Friday, August 21, 2026

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

 पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट 

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भारतीय सनातन परम्परा में काल का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे यहाँ प्रत्येक धार्मिक, आध्यात्मिक एवं मांगलिक कर्म को उचित काल में करने की परम्परा रही है। इसी काल-विचार को समझने और दैनिक जीवन में उपयोग करने का प्रमुख साधन है—पञ्चाङ्ग।


‘पञ्चाङ्ग’ शब्द दो शब्दों से बना है—‘पञ्च’ अर्थात् पाँच और ‘अङ्ग’ अर्थात् अंग। अर्थात् जिस काल-विधान में पाँच प्रमुख अंगों का विचार किया जाता है, उसे पञ्चाङ्ग कहा जाता है।


पञ्चाङ्ग के पाँच अंग हैं :—

१. तिथि

२. वार

३. नक्षत्र

४. योग

५. करण


इन पाँचों के माध्यम से किसी दिन के काल की प्रकृति, शुभाशुभता तथा विभिन्न कर्मों के लिए उसकी अनुकूलता का विचार किया जाता है।


▪︎ १. तिथि :-

सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर कोणीय अंतर के आधार पर बनने वाली काल-इकाई को तिथि कहा जाता है। सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२ अंश का अंतर होने पर एक तिथि पूर्ण होती है।


एक चन्द्रमास में सामान्यतः ३० तिथियाँ मानी जाती हैं—


शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ तिथियाँ तथा

कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या तक १५ तिथियाँ।


तिथियों के नाम हैं :—

प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा/अमावस्या।


तिथियों की पाँच संज्ञाएँ

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तिथियों को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है—

नन्दा — १, ६, ११

प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी।


भद्रा — २, ७, १२

द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी।


जया — ३, ८, १३

तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी।


रिक्ता — ४, ९, १४

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी।


पूर्णा — ५, १०, १५

पंचमी, दशमी और पूर्णिमा/अमावस्या।


मुहूर्त-विचार में इन तिथि-संज्ञाओं का विशेष महत्व है। प्रत्येक तिथि सभी प्रकार के कार्यों के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन, यात्रा, व्यापारारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान आदि में केवल तिथि देखकर निर्णय न करके सम्पूर्ण पञ्चाङ्ग तथा मुहूर्त का विचार किया जाता है।


▪︎ २. वार :-

एक सप्ताह में सात वार होते हैं :—

रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।


प्रत्येक वार का सम्बन्ध एक-एक ग्रह तथा उससे सम्बद्ध देवता और कर्म-प्रकृति से माना गया है। इसलिए विभिन्न कार्यों के लिए वार का चयन भी मुहूर्त-विचार का महत्वपूर्ण अंग है।


उदाहरण के लिए सोमवार का सम्बन्ध चन्द्रमा से, मंगलवार का मंगल से, बुधवार का बुध से, गुरुवार का बृहस्पति से, शुक्रवार का शुक्र से तथा शनिवार का शनि से माना जाता है।


अतः किसी कार्य की सफलता के लिए केवल दिन देखना पर्याप्त नहीं, बल्कि कार्य के अनुरूप वार की अनुकूलता का विचार भी आवश्यक है।


▪︎ ३. नक्षत्र :-

आकाश में चन्द्रमा की गति के मार्ग को २७ प्रमुख नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।


२७ नक्षत्र हैं—

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती।


कुछ परम्पराओं में अभिजित् को विशेष रूप से २८वें नक्षत्र के रूप में भी स्वीकार किया गया है।


नक्षत्रों की प्रकृति के आधार पर मुहूर्तशास्त्र में इन्हें विभिन्न संज्ञाओं में विभाजित किया जाता है—ध्रुव, चर, उग्र, मिश्र, क्षिप्र, मृदु और तीक्ष्ण।


किस नक्षत्र में कौन-सा कार्य करना चाहिए, इसका निर्णय कार्य की प्रकृति के अनुसार किया जाता है। इसलिए किसी नक्षत्र को मात्र ‘शुभ’ या ‘अशुभ’ कह देना पर्याप्त नहीं है।


▪︎ ४. योग :-

सूर्य और चन्द्रमा की गतियों से प्राप्त विशेष कोणीय सम्बन्ध के आधार पर २७ योगों की गणना की जाती है।


इनके नाम हैं :—

विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान्, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृति।


इनमें कुछ योग सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माने जाते हैं, जबकि विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति को सामान्यतः अशुभ अथवा त्याज्य योगों में गिना जाता है।


विशेष बात यह है कि किसी योग को देखकर ही अंतिम निर्णय नहीं किया जाता। कार्य की प्रकृति, तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न आदि का भी विचार आवश्यक है।


▪︎ ५. करण :-

एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है। इस प्रकार एक तिथि में सामान्यतः दो करण होते हैं।


कुल ११ करण माने गए हैं :—

बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न।


इनमें विष्टि करण को भद्रा भी कहा जाता है। सामान्यतः भद्रा में अनेक मांगलिक कार्यों को करने से बचने की परम्परा है।


करण का विचार विशेष रूप से मुहूर्त-निर्णय में किया जाता है।


पञ्चाङ्ग केवल कैलेंडर नहीं है

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आज के समय में बहुत से लोग पञ्चाङ्ग को केवल तिथि अथवा पर्व बताने वाला कैलेंडर समझते हैं। वास्तव में पञ्चाङ्ग इससे कहीं अधिक व्यापक है।


पञ्चाङ्ग हमें यह समझने में सहायता करता है कि :—

कौन-सा दिन है?

कौन-सी तिथि है?

कौन-सा नक्षत्र चल रहा है?

कौन-सा योग है?

कौन-सा करण है?

और किसी विशेष कर्म के लिए काल की स्थिति कैसी है?


इसीलिए सनातन परम्परा में किसी भी महत्वपूर्ण धार्मिक या मांगलिक कर्म के पूर्व तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का विचार किया जाता है।


चन्द्रमास और बारह मास

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भारतीय चान्द्र परम्परा में वर्ष के बारह प्रमुख मास माने जाते हैं—

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।


इन मासों के नामकरण का सम्बन्ध पूर्णिमा के समय चन्द्रमा की नक्षत्र स्थिति से जोड़ा गया है। जैसे—

चित्रा → चैत्र

विशाखा → वैशाख

ज्येष्ठा → ज्येष्ठ

पूर्वाषाढ़ा/उत्तराषाढ़ा → आषाढ़

श्रवण → श्रावण

पूर्वाभाद्रपदा/उत्तराभाद्रपदा → भाद्रपद

अश्विनी/भरणी आदि से सम्बद्ध परम्पराएँ → आश्विन

कृत्तिका → कार्तिक

मृगशिरा → मार्गशीर्ष

पुष्य → पौष

मघा → माघ

पूर्वाफाल्गुनी/उत्तराफाल्गुनी → फाल्गुन।


यह व्यवस्था भारतीय कालगणना की वैज्ञानिक एवं खगोलीय परम्परा को दर्शाती है।


पञ्चाङ्ग का दैनिक जीवन में महत्व

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सनातन धर्म में प्रातःकाल उठकर तिथि, वार आदि का स्मरण करने की परम्परा रही है। पञ्चाङ्ग के माध्यम से व्यक्ति अपने दिन को धार्मिक एवं व्यवस्थित ढंग से प्रारम्भ कर सकता है।


विशेष रूप से :—

व्रत एवं उपवास,

पूजा-पाठ,

जप एवं अनुष्ठान,

संस्कार,

विवाह,

गृहप्रवेश,

यात्रा,

व्यापारारम्भ,

यज्ञ एवं धार्मिक आयोजन


आदि में पञ्चाङ्ग का विचार किया जाता है।


पञ्चाङ्ग हमें केवल शुभ-अशुभ बताने का साधन नहीं देता, बल्कि काल के प्रति जागरूकता प्रदान करता है।


अतः सनातन परम्परा में पञ्चाङ्ग का अध्ययन केवल ज्योतिषियों तक सीमित विषय नहीं है। प्रत्येक गृहस्थ को कम-से-कम अपने दैनिक जीवन की तिथि, वार, नक्षत्र और प्रमुख पर्व-त्योहारों की जानकारी रखने का प्रयास करना चाहिए।


काल का ज्ञान ही कर्म को उचित समय से जोड़ता है और उचित समय में किया गया कर्म ही मुहूर्त-विचार की मूल भावना है।


इसीलिए पञ्चाङ्ग हमारे लिए केवल एक पंचांग-पुस्तिका नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष-विज्ञान और सनातन जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण आधार है।


॥ श्रीसीतारामाभ्यां नमः ॥

जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था

 यह कथा द्वापरयुग की है ,जब भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था !


बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ! यह कथा इस प्रकार है :~


मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था ! उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे ! यही कारण था ,कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे !


जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं ! उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था !


कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था ! प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उसका वध कर दिया !

 

दामाद की मृत्यु की सुचना सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा !


प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया ! किंतु हर बार श्री कृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे !


एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया !

 

लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया ! जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए !


काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्री कृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया !

 

वह श्री कृष्ण की शक्ति जानता था ! इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा !


भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा ! किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा !


तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले :- 


वत्स ! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी ! लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना !

 

वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा ! यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए !


इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्री कृष्ण सभी मथुरा वासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे ! 


काशीराज ने श्री कृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा !


काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं ! इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई !


उल्टे श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया ! सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा ! प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत हो कर काशी की ओर भागी !


सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा ! काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया ! किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया !


कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा ! वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया !


इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ!

Thursday, August 20, 2026

वैदिक_रक्षासूत्र____|| रक्षाबंधन.रक्षासूत्र.राखी विशेष!!

 #वैदिक_रक्षासूत्र____|| रक्षाबंधन.रक्षासूत्र.राखी विशेष!!

रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है। यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है।

#कैसे_बनायें_वैदिक_राखी

वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें। उसमें

(१) दूर्वा

(२) अक्षत (साबूत अरुणाक्षत)

(३) केसर या हल्दी

(४) शुद्ध चंदन

(५) सरसों के साबूत दाने

इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें। सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं।

कुछ विशिष्ठ पवित्र पदार्थ का प्रयोग करने के लिये अपने आचार्य या पुरोहित से सम्पर्क कर समझे||

#वैदिक_राखी_का_महत्त्व

वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं।

(१) #दूर्वा

जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सद्गुण फैलते जायें, बढ़ते जायें...’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा । दूर्वा गणेशजी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आनेवाले विघ्नों का नाश हो जाय ।

(२) #अरुणाक्षत (साबूत लालचावल)

हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखंड और अटूट हो, कभी क्षत-विक्षत न हो - यह अक्षत का संकेत है । अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं । जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय ।

(३) #केसर या #हल्दी

केसरकेसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो । उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय । केसर की जगह पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं । हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है । यह नजरदोष व नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है 

(४) #चंदन

चंदनचंदन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है । यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो । उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे । उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले ।

(५) #सरसों_पीत

सरसोंसरसों तीक्ष्ण होती है । इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज-द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें ।

अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व-मंगलकारी है। 


रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है :-

#येन_बद्धो_बली_राजा_दानवेन्द्रो_महाबलः ।

#तेन_त्वाम_नुबध्नामि_रक्षे_मा_चल_मा_चल ।।


यहां वैदिक मन्त्र का भी उपयोग किया जा सकता है||

यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:। तन्मSआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।

इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है । यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सद्गुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है  भक्ति बढ़ती है।

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 यज्ञोपवीतः आभूषणं च,शिखा धर्मस्तम्भयः ।

जयतु ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये ----------

-------/आपको इसे पढ़कर निर्माण विधि का ज्ञान हो गया ,लेकिन इसमें रक्षा शक्ति का संचार कैसे करेंगे उन मन्त्रो से  इसे अभिमंत्रित करें जिससे आप इस रक्षासूत्र से स्वयं की एव जिसे यह बांधे उसकी भी रक्षा यह करे।

इसके लिए आचार्य ,पुरोहित से मार्गदर्शन अवश्य लीजिये।।

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रक्षा सूत्रों के विभिन्न प्रकार

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विप्र रक्षा सूत्र- रक्षाबंधन के दिन किसी तीर्थ अथवा जलाशय में जाकर वैदिक अनुष्ठान करने के बाद सिद्ध रक्षा सूत्र को विद्वान पुरोहित ब्राह्मण द्वारा स्वस्तिवाचन करते हुए यजमान के दाहिने हाथ मे बांधना शास्त्रों में सर्वोच्च रक्षा सूत्र माना गया है।

गुरु रक्षा सूत्र- सर्वसामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्य के कल्याण के लिए इसे बांधते है।

मातृ-पितृ रक्षा सूत्र- अपनी संतान की रक्षा के लिए माता पिता द्वारा बांधा गया रक्षा सूत्र शास्त्रों में  "करंडक" कहा जाता है।

भातृ रक्षा सूत्र- अपने से बड़े या छोटे भैया को समस्त विघ्नों से रक्षा के लिए बांधी जाती है देवता भी एक दूसरे को इसी प्रकार रक्षा सूत्र बांध कर विजय पाते है।

स्वसृ-रक्षासूत्र- पुरोहित अथवा वेदपाठी ब्राह्मण द्वारा रक्षा सूत्र बांधने के बाद बहिन का पूरी श्रद्धा से भाई की दाहिनी कलाई पर समस्त कष्ट से रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधती है। भविष्य पुराण में भी इसकी महिमा बताई गई है। इससे भाई दीर्घायु होता है एवं धन-धान्य सम्पन्न बनता है।

गौ रक्षा सूत्र- अगस्त संहिता अनुसार गौ माता को राखी बांधने से भाई के रोग शोक दूर होते है। यह विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है।

वृक्ष रक्षा सूत्र - यदि कन्या को कोई भाई ना हो तो उसे वट, पीपल, गूलर के वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधना चाहिए पुराणों में इसका विशेष उल्लेख है।।

 ध्यान दें ~~ पत्नी भी पति को रक्षासूत्र बांध सकती है इसमें कुछ भी विचारणीय नहीं है,, सूत्र अभिमंत्रित होना चाहिए.!!

विशेष>>> यदि सूत्र अभिमंत्रित नहीं है तो उसकी उपयोगिता मात्र एक सूत्र की रहेगी उस सूत्र से किसी रक्षा या सुरक्षा की कल्पना नहीं करें.. बाजार से निर्मित सूत्र राखी आदि खरीदने से बचना चाहिए..!!

🪷 महादेव🪷

  🌼शुभमस्तु..🌼 कल्याणमस्तु 🪷


#संकलित||

Arun Shastri जबलपुर।।

❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Wednesday, August 19, 2026

ऋष्यशृंग ऋषि (श्रृंगी ऋषि) की संपूर्ण पौराणिक कथा

 *ऋष्यशृंग ऋषि (श्रृंगी ऋषि) की संपूर्ण पौराणिक कथा*


ऋष्यशृंग (श्रृंगी ऋषि) की कथा हिंदू धर्म की अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। इसका वर्णन मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा अनेक पुराणों में मिलता है। यह कथा तप, ब्रह्मचर्य, निष्कपटता, धर्म और लोककल्याण का अद्भुत उदाहरण है।

ऋष्यशृंग का चमत्कारी


*जन्म*

प्राचीन काल में महान तपस्वी महर्षि विभाण्डक घोर तपस्या करते थे। एक दिन उन्होंने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को देखा। उनके मन में क्षणभर के लिए विकार उत्पन्न हुआ और उनके तेज से एक दिव्य गर्भ की उत्पत्ति हुई। पौराणिक कथाओं के अनुसार वह तेज एक हिरणी तक पहुँचा, जिसने एक बालक को जन्म दिया।

उस बालक के माथे पर हिरण के सींग जैसा उभार था। इसी कारण उसका नाम ऋष्यशृंग पड़ा। संस्कृत में "ऋश्य" का अर्थ हिरण और "शृंग" का अर्थ सींग होता है।

वन में पालन-पोषण

महर्षि विभाण्डक ने अपने पुत्र को घने वन में आश्रम बनाकर पाला। उन्होंने निश्चय किया कि पुत्र का मन संसार के मोह से दूर रहेगा।

ऋष्यशृंग ने बचपन से केवल अपने पिता, पशु-पक्षियों, वृक्षों और प्रकृति को ही देखा था। उन्होंने कभी किसी अन्य मनुष्य, विशेषकर किसी स्त्री को नहीं देखा था।

वे अत्यंत सरल, निष्कपट, सत्यवादी और पूर्ण ब्रह्मचारी थे। उनकी तपस्या से देवता भी प्रसन्न रहते थे।


*अंगदेश में भयंकर अकाल*

उसी समय अंगदेश के राजा रोमपाद (जिन्हें लोमपाद भी कहा जाता है) के राज्य में भीषण अकाल पड़ गया।

न वर्षा हो रही थी, न खेतों में अन्न उग रहा था। नदियाँ सूख गईं, पशु-पक्षी मरने लगे और प्रजा भूख से व्याकुल हो उठी।

राजा ने विद्वान ऋषियों और ब्राह्मणों से उपाय पूछा।

उन्होंने कहा—

"यदि पूर्ण ब्रह्मचारी ऋष्यशृंग आपके राज्य में प्रवेश करेंगे, तो उनके तप के प्रभाव से इंद्रदेव प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे।"

ऋष्यशृंग को लाने की योजना

समस्या यह थी कि ऋष्यशृंग कभी आश्रम से बाहर नहीं निकले थे और उनके पिता किसी को भी उनके पास आने नहीं देते थे।

राजा रोमपाद ने बुद्धिमान मंत्रियों से सलाह ली। अंततः यह योजना बनी कि कुछ सुंदर, विनम्र और संगीत-कला में निपुण स्त्रियों को वन में भेजा जाए।

उनका उद्देश्य छल से ऋष्यशृंग को राज्य तक लाना था।


*पहली भेंट*

जब महर्षि विभाण्डक आश्रम से बाहर गए, तब वे स्त्रियाँ वहाँ पहुँचीं।

ऋष्यशृंग ने जीवन में पहली बार किसी स्त्री को देखा। उन्हें लगा कि ये भी किसी अन्य प्रकार के तपस्वी हैं।

उन्होंने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया।

स्त्रियों ने मधुर संगीत गाया, स्वादिष्ट फल और मिठाइयाँ खिलाईं तथा प्रेमपूर्वक उनसे बातें कीं।

ऋष्यशृंग ने पहले कभी ऐसा व्यवहार नहीं देखा था, इसलिए वे अत्यंत प्रसन्न हुए।

कुछ समय बाद वे स्त्रियाँ लौट गईं।

दूसरी बार आगमन

कुछ दिनों बाद वे पुनः आईं और इस बार ऋष्यशृंग को अपने साथ चलने का आग्रह किया।

उनकी सरलता और निष्कपट स्वभाव के कारण वे उनके साथ चल पड़े।

जैसे ही ऋष्यशृंग ने अंगदेश की सीमा में प्रवेश किया, आकाश में बादल घिर आए।

कुछ ही समय में मूसलाधार वर्षा होने लगी।

सूखी धरती हरी-भरी हो गई। नदियाँ भर गईं और पूरा राज्य आनंद से झूम उठा।

प्रजा ने ऋष्यशृंग का भव्य स्वागत किया।


*शान्ता से विवाह*

राजा रोमपाद अपनी भूल और योजना के लिए लज्जित थे। उन्होंने ऋष्यशृंग से क्षमा माँगी।

अपनी पुत्री शान्ता का विवाह ऋष्यशृंग से कर दिया।

अनेक परंपराओं के अनुसार शान्ता, राजा दशरथ की ज्येष्ठ पुत्री थीं, जिन्हें उन्होंने अपने मित्र राजा रोमपाद को गोद दे दिया था।

ऋष्यशृंग और शान्ता ने धर्मपूर्वक गृहस्थ जीवन बिताया।


*पुत्रकामेष्टि यज्ञ*

कुछ समय बाद राजा दशरथ संतान न होने से अत्यंत चिंतित थे।

गुरु वशिष्ठ की सलाह पर ऋष्यशृंग को अयोध्या बुलाया गया।

ऋष्यशृंग ने वैदिक विधि से पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर अग्निदेव प्रकट हुए और दिव्य खीर से भरा स्वर्ण पात्र राजा दशरथ को दिया।

राजा ने वह खीर अपनी रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—को दी।

समय आने पर चार दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ—

श्रीराम

भरत

लक्ष्मण

शत्रुघ्न

इस प्रकार ऋष्यशृंग अप्रत्यक्ष रूप से भगवान श्रीराम के अवतार की कथा के महत्वपूर्ण पात्र बन गए।


*कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ*

सच्चा तप और पवित्र चरित्र समाज के कल्याण का कारण बनता है।

निष्कपटता महान गुण है, लेकिन उसके साथ विवेक भी आवश्यक है।

धर्म और तप की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।

महान ऋषि केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त लोक के कल्याण के लिए जीते हैं।

भगवान की योजना में प्रत्येक पात्र का अपना विशेष महत्व होता है।

ऋष्यशृंग ऋषि की यह कथा हमें बताती है कि तप, ब्रह्मचर्य, विनम्रता और धर्म का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों का कल्याण करता है।


साभार स्वीकृत

~ आराधना कुमारी,

जेहानाबाद

Tuesday, August 18, 2026

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है साल में सिर्फ एक दिन

 उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है साल में सिर्फ एक दिन

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हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। 


इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि  नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।


नागचंद्रेश्वर मंदिर में  11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।


पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

 

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। 


लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 


यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

 

नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए रविवार रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। सोमवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे। 


नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। 

 

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।

 

नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करते है। यह सरकारी पूजा होती है। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा।

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Monday, August 17, 2026

रुद्राक्ष के एक-मुख आदि के नाम और उनका फल-:

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*🔱ॐ दुं दुर्गायै नमः।।🔱*

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*✨रुद्राक्ष के एक-मुख आदि के नाम और उनका फल-:✨*

🪷श्लोक के पश्चात हिन्दी अनुवाद किया हुआ है।🪷

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*एकवक्त्रः शिवः साक्षाद् ब्रह्महत्यां व्यपोहति।*

*अवध्यत्वं प्रतिस्त्रोतो वह्निस्तम्भं करोति च।।*

*द्विवक्त्रो हरगौरी स्याद् गोवधाद्यघनाशकृत्।*

*त्रिवक्त्रो ह्यग्निजन्माथ पापराशिं प्रणाशयेत्।।*

*चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति।*

*पञ्चवक्त्रस्तु कालाग्निरगम्याभक्ष्यपापनुत्।।*

*षड्वक्त्रस्तु गुहो ज्ञेयो भ्रुणहत्यादि नाशयेत्।*

*सप्तवक्त्रस्त्वनन्तः स्यात् स्वर्णस्येयादिपापह्रत्।।*

*विनाययकोऽष्टवक्त्रः स्यात् सर्वानृतविनाशकृत्।*

*भैरवो नववक्त्रस्तु शिवसायुज्यकारकः।*

*दशवक्त्रः स्मृतो विष्णुर्भूतप्रेतभयापहः।*

*एकादशमुखो रुद्रो नानायज्ञफलप्रदः।*

*द्वादशास्यस्तथादित्यः सर्वरोगनिबर्हणः।।*

*त्रयोदशमुखः कामः सर्वकामफलप्रदः।*

*चतुर्दशास्यः श्रीकण्ठो वंशोद्धारकरः परः।।*

(शिवरहस्य)

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*एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् 'शिव' है, जो ब्रह्महत्या को दूर करता है और समस्त स्त्रोतोंको अवध्य तथा अग्नि को रोकता है। दो मुखवाला रुद्राक्ष 'हरगौरी' (शिव-पार्वती) है, जो गोहत्या आदि पापों को दूर करता है। तीन मुखवाला रुद्राक्ष 'अग्निजन्मा' है, जो पाप-समूहों को दूर करता है। चार मुखवाला रुद्राक्ष 'ब्रह्मा' है, जो मनुष्यकी हत्या के पाप को नष्ट करता है। पाँच मुखवाला रुद्राक्ष 'कालाग्नि' है, जो अगम्य स्त्रीके साथ गमन तथा अभोज्य के भोजन करने के पाप को नष्ट करता है। छः मुखवाला रुद्राक्ष 'गुह' है, जो भ्रुण-हत्या के पाप को नष्ट करता है। सात मुखवाला रुद्राक्ष 'अनन्त' है, जो सुवर्ण की चोरी के पाप को नष्ट करता है। आठ मुखवाला रुद्राक्ष 'विनायक' है, जो समस्त प्रकार के असत्यों का नाश करता है। नौ मुखवाला रुद्राक्ष 'भैरव' है, जो शिवसायुज्य (मोक्ष) को देता है। दश मुखवाला रुद्राक्ष 'विष्णु' है, जो भूत एवं प्रेत के भय को हरण करता है। ग्यारह मुखवाला रुद्राक्ष 'रुद्र' है, जो अनेक प्रकार के यज्ञों के फल को देता है। बारह मुखवाला रुद्राक्ष 'आदित्य' है, जो समस्त प्रकार के रोगों को दूर करता है। तेरह मुखवाला रुद्राक्ष 'काम' है, जो समस्त कर्मो में सफलता देता है और चौदह मुखवाला रुद्राक्ष 'श्रीकण्ठ' है , जो वंश का उद्धार करता है।*

-- शास्त्री धवलकुमार दवे

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महामृत्युंजय/रुद्राभिषेक कामना परकअनुष्ठान विना शिववासके अधूरा''

 ''महामृत्युंजय/रुद्राभिषेक कामना परकअनुष्ठान विना शिववासके अधूरा'' #शिववास ~शिव वास देखने का सूत्र  :--- #शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियोंकी कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखनेके लिए 1 से 30 तक की संख्याको ही लेना चाहिए ।।

~~~~~शिव वास ज्ञान : 

तिथिकी गणना शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से करनी चाहिए. शिवार्चनके लिए शुभ तिथियाँ शुक्ल पक्ष में २,५,६,७,९,१२,१३,१४ और कृष्ण पक्ष में १,४,५,६,८,११,१२,१३,३० 


तिथिको दुगुना करें,उसमे पांचको जोड़ देना चाहिए, 

कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है, शिववास अच्छा बनता है । बाकि

 बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।

इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...

१.कैलाश अर्थात = सुख,

२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति, 

३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि

४.सभा = सन्ताप,

५.भोजन = पीड़ा, 

६.क्रीड़ा = कष्ट, 

७.श्मशाने = मरण ।।


##शिव-वास:--

#'1) यह ध्यान रहे कि शिव-वासका विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है...

#2)  निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है..

#3) ज्योतिíलंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, सावनके सोमवार आदि पर्वो में शिव-वासका विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है... 

#4) वस्तुत:शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिवको शीघ्र प्रसन्न करके साधकको उनका कृपापात्र बना देता है और तब उसकी (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी )  समस्याएं स्वत:समाप्त हो जाती हैं..

#5) दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से सारे (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) पाप-ताप-शाप धुल जाते हैं.


#6) कृष्णपक्षकी सप्तमी (7), चतुर्दशी (14) तथा शुक्लपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), पूíणमा (15) में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं अतएव इन तिथियों में किसी कामनाकी पूर्तिके लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होगी. इससे यजमान पर विपत्ति आ सकती है.


#7) कृष्णपक्षकी द्वितीया (2), नवमी (9) तथा शुक्लपक्षकी तृतीया (3) व दशमी (10) में महादेवजी देवताओंकी सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं. इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप (दुख) मिलेगा. 


#8)कृष्णपक्षकी तृतीया (3), दशमी (10) तथा शुक्लपक्षकी चतुर्थी (4) व एकादशी (11) में नटराज क्रीडारत रहते हैं.इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतानको कष्ट दे सकता है. 


#9)कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेव भोजन करते हैं.


--- इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक ठीक नहीं माना जाता है लेकिन निष्काम ठीक हैं।


#10) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) अवश्य सफल होता है 

और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.


#11) प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), अमावस्या तथा शुक्लपक्षकी द्वितीया (2) व नवमी (9) के दिन भगवान शिव माता गौरीके साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है.


#12) कृष्णपक्षकी चतुर्थी (4), एकादशी (11) तथा शुक्लपक्षकी पंचमी (5) व द्वादशी (12) तिथियों में भगवान शंकर कैलास पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है.


#13)कृष्णपक्षकी पंचमी (5), द्वादशी (12) तथा शुक्लपक्षकी षष्ठी (6) व त्रयोदशी (13) तिथियों में भगवान शंकर नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं… अत:इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है… 


#14) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में न्यूनाधिक्य) अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.

~~~~~~ नित्य/ नैमित्तिक मे आवश्यक नहीं होता..!! 

विशेष... सोसल मीडिया के किसी भी लेख की पुष्टि अपने आचार्य पुरोहित से अवश्य करना चाहिए..!!


शिववास ज्ञान

तिथिं च द्विगुणी कृत्य बाणैः संयोजये ततः ।

सप्तभिश्च हरेत् भागःशिववासः प्रकीर्तितः ॥


एकेन वासः कैलाशे द्वितीयं गौरी सन्निधौ । 

तृतीयं वृषभारुढ़ः सभायां च चतुर्थके  । 

पंचमे भोजने चैव क्रीड़ायां च रसात्मके । 

श्मशाने सप्तशेषे च शिववासः उदीरितः ।।  

कैलासे लभते सौख्यं  गौर्या च सुख सम्पदः । 

वृषभेऽभीष्टसिद्धिः स्यात् सभा संतापकारिणी । 

भोजने च भवेत् पीड़ा  क्रीडायां कष्टमेव च । 

श्मशाने मरणं ज्ञेयं फलमेवं विचारयेत्  ॥

वैसे ये सभी काम्यप्रयोगों के लिये है । निष्काम पूजा में कुछ भी देखनें की आवश्यकता नहीं है


Arun Dubey Jabalpur

 ❗ शिवार्चनसृति ❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️


प्र०-  शिववास का विचार कब-कब करना आवश्यक नहीं होता❓ लोग इसे परिहार के रूप में देखते हैं..?

उत्तर:- शास्त्रीय प्रमाण:- इन सभी ग्रंथों में (निर्णय सिंधु, शिवमहापुराण, नारद संहिता, शिवार्चनम्, मुहुर्त कल्पद्रुम)

श्रावणेऽधिकमासे च आर्द्रायाश्च गते रवौ।

शिवभेन्दुगते योगे, शुक्ले च व्यतिपातके॥

हरानङ्गहरीणाञ्च तिथिषु करणे चतुष्पदे।

सोमवारे शुभे ब्राह्मे प्रदोषाख्येऽभिजित्क्षणे॥

शिवरात्र्यादि पर्वेषु उत्सवेषु निमित्तके।

नित्याराधनकाले  च  शिववासं न चिन्तयेत्॥

👉अर्थात्:-  श्रावणमास में, अधिकमास (मलमास) में, जब सूर्य आर्द्रा में रहे तब, शुक्ल और व्यतिपात योगों में अष्टमी, त्रयोदशी तिथियों में,सोमवार, प्रदोष तिथि व प्रदोष काल में, अभिजित मुहूर्त में, शिवरात्रि में व नित्य आराधना में शिववास के विचार की आवश्यकता नहीं होती।