Sunday, October 25, 2026

यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊ : ९६ अंगुल की लंबाई, शास्त्रीय मान्यता और धर्ममय जीवन की प्रतिज्ञा

 ॥ यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊ : ९६ अंगुल की लंबाई, शास्त्रीय मान्यता और धर्ममय जीवन की प्रतिज्ञा 

--- प्रस्तुतीकरण: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट ॥


सनातन धर्म में यज्ञोपवीत केवल सूत का धागा नहीं, अपितु संस्कार, अनुशासन, स्वाध्याय, कर्तव्यबोध और धर्माचरण का पवित्र प्रतीक है। इसका धारण करना मनुष्य को स्मरण कराता है कि जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना, कर्तव्यपालन और लोककल्याण के लिए भी है।


▪️१. यज्ञोपवीत की ९६ अंगुल लंबाई का पारंपरिक आधार :---


सामवेदीय छान्दोग्यपरिशिष्ट के नाम से प्रचलित यज्ञोपवीत-विषयक श्लोक इस प्रकार उद्धृत किया जाता है :—


तिथिर्वारं च नक्षत्रं तत्त्ववेदगुणान्वितम्।

कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णवम्॥


इस श्लोक में यज्ञोपवीत को तिथि, वार, नक्षत्र, तत्त्व, वेद, गुण, काल और मास आदि की संख्याओं के साथ प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा गया है। इसकी परंपरागत व्याख्या में इन संख्याओं का योग ९६ माना जाता है।


वे संख्याएँ इस प्रकार हैं :—


१. तिथि — १५

२. वार — ७

३. नक्षत्र — २७

४. तत्त्व — २५

५. वेद — ४

६. गुण — ३

७. काल — ३

८. मास — १२


इनका योग :—

१५ + ७ + २७ + २५ + ४ + ३ + ३ + १२ = ९६


इस प्रकार ९६ की संख्या को कालचक्र, प्रकृति, तत्त्वज्ञान, वेदविद्या और सृष्टि के विविध पक्षों का स्मरण कराने वाली प्रतीकात्मक संख्या के रूप में समझा जाता है।


यहाँ ध्यान देने योग्य है कि यह गणना परंपरागत व्याख्या पर आधारित है। इसे प्रस्तुत करते समय श्लोक के मूल पाठ और उसके व्याख्यात्मक अर्थ के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए।


▪️२. यज्ञोपवीत धारण करने का वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्य :----


यज्ञोपवीत धारण करने का उद्देश्य केवल बाहरी चिह्न धारण करना नहीं, बल्कि अपने आचरण को धर्म के अनुरूप बनाना है। उपनयन संस्कार के माध्यम से विद्यार्थी को आचार्य के सान्निध्य में विद्या, अनुशासन, स्वाध्याय और संयमपूर्ण जीवन की दिशा प्रदान की जाती है।


शास्त्रीय प्रमाण :—


भगवद्गीता (१७.१४) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :—

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥


भावार्थ : देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानीजनों का सम्मान; पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा—ये शरीर से किए जाने वाले तप के अंग हैं।


इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है कि धार्मिक संस्कारों की सार्थकता सदाचार, संयम, सम्मान और पवित्र जीवन में है। यज्ञोपवीत धारण करने वाला व्यक्ति भी इन गुणों को अपने आचरण में उतारने का निरंतर प्रयत्न करे।


▪️३. यज्ञोपवीत के नौ तन्तु और तीन सूत्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व :---


परंपरागत यज्ञोपवीत में तीन सूत्र तथा प्रत्येक सूत्र में तीन-तीन तन्तुओं की रचना का विधान प्रचलित है। इस प्रकार नौ तन्तुओं की संरचना बनती है। विभिन्न परंपराओं में इनके देवताओं, गुणों और प्रतीकात्मक अर्थों की अलग-अलग व्याख्याएँ भी मिलती हैं।


इनका आध्यात्मिक संदेश यह है कि मनुष्य का जीवन केवल विचारों तक सीमित न रहे, बल्कि उसके विचार, वाणी और कर्म भी पवित्र हों। वह अपने कर्तव्यों को समझे और अपने आचरण में सत्य, संयम, सेवा तथा उत्तरदायित्व को स्थान दे।


यह स्पष्ट रहना चाहिए कि नौ तन्तुओं की संरचना और उनके विशिष्ट प्रतीकार्थों की व्याख्या परंपरागत मान्यताओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।


▪️ ४. गृहस्थ के दो यज्ञोपवीत और उत्तरदायित्व का भाव :---


कुछ धर्मशास्त्रीय परंपराओं में गृहस्थ के लिए दो यज्ञोपवीत धारण करने का विधान बताया गया है। इस परंपरा की एक प्रचलित व्याख्या यह है कि गृहस्थ अपने जीवन के साथ-साथ धर्मपत्नी के प्रति भी अपने दायित्वों का स्मरण रखे।


विवाह केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, सहयोग, मर्यादा और धर्मसम्मत जीवन की साझा जिम्मेदारी भी है।


शास्त्रीय प्रमाण :—


भगवद्गीता (३.१९) में कहा गया है :—

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥


भावार्थ : इसलिए आसक्ति का त्याग करके निरंतर कर्तव्यकर्म करते रहना चाहिए; अनासक्त भाव से कर्म करने वाला मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है।


इस सिद्धांत के अनुसार गृहस्थ का कर्तव्य केवल अपने सुख तक सीमित नहीं है। उसे परिवार, समाज और धर्म के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का भी निष्ठापूर्वक निर्वहन करना चाहिए।


हालाँकि, दो यज्ञोपवीतों को पति-पत्नी के नौ-नौ ग्रहों अथवा सत्ताईस-सत्ताईस नक्षत्रों के ऋण का शास्त्रीय प्रमाण मानने के लिए अलग प्रामाणिक स्रोत आवश्यक है। इस प्रकार की व्याख्या को प्रतीकात्मक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है।


▪️५. अंकगणना, ग्रह और नक्षत्र : परंपरा तथा प्रमाण का अंतर :---


कुछ प्रचलित व्याख्याओं में नौ तन्तुओं को नौ ग्रहों तथा २७ तन्तुओं की गणना को नक्षत्रों से जोड़ा जाता है। इसी क्रम में २७ + ९ = ३६ और ३ + ६ = ९ जैसी अंकगणना प्रस्तुत की जाती है। फिर दो यज्ञोपवीतों की संख्या जोड़कर ११ तथा १ + १ = २ का अर्थ निकाला जाता है।


ये गणनाएँ प्रतीकात्मक अथवा अंकविद्यात्मक व्याख्या के अंतर्गत आती हैं। इन्हें वेद, उपनिषद् या किसी विशिष्ट धर्मशास्त्र का प्रत्यक्ष कथन तभी कहा जाना चाहिए, जब उस ग्रंथ का स्पष्ट और सत्यापित प्रमाण उपलब्ध हो।


धर्म की प्रमाणिकता बनाए रखने के लिए परंपरा का सम्मान करना और प्रत्येक प्रचलित व्याख्या को बिना जाँच शास्त्रवचन घोषित न करना—दोनों आवश्यक हैं।


▪️६. यज्ञोपवीत : काल, कर्तव्य और धर्म का निरंतर स्मरण :---


तिथि, वार, नक्षत्र और मास हमें कालचक्र का बोध कराते हैं। वेद ज्ञान और धर्ममार्ग का स्मरण कराते हैं। प्रकृति के तत्त्व जीवन की व्यापक व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं। इन सबके बीच यज्ञोपवीत धारण करने वाला व्यक्ति स्वयं को धर्माचरण के लिए प्रतिबद्ध माने—यही इस परंपरा का प्रेरक संदेश है।


यज्ञोपवीत धारण करने का अर्थ यह नहीं कि केवल धागा पहन लेने से मनुष्य के सभी दायित्व पूर्ण हो जाते हैं। इसकी सार्थकता तब है, जब वह सत्य बोले, अपने कर्तव्यों का पालन करे, गुरुजनों का सम्मान करे, स्वाध्याय करे, संयम रखे और प्राणिमात्र के प्रति करुणा का भाव विकसित करे।


धर्म केवल बाहरी चिह्न में नहीं, बल्कि आचरण में प्रतिष्ठित होता है। संस्कार का वास्तविक फल तभी प्रकट होता है, जब वह मनुष्य के जीवन को अधिक पवित्र, अनुशासित और उत्तरदायी बनाए।


《 यज्ञोपवीत हमें यह स्मरण कराने वाला पवित्र संस्कार है कि हमारा जीवन धर्म, ज्ञान, कर्तव्य और लोककल्याण से जुड़ा हुआ है। इसकी ९६ की पारंपरिक गणना हमें सृष्टि और काल की व्यापकता का बोध कराती है, जबकि इसका आध्यात्मिक संदेश हमें आत्मसंयम, सदाचार और धर्मनिष्ठ जीवन की ओर प्रेरित करता है।


आइए, यज्ञोपवीत की मर्यादा को केवल बाहरी धारण तक सीमित न रखकर उसके अनुरूप जीवन जीने का संकल्प लें। अपने परिवार, समाज, गौवंश, गुरु-परंपरा और सनातन धर्म के प्रति अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें तथा अपने आचरण से धर्म की गरिमा को प्रतिष्ठित करें। 》


धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणिमात्र में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो। हर हर शंकर, जय जय शंकर।

Friday, October 23, 2026

कौन थीं त्रिजटा?

 *कौन थीं त्रिजटा?*


 राक्षसी कुल में जन्म लेकर भी कैसे बनीं माता सीता की परम हितैषी और 'माता


​श्रीरामचरितमानस का एक-एक पात्र अपनी अनोखी विशेषताओं से परिपूर्ण है, जिसमें त्रिजटा का लघु स्त्रीपात्र आकार में जितना संक्षिप्त है, महिमा में उतना ही गौरवमंडित और अलौकिक है। 


संपूर्ण ‘मानस’ में मुख्य रूप से सुंदरकांड और लंकाकांड में सीता-त्रिजटा संवाद के माध्यम से त्रिजटा का वर्णन मिलता है, किंतु इन संक्षिप्त प्रसंगों में ही उनके चरित्र की महानता पूरी तरह निखर कर सामने आती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने सुंदरकांड में त्रिजटा के स्वरूप का सुंदर परिचय इन पंक्तियों में दिया है


​त्रिजटा नाम राच्छसी एका।

राम चरन रति निपुन बिबेका।।

(रा.च.मा. 5।11।1)


​यह पंक्ति त्रिजटा के चार प्रमुख गुणों को स्पष्ट करती है—वह राक्षसी कुल की होते हुए भी श्रीराम-चरणों में अनन्य अनुराग (रति) रखती हैं, और व्यवहार-निपुण तथा विवेकशीला हैं।


 संतों का मानना है कि ज्ञान, भक्ति और वैराग्य रूपी तीन जटाएं उनके सिर पर सुशोभित हैं, इसीलिए उनका नाम 'त्रिजटा' पड़ा। पारिवारिक रूप से वे विभीषण और सरमा की पुत्री तथा रावण की भतीजी थीं, जहाँ राक्षसी उनका वंश-गुण और रामभक्ति उनका पैतृक संस्कार था।


​लंका की अशोकवाटिका में माता सीता की पहरेदारी और देखभाल के लिए नियुक्त राक्षसियों के दल में शामिल त्रिजटा ने एक हितैषी, परामर्शदात्री और प्राणरक्षिका की भूमिका निभाई। उनके इसी स्नेह और संरक्षण से भावविभोर होकर विरहाकुल और त्रासित सीताजी ने उन्हें 'माता' कहकर संबोधित किया, जैसा कि मानस में वर्णित है


​त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।

मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।

(रा.च.मा. 5।12।1)


​त्रिजटा के घर में निरंतर रामकथा होती थी और हनुमानजी से रामकथा सुनने के कारण उनके हृदय में राम-भक्ति स्वाभाविक रूप से समाहित थी। दानवी होने के कारण वह दानव-मनोविज्ञान को भली-भांति जानती थीं कि राक्षस केवल भय और शक्ति के अधीन होते हैं, जबकि माता सीता जैसी कोमल प्रकृति की देवी को केवल रामयश से ही सांत्वना मिल सकती है। जैसा कि हनुमानजी के आने से पूर्व प्रसंग में भी उल्लेख मिलता है


​तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।

(रा.च.मा. 5।6)


​जब असह्य विरह से व्याकुल होकर माता सीता ने अपनी चिता सजाने और अग्नि देने की प्रार्थना की, तब इस बुद्धिमान रामभक्ता ने रात्रि के समय अग्नि न मिलने का बहाना बनाकर उस अनुरोध को टाल दिया और माता को रामजी के यश का गान सुनाकर शांत किया।


 रावण ने सीताजी को डराने के लिए राक्षसियों को भयंकर रूप बनाकर प्रताड़ित करने का निर्देश दिया था, जिससे सीताजी का दुख और बढ़ गया। व्यवहार-कुशल त्रिजटा के लिए यह असह्य हो गया और उन्होंने राक्षसियों को भय से मुक्त करने तथा सीताजी की सेवा में लगाने के लिए एक विवेकपूर्ण युक्ति रचते हुए एक भयानक स्वप्न की कथा सुनाई। उन्होंने स्वप्न में देखा कि एक वानर ने लंका जला दी है, राक्षसों की सेना मारी गई है, रावण नग्न अवस्था में गधे पर सवार है, उसके सिर मुड़े हुए हैं और बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। रावण यमपुरी की ओर जा रहा है, लंका विभीषण को मिल गई है और चारों ओर श्रीराम की दुहाई फिर गई है।


 इस स्वप्न के प्रभाव से सभी राक्षसियाँ भयभीत होकर जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं, जिससे त्रिजटा ने अपनी दूरदर्शिता और विवेक से प्रत्यक्ष राजभय से बचते हुए राक्षसियों को सन्मार्ग पर लगा दिया।


​लंका के युद्ध प्रसंग में जब रावण के सिर बार-बार कटकर फिर जुड़ जाते थे और वह श्रीराम के बाणों से भी नहीं मरता था, तब अशोकवाटिका में बैठी सीताजी घबरा गईं। उनकी इस दशा को देखकर त्रिजटा ने उन्हें ढांढस बंधाया और समझाया कि श्रीराम रावण के हृदय में इसलिए बाण नहीं मार रहे हैं, क्योंकि उसके हृदय में माता जानकी का निवास है। अंततः, जब रावण के हृदय से आपका ध्यान हटेगा 


(क्योंकि वह हर पल केवल आपको पाने की लालसा में ही आपको याद करता रहता है), तब उसका वध निश्चित है। त्रिजटा के इन वचनों से सीताजी को संबल और शांति मिली।


 माता जानकी ने हनुमानजी को पुत्र और त्रिजटा को माता कहकर अपना संबंध जोड़ा और माता सीता की कृपा से त्रिजटा को अखंड भक्ति का वरदान प्राप्त हुआ। राक्षसी कुल में जन्म लेकर भी त्रिजटा ने अपनी भक्ति, विवेक और व्यवहार-कुशलता से यह सिद्ध कर दिया कि भगवान की भक्ति कुल या योनि की मोहताज नहीं होती, और त्रिजटा का यह चरित्र वास्तव में भक्ति, विवेक और व्यवहारकुशलता का मणिकांचन योग है।

Tuesday, October 20, 2026

प्राचीन भारतीय मंदिर निर्माण का विज्ञान एवं आध्यात्मिक रहस्य

 ॥ प्राचीन भारतीय मंदिर निर्माण का विज्ञान एवं आध्यात्मिक रहस्य --- प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट।


वास्तुपुरुषमण्डल, गर्भगृह, प्रदक्षिणापथ और कुण्डलिनी योग के संदर्भ में एक अध्ययन


भारत की प्राचीन सभ्यता में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के लिए निर्मित भवन नहीं थे। वे धर्म, दर्शन, स्थापत्य, मूर्तिकला, गणितीय अनुपात, धार्मिक अनुष्ठान और आध्यात्मिक साधना के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। प्राचीन भारतीय आचार्यों ने मंदिर निर्माण की परंपराओं में भूमि, दिशा, माप, ज्यामिति, देवप्रतिष्ठा तथा धार्मिक विधानों को विशेष महत्त्व दिया।


भारतीय मंदिर वास्तुकला का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि मंदिर की संरचना के पीछे केवल निर्माण-कौशल ही नहीं, बल्कि गहन प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक चिंतन भी विद्यमान था।


आधुनिक स्थापत्य इतिहास के अध्ययनों में भी इस विषय पर विचार किया गया है कि भारतीय मंदिर की योजना किस प्रकार ब्रह्माण्डीय व्यवस्था, वास्तुपुरुषमण्डल और मानव के धार्मिक अनुभव से जुड़ती है।


🚦१. वास्तुपुरुषमण्डल : मंदिर निर्माण की प्राचीन परंपरा :---


भारतीय वास्तुशास्त्र में वास्तुपुरुषमण्डल का विशेष स्थान है। यह एक ज्यामितीय योजना है, जिसका उपयोग पारंपरिक स्थापत्य में स्थान-विन्यास और धार्मिक प्रतीकात्मकता को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता था।


वास्तुपुरुषमण्डल में वर्गाकार विभाजन, दिशाओं का निर्धारण तथा विभिन्न देवताओं के लिए स्थान निर्धारित करने की परंपरा मिलती है। मंदिर की योजना में गर्भगृह और अन्य स्थापत्य भागों की स्थिति तथा उनके अनुपात को भी महत्त्व दिया जाता था।


युवा जे. किम द्वारा २०१४ में प्रकाशित शोधपत्र Revisiting the Vāstupuruṣamaṇḍala in Hindu Temples, and Its Meanings में वास्तुपुरुषमण्डल के ऐतिहासिक विकास, मंदिर निर्माण में उसकी भूमिका तथा उसके व्यावहारिक और आध्यात्मिक अर्थों का अध्ययन किया गया है।


इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मंदिर निर्माण की परंपरा में ज्यामितीय योजना और धार्मिक प्रतीकात्मकता का परस्पर संबंध था।


अतः प्राचीन मंदिरों को केवल पत्थरों से निर्मित भवन समझना उनके स्थापत्य और धार्मिक महत्त्व को सीमित कर देना होगा।


🚦२. गर्भगृह : मंदिर की आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र :---


मंदिर का गर्भगृह उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण स्थापत्य इकाइयों में से एक है। सामान्यतः इसी स्थान पर आराध्य देवता की मूर्ति अथवा शिवलिंग प्रतिष्ठित किया जाता है।


गर्भगृह का महत्त्व केवल उसके आकार या स्थिति तक सीमित नहीं है। भारतीय उपासना परंपरा में यह वह स्थान है जहाँ भक्त अपने आराध्य का दर्शन करता है और श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करता है।


अनेक मंदिरों में गर्भगृह अपेक्षाकृत सीमित, गंभीर और नियंत्रित प्रकाश वाला स्थान होता है। मंदिर की बाहरी गतिविधियों से भीतर के इस पवित्र स्थान तक पहुँचने की प्रक्रिया भक्त के धार्मिक अनुभव को एक विशेष क्रम प्रदान करती है।


वास्तुपुरुषमण्डल पर आधारित स्थापत्य संबंधी अध्ययनों में भी केंद्रीय स्थान और गर्भगृह के महत्त्व का उल्लेख मिलता है।


इस दृष्टि से गर्भगृह मंदिर की धार्मिक अवधारणा का केन्द्र है, जहाँ स्थापत्य, देवप्रतिष्ठा, दर्शन और उपासना एक-दूसरे से जुड़ते हैं।


🚦३. मण्डप और प्रदक्षिणापथ : उपासना की सुव्यवस्थित व्यवस्था :---


भारतीय मंदिरों में मण्डप, अन्तराल, गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ जैसे स्थापत्य भागों का विशेष महत्त्व है।


मण्डप सामान्यतः स्तम्भों से युक्त सभा अथवा उपासना का स्थान होता है। मंदिर की परंपरा और आकार के अनुसार यहाँ भक्त एकत्र होते हैं, धार्मिक अनुष्ठान होते हैं तथा भजन, संगीत या अन्य धार्मिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं।


अन्तराल गर्भगृह और उसके सामने स्थित मण्डप के बीच का संपर्क-स्थान होता है। हालाँकि, इन भागों की उपस्थिति और संरचना सभी मंदिरों में समान नहीं होती।


प्रदक्षिणापथ वह मार्ग है, जिसके माध्यम से भक्त आराध्य देवता अथवा गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा करता है। यह परिक्रमा श्रद्धा, समर्पण और आराध्य के प्रति सम्मान की धार्मिक अभिव्यक्ति है।


इस प्रकार मंदिर की स्थापत्य योजना भक्त की गतिविधियों को एक क्रम प्रदान करती है—प्रवेश, उपासना, दर्शन और प्रदक्षिणा।


यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी मंदिरों में प्रदक्षिणापथ का निर्माण एक ही प्रकार से नहीं हुआ है। उसकी स्थिति और संरचना मंदिर की शैली, कालखंड तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकती है।


🚦४. मंदिर और मानव शरीर : क्या है इस संबंध का आधार?


भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपराओं में मानव शरीर और ब्रह्माण्ड के बीच संबंध की विभिन्न अवधारणाएँ मिलती हैं। इसी प्रकार कुछ स्थापत्य-व्याख्याओं में मंदिर को विराट पुरुष अथवा ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के प्रतीक के रूप में समझाया गया है।


२००८ में विद्वान वाल्दास जस्कूनास द्वारा प्रकाशित शोधपत्र Measuring the body of god: Temple plan construction and proportional measurement in early texts on north Indian architecture में उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला से संबंधित प्राचीन ग्रंथों में मंदिर की योजना, माप और अनुपात की परंपराओं का अध्ययन किया गया है।


यह अध्ययन बताता है कि मंदिर निर्माण की प्राचीन परंपराओं में गर्भगृह की ज्यामितीय योजना तथा पूरे मंदिर के अनुपात के बीच संबंध को महत्त्व दिया जाता था।


कुछ धार्मिक व्याख्याओं में मंदिर के विभिन्न भागों को मानव शरीर के अंगों के समान भी समझाया गया है। यह संबंध केवल भौतिक संरचना की तुलना नहीं, बल्कि धार्मिक और दार्शनिक प्रतीकात्मकता को समझने का एक माध्यम है।


लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।


मंदिर की संरचना को मानव शरीर के प्रतीक के रूप में समझना और मंदिर के प्रत्येक भाग को किसी विशिष्ट कुण्डलिनी चक्र को जाग्रत करने के लिए निर्मित मानना—ये दोनों अलग-अलग दावे हैं।


पहली अवधारणा के समर्थन में स्थापत्य और प्रतीकात्मकता से संबंधित अध्ययन उपलब्ध हैं। दूसरी अवधारणा को प्रमाणित करने के लिए संबंधित मंदिर, उसके निर्माणकाल और विशिष्ट शास्त्रीय निर्देशों के आधार पर अलग प्रमाण आवश्यक हैं।


🚦५. कुण्डलिनी योग और प्राचीन मंदिर : एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण :---


कुण्डलिनी योग भारतीय योग तथा तान्त्रिक साधना की परंपराओं से संबंधित विषय है। इसमें कुण्डलिनी, चक्र और आध्यात्मिक साधना के विभिन्न चरणों की चर्चा मिलती है।


इस विषय में महाराष्ट्र के देवलाणे स्थित जोगेश्वर मंदिर से संबंधित एक विशेष शोध उल्लेखनीय है।


२०२१ में South Asian Studies नामक शोध-पत्रिका में A Unique Sculptural Illustration of Kuṇḍalinīyoga at Jogeśvara Temple, Devalane, Maharashtra शीर्षक से एक शोधपत्र प्रकाशित हुआ।


इस शोध में जोगेश्वर मंदिर के शिल्पांकनों का अध्ययन किया गया है, जिनमें सर्प के प्रतीक के माध्यम से कुण्डलिनी के जागरण और आरोहण की अवस्थाओं को दर्शाने की व्याख्या की गई है। शोधकर्ताओं ने इन शिल्पांकनों को समझने के लिए शैव तान्त्रिक, हठयोग और नाथ परंपरा से संबंधित संस्कृत ग्रंथों सहित अन्य साहित्यिक स्रोतों का अध्ययन किया।


यह शोध इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि इससे एक विशिष्ट ऐतिहासिक मंदिर में कुण्डलिनी योग से संबंधित अवधारणाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रमाण मिलता है।


अर्थात् मंदिरों और योग-साधना के बीच संबंध केवल आधुनिक कल्पना का विषय नहीं है; कुछ विशिष्ट ऐतिहासिक मंदिरों में योग-संबंधी विचारों की अभिव्यक्ति के पुरातात्त्विक एवं कलात्मक साक्ष्य उपलब्ध हैं।


लेकिन इस प्रमाण का सही अर्थ समझना भी उतना ही आवश्यक है।


जोगेश्वर मंदिर में कुण्डलिनी योग से संबंधित शिल्पांकन का होना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि सभी प्राचीन मंदिर सात कुण्डलिनी चक्रों के अनुसार बनाए गए थे अथवा उनमें प्रत्येक स्थान पर जाने से संबंधित चक्र जाग्रत हो जाता था।


इस निष्कर्ष के लिए प्रत्येक मंदिर की योजना, उसके शिल्पांकन और संबंधित ग्रंथों के प्रमाणों का अलग अध्ययन करना होगा।


🚦६. क्या मंदिर में जाने से मानसिक शांति मिलती है?


अनेक श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करने पर मानसिक शांति, एकाग्रता और संतोष का अनुभव करते हैं। इस अनुभव का धार्मिक महत्त्व है और इसे श्रद्धालुओं की उपासना-परंपरा के संदर्भ में समझा जा सकता है।


मंदिर का शांत वातावरण, आराध्य के प्रति श्रद्धा, मन्त्र-जप, प्रार्थना, नियमित उपासना और सामूहिक भक्ति व्यक्ति के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं।


मंदिर की संरचना, प्रकाश, ध्वनि और आसपास का वातावरण भी उपासना के अनुभव में भूमिका निभा सकते हैं।


हालाँकि, किसी मंदिर में शांति का अनुभव होना इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि वहाँ किसी विशेष कुण्डलिनी चक्र का जागरण हुआ है।


इसी प्रकार, कुण्डलिनी जागरण जैसे आध्यात्मिक अनुभवों को केवल मंदिर के किसी स्थापत्य भाग से जोड़कर सार्वभौमिक नियम के रूप में प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त प्रमाण आवश्यक हैं।


आस्था और प्रमाण के बीच यह अंतर बनाए रखना हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को अधिक गंभीरता से समझने में सहायक है।


🚦७. प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला का वास्तविक महत्त्व :---


प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला में धार्मिक विचारों, स्थापत्य कौशल, गणितीय अनुपात, ज्यामिति, मूर्तिकला और अनुष्ठानों का समन्वय दिखाई देता है।


मंदिर निर्माण की परंपराओं में वास्तुपुरुषमण्डल, गर्भगृह, मण्डप, शिखर, देवप्रतिष्ठा और प्रदक्षिणा जैसे अनेक पक्षों का महत्त्व रहा है।


इन सभी विषयों का अध्ययन करते समय हमें तीन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।


पहली, जिन स्थापत्य सिद्धान्तों और धार्मिक परंपराओं का प्राचीन ग्रंथों तथा ऐतिहासिक मंदिरों से समर्थन मिलता है, उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के रूप में प्रस्तुत किया जाए।


दूसरी, जिन विषयों की व्याख्या प्रतीकात्मक या दार्शनिक है, उन्हें उसी रूप में समझाया जाए।


तीसरी, जिन दावों के लिए अभी पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें सिद्ध ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रचारित करने से बचा जाए।


इस प्रकार अध्ययन करने से सनातन संस्कृति के प्रति श्रद्धा और उसके ज्ञान के प्रति गंभीरता दोनों सुरक्षित रहते हैं।


❗️निष्कर्ष : आस्था के साथ प्रमाणिक ज्ञान का संरक्षण❗️


भारत के प्राचीन मंदिर हमारे पूर्वजों की स्थापत्य-दृष्टि, धार्मिक चेतना, कलात्मक प्रतिभा और दार्शनिक चिंतन के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं।


वास्तुपुरुषमण्डल से संबंधित शोध मंदिर की ज्यामितीय एवं प्रतीकात्मक योजना को समझने में सहायता करता है। मंदिर के गर्भगृह, मण्डप और प्रदक्षिणापथ की संरचना उपासना की व्यवस्थित परंपरा को सामने लाती है। जोगेश्वर मंदिर के कुण्डलिनी योग संबंधी शिल्पांकन यह दिखाते हैं कि कुछ विशिष्ट मंदिरों में योग-संबंधी अवधारणाओं को कलात्मक रूप में अभिव्यक्त किया गया था।


इन तथ्यों के आधार पर मंदिर वास्तुकला और आध्यात्मिक साधना के संबंध का गंभीर अध्ययन किया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक मंदिर को सात कुण्डलिनी चक्रों के अनुसार निर्मित मानने अथवा वहाँ जाने से चक्र जाग्रत होने का दावा करने से पहले विशिष्ट प्रमाणों की आवश्यकता है।


हमारा उद्देश्य अपनी प्राचीन परंपराओं का सम्मान करना, उनके वास्तविक ज्ञान को समझना और प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना होना चाहिए।


सनातन संस्कृति की महिमा केवल हमारे गौरवशाली अतीत में ही नहीं, बल्कि उस ज्ञान को सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विवेक के साथ समझने के हमारे प्रयास में भी निहित है।


॥ धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो। ॥

Sunday, October 18, 2026

॥ वेदों के उपाङ्ग ॥

 ॥ वेदों के उपाङ्ग ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


🔸️ वेदों के चार उपाङ्ग हैं ---  

पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र।


यहां पर उपपुराणों का भी पुराण में अंतर्भाव हैं। वैशेषिक शास्त्र का न्याय में, वेदान्त शास्त्र का मीमांसा में, महाभारत तथा रामायण आदि इतिहास ग्रन्थ तथा सांख्य, पातन्जल (योग), पाशुपत और वैष्णव आदि का धर्मशास्त्रों में अंतर्भाव है।


▪︎ १ . पुराण :---  पुराण अठारह हैं, जिनके नाम हैं = ब्रह्म-पद्म-विष्णु-शिव-भागवत-नारद-मार्कण्डेय-अग्नि-भविष्य-ब्रह्मवैवर्त-लिंग-वाराह-स्कन्द-कूर्म-गरुड़-मत्स्य-ब्रह्मांड। इसके अतिरिक्त उपपुराण हैं, जिनमें सूर्य- कालिका- नृसिंह- जमदग्नि आदि हैं।


▪︎ २ . न्याय :---   यह दो प्रकार का है, कणाद जी का वैशेषिक व गौतम जी का न्याय दर्शन।


"आन्वीक्षिकी पंचध्याय" नाम वाला शास्त्र गौतम जी का बनाया पांच अध्यायों में है।  

प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टांत-सिद्धांत-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-छल-जाति और निग्रहस्थान --- इन सोलह पदार्थों के उद्द्येश्य, लक्षण और परीक्षा द्वारा तत्त्वज्ञान कराना आन्वीक्षिकी विद्या का प्रयोजन है।


कणाद मुनि ने ६ अध्यायों में वैशेषिक-शास्त्र का निर्माण किया। द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय ---- इन ६ भाव और सातवें अभाव पदार्थ के साधर्म्य और वैधर्म्य का बोध कराना ही इसका प्रयोजन है। न्यायपद से ही इस शास्त्र का भी कथन किया गया है।


▪︎ ३ . मीमांसा :---   कर्ममीमांसा और शारीरिकमीमांसा के भेद से मीमांसा भी दो प्रकार की है।


"अथातो धर्मजिज्ञासा" से आरम्भ करके "अन्वाहार्ये च दर्शनात्" पर्यन्त बारह अध्यायों में भगवान् जैमिनी मुनि ने कर्ममीमांसा की रचना की है। 


उसमें धर्मप्रमाण-धर्मभेदाभेद-शेषशेषिभाव-क्रत्वर्थ पुरुषार्थ भेद से प्रयुक्तिविशेष- श्रुत्यर्थपाठादिक्रमभेद- अधिकारविशेष- सामान्यातिदेश, विशेषातिदेश-ऊह-बाध-तन्त्र और प्रसङ्ग ---


इस क्रम से बारह अध्यायों में बारह पदार्थों का निरूपण किया गया है। ऐसे ही जैमिनी मुनि ने चार अध्यायों में "संकर्षकाण्ड" नामक एक अन्य शास्त्र भी बनाया है, वह यद्यपि "देवताकाण्ड" से ही प्रसिद्ध है, तथापि उपासनारूप कर्म का प्रतिपादक होने से कर्ममीमांसा के ही अंतर्गत आता है। इसे वेद का पूर्वपक्ष होने से पूर्वमीमांसा के नाम से भी जानते हैं।


🔹️ शारीरिकमीमांसा :---   

"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" से आररम्भ करके "अनावृत्ति: शब्दात्" तक चार अध्यायों में शारीरिकमीमांसा नाम से भगवान् बादरायण (व्यास जी) ने एक शास्त्र बनाया है, जिसे उत्तर मीमांसा, ब्रह्मसूत्र, वेदान्त-दर्शन आदि भी कहते हैं। इसपर श्रीकण्ठाचार्य, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य---  इन सभी ने भाष्य किये हैं। 

शांकरभाष्य पर आनन्द गिरि, भामती, वेदान्त-कल्पतरु, वेदान्त-कल्पतरु-परिमल, रत्नप्रभा, प्रभृति आदि संस्कृत टिकाएं हैं।


आनन्द गिरि जी का न्याय निर्णय, वाचस्पति मिश्र की भामती, अप्पयदीक्षित का वेदान्त-कल्पतरु तथा अमलानन्द का वेदान्त-कल्पतरु-परिमल है।


▪️इसमें चार अध्याय हैं ---- 

प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद हैं।


इसके पहले अध्याय के प्रथम पाद में सभी उपनिषदों के वाक्यों का साक्षात् अथवा परम्परा से प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म में तात्पर्य बताया गया है तथा स्पष्ट रूप से ब्रह्मज्ञान कराने वाले वाक्यों पर विचार किया है।


दूसरे अध्याय के पहले पाद में सांख्ययोग, वैशेषिक तथा स्मृतियों में आये हुये विरोधी वचनों का वेदान्त में समन्वय किया है। दूसरे पाद में सांख्यादि अनेक मतों के दोषों को दिखाकर परपक्ष का खण्डन और अपने पक्ष का समर्थंन किया है। 

तीसरे पाद में पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुई सृष्टि के विषय में श्रुतियों के विरोधी वचनों का परिहार किया है। जैसे == छान्दोग्य उपनिषद् में पहले असत् से जगत् की उत्पत्ति पुनः सत् से जगत् की उत्पत्ति कही गई है, किन्तु सामवेद में अग्नि-जल-पृथ्वी--- इन तीन से ही उत्पत्ति कही है, इन सभी शंकाओं का समाधान किया है। तीसरे पाद में जीव विषयक शंकाओं का समाधान है। चौथे पाद में इंद्रियों से सम्बंधित श्रुतियों के विरोध का परिहार है।


तीसरे अध्याय में ब्रह्म प्राप्ति के साधन बताये हैं। प्रथमपाद में जीव के परलोक गमन से स्वर्गादि की प्राप्ति का कथन करके वैराग्य का निरूपण किया है। दूसरे पाद के पूर्व भाग में त्वं पदार्थ का शोधन तथा उत्तर भाग में तत् पदार्थ का शोधन है।  तीसरे पाद में निर्गुण परमात्मा के अनेक वेद की शाखाओं का तात्पर्य बताया है तथा प्रसङ्ग से प्राप्त सगुण ब्रह्मविद्या के विषय में सगुण ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने वाले अन्य साधनों का उपसंहार किया है। चौथे पाद में निर्गुण ब्रह्मविद्या की प्राप्ति कराने वाले बहिरङ्ग साधन वर्णाश्रम धर्म तथा यज्ञदानादि का निरूपण है। इसी पाद के अंत में ब्रह्मज्ञान तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के अन्तरङ्ग साधन शमदमादि सहित श्रवण-मनन-निदिध्यासनादि का निरूपण है।


तीसरे अध्याय में सगुण ब्रह्मविद्या तथा निर्गुण ब्रह्मविद्या के फलविशेष का वर्णन किया गया है। इसके प्रथम पाद में श्रवण-मनन-निदिध्यासन के अभ्यास से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति तथा सगुणोपासना के अभ्यास से इष्ट देव का दर्शन करके जीवन में ही उपासक द्वारा पुण्य-पाप के सम्बंध से रहित होकर मुक्ति की प्राप्ति का वर्णन किया है।

 

दूसरे पाद में जीव एक शरीर से निकलकर अन्य शरीर या अन्य लोक में कैसे जाता है, इसका विचार है। तीसरे पाद में सगुण ब्रह्मवेत्ता के मरने पर उत्तरायण मार्ग से कौन गति की प्राप्ति होती है, इसका वर्णन है। चौथे पाद के आरम्भ में निर्गुण ब्रह्मवेत्ता की विदेह कैवल्य मुक्ति का वर्णन है, इसके अंत में सगुण ब्रह्मवेत्ता की ब्रह्मलोक में कैसी स्थिति होती है , इसका वर्णन है।


यह वेदान्त-दर्शन सभी शास्त्रों का शिरोमणि है, अतः मुमुक्षुओं को इस शास्त्र का श्रवण-मनन-निदिध्यासन अवश्य करना चाहिए ---- 

ऐसा भगवान् शंकराचार्य जी ने कहा है। इसकी प्रशंसा दूसरे आचार्यों ने भी की है।


"कर्मशास्त्रे कुतो ज्ञानं तर्के नैवास्ति निश्चय:।

सांख्य योगो भिदापन्नो- शाब्दिका: शब्द तत्परा:।।

अन्ये पाखण्डिन: सर्वे ज्ञानवार्तासु दुर्बला:।

एकं वेदान्तविज्ञानं स्वानुभूत्या विराजते।।"


अर्थ==  कर्मशास्त्र के पढ़ने से ज्ञान नहीं होता। गौतम तथा कणाद के तर्क से निश्चय नहीं है। सांख्य और योग के भेद से युक्त वैयाकरणी शब्द के पीछे लिंग और विभक्ति की चिन्ता में ही लगे रहते हैं। इन पांचों के अतिरिक्त नास्तिक दर्शन वेद का खण्डन करने वाले पाखंडी हैं, अतः इन ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त नहीं होता, ये ज्ञान-चर्चा में दुर्बल है। एकमात्र वेदान्त-विज्ञान ही ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है।


▪︎ ४ .  धर्मशास्त्र :---  धर्मशास्त्रों में मनु- याज्ञवल्क्य- विष्णु- यम- अंगिरा- वसिष्ठ- दक्ष- संवर्त- शातातप- पराशर- गौतम- शंख- लिखित- हारीत- आपस्तम्ब- उशना (शुक्राचार्य)- व्यास- कात्यायन- वृहस्पति- देवल- नारद-पैठिनसि आदि मुनियों द्वारा निर्मित स्मृतियां कही जाती हैं। इन समस्त स्मृतियों में वर्णाश्रम धर्म के विभागों का निरूपण है। इनके अतिरिक्त वाल्मीकि जी तथा व्यासजी द्वारा रचित रामायण, महाभारत --- ऐतिहासिक ग्रन्थ भी धर्मशास्त्र के अंतर्गत है। सांख्यादि पांच दर्शनों का धर्मशास्त्र के अंतर्गत होने पर भी अलग से निर्देश है।

       

【पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत गुरुवंश पुराण के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के पांचवें अध्याय के आधार पर】

॥ वेदाङ्ग ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


🔸️ वेद के ६ अंग हैं :---

शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और कल्प।


● १. शिक्षा :---  इसमें वेद का शुद्ध पाठ करने के लिये ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त, समाहार, स्वरित्,अनुनासिक आदि भेद से शिक्षा दी गई है, क्योंकि उच्चारणज्ञान के न होने से अनर्थ की प्राप्ति होती है। सर्ववेदों के लिए साधारण शिक्षा को श्री पाणिनी मुनि ने "अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि" इत्यादि से आरंम्भ करके नौ खंडों में प्रकाशित किया है और प्रत्येक वेद के लिए भिन्न-भिन्न शिक्षायें 'प्रातिशाख्य' नाम से अन्यान्य ऋषियों ने बनाई है।


● २. व्याकरण :---  वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये, व्याकरण का मुख्य प्रयोजन है। प्राचीन काल में आठ प्रकार के व्याकरण थे। इनका पाणिनि ऋषि ने सारांश अपने अष्टाध्यायी व्याकरण में दिया है। इसके आरम्भ में भगवान् शङ्कर के डमरू से निकले १४ सूत्रों का वर्णन है। अष्टाध्यायी के सूत्रों पर कात्यायन ऋषि का वार्तिक है तथा पतञ्जलि ऋषि का महाभाष्य है। इन तीनों पर कैय्यट ऋषि ने विस्तार से टीका की है। 


▪️सूत्र, वार्तिक तथा भाष्य के लक्षण इस प्रकार से हैं :---


"अल्पाक्षरसन्दिग्धम् सारवद् विश्वतोमुखम्।

अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः।।"


जिसमें बहुत थोड़े अक्षर हों, किन्तु अर्थ सन्देह रहित हो, विश्वतोमुखी अर्थ (गागर में सागर भरा हुआ) सूत्र के विशेषज्ञों ने उसे सूत्र कहा है।


☆ वार्तिक :---   "उक्तानुक्त दुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते।

तं ग्रँथं वार्तिकं प्राहु: वार्तिकज्ञा: मनीषिणः।।"

मूल में कही हुई बात, न कही हुई बात तथा कठिन कही हुई बात की चिंता जहां होती है, वार्तिक के मर्म जानने वाले विद्वानों ने उसे वार्तिक कहा है।


☆ भाष्य :---  "सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वाक्यै: सूत्रानुकारिभि:।

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदोविदुः।।"

सूत्रकार के वाक्यों के अनुसार जहां अर्थ किया जाता है तथा अपने द्वारा कहे शब्दों की व्याख्या की जाती है, भाष्य के जानने वाले विद्वानों ने उसे भाष्य कहा है।


● ३. निरुक्त :---  शिक्षा, व्याकरण से वर्णों का शुद्ध उच्चारण होने पर भी वैदिक मंत्रों का अर्थ जानने की इच्छा से जो ग्रन्थ रचा जाता है, उसे निरुक्त कहते हैं। भगवान् यास्काचार्य ने १३ अध्यायों में निरुक्त की रचना की है। निरुक्त दो प्रकार का है= लौकिक निरुक्त, वैदिक निरुक्त ;  दोनों रचना इन्ही की है। लौकिक निरुक्त में महाभारत, पुराण, रामायण आती है, वैदिक निरुक्त में वैदिक देवता, द्रव्यपदार्थ के पर्यायवाची शब्दों का निरूपण है, इसको वैदिक निघण्टु भी कहते हैं। यह ५ अध्यायों में है। यास्काचार्य के अतिरिक्त अमरकोष, मेदिनी कोष आदि भी निरुक्त के अंतर्गत ही आते हैं।


● ४. छन्द :---  इसके कर्ता पिंगल ऋषि हैं। यह शास्त्र भी दो प्रकार का है --  लौकिक, वैदिक।

वैदिक छन्दों में गायत्री, उष्णिग्, अनुष्टुप्, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती आदि सात छन्द हैं। लौकिक छन्दों में शार्दूलविक्रीड़ित सृग्धरा, विराट् आदि अनेक छन्द हैं।


● ५. ज्योतिष :---  वैदिक काल के काल ज्ञान के लिए ; गर्गाचार्यादि अनेक ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस शास्त्र से सम्बंधित ग्रन्थ लिखें हैं।


● ६. कल्प :---  शास्त्रीय गुणों के उपसंहार में वैदिक अनुष्ठान का क्रमानुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए कल्प-सूत्रों की रचना हुई है। चारों वेदों के भिन्न-भिन्न कल्पसूत्र हैं। अथर्ववेद से सम्बंधित के लिए बौधायन, आपस्तम्ब, कात्यायन आदि के सूत्र हैं तथा सामवेदी प्रयोगों के लिए लाटायन-ब्रिहियायन आदि सूत्र हैं।


ये वेद के ६ अंग हुये। जैसे हमारे शरीर में मुख, नासिका, नेत्र, पैर, श्रोत्र आदि अंग हैं, वैसे ही व्याकरण भगवान् वेद का मुख, शिक्षा नासिका, निरुक्त चरण, छन्द श्रोत्र, कल्प हाथ, ज्योतिष नेत्र हैं।


----- पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत "गुरुवंश पुराण" के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के चतुर्थ अध्याय के आधार पर

॥ उपवेद ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गान्धर्ववेद, अथर्ववेद का अर्थशास्त्र


▪️आयुर्वेद :--- 

इसके आठ अंग है।


सूत्र-शरीर-इंद्रियां-चिकित्सा-निदान-विमान-कल्प-सिद्धि।

इनके उपदेशक प्रजापति ब्रह्मा, अश्विनी कुमार, धन्वन्तरि, इंद्र, भारद्वाज, आत्रेय, अग्निवेश्य, पतञ्जलि जी हैं।


▪️धनुर्वेद :---

यह चारों पादों से युक्त हैं। इसके कर्ता विश्वामित्र हैं। 


▪️इसके चार पाद हैं :--- दीक्षा पाद, संग्रह पाद, सिद्धि पाद, प्रयोग पाद। पहले पाद में धनुष के लक्षण और अधिकार का निरूपण है। धनुष को आयुध कहते हैं।


▪️धनुर्वेद के चार भेद हैं :---

मुक्त-अमुक्त-मुक्तामुक्त-यन्त्रमुक्त।


▪️मुक्त :---  

जिसका हाथ से प्रहार किया जाता है, जैसे चक्र, हथगोला आदि।


▪️अमुक्त :--- 

जिसको हाथ से नहीं छोड़ा जाता जैसे तलवार आदि।


▪️मुक्तामुक्त :--- शल्य आदि।

▪️यन्त्रमुक्त :--- वाण आदि।


मुक्तों को अस्त्र और अमुक्तों को शस्त्र कहते हैं। 

जैसे-- ब्रह्मास्त्र, वैष्णवास्त्र, पाशुपत अस्त्र।


धनुर्वेद के संग्रह पाद में देवताओं के मंत्रों सहित चारों प्रकार के आयुधों का वर्णन है। इसमें क्षत्रियों का ही अधिकार है।


दीक्षा पाद में शस्त्रों के विशेषण तथा लक्षण दिये हैं।


सिद्धि पाद में गुरु-परम्परा से मन्त्रों की सिद्धि, देवताओं की कृपा तथा अभ्यास का निरूपण है।


प्रयोग पाद में देवताओं की पूजा के अभ्यास से सिद्ध अस्त्र विशेष के प्रयोग का वर्णन है।


इस उपवेद का प्रयोजन दुष्टों का वध तथा प्रजा पालन है।


▪️गान्धर्ववेद :--- 

इस वेद के रचयिता भरतमुनि हैं। इसमें नृत्य, गीत, वाद्यादि के बहुत से भेदों का विस्तार है। इस उपवेद का प्रयोजन देवताओं की आराधना द्वारा निर्विकल्प समाधि से मुक्ति की प्राप्ति है।


▪️अर्थशास्त्र :---  

इसके अनेकों भेद हैं। उनमें से नीति शास्त्र, अश्व शास्त्र, गज शास्त्र, शिल्प शास्त्र, पाक शास्त्र तथा चौसठ कला शास्त्र है।


【पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत गुरुवंश पुराण के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के तृतीय अध्याय के आधार पर】

Saturday, October 17, 2026

पुष्कर

 पुष्कर

१. अर्थ-

(१) पुष्कर-पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है, पुष्ट करने वाला। इसके कई अर्थ हैं, किन्तु सामान्यतः यह कमल के लिये प्रयुक्त होता है। पृथ्वी भी पुष्कर है, जो जीवों को पुष्ट करती है।

इसका एक पर्याय पद्म है। पृथ्वी पद्म है, जिस पर पद रखते हैं।

अन्य प्रचलित शब्द कमल है, जो क = जल का मल या उससे उत्पन्न है। लक्ष्मी को कमला कहते हैं। सम्पत्ति रूप में यह क = कर का मल है, हाथों के परिश्रम से उत्पन्न। अतः सम्पत्ति को हाथ का मैल कहते हैं। लक्ष्मी को पद्मा, पद्मालया, भी कहते हैं-

लक्ष्मी पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिर्प्रिया। (अमर कोश, १/१/२७) 

कमल का पत्ता जल से उत्पन्न होता है, कितु उससे जल चिपकता नहीं है। इसी प्रकार जीवन्मुक्त व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (गीता, ५/१०)

कमल जल जैसे स्रोत से सृष्टि का प्रतीक है। अतः इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कर्ता या यज्ञ रूप विष्णु के नाभि से कही जाती है, जिस पर स्रष्टा रूप ब्रह्मा आसीन हैं। ब्रह्मा का ज्ञान रूप सरस्वती भी पद्म पर स्थित हैं।

पद्म दल का अर्थ है, सृष्टि की विविध दिशायें या प्रकार। सृष्टि केन्द्र रूप में इसे उल्ब (गर्भ-नाल), मेरु भी कहते हैं। 

(२) ब्रह्मा रूप- गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, शिव के स्वरूप-

ब्रह्मा-मूल स्रोत पदार्थ, ३ धामों के ७ लोक, ज्ञान रूप त्रयी वेद, प्रतीक-पलास, दण्ड से ३ पत्ते निकलने पर मूल भी बचा रहता है। इसी तरह त्रयी विभाजन के बाद अविभाज्य अथर्व वेद रहता है।

विष्णु-सृष्टि इच्छा, सृष्टि निर्माण-विनाश क्रिया, व्यक्ति रूप से स्वतन्त्र चेतना जिसका प्रतीक अश्वत्थ है (गीता, १०/२६)

शिव-मूल चेतना, तेज स्तरों का अनुभव, मन के भीतर ज्ञान दाता। प्रतीक वट वृक्ष है जिसकी हवाई जड़ से वैसा ही वृक्ष बनता है। गुरु ज्ञान दे कर अपने जैसा शिष्य बनाता है।

पृथ्वी पर मनुष्य रूप में ब्रह्मा द्वारा सभ्यता और ज्ञान का विकास, प्रजापति। सृष्टि की असुरों से रक्षा के लिए विष्णु के १० या ३२ अवतार। शिव के अवतार २८ व्यास।

२. आधिदैविक पद्मनाभ-

आधिदैविक तथा आध्यात्मिक अर्थ भौतिक शब्दों के ही अर्थ का विस्तार है, जिसे वृद्धि कहा गया है। भागवत माहात्म्य में कहा है कि ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति द्रविड में हुई, वृद्धि कर्णाटक में। ज्ञान का मूल वेद है, वह श्रुति आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निसर्ग से प्राप्त ज्ञान है, अतः इसे श्रुति तथा निगम कहते है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां अर्थों का विभिन्न संस्थाओं में विस्तार हुआ, उसे कर्णाटक कहा गया।

उत्पन्ना द्रविडे साऽहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥

(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)

वृद्धि अर्थ में मनुष्य द्वारा जो पृथ्वी पर दीखता है, उसी का आकाश में विस्तार करते हैं। यथा पिण्डे, तथा ब्रह्माण्डे-मनुष्य शरीर की ब्रह्माण्ड से तुलना विस्तार से चरक संहिता, शरीर स्थान, अध्याय ५ में है। मनुष्य का जन्म माता के गर्भ में होता है तो उसका शरीर माता के गर्भ से नाल द्वारा जुड़ा रहता है। आकाश में भी सृष्टि के हर स्तर पर स्रष्टा पुरुष की नाभि कमल से सृष्टि रूप ब्रह्मा की उत्पत्ति का वर्णन है।

(१) हिरण्यगर्भ मेरु या उल्ब-अव्यक्त ब्रह्म पूरुष (४ पाद का), हिरण्यगर्भ रूप सृष्टि का आरम्भ उल्ब है, उससे उत्पन्न विश्वों का क्रम ब्रह्मा रूप है। विश्व क्रम हैं-संयती (पूर्ण विश्व), क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड, आकाशगङ्गा), रोदसी (सौर मण्डल), पृथ्वी। सूर्य से प्रकाश का विकिरण उसका रुदन है, उसका क्षेत्र रोदसी। ब्रह्माण्ड के खर्व संख्यक सूर्यों के मिलित रुदन को क्रन्दन कहते हैं, उसका क्षेत्र क्रन्दसी है।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 

यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥ 

यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 

(ऋक्, १०/१२१/१,४-६, अथर्व, ४/२/३-५, ७)

हिरण्यगर्भ से ब्रह्माण्ड जन्म पुराणों में भी है, जहां इसे मेरु तथा उल्ब भी कहा है।

एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्योऽण्डमभवत् बृहत् तदुदके शयम्॥३६॥

तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥

स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥

यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥

मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥ (कूर्म पुराण, १/४)

ब्रह्माण्ड पुराण (१/१/३/२५-२९) में प्रायः यही वर्णन है।

(२) स्वयम्भू मण्डल-यह खर्व ब्रह्माण्डों का समूह है। ब्रह्माण्डों के बीच परस्पर आकर्षण (संकर्षण) ही उल्ब या पद्म है, जिस पर ब्रह्माण्ड स्थित है।

(३) कूर्म मेरु-यह ब्रह्माण्ड का निर्माण क्षेत्र है, जो उससे १० गुणा बड़ा है। इसका आकार ब्रह्माण्ड से १० गुणा बड़ा, अर्थात् ५६ अहर्गण (शक्वरी छन्द = रात्रि क्षेत्र) है। जगती छन्द ब्रह्माण्ड की माप है, गायत्री लोकों की माप है (मनुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी, सौर मण्डल की भूमि, ब्रह्माण्ड, पूर्ण जगत् क्रमशः २ घात २४ = कोटि गुणा बड़े हैं-विष्णु पुराण, २/७/३-४)। त्रिष्टुप् सौर मण्डल के क्षेत्रों तथा महर्लोक की माप है।

यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्या त्रैष्टुभं निरतक्षत।

यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इतद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋक्, १/१६४/२३)

शङ्कु भवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतँ शङ्कुना तद्दाधार॥११॥

तद् (शङ्कु साम) उ सीदन्तीयमित्याहुः॥१२॥ (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ११/१०/११-१२)

सप्तपदा वै तेषां (छन्दसां) परार्ध्या शक्वरी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/९/२/१७)

यदिमाँल्लोकान् प्रजापतिः सृष्ट्वेदं सर्वमशक्नोद्यदिदं किञ्च तच्छक्वर्योऽभवंस्तच्छक्वरीणां शक्वरीत्वम्॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ५/७)

मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः। 

शङ्कोः शतसहस्राणि योजनानि वपुः स्थितम्॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्म चक्र)

(शङ्कु = शंख = १० घात १३, शत सहस्र शङ्कु = १० घात १८, ब्रह्माण्ड = १००० योजन की पृथ्वी x १ कोटि x १ कोटि)

(४) परमेष्ठी मेरु-ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी रचना होने के कारण परमेष्ठी है। इसका केन्द्र कृष्ण (Black hole) है जिसके आकर्षण से ३०,००० प्रकाश-वर्ष (प्रकाश योजन) की दूरी पर सूर्य उसके केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। 

अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥ यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१-२) 

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥

(ऋक्, १/३५/२, वाजसनेयि यजु ३३/४३, तैत्तिरीय संहिता, ३/४/११/२)

आकृष्णेन = आकर्षण द्वारा, ब्लैक होल द्वारा जो सभी रंगों को आकर्षित करता है।

(५) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है, जिसने अपने आकर्षण से पृथ्वी को धारण किया है।

पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)-यह निम्न वेद मन्त्र का सारांश है-

अनवर्णे इमे भूमी इयं चासौ च रोदसी, किं स्विदत्रान्तराभूतं येनेमे विधृते उभे। विष्णुना विधृते भूमी इति वत्सस्य वेदना, इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या, व्यष्टभ्नाद् रोदसी विश्णवेते वाधयं पृथ्वीमभिति मयूखैः। (तैत्तिरीय आरण्यक, १/८/४/६)

सूर्य ‘यह’ या निकट का सविता है, इसका असौ, यत् या एष से संकेत है। गायत्री मन्त्र का तत्-सविता, सूर्य के पिता का भी पिता या परमपिता है।

असौ बा आदित्यो (सूर्यः) बृहज्ज्योतिः (शतपथ ब्राह्मण, ६/३/१/१५)

य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, १४/१/४/२)

सूर्य का आकर्षण कमल-नाल है, उस पर पृथ्वी ही पद्म है। 

इयं (पृथिवी) वै पुष्करपर्णम् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/१२)

तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥

तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवी रूपमुत्तमम्। 

नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ (पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, ४०/२-३)

३. पार्थिव पुष्कर-

(१) मनुष्य ब्रह्मा- महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में ७  ब्रह्मा का वर्णन है-

(१) मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश, 

(२) नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को, 

(३) वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है। उनसे त्रिसुपर्ण ऋषि को उपदेश। गर्ग संहिता (६/१४/८) में अपान्तरतमा द्वारा गौतम-पुत्र मेधावी को पर्वत बनने का शाप , (७/४०/३५) में अपान्तरतमा ऋषि द्वारा हरिण उपद्वीप (मलगासी द्वीप, मृगव्याध या मृगतस्कर = मगाडास्कर) में तप, अपान्तरतमा आश्रम में गरुड के पक्ष का पतन, (७/४२/२३) में अपान्तरतमा शकुनि द्वारा शम्बर आदि दैत्यों को मोक्ष उपाय रूप में भक्ति के प्रकारों का कथन, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण (१/८/२७) में अपान्तरतमा ऋषि का ब्रह्मा के गले से प्रादुर्भाव), (१/१२/४) में ब्रह्मा - पुत्र, (१/२२/१७) में अपान्तरतमा नाम की निरुक्ति, तैत्तिरीय आरण्यक (८/९) सायण भाष्य में अपान्तरतमा का जन्मान्तर में कृष्ण द्वैपायन व्यास बनना।)

(४) आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।

(५) आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।

(६) अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।

(७) पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।

इनके अतिरिक्त २ अन्य ब्रह्मा थे। स्वायम्भुव मनु के बहुत बाद सभ्यता नष्ट हो गयी तो द्वितीय व्यास कश्यम ने उसका उद्धार किया। अतः उनको भी ब्रह्मा तथा प्रजापति कहा गया है। उनका समय १७,५०० ईपू. था जब अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष का अन्त और आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक्, १/८९/१०, वाज. यजु, २५/२३)  

राजस्या ब्रह्मणोंऽशेन मारीचः कश्यपोऽभवत्॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/३/१०५)

कश्यपो ब्रह्मणोंऽशश्च पृथिव्या अदितिस्तथा॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७१/२३८) 

द्वापरे प्रथमो व्यासो मनुः स्वायम्भुवो मतः॥१॥

द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥२॥ (कूर्म पुराण, पूर्व भाग, अध्याय ५२)

इनके कई स्थान अनुमानित हैं-कैस्पियन समुद्र (नाम समानता), कश्मीर या कश्यप-मीर (नीलमत पुराण), या थाइलैण्ड के बैंगकाक तथा चम्पक पर्वत वियतनाम की प्राचीन राजधानी चम्पा) के बीच मणिपर्वत पर। सम्भवतः यहां के मेरु को मणिपर्वत कहा है।

विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे। शतयोजन विस्तीर्णं द्वियोजन शतायतम्॥१६॥ 

विपुलं चम्पकवनं सिद्ध चारण सेवितम्॥१७॥ तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः।

सिद्ध साध्य गणाकीर्णं नानाश्रुति विभूषितम्॥२२॥ (वायु पुराण, ३७/१६-२२)

पुष्कर कई थे अतः वहां क ब्रह्मा भी भिन्न होंगे।

(२) त्रिपुष्कर-पुराण में ३ पुष्करों का उल्लेख है (पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)-

पृथूदके गयाशीर्षे नैमिषे पुष्करत्रये॥ (स्कन्द पुराण, ६/४/३७)

स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-

ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।

मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।

कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।

तीन पुष्कर स्थानों की तरह त्रिपुष्कर योग भी होता है- 

त्रिपादेषु च ऋक्षेषु यदा भद्रा तिथिर्भवेत्॥५७॥ 

भौमादित्यशनैश्चारी विज्ञेयं तत् त्रिपुष्करम्॥५८॥(अग्नि पुराण, १२१/५७-५८)

(३) पुष्कर द्वीप के ब्रह्मा-इनका स्थान पुष्कर द्वीप या दक्षिण अमेरिका कहा है (मत्स्य पुराण, १२३/३९, विष्णु पुराण, २/८/८/५, ऋक्, ६/१६/१३) । इनके स्थान से ४ दिशाओं में ४ राजपथ जाते थे। यह पेरु का कुजको या उसके निकट का स्थान हो सकता है। यह इंका (इनः = सूर्य) साम्राज्य की राजधानी थी और यहां से पूरे अमेरिका में ४ दिशाओं में मार्ग थे।

त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥

तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)

न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥

(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)

न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९)

यहां भी मेरु था, जिसका नाम अमेरु (अपर मेरु = पश्चिमी मेरु) है, जिससे द्वीप का नाम अमेरिका हुआ। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६अंश १२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९अंश ३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है।इस परम्परा को नष्ट करने के लिए एक काल्पनिक स्पेनी लुटेरे अमेरिगो वेस्पुसी की कहानी गढ़ी गयी है, जिसे अमेरिका नाम का स्रोत कहा जा सके। मूल अमेरिकी सभ्यता तथा इतिहास नष्ट करने का अभियान अभी तक चल रहा है।

(४) द्वितीय पुष्कर-यह उज्जैन से १ मुहूर्त अर्थात् १२ अंश पश्चिम था। इस स्थान पर आज बुखारा है (प्राचीन ईरान राज्य, वर्तमान उजबेकिस्तान) जो पुष्कर का अपभ्रंश है। 

एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः। 

त्रिंशद् भागन्तु मेदिन्यास्तदा मौहूर्त्तिकी गतिः॥ (विष्णु पुराण, २/८/२६)

इस स्थान पर अधिकतम दिन मान १६ गण्टा है जो वेदाङ्ग ज्योतिष में माना गया है (ऋक् ज्योतिष, ७)।

यहां प्राङ्-मेरु (पूर्वी मेरु) है जिसका अपभ्रंश पामीर है। यहां से ४ दिशाओं में पर्वत हैं।

(५) इन्द्रप्रस्थ पुष्कर-इसकी ४ दिशाओं में ४ नदियां हैं।

श्रूयते पुष्करंनाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। ब्रह्मणा निर्मितं तत्र यच्च योजनमात्रकम्॥४॥ 

उत्तरे चन्द्रभागाया नद्या यावत्सरस्वती। दक्षिणे करतोयायाः सीमेयं पुष्करत्रये॥५॥ 

(स्कन्द पुराण, नागरखण्ड, १७९/४-५) 

यहां सरस्वती नदी की पूर्ववाहिनी धारा भी आरम्भ होती है, जिसका प्रयाग में गङ्गा-यमुना के साथ त्रिवेणी-सङ्गम होता था।

एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती।॥१२६॥ पुण्यस्य पुण्यताकारि पञ्चस्रोता सरस्वती॥१२८॥

पुष्करे तु विशेषेण पूतात् पूततमा हि सा। नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता॥२३३॥

दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा॥२३४॥ प्राची सरस्वतीं प्राप्य योयोऽन्यं तीर्थं हि मार्ग ते॥२३५॥

पुष्करारण्यमासाद्य पुनस्तस्मात् सरस्वती॥२४७॥

अन्तर्धानं गता गन्तुं प्रवृत्ता पश्चिमा मुखी। नाति दूरे ततस्तस्य पुष्करस्य सुशोभना॥२४८॥

(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१८/१२६-२४८)

इस पुष्कर में ब्रह्मा के भवन का नाम वैराज था। उनकी सभा कान्तिमती थी इसके मेरु का नाम श्रीनिधान (अज) था, जिसे अजमेर कहते हैं। 

श्रीनिधानंपुरं मेरोः शिखरे रत्न-चित्रितम्॥३॥ वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥९॥

सभा कान्तिमती नाम देवानां शर्मदायिका। ऋषि संघ समायुक्ता मुनिवृन्द निषेविता॥१३॥

अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद् विष्णु-नाभिजम्। पुष्करं प्रोच्यते तीर्थं ऋषिभिर्वेदपाठकैः॥२०॥

(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१५/९-२०)

यहां अर्बुद (आबू) पर्वत ही अर्णव से उत्पन्न कमल है-

इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानं अर्बुदस्य। (अथर्व सं, २०/९१/१२, ऋक्, १०/६७/१२)

वाक् को भी अर्बुद कहा है-वाग्वा अर्बुदम् (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१६/३)

विद्या रूपी सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी हैं।

४. आध्यात्मिक पुष्कर-

शरीर के सभी चक्रों को कमल कहा है, जिसके दलों की संख्या ४, ६, १०, १२, १६, २ हैं। उसके ऊपर सहस्रार में १,००० दल हैं। मूलाधार से मतिष्क केन्द्र आज्ञा चक्र तक को संवित् कमल कहा गया है। मस्तिष्क के वाम-दक्षिण भाग २ पक्षी हैं, इनका सूक्ष्म रूप जीव-आत्मा है। वेद में इनको २ सुपर्ण कहा है।

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥

(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)

सुषुम्ना चेतना या ज्ञान का वृक्ष है। उसके मध्य (आज्ञा चक्र) में २ सुपर्ण (हंस, पक्षी) रहते हैं (परिषस्वजाते-पड़ोस में)। उनमें अन्य (एक) पिप्पल (पिब् + फल = जिस फल में आसक्ति हो) को स्वाद सहित खाता है। अन्य (दूसरा) बिना खाये (बिना आसक्ति = अनश्नन्) केवल देखभाल करता है। आकाश में भी सृष्टि निर्माण का क्रम (स्वयम्भू से पृथ्वी तक) स्कम्भ या वृक्ष है। इसके हर स्तर पर ब्रह्म के २ रूप हैं, निर्विशेष निर्लिप्त रहता है, विशिष्ट रूप विविध या विशिष्ट सृष्टि करता है। निर्विशेष में भेद नहीं होने के कारण उसका वर्णन नहीं होता, उपवर्णन हो सकता है। 

मनुष्य शरीर में इन हंसों को जीव और आत्मा कहते हैं। आत्मा निर्लिप्त है, जीव कर्म में लगा है। जीव और आत्मा को ही बाइबिल में ईव और आदम कहा गया है। 

समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।

यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ (शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)

संवित्-कमल को बाइबिल में ज्ञान का वृक्ष कहा है। मस्तिष्क में जो सूचनाओं का संग्रह है, वह अप् = जल है। उसके भीतर से क्रमबद्ध ज्ञान (जो वाक्य में लिखा जा सके) दूध जैसा उपयोगी है। यही मन के हंस द्वारा जल से दूध निकालना है। भौतिक रूप में मान सरोवर का हंस जल में दूध के मिश्रण से दूध नहीं निकाल सकता।

--- त्रिस्कन्धज्योतिर्विद 

Friday, October 16, 2026

नवरात्रि को देखने का आपका नजरिया

 "सावधान! इसे पढ़ने के बाद नवरात्रि को देखने का आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल जाएगा।" 2016 में जब जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओहसुमी को यह साबित करने के लिए चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया कि "उपवास (Fasting) करने से शरीर की कोशिकाएं अपने ही भीतर मौजूद सड़े-गले, मृत और कैंसरकारी कचरे को खाकर भस्म कर देती हैं", तब पूरी दुनिया आधुनिक विज्ञान की मेधा के आगे नतमस्तक हो गई। वैश्विक शोध पत्रिकाओं ने इसे 'ऑटोफैगी' (Autophagy) नाम देकर चिकित्सा जगत की सबसे क्रांतिकारी खोज घोषित कर दिया। लेकिन आधुनिक जगत यह पूछना भूल गया कि जिस क्रियाविधि को सिद्ध करने में 21वीं सदी के इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप और अरबों डॉलर की प्रयोगशालाएं लग गईं, वही सटीक फॉर्मूला भारत के सनातन पंचांग में उस समय से क्यों दर्ज है जब दुनिया को यह भी नहीं पता था कि कोशिका (Cell) और डीएनए (DNA) की संरचना क्या होती है?


यदि आपको लगता है कि नवरात्रि केवल नौ दिन भूखे रहने, शाम को फलाहारी नमकीन चबाने, गरबा-डांडिया के उल्लास में झूमने और लाउडस्पीकर पर भजन बजाने का एक सामाजिक पर्व है—तो क्षमा कीजिए, आप सनातन के सबसे बड़े, सबसे परिष्कृत वैज्ञानिक अनुसंधान से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। जिसे लोक परंपरा 'त्योहार' समझकर मनाती है, वह वास्तव में खगोल भौतिकी (Astrophysics), काल-गणना, न्यूरोबायोलॉजी (Neurobiology), सेल्युलर डिटॉक्सिफिकेशन और सामाजिक मनोविज्ञान का ऐसा अभेद्य महाप्रयोग है जिसकी मिसाल पूरी मानव सभ्यता में नहीं मिलती।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने इसे 'नव-दिन' कभी नहीं कहा। शास्त्रों का प्रत्येक पन्ना इसे साधिकार 'नव-रात्र' पुकारता है। दिन तो संसार की माया है, दृश्य जगत का कोलाहल है, इंद्रियों का भटकाव और धूप की तपिश है। रात्रि वह अनंत गर्भ है जहां नक्षत्र आकार लेते हैं, जहां बीज की खोल टूटती है, जहां गर्भाशय में भ्रूण का निर्माण होता है और जहां टूटे हुए परमाणु खुद को पुनर्गठित करते हैं। नौ रातों का यह चक्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि मानव देह को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सिंक्रोनाइज़ (Synchronize) करने का छह-माही महायज्ञ है।

1. खगोलीय रणभूमि: जब आकाश में दो युग टकराते हैं

सनातन काल-गणना का आधार सूर्य और चंद्रमा की परस्पर सापेक्ष गतियां हैं। वर्ष में मुख्य रूप से चार नवरात्र आते हैं—दो प्रत्यक्ष (चैत्र और आश्विन) और दो गुप्त (आषाढ़ और माघ)। विचारणीय प्रश्न यह है कि प्रत्यक्ष नवरात्र केवल चैत्र और आश्विन में ही क्यों मनाए जाते हैं?

खगोल विज्ञान (Astronomy) की दृष्टि से देखिए। यह वह समय है जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपने विषुव (Equinoxes) के बिंदु पर पहुंचती है।


वसंत विषुव (Vernal Equinox): मार्च का समय (चैत्र नवरात्र), जब शीत ऋतु विदा होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है।

शरद विषुव (Autumnal Equinox): सितंबर-अक्टूबर का समय (आश्विन नवरात्र), जब ग्रीष्म विदा होती है और शीत ऋतु की देहरी सजती है।

विषुव वह खगोलीय घटना है जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा के ऊपर चमकता है और पृथ्वी के दोनों गोलार्धों में दिन और रात की अवधि लगभग 12-12 घंटे बराबर हो जाती है। इस संधिकाल में पृथ्वी का भू-चुंबकीय क्षेत्र (Geomagnetic Field) और सौर विकिरण (Solar Radiation) का आपतन कोण एकाएक बदलता है।


        शीत ऋतु (Winter) ────────┐

                                 ├── [ऋतु संधिकाल: विषुव (Equinox)] ──► यमदंष्ट्रा (महा-संक्रमण काल)

        ग्रीष्म ऋतु (Summer) ────┘


चरक और सुश्रुत की चेतावनी: 'यमदंष्ट्रा'

आयुर्वेद के प्रणेता महर्षि चरक और शल्यक्रिया के पितामह सुश्रुत ने इस मौसमी बदलाव के कालखंड को सामान्य समय नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इसे कहा—‘यमदंष्ट्रा’। अर्थात साक्षात काल या यमराज की दाढ़!

ऋतु संधि के इस संक्रमण काल में अचानक तापमान घटता-बढ़ता है, वायुमंडल में आर्द्रता (Humidity) का अनुपात अनियंत्रित होता है और परिणामतः अदृश्य सूक्ष्मजीवियों, संक्रामक पैथोजेन्स, बैक्टीरिया और वायरसों का अभूतपूर्व विस्फोट होता है। प्रकृति में चारों ओर दुर्बलता और क्षय का वातावरण पसरता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी पुष्टि करता है कि मौसमी फ्लू, श्वसन तंत्र के संक्रमण और वायरल बुखार सबसे ज्यादा इन्हीं दो संधिकालों में फैलते हैं।


आप सोच रहे होंगे कि मनीष जी अगर शुरू से ही उदाहरण देते चले तो आसानी से समझ में आएगा तो लीजिए बिल्कुल सरल उदाहरण कार का गियर बदलना से इसे समझिए। 


 जब आप किसी तेज रफ्तार गाड़ी को तीसरे गियर से सीधे पांचवें गियर में डालते हैं, तो आप पहले क्लच दबाकर एक्सीलेटर छोड़ते हैं। यदि क्लच दबाए बिना सीधे गियर का लीवर खींचेंगे, तो गियरबॉक्स के दांत टूट जाएंगे और गाड़ी का इंजन सीज हो जाएगा। ग्रीष्म से शीत में जाना प्रकृति का गियर बदलना है। इस समय यदि आप वही गरिष्ठ भोजन, वही तामसिक दिनचर्या और वही भागदौड़ जारी रखेंगे, तो देह का जैविक इंजन ध्वस्त हो जाएगा। नवरात्रि वह नौ दिन का 'न्यूट्रल गियर' है, जिसमें गति को स्वेच्छा से धीमा करके, क्लच दबाकर, शरीर को आगामी छह महीने के नए मौसम के अनुकूल ढाला जाता है।

2. नौ का अखंड गणित: अंकशास्त्र और कॉस्मिक कोड

नौ दिन ही क्यों? दस क्यों नहीं? सात या पांच क्यों नहीं?

सनातन परंपरा में संख्याओं का चुनाव कभी यादृच्छिक (Random) नहीं होता। गणितीय दर्शन की आंख से देखिए। शून्य से लेकर नौ तक की अंक-प्रणाली में नौ (9) अंतिम और सर्वोच्च पूर्ण अंक (Highest Single-Digit Number) है।


अंकशास्त्र और बीजगणित में 9 को 'अक्षय अंक' या 'दिव्य स्थिरांक' माना जाता है। नौ के किसी भी गुणज (Multiple) के अंकों को परस्पर जोड़िए, परिणाम सदैव नौ ही निकलकर आएगा:

9 \times 2 = 18 \longrightarrow 1 + 8 = 9 


9 \times 5 = 45 \longrightarrow 4 + 5 = 9 


9 \times 13 = 117 \longrightarrow 1 + 1 + 7 = 9


 9 \times 432 = 3888 \longrightarrow 3 + 8 + 8 + 8 = 27 \longrightarrow 2 + 7 = 9


सनातन ब्रह्मांड विज्ञान के काल-चक्र को देखिए:

कलियुग: 4,32,000 वर्ष (4+3+2+0+0+0 = 9)


द्वापर युग: 8,64,000 वर्ष (8+6+4+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


त्रेता युग: 12,96,000 वर्ष (1+2+9+6+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


सत्ययुग: 17,28,000 वर्ष (1+7+2+8+0+0+0 = 18 \rightarrow 1+8 = 9)


महायुग: 43,20,000 वर्ष (4+3+2 = 9)


नौ वह अमर संख्या है जो कभी विकृत नहीं होती, जो किसी भी संख्या के साथ मिलकर अंततः स्वयं को ही प्रकट करती है। यह परब्रह्म और आदिशक्ति की अखंडता का गणितीय प्रमाण है। जब आप नौ दिनों की साधना में प्रवृत्त होते हैं, तो आप वास्तव में शून्य से पूर्णता की उस नौ-चरणीय ज्यामिति को अपनी चेतना में दोहरा रहे होते हैं।

3. घटस्थापना और 'जौ' (यव): वेदी पर स्थापित वैदिक कृषि अनुसंधान

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना होती है। तांबे या मिट्टी के कलश के नीचे बलुई दोमट मिट्टी की एक गोल वेदी बनाई जाती है और उसमें जल छिड़ककर 'यव' यानी जौ के दाने बोए जाते हैं। नई पीढ़ी इसे केवल पंडित जी की बताई पूजा विधि मानकर अनदेखा कर देती है, किंतु एक पत्रकार और खोजी दृष्टि से जब आप इसके मूल में उतरते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन सजीव मृदा-परीक्षण और अंकुरण प्रयोगशाला (Seed Germination & Soil Viability Lab) थी।

                                [घटस्थापना: वेदी निर्माण]

                                           │

                        ┌──────────────────┴──────────────────┐

                        ▼                                     ▼

             [घर/खेत की स्थानीय मिट्टी]              [संग्रहीत बीज: यव (जौ)]

                        │                                     │

                        └──────────────────┬──────────────────┘

                                           ▼

                             [9 दिनों का नियंत्रित संवर्धन]

                                           │

         ┌─────────────────────────────────┼─────────────────────────────────┐

         ▼                                 ▼                                 ▼

   [सघन, सीधे, हरे अंकुर]         [पीले, मुरझाए, टेढ़े अंकुर]            [अंकुरण में विफलता]

         │                                 │                                 │

         ▼                                 ▼                                 ▼

[उच्च अंकुरण दर / बंपर फसल]       [सूक्ष्म पोषक तत्वों का अभाव]         [दूषित बीज / अनुपजाऊ मिट्टी]

   (खेत बुवाई हेतु उपयुक्त)            (खाद व जल प्रबंधन आवश्यक)             (बीज परिवर्तन का संकेत)


आश्विन नवरात्र के ठीक बाद पूरे भारतवर्ष में किसान अपनी सबसे मुख्य रबी फसल (गेहूं, जौ, सरसों, चना) बोने खेतों में उतरते हैं। प्राचीन काल में आज जैसी कृषि विज्ञान केंद्र या डिजिटल सॉइल-टेस्टिंग लैब नहीं थीं। ऋषियों ने प्रत्येक गृहस्थ और कृषक कुल के लिए यह अनिवार्य नियम बना दिया कि खेत में लाखों बीजों को झोंकने से पहले, अपने घर के पवित्र ईशान कोण में उस मिट्टी और बीजों का एक छोटा सा 'नमूना' (Sample) वेदी पर स्थापित करो।

नौ दिनों तक आचमन के शुद्ध जल, धूप और दीप के नियंत्रित तापमान में जौ का परीक्षण होता था।


यदि 9 दिनों में जौ की पत्तियां सघन, गहरे हरे रंग की और सीधी आकाश की ओर लहलहाती हुई 6 से 8 इंच तक बढ़ गईं, तो यह इस बात का प्रत्यक्ष बायो-इंडिकेटर (Bio-indicator) था कि बीज की जीवन-क्षमता (Viability) 95% से अधिक है और मिट्टी में कोई रोगाणु नहीं हैं। किसान निश्चिंत होकर बुवाई करता था कि फसल बंपर होगी।


यदि पत्तियां पीली, दुर्बल या मुड़ी हुई निकलती थीं, तो यह चेतावनी थी कि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी है या बीज में फंगस लग चुका है—इसे तुरंत बदलो!


अब प्रयागराज फाइल्स में वक्त हो गया है एक और उदाहरण का तो सरल उदाहरण खेत का लिटमस पेपर से इसे समझने का प्रयास करते हैं। 

आज किसी जल संयंत्र में पानी की शुद्धता जांचनी हो तो केमिस्ट लिटमस पेपर या इलेक्ट्रॉनिक सेंसर का इस्तेमाल करता है। हमारे पूर्वज वैज्ञानिकों ने जौ के दाने को प्रकृति का 'लिविंग लिटमस पेपर' बना दिया था। बिना एक पैसा खर्च किए, धर्म के अनुशासन में बांधकर, पूरे राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा (Food Security) को सुरक्षित रखने की यह कितनी विस्मयकारी व्यवस्था थी!

4. त्रिगुण दर्शन: चेतना के तीन महास्तंभ

दुर्गा सप्तशती और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, ब्रह्मांड का समस्त विस्तार तीन मूल गुणों से संचालित है: तमस् (Inertia/Darkness), रजस् (Kinetic/Passion), और सत्व (Consciousness/Purity)।

मनुष्य का मन भी इन्हीं तीन परतों में कैद है। साधारण अवस्था में व्यक्ति तामसिक वृत्तियों (आलस्य, भय, काम, क्रोध, अवसाद) में आकंठ डूबा रहता है। उसे सीधे ज्ञान या समाधि में नहीं धकेला जा सकता। इसी कारण नवरात्रि के नौ दिनों को तीन-तीन दिनों के तीन वैज्ञानिक चरणों में विभाजित किया गया।


कालखंड

अधिष्ठात्री महाशक्ति

मनोवैज्ञानिक व जैविक स्तर

क्रियात्मक स्वरूप

प्रथम 3 दिन (प्रतिपदा–तृतीया)

महाकाली

तमोगुण संहार: अंतस के विकारों का दमन।

मूलाधार व स्वाधिष्ठान का शोधन; टॉक्सिन्स का निष्कासन।


मध्य 3 दिन (चतुर्थी–षष्ठी)

महालक्ष्मी

रजोगुण परिशोधन: ऊर्जा का रचनात्मक दिशा-परिवर्तन।

मणिपूरक व अनाहत चक्र का सक्रियण; ओज व प्राण संचय।


अंतिम 3 दिन (सप्तमी–नवमी)

महासरस्वती

सत्वगुण प्रतिष्ठा: प्रज्ञा, विवेक और बोध का उदय।

विशुद्धि, आज्ञा व सहस्रार का प्रबोधन; मानसिक स्थिरता।


यह क्रम आकस्मिक नहीं है। जब तक आप किसी गंदे बर्तन से काई और मैल को खुरचकर बाहर नहीं फेंकेंगे (काली), तब तक उसमें शुद्ध स्वर्ण-जल नहीं भर सकते (लक्ष्मी)। और जब तक पात्र स्वच्छ और बहुमूल्य नहीं होगा, तब तक उसमें आत्मज्ञान का अमृत (सरस्वती) टिक ही नहीं सकता।

5. नवदुर्गा और नव-औषधि: मार्कंडेय पुराण का गुप्त चिकित्सा विज्ञान

अधिकांश लोग नवदुर्गा को केवल देवी के नौ काल्पनिक चित्र मानते हैं। किंतु मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत 'कवच' के प्रारंभिक श्लोकों में स्वयं ब्रह्माजी ने महर्षि मार्कंडेय को नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को नौ दिव्य वनस्पतियों और औषधियों के रूप में प्रकट किया था। यह भारत का वह प्रिवेंटिव मेडिसिन चार्ट (Preventive Medicine Chart) है जिसे मौसमी संधिकाल में देह को निरोगी रखने के लिए रचा गया था:

1. शैलपुत्री ➔ हरड़ (हरीतकी)

हिमवान की पुत्री शैलपुत्री आयुर्वेद की प्रधान औषधि 'हरड़' की अधिष्ठात्री हैं। यह सात प्रकार की होती है और त्रिफला का मुख्य घटक है। मौसमी संधिकाल में पेट की जठराग्नि मंद होते ही यह पाचक रसों को संतुलित करती है और आंतों का शोधन करती है।

2. ब्रह्मचारिणी ➔ ब्राह्मी (Bacopa monnieri)

तप और संयम की देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात मेध्य रसायन 'ब्राह्मी' हैं। उपवास के दौरान जब शरीर में शर्करा का स्तर गिरता है और मस्तिष्क में चिड़चिड़ापन या घबराहट होती है, तब ब्राह्मी न्यूरोट्रांसमीटर्स को शांत कर स्मरण शक्ति, एकाग्रता और मानसिक धैर्य को अक्षुण्ण बनाए रखती है।

3. चंद्रघंटा ➔ चंदुसूर (चमसूर / Halim Seeds)

मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी चंद्रघंटा 'चंदुसूर' की प्रतीक हैं। यह औषधि फाइटोएस्ट्रोजेन, आयरन और फोलिक एसिड से भरपूर होती है। यह रक्त को शुद्ध कर शरीर के दुबलेपन और हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करती है।

4. कूष्मंडा ➔ पेठा (कुम्हड़ा / Ash Gourd)

अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली कूष्मंडा देवी साक्षात 'पेठा' हैं। कुम्हड़ा संसार की सबसे क्षारीय (Most Alkaline) सब्जियों में से एक है। यह पेट के अत्यधिक अम्लीय (Acidic) स्राव को सोखकर अल्सर, गैस और मानसिक उन्माद को शांत करता है।

5. स्कंदमाता ➔ अलसी (Flaxseeds)

भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का स्वरूप 'अलसी' है। अलसी ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटी-ऑक्सीडेंट्स का विशाल भंडार है। यह वात, पित्त और कफ के त्रिदोष को शांत कर हृदय धमनियों में रक्त के थक्के जमने से रोकती है।

6. कात्यायनी ➔ माचिका (मोइया / अंबा हल्दी)

महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुई कात्यायनी देवी 'माचिका' या कड़वी अंबा हल्दी का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह शक्तिशाली एंटी-वायरल और एंटी-इन्फ्लेमेटरी औषधि है जो संधिकाल में रक्त के विकारों और गले के संक्रमण का समूल नाश करती है।

7. कालरात्रि ➔ नागदौन (Artemisia / Damanaka)

अंधकार रूपी असुरों का संहार करने वाली कालरात्रि साक्षात 'नागदौन' हैं। यह सभी प्रकार के विषों, वायु विकारों और मानसिक अवसादों को नष्ट करने वाली महा-औषधि है। यह आंतों के कीड़ों (Parasites) को मारकर पाचन तंत्र को निष्कंटक बनाती है।

8. महागौरी ➔ तुलसी (Ocimum sanctum)

शंख और चंद्रमा के समान श्वेत महागौरी जगत्-कल्याणकारी 'तुलसी' हैं। तुलसी संसार की सबसे शक्तिशाली एडेप्टोजेन (Adaptogen) है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी भी बाह्य वायरस से लड़ने के लिए अजेय ढाल प्रदान करती है।

9. सिद्धिदात्री ➔ शतावरी (Asparagus racemosus)

समस्त सिद्धियों को देने वाली माता सिद्धिदात्री 'शतावरी' का साक्षात विग्रह हैं। यह शरीर के अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) को संतुलित कर नवजीवन, बल, वीर्य और प्राणशक्ति का संचार करती है।

6. बायोकेमिस्ट्री और उपवास: देह का सेल्युलर रीबूट

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह बिना रुके 24 घंटे, 365 दिन अपने पाचन तंत्र पर भोजन का असहनीय बोझ लादे रहता है। जब आप लगातार खाते रहते हैं, तो शरीर की 80% ऊर्जा केवल भोजन को पचाने में खर्च होती रहती है। शरीर को अपने आंतरिक अंगों की मरम्मत (Repair), सफाई और ट्यूमर कोशिकाओं को नष्ट करने की कभी फुर्सत ही नहीं मिलती।

नवरात्रि में 9 दिन का उपवास कोई धार्मिक हठयोग नहीं, बल्कि शरीर को 'मेटाबॉलिक रिलीफ' देने की अचूक योजना है:

[उपवास प्रारंभ: 0-24 घंटे] ──► रक्त शर्करा सामान्य; ग्लाइकोजन का उपभोग

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[24-48 घंटे: कीटोसिस मोड]  ──► फैट बर्निंग शुरू; लिवर द्वारा कीटोन्स का निर्माण

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[48-72 घंटे: गहन ऑटोफैगी] ──► मृत कोशिकाओं व क्षतिग्रस्त प्रोटीन्स का भक्षण

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[72-216 घंटे: स्टेम सेल एक्टिवेशन] ──► पुरानी प्रतिरक्षा कोशिकाओं का संहार; नई WBCs व इम्यून रीबूट


ऑटोफैगी (Autophagy): देह का कबाड़ी वाला

जब उपवास के दौरान शरीर को बाहर से ग्लूकोज नहीं मिलता, तो जीवित रहने के लिए कोशिकाएं अपने ही भीतर झांकती हैं। वे वहां जमा प्रोटीन के कचरे, पुराने वायरस, मृत माइटोकॉन्ड्रिया और कैंसर के प्रारंभिक बीजों को पकड़कर अपने लाइसोसोम (Lysosome) में झोंक देती हैं और उन्हें जलाकर ऊर्जा बना लेती हैं।


आपको लग रहा होगा कि यह मनीष जी को कोई उदाहरण देना चाहिए तो परेशान मत होइए बिल्कुल सरल उदाहरण है घर की दिवाली वाली सफाई।

 सोचिए, अगर आप 6 महीने तक घर का कूड़ा बाहर न फेंकें और बाहर से लगातार नया सामान लाकर ड्राइंग रूम में भरते रहें, तो घर का क्या हाल होगा? हर कोने से दुर्गंध उठेगी, चूहे और कीड़े बिलबिलाएंगे। हम 365 दिन तला-भुना, मैदा, प्रिजर्वेटिव्स और चीनी ठूंस-ठूंस कर अपनी आंतों के साथ यही करते हैं। नवरात्रि का उपवास देह की दिवाली वाली सफाई है। जब बाहर से नया सामान (भोजन) आना बंद होता है, तो शरीर झाड़ू उठाकर घर के कोने-कोने में देखता है—'अच्छा, यह कोशिका सड़ रही है? इसे जलाओ! यह प्रोटीन कचरा है? इसे भस्म करो!' जो काम हम घर में कबाड़ी वाले को बुलाकर करते हैं, देह वही काम 9 दिन के उपवास में अपनी विकृत कोशिकाओं के साथ करती है।

आंतों का कायाकल्प (Gut Microbiome Reset)

नवरात्रि के भोजन के नियम देखिए:

सेंधा नमक (Rock Salt): समुद्री नमक प्रोसेस्ड और आयोडीन-सिंथेटिक होता है, जबकि सेंधा नमक शुद्ध क्रिस्टलीय खनिज है जिसमें 84 ट्रेस मिनरल्स (पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम) होते हैं जो सेल्युलर ऑस्मोटिक दबाव को नियंत्रित रखते हैं।


कुट्टू (Buckwheat) और सिंघाड़ा: ये अनाज नहीं, सूखे मेवे और फल हैं। ये 100% ग्लूटेन-फ्री होते हैं। ग्लूटेन आंतों की आंतरिक दीवारों (Villi) पर चिपककर सूजन (Inflammation) पैदा करता है। 9 दिन तक ग्लूटेन बंद होते ही आंतों की आंतरिक परत नई हो जाती है।


आये अब प्रयाग फाइल्स में एक और सरल उदाहरण स्मार्टफोन का 'Factory Reset' विकल्प से समझते हैं। 

जब आपका फोन लगातार ऐप्स चलाने से गर्म होने लगता है, हैंग होता है और स्क्रीन अटकती है, तो आप क्या करते हैं? आप फोन की कैशे मेमोरी साफ करते हैं और उसे Restart या Factory Reset कर देते हैं। साल भर तेल, मसाले और तनाव झेलते-झेलते हमारा पाचन तंत्र 'हैंग' हो चुका होता है। नवरात्रि का सात्विक आहार पाचन तंत्र को 9 दिन के लिए 'सेफ मोड' में डालकर फैक्ट्री रीसेट करना है। कैशे मेमोरी (टॉक्सिन्स) साफ हो जाती है और सिस्टम नए फोन की तरह फर्राटा भरने लगता है।

7. न्यूरोबायोलॉजी और एकॉस्टिक साइंस: मंत्रों का परमाणु परीक्षण

दिन के समय पृथ्वी का वायुमंडल सौर तूफानों, पराबैंगनी किरणों, और लाखों वाहनों व कारखानों के शोर से विक्षुब्ध रहता है। रात्रि में जब सौर विकिरण थम जाता है, तो आयनमंडल (Ionosphere) शांत हो जाता है और पृथ्वी का प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय स्पंदन, जिसे विज्ञान शुमान रेजोनेंस (Schumann Resonance - ~7.83 Hz) कहता है, स्पष्ट और स्थिर हो जाता है।

इसीलिए ऋषियों ने साधना के लिए रात्रि के पहर को चुना।

शंख और पीतल के घंटे का सोनिक प्रहार

आरती के समय जब शंख बजता है और भारी पीतल के घंटे एक ताल में बजाए जाते हैं, तो वह केवल संगीत नहीं होता। शंख की ध्वनि 110 से 130 हर्ट्ज़ की फ्रीक्वेंसी पैदा करती है, जो मानव मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों (Left and Right Hemispheres) को तुरंत एक लय में (Brainwave Synchronization) बांध देती है।

मस्तिष्क की चंचल और तनावग्रस्त 'बीटा तरंगें' (Beta Waves - 14 से 30 Hz) गिरकर शांत, एकाग्र और रचनात्मक 'अल्फा' (8-13 Hz) और 'थीटा' (4-7 Hz) तरंगों में बदल जाती हैं। पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) से मेलाटोनिन और सेरोटोनिन का स्राव उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता है, जिससे तनाव पैदा करने वाला हॉर्मोन 'कॉर्टिसोल' खून से साफ हो जाता है।

[दैनिक जीवन: विक्षिप्त अवस्था]  ──► बीटा तरंगें (14-30 Hz)  ──► तनाव, कॉर्टिसोल, उच्च रक्तचाप

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                              (शंख, घंटा व चंडी पाठ की ध्वनि)

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[नवरात्र साधना: शांत प्रज्ञा]   ──► अल्फा/थीटा तरंगें (4-12 Hz) ──► मानसिक शांति, न्यूरोनल हीलिंग


इसे आप एक और सरल उदाहरण चश्मे की दुकान वाली अल्ट्रासोनिक क्लीनिंग से समझने का प्रयास करें। कभी चश्मे या गहनों की दुकान पर देखा है कि वे मैली घड़ी या चश्मे को पानी के एक छोटे से टब में डालते हैं, बटन दबाते हैं और बिना हाथ लगाए कंपन से सारा मैल सेकंडों में कटकर पानी में तैरने लगता है? इसे विज्ञान अल्ट्रासोनिक क्लीनिंग कहता है। नवरात्रि की रात्रि में आरती का घंटा और शंख की गूंज वही अल्ट्रासोनिक वाइब्रेशन है। जब यह नाद आपकी खोपड़ी की हड्डियों और न्यूरॉन्स से टकराता है, तो नसों में जमा महीनों का तनाव, अवसाद और मानसिक कचरा वैसे ही झड़कर बाहर गिर जाता है जैसे पेड़ हिलाने पर सूखे पत्ते गिरते हैं।

8. कन्या पूजन: जेनेटिक सम्मान और सामाजिक न्यूरोसाइंस

नवरात्रि की पूर्णाहुति अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन (कंजक) के बिना संभव नहीं मानी जाती। 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को घर बुलाकर उनके पांव पखारना, उन्हें तिलक लगाना, भोजन कराना और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना—यह परंपरा सनातन के सिवा दुनिया के किस मजहब या संस्कृति में देखने को मिलती है?

इसके पीछे का विज्ञान दो धरातलों पर काम करता है:

1. जैविक व जेनेटिक शुद्धता (Bio-electric Pure State)

दो से दस वर्ष की आयु (Pre-pubescent age) वह कालखंड है जब बालिका के शरीर में हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव (Sex Hormones) शुरू नहीं हुए होते। उसकी अंतःस्रावी ग्रंथियां पूरी तरह शांत होती हैं, डीएनए म्यूटेशन और मानसिक विकृतियां शून्य होती हैं। इस अवस्था में उसका बायो-इलेक्ट्रिक आभामंडल (Aura) सबसे अधिक स्वच्छ, निर्दोष और स्पंदनशील होता है। ऋषियों ने इसे साक्षात 'अव्यक्त प्रकृति' की शुद्धतम जैविक अभिव्यक्ति माना।


[आयु 2 से 10 वर्ष] ──► हॉर्मोनल विकार शून्य ──► शांत डीएनए ──► शुद्धतम बायो-इलेक्ट्रिक ऊर्जा (Aura)


2. सामाजिक न्यूरोसाइंस: वासना का समूल दहन

मनोविज्ञान कहता है कि समाज में बलात्कार, यौन हिंसा और विकृतियों का जन्म पुरुष के अवचेतन मन में स्त्री को केवल 'मांसपिंड' या 'भोग की वस्तु' समझने से होता है।

सनातन के ऋषियों का मनोवैज्ञानिक मास्टरस्ट्रोक देखिए: समाज के प्रत्येक वयस्क, दाढ़ी-मूंछ वाले पुरुष को वर्ष में दो बार, नौ दिनों के कठिन तप के बाद, अपने घुटनों पर बैठकर एक नन्हीं बालिका के चरणों में अपना मस्तक रगड़ना अनिवार्य कर दिया गया!

जिस क्षण कोई पुरुष अपनी आंखें बंद करके एक अबोध कन्या के पैर छूता है और उसे 'माता' कहकर पुकारता है, उसके मस्तिष्क के अवचेतन (Subconscious) में न्यूरो-प्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) के जरिए एक अमिट संस्कार अंकित हो जाता है—कि 'नारी भोग्या नहीं, साक्षात पराशक्ति की अधिष्ठात्री है'। यह समाज से वासना के दानव को उखाड़ फेंकने का सबसे गहन मनोवैज्ञानिक टीका (Psychological Vaccine) था।


अपनी थाती को पहचानो

नवरात्रि किसी दुर्बल मन का विलाप नहीं है। यह सिंह पर आरूढ़ उस अष्टभुजा महाशक्ति का तांडव है जिसकी आंखों में सूर्य और चंद्रमा चमकते हैं, जिसके हाथों में ब्रह्मांडीय ऊर्जा के शस्त्र चमक रहे हैं और जिसके पैरों के नीचे काल और अज्ञान का महिषासुर कुचला हुआ तड़प रहा है।

वह महिषासुर कोई बाहर खड़ा सींग वाला दैत्य नहीं था—वह हमारे ही भीतर बैठा हुआ आलस्य, प्रमाद, अनियंत्रित वासना, अस्वस्थ खानपान और अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना का दैत्य था। उस आंतरिक दानव के वध के लिए ही हमारे पूर्वजों ने इस नौ रातों के महाचक्रव्यूह की रचना की थी।

जब अगली बार नवरात्रि पर आपके घर में कलश की वेदी सजे, जब अग्निहोत्र से धूप का धुआं उठे और शंख की गूंज से दिशाएं कांपें—तो स्मरण रखना कि आप किसी दकियानूसी रस्म का निर्वाह नहीं कर रहे। आप अपनी देह को प्रयोगशाला, अपने प्राण को हवि और अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम शक्ति से जोड़ने का वह महायज्ञ कर रहे हैं जिसकी थाती पूरे विश्व में केवल और केवल सनातन के पास है।


जब अगली बार नवरात्रि पर आपके घर में कलश की वेदी सजे, जब अग्निहोत्र से धूप का धुआं उठे और शंख की गूंज से दिशाएं कांपें—तो स्मरण रखना कि आप किसी दकियानूसी रस्म का निर्वाह नहीं कर रहे। आप अपनी देह को प्रयोगशाला, अपने प्राण को हवि और अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम शक्ति से जोड़ने का वह महायज्ञ कर रहे हैं जिसकी थाती केवल और केवल सनातन के पास है। गर्व से अपनी छाती चौड़ी कर लीजिए, मस्तक उठाइए और अंतरात्मा के पूरे वेग से बोलिए—जय माता दी!


लेकिन... वह एक रहस्य जो अभी बंद है!

किंतु रुकिए। देह, कोशिका, खगोल और गट-माइक्रोबायोम का यह गणित तो वह है जिसे आज की आधुनिक मेडिकल साइंस ने माइक्रोस्कोप के जरिए जैसे-तैसे छू लिया है। लेकिन उस रहस्य का क्या, जिसके सामने विज्ञान आज भी अपने हाथ खड़े कर देता है?


क्या आपने कभी विचार किया कि वर्ष में चार नवरात्रों में से दो को 'गुप्त नवरात्र' क्यों कहा गया?

और उससे भी बड़ा अनुत्तरित प्रश्न—दुर्गा सप्तशती के अंत में जब महिषासुर का वध हो जाता है, तब ऋषि किसी मोक्ष या स्वर्ग की बात नहीं करते; वे 'वैश्य और सुरथ' नाम के दो साधारण मनुष्यों के मस्तिष्क की उस गुप्त न्यूरो-प्रोग्रामिंग (Neuro-programming) की बात छेड़ते हैं जिसे 'महामाया का आवरण' कहा गया।

क्या नवदुर्गा का यह नौ रातों का चक्र वास्तव में केवल शरीर को ठीक करने की भट्ठी है, या इसके भीतर मानव मस्तिष्क के 'सबकॉन्शियस माइंड' के उस 90% हिस्से को हैक करने का कोई ऐसा गुप्त तांत्रिक कोड छुपा है, जिसे ऋषियों ने आम जनता की पहुंच से जानबूझकर ओझल कर दिया था?


 वह 10वां द्वार कौन सा है, जो नौ रातों के महाविस्फोट के बाद विजयादशमी की भोर में खुलता है?

सोचिएगा... 'प्रयाग फाइल्स' की दूसरी कड़ी में जब हम इस ताले की चाबी घुमाएंगे, तो शायद आधुनिक न्यूरोसाइंस की बुनियाद हिल जाएगी। तब तक, अपनी रीढ़ को सीधा रखिए और चेतना को जागृत! अगली कड़ी को जल्द से जल्द पढ़ने के लिए कमेंट बॉक्स में जरूर अपनी प्रतिक्रिया दें और लिखे भाग दो या जय माता दी। 


"क्या आपको कभी किसी ने नवरात्रि का यह वैज्ञानिक पक्ष समझाया था, या आज पहली बार यह तथ्य सामने आए हैं? सच बताइएगा—क्या आज के बाद आप और आपके बच्चे नवरात्रि को केवल एक व्रत समझेंगे या हमारे ऋषियों का सबसे बड़ा सेल्युलर साइंस? अपनी राय नीचे जरूर दर्ज करें और अगर गर्व हुआ हो तो 'जय माता दी' लिखकर अपनी हाजिरी लगाएं! 👇🚩”


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ…..। अगली गणित जल्द…..।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



श्राद्ध भाद्रपद मास मे ही क्यों किया जाता है.?

 श्राद्ध भाद्रपद मास मे ही क्यों किया जाता है.?

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हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्र मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और वहाँ अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। ऐसा वर्णन ‘श्राद्ध मीमांसा’ में मिलता है। इस तरह पितृ ॠण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध काल में पितरों का तर्पण और पूजन किया जाता है। भारतीय संस्कृति एवं समाज में अपने पूर्वजों एवं दिवंगत माता-पिता के स्मरण श्राद्ध पक्ष में करके उनके प्रति असीम श्रद्धा के साथ तर्पण, पिंडदान, यक्ष तथा ब्राह्मणों के लिए भोजन का प्रावधान किया गया है। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं। प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और दूसरा पितृ पक्ष में। जिस मास और तिथि को पितृ की मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उनका दाह संस्कार हुआ है, वर्ष में उम्र उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है।


एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिण्ड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथियाँ याद नहीं है, तो वह अमावस्या के दिन ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का विधि-विधान से पिंडदान तर्पण, श्राद्ध कर सकता है। इस दिन किया गया तर्पण करके 15 दिन के बराबर का पुण्य फल मिलता है और घर परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में विशेष उन्नति होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई है, तो पितृदोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्मशांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करना चाहिए। सामर्थ्यनुसार किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ ब्राह्मण से श्रीमद भागवत पुराण की कथा अपने पितरों की आत्मशांति के लिए करवा सकते हैं। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना सारी सुख सुविधाओं के होते भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।

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