Wednesday, May 20, 2026

कौन से #ऋषि का क्या है महत्व

 कौन से #ऋषि का क्या है महत्व-

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महत्वपूर्ण जानकारी 

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अंगिरा ऋषि👉 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।


विश्वामित्र ऋषि👉 गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।


वशिष्ठ ऋषि👉 ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।


कश्यप ऋषि👉 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।


जमदग्नि ऋषि👉 भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।


अत्रि ऋषि👉 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।


अपाला ऋषि👉 अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।


नर और नारायण ऋषि👉  ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।


पराशर ऋषि👉 ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।


भारद्वाज ऋषि👉 बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।


आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।


वेदों के रचयिता ऋषि 👉 ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 


वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- १.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक। 


पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- 


वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।

विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।


 अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।


इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।


महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।


१. वशिष्ठ👉 राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।


२. विश्वामित्र👉 ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।


माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 


३. कण्व👉 माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।


४. भारद्वाज👉 वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।


ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।


५. अत्रि👉 ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।


अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।


६. वामदेव👉 वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। 


७. शौनक👉 शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। 


फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।


इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है। 

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Tuesday, May 19, 2026

रंभा - श्री शुकदेव जी संवाद

 🌹!!!! रंभा - श्री शुकदेव जी संवाद !!!!!!!🌹

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#रंभा_नामक_एक_अतीव_सुंदरी (अप्सरा) श्री शुकदेव जी के रूपलावणय को देख मुग्ध हो गयी और श्रीशुकदेव जी को लुभाने पहुंची। श्री शुकदेव जी सहज विरागी थे। बचपन में ही वह वन चले गए थे। उन्होंने ही राजा परीक्षित को भागवत पुराण सुनाया था। वे महर्षि वेदव्यास के अयोनिज पुत्र थे और बारह वर्षों तक माता के गर्भ में रहे। 


श्रीकृष्ण के यह आश्वासन देने पर कि उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, उन्होंने जन्म लिया। उन्हें गर्भ में ही उन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का ज्ञान हो गया था। कम अवस्था में ही वह ब्रह्मलीन हो गए थे।


रंभा ने उन्हें देखा, तो वह मुग्ध हो गई और उनसे प्रणय निवेदन किया। शुकदेव ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। रंभा उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में जुट गई। जब वह बहुत कोशिश कर चुकी, तो शुकदेव ने पूछा, देवी, आप मेरा ध्यान क्यों आकर्षित कर रही हैं। रंभा ने कहा, ताकि हम जीवन का छक कर भोग कर सकें। शुकदेव बोले, देवी, मैं तो उस सार्थक रस को पा चुका हूं, जिससे क्षण भर हटने से जीवन निरर्थक होने लगता है। मैं उस रस को छोड़कर जीवन को निरर्थक बनाना नहीं चाहता। कुछ और रस हो, तो भी मुझे क्या?


रंभा ने अपने रंग-रूप और सौंदर्य की विशेषताएं बताईं। उसने कहा कि उसके शरीर से सौंदर्य की अजस्र धारा तो बहती ही रहती है, भीनी-भीनी सुवास की लहरियां भी फूटती रहती हैं। देवलोक में, जहां वह रहती है, कोई कभी वृद्ध नहीं होता। शुकदेव ने यह सुना तो बोले, देवी, आज हमें पहली बार यह पता लगा कि नारी शरीर इतना सुंदर होता है। यह आपकी कृपा से संभव हुआ। अब यदि भगवत प्रेरणा से पुनः जन्म लेना पड़ा, तो मैं नौ माह आप जैसी ही माता के गर्भ में रहकर इसका सुख लूंगा। अभी तो प्रभु कार्य ही प्रधान है।


यहाँ हमें ध्यान देना है कि हम इसे श्रृंगार और अध्यात्म का संवाद कह सकते हैं।भोग और मोक्ष का संवाद कह सकते हैं।यहाँ हमें अपनी दृष्टि सांसारिक स्थूलता से हटा कर पारमार्थिक सूक्ष्मता की ओर बड़ी सावधानी से ले जानी चाहिए।

यहाँ रंभा को भोग और श्री शुकदेव जी को मोक्ष का प्रतीक मानना चाहिए।


इस संवाद के रचयिता अज्ञात हैं। यह संवाद आचार्य परंपरा से प्राप्त है।लेकिन है यह बहुत प्रसिद्ध।


रम्भा-शुक संवाद

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रंभा रुपसुंदरी है और शुकदेवजी मुनि शिरोमणि ! रंभा यौवन और शृंगार का वर्णन करते नहीं थकती, तो शुकदेवजी ईश्वरानुसंधान का । दोनों के बीच हुआ संवाद अति सुंदर है;


रम्भा–

मार्गे मार्गे नूतनं चूतखण्डं खण्डे खण्डे कोकिलानां विरावः।

रावे रावे मानिनीमानभंगो भंगे भंगे मन्मथः पञ्चबाणः ॥


हे मुनि ! हर मार्ग में नयी मंजरी शोभायमान हैं, हर मंजरी पर कोयल सुमधुर टेहुक रही हैं । टेहका सुनकर मानिनी स्त्रीयों का गर्व दूर होता है, और गर्व नष्ट होते हि पाँच बाणों को धारण करनेवाले कामदेव मन को बेचेन बनाते हैं ।


श्री शुक उवाच–

मार्गे मार्गे जायते साधुसङ्गः,सङ्गे सङ्गे श्रूयते कृष्णकीर्तिः ।

कीर्तौ कीर्तौ नस्तदाकारवृत्तिः वृत्तौ वृत्तौ सच्चिदानन्द भासः ॥


हे रंभा ! हर मार्ग में साधुजनों का संग होता है, उन हर एक सत्संग में भगवान कृष्णचंद्र के गुणगान सुनने मिलते हैं । हर गुणगाण सुनते वक्त हमारी चित्तवृत्ति भगवान के ध्यान में लीन होती है, और हर वक्त सच्चिदानंद का आभास होता है ।

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तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं वृन्दे वृन्दे तत्त्व चिन्तानुवादः ।

वादे वादे जायते तत्त्वबोधो बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः ॥


हर तीर्थ में पवित्र ब्राह्मणों का समुदाय विराजमान है । उस समुदाय में तत्त्व का विचार हुआ करता है । उन विचारों में तत्त्व का ज्ञान होता है, और उस ज्ञान में भगवान चंद्रशेखर शिवजी का भास होता है ।

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रम्भा:

गेहे गेहे जङ्गमा हेमवल्ली वल्यां वल्यां पार्वणं चन्द्रबिम्बम् ।

बिम्बे बिम्बे दृश्यते मीन युग्मं,युग्मे युग्मे पञ्चबाणप्रचारः ॥


हे मुनिवर ! हर घर में घूमती फिरती सोने की लता जैसी ललनाओं के मुख पूर्णिमा के चंद्र जैसे सुंदर हैं । उन मुखचंद्रो में नयनरुप दो मछलीयाँ दिख रही है, और उन मीनरुप नयनों में कामदेव स्वतंत्र घूम रहा है ।

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शुकः

स्थाने स्थाने दृश्यते रत्नवेदी,वेद्यां वेद्यां सिद्धगन्धर्वगोष्ठी ।

गोष्ठयां गोष्ठयां किन्नरद्वन्द्वगीतं,गीते गीते गीयते रामचन्द्रः ॥


हे रंभा ! हर स्थान में रत्न की वेदी दिख रही है, हर वेदी पर सिद्ध और गंधर्वों की सभा होती है । उन सभाओं में किन्नर गण किन्नरीयों के साथ गाना गा रहे हैं । हर गाने में भगवान रामचंद्र की कीर्ति गायी जा रही है ।

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रम्भा:

पीनस्तनी चन्दनचर्चिताङ्गी,विलोलनेत्रा तरुणी सुशीला ।

नाऽऽलिङ्गिता प्रेमभरेण येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! सुंदर स्तनवाली, शरीर पर चंदन का लेप की हुई, चंचल आँखोंवाली सुंदर युवती का, प्रेम से जिस पुरुष ने आलिंगन किया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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शुक:

अचिन्त्य रूपो भगवान्निरञ्जनो,विश्वम्भरो ज्ञानमयश्चिदात्मा ।

विशोधितो येन ह्रदि क्षणं नो,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


जिसके रुप का चिंतन नहीं हो सकता, जो निरंजन, विश्व का पालक है, जो ज्ञान से परिपूर्ण है, ऐसे चित्स्वरुप परब्रह्म का ध्यान जिसने स्वयं के हृदय में किया नहीं है, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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रम्भाः

कामातुरा पूर्णशशांक वक्त्रा,बिम्बाधरा कोमलनाल गौरा ।

नाऽऽलिङ्गिता स्वे ह्र्दये भुजाभ्यां,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनि ! भोग की ईच्छा से व्याकुल, परिपूर्ण चंद्र जैसे मुखवाली, बिंबाधरा, कोमल कमल के नाल जैसी, गौर वर्णी कामिनी जिसने छाती से नहीं लगायी, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुक:

चतुर्भुजः चक्रधरो गदायुधः,पीताम्बरः कौस्तुभमालया लसन् ।

ध्याने धृतो येन न बोधकाले,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! चक्र और गदा जिसने हाथ में लिये हैं, ऐसे चार हाथवाले, पीतांबर पहेने हुए, कौस्तुभमणि की माला से विभूषित भगवान का ध्यान, जिसने जाग्रत अवस्था में किया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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रम्भा:   

विचित्रवेषा नवयौवनाढ्या,लवङ्गकर्पूर सुवासिदेहा ।

नाऽऽलिङ्गिता येन दृढं भुजाभ्यां,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिराज ! अनेक प्रकार के वस्त्र और आभूषणों से सज्ज, लवंग कर्पूर इत्यादि सुगंध से सुवासित शरीरवाली नवयुवती को, जिसने अपने दो हाथों से आलिंगन दिया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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शुक:

नारायणः पङ्कजलोचनः प्रभुः,केयूरवान् कुण्डल मण्डिताननः।

भक्त्या स्तुतो येन न शुद्धचेतसा,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


कमल जैसे नेत्रवाले, केयूर पर सवार, कुंडल से सुशोभित मुखवाले, संसार के स्वामी भगवान नारायण की स्तुति जिसने एकाग्रचित्त होकर, भक्तिपूर्वक की नहीं, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भा:

प्रियवंदा चम्पकहेमवर्णा,हारावलीमण्डितनाभिदेशा ।

सम्भोगशीला रमिता न येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! प्रिय बोलनेवाली, चंपक और सुवर्ण के रंगवाली, हार का झुमका नाभि पर लटक रहा हो ऐसी, स्वभाव से रमणशील ऐसी स्त्री से जिसने भोग विलास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुकः

श्रीवत्सलक्षाङ्कितह्रत्प्रदेशः,तार्क्ष्यध्वजः शार्ङ्गधरः परात्मा ।

न सेवितो येन नृजन्मनाऽपि,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


जिस प्राणी ने मनुष्य शरीर पाकर भी, भृगुलता से विभूषित ह्रदयवाले, धजा में गरुड वाले, और शाङ्ग नामके धनुष्य को धारण करनेवाले, परमात्मा की सेवा न की, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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रम्भा:   

चलत्कटी नूपुरमञ्जुघोषा,नासाग्रमुक्ता नयनाभिरामा ।

न सेविता येन भुजङ्गवेणी,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिश्रेष्ठ ! चंचल कमरवाली, नूपुर से मधुर शब्द करनेवाली, नाक में मोती पहनी हुई, सुंदर नयनों से सुशोभित, सर्प के जैसा अंबोडा जिसने धारण किया है, ऐसी सुंदरी का जिसने सेवन नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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शुक:

विश्वम्भरो ज्ञानमयः परेशः,जगन्मयोऽनन्तगुण प्रकाशी ।

आराधितो नापि वृतो न योगे,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! संसार का पालन करनेवाले, ज्ञान से परिपूर्ण, संसार स्वरुप, अनंत गुणों को प्रकट करनेवाले भगवान की आराधना जिसने नहीं की, और योग में उनका ध्यान जिसने नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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रम्भा:

ताम्बूलरागैः कुसुम प्रकर्षैः,सुगन्धितैलेन च वासितायाः ।

न मर्दितौ येन कुचौ निशायां,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनि ! सुगंधी पान, उत्तम फूल, सुगंधी तेल, और अन्य पदार्थों से सुवासित कायावाली कामिनी के कुच का मर्दन, रात को जिसने नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुकः

ब्रह्मादि देवोऽखिल विश्वदेवो,मोक्षप्रदोऽतीतगुणः प्रशान्तः ।

धृतो न योगेन हृदि स्वकीये,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


ब्रह्मादि देवों के भी देव, संपूर्ण संसार के स्वामी, मोक्षदाता, निर्गुण, अत्यंत शांत ऐसे भगबान का ध्यान जिसने योग द्वारा हृदय में नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भाः

कस्तूरिकाकुंकुम चन्दनैश्च,सुचर्चिता याऽगुरु धूपिकाम्बरा ।

उरः स्थले नो लुठिता निशायां,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


कस्तूरी और केसर से युक्त चंदन का लेप जिसने किया है, अगरु के गंध से सुवासित वस्त्र धारण की हुई तरुणी, रात को जिस पुरुष की छाती पर लेटी नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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शुकः 

आनन्दरुपो निजबोधरुपः,दिव्यस्वरूपो बहुनामरपः ।

तपः समाधौ मिलितो न येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! आनंद से परिपूर्ण रुपवाले, दिव्य शरीर को धारण करनेवाले, जिनके अनेक नाम और रुप हैं ऐसे भगवान के दर्शन जिसने समाधि में नहीं किये, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भा:

कठोर पीनस्तन भारनम्रा,सुमध्यमा चञ्जलखञ्जनाक्षी ।

हेमन्तकाले रमिता न येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


जिस पुरुष ने हेमंत ऋतु में, कठोर और भरे हुए स्तन के भार से झुकी हुई, पतली कमरवाली, चंचल और खंजर से नैनोंवाली स्त्री का संभोग नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुकः

तपोमयो ज्ञानमयो विजन्मा,विद्यामयो योगमयः परात्मा ।

चित्ते धृतो नो तपसि स्थितेन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! तपोमय, ज्ञानमय, जन्मरहित, विद्यामय, योगमय परमात्मा को, तपस्या में लीन होकर जिसने चित्त में धारण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया।

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रम्भाः   

सुलक्षणा मानवती गुणाढ्या,प्रसन्नवक्त्रा मृदुभाषिणी या ।

नो चुम्बिता येन सुनाभिदेशे,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! सद्लक्षण और गुणों से युक्त, प्रसन्न मुखवाली, मधुर बोलनेवाली, मानिनी सुंदरी के नाभि का जिसने चुंबन नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुकः

पल्यार्जितं सर्वसुखं विनश्वरं,दुःखप्रदं कामिनिभोग सेवितम् ।

एवं विदित्वा न धृतो हि योगो,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! जिस इन्सान ने, नारी के सेवन से उत्पन्न सब सुख नाशवंत, और दुःखदायक है ऐसा जानने के बावजुद जिसने योगाभ्यास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भा:

विशालवेणी नयनाभिरामा,कन्दर्प सम्पूर्ण निधानरुपा ।

भुक्ता न येनैव वसन्तकाले,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


जिस पुरुष ने वसंत ऋतु में लंबे बालवाली, सुंदर नेत्रों से सुशोभित कामदेव के समस्त भंडाररुप ऐसी कामिनी के साथ विहार न किया हो, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुकः

मायाकरण्डी नरकस्य हण्डी,तपोविखण्डी सुकृतस्य भण्डी ।

नृणां विखण्डी चिरसेविता चेत्,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! नारी माया की पटारी, नर्क की हंडी, तपस्या का विनाश करनेवाली, पुण्य का नाश करनेवाली, पुरुष की घातक है; इस लिए जिस पुरुष ने अधिक समय तक उसका सेवन किया है, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भाः

समस्तशृङ्गार विनोदशीला,लीलावती कोकिल कण्ठमाला ।

विलासिता नो नवयौवनेन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनि ! जिस पुरुष ने अपनी युवानी में, समस्त शृंगार और मनोविवाद करने में चतुर और अनेक लीलाओं में कुशल और कोकिलकंठी कामिनी के साथ विलास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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शुक:

समाधि ह्रंत्री जनमोहयित्री,धर्मे कुमन्त्री कपटस्य तन्त्री ।

सत्कर्म हन्त्री कलिता च येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


समाधि का नाश करनेवाली, लोगों को मोहित करनेवाली, धर्म विनाशिनी, कपट की वीणा, सत्कर्मो का नाश करनेवाली नारी का जिसने सेवन किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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रम्भा:   

बिल्वस्तनी कोमलिता सुशीला,सुगन्धयुक्ता ललिता च गौरी ।

नाऽऽश्लेषिता येन च कण्ठदेशे,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिराज ! बिल्वफल जैसे कठिन स्तन है, अत्यंत कोमल जिसका शरीर है, जिसका स्वभाव प्रिय है, ऐसी सुवासित केशवाली, ललचानेवाली गौर युवती को जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।

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शुक:

चिन्ताव्यथादुःखमया सदोषा,संसारपाशा जनमोहकर्त्री ।

सन्तापकोशा भजिता च येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


चिंता, पीडा, और अनेक प्रकार के दुःख से परिपूर्ण, दोष से भरी हुई, संसार में बंधनरुप, और संताप का खजाना, ऐसी नारी का जिसने सेवन किया उसका जन्म व्यर्थ गया ।

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रम्भा:

आनन्द कन्दर्पनिधान रुपा,झणत्क्वणत्कं कण नूपुराढ्या ।

नाऽस्वादिता येन सुधाधरस्था,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! आनंद और कामदेव के खजाने समान, खनकते कंगन और नूपुर पहेनी हुई कामिनी के होठ पर जिसने चुंबन किया नहीं, उस पुरुष का जीवन व्यर्थ है ।

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शुक:

कापट्यवेषा जनवञ्चिका सा,विण्मूत्र दुर्गन्धदरी दुराशा ।

संसेविता येन सदा मलाढ्या,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


छल-कपट करनेवाली, लोगों को बनानेवाली, विष्टा-मूत्र और दुर्गंध की गुफारुप, दुराशाओं से परिपूर्ण, अनेक प्रकार से मल से भरी हुई, ऐसी स्त्री का सेवन जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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रम्भाः   

चन्द्रानना सुन्दरगौरवर्णा,व्यक्तस्तनीभोगविलास दक्षा ।

नाऽऽन्दोलिता वै शयनेषु येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! चंद्र जैसे मुखवाली, सुंदर और गौर वर्णवाली, जिसकी छाती पर स्तन व्यक्त हुए हैं ऐसी, संभोग और विलास में चतुर, ऐसी स्त्री को बिस्तर में जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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शुक:     

उन्मत्तवेषा मदिरासु मत्ता,पापप्रदा लोकविडम्बनीया ।

योगच्छला येन विभाजिता च,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! पागल जैसा विचित्र वेष धारण की हुई, मदिरा पीकर मस्त बनी हुई, पाप देनेवाली, लोगों को बनानेवाली, और योगीयों के साथ कपट करनेवाली स्त्री का सेवन जिसने किया है, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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रम्भा:   

आनन्दरुपा तरुणी नगाङ्गी,सद्धर्मसंसाधन सृष्टिरुपा ।

कामार्थदा यस्य गृहे न नारी,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनि ! आनंदरुप, नतांगी युवती, उत्तम धर्म के पालन में और पुत्रादि पैदा करने में सहायक, इंद्रियों को संतोष देनेवाली नारी जिस पुरुष के घर में न हो, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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शुक:     

अशौचदेहा पतित स्वभावा,वपुःप्रगल्भा बललोभशीला ।

मृषा वदन्ती कलिता च येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


अशुद्ध शरीरवाली, पतित स्वभाववाली, प्रगल्भ देहवाली, साहस और लोभ करानेवाली, झूठ बोलनेवाली, ऐसी नारी का विश्वास जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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रम्भा:

क्षामोदरी हंसगतिः प्रमत्ता,सौंदर्यसौभाग्यवती प्रलोला ।

न पीडिता येन रतौ यथेच्छं,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे मुनिवर ! पतली कमरवाली, हंस की तरह चलनेवाली, प्रमत्त सुंदर, सौभाग्यवती , चंचल स्वभाववाली स्त्री को रतिक्रीडा के वक्त अनुकुलतया पीडित की नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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शुक:

संसारसद्भावन भक्तिहीना,चित्तस्य चौरा हृदि निर्दया च ।

विहाय योगं कलिता च येन,वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥


हे रंभा ! संसार की उत्तम भावनाओं को प्रकट करनेवाले प्रेम से रहित पुरुषों के चित्त को चोरनेवाली, ह्रदय में दया न रखनेवाली, ऐसी स्त्री का आलिंगन, योगाभ्यास छोडकर जिस पुरुष ने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।

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रम्भा:

सुगन्धैः सुपुष्पैः सुशय्या सुकान्ता वसन्तो ऋतुः पूर्णिमा पूर्णचन्द्रः ।

यदा नास्ति पुंस्त्वं नरस्य प्रभूतं ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥


हे मुनिवर ! सुंदर, सुगंधित पुष्पों से सुशोभित शय्या हो, मनोनुकूल सुंदर स्त्री हो, वसंत ऋतु हो, पूर्णिमा के चंद्र की चांदनी खीली हो, पर यदि पुरुष में परिपूर्ण पुरुषत्त्व न हो तो उसका जीवन व्यर्थ है ।


शुक:

सुरुपं शरीरं नवीनं कलत्रंधनं मेरुतुल्यं वचश्चारुचित्रम् ।

हरस्याङ्घि युग्मे मनश्चेदलग्नं ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥


हे रंभा ! सुंदर शरीर हो, युवा पत्नी हो, मेरु पर्वत समान धन हो, मन को लुभानेवाली मधुर वाणी हो, पर यदि भगवान शिवजी के चरणकमल में मन न लगे, तो जीवन व्यर्थ है । 


       जय महादेव

Saturday, May 16, 2026

असावरी देवी कौन हे ?

 असावरी देवी कौन हे ? 


क्या आपको पता हे की भगवान शिवकी एक बहन भी थी ? 


पौराणिक कथाओं के अनुसार

असावरी भगवान शिव की बहन थी, जिनका सृजन माता पार्वती की इच्छा पर हुआ था। कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वतीजी ने नंनद होनेकी इच्छा जताई, जिसके बाद शिव ने अपनी माया से असावरी देवी को बनाया। वे अपने भयानक रूप और अत्यधिक भोजन करने की आदत के कारण जानी जाती हैं।


माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने अपनी शक्ति से असावरी देवी को ननंद के रूप में प्रकट किया था। कथाके अनुसार, माता पार्वती और असावरी देवी के बीच के अनुभवों को ननंद-भाभी के सांसारिक रिश्तों के एक प्रारंभिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है। 


उनकी एक विशेष आदत थी की उनको भूख बहुत लगती थी और उसको पेट भरनेके लिए बहुत अन्न की जरूरत पड़ती थी। इस व्यवहार के कारण अंततः उन्हें एक अलग स्थान दिया गया।


कहा जाता है कि असावरी देवी को बहुत अधिक भूख लगती थी। एक बार उनके अत्यधिक खाने के कारण कैलाश का सारा भोजन समाप्त हो गया और उन्होंने देवी पार्वती के साथ मजाक करते हुए अपने विशाल पैरों के बीच दरारों में उन्हें छिपा लिया। इस शरारत से आहत होकर देवी पार्वती ने उन्हें कैलाश से विदा कर दिया। इस प्रसंग के माध्यम से पुराणों और लोक-कथाओं में ननद-भाभी के रिश्ते की शुरुआत और उनसे जुड़े खट्टे-मीठे संबंधों की व्याख्या की जाती है।


असावरी देवी को कई समुदायों में श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। राजस्थान के अलवर जिले के पास राजोरगढ़ गांवमें असावरी माता का एक प्राचीन मंदिर है। कई परिवार इनको अपनी कुलदेवी मानकर पूजते है और भक्त इन्हें शक्ति के एक स्वरूप के रूप में मानते हैं।


  । उमापति महादेव की जय ।

भूमिका: एक पंक्ति, पूरा ब्रह्मांड

 "काल हर, कष्ट हर, दुख हर, दरिद्र हर, सर्व रोग हर, सर्व पाप हर, नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव।"  


भूमिका: एक पंक्ति, पूरा ब्रह्मांड  


ये सिर्फ एक श्लोक नहीं है। ये शिव का विज़िटिंग कार्ड है। 8 शब्दों में पूरी फरियाद, पूरी दवा, पूरा समाधान।  


जब वैद्य कह दे "अब कुछ नहीं हो सकता", जब कोर्ट कह दे "फैसला तुम्हारे खिलाफ है", जब किस्मत कह दे "तुम्हारा वक्त खराब है", तब ये पंक्ति शुरू होती है।  


"काल हर" — समय खराब है? हर लो।  

"कष्ट हर" — दर्द में हो? हर लो।  

"दुख हर" — टूट गए हो? हर लो।  

"दरिद्र हर" — जेब खाली है? हर लो।  

"सर्व रोग हर" — शरीर जवाब दे रहा? हर लो।  

"सर्व पाप हर" — अतीत पीछा कर रहा? हर लो।  

"नमः पार्वती पतये" — किससे माँग रहे हो? उससे जिसकी ताकत पार्वती का प्रेम है।  

"हर हर महादेव" — और आखिर में उद्घोष। क्योंकि माँगने के बाद धन्यवाद बनता है।  


आओ, इस मंत्र को 5000 शब्दों में जीते हैं। 8 हिस्से, 8 कहानियाँ, 8 सत्य।  


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1. काल हर: जब समय ने पीठ दिखाई


कहानी: राघव की घड़ी  

राघव शेयर मार्केट में ट्रेडर था। 2023 की मंदी में 1.8 करोड़ डूब गए। घर गिरवी, बीवी मायके, 2 साल की बेटी की फीस बाकी। रोज़ रात 3 बजे उठ जाता — "कब सुधरेगा टाइम?"  


एक दिन उज्जैन गया। मंदिर के बाहर बुज़ुर्ग ने देखा, बोला, "बेटा, टाइम को गाली मत दे। टाइम का भी बाप है। बोल 'काल हर'।"  


राघव को मज़ाक लगा। पर उस रात छत पर बैठकर पहली बार बोला, "काल हर... महादेव, मेरा वक्त हर ले।"  


6 महीने लगे। आज राघव फाइनेंशियल कोच है। 300 लोगों को कर्ज़ से निकाला। कहता है, "मार्केट ने पैसा नहीं लौटाया। 'काल हर' ने मेरा दिमाग लौटाया। जब दिमाग लौटा, पैसा अपने आप आया।"  


काल क्या है?  

काल = समय + मृत्यु + परिस्थिति। हम कहते हैं "बुरा वक्त चल रहा है"। शिव कहते हैं "वक्त को मैं चलाता हूँ"। इसलिए पहला शब्द 'काल हर'। क्योंकि जब तक समय तुम्हारा दुश्मन है, कोई दुआ काम नहीं करेगी।  


विज्ञान भी मानता है — स्ट्रेस में टाइम स्लो चलता है। डिप्रेशन में 1 दिन = 1 साल। 'काल हर' जपने से पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम एक्टिव होता है। टाइम का डर खत्म। और जब डर खत्म, तो गेम पलटता है।  


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2. कष्ट हर: दर्द का गणित


कहानी: मीरा का ऑपरेशन  

मीरा की रीढ़ में ट्यूमर। 9 घंटे की सर्जरी। डॉक्टर ने कहा, "बच गईं तो लकवा पक्का।"  

ऑपरेशन थिएटर के बाहर पति ने 11 माला की। हर माला पर सिर्फ "कष्ट हर"।  


सर्जरी सफल। पर दर्द ऐसा कि मॉर्फिन भी फेल। नर्स ने सुना मीरा बेहोशी में बड़बड़ा रही — "कष्ट हर... कष्ट हर..."  


तीसरे दिन मीरा ने आँख खोली। पहला सवाल, "मैं अपने पैर हिला सकती हूँ?"  

हिला दिए। डॉक्टर ने कहा, "मेडिकल मिरैकल।"  

मीरा ने कहा, "नहीं। कष्ट हर मिरैकल।"  


कष्ट क्या है?  

कष्ट = शरीर का दर्द + मन की बेचैनी। शिव को 'वैद्यनाथ' कहते हैं। धन्वंतरि से पहले के डॉक्टर।  

'कष्ट हर' बोलते ही शरीर में एंडोर्फिन रिलीज़ होता है। ये नेचुरल पेनकिलर है। इसलिए पुराने लोग प्रसव पीड़ा में "हर हर महादेव" बुलवाते थे।  


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3. दुख हर: मन का मर्ज़  


कहानी: 17 साल का समीर  

12वीं में फेल। गर्लफ्रेंड ने छोड़ दिया। बाप ने कहा "नालायक"। समीर ने नींद की 40 गोलियाँ खा लीं।  


पेट वॉश हुआ। ICU में होश आया तो सामने दादी। हाथ में गंगाजल। बोलीं, "बेटा, फेल होना दुख नहीं। दुख को पकड़कर बैठ जाना दुख है। बोल 'दुख हर'।"  


समीर 6 महीने डिप्रेशन में रहा। दवा + काउंसलिंग + रोज़ सुबह 'दुख हर' 108 बार।  

आज समीर स्टैंड-अप कॉमेडियन है। अपना पहला जोक इसी से शुरू करता है, "मैं मरते-मरते बचा, क्योंकि दादी ने कहा दुख हर... और महादेव ने सच में हर लिया।"  


दुख का साइंस  

दुख = अटैचमेंट x एक्सपेक्टेशन। शिव 'वैरागी' हैं। उनका मंत्र डिटैचमेंट सिखाता है। 'दुख हर' का मतलब दुख को भगाना नहीं, दुख से रिश्ता तोड़ना है।  


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4. दरिद्र हर: खाली जेब, भरा दिल  


कहानी: लक्ष्मी ऑटो वाले की  

नाम लक्ष्मी, काम ऑटो चलाना, जेब में लक्ष्मी नहीं। 3 बेटियाँ, किराये का घर। रोज़ स्टेशन पर खड़ा होता, "महाकाल, आज सवारी भेज दे।"  


एक दिन IIT का छात्र बैठा। बातों-बातों में लक्ष्मी ने 'दरिद्र हर' मंत्र सुना दिया। लड़का YouTube क्रिएटर था। उसने वीडियो बनाया — "ऑटो वाला जो शिव का मंत्र बांटता है"। 2 मिलियन व्यू।  


डोनेशन आए 4 लाख। लक्ष्मी ने ऑटो के साथ मोमो स्टॉल लगाया। अब 3 ऑटो, 1 दुकान। ऑटो के पीछे लिखाया, "दरिद्र हर — प्रूव्ड"।  


दरिद्र कौन?  

शिव खुद श्मशान में रहते, भस्म लपेटते, मृगछाला पहनते। वो दरिद्रता के राजा हैं। इसलिए दरिद्र उनसे नहीं डरती। 'दरिद्र हर' का मतलब पैसा आना नहीं, पैसे की कमी का डर जाना है। और जहाँ डर नहीं, वहाँ इनोवेशन आता है। इनोवेशन से लक्ष्मी आती है।  


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5. सर्व रोग हर: डॉक्टर से पहले की दवा  


कहानी: 108 साल के बाबा भोलेनाथ  

केदारनाथ के पास गाँव। बाबा भोलेनाथ उम्र 108। आँख साफ, कान साफ, 2 किमी पैदल।  

रिसर्च टीम आई, "बाबा, राज़ क्या है?"  

बाबा हँसे, "सुबह 4 बजे उठता हूँ। नहाकर 'सर्व रोग हर' 1 माला। बस।"  


मेडिकल टेस्ट हुआ। बीपी 120/80। शुगर नॉर्मल। कोलेस्ट्रॉल जवानों वाला।  

डॉक्टर ने पेपर पब्लिश किया — "Effect of Mantra Chanting on Geriatric Health"।  


रोग का रूट  

आयुर्वेद कहता है: 90% रोग पेट से, पेट का रोग स्ट्रेस से। 'सर्व रोग हर' स्ट्रेस काटता है। स्ट्रेस कटा = कॉर्टिसोल कम = इन्फ्लेमेशन कम = रोग कम। शिव को 'मृत्युंजय' यूं ही नहीं कहते।  


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6. सर्व पाप हर: अतीत की जेल से रिहाई  


कहानी: विक्रम, एक्स-गैंगस्टर  

मुंबई, 2008। विक्रम के नाम 3 मर्डर। पुलिस एनकाउंटर से बचा तो नेपाल भागा। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर भीख माँगता।  


एक साधु ने रोटी दी, साथ में मंत्र, "सर्व पाप हर बोल। पाप धुलते नहीं, हर होते हैं।"  


विक्रम 12 साल लगा। आज 'विक्रम सेवाश्रम' चलाता है। अनाथ बच्चों को पढ़ाता है। कोर्ट में सरेंडर किया, 7 साल सज़ा काटी। जज ने कहा, "तुम्हारी सज़ा कम क्यों करूँ?"  

विक्रम बोला, "साहब, कानून ने सज़ा दी। महादेव ने माफ़ी। 'सर्व पाप हर' ने मुझे मुझसे मुक्त किया।"  


पाप क्या है?  

पाप = गिल्ट + कर्म का बैगेज। शिव 'पशुपति' हैं — पशु यानी वासना, गुस्सा, लालच। 'सर्व पाप हर' इन पशुओं को हरता है। जब वासना हरी, तो नया पाप बनता ही नहीं। पुराना वाला कर्म से कट जाता है।  


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7. नमः पार्वती पतये: ताकत के पीछे की ताकत  


कहानी यहाँ रुकती है। क्योंकि माँग लिया काल हर, कष्ट हर... पर किससे माँग रहे हो?  


शिव श्मशान में नाचते हैं, क्योंकि पार्वती घर संभालती हैं। शिव विष पीते हैं, क्योंकि पार्वती गले में हाथ रखती हैं।  


'नमः पार्वती पतये' का मतलब — "मैं उसको नमन करता हूँ जो शक्ति का पति है"। बिना शक्ति के शिव 'शव' हैं।  


कहानी: अनुज और नेहा  

अनुज का एक्सीडेंट। कोमा। डॉक्टर ने जवाब दिया। नेहा, पत्नी, 90 दिन हॉस्पिटल में सोई। रोज़ 11 माला 'नमः पार्वती पतये'।  

91वें दिन अनुज उठा। पहला शब्द, "पार्वती कहाँ है?"  

नर्स चौंकी। अनुज बोला, "सपने में एक औरत बोली, तेरा पति पार्वती पति का नाम ले रहा है, तू हार मत मानना।"  


नेहा का नाम पार्वती नहीं। पर उस दिन अनुज ने जाना — हर पत्नी में पार्वती है, अगर पति में शिवत्व हो।  


इसलिए मंत्र में 'पार्वती पतये' लिखा है। ये रिमाइंडर है — अकेले नहीं मिलेगा। शक्ति को साथ रखो। माँ, पत्नी, बहन, बेटी — जिस रूप में हो, सम्मान दो। तब 'हर' शब्द काम करेगा।  


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8. हर हर महादेव: उद्घोष, अहंकार नहीं  


युद्ध से पहले, श्मशान से लौटकर, बच्चा पैदा होने पर — भारत में एक ही नारा: "हर हर महादेव"।  


'हर' = हरना + हरण करना + हर जगह होना।  

'महादेव' = देवों के देव।  


जब तुम 'काल हर' से शुरू करके 'हर हर महादेव' पर खत्म करते हो, तो तुम माँगते नहीं, घोषणा करते हो। "मेरा दुख हर चुका। अब मैं धन्यवाद दूँगा।"  


कहानी: कारगिल का सिपाही  

1999, टाइगर हिल। गोली लगी। साथी चिल्लाया "बचाओ!"  

सिपाही ने आखिरी साँस में कहा, "हर हर महादेव"।  

चमत्कार: गोली दिल से 1 इंच बची। वो सिपाही आज सूबेदार मेजर है। हर सुबह यूनिट से बुलवाता है, "हर हर महादेव"। कहता है, "ये नारा नहीं, बुलेटप्रूफ जैकेट है।"  


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उपसंहार: मंत्र को जीने के 5 नियम  


समय: ब्रह्म मुहूर्त 4-6 AM बेस्ट। नहीं तो सोने से पहले। क्योंकि 'काल हर' सबसे पहले है।  

संख्या: 1 बार, 11 बार, 108 बार। श्रद्धा मायने रखती है, गिनती नहीं।  

भाव: माँगते वक्त बच्चा बन जाओ। धन्यवाद देते वक्त योद्धा। 'हर हर महादेव' योद्धा का नारा है।  

कर्म: मंत्र लिफ्ट है, सीढ़ी फिर भी चढ़नी है। दवा + दुआ + दम।  

शेयर: 'दरिद्र हर' पाने के बाद बांटो। लक्ष्मी ऑटो वाला याद रखो।  


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आखिरी बात: तुम्हारी बारी  


तुम अभी जहाँ हो, वहीं रुक जाओ। आँख बंद करो। 1 गहरी साँस।  

बोलो:  

"काल हर" — और अपना बुरा वक्त शिव को दे दो।  

"कष्ट हर" — और दर्द सौंप दो।  

"दुख हर" — और टेंशन उतार दो।  

"दरिद्र हर" — और कमी का डर निकाल दो।  

"सर्व रोग हर" — और बीमारी थमा दो।  

"सर्व पाप हर" — और गिल्ट जला दो।  

"नमः पार्वती पतये" — और शक्ति को धन्यवाद दो।  

"हर हर महादेव" — और उठ खड़े हो।  


क्योंकि ये मंत्र प्रार्थना नहीं, FIR है — काल के खिलाफ, कष्ट के खिलाफ, दुख के खिलाफ।  

और जिसकी FIR महादेव के थाने में लिखी जाए, उसका इंसाफ पक्का है।  


तो जाओ। जी लो।  

काल हर, कष्ट हर, दुख हर, दरिद्र हर, सर्व रोग हर, सर्व पाप हर, नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव। 🙏  


 

Thursday, May 14, 2026

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।

 “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता” — एक शास्त्रीय, व्याकरणिक एवं निरुक्तपरक अध्ययन


✓•प्रस्तावना: हनुमान चालीसा में वर्णित प्रसिद्ध पंक्ति—


“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।”


भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की अत्यन्त गूढ़ एवं रहस्यपूर्ण अवधारणा को अभिव्यक्त करती है। सामान्यतः भक्तजन इसे केवल भक्ति-भाव से ग्रहण करते हैं, परंतु यदि इस चौपाई का अध्ययन व्याकरण, निरुक्त, योगशास्त्र, पुराण, रामायण, तंत्र तथा वेदान्त के आलोक में किया जाए तो यह सम्पूर्ण भारतीय दार्शनिक चेतना का संक्षिप्त सूत्र प्रतीत होती है।


यह चौपाई केवल हनुमानजी की स्तुति नहीं, अपितु शक्ति और चेतना, सिद्धि और संपदा, भक्ति और ब्रह्मविद्या, शब्द और अर्थ—इन सभी के अद्वैत संबंध की उद्घोषणा है।


✓•पाठ-विश्लेषण:


"अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥"


∆इसमें मुख्य शब्द हैं—

•१. अष्ट

•२. सिद्धि

•३. नव

•४. निधि

•५. दाता

•६. अस

•७. बर

•८. दीन

•९. जानकी

•१०. माता


इन सभी शब्दों की व्युत्पत्ति, व्याकरणिक सिद्धि एवं निरुक्तीय अर्थ का अध्ययन आवश्यक है।


✓•“अष्ट” शब्द की व्याकरणिक सिद्धि:


“अष्ट” संख्या-वाचक शब्द है।


पाणिनीय परंपरा में संख्या शब्दों की गणना “संख्यायाम्” अधिकार में की गई है। “अष्ट” संस्कृत का प्राचीन वैदिक शब्द है।


∆निरुक्तीय अर्थ:


निरुक्त के अनुसार संख्या शब्द केवल गणना के लिए नहीं, बल्कि दार्शनिक संकेत भी हैं।


“अष्ट” के अनेक प्रतीकार्थ हैं—

•अष्टदिक्

•अष्टप्रकृति

•अष्टाङ्गयोग

•अष्टलोकपाल

•अष्टभैरव

•अष्टमूर्ति शिव

अतः “अष्ट” पूर्णता एवं समग्र शक्ति का सूचक है।


✓•“सिद्धि” शब्द की व्युत्पत्ति:


“सिद्धि” शब्द “सिध्” धातु से बना है।


∆धातु:


"सिधँ संसिद्धौ।"


•अर्थात् — सफल होना, पूर्ण होना, प्राप्त होना।


∆व्याकरणिक सिद्धि:


सिध् + क्तिन् = सिद्धि


यहाँ “क्तिन्” प्रत्यय भाववाचक स्त्रीलिंग शब्द बनाता है।


∆अतः—


 “सिध्यते अनया” इति सिद्धिः।


•जिससे कार्य सिद्ध हो जाए वह सिद्धि है।


∆निरुक्तीय अर्थ:


निरुक्त परंपरा में “सिद्धि” का अर्थ है—

•पूर्णता

•उपलब्धि

•योगबल

•आत्मशक्ति

•चित्तविजय

योगशास्त्र में सिद्धि का अर्थ अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि चेतना की उन्नत अवस्था है।


✓•अष्ट सिद्धियाँ — शास्त्रीय विवेचन:

भागवत पुराण तथा योगग्रंथों में अष्ट सिद्धियों का वर्णन प्राप्त होता है।


∆वे हैं—

•१. अणिमा

•२. महिमा

•३. गरिमा

•४. लघिमा

•५. प्राप्ति

•६. प्राकाम्य

•७. ईशित्व

•८. वशित्व


✓•१. अणिमा:


“अणु” + “इमनिच्” = अणिमा


अत्यन्त सूक्ष्म होने की शक्ति।


∆दार्शनिक अर्थ:


अहंकार का सूक्ष्मीकरण।


हनुमानजी ने लंका प्रवेश करते समय यही शक्ति धारण की—


 “मसक समान रूप कपि धरी।”


✓•२. महिमा:


“महत्” से “महिमा”


विशाल होने की शक्ति।


यह केवल शरीर-वृद्धि नहीं, चेतना की विराटता है।


✓•३. गरिमा:


“गुरु” धात्वर्थ से सम्बद्ध।


अत्यन्त भारी होने की क्षमता।


आध्यात्मिक रूप में—गंभीरता एवं स्थिरता।


✓•४. लघिमा:


“लघु” से लघिमा।


अत्यन्त हल्का होने की शक्ति।


∆योग में इसका अर्थ है—


मनोभार से मुक्ति


आसक्ति-शून्यता


✓•५. प्राप्ति:


“प्र + आप् (लाभे)” धातु।


इच्छित वस्तु की प्राप्ति।


यह बाह्य नहीं, अन्तःचेतना की उपलब्धि भी है।


✓•६. प्राकाम्य:


कामना की पूर्ण सिद्धि।


यहाँ कामना लौकिक नहीं, दिव्य संकल्प है।


✓•७. ईशित्व:


“ईश” से ईशित्व।


स्वामीभाव।


स्वयं पर शासन।


✓•८. वशित्व:


“वश” धातु से।


वशीकरण नहीं, अपितु—


इन्द्रियनिग्रह


चित्तसंयम


✓•“नव निधि” का शास्त्रीय अध्ययन:


“निधि” शब्द—


नि + धा + कि


 “निधीयते अस्मिन्” इति निधिः।


जिसमें संपदा रखी जाए।

नव निधियाँ


∆विष्णु पुराण तथा तांत्रिक ग्रंथों में नौ निधियों का उल्लेख मिलता है—

•१. पद्म

•२. महापद्म

•३. शंख

•४. मकर

•५. कच्छप

•६. मुकुन्द

•७. नन्द

•८. नील

•९. खर्व


✓•निधियों का आध्यात्मिक अर्थ:


∆१. पद्म:

•कमल।

•आध्यात्मिक जागरण।


∆२. महापद्म:

•परम वैभव।

•ब्रह्मज्ञान।


✓•३. शंख:

•नादब्रह्म।

•प्रणवध्वनि।


✓•४. मकर:

•जलतत्त्व।

•अवचेतन शक्ति।


✓•५. कच्छप:

•स्थिरता।

•योग में प्रत्याहार।


✓•६. मुकुन्द:

•मोक्षदायक संपदा।


✓•७. नन्द:

•आनन्दस्वरूप धन।


✓•८. नील:

•गूढ़ तांत्रिक शक्ति।

•अनन्त आकाशतत्त्व।


✓•९. खर्व:

•सूक्ष्म छिपी हुई संपत्ति।

•कुण्डलिनी का प्रतीक।


✓•“दाता” शब्द का व्याकरण:


“दा” धातु से “तृच्” प्रत्यय।


दा + तृ = दाता


 “ददाति इति दाता।”

जो प्रदान करे।

यहाँ हनुमानजी केवल भौतिक दाता नहीं, आध्यात्मिक अनुग्रहदाता हैं।


✓•“अस बर दीन” का विश्लेषण:

“अस”

अयम् अर्थे अवधी-प्रयोग।

अर्थात् — ऐसा।


✓•“बर”:

संस्कृत “वर” का अपभ्रंश।


"वृञ् वरणे।"


जो वरण करने योग्य हो।

वर = अनुग्रह।


✓•“दीन”:


“दा” धातु से क्त।

दत्तवान्।


∆यहाँ अर्थ—

प्रदान किया।


✓•“जानकी माता” — निरुक्तीय विवेचन:


∆जानकी:

•जनकस्य अपत्यम् = जानकी


∆पाणिनि सूत्र—


 “तस्य अपत्यम्”


जनक की पुत्री।


✓•माता:


“मा” धातु (माने — पोषण) से।


मानयति, पोषयति इति माता।


जो पालन करे।


∆दार्शनिक अर्थ:


∆सीता केवल स्त्री पात्र नहीं, अपितु—

•आदिशक्ति

•करुणा

•भक्ति

•श्रीविद्या

•प्रकृति


✓•सीता द्वारा हनुमान को वरदान:

•रामचरितमानस में वर्णित है कि अशोकवाटिका में हनुमानजी की भक्ति से प्रसन्न होकर सीताजी ने उन्हें वर प्रदान किया।

•यह वर केवल शक्ति का नहीं, दिव्य कृपा का प्रतीक है।

•शक्ति बिना शिव शव है।

सीता बिना राम लीलारहित हैं।

•अतः सीता का वरदान हनुमान को “शक्ति-तत्त्व” से संपन्न करता है।


✓•योगदृष्टि से अष्ट सिद्धि:

पतञ्जलि योगसूत्र में सिद्धियाँ चित्त की उच्च अवस्थाएँ मानी गई हैं।


∆योगसूत्र में कहा गया—


“जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः।”


∆अर्थात् सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं—

•जन्म से

•औषध से

•मन्त्र से

•तप से

•समाधि से

हनुमानजी में ये सभी तत्त्व विद्यमान थे।


✓•वेदान्तीय अर्थ:

अष्ट सिद्धियाँ वास्तव में आत्मा की शक्तियाँ हैं।


नव निधियाँ चित्त की सम्पन्न अवस्थाएँ हैं।


∆हनुमानजी—

•भक्ति के शिखर

•ज्ञान के भास्कर

•योग के आचार्य

•शक्ति के केंद्र

हैं।


✓•तांत्रिक व्याख्या:


∆तंत्रशास्त्र में—

•अष्ट सिद्धियाँ = अष्टचक्रों की जागृति

•नव निधियाँ = नवशक्तियाँ

मानी गई हैं।

•सीता = कुण्डलिनी शक्ति।

•हनुमान = प्राणशक्ति।

•जब प्राण और शक्ति का संयोग होता है तब सिद्धियाँ प्रकट होती हैं।


✓•भक्ति-दर्शन में अर्थ:

•भक्ति में “सिद्धि” गौण है।


∆हनुमानजी स्वयं कहते हैं—


“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”


•अतः उनका लक्ष्य सिद्धि नहीं, सेवा है।


•यही कारण है कि सिद्धियाँ उनके पीछे चलती हैं।


✓•व्याकरणिक सौन्दर्य:

•इस चौपाई में अनुप्रास, लय और ध्वनि अत्यन्त अद्भुत है—

•अष्ट — सिद्धि

•नव — निधि

•दाता — माता

यह ध्वनिसाम्य अर्थ को प्रभावशाली बनाता है।


✓•तुलसीदास की काव्यप्रतिभा:

गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यल्प शब्दों में सम्पूर्ण योग, तंत्र, वेदान्त और भक्ति को समाहित कर दिया।

यह चौपाई केवल स्तुति नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिकता का सूत्रग्रंथ है।


✓•निष्कर्ष:

“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता” यह चौपाई भारतीय संस्कृति की बहुआयामी चेतना का अद्भुत संक्षेप है।


∆इसमें—

•योग है,

•वेदान्त है,

•तंत्र है,

•भक्ति है,

•व्याकरण है,

•निरुक्त है,

•शक्ति है,

•रामभक्ति है।

व्याकरण की दृष्टि से प्रत्येक शब्द अत्यन्त सारगर्भित है।

निरुक्त की दृष्टि से प्रत्येक पद गहन दार्शनिक अर्थ रखता है।

योग की दृष्टि से यह चेतना-विकास का सूत्र है।

भक्ति की दृष्टि से यह पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।


हनुमानजी की महिमा इसी में है कि वे सिद्धियों के स्वामी होकर भी स्वयं को केवल “रामदूत” कहते हैं।


अतः इस चौपाई का वास्तविक संदेश है—


"सच्ची सिद्धि शक्ति में नहीं, सेवा में है।

सच्ची निधि धन में नहीं, भक्ति में है।"

*#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्*

हमारी संस्कृति के वो 6 बाल नायक

 हमारी संस्कृति के वो 6 बाल नायक, जिनसे आज के बच्चों (और बड़ों) को भी बहुत कुछ सीखना चाहिए। 🏹🔥


🌟 सनातन धर्म के 6 महान बाल भक्त: जिनसे हमें जीवन की सबसे बड़ी सीख मिलती है 🌟

1. भक्त ध्रुव: अडिग संकल्प की शक्ति 🌠

राजा उत्तानपाद के पुत्र, जिन्होंने मात्र 5 वर्ष की आयु में सौतेली माँ के कटु वचनों से दुखी होकर वन की राह ली। उनकी कठोर तपस्या से स्वयं नारायण प्रकट हुए और उन्हें ब्रह्मांड में 'ध्रुव तारे' के रूप में अमर स्थान दिया।

✅ सीख: लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय हो, तो उम्र महज एक संख्या है।

2. भक्त प्रह्लाद: अटूट विश्वास का प्रमाण 🔥

असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद के हृदय में केवल विष्णु नाम था। पिता हिरण्यकश्यप के हर जुल्म और होलिका की आग को उन्होंने अपनी भक्ति से हरा दिया। अंततः भगवान ने 'नृसिंह अवतार' लेकर उनकी रक्षा की।

✅ सीख: ईश्वर पर सच्चा भरोसा हर विपत्ति का ढाल बन जाता है।

3. ऋषि अष्टावक्र: ज्ञान का शिखर 📚

शारीरिक रूप से आठ स्थानों से टेढ़े होने के बावजूद, अष्टावक्र परम ज्ञानी थे। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने राजा जनक की सभा में बड़े-बड़े विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।

✅ सीख: बुद्धिमत्ता और चरित्र, शारीरिक दिखावे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

4. बालक आस्तिक: करुणा और बुद्धिमानी 🐍

ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तिक ने अपनी तार्किक शक्ति और बुद्धिमत्ता से राजा जनमेजय के 'सर्प सत्र' यज्ञ को रुकवाया और पूरी नाग जाति को विनाश से बचाया।

✅ सीख: सही तर्क और दया भाव से बड़े से बड़े विनाश को टाला जा सकता है।

5. ऋषि मार्कण्डेय: भक्ति की अमरता 🕉️

जिनकी आयु केवल 16 वर्ष थी, उन्होंने मृत्यु के क्षणों में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग को गले लगा लिया। स्वयं महादेव ने प्रकट होकर यमराज से उनकी रक्षा की और उन्हें 'अमर' होने का वरदान दिया।

✅ सीख: सच्ची भक्ति काल (मृत्यु) पर भी विजय प्राप्त कर सकती है।

6. वीर एकलव्य: गुरु-भक्ति की पराकाष्ठा 🏹

मिट्टी की प्रतिमा को गुरु मानकर धनुर्विद्या में महारत हासिल करने वाले एकलव्य ने जब गुरु दक्षिणा में अपना अँगूठा माँगा गया, तो बिना एक पल सोचे उसे काटकर अर्पित कर दिया।

✅ सीख: अटूट अभ्यास और गुरु के प्रति समर्पण ही सफलता की कुंजी है।

🚩 हमें गर्व है अपनी समृद्ध संस्कृति और इन महान बाल भक्तों पर! 🚩

कमेंट में 

'जय श्री कृष्ण' या 

'हर हर महादेव'

'जय श्री द्वारकाधीश' लिखकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करें। 👇

गंभीर से गंभीर रोग में शीघ्र स्वस्थ होने की विधि – प्राण और संकल्प का अद्भुत समन्वय

 गंभीर से गंभीर रोग में शीघ्र स्वस्थ होने की विधि – प्राण और संकल्प का अद्भुत समन्वय


मित्रो, आज हम एक ऐसी विधि पर बात करेंगे जो गंभीर से गंभीर रोग में भी शीघ्र स्वस्थ होने में सहायक है। यह कोई जादू नहीं – यह प्राण, संकल्प और चित्त की शक्ति का शुद्ध विज्ञान है।


पहला चरण – दिनचर्या को साधो


प्रतिदिन रात को समय से सो जाओ, लगभग रात्रि 10 बजे अथवा जैसे ही सहज नींद आए। प्रातः जल्दी उठो – अपने आलस को सहजता मत समझ लेना। लगभग 7 घंटे की नींद लेना उचित है। सुबह उठकर ताजा जल 2-3 गिलास बैठकर पियो। फिर नित्य कर्म से निवृत्त होकर टहलने जाओ और व्यायाम करो – हल्का पसीना आना चाहिए।


दूसरा चरण – गहरी साँस का अभ्यास


गहरी, लंबी, धीमी साँस नाभि तक लेना और छोड़ना जरूर करो। दिन के समय भी, जब भी याद आए – गहरी, लंबी साँस लो और छोड़ो। ज्यादा से ज्यादा गहरी, लंबी, धीमी साँस की आदत डालो। जिससे शरीर में प्राण की मात्रा बढ़े।


तीसरा चरण – साँस के साथ ध्यान और ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव


जब साँस ले रहे हो, आँखें धीरे से बंद कर लो। आती-जाती साँस को पहले कुछ दिन नाक के नथुनों से बाहर आते-अंदर जाते महसूस करो। अपना पूरा ध्यान इस बात पर रहे – कैसे साँस धीरे-धीरे अंदर ले रहे हो, उस साँस के स्वाद को महसूस करो, कैसे धीरे-धीरे बाहर निकाल रहे हो।


शुरू-शुरू में 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम – ताजी, स्वच्छ हवा में – बैठकर या खड़े होकर, जिस स्थिति में सहज हो, अपनी गहरी साँस के आने-जाने का ध्यान करो।


जब साँस ले रहे हो, ध्यान पूरा नाक के नथुनों से अंदर प्रवेश करती और बाहर निकलती प्राणवायु पर रहे। और साथ ही, हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव करो।


चौथा चरण – नाक के नथुनों से आज्ञा चक्र तक


कुछ दिन इस तरह ध्यान करने से तुम नाक के नथुनों से लेकर आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य माथे) तक कुछ शीतलता, खिंचाव, और वायु के घर्षण को महसूस करोगे। तब अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य माथे पर ही ले जाओ। वहाँ साँस की शीतलता को महसूस करते हुए, हर आती-जाती साँस के साथ अपने भाव को दोहराओ – ‘स्वस्थ हूँ’।


ऐसा सिर्फ भाव ही नहीं करना है – अपने स्वास्थ्य को महसूस करो, उसके घटने को महसूस करो। प्राण के रूप में जो संजीवनी तुममे प्रवेश कर रही है, वह लगातार तुम्हें स्वस्थ बनाए हुए है। बार-बार हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ, स्वस्थ हूँ’ दोहराओ, अपने भाव को प्रगाढ़ करो।


पाँचवाँ चरण – ‘स्वस्थ हूँ’ ही तुम्हारा मंत्र है


‘स्वस्थ हूँ’ – यही तुम्हारा मंत्र है। इसको हर साँस के साथ जोड़ देना है। जो कार्य तुमने 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम किया, उसे अपने पूरे 24 घंटे पर फैला दो। ध्यान के समय के अलावा जब तुम यह कर रहे हो, आँखें बंद करने की भी जरूरत नहीं। एक धारा सतत चित्त में प्रगाढ़ होती रहे – ‘स्वस्थ हूँ’। और परमात्मा के प्रति धन्यवाद के भाव से भरे रहो। रात को सोने से पूर्व इसी भाव के साथ सो जाओ, जिससे रात भर यह मंत्र काम करता रहे।


छठवाँ चरण – हथेलियाँ टकराओ (विशेष विधि)


यदि तुम किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो और शीघ्र स्वस्थ होना चाहते हो, तो अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में टकराओ। यह एक दिन में कम से कम 500 बार – जोर-जोर से हथेलियाँ टकराकर बजाओ। हर टकराहट के साथ एक ही भाव रखो – ‘स्वस्थ हूँ’। यह मंत्र बन जाए। तुम्हारा अंतस इस जगत में फैले प्राण प्रवाह (संजीवनी) को तुममें तीव्रता से प्रवेश के लिए तैयार होगा। वे सभी ग्रन्थियाँ जो मन और शरीर के स्तर पर गलत जीवनशैली से पैदा हो गई थीं, टूट जाएँगी।


सातवाँ चरण – चित्त ही मंत्र है (शिव सूत्र)


यह शिव सूत्र है – ‘चित्त ही मंत्र है’। तुम जो भी मन से दोहराते हो, वही घटने लगता है। तुम जो भी दोहराओगे, वही घटेगा। तुम्हारे मन के द्वारा जो भी बार-बार पुनरुक्ति की जाती है, वह चित्त की धारा में प्रवाह बन जाती है, वही शक्ति बन जाती है। मन और शरीर दो नहीं – एक ही हैं। मन पर जो घटेगा, शरीर पर लक्षण आने शुरू हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे से गहरे में जुड़े हैं।


आठवाँ चरण – प्रगति की निगरानी रखो


तुम कितनी भी गंभीर या लाइलाज बीमारी से ग्रसित हो, इस सूत्र को समझकर उपयोग करो। साधना शुरू होने के उपरांत 15 दिन में एक बार चेकअप जरूर कराओ। सतत लगे रहो। धीरे-धीरे यह बात प्रगाढ़ होने लगेगी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो। एक क्रम तेजी से तुम्हें स्वस्थ करने में विकसित होने लगेगा। जब तक पूर्ण स्वस्थ न हो जाओ, सतत इस प्रक्रिया में लगे रहना है।


नौवाँ चरण – परमात्मा के प्रति अनुग्रह और धन्यवाद का भाव


परमात्मा के प्रति एक अनुग्रह, धन्यवाद के भाव से भरे रहो। यह बहुत सहायक होगा। पूरा अस्तित्व तुम्हें स्वस्थ किए जाने के प्रवाह से भर उठेगा।