Tuesday, May 26, 2026

विश्व के सभी आविष्कार भारतीय ने किए थे।

 


5000 साल पहले ब्राह्मणों ने हमारा बहुत शोषण किया ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने से रोका। यह बात बताने वाले महान इतिहासकार यह नहीं बताते कि,100 साल पहले अंग्रेजो ने हमारे साथ क्या किया। 500 साल पहले मुगल बादशाहों ने क्या किया।। 


हमारे देश में शिक्षा नहीं थी लेकिन 1897 में शिवकर बापूजी तलपडे ने हवाई जहाज बनाकर उड़ाया था मुंबई में जिसको देखने के लिए उस टाइम के हाई कोर्ट के जज महा गोविंद रानाडे और मुंबई के एक राजा महाराज गायकवाड के साथ-साथ हजारों लोग मौजूद थे जहाज देखने के लिए।


उसके बाद एक डेली ब्रदर नाम की इंग्लैंड की कंपनी ने शिवकर बापूजी तलपडे के साथ समझौता किया और बाद में बापू जी की मृत्यु हो गई यह मृत्यु भी एक षड्यंत्र है हत्या कर दी गई और फिर बाद में 1903 में राइट बंधु ने जहाज बनाया।


आप लोगों को बताते चलें कि आज से हजारों साल पहले की किताब है महर्षि भारद्वाज की विमान शास्त्र जिसमें 500 जहाज 500 प्रकार से बनाने की विधि है उसी को पढ़कर शिवकर बापूजी तलपडे ने जहाज बनाई थी।


लेकिन यह तथाकथित नास्तिक लंपट ईसाइयों के दलाल जो हैं तो हम सबके ही बीच से ही लेकिन हमें बताते हैं कि भारत में तो कोई शिक्षा ही नहीं थी कोई रोजगार नहीं था।


अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन 14 दिसंबर 1799 को आये थे। सर्दी और बुखार की वजह से उनके पास बुखार की दवा नहीं थी। उस टाइम भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और अंग्रेज प्लास्टिक सर्जरी सीख रहे थे हमारे गुरुकुल में अब कुछ वामपंथी लंपट बोलेंगे यह सरासर झूठ है।


तो वामपंथी लंपट गिरोह कर सकते है ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन मेलबर्न में ऋषि सुश्रुत ऋषि की  प्रतिमा "फादर ऑफ सर्जरी" टाइटल के साथ स्थापित है।


महर्षि सुश्रुत: ये शल्य चिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।


जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद पथरी हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।


भास्कराचार्य: आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।


आचार्य कणाद: कणाद परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।


उनके अनासक्त जीवन के बारे में यह रोचक मान्यता भी है कि किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते वक्त रास्तों में पड़ी चीजों या अन्न के कणों को बटोरकर अपना जीवनयापन करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद भी प्रसिद्ध हुआ।


गर्गमुनि: गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के बारे में नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।


आचार्य चरक: ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीर विज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर में सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।


पतंजलि: आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को भी रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।


बौद्धयन: भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।


15 साल साल पहले का 2000 साल पहले का मंदिर मिलते हैं जिसको आज के वैज्ञानिक और इंजीनियर देखकर हैरान में हो जाते हैं कि मंदिर बना कैसे होगा अब हमें इन वामपंथी लंपट लोगो से हमें पूछना चाहिए कि मंदिर बनाया किसने 


ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया यह बात बताने वाले महान इतिहासकार हमें यह नहीं बताते कि सन 1835 तक भारत में 700000 गुरुकुल थे इसका पूरा डॉक्यूमेंट Indian house में मिलेगा।


भारत गरीब देश था तो फिर दुनिया के तमाम आक्रमणकारी भारत ही क्यों आए हमें अमीर बनाने के लिए।


भारत में कोई रोजगार नहीं था। भारत में पिछड़े दलितों को गुलाम बनाकर रखा जाता था लेकिन वामपंथी लंपट आपसे यह नहीं बताएंगे कि हम 1750 में पूरे दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा 24 परसेंट था और सन उन्नीस सौ में एक परसेंट पर आ गया आखिर कारण क्या था।


अगर हमारे देश में उतना ही छुआछूत थे हमारे देश में रोजगार नहीं था तो फिर पूरे दुनिया के व्यापार में हमारा 24 परसेंट का व्यापार कैसे था।


यह वामपंथी लंपट यह नहीं बताएंगे कि कैसे अंग्रेजों के नीतियों के कारण भारत में लोग एक ही साथ 3000000 लोग भूख से मर गए कुछ दिन के अंतराल में 


एक बेहद खास बात वामपंथी लंपट या अंग्रेज दलाल कहते हैं इतना ही भारत समृद्धशाली था इतना ही सनातन संस्कृति समृद्ध थी तो सभी अविष्कार अंग्रेजों ने ही क्यों किए हैं भारत के लोगों ने कोई भी अविष्कार क्यों नहीं किया।


उन वामपंथी लंपट लोगों को बताते चलें कि किया तो सब आविष्कार भारत में ही लेकिन उन लोगों ने चुरा करके अपने नाम से पेटेंट कराया नहीं तो एक बात बताओ भारत आने से पहले अंग्रेजों ने कोई एक अविष्कार किया हो तो उसका नाम बताओ और थोड़ा अपना दिमाग लगाओ कि भारत आने के बाद ही यह लोग आविष्कार कैसे करने लगे उससे पहले क्यों नहीं करते थे।

        जय सनातन धर्म की ⛳⛳⛳⛳🌷🌷🌷

शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है।

 शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है।

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श्रुति और स्मृति। 

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श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है।


वेदों में क्या है?

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वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।


ऋग्वेद ● ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।


यजुर्वेद ● यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

 

सामवेद ●  साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसी से शास्त्रिय संगीत और नृत्य का जिक्र भी मिलता है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें संगीत के विज्ञान और मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।


अथर्वदेव ●  अथर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है।

 


उपनिषद् क्या है ~

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उपनिषद वेदों का सार है। सार अर्थात निचोड़ या संक्षिप्त। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ईश्वर है या नहीं, आत्मा है या नहीं, ब्रह्मांड कैसा है आदि सभी गंभीर, तत्व ज्ञान, योग, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि की बातें उपनिषद में मिलेगी। उपनिषदों को प्रत्येक हिन्दुओं को पढ़ना चाहिए। इन्हें पढ़ने से ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और जगत के बारे में सच्चा ज्ञान मिलता है।

 

वेदों के अंतिम भाग को 'वेदांत' कहते हैं। वेदांतों को ही उपनिषद कहते हैं। उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे; 1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि और 12. श्वेताश्वतर।


षड्दर्शन क्या है ~

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वेद से निकला षड्दर्शन ●  वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं। दरअसल यह वेद के ज्ञान का श्रेणीकरण है। ये छह दर्शन हैं:- 1. न्याय, 2. वैशेषिक, 3. सांख्य, 4. योग, 5. मीमांसा और 6. वेदांत। वेदों के अनुसार सत्य या ईश्वर को किसी एक माध्यम से नहीं जाना जा सकता। इसीलिए वेदों ने कई मार्गों या माध्यमों की चर्चा की है।


आत्मा के बारे में ~

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आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।


आत्मा का ना जन्म होता है और ना ही उसकी कोई मृत्यु है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। यह आत्मा अजर और अमर है। आत्मा को प्रकृति द्वारा तीन शरीर मिलते हैं एक वह जो स्थूल आंखों से दिखाई देता है। दूसरा वह जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं जो कि ध्यानी को ही दिखाई देता है और तीसरा वह शरीर जिसे कारण शरीर कहते हैं उसे देखना अत्यंत ही मुश्लिल है। बस उसे वही आत्मा महसूस करती है जो कि उसमें रहती है। आप और हम दोनों ही आत्मा है हमारे नाम और शरीर अलग अलग हैं लेकिन भीतरी स्वरूप एक ही है।


स्वर्ग और नरक के बारे में ~

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वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1. अगति और 2. गति।


१. अगति ● अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।


२. गति ● गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है या वह अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।


अगति के चार प्रकार है; 1. क्षिणोदर्क, 2. भूमोदर्क, 3. अगति और 4. दुर्गति।


क्षिणोदर्क क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है।


भूमोदर्क ●  भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।


अगति ●  अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।


दुर्गति ●  दुर्गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।


गति के भी 4 प्रकार:- गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:- 1. ब्रह्मलोक, 2. देवलोक, 3. पितृलोक और 4. नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।


तीन मार्गों से यात्रा ~

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जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं; अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।


धर्म और मोक्ष के बारे में ~

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धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्‍ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।


व्रत और त्योहार के बारे में ~

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हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।


मौसम और ग्रह नक्षत्रों की गतियों को ध्यान में रखकर बनाए गए व्रत और त्योहार का महत्व अधिक है। व्रतों में चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा, श्रावण मास और कार्तिक मास के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ है। यदि उपरोक्त सभी नहीं रख सकते हैं तो श्रावण के पूरे महीने व्रत रखें। त्योहारों में मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और हनुमान जन्मोत्सव ही मनाएं। पर्व में श्राद्ध और कुंभ का पर्व जरूर मनाएं।


व्रत करने से काया निरोगी और जीवन में शांति मिलती है। सूर्य की 12 और 12 चंद्र की संक्रांति होती है। सूर्य संक्रांतियों में उत्सव का अधिक महत्व है तो चंद्र संक्रांति में व्रतों का अधिक महत्व है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। इसमें से श्रावण मास को व्रतों में सबसे श्रेष्ठ मास माना गया है। इसके अलावा प्रत्येक माह की एकादशी, चतुर्दशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या और अधिमास में व्रतों का अलग अलग महत्व है। सौरमास और चंद्रमास के बीच बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साधुजन चतुर्मास अर्थात चार महीने श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।


उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्री, शिवरात्री, होली, ओणम, दीपावली, गणेशचतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।


तीर्थ के बारे में ~

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तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धान है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल,


भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।


 संस्कार के बारे में ~

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संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है; गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।


पाठ करने के बारे में ~

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वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।


धर्म कर्म और सेवा के बारे में ~

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धर्म कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे; 1. व्रत, 2. सेवा, 3. दान, 4. यज्ञ, 5. प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।


सेव का मतलब यह कि सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन बेटी, फिर भाई बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।


दान के बारे में ~

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दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं; 1. उक्तम, 2. मध्यम और 3. निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है।


यज्ञ के बारे में ~

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यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं; ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न जल देना ही भूत यज्ञ कहलाता है। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।


मंदिर जाने के बारे में ~

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प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना


सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।


संध्यावंदन के बारे में ~

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संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संध्योपासना के चार प्रकार है; 1. प्रार्थना, 2. ध्यान, 3. कीर्तन और 4. पूजा आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।


धर्म की सेवा के बारे में ~

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धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।


मंत्र के बारे में ~

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वेदों में बहुत सारे मंत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन जपने के लिए सिर्फ प्रणव और गायत्री मंत्र ही कहा गया है बाकी मंत्र किसी विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के लिए है। वेदों में गायत्री नाम से छंद है जिसमें हजारों मंत्र है किंतु प्रथम मंत्र को ही गायत्री मंत्र माना जाता है। उक्त मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप करते रहने से समय और ऊर्जा की बर्बादी है। गायत्री मंत्र की महिमा सर्वविदित है। दूसरा मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र, लेकिन उक्त मंत्र के जप और नियम कठिन है इसे किसी जानकार से पूछकर ही जपना चाहिए।


प्रायश्चित के बार में ~

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प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्‍चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग अलग तरीके बताते हैं। दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना, तपस्या का एक दूसरा रूप है।  यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम, मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है।


दीक्षा देने के बारे में ~

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दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा।

गरुड़ पुराण के अनुसार एक कोख से जुड़वां बच्चों के जन्म का रहस्य

 गरुड़ पुराण के अनुसार एक कोख से जुड़वां बच्चों के जन्म का रहस्य


गरुड़ पुराण हिन्दू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है। इसे महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के संवाद के माध्यम से मृत्यु, पुनर्जन्म, कर्मफल, नरक-स्वर्ग, पाप-पुण्य और आत्मा की गति का विस्तृत वर्णन है। इसी ग्रंथ के प्रेतकल्प और धर्मकांड में गर्भाधान, जन्म और मृत्यु के कई रहस्यों को खोला गया है। 


जुड़वां बच्चों का एक ही कोख से जन्म लेना आज भी विज्ञान के लिए जिज्ञासा का विषय है, लेकिन गरुड़ पुराण इसे केवल जीवविज्ञान नहीं, बल्कि कर्म, संस्कार और पूर्वजन्म के संबंधों से जोड़कर देखता है।


1. गर्भाधान का सामान्य सिद्धांत गरुड़ पुराण में


गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों से बनता है: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। जब माता-पिता के रज और वीर्य का संयोग होता है, तब उसमें जीवात्मा अपने सूक्ष्म शरीर के साथ प्रवेश करती है। 


प्रमुख बिंदु:

कर्म की भूमिका: आत्मा अपने पिछले जन्मों के संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों के अनुसार ही माता-पिता का चयन करती है।

काल का महत्व: गर्भाधान के समय नक्षत्र, तिथि, वार और लग्न का प्रभाव संतान के स्वभाव पर पड़ता है।

चित्त की अवस्था: गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जैसे भाव होते हैं, संतान का स्वभाव वैसा ही बनता है।


इस सामान्य नियम से अलग जब एक ही गर्भ में दो जीव एक साथ प्रवेश करते हैं, तो इसके पीछे विशेष कारण बताए गए हैं।


2. जुड़वां जन्म के मुख्य कारण: कर्मबंधन का सिद्धांत


गरुड़ पुराण का मूल सिद्धांत है: "यादृशं कर्म तादृशं फलम्"। अर्थात जैसा कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा। जुड़वां बच्चों के जन्म को यह 4 प्रकार के कर्मबंधनों से जोड़ता है।


कारण 1: ऋणानुबंध - पिछले जन्म का लेन-देन

गरुड़ पुराण कहता है कि कई आत्माओं के बीच पिछले जन्मों का ऋण बाकी रह जाता है। 


उदाहरण 1: यदि दो मित्रों ने पिछले जन्म में एक साथ व्यापार किया और एक दूसरे के पैसे नहीं चुकाए, तो अगले जन्म में वे भाई-बहन या जुड़वां बनकर आते हैं ताकि वह ऋण प्रेम या सेवा के रूप में चुकाया जा सके।

उदाहरण 2: पति-पत्नी यदि एक जन्म में एक दूसरे को अधूरा छोड़कर मर जाते हैं, तो अगले जन्म में वे जुड़वां बनकर पैदा हो सकते हैं। क्योंकि गर्भ में 9 महीने का साथ ही उनका अधूरा साथ पूरा करता है।


इसलिए जुड़वां बच्चों में अक्सर एक अजीब सा जुड़ाव दिखता है। एक को चोट लगे तो दूसरे को दर्द महसूस होना, इसका कारण यही ऋणानुबंध है।


कारण 2: संकल्प और वरदान का फल

प्रेतकल्प में वर्णन है कि कई बार दो जीव मृत्यु के समय एक साथ मरने का संकल्प लेते हैं। 


कथा: दो सगी बहनें थीं जो एक दूसरे से बहुत प्रेम करती थीं। महामारी में दोनों ने साथ प्राण त्यागे और भगवान से प्रार्थना की कि "अगले जन्म में भी हम साथ रहें"। यमदूतों ने उनके इस संकल्प को धर्मराज के सामने रखा। कर्मों का लेखा-जोखा देखने के बाद धर्मराज ने उन्हें एक ही माता के गर्भ से जुड़वां के रूप में जन्म दिया।


इसी प्रकार, यदि कोई माता-पिता संतान के लिए कठोर तप करते हैं और "हमें दो संतान एक साथ चाहिए" का संकल्प लेते हैं, तो प्रकृति उन्हें जुड़वां रूप में फल देती है।


कारण 3: सामूहिक पाप और सामूहिक पुण्य

गरुड़ पुराण के अनुसार जब दो या अधिक लोग मिलकर कोई बड़ा पाप या पुण्य करते हैं, तो उनका फल भी उन्हें साथ ही भोगना पड़ता है।


सामूहिक पाप: जैसे युद्ध में दो सैनिकों ने मिलकर किसी निरपराध को मारा। अगले जन्म में वे जुड़वां बनकर पैदा होंगे और बचपन से ही रोग, कलह या दरिद्रता साथ-साथ भोगेंगे।

सामूहिक पुण्य: यदि दो लोगों ने मिलकर मंदिर बनवाया, कुआँ खुदवाया या किसी की जान बचाई, तो वे जुड़वां बनकर राजयोग, सुख और समृद्धि साथ भोगते हैं।


इसलिए सभी जुड़वां बच्चों का भाग्य एक जैसा नहीं होता। कुछ बहुत भाग्यशाली होते हैं, कुछ बहुत दुखी। यह उनके सामूहिक कर्म पर निर्भर है।


कारण 4: गर्भ के दोष और आत्माओं की प्रतिस्पर्धा

गरुड़ पुराण में "गर्भोपनिषद" के संदर्भ से बताया गया है कि कभी-कभी गर्भ में प्रवेश के समय दो आत्माएं एक साथ आ जाती हैं। 


जब स्त्री का रज और पुरुष का वीर्य बहुत पुष्ट हो, और उस समय अंतरिक्ष में दो ऐसी आत्माएं भटक रही हों जिनका प्रारब्ध एक समान हो, तो दोनों ही उस रज-वीर्य में प्रवेश कर जाती हैं। 


इसे "आत्माओं की प्रतिस्पर्धा" कहा गया है। दोनों का कर्मफल और आयु लगभग बराबर होती है, इसलिए प्रकृति दोनों को स्वीकार कर लेती है। बाद में जन्म के बाद जिसके पुण्य अधिक होते हैं, वह अधिक जीता है। इसी कारण कई बार जुड़वां में से एक बच्चा कमजोर होता है या अल्पायु में मर जाता है।


3. जुड़वां के प्रकार और उनका फल


गरुड़ पुराण में जुड़वां बच्चों को उनके स्वभाव और जन्म के आधार पर 3 श्रेणियों में बांटा गया है।


4. जुड़वां जन्म को लेकर प्रचलित भ्रांतियां और पुराण का समाधान


भ्रांति 1: जुड़वां होना अशुभ है। 

पुराण का मत: जुड़वां जन्म न शुभ है न अशुभ। यह केवल कर्मों का प्रकटीकरण है। भगवान राम के पुत्र लव-कुश जुड़वां थे, जो महापराक्रमी हुए। रावण के पुत्र भी जुड़वां थे। इसलिए फल कर्म पर निर्भर है।


भ्रांति 2: जुड़वां बच्चों में एक की मृत्यु दूसरे के लिए अशुभ है।

पुराण का मत: जिसका ऋणानुबंध पूरा हो जाता है, वह पहले चला जाता है। दूसरा अपनी शेष आयु भोगता है। इसमें दोष नहीं है। माता-पिता को शोक की जगह गयाश्राद्ध और नारायणबलि करनी चाहिए ताकि गई हुई आत्मा को गति मिले।


भ्रांति 3: जुड़वां को अलग करना पाप है।

पुराण का मत: यदि दोनों के कर्म अलग-अलग दिशाओं में ले जा रहे हैं, तो उन्हें रोकना प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। जैसे नदी की दो धाराएं कुछ दूर साथ चलकर अलग हो जाती हैं।


5. माता-पिता के लिए गरुड़ पुराण के निर्देश


यदि किसी के घर जुड़वां संतान जन्म ले, तो गरुड़ पुराण माता-पिता को ये 5 कार्य करने को कहता है।


नामकरण: दोनों का नाम एक ही अक्षर से रखें, पर अर्थ विपरीत न हो। जैसे नकुल-सहदेव, लव-कुश। इससे उनमें सामंजस्य रहता है।

तुलादान: जन्म के 6 महीने बाद दोनों बच्चों को अन्न, वस्त्र या चांदी से तौलकर दान करें। इससे पिछले जन्म का ऋण हल्का होता है।

समान व्यवहार: दोनों से कभी भेदभाव न करें। यदि एक से अधिक प्रेम और एक से कम किया, तो अगले जन्म में यही ऋण फिर बनेगा।

गोदान: बच्चों के 5 वर्ष का होने पर गौ दान करें। इससे सामूहिक पाप कटते हैं।

कथा श्रवण: घर में हर पूर्णिमा को सत्यनारायण कथा कराएं। इससे घर में धर्मज ऊर्जा बढ़ती है और कामज दोष नष्ट होते हैं।


6. आधुनिक संदर्भ में गरुड़ पुराण की व्याख्या


आज विज्ञान जुड़वां को "मोनोज़ायगोटिक" और "डायज़ायगोटिक" में बांटता है। गरुड़ पुराण इसे "संकल्पज" और "कर्मज" कहता है। विज्ञान कारण बताता है, पुराण "क्यों" का उत्तर देता है।


विज्ञान कहता है कि एक अंडाणु दो भागों में बंट जाए तो एक जैसे जुड़वां होते हैं। पुराण कहता है कि जब दो आत्माओं का संकल्प इतना प्रबल हो कि वे अलग नहीं रह सकतीं, तो प्रकृति एक अंडाणु को ही दो में विभाजित कर देती है।


दो अलग अंडाणु दो अलग शुक्राणु से मिलें तो अलग जुड़वां बनते हैं। पुराण इसे "ऋणानुबंध वाली दो आत्माएं जिनका समय एक आ गया" कहता है।


इस प्रकार विज्ञान और पुराण एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। एक "कैसे" बताता है, दूसरा "क्यों" बताता है।


7. निष्कर्ष: जुड़वां जन्म एक अवसर है


गरुड़ पुराण के अनुसार एक कोख से जुड़वां बच्चों का जन्म कोई संयोग नहीं है। यह ब्रह्मांड के अचूक कर्मविधान का प्रमाण है। 


यह माता-पिता के लिए परीक्षा है कि वे समान प्रेम कर पाते हैं या नहीं। यह जुड़वां बच्चों के लिए अवसर है कि वे पिछले जन्म का ऋण चुकाकर मुक्त हो जाएं। और यह समाज के लिए संदेश है कि कोई भी संबंध "आकस्मिक" नहीं होता। हर संबंध के पीछे जन्मों की कहानी है।


इसलिए जुड़वां बच्चों को बोझ या चमत्कार न समझें। उन्हें प्रेम दें, धर्म का संस्कार दें और यह समझें कि भगवान ने आपके घर एक साथ दो कहानियां, दो प्रारब्ध, दो अवसर भेजे हैं। यदि आप उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाएंगे, तो वे आपके लिए और अपने लिए, दोनों जन्म सुधार लेंगे।


गरुड़ पुराण अंत में यही कहता है: "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा"। जुड़वां जन्म भी इसी कर्म-विधान की एक सुंदर, रहस्यमयी अभिव्यक्ति है।

Monday, May 25, 2026

मोक्ष पट्टम


 

आप सभी ने सांप सीढ़ी का खेल अवश्य खेला होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि इसके पीछे का इतिहास क्या है? क्या आपको ये ज्ञात है कि इस खेल का सम्बन्ध हमारे पौराणिक ज्ञान से भी है। आज हम आपको इस खेल के उद्भव के विषय में बताएँगे और हम ये भी देखेंगे कि ये खेल किस प्रकार हमारे पौराणिक ज्ञान से सम्बंधित है।


पहले तो हम इसका वास्तविक नाम आपको बता दें। इसे "मोक्ष पट्टम" कहा जाता था। जैसा कि नाम से प्रदर्शित होता है, ये एक ऐसा खेल था जिसमें मोक्ष प्राप्त करने के तरीके के विषय में बताया जाता था। ये तो हम सब ही जानते हैं कि हिन्दू धर्म में किसी भी प्राणी का जो सर्वोच्च लक्ष्य होता है वो है मोक्ष की प्राप्ति करना। ये भी सर्वविदित है कि केवल अच्छे कर्मों से ही प्राणी मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। अर्थात, पुण्य जितना अधिक और पाप जितना कम होगा, मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग उतना ही सरल होगा। इसे "परमपद सोपान" और "ज्ञान चौपड़" के नाम से भी जाना जाता है। 


इसी भावना से पाप और पुण्य के कार्य और उनसे प्राप्त होने वाले फल के विषय पर आधारित इस खेल का अविष्कार किया गया जिससे व्यक्ति, विशेषकर बच्चे कम आयु से ही पाप और पुण्य का अंतर समझ सकें और उसी के अनुसार आचरण करें। तो आप ये भी कह सकते हैं कि ये खेल बच्चों के मन में अच्छे कर्मों को करने और अच्छे संस्कार प्राप्त करने की भावना जगाने के उद्देश्य से बनाया गया था। बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं और अगर उन्हें बचपन से ही अच्छे संस्कार मिल जाएँ तो देश की प्रगति निश्चित है। यही इस खेल का वास्तविक उद्देश्य था। 


इस खेल की उत्पत्ति १३वीं शताब्दी की मानी जाती है। इसकी रचना महाराष्ट्र के महान संत श्री ज्ञानेश्वर ने केवल १८ वर्ष की आयु में सन १२९३ में की थी। संत ज्ञानेश्वर का जन्म सन १२७५ में महाराष्ट्र के पैठण जिले में हुआ था और उनकी मृत्यु केवल २१ वर्ष की आयु में सन १२९६ में हो गयी। इतनी कम आयु में भी उन्होंने जो उपलब्धि प्राप्त की वो अद्भुत है। यही कारण है कि उन्हें ना सिर्फ महाराष्ट्र का अपितु समस्त देश के सबसे प्रसिद्ध संतों में से एक माना जाता है। उनकी महान उपलब्धियों में से एक मोक्ष पट्टम नामक ये खेल भी था जिसने भारतीय समाज की जड़ों में अच्छे संस्कार का बीज बोया।


हालाँकि अगर इसका और भी इतिहास जानें तो ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले इस खेल का अविष्कार ईसा से २०० वर्ष पहले दक्षिण भारत में किया गया। हालाँकि उस काल में इस खेल की रचना किसने की उसका कोई सटीक विवरण है है। आज का सांप सीढ़ी का खेल १०० खानों में बंटा रहता है किन्तु मोक्ष पट्टम के मूल स्वरुप में ये सामानांतर और लंबवत ९ x ९ = ८१ खानों में बंटा रहता था। इनमें से पहला खाना "जन्म" एवं अंतिम खाना "मोक्ष" का होता था। खिलाडी का लक्ष्य अपने जन्म के खाने से प्रारम्भ कर सभी प्रकार के पाप और पुण्यों से होते हुए मोक्ष तक पहुँचना था। मोक्ष तक पहुँचने के साथ ही ये खेल समाप्त हो जाता था। बाद में कुछ अन्य गुणों को भी जोड़ कर इसकी कुल संख्या १३२ तक पहुँच गयी।


मोक्ष पट्टम में पाप और पुण्य को क्रमशः सर्प और रस्सी (सीढ़ी) के द्वारा दर्शाया जाता था। इनमें जहाँ सर्प क्रोध, हिंसा, लालच, आलस्य इत्यादि के प्रतिनिधित्व करते थे जो आपको अधो लोक (नीचे) की ओर धकेलता था वही रस्सी परोपकार, सहायता, धर्म, विद्या, बुद्धि इत्यादि का प्रतिनिधित्व करती थी, जो आपको उर्ध्व लोक (ऊपर) मोक्ष के पास ले जाता था। यदि आप पुण्य प्राप्त-करते करते सबसे ऊपर पहुँचते थे तो आपको मोक्ष की प्राप्ति होती थी और वही अगर आप पाप प्राप्त करते-करते सबसे नीचे पहुंचते थे तो आपका पुनर्जन्म होता था और आप जन्म और मृत्यु के चक्र में फंस जाते थे। 


इन विभिन्न सर्पों और रस्सियों में ४ सबसे बड़े सर्प और ४ सबसे बड़ी रस्सियां होती थी जो क्रमशः चार सबसे महान पाप और चार सबसे महान पुण्य को प्रदर्शित करता था। अगर खिलाडी इनमें से किसी भी खानों में पहुँचता था तो या तो मोक्ष के बिलकुल निकट पहुँच जाता था या फिर जन्म के बिलकुल निकट। ये महान पाप और पुण्य हमारे पुराणों में भी वर्णित हैं। ये थे:

४ महान सर्प (पाप)

गुरुपत्नी गामी 

चोरी करना 

मदिरा पान 

ब्रह्महत्या 

४ महान रस्सियाँ (पुण्य)

सत्य 

तप 

दया

दान 

इस खेल में सर्पों की संख्या सीढ़ियों की संख्या से अधिक होती थी जो ये बताती थी कि मनुष्य के जीवन में पाप करने के बहुत सारे अवसर आते हैं और पुण्य के बहुत कम। अतः पुण्य का कोई अवसर हाथ  निकलने नहीं देना चाहिए और पाप से सदैव बच कर रहना चाहिए। मोक्ष पट्टम के २०० से भी अधिक नमूनों का अध्ययन करने के बाद उनके खानों में लिखे गुणों की जानकारी मिलती है। हालाँकि हर मोक्ष पट्टम में ये गुण अलग हो सकते हैं किन्तु अधिकतर में उनका क्रम कुछ इस प्रकार था:


जन्म, माया, क्रोध, लोभ, भूलोक, मोह, मद, मत्सर, काम, तपस्या, गन्धर्वलोक, ईर्ष्या, अन्तरिक्ष, भुवर्लोक, नागलोक, द्वेष, दया, हर्ष, कर्म, दान, समान, धर्म, स्वर्ग, कुसंग, सत्संग, शोक, परम धर्म, सद्धर्म, अधर्म, उत्तम, स्पर्श, महलोक, गन्ध, रस, नरक, शब्द, ज्ञान, प्राण, अपान, व्यान, जनलोक, अन्न, सृष्टि, अविद्या, सुविद्या, विवेक, सरस्वती, यमुना, गंगा, तपोलोक, पृथिवी, हिंसा, जल, भक्ति, अहंकार, आकाश, वायु, तेज, सत्यलोक, सद्बुद्धि, दुर्बुद्धि, झखलोक, तामस, प्रकृति, दृष्कृत, आनन्दलोक, शिवलोक, वैकुण्ठलोक, ब्रह्मलोक, सवगुण, रजोगुण, तमोगुण।


१९वीं शताब्दी में ये खेल इंग्लॅण्ड पहुँचा और फिर सन १९४३ में ये अमेरिका पहुँचा जहाँ "मिल्टन ब्रेडले" नामक व्यक्ति ने इसे आसान बना कर "स्नेक एंड लैडर" का नाम दिया। जहाँ मोक्ष पट्टम में इस खेल में मनोरंजन और उससे भी अधिक शिक्षा और ज्ञानवर्धन का समावेश रहता था, अंग्रेजों ने इसे केवल मनोरंजन के लिए रखा और ज्ञान और शिक्षा की बात निकाल कर बाहर कर दिया। इससे हुआ ये कि ये खेल केवल और केवल मनोरंजन हेतु रह गया और आज भी वैसे ही चल रहा है।


अब तो ये खेल उतना प्रचलन में नहीं है किन्तु आज भी दक्षिण भारत में कुछ स्थानों पर मोक्ष पट्टम को पञ्चाङ्ग (कैलेंडर) के रूप में प्रकाशित किया जाता है। इसका स्वरुप थोड़ा आधुनिक होता है किन्तु पाप और पुण्य की सभी ज्ञानवर्धक बातें उसमें लिखी हुई होती है। अगर आपको आज मोक्ष पट्टम कहीं मिले तो उसे अवश्य खरीदें और उसका प्रयोग अपने बच्चों को उसी प्रकार संस्कार देने में करें जैसे पुराने ज़माने में बड़े-बजुर्ग करते थे।


राधे राधे 


मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज 

प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

हिन्दु धर्मग्रंथो के प्रसिद्ध वक्ता "सुतजी" कौन थे ?

 

यदि आपने हिन्दू धर्म के किसी भी धर्मग्रन्थ या व्रत कथाओं को पढ़ा है तो आपके सामने पौराणिक "सूत जी" का नाम अवश्य आया होगा। कारण ये है कि सूत जी कदाचित हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध वक्ता हैं। कारण ये कि पुराणों की कथा का प्रसार जिस स्तर पर उन्होंने किया है वैसा किसी और ने नहीं किया। किन्तु ये "सूत जी" वास्तव में हैं कौन?


सूत जी का वास्तविक नाम "रोमहर्षण" था। उन्हें लोमहर्षण भी कहते हैं। उनका रोमहर्षण नाम इसीलिए पड़ा क्यूंकि उनका सत्संग पाकर श्रोताओं का रोम-रोम हर्ष से भर जाता था। उन्हें सूत जी इसीलिए कहते हैं क्यूंकि वे सूत समुदाय से थे। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे जिस कारण वे सूत के रूप में जन्में। हालाँकि पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था।


एक बार सम्राट पृथु ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया जिसके अंत में सभी देवताओं को हविष्य दिया जा रहा था। ब्राह्मणों ने भूल से देवराज इंद्र को अर्पित किये जाने वाले सोमरस में देवगुरु बृहस्पति के हविष्य का अंश मिला दिया। जब उस हविष्य को अग्नि में डाला गया तो उसी से रोमहर्षण की उत्पत्ति हुई। चूँकि उनका जन्म इंद्र (क्षत्रिय गुण) और बृहस्पति (ब्राह्मण गुण) के मेल से हुआ था, इसलिए उन्हें "सूत" माना गया।


जब महर्षि वेदव्यास ने महापुराणों की रचना की तो उनके मन में चिंता हुई कि इस ज्ञान को कैसे सहेजा जाये। उनके कई शिष्य थे किन्तु कोई भी उन सभी १८ पुराणों को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए। जब सूत जी किशोरावस्था में पहुंचे तो एक योग्य गुरु की खोज करते हुए महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। आज ये माना जाता है कि सूत कुल के व्यक्ति को वेदाभ्यास का अधिकार नहीं था, ये बिलकुल गलत है। क्यूंकि महर्षि वेदव्यास ने रोमहर्षण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।


उनके आश्रम में सूत जी की विशेष रूप से वेदव्यास के एक अन्य शिष्य शौनक ऋषि से घनिष्ठ मित्रता हो गयी। ये दोनों महर्षि व्यास के सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक माने जाते हैं। रोमहर्षण ने अपनी प्रतिभा से व्यास रचित सभी १८ महापुराणों को कंठस्थ कर लिया। ये देख कर व्यास मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रोमहर्षण से उस अथाह ज्ञान का प्रसार करने को कहा।


तत्पश्चात रोमहर्षण ने अपने गुरु महर्षि व्यास से अपने पुत्र उग्रश्रवा को उनका शिष्य बनाने का अनुरोध किया। उग्रश्रवा अपने पिता के समान ही तेजस्वी थे जिसे देख कर व्यास जी ने उन्हें भी अपना शिष्य बना लिया। रोमहर्षण सभी वेद पुराणों का अध्ययन तो कर ही चुके थे, वे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमपिता ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया।


रोमहर्षण ने उनसे पूछा कि मुझे अपने गुरु से सभी पुराणों का ज्ञान प्राप्त हुआ है और आपने भी मुझे अलौकिक ज्ञान प्रदान किया है। अब मैं किस प्रकार इस ज्ञान का प्रसार करूँ? इस पर ब्रह्मदेव ने उन्हें एक दिव्य चक्र दिया और कहा कि इसे चलाओ और जिस स्थान पर ये रुक जाये वही अपना आश्रम स्थापित कर इस ज्ञान का प्रसार करो।


ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर रोमहर्षण ने उस चक्र को चलाया और वो जाकर "नैमिषारण्य" नामक स्थान पर रुक गया जो ८८००० तपस्वियों का स्थल था। इसी स्थल पर भगवान विष्णु ने निमिष (आंख झपकने में लगने वाला समय) भर में सहस्त्रों दैत्यों का संहार कर दिया था। इसी कारण उस प्रदेश का नाम नैमिषारण्य पड़ा। उसी पवित्र तीर्थ में रोमहर्ष ने अपना आश्रम स्थापित किया और प्रतिदिन सत्संग करने लगे।


कहा जाता है कि उनकी कथा कहने की शैली इतनी रोचक थी कि मनुष्य तो मनुष्य, जीव-जंतु भी उसे सुनने के लिए वहां आ जाते थे। उसी स्थान पर वे "सूत जी" के नाम से प्रसिद्ध हुए। उधर उनके पुत्र उग्रश्रवा भी महर्षि व्यास से शिक्षा लेकर पारंगत हो गए। उन्होंने अपने पिता से भी अधिक शीघ्रता से समस्त पुराणों का अध्ययन कर लिया और वे अपने पिता की भांति ही उस ज्ञान का प्रसार करने लगे।


एक बार नैमिषारण्य के सभी ८८००० ऋषियों ने महर्षि व्यास से ये अनुरोध किया कि वे उन्हें सभी महापुराणों की सम्पूर्ण कथाओं से अवगत कराएं। ये सुनकर महर्षि व्यास ने कहा कि इसके लिए आपको मेरी क्या आवश्यकता है? नैमिषारण्य में मेरे शिष्य रोमहर्षण हैं जो इन सभी कथाओं को सुना सकते है। आप सभी उन्हें "व्यास पद" पर आसीन कर पुराणों का ज्ञान प्राप्त करें। इस पर ऋषियों ने पूछा कि एक सूत को व्यास पद पर कैसे बिठाया जा सकता है? ये सुनकर महर्षि ने सभी को तत्वज्ञान दिया और बताया कि योग्यता जन्म से नहीं बल्कि कर्म से आती है।


ये सुनकर सभी ८८००० ऋषि नैमिषारण्य लौटे और सूत जी को व्यास गद्दी पर बिठा कर पुराणों का ज्ञान देने का अनुरोध किया। इसपर सूत जी ने १२ वर्षों का विशाल यज्ञ सत्र आयोजित किया जिसे सुनने उनके बाल सखा शौनक जी भी पधारे और यजमान का पद ग्रहण किया। सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व पर उनसे प्रश्न करते थे और सूत जी उत्तर देते थे। ऐसा कहते हुए बहुत समय बीत गया और सूत जी ने १० पुराणों की कथा समाप्त कर ११वां पुराण आरम्भ किया।


उधर महाभारत का युद्ध का समाचार सुनकर भगवान बलराम तीर्थ यात्रा पर निकले। घूमते हुए वे नैमिषारण्य पहुंचे जहाँ सूत जी का यज्ञ सत्र चल रहा था। जैसे ही सभी ऋषियों ने बलराम जी को देखा तो सभी अपने स्थान पर खड़े होकर उनका अभिवादन करने लगे और उन्हें आसन दिया। किन्तु सूत जी व्यास गद्दी पर बैठे होने के कारण ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के सम्मान में खड़े नहीं सकते थे। उन्होंने बलराम के आने पर थोड़ी देर के लिए कथा को भी विश्राम दिया।


जब बलराम ने ये देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि इतने बड़े-बड़े महर्षियों ने यहाँ मेरा स्वागत किया किन्तु सूत कुल में जन्मे इस व्यक्ति ने मेरा अपमान किया। यही सोच कर उन्होंने बैठे बैठे ही एक घास को मंत्रसिद्ध कर सूत जी पर चलाया जिससे उनका मस्तक धड़ से अलग हो गया। इस प्रकार सूत जी का वध होते देख कर सारी सभा त्राहि-त्राहि कर उठी। भयानक कोलाहल मच गया।


सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व में बलराम के पास पहुंचे और उनसे कहा कि आपने ये क्या किया? हम सभी ने महर्षि व्यास के आदेशानुसार सूत जी को व्यास पद प्रदान किया था किन्तु आपने बिना सत्य जाने उनका वध कर दिया। अब तो आप पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया है। उससे अधिक हानि हमारी हुई क्यूंकि सूत जी ने अभी तक पुराणों की कथा सम्पूर्ण नहीं की थी। अब ये ज्ञान सदा के लिए लुप्त हो जाएगा।


जब बलराम जी को सत्य का पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने महर्षि शौनक के चरण पकड़ कर कहा कि अनजाने में मुझसे बड़ा पाप हो गया। आप मुझे इसका प्रायश्चित बताएं। किस प्रकार मैं उनके द्वारा दिए गए इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करूँ?


इस पर शौनक जी ने कहा कि आप सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा को यहाँ बुलाइये क्यूंकि व्यास जी के अतिरिक्त अब एक वे ही है जिनके पास समस्त पुराणों का ज्ञान है। ये सुनकर बलराम तत्काल शौनक जी के साथ उग्रश्रवा ऋषि के पास पहुंचे और उनसे क्षमा याचना की। वे उन्हें मना कर नैमिषारण्य ले आये जहाँ उग्रश्रवा जी ने बांकी ८ पुराणों की कथा सुनाने का वचन दिया। बलराम को इससे थोड़ा संतोष हुआ।


उन्होंने पुनः प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले सभी ऋषियों से पूछा कि मुझे बताइये कि मैं प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले आपका और क्या हित करूँ? तब सभी ऋषियों ने कहा कि हे बलराम इस वन में "बल्वल" नामक एक असुर है जो इल्वल का पुत्र है। वो सदैव हमारे यज्ञ में विघ्न डालता है और यज्ञ कुंड में अपशिष्ट पदार्थ डाल देता है। कृपया उससे हमारी रक्षा करें।


ऋषियों का ऐसा अनुरोध सुनकर बलराम जी ने बल्वल ये युद्ध कर सहज ही उसका वध कर दिया और नैमिषारण्य को राक्षसों के आतंक से मुक्त किया। तत्पश्चात वे प्रायश्चित के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल गए। तब सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने पिता का सत्संग आगे बढ़ाया और बचे हुए ८ महापुराणों के ज्ञान से समस्त ऋषियों को परिपूर्ण कर दिया। 


महाभारत की कथा जो आज हम पढ़ते हैं वो भी सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा सौति द्वारा ही सुनाई हुई है। जब महर्षि वैशम्पायन ने महाभारत की मूल कथा, जिसे जय कहते हैं, परीक्षित पुत्र जन्मेजय को सुनाई थी, उस समय लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति ने भी वो कथा सुनी थी। बाद में उन्होंने नैमिषारण्य में पहुँच कर वही कथा विस्तार पूर्वक ८८००० ऋषियों को महर्षि शौनक की उपस्थिति में सुनाया। उन्होंने अपने पिता का पद प्राप्त किया था इस कारण उग्रश्रवा सौति को भी अपने पिता की भांति सूत जी कहा जाने लगा। 


कुछ लोगों का ये भी मानना है कि लोमहर्षण या उग्रश्रवा सौति सूत नहीं बल्कि ब्राह्मण थे किन्तु ये भी गलत है। हालाँकि कुछ पुराणों मेंरोमहर्षण को अग्नि से उत्पन्न अवश्य माना गया है किन्तु वास्तव में वे सूत ही थे। महाभारत में अनेकों स्थानों पर उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति को "सूत नंदन" कहकर सम्बोधित किया गया है। वैसे भी सूत एक सम्मानित पद ही था, इसीलिए इसे अन्यथा के रूप में नहीं देखना चाहिए। 


समान पद होने के कारण ही जनमानस में ये संदेह फैला है कि वास्तविक सूत जी कौन हैं? कुछ लोग लोमहर्षण को सूत जी मानते हैं तो कुछ लोग उग्रश्रवा सौति को। तो इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझें कि दोनों पिता-पुत्र सूत जी ही कहलाते हैं लेकिन पुराणों में अधिकतर स्थानों जिन सूत जी का वर्णन वो लोमहर्षण (रोमहर्षण) हैं और महाभारत के सन्दर्भ में जिन सूत जी का वर्णन आता है वो उग्रश्रवा सौति हैं। आम तौर पर जिन सूत जी की बात होती हैं उन्हें रोमहर्षण ही समझा जाना चाहिए।


राधे राधे 


मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज 

प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

नाथ संप्रदाय

 


हिन्दू धर्म में नाथ संप्रदाय का बड़ा महत्त्व है। ऐसी मान्यता है कि ये संप्रदाय स्वयं भगवान शंकर के भैरव रूप से आरम्भ हुआ और इसके पहले गुरु श्रीहरि के अवतार भगवान दत्तात्रेय हुए। इसी कारण नाथ संप्रदाय में महादेव अथवा भैरव को "आदिनाथ" एवं दत्तात्रेय को "आदिगुरु" कहा जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि सभी नौ सिद्धों का जन्म परमपिता ब्रह्मा के वीर्य से ही हुआ था। 


१. मच्छिन्द्रनाथ: इनका एक नाम मत्स्यनाथ भी है। इन्हे नाथ प्रथा का संस्थापक भी माना जाता है। ये गोरखनाथ के गुरु थे और इन्होने ही हठयोग विद्यालय की स्थापना की थी। ये हठयोग की पहली पुस्तक कौलजणाननिर्णय के लेखक भी हैं। इनकी बौद्ध धर्म में भी समान महत्ता है। बौद्ध धर्म के ६४ महासिद्धों में भी इनका वर्णन आता है। इन्हे नाथ संप्रदाय में "विश्वयोगी" भी कहा जाता है। इनके विषय में जो एक कथा सबसे प्रसिद्ध है वो उनके और महाबली हनुमान के बीच के युद्ध के विषय में है। संक्षेप में कथा ये है कि एक बार मच्छिन्द्रनाथ रामसेतु पर तपस्यारत थे। उसी समय हनुमानजी ने उनकी परीक्षा लेने का सोचा। उन्होंने वही पास में पड़े सात पर्वतों पर अपनी गदा से प्रहार करने लगे जिससे मच्छिन्द्रनाथ की तपस्या भंग हो गयी। इस पर दोनों में युद्ध छिड़ गया। हनुमानजी ने उन सभी ७ पर्वतों को उखाड़ कर मत्स्यनाथ पर फेंका किन्तु उन्होंने उन सभी पर्वतों को अपनी मंत्रशक्ति से चूर कर दिया। फिर मच्छिन्द्रनाथ ने अपने मन्त्र से हनुमान जी को स्तंभित कर दिया। ये देख कर महाबली हनुमान बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मच्छिन्द्रनाथ को अपना आशीर्वाद दिया।


२. गोरक्षनाथ: नाथ संप्रदाय के सर्वाधिक प्रसिद्ध गुरु जिन्हे हम गोरखनाथ के नाम से जानते हैं। उत्तरप्रदेश का गोरखपुर उन्ही के नाम पर है जहाँ उन्होंने वर्तमान गोरक्षपीठ मठ की स्थापना की थी। नेपाल का जो गोरखा समाज है, वो भी उन्ही के नाम पर पड़ा है। उन्ही के नाम पर नेपाल के एक जिले का नाम भी गोरखा है जहाँ एक प्राचीन गुफा में उनकी एक मूर्ति स्थापित है। गोरखनाथ का वर्णन त्रेतायुग एवं द्वापरयुग में भी आता है। जहाँ त्रेतायुग में वे श्रीराम के राज्याभिषेक में सम्मलित हुए थे वही द्वापरयुग में वे श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह में भी आये थे। कलियुग में भी उनकी कथा आती है जब महान वीर बाप्पा रावल ने उनके दर्शन किये और उनसे वरदान स्वरुप एक दिव्य तलवार प्राप्त की। उसी तलवार से उन्होंने मुगलों को पराजित किया था। भैरोंनाथ इन्ही के शिष्य थे जिनका उद्धार माता वैष्णोदेवी ने किया था। गोरखनाथ के जन्म के विषय में एक कथा आती है कि एक बार मच्छिन्द्रनाथ चंद्रगिरि नामक स्थान पर एक घर में भिक्षा मांगने पहुंचे। सरस्वती नाम की जिस स्त्री ने उन्हें भिक्षा दी वो निःसंतान थी। उन्होंने उसे विभूति दी और कहा इसे खा लेना, तुम्हे पुत्र प्राप्त होगा। किन्तु उस स्त्री ने भय से उस विभूति को गोबर के ढेर पर रख दिया। १२ वर्ष के बाद मत्स्यनाथ वहां पहुंचे तब उन्हें पता चला कि उस स्त्री ने उनकी विभूति को गोबर के ढेर पर रख दिया था। वे उस गोबर के ढेर पर पहुंचे और अलख जगाई तो उसी ढेर से १२ वर्ष के गुरु गोरखनाथ प्रकट हुए। गोबर में सुरक्षित रहने के कारण मत्स्यनाथ ने उन्हें गोरक्षनाथ नाम दिया। 


३. गहिनीनाथ: ये गोरखनाथ के शिष्य थे। इनके जन्म की एक अद्भुत कथा मिलती है। एक बार मछेन्द्रनाथ और गोरखनाथ भ्रमण करते हुए कनक गांव पहुंचे। वहां मत्स्यनाथ ने गोरखनाथ से कहा कि मैं भिक्षा लेने जा रहा हूँ, तुम एकांत में मृतसंजीवनी विद्या का अभ्यास करो। जब गोरखनाथ ध्यानमग्न थे तब वहां कुछ बच्चे खेलते हुए आ गए। उन्होंने गोरखनाथ से कहा कि वो गीली मिट्टी से एक पुतला बना दें। उनका आग्रह मानकर गोरखनाथ जी संजीवनी मन्त्र पढ़ते ही एक बच्चे का पुतला बनाने लगे, जो उस मन्त्र के प्रभाव से जीवित हो उठा। जब मत्स्यनाथ लौटे तो उन्होंने अपने कमंडल से उस बालक को दूध पिलाया। कुछ समय बाद वे दोनों उस बालक को लेकर वहां से जाने लगे। तब उसी गांव में रहने वाले एक ब्राह्मण जिनका नाम मधुमय था, अपनी पत्नी गंगा के साथ उनके पास पहुंचे। वे दोनों निःसंतान थे इसीलिए उन्होंने गोरखनाथ से उस बालक को गोद लेने का आग्रह किया। अपने गुरु मत्स्यनाथ के समर्थन से गोरखनाथ ने उस बालक को मधुमय को प्रदान किया जो उसके दत्तक पिता बने। उन्होंने उस बालक का नाम गहिनीनाथ रखा जो आगे चल कर महान संत बनें। 


४. जालंधरनाथ: ये पंजाब के रहने वाले थे और आज का जालंधर शहर इन्हे के नाम से जाना जाता है। कई स्थानों पर इन्हे गुरु मत्स्यनाथ का गुरुभाई बताया जाता है। इन्हे स्वयं भगवान दत्तात्रेय का शिष्य बताया गया है। इनके शिष्यों में श्री कृष्णपाद, जो बाद में नवनाथों में शामिल हुए, प्रमुख थे। अपने शिष्य कृष्णपाद के साथ मिलकर इन्होने ही कापालिक संप्रदाय की स्थापना की थी। तिब्बत में इनका बड़ा महत्त्व है और वहां की मान्यताओं के अनुसार ये मत्स्यनाथ के गुरु थे जिनका जन्म नगरभोग देश के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हठयोग का एक समूचा अध्याय इनके नाम पर ही है जिसे "जालंधर बंध" कहा जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि जालंधर नाथ पहले नाथ और अंतिम सिद्ध हैं। इनके जन्म के विषय में जो कथा आती है वो ये है कि हस्तिनापुर में बृहद्रव नामक राजा सोम नाम का एक यज्ञ कर रहे थे। उसी यज्ञ के समिधा के रूप में अंतरिक्षनारायण ने उस यज्ञ में प्रवेश किया जिससे उस यञकुंड से जालंधरनाथ की उत्पत्ति हुई। 


५. कानिफनाथ: इनका ही दूसरा नाम कृष्णपाद था और ये जालंधरनाथ के शिष्य थे। महाराष्ट्र में इन्हे कान्होबा भी कहा जाता है। चार्यपद में इन्हे ही कण्हपा के नाम से जाना जाता है। इन्होने हेव्रज और शैव योग साधना को मिश्रित कर अपना एक विशिष्ट योग बनाया जिसका अनुसार उनके शिष्यों ने किया। इनका जन्म कर्नाट देशीय ब्राह्मण के घर हुआ था और इनके शरीर का रंग काला होने के कारण इन्हे कृष्णपाद नाम मिला। इनकी एक शिष्या थी मेखला जिन्हे वज्रयान संप्रदाय में बहुत सम्मान प्राप्त है। उनके अतिरिक्त कनखल, अचिति एवं भदलि इन्ही के प्रसिद्ध शिष्य थे। इन्हे प्रबुद्ध नारायण के नौ अवतारों, जिन्हे "नवनारायण" कहा जाता है, में से एक माना गया है। अपने गुरु जालंधर नाथ के साथ मिलकर इन्होने कापालिक पंथ की स्थापना की। हालाँकि बाद में ये शैव योग की ओर मुड़ गए। भागवत पुराण के अनुसार ये स्वामी ऋषभ देव के पुत्र थे। इन्हे ब्रह्मा जी का पुत्र भी माना जाता है। एक बार ब्रह्मा जी माता सरस्वती के प्रति आकृष्ट हुए तो उनका तेज स्खलित हो पृथ्वी पर एक हथिनी के कान में जा गिरा। उसी से एक बालक का जन्म हुआ और कान से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम कनीफनाथ पड़ा। 


६. भृतहरिनाथ: इन्हे भरथरी नाथ भी कहा जाता है। भृतहरि राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई और उज्जैन के राजा थे। वे अपनी पत्नी पिंगला से अत्यधिक प्रेम करते थे। उन्होंने संन्यास भी अपनी पत्नी के कारण लिया। एक बार गुरु गोरखनाथ ने उन्हें एक फल दिया जिससे वे चिरकाल तक युवा बने रहेंगे। उस फल को उन्होंने अपनी रानी पिंगला को दिया। पिंगला किसी और युवक से प्रेम करती थी तो वो फल उसने उसे दे दिया। वो युवक एक वैश्या से प्रेम करता था तो वो फल उसने उस वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा कि वो इस फल का क्या करेगी? ये सोच कर उसने उस फल को राजा भृतहरि को उनकी लम्बी आयु के लिए दे दिया। जब राजा ने वो फल देखा तो उसे पिंगला की असलियत पता चली। उसी दुःख में उन्होंने संन्यास ले लिया। एक अन्य कथा इसके बिलकुल विपरीत है। उस कथा के अनुसार पिंगला अपने पति से अत्यंत प्रेम करती थी। एक बार भृतहरि ने पिंगला से पूछा कि यदि वे मर गए तो वो क्या करेगी? इसपर पिंगला ने कहा कि वो तो ये समाचार सुनते ही मर जाएगी। ये सुनकर भृतहरि ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनकी मृत्यु का झूठा समाचार रानी तक पहुंचाया। ये सुनते ही रानी ने अपने प्राण त्याग दिए। अब तो भृतहरि को अत्यंत क्षोभ हुआ और वे विलाप करने लगे। तब गोरखनाथ भ्रमण करते हुए उनके राज्य में पहुंचे। राजा भृतहरि ने उनसे आग्रह किया कि वे उनकी पत्नी को जीवनदान दें। गोरखनाथ ने ऐसा ही किया। इस पर भृतहरि ने संन्यास लेने का निश्चय किया और अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को राज्य सौंप कर वे गुरु गोरकनाथ के साथ चले गए।


७. रेवणनाथ: सिद्ध रेवणनाथ को भी ब्रह्माजी का पुत्र माना जाता है। एक कथा के अनुसार रेवा नदी के किनारे एक निःसंतान व्यक्ति ने प्रेम पूर्वक बालू से एक बालक की प्रतिमा का निर्माण किया और वापस चला गया। कानिफनाथ का जन्म ब्रह्मा के जिस तेज से हुआ उसी तेज का कुछ अंश रेवा नदी के किनारे पड़े उस प्रतिमा पर भी पड़ा जिससे उसमें प्राण आ गए और वो रोने लगा। अगले दिन जब वही व्यक्ति नदी किनारे आया तो अपने द्वारा बनाई गयी प्रतिमा को जीवित देख कर उसे अपने घर ले गया और रेवा नदी के किनारे उत्पन्न होने के कारण उसे रेवणनाथ नाम दिया। थोड़ा बड़े होने पर रेवणनाथ को दत्तात्रेय जी ने दर्शन दिए और उसे वरदान दिया कि वो जो कुछ भी चाहेगा, वो पूर्ण हो जाएगा। अब तो वो सब की इच्छा पूर्ण करने लगा और लोग उन्हें रेवणसिद्धि के नाम से पुकारने लगे। इससे उनमे थोड़ा अभिमान आ गया। एक दिन मछेन्द्रनाथ उस नगर में पधारे और रेवणनाथ की प्रसिद्धि के बारे में सुनकर उससे मिलने गए। वहाँ उनकी सिद्धि देख कर वे बड़े हैरान हुए किन्तु ये समझ गए कि उन्हें अभिमान ने घेर रखा है। उससे रेवणनाथ को मुक्त करवाने के लिए उन्होंने देव दत्तात्रेय से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुन कर दत्तात्रेय रेवणनाथ के पास आये और उनके मन में छिपे अभिमान और अज्ञान को दूर किया।


८. नागनाथ: एक कथा के अनुसार ब्रह्माजी के तेज को एक नागिन ने निगल लिया जो जन्मेजय के नागयज्ञ से छिप कर एक पेड़ के कोटर में बैठी थी। समय आने पर उस नागिन ने अंडे का प्रसव किया और उससे एक बालक का जन्म हुआ जो नागनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उसकी माता का वटवृक्ष में आश्रय लेने के कारण उनका एक नाम वटनाथ भी पड़ा। बड़े होने पर उन्हें भी दत्तात्रेय जी ने दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया कि वो जिस भी भोजन को चाहेगा वो उसके सामने आ जाएगा। उस वरदान को प्राप्त कर नागनाथ समस्त भिक्षुओं को प्रतिदिन भोजन करवाने लगे। इसे देख कर दत्तात्रेय अत्यंत प्रसन्न हुए। बाद में दत्तात्रेय ने उन्हें काशी ले जाकर भगवान शंकर का और बद्रीनाथ ले जाकर श्रीहरि का आशीर्वाद दिलवाया। इसे नागनाथ सभी ६४ विद्याओं के ज्ञाता हो गए। एक बार मछेन्द्रनाथ उनसे मिलने आये किन्तु नागनाथ के शिष्यों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। इस पर मछेन्द्रनाथ ने उन सभी को नागपाश से बांध दिया। ये देख कर नागनाथ मछेन्द्रनाथ से युद्ध करने लगे। युद्ध को भयावह होते देख दत्तात्रेय वहां पधारे और नागनाथ को बताया कि मत्स्यनाथ उनके बड़े गुरु भाई हैं। सत्य जान कर नागनाथ को बड़ा पश्चाताप हुआ और उन्होंने मछेन्द्रनाथ से क्षमा मांगी।


९. चर्पटीनाथ: नवनाथों में अंतिम चर्पटीनाथ हैं जो गुरु गोरखनाथ के शिष्य थे। एक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने जब ब्रह्मदेव को माता पार्वती को देखने के कारण श्राप दिया, तब उन्होंने अपने तेज को अपने पैरों से मसल दिया। उसके आधे भाग से ८८००० दिव्य ऋषि उत्पन्न हुए और आधा भाग होम नदी में गिर गया। किन्तु उनके तेज का कुछ भाग नदी किनारे उगे घास में फस गया और ९ महीने बाद उससे एक बालक का जन्म हुआ। घास या ईख में फंसे होने के कारण उनका नाम चर्पटीनाथ पड़ा। देवर्षि नारद की प्रेरणा से सत्यश्रवा नाम के एक व्यक्ति ने उन्हें गोद ले लिया। देवर्षि नारद ने बाद में दत्तात्रेय से कहा कि आपने जो नौ नाथों के समूह को बनाने का स्वप्न देखा था उसमें ८ सिद्ध तो सम्मलित हो गए हैं। अब नवें एवं अंतिम सिद्ध के रूप में आप चर्पटीनाथ को उस समूह में सम्मलित करें। इसपर दत्तात्रेय ने कहा कि बिना पश्चाताप कोई सिद्ध नहीं बन सकता अतः उन्हें चर्पटीनाथ के सिद्ध बनने तक प्रतीक्षा करनी होगी। ये सुनकर देवर्षि नारद रूप बदल कर चर्पटीनाथ के पास गए और उनके मार्गदर्शन में चर्पटीनाथ ने पश्चाताप किया और फिर ६४ विद्याओं को प्राप्त कर नवें सिद्ध का स्थान ग्रहण किया।


इन सभी नवनाथों के लिए एक स्मरण मन्त्र है:


आदि-नाथ ओ स्वरुप, उदय-नाथ उमा-महि-रुप। 

जल-रुपी ब्रह्मा सत-नाथ, रवि-रुप विष्णु सन्तोष-नाथ। 

हस्ती-रुप गनेश भतीजै, ताकु कन्थड-नाथ कही जै।

माया-रुपी मछिन्दर-नाथ, चन्द-रुप चौरङ्गी-नाथ। 

शेष-रुप अचम्भे-नाथ, वायु-रुपी गुरु गोरख-नाथ। 

घट-घट-व्यापक घट का राव, अमी महा-रस स्त्रवती खाव।

ॐ नमो नव-नाथ-गण, चौरासी गोमेश। 

आदि-नाथ आदि-पुरुष, शिव गोरख आदेश।

ॐ श्री नव-नाथाय नमः।।


राधे राधे 


मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज 

प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

भगवान बुद्ध और गौतमबुद्ध में अंतर है

 कहीं आप गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध को एक ही तो नहीं मान रहे? दोनों के बीच अंतर जानें।

कई बार जब हम गौतम बुद्ध के बारे में पढ़ते हैं तो हमें लगता है की बुद्ध एक ही व्यक्ति हैं, यह भ्रम हर उम्र के लोगों को अक्सर रहता है और इसी बात को लेकर विद्यार्थी भी सबसे ज्यादा भ्रम में रहते हैं परन्तु भ्रमित हों भी क्यों न क्योंकि दोनों में ही नाम और गोत्र और कार्यों में भी काफी हद तक समानता है, तो दोस्तों बड़ा ही रोचक विषय है, आज जानेंगे भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध के बारे में, उनके जन्म और वर्ण, और बाद में उनके समाज में अपने अपने क्या योगदान थें।


विशेष की गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं। भगवान विष्णु के प्रमुख दस अवतारों में भगवान बुद्ध, नौवें अवतार हैं। भगवान बुद्ध भगवान क्षीरोदशायी विष्णु के अवतार हैं। बलि प्रथा की अनावश्यक जीव हिंसा को बंद करने के लिए ही इनका अवतार हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती अंजना था और पिता का नाम हेमसदन था जिनका जन्मस्थान भारत के 'गया' (बिहार) में है। विचार करने वाली बात यह है कि शुद्धोदन व माया के पुत्र, शाक्यसिंह बुद्ध जिनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं।


श्री शाक्यसिंह बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति थे, उन्होंने कठिन तपस्या के बाद तत्त्वानुभूति की प्राप्ति की हुई जिसके बाद वे बुद्ध कहलाए। जबकि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार हैं। श्रीललित विस्तार ग्रंथ के 21 वें अध्याय के 178 पृष्ठ पर बताया गया है कि संयोगवश गौतम बुद्ध जी ने उसी स्थान पर तपस्या की जिस स्थान पर भगवान बुद्ध ने तपस्या की थी। इसी कारण लोगों ने दोनों को एक ही मान लिया।


जर्मन के वरिष्ट स्कालर श्रीमैक्स मूलर जी (German Scholar Mr.Max Müller) के अनुसार शाक्यसिंह बुद्ध अर्थात गौतम बुद्ध (Gautam Budh), का जन्म कपिलवस्तु के लुम्बिनी के वनों में 477 BC में हुआ था। जबकि भगवान बुद्ध (Bhagwan Buddh) आज से 5000 वर्ष पूर्व में वर्तमान में बिहार के 'गया' नामक स्थान में प्रकट हुए थे।


श्रीमद् भागवत महापुराण (1.3.24) तथा श्रीनरसिंह पुराण (36/29) के अनुसार भगवान बुद्ध आज से लगभग 5000 साल पहले इस धरातल पर आए जबकि Max Muller के अनुसार गौतम बुद्ध 2491 साल पहले आए। कहने का तात्पर्य यह है कि गौतम बुद्ध और भगवान बुद्ध एक नहीं हैं।


श्रीगोवर्धन मठ पुरी के पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के अनुसार भगवान बुद्ध और गौतम बुद्ध दोनों अलग-अलग काल में जन्मे अलग-अलग व्यक्ति थे। जिन गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का अंशावतार बताया गया है, उनका जन्म कीकट प्रदेश (मगध) में ब्राह्मण कुल में हुआ था। और उनके जन्म के सैकड़ों वर्षों के बाद कपिलवस्तु में जन्मे गौतम बुद्ध, क्षत्रिय राजकुमार थे और ब्राह्मण कुल के थे।


शंकराचार्य जी ने लोगों के पूछने पर बताया जब लोगों ने कहा कि- ब्राह्मणों ने ही बुद्ध को भगवान का अवतार घोषित कर पूजन की शुरुआत की थी , जिसपर उन्होंने कहा कि कर्मकांड में जिस बुद्ध की चर्चा होती है वे अलग हैं। भगवान बुद्ध की चर्चा वेदों (Vedas) में भी हुई है। जो की भगवान के अंशावतार हैं। इनकी चर्चा श्रीमद्भागवत में भी है। जो की ब्राह्मण कुल में जन्में थे। किस कारण भ्रम हुआ? तब शंकराचार्य जी ने कहा की अमरसिंह जो की राजा विक्रमादित्य की राजसभा के नौ रत्नों में से एक थे। उन्होंने जब अमरकोष, जो की संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कोष ग्रन्थ है उसकी रचना की थी। तो उस ग्रन्थ में भगवान बुद्ध के 10 और गौतम बुद्ध के पांच पर्यायवाची नाम को एक ही क्रम में लिख दिया था, जिस कारण यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुयी थी।


उन्होंने इसकी रचना तीसरी शताब्दी ई॰ पू॰ में की थी। शंकराचार्य ने कहा कि दोनों का गोत्र गौतम था। यह भी एक बड़ा कारण था कि इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अग्निपुराण में भगवान बुद्ध को लंबकर्ण कहा गया है, जिसका अर्थ है लम्बे कान वाला, जिसके बाद से गौतम बुद्ध के लंबे कान प्रतिमाओं में बनाए जाने लगीं। बौद्ध स्वयं को वैदिक नहीं मानते हैं जो की हैं भी नहीं। खुद को हिंदू नहीं मानते।


उन्होंने कहा कि संविधान की धारा 25 के तहत जैन, बौद्ध और सिख सभी हिंदू परिभाषित किए गए हैं। बौद्ध तो खुद को हिंदू नहीं मानते हैं। अब जैन, सिख भी खुद को हिंदू नहीं बताने लगे हैं।