क अत्यधिक ऑक्सीजन-विहीनता (Anoxia) के कारण भयंकर भय और पैनिक में डूब रहा होता है, तब कान में गूँजने वाला यह नाद

—‘राम’

—मस्तिष्क के पूरे न्यूरोनल नेटवर्क को भय से खींचकर एक सेकंड में डीप डेल्टा (Deep Delta Transcendence) की परम समाधि में स्थिर कर देता है। शिव ने पार्वती को 'वरानने' कहकर यही समझाया था कि यह ध्वनि कपाल की अंतिम जीवित नस को सीधे मोक्ष के आयाम से जोड़ देती है!

रहस्य 2: 'रा' और 'म' के बीच का 0.01 सेकंड (The Quantum Singularity)

अब अपनी बुद्धि को उस स्थान पर ले आइए जहाँ भौतिकी का हर समीकरण मौन हो जाता है। श्लोक के केंद्र में स्थित नाद को अत्यंत धीमे मोशन में देखिए: ‘रा...’ और ‘...म’।

  'रा' — यह अग्नि है। यह बाहर की ओर फेंका गया प्रस्फोट है, चेतना का विस्तार है।

  'म' — यह जल है। यह होंठों का बंद होना है, महा-विश्रांति है और ऊर्जा का भीतर की ओर खिंचाव है।

परंतु क्या आपने कभी अनुभव किया है कि जब 'रा' का स्वर समाप्त होता है और 'म' के लिए होंठ मिलने वाले होते हैं, उन दोनों के ठीक बीच में एक सेकंड के सौवें हिस्से का एक मूक अंतराल (Silent Gap) आता है?

क्वांटम भौतिकी में इसे ‘ज़ीरो-पॉइंट फील्ड’ (Zero-Point Field) या 'क्वांटम वैक्यूम' कहा जाता है। यह वह शून्य है जहाँ न कोई पदार्थ है, न कोई तरंग, न कोई समय।

अब आप फिर कहेंगे कि मनीष जी पहले कोई उदाहरण तो दे दो तो बिल्कुल लिए हम इसे धड़कनों के बीच का मौन और कैमरे का शटर से समझते हैं। ‌

 अपनी कलाई पर उँगली रखिए। नाड़ी कैसे चलती है? 'धक'... फिर एक छोटा सा ठहराव... फिर 'धक'। कभी सोचा है कि दो धड़कनों के बीच में जो आधा सेकंड का सन्नाटा आता है, उस पल क्या होता है? यदि दिल बिना रुके लगातार धड़कता रहे, तो फट जाएगा। उस दो धड़कनों के बीच के मौन में ही दिल को विश्राम और नई उम्र मिलती है। ठीक वैसे ही, जैसे कैमरे से फोटो खींचते समय 'शटर' एक मिलीसेकंड के लिए गिरता है और लेंस के आगे अंधेरा छा जाता है, पर वही क्षण उस तस्वीर को हमेशा के लिए अमर कर देता है। 'रा' और 'म' के बीच का वह 0.01 सेकंड चेतना का वही शटर है—जहाँ संसार का वीडियो रुकता है और परमात्मा की तस्वीर खिंच जाती है!


प्रयाग फाइल्स में एक और उदाहरण लेते हैं और आसमान में ठहरता झूला से इसको आसानी से समझते हैं। ‌

जब आप किसी बड़े झूले पर झूलते हैं, तो झूला पूरी ताकत से आगे जाता है। फिर जब वह अपनी सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचता है, तो पीछे मुड़ने से ठीक पहले—एक पल के लाखवें हिस्से के लिए—वह हवा में पूरी तरह ठहर जाता है। उस एक सूक्ष्म क्षण में न झूला आगे जा रहा होता है, न पीछे। गति शून्य हो जाती है। 'रा' और 'म' के बीच का वह छोटा सा शून्य वही ठहराव है। उस 0.01 सेकंड के शून्य में उतरने वाला व्यक्ति साक्षात् समय (Time) की परिधि से बाहर छलांग लगा देता है!


रहस्य 3: ध्वनि से पदार्थ का झुकना (Acoustic Radiation Pressure & Cymatics)

अब आइए उस रहस्य पर जिसे हमारे इतिहास में 'पत्थरों का जल पर तैरना' कहा गया। सदियों तक इसे केवल एक चमत्कार मानकर पन्नों में समेट दिया गया।

परंतु आधुनिक भौतिकी के सिद्धांतों को देखिए जहाँ उच्च-तीव्रता वाली पराश्रव्य ध्वनि-तरंगें (Acoustic Standing Waves) जब किसी माध्यम से टकराती हैं, तो वे एक ठोस भौतिक दबाव पैदा करती हैं, जिसे 'एकॉस्टिक रेडिएशन प्रेशर' (Acoustic Radiation Pressure) कहा जाता है। आधुनिक प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक इसी सिद्धांत से ध्वनि-तरंगों के जोर से तरल बूंदों और सूक्ष्म कणों को बिना छुए हवा में स्थिर कर रहे हैं (Acoustic Levitation)। वैज्ञानिक हैंस जेनी (Hans Jenny) का 'साइमैटिक्स' (Cymatics) विज्ञान सिद्ध करता है कि जब किसी माध्यम पर एक विशिष्ट ध्वनि-आवृत्ति छोड़ी जाती है, तो वह माध्यम के सतही तनाव (Surface Tension) और उसकी आंतरिक आणविक ज्यामिति को पूरी तरह पुनर्गठित कर देती है।


मुझे लगता है कि प्राइवेट फाइल्स में अब वक्त हो गया है एक और उदाहरण का। आइये डीजे का लाउडस्पीकर और सीने पर धमक से इसको समझते हैं।

जब किसी सड़क से बड़ा डीजे या ढोल-नगाड़ों का जुलूस गुज़रता है और उसमें गहरा बेस (Bass) बजता है, तो क्या होता है? आप लाउडस्पीकर को छूते भी नहीं हैं, हवा खाली दिखती है, फिर भी आपके सीने की पसलियों में एक धमक महसूस होती है! खिड़कियों के काँच थरथराने लगते हैं, मेज पर रखा खाली गिलास हिलने लगता है। क्यों? क्योंकि आवाज़ केवल सुनाई नहीं देती; आवाज़ में 'वज़न' होता है, आवाज़ में धक्का देने का एक अदृश्य 'हाथ' होता है!

 जब एक सामान्य लाउडस्पीकर काँच कंपा सकता है, तो सोचिए—परब्रह्म के नाद की वह महा-आवृत्ति जब एक लय में टकराई होगी, तो क्या वह जल के सतही तनाव को एक ठोस आधार नहीं दे सकती थी? 'राम' नाम केवल अक्षरों का समूह नहीं था; यह उस विशिष्ट नाद-दबाव की ज्यामिति थी जिसने उस कालखंड में जल के घनत्व को साध दिया था। जब चेतना इस नाद से भरती है, तो मन का भारीपन और अवसाद का बोझ ऐसे ही हल्का हो जाता है जैसे जल की सतह पर संतुलित होता कोई भार!


रहस्य 4: सूर्य-चंद्र नाड़ियों का संतुलन (The Bi-Hemispheric Laser)

मानव शरीर ऊर्जा का एक जटिल डायनेमो है। श्लोक के पहले हिस्से को ध्यान से सुनिए।

 ‘राम रामेति रमेति, रमे रामे मनोरमे...’

यहाँ 'रमे' (अग्नि का वेग) और 'रामे' (शीतलता का ठहराव) का जो द्वैत है, वह सीधे शरीर की दो मुख्य नाड़ियों को साधता है:

 रीढ़ के दाहिने भाग में बहती है—पिंगला (सूर्य नाड़ी), जो ताप, पराक्रम और तार्किकता का संचालन करती है।

 रीढ़ के बाएँ भाग में बहती है—इड़ा (चंद्र नाड़ी), जो शीतलता, विश्रांति और अंतर्ज्ञान का संचालन करती है।

आम मनुष्य के जीवन में या तो सूर्य नाड़ी बहुत उत्तेजित होती है (क्रोध, तनाव, अनिद्रा) या चंद्र नाड़ी बहुत सुस्त (आलस्य, अवसाद, भ्रम)। दोनों कभी एक साथ संतुलित नहीं होते।

'रा' का प्रहार सीधे पिंगला (सूर्य) को जाग्रत करता है। 'म' का अनुनाद तत्काल इड़ा (चंद्र) को सक्रिय कर शांति का आवरण चढ़ा देता है। और जैसे ही साधक कहता है—‘मनोरमे’, ये दोनों विपरीत ऊर्जा-धाराएं रीढ़ के मध्य में स्थित ‘सुषुम्ना नाड़ी’ के मुहाने पर आकर विलीन हो जाती हैं!

प्रयाग फाइल्स के  सरल उदाहरण की कड़ी में आई है साइकिल के दो पैडल सही से बहुत सरल भाषा में समझते हैं।

अगर आप साइकिल चला रहे हों और केवल दायाँ पैडल दबाते रहें, तो साइकिल आगे नहीं बढ़ेगी, बल्कि गिर जाएगी। यदि केवल बायाँ दबाएंगे, तब भी गिर जाएगी। गति तब बनती है जब दायाँ नीचे जाए तो बायाँ ऊपर आए—एक सटीक तालमेल! हमारा शरीर वही साइकिल है। 'रा' दायाँ पैडल है और 'म' बायाँ पैडल। दिनभर हम केवल चिंताओं का एक ही पैडल दबाते-दबाते हाँफ जाते हैं। यह मंत्र दोनों पैडल को एक साथ साध देता है, और जीवन की गाड़ी बिना किसी झटके के अपने-आप सरकने लगती है।


आपको लग रहा होगा कि मनीष जी ने कुछ बेहतर और सरलतम उदाहरण अभी तक नहीं दिया तो गर्म और ठंडे पानी का सटीक मिश्रण आपके इस समस्या को भी हल कर देगा।

यदि आप अत्यधिक खौलते पानी से नहाएंगे तो त्वचा झुलस जाएगी। यदि अत्यधिक बर्फ जैसे ठंडे पानी में उतरेंगे तो शरीर अकड़ जाएगा। परंतु जब गीज़र का गर्म पानी और टंकी का ठंडा पानी एक बराबर अनुपात में मिलकर गिरता है, तो वह समशीतोष्ण जल शरीर के एक-एक रोम की थकान को एक झटके में मिटा देता है। 'रमे' और 'रामे' शरीर का वही आंतरिक थर्मोस्टेट हैं जो प्राण-ऊर्जा को सीधे सुषुम्ना के केंद्रीय मार्ग पर चढ़ा देते हैं।


रहस्य 5: कोशिकाओं से फूटता प्रकाश (Biophotons & Epigenetics)

अब आइए श्लोक की उस पंक्ति पर, जहाँ यह महामंत्र संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी लपेट में ले लेता है।


‘सहस्त्र नाम तत्तुल्यं...’

जर्मन बायो-फिजिसिस्ट फ्रिट्ज़-अल्बर्ट पॉप (Fritz-Albert Popp) ने प्रयोगशाला में सिद्ध किया कि मानव शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका के केंद्रक (DNA Nucleus) से प्रकाश के अत्यंत सूक्ष्म पैकेट लगातार बाहर निकलते हैं, जिन्हें ‘बायोफोटॉन्स’ (Biophotons) कहा जाता है।

 जब कोई व्यक्ति गहरे तनाव, भय या मानसिक विकृति में होता है, तो उसकी कोशिकाओं से निकलने वाला यह प्रकाश असंबद्ध (Incoherent) होकर बिखर जाता है—जैसे किसी टूटे हुए लैंप से टिमटिमाती, बेतरतीब रोशनी छूट रही हो।

 परंतु जब व्यक्ति एक निश्चित लयबद्ध, अनुष्टुप छंद की ज्यामितीय ध्वनि में प्रवेश करता है, तो कोशिकाओं का यह प्रकाश बिखरने के बजाय एक सीधी, सुसंगत लेज़र-बीम (Coherent Light) की तरह प्रवाहित होने लगता है।


सरल उदाहरण के तौर पर हम साधारण टॉर्च बनाम लेज़र लाइट सही से समझने का प्रयास करते हैं।

रात के अंधेरे में एक साधारण टॉर्च जलाइए। उसकी रोशनी पूरे कमरे में फैल जाती है, लेकिन 100 मीटर दूर जाते-जाते दम तोड़ देती है। वह एक कागज़ का टुकड़ा भी नहीं जला सकती। परंतु उसी रोशनी की बिखरी हुई किरणों को जब वैज्ञानिक एक सीधी, केंद्रित रेखा में बाँध देते हैं, तो वह 'लेज़र' बन जाती है—जो लोहे की मोटी चादर को भी मक्खन की तरह चीर देती है! हमारा मन और हमारे शरीर की कोशिकाएँ बिखरी हुई टॉर्च की तरह थीं—कमज़ोर और भटकी हुई। 'सहस्त्र नाम तत्तुल्यं' उन 1000 बिखरी हुई किरणों को एक बिंदु पर लाकर लेज़र बना देता है। फिर कोई मानसिक रोग या कोई भय आपके सामने टिक ही नहीं सकता!


और अंत में, अनुष्टुप छंद के उस 32वें अक्षर की समाप्ति पर ध्यान दीजिए। 'वरानने' का अंतिम स्वर जैसे ही विसर्जित होता है, मुख-गुहा के 32 दाँतों और रीढ़ की 32 संधियों में उत्पन्न हुआ कंपन शांत होकर 'म' की उस अंतिम बिंदु (Singularity) में सिमट जाता है। आधुनिक भौतिकी की 'स्ट्रिंग थ्योरी' (String Theory) मानती है कि यह समूचा ब्रह्मांड सूक्ष्म तारों के कंपन से बना है। जब इस श्लोक का 32वाँ अक्षर पूरा होकर मौन में डूबता है, तो वह मौन साधारण सन्नाटा नहीं होता; वह उस बहु-आयामी ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश-द्वार बन जाता है जहाँ चेतना शरीर की सीमा से ऊपर उठकर साक्षी-भाव में प्रतिष्ठित हो जाती है।

अपने अस्तित्व का साक्षात्कार करिए महाराज। 

अब उस मटमैले कागज़ के टुकड़े को अपने अंतःकरण में देखिए।

वह कोई सामान्य धार्मिक श्लोक नहीं है। वह देवाधिदेव शिव द्वारा माता पार्वती के माध्यम से समूची मानवता को सौंपा गया वह अचूक तांत्रिक ब्लूप्रिंट है, जिसे:

 *गणित ने 10 \times 10 \times 10 = 1000 के संपीड़न के रूप में सिद्ध किया...

  न्यूरोलॉजी ने 43 मांसपेशियों और फेज़-इन्वर्जन के रूप में प्रमाणित किया...

 भौतिकी ने एकॉस्टिक तरंगों और ज़ीरो-पॉइंट फील्ड के रूप में स्वीकारा...

 और अध्यात्म ने जन्म-मरण के पार ले जाने वाले 'तारक नाद' के रूप में अमर कर दिया!

हज़ारों वर्ष पूर्व कैलाश के निर्जन सन्नाटे में महाकाल ने जिस सत्य को समाधि से निकाला था, आज आधुनिक विज्ञान सदियों की ठोकरें खाकर उसी सत्य की दहलीज पर आकर खड़ा हो गया है। जीवित रहिए तो इस नाद के साथ, ताकि संसार की कोई चिंता आपकी आत्मा को छू न सके। और जब कभी यह देह अपनी अंतिम सांस ले, तो भीतर केवल यही गूँज शेष रहे, क्योंकि जिसके अंतःकरण में यह कोड सक्रिय है, उसके लिए न कोई मृत्यु है, न कोई भय।

“ब्रह्मांड की हर आकाशगंगा जिस आधार पर टिकी है, विज्ञान की हर सीमा जहाँ आकर नतमस्तक हो जाती है, और मृत्यु का संताप जहाँ आकर स्वयं भस्म हो जाता है—उस आदि, अनादि और कालजयी महा-ऊर्जा का सनातन नाम केवल एक है


... ‘राम’!”


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ ....। अगली कड़ी जल्द....। 


 अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज