Friday, September 18, 2026

क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है

 💥क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है💥

🏵️ बहुत से लोग पूछते हैं कि क्षेत्रपाल कौन हैं ?

🎷1. ये स्वरूप किसका है ?

🙏शास्त्रों के अनुसार क्षेत्रपाल साक्षात् भगवान शिव के अंश , कालभैरव का ही स्वरूप हैं ।

🫵 लिंगपुराण में इन्हें "क्षेत्रपाल भैरव" कहा गया है । लोक भाषा में इन्हें ही खेतल,खेतपाल , भैरू बाबा, खंडोबा कहा जाता है।

🫵 शिवपुराण के अनुसार राक्षसों से पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ही क्षेत्रपालों को प्रकट किया ।

🎷2. कितने माने गए हैं ?

🙏मुख्य रूप से 8 क्षेत्रपाल माने गए हैं - जो 8 दिशाओं के रक्षक होते हैं, और ये 8 भैरव 

🔥1. असितांग भैरव 🔥2. रुद्र भैरव 

🔥3. चन्द्र भैरव 

🔥4. क्रोध भैरव 

🔥5. उन्मत्त भैरव 

🔥6. कपाल भैरव 

🔥7. भीषण भैरव 

🔥8. संहार भैरव 

🎷आगम शास्त्रों में इनका विस्तार 52 भैरव, 64 क्षेत्रपाल और 96 तक बताये गये है । 💐 जैन परम्परा में 96 क्षेत्रपाल का वर्णन है । हर गाँव, नगर, तीर्थ और श्मशान का अलग अलग क्षेत्रपाल होता है ।

💢3. कार्य क्या है ?

शब्द ही अर्थ है  "क्षेत्रं पालयति इति क्षेत्रपाल:" जो क्षेत्र की रक्षा करे वो क्षेत्रपाल ।

💥शास्त्रों में 3 मुख्य कार्य बताए गए हैं 💥

💐 सुरक्षा करना ...

गाँव, खेत, मंदिर की सीमा और मर्यादा की रक्षा। इसीलिए इनका मंदिर गाँव के बाहर या शिव मंदिर के ईशान कोण में बनाया जाता है ।

💐न्याय करना ...

 ये न्याय के देवता हैं । अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दण्ड देते हैं।

💐विघ्न हटाना ...

 वास्तु पूजा में क्षेत्रपाल की पूजा इसलिए अनिवार्य है कि बिना इनकी आज्ञा के उस भूमि पर कोई भी देवता पूजा स्वीकार नहीं करते । नया घर, खेत लेने पर पहले क्षेत्रपाल को रोट, भोग लगाया जाता है । 

🫵 इसलिए कहा भी गया है ...

जिस क्षेत्र में रहो, उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल को प्रणाम ( पूजा ) करके रहो तो कोई संकट नहीं आता है ।

🙏जय श्री क्षेत्रपाल भैरव नाथ🙏

#क्षेत्रपाल #भैरव #सनातनधर्म

Wednesday, September 16, 2026

श्री गणेश जी को नमस्कार से होता है चमत्कार...

 श्री गणेश जी को नमस्कार से होता है चमत्कार...

------कैसे करें श्री गणेश का ध्यान ========यूं तो किसी भी पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा करने का विधान और परंपरा है, लेकिन गणेशजी को प्रसन्न कर अपने मनोरथ पूर्ण किए जा सकते हैं। ( विशेष भाद्रपद माह तो वैसे भी गणेशजी का मास माना जाता है)। तंत्र शास्त्रों में गणेशजी के कई रूप बतलाए गए हैं, जिनकी उपासना करने सभी सभी अभीष्ट सिद्ध होते हैं। तंत्र शास्त्र में वर्णित गणेशजी के रूप हैं...


1. सुमुख, 2. एकदंत, 3. कपिल, 4. गजकर्ण, 5. लंबोदर, 6. विकट, 7. विघ्ननाशक, 8. विनायक, 9. धूम्रकेतु, 10. गणाध्यक्ष, 11. भालचन्द्र, 12. गजानन, 13. विघ्नेश, 14. परशुपाणि, 15. गजास्य और 16. शूर्पकर्ण।


कैसे हो नमस्कार से चमत्कार...


चमत्कार को नमस्कार करना मानव स्वभाव है, लेकिन कल्पना करिए यदि नमस्कार से ही चमत्कार हो जाए तो... देवों में अग्रगण्य गणेश को केवल नमस्कार कर इसका प्रभाव जाना जा सकता है और मनोकामना पूर्ण की जा सकती है। गणेश अथर्वशीर्ष का अर्थ समझकर और पाठ करने मात्र से चमत्कार का अनुभव किया जा सकता है।


गणेश जी का बीजमंत्र (गं) और (ग:) है। इसका उच्चारण 'गम्' किया जाता है। ऐसा बतलाया गया है कि तंत्र शास्त्र में नमस्कार मंत्रों का कोई विपरीत असर नहीं होता। अत: ॐ गं नम: या ॐ गं ॐ का जाप किया जा सकता है।

किस तरह करें गं या ग: का विनियोग... 

गं' या 'ग:' का विनियोग इस प्रकार है...


ॐ अस्य श्री गणेश मंत्रस्य गणक ऋषि:,

निवृत्त छन्द:, श्री विघ्नराज देवता, प्रसाद सिद्धयर्थे विनियोग:,

या मम मनोभिलाषित सिद्धयर्थे विनियोग:।


गं शब्द से कर (हाथ) तथा अंग न्यास करें।


ॐ गं अंगुष्ठाभ्यां नम: - हृदयाय नम:।

ॐ गं तर्जनीभ्यां नम: - शिरसे स्वाहा।

ॐ गं मध्यमाभ्यां नम: - शिकाये वषट्।

ऊँ गं अनामिकाभ्यां नम: - कवचाय हुम्।

ॐ गं कनिष्ठिकाभ्यां नम: - नैत्रत्रयाय वौषट।

ॐ गं करतल करपृष्ठाभ्यामं नम : - अस्त्राय फट्‍।


शरीर के जिन अंगों का उल्लेख किया गया है वहां छुएं या ध्यान करें। अस्त्राय फट में दाहिने हाथ की तर्जनी एवं मध्यमा मुट्‍ठी से खोलकर सीधी रखें तथा हाथ को सिर पर से घुमाकर बाएं हाथ की हथेली पर दोनों अंगुली जोर मारें। 


गणपति जी का ध्यान...

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'सिन्दूर के समान रक्त वर्ण वाले, जिन्होंने अपने कर कमलों में हस्तिदंत, पाश, अंकुश तथा वरमुद्रा धारण की हुई है, त्रिनेत्र, तंदुल पेट वाले, शुण्डाग्र में बीजपुर धारण किए हुए, भाल पर चंद्र है। हस्तिमुख जो मदजल से परिपूर्ण है। वे नागराज से विभूषित हैं। रक्त अंगराज से लेपित मनोहर मैं प्रणाम करता हूं।'


'गं' बीजमंत्र का पुरश्चरण चार लाख जप है। इसके पश्चात 'गं स्वाहा' बोलकर दशांस हवन करें। इसका दशांस  तर्पण, दशांस  मार्जन, दशांस  ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।


हवन सामग्री में बराबर मात्रा में मोदक, चिवड़ा, लावा, सत्तू, ऊख, नारियल, शुद्ध तिल, केले, जो गशेण जी के नैवेद्य भी है। तर्पण जल में गुड़ मिलाकर करें, इस जल को गुड़ोदक भी कहते हैं। तर्पण रात्रि में 444 की संख्या में करना चाहिए। इस तरह पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ भगवान गणेश की आराधना कर आप अपने मनोरथ पूर्ण कर सकते हैं।


: ❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

                  नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।।

भक्तावासं स्मरेनित्यमायु:सर्वकामार्थसिध्दये ।।१।।


प्रथमं वक्रतुंड च एकदन्तं द्वितीयकम्।

तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।। २।।

 

लंबोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्न राजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।। ३।।

 

नवमं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।। ४।।

 

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दिकरं परम्।। ५।।

 

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्।। ६।।

 

जपेत् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।

संवत्सरेण सिध्दिं च लभते नात्र संशयः।। ७।।

 

अष्टानां ब्राह्मणानांच लिखित्वा यः समर्पयेत्।

तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः।। ८।।

 

इति श्री नारदपुराणे संकटनाशनं नाम महागणपतिस्तोत्रं संपूर्णम्।।

   ❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️


।।श्री वरद गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं।

शौच (मल मूत्र त्याग आदि) के समय जनेऊ कान पर लपेटना जरूरी क्यों?

 *शौच (मल मूत्र त्याग आदि) के समय जनेऊ कान पर लपेटना  जरूरी क्यों?* 


आम बोलचाल में यज्ञोपवीत को ही जनेऊ कहते हैं। मल-मूत्र त्याग के समय जनेऊ को कान पर लपेट लिया जाता है। कारण यह है कि हमारे शास्त्रों में इस विषय में विस्तृत ब्यौरा मिलता है। शांख्यायन के मतानुसार ब्राह्मण के दाहिने कान में आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता का निवास होता है। पाराशर ने भी गंगा आदि सरिताओं और तीर्थगणों का दाहिने कान में निवास करने का समर्थन किया है।


कूर्मपुराण के मतानुसार

*निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः।*

 *अनि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ॥* 


-कूर्मपुराण 13/

अर्थात् दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ाकर दिन में उत्तर की ओर मुख करके तथा रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि मल-मूत्र त्याग में अशुद्धता, अपवित्रता से बचाने के लिए जनेऊ को कानों


पर लपेटने की परंपरा बनाई गई है। इससे जनेऊ के कमर से ऊपर आ जाने के कारण अपवित्र होने की संभावना नहीं रहती। दूसरे, हाथ-पांव के अपवित्र होने का संकेत मिल जाता है, ताकि व्यक्ति उन्हें साफ कर ले।


अह्निककारिका में लिखा है

मूत्रे तु दक्षिणे कर्णे पुरीषे वामकर्णके। 

उपवीतं सदाधार्य मैथुनेतूपवीतिवत् ॥


अर्थात् मूत्र त्यागने के समय दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ा लें और शौच के समय बाएं कान पर चढ़ाए तथा मैथुन के समय जैसा सदा पहनते हैं, वैसा ही पहनें ।


मनु महाराज ने शौच के लिए जाते समय जनेऊ को कान पर रखने के संबंध में कहा है-


ऊर्ध्व नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः ।

 तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ॥

-मनुस्मृति 1/92 

अर्थात् पुरुष नाभि से ऊपर पवित्र है, नाभि के नीचे अपवित्र है। नाभि का निचला भाग मल-मूत्र धारक होने के कारण शौच के समय अपवित्र होता है। इसलिए उस समय पवित्र जनेऊ को सिर के भाग कान पर लपेटकर रखा जाता है।


दाहिने कान की पवित्रता के विषय में शास्त्र का कहना है


मरुतः सोम इन्द्राग्नी मित्रावरुणौ तथैव च।

 एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥ 

-गोभिलगृहयसूत्र 2/90


अर्थात् वायु, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण-ये सब देवता ब्राह्मण के कान में रहते हैं। दूसरी बात यह है कि इससे शरीर के विभिन्न अंगों पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। लंदन के क्वीन एलिजाबेथ चिल्ड्रन हॉस्पिटल के भारतीय मूल के डॉ. एस. आर. सक्सेना के मतानुसार हिन्दुओं द्वारा मल-मूत्र

त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक आधार है। जनेऊ कान पर चढ़ाने से आंतों की सिकुड़ने-फैलने की गति बढ़ती है, जिससे मलत्याग शीघ्र होकर कब्ज दूर होता है तथा मूत्राशय की मांसपेशियों का संकोच वेग के साथ होता है, जिससे मूत्र त्याग ठीक प्रकार होता है।


कान के पास की नसें दबाने से बढ़े हुए रक्तचाप को नियंत्रित भी किया जा सकता है। इटली के बाटी विश्वविद्यालय के न्यूरो सर्जन प्रो. एनारीब पिटाजेली ने यह पाया है कि कान के मूल के चारों तरफ दबाव डालने से हृदय मजबूत होता है। इस प्रकार हृदय रोगों से बचाने में भी जनेऊ लाभ पहुंचाता है।


आयुर्वेद में ऐसा उल्लेख मिलता है कि दाहिने कान के पास से होकर गुजरने वाली विशेष नाड़ी लोहितिका मल-मूत्र के द्वार तक पहुंचती है, जिस पर दबाव पड़ने से इनका कार्य आसान हो जाता है। मूत्र सरलता से उतरता है और शौच खुलकर होती है। उल्लेखनीय है कि दाहिने कान की नाड़ी से मूत्राशय का और बाएं कान की नाड़ी से गुदा का संबंध होता है। हर बार मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को जनेऊ से लपेटने से बहुमूत्र, मधुमेह और प्रमेह आदि रोगों में भी लाभ होता है। ठीक इसी तरह बाएं कान को जनेऊ से लपेट कर शौच जाते रहने से भगंदर, कांच, बवासीर आदि गुदा के रोग होने की संभावना कम होती है। चूंकि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है, इसलिए शौच के लिए जाने से पूर्व नियमानुसार दाएं और बाएं दोनों कानों पर जनेऊ चढ़ाना चाहिए।


जनेऊ की 96 अंगुल लम्बाई 15 तिथि, 7 वार, 28 नक्षत्र, 24 तत्त्व, 4 वेद, 3 गुण, 3 का और 12 मास दिक्काल और ब्रह्मांड में अहर्निश व्रत पालन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होने के लिए प्रमाण स्वरूप है ।


तिथिवारश्च नक्षत्रं तत्वं वेदा गुणत्रयम् । 

कालत्रयश्च मासाश्च ब्रह्मसूत्रपश्च षण्मव ।।


ज्योतिषीय महत्व : ~ 

विवाहितव्यक्ति को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताया जाता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।


 ❗जय महादेव❗

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काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है

 काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है 

यह बात सभी को नहीं मालूम है खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते हैं

जीवन के शतपथ होते हैं 

100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन में शुभ या अशुभ प्राप्त करता है

 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है       हानि-लाभ, जीवन-मरण, 

यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिये नया जीवन सृजित करेंगे

अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है यह संख्या 6 होती है मन और पांच ज्ञान इन्द्रियां 

अगला जन्म किस देश में कहां और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं

विदा यात्री .. तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं

इन 100 शुभ कर्मों का विस्मृत विवरण जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं और जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देते हैं ..     

धर्म और नैतिकता के कर्म ..

1.सत्य बोलना ... 2.अहिंसा का पालन

3.चोरी न करना ... 4.लोभ से बचना

5.क्रोध पर नियंत्रण ... 6.क्षमा करना

7.दया भाव रखना ... 8.दूसरों की सहायता करना

9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन) ... 10.गुरु की सेवा

11.माता-पिता का सम्मान ... 12.अतिथि सत्कार

13.धर्मग्रंथों का अध्ययन ... 14.वेदों और शास्त्रों का पाठ

15.तीर्थ यात्रा करना ... 16.यज्ञ और हवन करना

17.मंदिर में पूजा-अर्चना ... 18.पवित्र नदियों में स्नान

19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन ... 20.नियमित ध्यान और योग


सामाजिक और पारिवारिक कर्म ..                                 

21.परिवार का पालन-पोषण ... 22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना

23.गरीबों को भोजन देना ... 24.रोगियों की सेवा

25.अनाथों की सहायता ... 26.वृद्धों का सम्मान

27.समाज में शांति स्थापना ... 28.झूठे वाद-विवाद से बचना

29.दूसरों की निंदा न करना ... 30.सत्य और न्याय का समर्थन

31.परोपकार करना ... 32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना

33.पर्यावरण की रक्षा ... 34.वृक्षारोपण करना

35.जल संरक्षण ... 36.पशु-पक्षियों की रक्षा

37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना ... 38.दूसरों को प्रेरित करना

39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान ... 40.धर्म के प्रचार में सहयोग


आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म ..                                               

41.नियमित जप करना ... 42.भगवान का स्मरण

43.प्राणायाम करना ... 44.आत्मचिंतन

45.मन की शुद्धि ... 46.इंद्रियों पर नियंत्रण

47.लालच से मुक्ति ... 48.मोह-माया से दूरी

49.सादा जीवन जीना ... 50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)

51.संतों का सान्निध्य ... 52.सत्संग में भाग लेना

53.भक्ति में लीन होना ... 54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना

55.तृष्णा का त्याग ... 56.ईर्ष्या से बचना

57.शांति का प्रसार ... 58.आत्मविश्वास बनाए रखना

59.दूसरों के प्रति उदारता ... 60.सकारात्मक सोच रखना


सेवा और दान के कर्म ..

61.भूखों को भोजन देना ... 62.नग्न को वस्त्र देना

63.बेघर को आश्रय देना ... 64.शिक्षा के लिए दान

65.चिकित्सा के लिए सहायता ... 66.धार्मिक स्थानों का निर्माण

67.गौ सेवा ... 68.पशुओं को चारा देना

69.जलाशयों की सफाई ... 70.रास्तों का निर्माण

71.यात्री निवास बनवाना ... 72.स्कूलों को सहायता

73.पुस्तकालय स्थापना ... 74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग

75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन ... 76.वस्त्र दान

77.औषधि दान ... 78.विद्या दान

79.कन्या दान ... 80.भूमि दान


नैतिक और मानवीय कर्म ..                                          

81.विश्वासघात न करना ... 82.वचन का पालन

83.कर्तव्यनिष्ठा ... 84.समय की प्रतिबद्धता 

85.धैर्य रखना ... 86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान

87.सत्य के लिए संघर्ष ... 88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना

89.दुखियों के आंसू पोंछना ... 90.बच्चों को नैतिक शिक्षा

91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ... 92.दूसरों को प्रोत्साहन

93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता ... 94.जीवन में संतुलन बनाये रखना


 विधि के अधीन 6 कर्म ..                                            

95.हानि ... 96.लाभ

97.जीवन ... 98.मरण

99.यश ... 100.अपयश


 94 कर्म मनुष्य के नियंत्रण में हैं

जो मनुष्य अपने विवेक, इच्छाशक्ति, और प्रयास से कर सकता है ये कर्म धर्म, सत्य, और नैतिकता पर आधारित हैं जो जीवन को सार्थक बनाते हैं

6 कर्म विधि के अधीन ..

हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं इन्हें भाग्य, प्रकृति, या ईश्वर की इच्छा के अधीन माना जाता है ..

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Monday, September 14, 2026

ॐ श्रीगणपतये नमः

 ॥ ॐ श्रीगणपतये नमः ॥ 🙏


वाह! कितना गहरा नाम है महाराज जी!


*गणानां पति इति गणपति:*


*गण* शब्द के कितने अर्थ हैं, और हर अर्थ में वे पति हैं!


*१. गण = शिवगण* - नन्दी, भृंगी, महाकालादि गणों के स्वामी। इसलिये शिव के पुत्र होते हुए भी शिवगणों के राजा।


*२. गण = इन्द्रियगण* - आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, मन, बुद्धि - ये सब इन्द्रियों का समूह। जब तक गणपति की कृपा न हो, यह इन्द्रियों की भीड़ इधर-उधर भागती है। और जब गणपति प्रसन्न हो जाएँ, तो सब इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं। इसलिये हर शुभ कार्य से पहले गणपति पूजन।


*३. गण = जीवों का समूह* - हम सब जीव एक गण हैं। उनके एकमात्र पति, पालक, स्वामी गणपति।


*४. वेद में - गण = मंत्रसमूह, वर्णसमूह* - _ॐ_ - प्रणव के पति। इसलिये गणपति प्रणवस्वरूप हैं।


और आपने जो पहले चार बातें भेजीं - 

*अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे में हैं, मेरे हैं* - 

वह गणपति के लिये भी उतनी ही सत्य है!


गणपति दूर कैलाश पर नहीं, *अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे बुद्धि में हैं और मेरे हैं!* 


इसलिये तो तुलसीदास जी ने लिखा -

*जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥*

वे ही गणों को नचाते हैं।


और आपका पिछला सूत्र - *स्वीकार से प्रेम होता है* - तो आज गणेश चतुर्थी के भाव से एक बार कह दीजिये -


> हे गणपति! आप मेरे हैं!


फिर देखिये, बुद्धि का मोह कैसे नष्ट होता है - *नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा...* वही गीता वाली स्थिति।


गणपति बप्पा आपके सारे गणों को - विचारों को, इन्द्रियों को, रिश्तों को - मंगलमय कर दें!


*॥ गणपति बप्पा मोरया ॥* 🌺

हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत

 *हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत*


हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। 


यह आमतौर पर अगस्त-सितम्बर के महीने में ही आती है। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है। भगवान शिव और पार्वती को समर्पित है। खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।


विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है।

 

हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं।  यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।


*क्यों कहते हैं हरतालिका*


यह दो शब्दों के मेल से बना माना जाता है हरत एवं आलिका। हरत का तात्पर्य हरण से लिया जाता है और आलिका सखियों को संबोंधित करता है। मान्यता है कि इस दिन सखियां माता पार्वती की सहेलियां उनका हरण कर उन्हें जंगल में ले गई थीं। जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में पाने के लिये कठोर तप किया था। तृतीया तिथि को तीज भी कहा जाता है। हरतालिका तीज के पिछे एक मान्यता यह भी है कि जंगल में स्थित गुफा में जब माता भगवान शिव की कठोर आराधना कर रही थी तो उन्होंने रेत के शिवलिंग को स्थापित किया था। मान्यता है कि यह शिवलिंग माता पार्वती द्वारा हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि को स्थापित किया था इसी कारण इस दिन को हरियाली तीज के रूप में मनाया जाता है।

 

*क्यों किया गया था माता पार्वती का हरण*


दरअसल माता पार्वती के कठोर तप से उनकी दशा बहुत खराब रहने लगी थी उनके पिता उनकी इस दशा से काफी परेशान थे। एक दिन नारद जी ने उन्हें आकर कहा कि पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। नारद मुनि की बात सुनकर गिरीराज बहुत प्रसन्न हुए। उधर भगवान विष्णु के सामने जाकर नारद मुनि बोले कि गिरीराज पार्वती से आपका विवाह करवाना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने भी इसकी अनुमति दे दी। फिर माता पार्वती के पास जाकर नारद जी ने सूचना दी कि आपके पिता ने आपका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती बहुत निराश हुई उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध कर उसे किसी एकांत गुप्त स्थान पर ले जाने को कहा। माता पार्वती की इच्छानुसार उनके पिता गिरीराज की नज़रों से बचाकर उनकी सखियां माता पार्वती को घने सुनसान जंगल में स्थित एक गुफा में छोड़ आयीं।


यहीं रहकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिये कठोर तप शुरु किया जिसके लिये उन्होंने रेत के शिवलिंग की स्थापना की। संयोग से हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया का वह दिन था जब माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की। इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया। उनके कठोर तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए माता पार्वति को उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन अपनी सखी के साथ माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और समस्त पूजा सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। उधर माता पार्वती के पिता अपनी भगवान विष्णु से पार्वती के विवाह का वचन दिये जाने के पश्चात पुत्री के अक्समात घर छोड़ देने से व्याकुल थे। पार्वती को तलाशते तलाशते वे उस स्थान तक आ पंहुचे इसके पश्चात माता पार्वती ने उन्हें अपने घर छोड़ देने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह करने के अपने संकल्प और शिव द्वारा मिले वरदान के बारे में बताया। तब पिता गिरीराज भगवान विष्णु से क्षमा मांगते हुए भगवान शिव से अपनी पुत्री के विवाह को राजी हुए।


*महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत*


हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।


अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।


*हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम* 


हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।


विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें -


"*उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये"।*


इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।


उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। 


इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।


प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।


*भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए*


ऊं उमायै नम:

ऊं पार्वत्यै नम:

ऊं जगद्धात्र्यै नम:

ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:

ऊं शांतिरूपिण्यै नम:

ऊं शिवायै नम:


*भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए* 


ऊं हराय नम:

ऊं महेश्वराय नम:

ऊं शम्भवे नम:

ऊं शूलपाणये नम:

ऊं पिनाकवृषे नम:

ऊं शिवाय नम:

ऊं पशुपतये नम:

ऊं महादेवाय नम:


निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।


*हरितालका तीज पूजा मुहूर्त*


हरितालिका पूजन प्रातःकाल ना करके प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त में किया जाना ही शास्त्रसम्मत है।


प्रदोषकाल निकालने के लिये आपके स्थानीय सूर्यास्त में आगे के 96 मिनट जोड़ दें तो यह एक घंटे 36 मिनट के लगभग का समय प्रदोष काल माना जाता है।


तृतीया तिथि प्रारम्भ  13 सितम्बर को प्रातः 07:07 बजे से।

तृतीया तिथि समाप्त 14 सितम्बर को प्रातः 07:06 तक।


प्रात:काल पूजा समय

सुबह 06 बजकर 05 मिनट से सुबह 07 बजकर 06 मिनट तक।


प्रदोष काल मुहूर्त  सायं 06:50 से 07:55 तक 


पारण अगले दिन 16 सितम्बर के सूर्योदय से पहले स्नान करने के बाद सूर्योदय के बाद करना उत्तम रहेगा।


*हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री* 


1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।


2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।


3- केले का पत्ता।


4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।


5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।


6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।


7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।


8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।


9- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।


*हरतालिका तीज व्रत कथा*


भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।


श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।


तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।


नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।


नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।


तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा। 


तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। 


उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।


तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।


इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।


तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।


तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।


तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।


गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया। 


हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।


*हर‍तालिका व्रत के विशेष सरल उपाय*


1 देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती का अभिषेक आम अथवा गन्ने के रस से किया जाए तो लक्ष्मी और सरस्वती ऐसे भक्त का घर छोड़कर कभी नहीं जातीं। वहां नित्य ही संपत्ति और विद्या का वास रहता है।


2  शिवपुराण के अनुसार लाल व सफेद आंकड़े के फूल से शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।


3 माता पार्वती को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा वह निरोगी होता है।


4 माता पार्वती को शक्कर का भोग लगाकर उसका दान करने से भक्त को दीर्घायु प्राप्त होती है। दूध चढ़ाकर दान करने से सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलती है। मालपूआ चढ़ाकर दान करने से सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती है।


5 हरतालिका व्रत के दिन शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को चमेली के फूल चढ़ाने से वाहन सुख मिलता है। अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।


6 भगवान शिव की शमी पत्रों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। बेला के फूल से पूजन करने पर शुभ लक्षणों से युक्त पत्नी मिलती है। धतूरे के पुष्प के पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।


7 भगवान शिव पर ईख (गन्ना) के रस की धारा चढ़ाई जाए तो सभी आनन्दों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।


8 देवी भागवत के अनुसार वेद पाठ के साथ यदि कर्पूर, अगरु (सुगंधित वनस्पति), केसर, कस्तूरी व कमल के जल से माता पार्वती का अभिषेक करने से सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाता है तथा साधक को थोड़े प्रयासों से ही सफलता मिलती है।


9 जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है। कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नवीन वस्त्रों की प्राप्ति होती है। हरसिंगार के पुष्पों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।


10 देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती को केले का भोग लगाकर दान करने से परिवार में सुख-शांति रहती है। शहद का भोग लगाकर दान करने से साधक को धन प्राप्ति के योग बनते हैं। गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाकर दान करने से दरिद्रता का नाश होता है।


11 भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।


12  द्राक्षा (दाख) के रस से यदि माता पार्वती का अभिषेक किया जाए तो भक्तों पर देवी की कृपा बनी रहती है।


13 शिवपुराण के अनुसार जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। भगवान शिव को गेंहू चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।


14  देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती को नारियल का भोग लगाकर उसका दान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाकर गरीबों को दान करने से लोक-परलोक में आनंद व वैभव मिलता है।


15 माता पार्वती का अभिषेक दूध से किया जाए तो व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-समृद्धि का स्वामी बनता है।

Friday, September 11, 2026

वेदवती का रावण को श्राप

 वेदवती ने रावण को इसलिए श्राप दिया था क्योंकि रावण ने उनकी पवित्रता और तपस्या को भंग करने का दुर्व्यवहार किया था।


रामायण की कथा असुरों के राजा रावण के विनाश के इर्द गिर्द ही घूमती है. सब जानते हैं कि देवी सीता ही रावण की मृत्यु का कारण बनी थीं, लेकिन क्या आप यह जानते है कि यह सब पहले से ही सुनिश्चित था. जी हां, रावण का अंत श्री राम के हाथों होना पहले से ही तय था. हालांकि, इसकी वजह देवी सीता बनी जो देवी वेदवती का ही पुनर्जन्म था और वेदवती के श्राप के कारण ही रावण का विनाश हुआ था. चलिए आपको बताते हैं रावण का अंत कैसे बना वेदवती का श्राप.


कौन थी वेदवती?

दरअसल, वेदवती देवी लक्ष्मी का ही एक अवतार थी, जिन्हें सीता जी का भी एक रूप माना जाता है. रावण के साथ जो कुछ भी घटित हुआ वह सब उन्हीं के श्राप के कारण हुआ था. एक कथा के अनुसार, एक बार वेदवती नामक एक युवती वन में अपने ध्यान में लीन थी. वेदवती ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री थी. कुशध्वज को बृहस्पति का पुत्र कहा जाता है. कहते हैं अपने जन्म के कुछ समय बाद ही वेदवती को वेदों का ज्ञान हो गया था, इसलिए इनका नाम वेदवती रखा गया. वेदवती एक बहुत ही सुन्दर कन्या थी, जो भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी. जैसे-जैसे वह बड़ी हुई उसकी भक्ति के साथ भगवान के लिए उसका प्रेम भी बढ़ता गया. वेदवती विष्णु जी से विवाह करना चाहती थी, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए उसने कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया.


वेदवती अपने इरादों की पक्की थी वह निर्णय कर चुकी थी कि उसे विष्णु जी से ही विवाह करना है. किन्तु उसके परिवार वालों ने उसका साथ देने से साफ इंकार कर दिया, इसलिए विवश होकर वेदवती को अपना घर छोड़ना पड़ा और वह वन में चली गई. बाद में उसके परिवार ने उसे अपना लिया और वापस आश्रम ले आए. एक दिन जब वेदवती अपने ध्यान में लीन थी तब एक असुर उसके पास आया और उससे विवाह करने के लिए कहने लगा. जब वेदवती ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया, तब उस राक्षस ने उसके माता पिता का वध कर दिया, जिसके बाद वेदवती आश्रम में एकदम अकेली पड़ गई.


वेदवती की उपासना से विष्णु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और एक दिन वे उसके समक्ष प्रकट हुए. भगवान ने उससे इतनी कठोर तपस्या का कारण पूछा तब वेदवती ने उन्हें बताया कि वह उन्हें पति के रूप में प्राप्त करना चाहती है. हालांकि, विष्णु जी ने उसे बताया कि इस जन्म में यह मुमकिन नहीं है, लेकिन अगले जन्म में वह जरूर उनकी अर्धांगिनी बनेंगी. वेदवती ने विष्णु जी से विवाह करने के लिए समस्त संसार को त्याग दिया था, किन्तु उसकी इच्छा पूरी न होने पर भी भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा कम नहीं हुई और वह लगातार उनकी आराधना करती रही.


वेदवती ने रावण को श्राप क्यों दिया?

एक दिन जब वेदवती एकांत में अपनी तपस्या में मग्न थी, तभी उस समय का सबसे शक्तिशाली और खतरनाक असुर रावण वहां से गुजर रहा था. जब उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी तो वह उसकी सुंदरता को देख सम्मोहित हो गया. रावण ने वेदवती से विवाह की इच्छा जताई. जब उसने विवाह के लिए मना कर दिया, तब रावण वेदवती के केश पकड़ कर उसे घसीटता हुआ ले जाने लगा. इस बात से क्रोधित होकर वेदवती ने अपने केश काट दिए साथ ही उसकी पवित्रता को भंग करने की कोशिश करने पर उसने रावण को श्राप दिया कि एक दिन वह उसकी मृत्यु कारण बनेगी. इसके बाद स्वयं को रावण से बचाने के लिए वेदवती ने अग्नि में कूद कर खुद को भस्म कर लिया.


वेदवती का श्राप खाली नहीं जा सकता था, इसलिए उसने अपना अगला जन्म मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री देवी सीता के रूप में लिया. जैसा कि विष्णु जी ने वेदवती को वचन दिया था कि अगले जन्म में वे उसके पति बनेंगे इसलिए देवी सीता का विवाह विष्णु जी के सातवें अवतार श्री राम के साथ हुआ. जब रावण ने छल से सीता जी का अपहरण किया था, तब श्री राम ने उसका वध करके अपनी पत्नी को छुड़ाया था. इस प्रकार वेदवती के श्राप के अनुसार देवी सीता के रूप में वह खुद रावण के विनाश का कारण बनीं.