Saturday, April 4, 2026

दक्ष प्रजापति की कन्याओं के वंश का विवरण संक्षिप्त

 *दक्ष प्रजापति की कन्याओं के वंश का विवरण संक्षिप्त*


ब्रह्माजीके अनुनय विनय करने पर दक्ष प्रजापतिने अपनी पत्नी असिक्नीके गर्भ से ६० कन्याएं उत्पन्न की थी जो अपने पिता को बहुत प्रेम करती थी।। 


दक्ष प्रजापति ने उनमें से १० कन्याएं धर्म को , १३ कश्यप को, २७ चंद्रमा को,२ भूत को , दो अङ्गिरा को, दो कृशाश्व को और शेष ४ तार्क्ष्यनामधारी कश्यप को ही ब्याह दी।।


*धर्म की १० पत्नीया*

 ```भानुर्लम्बाककुब्जाभि

र्विश्वा साध्या मरुत्वती।

वसुर्मुहूर्ता सङ्कल्पा 

धर्मपत्न्य: सुताञ् श्रृणु।।```

            भानु,लम्बा,ककुम्,

जामि, विश्वा,साध्या, मरुत्वती,वसु,मूहुर्ता और सङ्कल्पा।  


भानु के पुत्र - देवऋषभ और उसका इन्द्रसेन था।


लम्बा का पुत्र विधोत और मेघगण।


ककुम् का पुत्र सङ्कट उसका कीकट और कीकट और कीकटके पुत्र हुए पृथ्वी के सम्पूर्ण दुर्गों(किल्लों) के अभिमानी देवता।


जाभिके पुत्र का नाम खर्ग और उसका पुत्र नन्दी।


विश्वा के विश्वेदेव हुए और उनके कोइ संतान नहीं हुई।


साध्या से साध्यगण और उसका पुत्र अर्थसिद्धि।


मरूत्वतीके दो पुत्र हुए मरूत्वान् और जयन्त। जयन्त भगवान वासुदेव के अंश है जिन्हे लोग उपेन्द्र भी कहते हैं।


वसु के पुत्र आठो वसु हुए द्रोण,प्राण,धृव,अर्क,अग्नि,

दोष,वसु और विभावसु। 

-> द्रोण की पत्नी का नाम अभिमति से हर्ष शोक और भय के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए 

-> प्राण की पत्नी उर्जस्वतीके गर्भ से सह,आयु और पुरोजव नामके तीन पुत्र हुए।

-> धृवकी पत्नी धरणीने अनेक नगरों के अभिमानी देवता उत्पन्न किये।

-> अर्ककी पत्नी वासना के गर्भ से तर्ष(तृष्णा) आदि पुत्र हुए।

-> अग्नि नामक वसुकी पत्नी धारा के गर्भ से द्रविणक आदि बहुत पुत्र उत्पन्न हुए। कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्नि से और अग्नि से विशाख आदि का जन्म हुआ।

-> दोष की पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ जो भगवान का कलावतार है।

-> वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके अधिपति विश्वकर्माजी हुए विश्वकर्मा की भार्या कृतीके गर्भ से चाक्षुष मनु हुए जिनके पुत्र विश्वेदेव और साध्यगण हुए।

-> विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र व्युष्ट ,रोचिष और आतप हुए जिनमें आतप के पञ्चयाम (दिवस) नाम का पुत्र हुआ इन्हीं के कारण सब जीव अपने अपने कार्यो में लगे रहते हैं।




मूहुर्तासे अभिमानी देवता हुए जो अपने अपने मूहुर्त में जीवोको उनके कर्मानुसार फल देते हैं।


सङ्कल्पा का पुत्र हुआ सङ्कल्प और उसका पुत्र काम।


भूतकी पत्नी दक्षनन्दिनी सरूपाने कोटिकोटि रुद्रगण उत्पन्न किये। इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्य, बहरूप, और महान् ये ग्यारह मुख्य हैं। भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयंकर भूत और विनायकादि का जन्म हुआ। ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए।। अंगिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वांगिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ।। 


कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए-वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ।।


धिषणायां वेदशिरो 

देवलं वयुनं मनुम् । 

तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च ।। *तार्क्ष्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं- विनता, कद्र, पतंगी और यामिनी।पतंगीसे पक्षियोंका और यामिनीसे शलभों (पतिंगों) का जन्म हुआ।।*


पतङ्ग्यसूत पतगान्यामिनी शलभानथ।


सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद्यज्ञेशवाहनम् ।

सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः।।

*विनताके पुत्र गरुड़ हुए, ये ही भगवान् विष्णुके वाहन हैं। विनताके ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान्सूर्यके सारथि हैं। कद्रूसे अनेकों नाग उत्पन्न हुए ।।*


कृत्तिकादीनि नक्षत्रा-

णीन्दोः पत्न्यस्तु भारत। दक्षशापात्सोऽनपत्य

स्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः।।

*कृत्तिका आदि सत्ताईस नक्षत्रा-भिमानिनी देवियाँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। रोहिणीसे विशेष प्रेम करनेके कारण चन्द्रमाको दक्षने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षयरोग हो गया था। उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई ।।*


पुनः प्रसाद्य तं सोमः 

कला लेभे क्षये दिताः। 

शृणु नामानि लोकानां मातृणां शङ्कराणि च।।

*उन्होंने दक्षको फिरसे प्रसन्न करके कृष्णपक्षकी क्षीण कलाओंके शुक्लपक्षमें पूर्ण होनेका वर तो प्राप्त कर लिया, (परन्त नक्षत्राभिमानी देवियोंसे उन्हें कोई सन्तान न हई) अब तुम कश्यपपत्नियोंके मंगलमय नाम सुनो। वे लोकमाताएँ हैं। उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। उनके नाम हैं-अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनमें तिमिके पुत्र हैं-जलचर जन्तु और सरमाके बाघ आदि हिंसक जीव ।।*


सुरभेर्महिषा गावो ये 

चान्ये द्विशफा नृप। 

ताम्रायाः श्येनगृध्राद्या मुनेरप्सरसां गणाः।।

*सुरभिके पुत्र हैं-भैंस, गाय तथा दूसरे दो खुरवाले पशु। ताम्राकी सन्तान हैं- बाज, गीध आदि शिकारी पक्षी। मुनिसे अप्सराएँ उत्पन्न हईं ||*


दन्दशूकादयः सर्पा राजन्क्रोधवशात्मजाः । इलाया भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्च सौरसाः।।

*क्रोधवशाके पुत्र हुए-साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तु। इलासे वृक्ष, लता आदि पृथ्वीमें उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियाँ और सुरसासे यातुधान (राक्षस)*


अरिष्टायास्तु गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः। 

सुता दनोरेकषष्टि-

स्तेषां प्राधानिकाशृणु ।।

*अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोडे आदि एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। दनुके इकसठ पुत्र हुए। उनमें प्रधान-प्रधानके नाम सुनो।।*


द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः। अयोमखः शङकशिरा स्वर्भान कपिलोऽरुण।।

*द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ||*


स्वर्भानोः सुप्रभां कन्या

मुवाह नमुचिः किल। वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ।।

*स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया ||*


वैश्वानरसुतायाश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः। उपदानवी हयशिरा 

पुलोमा कालका तथा।।

*दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं। इनके नाम थे-उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका।।*


उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप। 

पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः।।

*उपयेमेऽथ भगवान्कश्यपो ब्रह्मचोदितः। पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः।।*


तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता। जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्र प्रियङ्करः।।

*इनमेंसे उपदानवीके साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ। ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान् कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों-पुलोमा और कालकाके साथ विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए। इन्हींका दूसरा नाम निवातकवच था। ये यज्ञकर्ममें विघ्न डालते थे, इसलिये परीक्षित् ! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला। यह उन दिनोंकी बात है, जब अर्जुन स्वर्गमें गये हुए थे ।।*


विप्रचित्तिः सिंहिकायां 

शतं चैकमजीजनत्। राहुज्येष्ठं केतुशतं 

ग्रहत्वं य उपागताः।।

*विप्रचित्तिकी पत्नी सिंहिकाके गर्भसे एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहोंमें हो गयी। शेष सौ पुत्रोंका नाम केतु था ||*


अथातः श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वशः। 

यत्र नारायणो देवः स्वांशेनावातरद्विभुः।।

*अब क्रमशः अदितिकी वंशपरम्परा सुनो। इस वंशमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायणने अपने अंशसे वामनरूपमें अवतार लिया था ।।*


विवस्वानर्यमा पूषा 

त्वष्टाथ सविता भगः। 

धाता विधाता वरुणो 

मित्रः शत्रु उरुक्रमः।।

*अदितिके पुत्र थे- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विवस्वान्की पत्नी महाभाग्यवती संज्ञाके गर्भसे श्राद्धदेव (वैवस्वत) मनु एवं यम-यमीका जोड़ा पैदा हुआ! संज्ञाने ही घोड़ीका रूप धारण करके भगवान् सूर्यके द्वारा भूलोकमें दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया ।।*


छाया शनैश्वरं लेभे 

सावर्णिं च मनुं ततः । 

कन्यां च तपतीं या 

वै वव्रे संवरणं पतिम्।।

*विवस्वान्की दूसरी पत्नी थी छाया। उसके शनैश्वर और सावर्णि मनु नामके दो पुत्र तथा तपती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। तपतीने संवरणको पतिरूपमें वरण किया ।।*


अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः । 

यत्र वै मानुषी जाति

र्ब्रह्मणा चोपकल्पिता।।

*अर्यमाकी पत्नी मातका थी। उसके गर्भसे चर्षणी नामक पुत्र हुए। वे कर्तव्य-अकर्तव्यके ज्ञानसे युक्त थे। इसलिये ब्रह्माजीने उन्हींके आधारपर मनुष्यजातिकी (ब्राह्मणादि वर्गोंकी) कल्पना की ।।*


पूषानपत्यः पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत्पुरा। 

योऽसौ दक्षाय कुपितं 

जहास विवृतद्विजः।।

*पूषाके कोई सन्तान न हुई। प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ।।*


त्वष्टुर्दैत्यात्मजा भार्या 

रचना नाम कन्यका। सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान्।।

*दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी पत्नी थी। रचनाके गर्भसेविधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (वामन)। यही बारह आदित्य कहलाये ||*


पूषानपत्य: पिष्टादो 

भग्नदन्तोऽभवत् पुरा।

योऽसौ दक्षाय कुपितं

जहास विवृतद्विज:।।

*पूषाके कोई सन्तान न हुई। प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे। तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ।।*


त्वष्टुर्दैत्यात्मजा भार्या 

रचना नाम कन्यका। सन्निवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान्।।

*दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी पत्नी थी। रचनाके गर्भसे दो पुत्र हुए-संनिवेश और पराक्रमी विश्वरूप ।।*


तं वव्रिरे सुरगणा 

स्वस्रीयं द्विषतामपि। विमतेन परित्यक्ता गुरुणाङ्गिरसेन यत्।।

*इस प्रकार विश्वरूप यद्यपि शत्रुओंके भानजे थे- फिर भी जब देवगुरु बहस्पतिजीने इन्द्रसे अपमानित होकर देवताओंका परित्याग कर दिया, तब देवताओंने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था ।।*


श्री कृष्णार्पणमस्तु 🙏 


*पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात*

जगन्नाथ रथयात्रा

 अरे जगन्नाथ जी किसके गंदे कपड़े धो रहे हैं? आइए देखते हैं इस कथा में। बहुत साल पहले पूरी के एक गांव में रहते थे हमारे माधवदास जी। एकदम अकेले ना आगे नाथ ना पीछे पग। बस दिन रात जगन्नाथ जगन्नाथ। समुद्र के किनारे परे रहते थे और मंदिर के सिंह द्वार पर घंटों खड़े होकर बस टुकुर टुर महाप्रभु को देखते रहते। अरे प्रभु आप ही माई हो। आप ही बाप हो। लेकिन हमारे जगन्नाथ जी को भक्तों की परीक्षा लेने में उन्हें थोड़ा सताने में बड़ा आनंद आता है। बैठे-बैठे सोचा माधव का प्रेम तो पक्का है लेकिन थोड़ा और पकाते हैं और दे दी माधवदास जी को भयंकर बीमारी। ऐसी वैसी बीमारी नहीं सीधा अतिसार। अब माधवदास जी अपनी झोपड़ी में पड़े हैं ना हिल पा रहे हैं ना डुल पा रहे हैं। हालत यह हो गई कि जहां लेटे हैं वहीं कपड़े गंदे हो रहे हैं। आसपास के लोग जो कल तक बाबा जी बाबा जी करते थे वह अब नाक पर कपड़ा रख के निकल रहे हैं। बोले अरे राम राम कितनी बदबू आ रही है। उधर मत जाना। माधवदास जी लेटे रो रहे हैं। हे प्रभु अब तो उठा लो। यह शरीर अब चलता नहीं और यह गंदगी मुझसे देखी नहीं जाती और दर्द के मारे एक दिन माधवदास जी बेहोश हो गए। जैसे ही माधवदास जी बेहोश हुए हमारे ठाकुर जी का आसन डोल गया। बोले अरे मेरा माधव बुला रहा है और तुरंत जगन्नाथ जी जो सोने के पलंग पर सोते हैं वो एक सेवक का भेष बना के कमर पर गमछा कस के पहुंच गए माधवदास की झोपड़ी में। और वहां जाकर क्या देखते हैं? माधवदास गंदगी में सने पड़े हैं। जगन्नाथ जी को घिन आएगी। अरे सवाल ही नहीं। उन्होंने अपने पीतांबर को ऊपर खौसा और लग गए काम पे। जिन हाथों से पूरी दुनिया का चक्कर चलता है, उन हाथों से माधवदास के गंदे कपड़े धो रहे हैं। समुद्र से दौड़-दौड़ के पानी ला रहे हैं। झोपड़ी साफ कर रहे हैं। माधवदास को नहला रहे हैं। और तो और जब माधवदास को होश आता तो पूछने लगते। अरे भाई तुम कौन हो? इतनी बदबू में मेरी सेवा क्यों कर रहे हो? ठाकुर जी मंदमंद मुस्कुरा के बोले। अरे बाबा हम तो सेवक हैं। पता चला तुम बीमार हो तो चले आए। तुम चुपचाप पड़े रहो। माधवदास जी सोचे बड़ा भला आदमी है। एक दिन माधवदास जी को थोड़ा आराम मिला तो देखा वो सेवक पैर दबा रहा है। लेकिन उस सेवक के शरीर से जो खुशबू आ रही थी तुलसी, चंदन और कपूर की। माधवदास जी का माथा ठनका। बोले यह खुशबू तो मेरे मंदिर वाले की है। ध्यान से देखा तो वो बड़ी-बड़ी आंखें वही मंद मुस्कान। माधवदास जी ने झट से हाथ पकड़ लिया। बोले पकड़े गए प्रभु यह आप हैं। और फूट-फूट के रोने लगे। हे नाथ आपको शर्म नहीं आती। आप त्रिभुवन के मालिक होके मेरे गंदे कपड़े धो रहे हो। मेरी गंदगी साफ कर रहे हो। मुझे नरक में डाल देते। पर यह पाप क्यों चढ़ा रहे हो मेरे सर पे? जगन्नाथ जी हंस के बोले अरे माधव भक्त और भगवान में काहे का ऊंचनीच? जहां मेरा भक्त वहां मैं। माधवदास जी बोले वो सब तो ठीक है पर आप तो सर्वशक्तिमान हैं। चाहते तो एक चुटकी बजाते मेरी बीमारी गायब हो जाती। खुद गंदे कपड़े धोने की क्या जरूरत थी? अब जगन्नाथ जी बोले अरे माधव तुम नहीं समझोगे। यह कर्म का नियम है। मैंने सृष्टि बनाई है तो नियम तो मुझे भी मानना पड़ेगा। यह तुम्हारे पिछले जन्म का कोई पाप था जो इस बीमारी के रूप में कट रहा है। माधवदास बोले तुम मिटा देते इसे। ठाकुर जी बोले अरे मिटा तो देता पर फिर यह उधारी रह जाती और इस उधारी को चुकाने के लिए तुम्हें फिर से जन्म लेना पड़ता। फिर से मां के पेट में उल्टा लटकना पड़ता और मैं नहीं चाहता कि मेरा भक्त जिसने मुझे इतना प्रेम किया वो सिर्फ एक बीमारी भोगने के लिए फिर से जन्म ले। इसलिए सोचा चलो मैं ही सेवा कर देता हूं। तुम्हारा हिसाब किताब यही बराबर कर देते हैं। माधवदास जी सुन के सन्न रह गए। बोले प्रभु आप मेरे लिए इतना कष्ट सह रहे हैं। नहीं नहीं अब आप यहां नहीं आएंगे। अब आप सेवा नहीं करेंगे। मुझसे यह पाप और नहीं होगा। जगन्नाथ जी बोले, लेकिन माधव, अभी तुम्हारे कर्म के 15 दिन और बचे हैं। 15 दिन तो भुगतना ही पड़ेगा। माधवदास जी जिद पर अड़ गए। 15 दिन क्या? 15 युग भुगत लूंगा। पर आपसे पैर नहीं दबवाऊंगा। अब जाओ यहां से। ठाकुर जी बोले, "अच्छा, बड़ी ज़िद है तुम्हारी।" ठीक है। तुम मेरी सेवा नहीं लेना चाहते ना तो एक काम करते हैं। तुम्हारी 15 दिन की बीमारी हम ले लेते हैं। खुश। इससे पहले कि माधवदास कुछ बोलते ठाकुर जी वहां से गायब और इधर माधवदास के शरीर में बिजली दौड़ी। एकदम चंगे हो गए। खड़े होके नाचने लगे। अरे मैं तो ठीक हो गया। दौड़े-दौड़े मंदिर गए कि प्रभु को धन्यवाद करूं। मंदिर पहुंचे तो देखा सन्नाटा है। पंडा पुजारी मुंह लटकाए बैठे हैं। माधवदास बोले अरे दरवाजा क्यों बंद है? दर्शन करने दो। पुजारी बोले क्या दर्शन करोगे माधव? महाप्रभु को 104 डिग्री बुखार चढ़ गया है। अभी राजा को सपना आया है कि प्रभु ने अपने भक्त की बीमारी ले ली है। अब वह 15 दिन तक रजाई ओढ़ के सोएंगे, काढ़ा पिएंगे। माधवदास जी वहीं सिंह द्वार पर पछाड़ खा के गिर पड़े। हां राम मेरी बला अपने सर ले ली और तभी से यह नियम बन गया। आज भी साल में एक बार स्नान यात्रा के बाद जगन्नाथ जी बीमार पड़ते हैं। इसे अंसर कहते हैं। 15 दिन तक मंदिर बंद रहता है। भगवान को बुखार आता है। वैद्य आते हैं। काढ़ा पिलाया जाता है। फलों का रस भोग लगता है और 15 दिन बाद जब ठाकुर जी ठीक होते हैं तो अंगराई लेकर कहते हैं। अरे बहुत दिन हो गए कमरे में पड़े पड़े। बड़ा मन ऊब गया है। चलो अब रथ निकालो। हम घूमने जाएंगे। और तब निकलती है जगन्नाथ रथ यात्रा। जैसे ही यह उद्घोष होता है पूरी नगरी शंखनाद और जय जगन्नाथ के जयकारों से गूंज उठती है। कहानी का असली रोमांच तब शुरू होता है जब पहांडी रस्म के जरिए तीनों भारी विग्रहों को झूमते हुए मंदिर से बाहर लाया जाता है। राजा द्वारा रास्ते की सफाई करने के बाद लाखों भक्त दीवाने होकर उन विशाल रस्सियों को थाम लेते हैं। रास्ते में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। कोई रथ को छूने की कोशिश करता है तो कोई बस एक झलक पाने को तरसता है। मान्यता है कि इन रथों के पहियों की धूल भी अगर माथे पर लग जाए तो जीवन सफल हो जाता है। जगन्नाथ जी का रथ नंदी घोष सबसे अंत में चलता है। जैसे वह अपने भक्तों की भीड़ को निहारते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हो। बीच रास्ते में भगवान अपनी मौसी के घर के पास रुककर विशेष पोड़ा पीठा का भोग लगाते हैं। 9 दिनों तक मौसी के घर गुंडीचा मंदिर में उत्सव का माहौल रहता है। जहां वे अपने भाई-बहन के साथ विश्राम करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भगवान और भक्त के अटूट मिलन की एक जीवंत दास्तान है। 

स्फटिक माला के फायदे ?

 *स्फटिक माला के फायदे ?*


1. कहते हैं कि इसे पहनने से किसी भी प्रकार का भय और घबराहट नहीं रहती है।


2. इसकी माला धारण करने से मन में सुख, शांति और धैर्य बना रहता है।


3.ज्योतिष अनुसार इसे धारण करने से धन, संपत्ति, रूप, बल, वीर्य और यश प्राप्त होता है।


4.माना जाता है कि इसे धारण करने से भूत-प्रेत आदि की बाधा से भी मुक्ति मिल जाती है।


5.इसकी माला से किसी मंत्र का जप करने से वह मंत्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है।


6.इससे सोच-समझ में तेजी और दिमाग का विकास होने लगता है।


7.इसकी भस्म से ज्वर, पित्त-विकार, निर्बलता तथा रक्त विकार जैसी व्याधियां दूर होती है।


8.स्फटिक किसी भी पुरुष या स्त्री को एकदम स्वस्थ रखता है।


9.स्फटिक की माला को भगवती लक्ष्मी का रूप माना जाता है।


10.स्फटिक की माला धारण करने से शुक्र ग्रह दोष दूर होता है।


11.स्फटिक के उपयोग से दु:ख और दारिद्र नष्ट होता है।


12.यह पाप का नाशक है। पुण्य का उदय होता है।


13.सोमवार को स्फटिक माला धारण करने से मन में पूर्णत: शांति की अनुभूति होती है एवं सिरदर्द नहीं होता।


14.शनिवार को स्फटिक माला धारण करने से रक्त से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।


15.अत्यधिक बुखार होने की स्थिति में स्फटिक माला को पानी में धोकर कुछ देर नाभि पर रखने से बुखार कम होता है एवं आराम मिलता है।

Friday, April 3, 2026

आरती विज्ञान

 🪔आरती विज्ञान  🪔

===============


जगत पांच तत्त्वों से निर्मित है - वही पांच तत्त्व  हर रुप में समाये हैं - फिर वे चाहे पांच कर्मेन्द्रिय हों - या पांच ज्ञानेन्द्रिय- या अंतःकरण पंचक - तन्मात्रा पंचक - या ईश्वर कोटि रुप पांच देव आदि --  वहीं आरती भी उन पांच तत्त्वों से अछूती नहीं ---

           

    जगत निर्माण में आत्मा से आकाश - आकाश से वायु से अग्नि - अग्नि से जल - और जल से पृथ्वी की व्युत्पत्ति का क्रम है - यही क्रम ईश्वर आराधन रुप आरती का भी है -- 


    आरती में पर्दा खुलते ही सर्वप्रथम आत्मस्वरूप ईश्वर को देखते हैं -- उसके पश्चात् आत्मा से प्रथम उत्पन्न आकाश के शब्द गुण रूप शंख को फूंका जाता है -- फिर दूसरे तत्त्व वायु का प्रतीक चंवर ढुलता है या वस्त्र से इस क्रिया का प्रदर्शन होता है -- पुनः तीसरे तत्त्व अग्नि व धूप से आरती होती है -- इसके अनन्तर चौथा तत्त्व जल का प्रदर्शन कुंभारती व जल युक्त शंख के रूप में होता है -- अंत में पांचवें तत्त्व पृथ्वी का प्रदर्शन अर्चक अपनी अंगुली अंगुष्ठादि अंगों द्वारा मुद्राऐं दिखाता हुआ करता है या उसके स्थान पर हाथ जोडता है -- पश्चात् इस प्रक्रिया का विलोम है ---


    अब प्रश्न है कि आरती को कैसे और कितनी बार घुमाएं ---


     जिस देवता की आरती करने चलें -- उसी देवता का बीजमंत्र- स्नान स्थाली  - नीराजन स्थाली  - घण्टिका  - और जल कमण्डलु आदि पात्रों पर चन्दन आदि से लिखना चाहिए-- फिर आरती के द्वारा भी उसी बीजमंत्र को देव प्रतिमा के सामने बनाना चाहिए-- यदि कोई व्यक्ति तत्तद देवताओं के विभिन्न बीजमंत्रों का ज्ञान न रखता हो तो सर्व वेदों के बीजभूत प्रणव ऊँकार को ही लिखना चाहिए अर्थात् आरती को ऐसे घुमाना चाहिए कि ऊँ वर्ण की आकृति उस दीपक द्वारा बन जाये ----


     शास्त्र में जिस देवता की जितनी संख्या लिखी हो - उतनी बार ही आरती घुमानी चाहिए  - जैसे भगवान विष्णु आदित्यों में परिगणित होने के कारण द्वादशात्मा माने गये हैं - इसलिए उनकी तिथि भी द्वादशी है और मंत्र भी द्वादशाक्षर है अतः विष्णु की आरती में बारह आवर्तन आवश्यक है ---


     सूर्य सप्त रश्मि है - सात रंग कि विभिन्न किरणों वाले - सात घोडों से युक्त रथ में सवार - सप्तमी तिथि का अधिष्ठाता हैं -- सूर्य आरती में सात बार बीजमंत्र उद्धार करना आवश्यक है ---


     दुर्गा की नव संख्या प्रसिद्ध है - नवमी तिथि है - नवाक्षर मंत्र है अतः नौ बार आरती का आवर्तन होना चाहिए-- एकादश रुद्र हैं अथवा शिव जी चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता है - अतः ११ या १४ आवर्तन आवश्यक हैं  -- गणेश जी चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता हैं - इसलिए चार आवर्तन होना चाहिए  --- 

         

    इसी प्रकार मंत्र संख्या या तिथि आदि के अनुरोध से अन्यान्य देवताओं के लिए भी कल्पना कर लेनी चाहिए  --


    अथवा सभी देवताओ के लिए सात बार भी साधारणतया किया जाता है - जिस में चरणों में चार बार  - नाभी में दो बार और मुख पर एक बार फिर सर्वांग पर सात बार आरती करें --


                    ॥ नारायण ॥

प्रातः जागरण क्यों ?

 प्रातः जागरण क्यों ?


यद्यपि उपरोक्त प्रश्न का वास्तविक उत्तर तो इसका आचरण करने पर ही मिल सकता है, क्योंकि किसी भी शंका का समाधान उसके उत्तर में प्रतिपादित तथ्यों की अनुभूति से ही सम्भव है, तथापि इतना जान लेना चाहिये कि यह समय शारीरिक स्वास्थ्य, बुद्धि, आत्मा, मन आदि सभी की दृष्टि से निद्रा छोड़कर जग जाने के लिए परम उपयुक्त है। इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, बुद्धि मेधा प्रसन्नता और सौन्दर्य की अपार राशि लुटाती है। इस समय बहने वाली वायु के एक एक कण में संजीवनी शक्ति का अपूर्व संमिश्रण रहता है। यह वायु रात्रि में चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी पर बरसाये हुये अमृत विन्दुओं को अपने साथ लेकर बहती है। इसीलिये शास्त्रों मे इसे वीरवायु के नाम से स्मरण किया है।


जो व्यक्ति इस समय निद्रा त्याग कर तथा चैतन्य होकर इस वायु का सेवन करते हैं उनका स्वास्थ्य सौन्दर्य और आयुष्य वृद्धि को प्राप्त होता है। मन प्रफुल्लित हो जाता है एव आत्मा में नव चेतनता का अनुभव होता है। आयुर्वेद कहता है-


वर्ण कीर्ति मतिं लक्ष्मी स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति ।

ब्राममुहूर्ते संजाग्रच्छ्रियं वा पंकजं यथा ॥ (भै० सार-६३)

अर्थात्-ब्रह्म मुहूर्त मे उठने से पुरुष को सौन्दर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। उसका शरीर कमल के सदृश सुन्दर हो जाता है।


इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण रात्री के पश्चात् प्रातः जब भगवान् सूर्य उदय होने वाले होते हैं तो उनका चैतन्यमय तेज आकाश मार्ग द्वारा विस्तृत होने लगता है। यदि मनुष्य सजग होकर स्नानादि से निवृत्त हो, उपस्थान एवं जप द्वारा उन प्राणाधिदेव भगवान सूर्य की किरणों से अपने प्राणों में अतुल तेज का आह्वान करे, तो वह पुरुष दीर्घजीवी हो जाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त वायु का विभाग साधारणतया निम्नक्रम से किया जाता है। 

आक्सीजन ( प्राणप्रदवायु)२१ प्रतिशत

कारवन डाईऑक्साइड ( दूषित वायु) ६ प्रतिशत

नाईट्रोजन ७३ प्रतिशत

कुल १०० प्रतिशत


विज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण दिन वायु का यही प्रवहण क्रम रहता है किन्तु प्रातः और सायं जब सन्धि काल होता है इस क्रम में कुछ परिवर्तन हो जाता है । साय काल जगत्प्राणप्रेरक भगवान् सूर्य के अस्त हो जाने से आक्सीजन (प्राण प्रद वायु) अपने स्वाभाविक स्तर से मन्द पड़ जाती है और मनुष्यों की प्राणशक्ति भी क्षीण हो जाती है उन्हें विश्राम की आवश्यकता अनुभव होने लगती है। 


इसी प्रकार प्रातः काल के सूर्योदय के साथ ही उस वायु के स्तर में वृद्धि होना स्वाभाविक है । इसलिये यदि इस समय निद्रामुक हो कर मनुष्य उस वायु का सेवन करे तो उस का स्वास्थ्य वहुत अच्छा हो जाएगा- यह बतलाने की विशेष आवश्यकता ही नहीं है । वास्तव में दीर्घजीवन का एक ही मूल मन्त्र है-जल्दी सोओ जल्दी उठो । Early to go bed early to rise, make a man Healthy Wealthy and wise अर्थात्

जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य  को स्वस्थ, धनवान और बुद्धि- मान बना देता है" की अंग्रेजी कहावत सर्वाश में सत्य ही है।


प्रातः जागरण और महानता का पारस्परिक योग है। सभी महान व्यक्ति प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में ही उठते हैं, और इस समय नियम-पूर्वक प्रति दिन उठने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, शारीरिक और बौद्धिक उन्नति से विलक्षण हो जाता है इस में किंचित् भी सन्देह नहीं । 


लिखने पढ़ने के लिये तो वास्तव में इस से उपयुक्त समय हो ही नहीं सकता । एकान्त और सर्वथा शान्त वायुमण्डल में जब कि मस्तिस्क बिलकुल उर्वर होता है, ज्ञानतन्तु रात्री विश्राम के बाद नव-शक्ति-युत होते हैं मनुष्य को वौद्धिक कार्य करने में विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।


इसलिये हमें प्रकृति के इस अमूल्य वरदान से लाभ उठाना चाहिये और ऐसा अभ्यास डाल लेना चाहिये कि बिना किसी की महायता के प्रतिदिन उठ जावें। इस के लिये एक छोटा सा उपाय कार्य में लाया जा सकता है। रात्री में सोते समय यदि व्यक्ति अपनी आत्मा से प्रातः अमुक समय पर उठने का संकल्प व्यक्त करदे तो निश्चय ही उसी समय पर नींद खुल जायगी और यदि उस समय हमने आलस्य का।आश्रय नहीं लिया तो फिर कुछ दिनों में बिना किसी की सहायता के स्वतः उठने लगेगे।


- धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज

जहाँ स्त्री शंख बजाती है। वहाँ से लक्ष्मी चली जाती है।

 जहाँ स्त्री शंख बजाती है।

वहाँ से लक्ष्मी चली जाती है।

===================


शंखचूढ जो दम्भ नामक दानव का पुत्र व विप्रचिति का पोत्र था - व भगवती तुलसी का पति था - जो भगवती राधा के शाप वश गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के मुख्य आठ सखाओं में से सुदामा नाम का गोप था - 

          यानि सुदामा नाम का गोलोक में निवास करने वाला गोप ही श्रीराधा जी के शाप वश शंखचूढ नाम का दानव हुआ - जिसकी हड्डियों से शंख व शंखजाति के अन्य शंखों की उत्पत्ति हुई।


" अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव है । "


वह शंख भगवान श्रीहरि का अधिष्ठान स्वरूप है -- वही शंख अनेक प्रकार के रूपों में निरन्तर विराजमान होकर देवताओं की पूजा में पवित्र माना जाता है।


अत्यंत प्रशस्त  - पवित्र तथा तीर्थजल स्वरूप शंखजल केवल शंकर भगवान को छोडकर अन्य देवताओं के लिए परम प्रीतिदायक है -- जहाँ शंख ध्वनि होती है - वहाँ लक्ष्मी जी स्थिर रूप से सदा विराजमान रहती है।


प्रशस्तं शंखतोयं  च देवानां  प्रीतिदं परम् ।

तीर्थतोयस्वरूपं  च पवित्रं शम्भुना विना ।।

शंखशब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीं सुसंस्थिरा ।। "


जहाँ शंख रहता है  - वहाँ भगवान श्रीहरि विराजमान रहते हैं -  वहीं पर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं तथा उस स्थान से सारा अमंगल दूर भाग जाता है - किन्तु स्त्रियों और विशेषरूप से शूद्रों के द्वारा की गई शंख ध्वनियों से भयभीत तथा रूष्ट होकर लक्ष्मी जी अन्य देश को चली जाती हैं।


शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः ।

तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम् ।।

स्त्रीणां च शंखध्वनिभिः शूद्राणां च विशैषतः ।।

भीता रूष्टा याति लक्ष्मीस्तत्स्थलादन्यदेशतः ।। 


       !! नारायण !!

Thursday, April 2, 2026

स्वर और नाड़ी का रहस्य

 🌿 स्वर नाड़ी सूत्र – 10 प्राण और मात्राओं का गूढ़ विज्ञान 🌿

(जहाँ श्वास केवल हवा नहीं… बल्कि जीवन की दिव्य ऊर्जा बन जाती है)



🌬️ स्वर और नाड़ी का रहस्य


भारतीय योग और Swara Yoga में “स्वर” का अर्थ है —

👉 हमारी श्वास का प्रवाह (breathing flow)


और “नाड़ी” का अर्थ है —

👉 वह सूक्ष्म ऊर्जा मार्ग, जिससे प्राण शक्ति पूरे शरीर में प्रवाहित होती है


हमारे शरीर में मुख्यतः तीन नाड़ियाँ मानी गई हैं:

 • इड़ा (चंद्र स्वर) 🌙

 • पिंगला (सूर्य स्वर) ☀️

 • सुषुम्ना (मध्य नाड़ी) 🔱



🔟 दस प्राण – जीवन के अदृश्य स्तंभ


योगशास्त्र में “प्राण” केवल सांस नहीं, बल्कि जीवन ऊर्जा है।

ये 10 प्रकार के होते हैं:


🌟 मुख्य 5 प्राण:

 1. प्राण – श्वास और हृदय की क्रिया नियंत्रित करता है

 2. अपान – मल-मूत्र और शरीर के त्याग कार्य

 3. समान – पाचन और ऊर्जा संतुलन

 4. उदान – वाणी और मानसिक शक्ति

 5. व्यान – पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार



🔹 उप-प्राण (5):

 6. नाग – डकार और गैस

 7. कूर्म – पलक झपकना

 8. कृकर – छींक और भूख

 9. देवदत्त – जम्हाई

 10. धनंजय – मृत्यु के बाद भी कुछ समय शरीर में रहता है



⏳ मात्राओं का विज्ञान (Breath Timing Science)


“मात्रा” का अर्थ है —

👉 श्वास लेने और छोड़ने का समय (timing)


योग में कहा गया है कि:

 • एक सामान्य श्वास = लगभग 4 से 6 मात्राएँ

 • ध्यान और साधना में इसे बढ़ाकर 16, 32 या 64 मात्राएँ किया जाता है


👉 यही विज्ञान Pranayama का आधार है



🧘‍♀️ स्वर का प्रभाव (Left vs Right Nostril)

 • 🌙 बाईं नाक (इड़ा स्वर) → शांति, ध्यान, ठंडक

 • ☀️ दाईं नाक (पिंगला स्वर) → ऊर्जा, क्रिया, गर्मी


👉 जब दोनों साथ चलें →

🔱 सुषुम्ना सक्रिय होती है (आध्यात्मिक जागरण)



🌟 गूढ़ रहस्य (Hidden Truth)


प्राचीन ऋषियों ने कहा है:

👉 “जिसने अपने स्वर को जान लिया, उसने अपने भाग्य को जान लिया।”

 • सही समय पर सही स्वर = सफलता

 • गलत समय पर गलत स्वर = बाधा



🔮 आध्यात्मिक प्रयोग


✔️ ध्यान से पहले बाईं नाक से श्वास लें → मन शांत होगा

✔️ कार्य से पहले दाईं नाक सक्रिय करें → ऊर्जा बढ़ेगी

✔️ मंत्र जप के समय संतुलित श्वास रखें



✨ अंतिम सार


👉 “स्वर ही प्राण है… और प्राण ही चेतना है।”


जब हम अपनी श्वास को समझ लेते हैं,

तो हम केवल शरीर नहीं…

👉 ऊर्जा, मन और आत्मा को भी नियंत्रित करने लगते हैं।