"अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ क्या हैं?योग, पुराण, तन्त्र एवं भक्तिपरम्परा में सिद्धि और निधि का शास्त्रीय अध्ययन"
✓•सारांश:
भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ अत्यन्त प्रसिद्ध अवधारणाएँ हैं। इनका उल्लेख पुराणों, योगशास्त्र, तन्त्रग्रन्थों तथा भक्तिसाहित्य में मिलता है। विशेषतः श्रीहनुमानजी की स्तुति में प्रसिद्ध चौपाई है—
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥
इस चौपाई के कारण सामान्य जनमानस में अष्ट सिद्धि और नव निधि का विशेष महत्त्व है। किन्तु इनका वास्तविक अर्थ केवल अलौकिक शक्तियाँ या भौतिक धन नहीं है। इनके पीछे गहन योगिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक संकेत निहित हैं।
✓•१. सिद्धि शब्द की व्युत्पत्ति:
व्याकरणिक सिद्धि
धातु—
सिध् संसिद्धौ
धातु "सिध्" में क्तिन् प्रत्यय होने पर—
सिद्धि
अर्थ
सिद्ध होना, पूर्णता प्राप्त करना, उपलब्धि।
निरुक्तीय अर्थ
सिध्यति अनेनेति सिद्धिः।
जिसके द्वारा कार्य सिद्ध हो जाए वह सिद्धि है।
✓•२. योगशास्त्र में सिद्धि:
पतञ्जलि योगसूत्र के विभूतिपाद में अनेक सिद्धियों का वर्णन है।
योगसूत्र कहता है—
जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः।
अर्थात् सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं—
जन्म से
औषधि से
मन्त्र से
तप से
समाधि से
✓•३. अष्ट सिद्धियाँ:
पुराणों और भक्तिपरम्परा में आठ प्रमुख सिद्धियाँ मानी गई हैं—
१. अणिमा २. महिमा ३. गरिमा ४. लघिमा ५. प्राप्ति ६. प्राकाम्य ७. ईशित्व ८. वशित्व
✓•४. अणिमा सिद्धि:
व्युत्पत्ति
अणु + इमनिच्
अर्थात्
अणु के समान सूक्ष्म हो जाना।
शास्त्रीय अर्थ
साधक अपने अस्तित्व को अत्यन्त सूक्ष्म बना सकता है।
आध्यात्मिक अर्थ
अहंकार का सूक्ष्मीकरण।
✓•५. महिमा सिद्धि:
महत् + इमनिच्
अर्थ—
अनन्त विस्तार।
पुराणिक उदाहरण
हनुमानजी का समुद्र लाँघने से पूर्व विराट रूप धारण करना।
आध्यात्मिक अर्थ
चेतना का विस्तार।
✓•६. गरिमा सिद्धि:
गुरु (भारी) से व्युत्पन्न।
अर्थ—
अत्यन्त भारी हो जाना।
आध्यात्मिक अर्थ
चरित्र की गुरुत्वशक्ति।
ऐसा व्यक्तित्व जिसे कोई विचलित न कर सके।
✓•७. लघिमा सिद्धि:
लघु + इमनिच्
अर्थ—
अत्यन्त हल्का हो जाना।
आध्यात्मिक अर्थ
मानसिक बोझ से मुक्ति।
✓•८. प्राप्ति सिद्धि:
अर्थ—
इच्छित वस्तु तक पहुँचने की क्षमता।
आध्यात्मिक अर्थ
लक्ष्यप्राप्ति की दक्षता।
✓•९. प्राकाम्य सिद्धि:
कामना + प्र
अर्थ—
इच्छा की पूर्णता।
आध्यात्मिक अर्थ
शुद्ध संकल्प की सिद्धि।
✓•१०. ईशित्व सिद्धि:
ईश + त्व
अर्थ—
स्वामित्व, अधिपत्य।
आध्यात्मिक अर्थ
अपने मन, इन्द्रियों और प्रवृत्तियों पर शासन।
✓•११. वशित्व सिद्धि:
वश धातु से।
अर्थ—
नियंत्रण।
आध्यात्मिक अर्थ
आत्मसंयम।
यह दूसरों को वश करने से अधिक स्वयं को वश में करने की शक्ति है।
✓•१२. अष्ट सिद्धियों का सार:
सिद्धि बाह्य अर्थ आध्यात्मिक अर्थ
अणिमा सूक्ष्म होना अहंकार का लय
महिमा विराट होना चेतना का विस्तार
गरिमा भारी होना स्थिरता
लघिमा हल्का होना आसक्ति-मुक्ति
प्राप्ति प्राप्त करना लक्ष्य सिद्धि
प्राकाम्य इच्छापूर्ति शुद्ध संकल्प
ईशित्व स्वामित्व आत्म-नियंत्रण
वशित्व नियंत्रण इन्द्रियनिग्रह
✓•१३. नव निधियाँ:
नव निधियों का सम्बन्ध मुख्यतः
कुबेर
से माना जाता है।
पुराणों में ये दिव्य सम्पदाओं के रूप में वर्णित हैं।
✓•१४. नव निधियों की सूची:
परम्परागत सूची—
१. पद्म २. महापद्म ३. शंख ४. मकर ५. कच्छप ६. मुकुन्द ७. नन्द ८. नील ९. खर्व
✓•१५. पद्म निधि:
पद्म = कमल
प्रतीक
समृद्धि
पवित्रता
सौन्दर्य
✓•१६. महापद्म निधि:
महान् कमल।
प्रतीक
विशाल ऐश्वर्य।
✓•१७. शंख निधि:
प्रतीक
यश
कीर्ति
शुभता
✓•१८. मकर निधि:
प्रतीक
शक्ति
साहस
सुरक्षा
✓•१९. कच्छप निधि:
प्रतीक
धैर्य
स्थिरता
संरक्षण
✓•२०. मुकुन्द निधि:
प्रतीक
आनन्द
आध्यात्मिक समृद्धि
✓•२१. नन्द निधि:
प्रतीक
प्रसन्नता
परिवारिक सुख
✓•२२. नील निधि:
प्रतीक
दुर्लभ ज्ञान
रहस्यविद्या
✓•२३. खर्व निधि:
प्रतीक
संचित सम्पत्ति
स्थायी धन
✓•२४. नव निधियों का दार्शनिक अर्थ:
यदि इन्हें प्रतीकात्मक रूप से देखें तो नव निधियाँ केवल सोना-चाँदी नहीं हैं।
वे जीवन की नौ प्रकार की सम्पत्तियाँ हैं—
धन
ज्ञान
यश
स्वास्थ्य
धैर्य
आनन्द
सुरक्षा
परिवार
आध्यात्मिक समृद्धि
✓•२५. हनुमान और अष्ट सिद्धि-नव निधि:
हनुमान चालीसा में कहा गया—
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
इसका अर्थ यह नहीं कि हनुमानजी केवल भौतिक चमत्कार बाँटते हैं।
अर्थ यह है कि—
उनकी भक्ति साधक को ऐसी आन्तरिक शक्ति प्रदान करती है जिससे जीवन की सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
✓•२६. योगदर्शन का दृष्टिकोण:
पतञ्जलि चेतावनी देते हैं—
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः।
अर्थात् सिद्धियाँ साधना-पथ में बाधा भी बन सकती हैं।
यदि साधक सिद्धियों में आसक्त हो जाए तो मोक्ष से दूर हो सकता है।
✓•२७. वेदान्त का दृष्टिकोण:
अद्वैत वेदान्त के अनुसार—
ब्रह्मज्ञान से बड़ी कोई सिद्धि नहीं।
शंकराचार्य का मत है—
आत्मसाक्षात्कार ही परम सिद्धि है।
✓•२८. अष्ट सिद्धि और नव निधि का आन्तरिक अर्थ:
अष्ट सिद्धियाँ
आत्मविजय की आठ अवस्थाएँ।
नव निधियाँ
जीवन की नौ वास्तविक सम्पत्तियाँ।
इस प्रकार दोनों का लक्ष्य—
बाह्य चमत्कार नहीं, आन्तरिक परिपूर्णता है।
✓•उपसंहार:
अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के अत्यन्त गूढ़ प्रतीक हैं। योगशास्त्र इन्हें चेतना की विशेष उपलब्धियों के रूप में देखता है, पुराण इन्हें दैवी शक्तियों और सम्पदाओं के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि वेदान्त इनके पार जाकर आत्मज्ञान को सर्वोच्च सिद्धि घोषित करता है।
अणिमा से वशित्व तक की अष्ट सिद्धियाँ मनुष्य की चेतना के विकास का प्रतीक हैं और पद्म से खर्व तक की नव निधियाँ जीवन की विविध समृद्धियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
अतः शास्त्रीय निष्कर्ष यह है कि—
सच्ची अष्ट सिद्धि अपने ऊपर विजय है और सच्ची नव निधि आत्मज्ञान से उत्पन्न जीवन-समृद्धि है।
इसी सत्य को भक्तिकाल ने एक सरल पंक्ति में व्यक्त किया—
“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन्ह जानकी माता।”
अर्थात् हनुमानभक्ति साधक को बाह्य एवं आन्तरिक दोनों प्रकार की सम्पन्नता की ओर अग्रसर करती है।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्