Thursday, June 4, 2026

आइए जानते हैं चिता की राख और आत्मा के बीच भटकते उस असली यात्री का वैज्ञानिक सच!"

 "जब गीता कहती है कि आत्मा अजर-अमर और अभेद्य है, तो फिर गरुड़ पुराण मृत्यु के बाद दान-पुण्य की बैसाखी क्यों थमाता है? आइए जानते हैं चिता की राख और आत्मा के बीच भटकते उस असली यात्री का वैज्ञानिक सच!"

"शरीर तो यहीं खाक हो जाता है और शुद्ध आत्मा को किसी वस्तु की प्यास नहीं होती, फिर मृत्यु के बाद किया गया आपका दान-पुण्य आख़िर जाता किसके खाते में है? इस कॉस्मिक वाई-फाई के पीछे छिपे ऋषियों के विज्ञान को देखकर दंग रह जाएंगे!"


कल्पना कीजिए एक ऐसी युद्ध भूमि, जहां सन्नाटे में भी मौत की चीखें सुनी जा सकती हैं, जहाँ समय की सुइयां भी सहमकर रुक गई हैं। श्मशान की धधकती चिता की लाल लपटें आसमान को छूने के लिए आडम्बर रच हैं। वहां कुरुक्षेत्र के मैदान में गांडीव की टंकार के बीच, योगेश्वर कृष्ण अर्जुन की आंखों में झांककर ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य फूंक रहे हैं:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः...

कृष्ण की वाणी गूंजती है कि इस जलती चिता के भीतर जो है, उसे आग छू भी नहीं सकती! वह अजर है, अमर है, अविनाशी है, सुख-दुख के थपेड़ों से परे एक अनंत आकाश है।

लेकिन ठीक इसी पल, श्मशान के दूसरी तरफ खड़ा एक विप्र, गरुड़ पुराण की जीर्ण-शीर्ण पोथी खोलकर कांपती आवाज में पढ़ रहा है—"हे जीव! यदि तेरे पुत्र ने तेरे लिए यमपथ के कांटों से बचने को जूता दान नहीं किया, तो अस्सी हजार योजन लंबे उस खौफनाक मार्ग पर तेरे पैर छिल जाएंगे। यदि तेरे नाम पर जल-पात्र दान नहीं हुआ, तो वैतरणी नदी के खौलते मवाद और रक्त के बीच तू प्यास से तड़प उठेगा!"

अब ठहरिए और ठंडे दिमाग से सोचिए! क्या यह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा विरोधाभास नहीं है? एक तरफ स्वयं साक्षात ईश्वर कह रहे हैं कि आत्मा को कोई कष्ट छू नहीं सकता, दूसरी तरफ हमारे ही महाशास्त्र चीख-चीख कर कह रहे हैं कि मरने के बाद जीव भूख, प्यास, और असहनीय असुविधाओं से तड़पेगा! क्या कृष्ण झूठ बोल रहे थे? या गरुड़ पुराण लिखने वाले ऋषि वेदव्यास हमें डरा रहे थे?

यदि शरीर यहीं पांच तत्वों की राख में तब्दील हो गया और आत्मा परम स्वतंत्र है, तो फिर यमराज के दूतों के कोड़ों से बचने के लिए यह भौतिक वस्तुओं का दान-पुण्य किसके लिए हो रहा है? वह कौन है जो इस हाड़-मांस के पिंजरे से निकलने के बाद भी भूख से बिलखता है और धूप में छाते की तलाश करता है?

यह कोई साधारण शंका नहीं है। यह जीवन, मृत्यु और उस पार के उस परम रहस्यमयी महा-अंधकार का विश्लेषण है, जिसे आज हम वेदांत के सूक्ष्म अंतर्मन और आधुनिक क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धांतों से देखने वाले हैं। एक ऐसा सच, जिसे जानने के बाद मृत्यु का डर हमेशा के लिए काफूर हो जाएगा और आप जीवन के एक नए आनंद से सराबोर हो उठेंगे। कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि अब हम उस सफर पर निकलने वाले हैं जहाँ विज्ञान के समीकरण और ऋषियों के मंत्र एक सुर में बोलेंगे!


 मानव अस्तित्व का त्रि-आयामी ब्लूप्रिंट — क्या जलता है और क्या बच जाता है?


इस रहस्य की पहली गांठ तब खुलती है जब हम सनातन दर्शन के 'थ्री-बॉडी ब्लूप्रिंट' यानी मानव अस्तित्व की तीन परतों को समझते हैं। हम जिसे शीशे में देखते हैं, वह हम हैं ही नहीं! वह तो सिर्फ एक बाहरी लिफाफा है। हमारे भीतर तीन समानांतर संसार चलते हैं:


1. मानव अस्तित्व की त्रिमूर्ति (Three Bodies System)


पहला... स्थूल शरीर (Physical Body): पांच तत्वों (मिट्टी, पानी, आग, वायु, आकाश) से निर्मित। मृत्यु पर अग्नि को समर्पित (यहीं नष्ट हो जाता है)।


दूसरा. सूक्ष्म शरीर (Subtle Body): 17 तत्वों (मन, बुद्धि, 5 प्राण, 10 इंद्रियों की ऊर्जा) से निर्मित। मृत्यु के बाद यही यात्रा करता है और कष्ट या सुख का अनुभव करता है।


तीसरा. कारण शरीर (Causal Body): अनंत जन्मों के कर्मों के बीज और मूल अज्ञान का 'बायो-डिजिटल' डेटा बैंक। यह आत्मा के सबसे पास होता है।


1. स्थूल शरीर: पांच तत्वों का किराए का मकान

यह वह हाड़-मांस का ढांचा है जिसे विज्ञान 'बायोलॉजिकल बॉडी' कहता है। यह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से उधार ली गई सामग्रियों से बना है। जैसे ही श्वसन तंत्र थमता है, इस शरीर की 'एक्सपायरी डेट' आ जाती है। हम इसे ससम्मान अग्नि को सौंप देते हैं। मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है, पानी वाष्प बन जाता है। इस मृत ढांचे का परलोक की यात्रा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता।


2. सूक्ष्म शरीर: चेतना का अदृश्य अंतरिक्ष यान

यही वह रहस्यमयी किरदार है जो मृत्यु के बाद की पूरी कहानी का नायक है। इसे शास्त्रों में 'लिंग शरीर' (Subtle Body) कहा गया है। यह कोई काल्पनिक भूत-प्रेत नहीं, बल्कि 17 अति-सूक्ष्म तत्वों का एक जटिल एनर्जी ग्रिड है:

पांच ज्ञानेंद्रियों की सूक्ष्म शक्तियां: भौतिक आंखें जल जाती हैं, लेकिन 'देखने की चेतना' नहीं जलती। भौतिक कान शांत हो जाते हैं, पर 'सुनने की सूक्ष्म तरंग' जीवित रहती है।

पांच कर्मेंद्रियों की ऊर्जाएं: हाथ-पैर की गति देने वाली सूक्ष्म गत्यात्मक शक्तियां।


पांच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान): यह हमारे शरीर का आंतरिक पावर ग्रिड है।


मन और बुद्धि: सोचने, याद रखने और अहंकार (मैं होने के अहसास) की सूक्ष्म परत।


जब मृत्यु की बिजली कड़कती है, तो आत्मा इस सूक्ष्म शरीर रूपी 'स्पेसशूट' को पहनकर पुराने स्थूल शरीर से बाहर छलांग लगा देती है। इसी संयुक्त स्वरूप को हम 'जीवात्मा' कहते हैं।


3. कारण शरीर: संस्कारों की बायो-डिजिटल चिप

यह सूक्ष्म शरीर से भी गहरा, ब्लैक बॉक्स है। जीवनभर आपने जो कुछ भी सोचा, जो इच्छाएं कीं, जो वासनाएं पालीं, वे सब एक सूक्ष्म तरंग (Data) के रूप में इसी 'कारण शरीर' (Causal Body) में दर्ज हो जाती हैं। इसे ही संचित कर्मों का लेखा-जोखा कहा जाता है।


अब कृष्ण के सत्य को दोबारा देखिए: आत्मा अछूती है, वह तो सिर्फ इस गाड़ी में बैठी 'लाइट' (प्रकाश) है। लेकिन जो गाड़ी बाहर निकली है—यानी सूक्ष्म शरीर—वह अपनी पुरानी आदतों, यादों और अधूरी इच्छाओं से पूरी तरह लबालब भरी हुई है! कष्ट आत्मा को नहीं, इस सूक्ष्म शरीर के 'मन' को होता है।


 'फैंटम लिम्ब' का आध्यात्मिक विज्ञान — क्यों लगती है मृत जीव को भूख और प्यास?


यहाँ एक अद्भुत मनोवैज्ञानिक मोड़ आता है! आधुनिक न्यूरोलॉजी में एक टर्म है—'फैंटम लिम्ब सिंड्रोम' (Phantom Limb Syndrome)। जब किसी सैनिक का पैर युद्ध में घुटने से काट दिया जाता है, तब भी कई महीनों तक उसे बिस्तर पर लेटे-लेटे ऐसा महसूस होता है कि उसका वह पैर वहीं है। उसे कटे हुए पैर की उंगलियों में खुजली महसूस होती है, उसमें दर्द होता है। वह उस पैर को हिलाने की कोशिश करता है, जबकि भौतिक रूप से वहां पैर होता ही नहीं! मस्तिष्क में बनी पैर की वह छवि इतनी गहरी होती है कि वह गायब पैर के दर्द को भी सच बना देती है।

ठीक यही 'फैंटम लिम्ब सिंड्रोम' मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर के साथ घटित होता है!


[ भौतिक शरीर का अंत ] ──> [ 'मन' की पुरानी आदतें सक्रिय ] ──> [ इंद्रियां न होने पर भी भूख-प्यास का गहरा भ्रम ]


साठ-सत्तर साल तक इस भौतिक शरीर में रहते-रहते हमारे मन को सुबह चाय पीने, दोपहर में भोजन करने, धूप में छाता लगाने और ठंड में कंबल ओढ़ने की इतनी भयानक आदत पड़ चुकी होती है कि स्थूल शरीर के जल जाने के बाद भी, सूक्ष्म शरीर का 'मन' इन सब चीजों की डिमांड करता रहता है!

उसके पास भौतिक पेट नहीं है, लेकिन भूख की तड़प तीव्र है।

उसके पास भौतिक गला नहीं है, पर प्यास की जलन सौ गुना बढ़ चुकी है।

उसके पास चमड़ी नहीं है, लेकिन संस्कारों के कारण उसे यममार्ग की तपती रेत का अहसास वैसे ही होता है जैसे स्वप्न में शेर के पीछे पड़ने पर हमारा दिल सचमुच जोरों से धड़कने लगता है।

जब आप सो रहे होते हैं और सपने में देखते हैं कि आप रेगिस्तान में प्यास से तड़प रहे हैं, तो क्या उस समय आपका भौतिक शरीर रेगिस्तान में होता है? नहीं! वह तो एसी कमरे में गद्दे पर सो रहा होता है। लेकिन उस सपने के भीतर आपका 'सूक्ष्म मन' जितनी भयानक और सच्ची प्यास महसूस करता है, क्या वह किसी हकीकत से कम होती है? मृत्यु के बाद की अवस्था वैसी ही एक 'दीर्घ दुःस्वप्न' (Long Nightmare) जैसी अवस्था है, जहाँ जीव अपनी ही वासनाओं के रेगिस्तान में भटक रहा होता है।


 यमपथ की फ्रीक्वेंसी और दान का क्वांटम ट्रांसफर


अब आपके मन में यह तार्किक उबाल आ रहा होगा कि "मनीष जी, चलिए मान लिया कि सूक्ष्म शरीर को मानसिक भूख-प्यास लगती है, लेकिन हमारे द्वारा यहाँ दिए गए भौतिक छाते, जूते, तिल या गाय से उसकी वह प्यास कैसे बुझ सकती है? वह सामान तो यहीं धरती पर पंडित जी के घर चला जाता है या किसी गरीब की झोपड़ी में!"


यहाँ काम करता है ब्रह्मांड का सबसे अचूक 'लॉ ऑफ एनर्जी रेजोनेंस' (ऊर्जा का अनुनाद सिद्धांत)!


शास्त्रों के वैज्ञानिक पक्ष को समझिए। जब कोई व्यक्ति मरता है, तो उसका अपने परिवार से जन्मों का एक 'जेनेटिक और आत्मिक' संबंध होता है। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो उनकी 'क्वांटम एंटैंगलमेंट' (Quantum Entanglement) होती है। जब जीवित परिवार का सदस्य अपने मृत प्रियजन के प्रति अगाध श्रद्धा (जिससे श्राद्ध बना है) से भरकर किसी भूखे को अन्न देता है, या किसी अभावग्रस्त को वस्त्र दान करता है, तो उस क्षण देने वाले के हृदय में एक परम सात्विक, उच्च-आवृत्ति की ऊर्जा तरंग (High-Frequency Wave) उत्पन्न होती है।


जीवित परिवार का सात्विक संकल्प (श्रद्धा)

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   भौतिक दान (अन्न/वस्त्र/पात्र)

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 उत्पन्न अदृश्य ऊर्जा (अपूर्व या पुण्य) ──> [ क्वांटम ट्यूनिंग ] ──> भटके हुए सूक्ष्म शरीर को मानसिक तृप्ति


मीमांसा दर्शन के महान ऋषि कहते हैं कि जब हम किसी के निमित्त त्याग करते हैं, तो उस भौतिक वस्तु का आध्यात्मिक रूपांतरण (Spiritual Conversion) हो जाता है। वह वस्तु एक अदृश्य ऊर्जा बल में बदल जाती है जिसे शास्त्रों में 'अपूर्व' कहा गया है। यह 'अपूर्व' सीधे उस मृत जीव के सूक्ष्म शरीर को जाकर हिट करता है।

इसे एक बेहद सरल समकालीन उदाहरण से समझिए। आप भारत के प्रयागराज में बैठकर अपने मोबाइल से एक बटन दबाते हैं और 'डिजिटल ट्रांजैक्शन' के जरिए अमेरिका में बैठे अपने मित्र के बैंक खाते में पैसे भेज देते हैं। क्या यहाँ से कोई भौतिक नोट उड़कर सात समंदर पार गया? क्या हवा में कोई सिक्के तैरते हुए दिखाई दिए? नहीं! यहाँ से सिर्फ एक 'इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल' गया, एक डेटा गया, लेकिन अमेरिका में बैठे आपके मित्र को वहां के स्टोर पर जाकर भौतिक रूप से बर्गर और कॉफी मिल गई!

ठीक इसी प्रकार, पृथ्वी पर किया गया 'भौतिक दान' एक आध्यात्मिक सिग्नल (पुण्य तरंग) में बदल जाता है, जो अंतरिक्ष के किसी भी कोने में भटक रहे उस 'सूक्ष्म शरीर' के खाते में 'क्रेडिट' हो जाता है। वहां पहुंचते ही उसकी मानसिक व्याकुलता शांत हो जाती है, उसकी तड़प मिट जाती है। उसे ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी ने उसके सिर पर छाता तान दिया हो, जैसे किसी ने उसके सूखे कंठ में गंगाजल की बूंदें टपका दी हों! यह अंधविश्वास नहीं, चेतना के धरातल पर किया गया 'कॉस्मिक वाई-फाई ट्रांसफर' है!


 गरुड़ पुराण के खौफनाक प्रतीक और उनका छुपा हुआ विज्ञान

आइए अब उस खौफनाक नदी की बात करते हैं जिसका नाम सुनते ही लोगों के पसीने छूट जाते हैं—'वैतरणी नदी'! गरुड़ पुराण कहता है कि यह नदी सौ योजन चौड़ी है, जिसमें पानी नहीं बल्कि खौफनाक पीप, रक्त, और मवाद बहता है। इसमें भयंकर मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले पक्षी जीव को नोचते हैं। और यदि जीव के निमित्त 'गौदान' किया गया हो, तो एक दिव्य गाय प्रकट होती है और जीव उसकी पूंछ पकड़कर इस खौफनाक नदी को पार कर जाता है।


क्या यह कोई डरावनी परियों की कहानी है? बिल्कुल नहीं! इसके पीछे के प्रतीकवाद (Symbolism) को समझिए:

यह वैतरणी नदी कहीं बाहर नहीं है, यह मृत जीव के अपने ही भीतर संचित किए गए 'पाप कर्मों, विकृतियों, ईर्ष्या, और वासनाओं का मानसिक उफान' है। जब स्थूल शरीर छूटता है, तो बुद्धि का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। जैसे पागलखाने का ताला खुल जाने पर सारे पागल बाहर आ जाते हैं, वैसे ही चित्त में दबी हुई सारी गंदगी (क्रोध, वासना, लोभ) एक डरावनी नदी बनकर जीव के सामने खड़ी हो जाती है। वही उसकी वैतरणी है।


 चेतना के तीन गुण और गंतव्य (Cosmic Grading)


1. तामसिक चेतना (भारी, हिंसक, अचेतन): इसका झुकाव निम्न लोक, पाताल आयाम या पशु-वनस्पति योनियों की तरफ होता है। यहाँ यात्रा कष्टप्रद होती है।


2. राजसिक चेतना (सांसारिक इच्छाएं, मोह, महत्वाकांक्षा): इसका झुकाव पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) की तरफ होता है। जीव इच्छाएं पूरी करने के लिए दोबारा मनुष्य योनि में जन्म लेता है।


3. सात्विक चेतना (पवित्र, शांत, परोपकारी, खोजी): इसका झुकाव उच्च लोक (स्वर्ग या देवलोक) या पृथ्वी पर किसी संस्कारी, कुलीन और समृद्ध परिवार के गर्भ की तरफ होता है।


[ चेतना के विभिन्न स्तर और गंतव्य ]


 उच्च चेतना (सतोगुण) ──> ☀️ [ उच्च आयाम / देवलोक ] ──> हल्का, आनंदमय मार्ग

      ▲

      │ (दान-पुण्य और प्रार्थनाएं चेतना को ऊपर उठाती हैं)

      │

 निम्न चेतना (तमोगुण) ──> 🌪️ [ निम्न आयाम / वैतरणी ] ──> भारी, कष्टप्रद मानसिक उथल-पुथल


अब 'गाय' क्या है? 

सनातन विज्ञान में गाय केवल एक पशु नहीं है; वह सात्विकता, निस्वार्थ करुणा, शांति और ब्रह्मांडीय सकारात्मक ऊर्जा (Cosmic Positive Energy) का सघन स्वरूप है। जब कोई परिवार गाय का दान करता है या गो-सेवा की ऊर्जा उस जीव को समर्पित करता है, तो उस परम पवित्र दान से उत्पन्न जो 'सतोगुण' (Pure Frequency) होती है, वह उस जीव की 'तमोगुण' (अंधकारमयी तरंगों) को काट देती है।


जैसे ही जीव के सूक्ष्म शरीर में सात्विकता का प्रवेश होता है, उसके मन की वे डरावनी लहरें (वैतरणी) शांत हो जाती हैं। गाय की पूंछ पकड़ने का अर्थ है—सात्विक चेतना का संबल पाना। सात्विकता का हाथ पकड़कर जीव अपने ही भीतर की वासनाओं के इस खौफनाक समंदर को पार कर जाता है। ऋषियों ने इस परम वैज्ञानिक सत्य को आम जनता को समझाने के लिए कहानियों और प्रतीकों का यह मनमोहक ताना-बाना बुना था, ताकि एक साधारण मनुष्य भी इसे आसानी से समझ सके और सही रास्ते पर चल सके।


कर्मों का जेनेटिक कोड और गर्भाधान की चुंबकीय ट्यूनिंग


अब कहानी उस रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुकी है जहाँ यह सूक्ष्म शरीर अपने अगले पड़ाव यानी 'पुनर्जन्म' की ओर कदम बढ़ाता है। यह सफर भी किसी जासूसी उपन्यास या साइंस-फिक्शन फिल्म से कम अद्भुत नहीं है।


जब सूक्ष्म शरीर अपने सारे कष्टों और पुण्यों का हिसाब पूरा करके अंतरिक्षीय माध्यम में आगे बढ़ता है, तो सवाल उठता है कि उसे अगला शरीर, अगले माता-पिता कैसे मिलते हैं? क्या यमराज कोई पर्ची काटते हैं? या यह सब ऑटोमैटिक होता है?


यह पूरी तरह एक 'मैग्नेटिक ऑटोमेशन' (स्वचालित चुंबकीय प्रक्रिया) है!


गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान कृष्ण तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का विज्ञान समझाते हैं। मृत्यु के समय जीव के सूक्ष्म शरीर में जिस गुण की प्रधानता होती है, उसकी ऊर्जा की 'वेवलेंथ' (Wavelength) वैसी ही बन जाती है।

जो जीवनभर वासना और ईर्ष्या में जिया, उसकी तरंगें भारी और मटमैली (Low Frequency) होती हैं।

जो महत्वाकांक्षा और कर्म में जिया, उसकी तरंगें चंचल और मध्यम (Medium Frequency) होती हैं।

जो ध्यान, सेवा और ज्ञान में जिया, उसकी तरंगें अत्यंत हल्की, चमकीली और उच्च (High Frequency) होती हैं।


[ अंतरिक्ष में भटकता सूक्ष्म शरीर ] 

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         ▼ (अपनी फ्रीक्वेंसी के अनुसार आकर्षण)


 गर्भ चयन का चुंबकीय नियम 


 • तामसिक फ्रीक्वेंसी ──> पशु योनि या अत्यंत कष्टप्रद गर्भ 

 • राजसिक फ्रीक्वेंसी ──> पुनः मनुष्य योनि / कर्म प्रधान 

• सात्विक फ्रीक्वेंसी ──> संस्कारी, कुलीन या दिव्य गर्भ 


3. आत्मा और सूक्ष्म शरीर का अंतर (The Final Concept)


तत्व: आत्मा

प्रकृति: अजर, अमर, निर्विकार, गुणातीत (शुद्ध प्रकाश)।

आवश्यकता: इसे किसी भी सांसारिक या भौतिक वस्तु की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं है।


दान-पुण्य का प्रभाव: यह पूर्णतः अलिप्त रहती है, इस पर कर्मकांड का कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।


तत्व: सूक्ष्म शरीर (जीवात्मा)

प्रकृति: मन, बुद्धि, वासना, अधूरी इच्छाओं और पुरानी आदतों का पुतला।

आवश्यकता: शांति, सकारात्मक ऊर्जा, सांसारिक मोह से मुक्ति और सही दिशा-निर्देश की जरूरत होती है।

दान-पुण्य का प्रभाव: इसके कष्टों का निवारण होता है, मन शांत होता है और आगे के सफर में बेहतर गर्भ (नया जन्म) ढूंढने में मदद मिलती है।


अब कैसे समझें ? 

जब पृथ्वी पर लाखों-करोड़ों जोड़े (माता-पिता) संतानोत्पत्ति के लिए संभोग की प्रक्रिया में होते हैं। गर्भाधान (Conception) के उस पवित्र या अपवित्र क्षण में, उन माता-पिता की मानसिक स्थिति, उनके विचारों और उनकी शारीरिक ऊर्जा के मिलन से वहां एक 'बायो-इलेक्ट्रिक मैग्नेटिक फील्ड' (Bio-Electromagnetic Field) तैयार होता है।


अब प्रकृति का अचूक नियम देखिए! अंतरिक्ष में भटकते हुए उस सूक्ष्म शरीर की फ्रीक्वेंसी, पृथ्वी पर तैयार हो रहे जिस गर्भ के चुंबकीय क्षेत्र से 'हूबहू मैच' (Resonate) कर जाती है, वह सूक्ष्म शरीर बिना किसी देरी के, प्रकाश की गति से उस गर्भ की ओर आकर्षित होकर उसमें समा जाता है! जैसे रेडियो का नॉब घुमाते ही जब 93.5 मेगाहर्ट्ज पर सुई पहुंचती है, तो हवा में तैर रही तरंगें तुरंत गाने के रूप में बजने लगती हैं—ठीक वैसे ही, समान फ्रीक्वेंसी मिलते ही जीव उस गर्भ में ट्यून हो जाता है।


यहाँ भी आपके द्वारा किया गया दान-पुण्य उस जीव की मदद करता है! जब आप यहाँ उसके नाम पर दीपदान करते हैं, गीता का पाठ करते हैं, भूखों को अन्न देते हैं, तो आपकी उन प्रार्थनाओं की 'हाई फ्रीक्वेंसी' तरंगें उस भटकते हुए जीव के सूक्ष्म शरीर के भारीपन को कम कर देती हैं। उसे एक 'ऊर्जा का धक्का' (Spiritual Push) मिलता है, जिससे वह किसी निम्न, अंधकारमयी योनि या पापी गर्भ में खिंचने से बच जाता है और उसे एक उच्च, संस्कारी, और ज्ञानवान माता-पिता का गर्भ प्राप्त होता है, जहाँ से उसकी आगे की आत्मिक उन्नति हो सके।


 ऋषियों की परम व्यावहारिक प्रयोगशाला — सामाजिक और मानसिक हीलिंग


आइए, अब इस पूरे परिदृश्य के उस पहलू पर विचार करें जो पूरी तरह इस धरा से, हमारे आज के समाज से जुड़ा है। हमारे सनातन ऋषि केवल लकीर के फकीर नहीं थे; वे परम मनोवैज्ञानिक (Master Psychologists) और समाजशास्त्री भी थे। उन्होंने मृत्यु के बाद के इन सारे कर्मकांडों को इस तरह से मानवीय जीवन में पिरोया कि इसके जरिए दो सबसे बड़े काम एक साथ संपन्न हो जाते हैं:


1. जीवित परिवार की 'ग्लानि' और 'शोक' का आध्यात्मिक उपचार

जब किसी घर का कोई सदस्य—चाहे वह पिता हो, माता हो या कोई प्रियजन—अचानक संसार छोड़कर चला जाता है, तो पीछे छूटे लोगों के दिलों में दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। इसके साथ ही, एक बहुत गहरा साइकोलॉजिकल सिंड्रोम जन्म लेता है, जिसे हम 'गिल्ट' (Guilt या अपराध-बोध) कहते हैं।

"काश! मैंने अंतिम समय में पिताजी को वह फल खिला दिया होता।"

"काश! मैं उनके पैर दबा देता, उन्हें अंतिम समय में कोई कष्ट न होने देता।"

यह अपराध-बोध जीवित व्यक्ति के मानसिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर सकता है। ऋषियों ने देखा कि इस शोक और आत्मग्लानि से मनुष्य को बाहर निकालना अनिवार्य है। इसलिए उन्होंने व्यवस्था दी—"घबराओ मत! तुम्हारा संबंध उनसे अभी टूटा नहीं है। वे जिस सूक्ष्म मार्ग पर बढ़ रहे हैं, तुम आज भी यहाँ बैठकर उनकी मदद कर सकते हो। उनके नाम पर यह शीतल जल दान करो, यह अन्न दान करो, यह सुंदर वस्त्र दान करो।"


जैसे ही दुखी पुत्र या परिजन यह दान करता है, उसके अंतर्मन को एक परम संतोष मिलता है। उसका डिप्रेशन, उसका अवसाद धीरे-धीरे घटने लगता है। यह मृतक के निमित्त किया गया कर्म वास्तव में जीवित बचे हुए लोगों की 'मानसिक हीलिंग' (Psychological Healing) की एक अद्भुत और अचूक विधा है।


2. कॉस्मिक टैक्स और वेल्थ रीडिस्ट्रिब्यूशन (Social Justice)

इस पूरे विज्ञान का सामाजिक ढांचा कितना भव्य है, जरा इस पर गौर कीजिए! जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो वह अपने पीछे जमीन, जायदाद, बैंक बैलेंस और कई भौतिक संपत्तियां छोड़ जाता है। ऋषियों ने नियम बनाया कि इस संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा समाज के सबसे कमजोर, गरीब, अनाथों और धार्मिक संस्थानों को 'दान' के रूप में तुरंत वितरित हो जाना चाहिए।


[ संपन्न परिवार में मृत्यु ] ──> [ संपदा का एक हिस्सा मुक्त ] ──> [ समाज के अभावग्रस्तों को दान ] ──> [ सामाजिक संतुलन ]


अन्न, वस्त्र, शैया, छाता, जूता, पात्र—ये सब क्या हैं? ये एक आम गरीब और जरूरतमंद इंसान की बुनियादी जरूरतें हैं। मृतक के बहाने, अमीर और मध्यम वर्ग की तिजोरियों से धन निकलकर समाज के उस तबके तक पहुंच जाता है जो कँपकँपाती ठंड में बिना बिस्तर के सो रहा है, या जो तपती दुपहरी में नंगे पैर चल रहा है।


क्या इससे खूबसूरत सामाजिक न्याय (Social Justice) की कोई और मिसाल हो सकती है? समाज के उन गरीबों के चेहरों पर जो मुस्कान आती है, उनके पेट की जो भूख शांत होती है, उससे जो सामूहिक दुआएं और आशीष (Positive Energy Clouds) पैदा होते हैं, वही उस दिवंगत आत्मा के सफर का पाथेय (रास्ते का संबल) बन जाते हैं।


 चेतना की अंतिम छलांग — मोक्ष का महापथ

अब हम इस विहंगम यात्रा के उस शिखर पर पहुंच चुके हैं, जहाँ से आगे केवल अनंत प्रकाश है। आपके मन में यह स्पष्ट हो चुका है कि आत्मा सचमुच अलिप्त है, लेकिन जब तक वह इस सूक्ष्म शरीर रूपी 'अहंकार और वासनाओं के पिंजरे' में कैद है, तब तक उसे इन सारे नियमों, दानों, पुण्यों और यात्रा के कष्टों से गुजरना ही होगा।

लेकिन क्या इस अंतहीन यात्रा का कोई अंत है? क्या इस सूक्ष्म शरीर को हमेशा के लिए इस आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल सकती है?

जी हां! इसी अवस्था को हमारे शास्त्रों में 'मोक्ष' (Liberation) या 'महा-निर्वाण' कहा गया है।


सांसारिक जीव ──> [ वासनाओं की पोटली ] ──> निरंतर यात्रा (जन्म-मृत्यु का चक्र)

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       ▼ (ज्ञान और निष्काम कर्म द्वारा)

  मुक्त आत्मा ──> [ सूक्ष्म शरीर का विलय ] ──> मोक्ष (अनंत चेतना में विलीन)


जब कोई मनुष्य अपने जीवनकाल में ही भगवान कृष्ण के उस परम सत्य को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि अपने भीतर 'अनुभव' कर लेता है; जब वह जान जाता है कि वह यह शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्मा है; जब उसकी सारी सांसारिक वासनाएं, सारे मोह, सारी आसक्तियां ज्ञान की अग्नि में जलकर भस्म हो जाती हैं—तब उसका यह 'सूक्ष्म शरीर' पूरी तरह से हल्का, पारदर्शी और निराकार हो जाता है।

ऐसी मुक्त आत्मा की मृत्यु होने पर उसका सूक्ष्म शरीर ब्रह्मांड में किसी गर्भ की तलाश में नहीं भटकता, न ही उसे यमलोक के किसी काल्पनिक मार्ग पर जाना पड़ता है। उसका सूक्ष्म शरीर ठीक उसी तरह ब्रह्मांडीय महा-चेतना (परमात्मा) में विलीन हो जाता है, जैसे किसी घड़े के टूटने पर घड़े के भीतर का आकाश बाहर के अनंत आकाश से मिलकर एक हो जाता है! फिर न कोई भूख बचती है, न प्यास; न कोई सर्दी बचती है, न गर्मी; न कोई वैतरणी बचती है और न यमराज का कोई खौफ!

लेकिन जब तक हम उस परम ज्ञान की स्थिति तक नहीं पहुंच जाते, तब तक यह सनातन कर्मकांड विज्ञान, यह श्राद्ध, यह दान-पुण्य हमारी चेतना को उस महापथ पर आगे बढ़ाने की सीढ़ियां हैं। यह भटके हुए को रास्ता दिखाने का, और टूटे हुए दिलों को जोड़ने का ब्रह्मांडीय सेतु है।


अंतहीन यात्रा का मर्म — विदाई की बेला

इस पूरे महा-विश्लेषण के बाद, जब हम दोबारा श्मशान की उस जलती हुई चिता को देखते हैं, तो हमारी आंखों में डर के आंसू नहीं, बल्कि ज्ञान की एक अनूठी चमक होती है। अब हमें समझ आ गया है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि केवल एक वस्त्र को बदलकर दूसरे वस्त्र को धारण करने का एक 'अंतरिक्षीय जंक्शन' (Transitional Junction) है।

मृत्यु के बाद का विज्ञान यह सिद्ध करता है कि हमारी सनातन संस्कृति का एक-एक बिंदु, एक-एक मंत्र और एक-एक विधान कितना तार्किक, कितना मनोवैज्ञानिक और कितना वैज्ञानिक है। हम केवल इस लोक को नहीं संवारते, हम उस पार के अंजाने रास्तों पर भी करुणा और प्रेम के दीपक जलाना जानते हैं।

तो फिर अगली बार जब आप किसी मृत पूर्वज के निमित्त जल की एक अंजलि दें या किसी गरीब को अन्न का दान करें, तो यह मत सोचिएगा कि आप कोई अंधविश्वास कर रहे हैं। याद रखिएगा कि आप उस समय अपनी कृतज्ञता की, अपने प्रेम की एक ऐसी 'क्वांटम वेव' छोड़ रहे हैं जो ब्रह्मांड की गहराइयों को चीरती हुई आपके उस प्रियजन को तृप्ति की शीतलता प्रदान कर रही होगी।

मनुष्य का यह जीवन एक महान अवसर है—इस स्थूल शरीर में रहते हुए उस सूक्ष्म शरीर को इतना पवित्र, इतना हल्का और इतना दिव्य बना लेने का, कि जब विदाई की अंतिम वेला आए, तो हमें किसी दान की बैसाखी की जरूरत न पड़े, बल्कि हम स्वयं साक्षात कृष्ण के हाथों में हाथ डालकर इस अनंत ब्रह्मांड के महा-आनंद में लीन हो सकें।


"भौतिक राख यहीं जमीं पर बिखर जाती है और आत्मा अंबर से परे निकल जाती है; मगर इन दोनों के बीच जो 'मन' का मुसाफ़िर है, उसे परलोक के सफर में आपके 'श्रद्धा और दान' की ही दुआएं रास्ता दिखाती हैं!"


निष्कर्ष: 

इस संपूर्ण, गहन और मर्मज्ञ विश्लेषण के उपसंहार में यदि हम सत्य की अंतिम परत को खोलें, तो यह शंका पूरी तरह विलीन हो जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता का 'आत्म-ज्ञान' और पुराणों का 'कर्मकांड-विज्ञान' वास्तव में एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि मानव चेतना की दो अलग-अलग अवस्थाओं के व्यावहारिक नियम हैं।

चिता की भस्म इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि स्थूल शरीर की यात्रा यहीं समाप्त हो गई, और गीता का उद्घोष इस बात का परम सत्य है कि शुद्ध आत्मा को किसी सांसारिक साधन या दान की आवश्यकता कभी थी ही नहीं। परंतु, जब तक जीव मोक्ष के परम शिखर पर नहीं पहुंच जाता, तब तक इन दोनों के बीच 'सूक्ष्म शरीर' (जिसमें मन, बुद्धि और जीवनभर के संस्कारों का बायो-डिजिटल डेटा दर्ज है) अपनी अतृप्त इच्छाओं और आदतों के कारण परलोक की यात्रा पर अग्रसर रहता है।

मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले समस्त दान-पुण्य, श्राद्ध और तर्पण इसी 'सूक्ष्म शरीर' की मानसिक व्याकुलता को शांत करने के लिए हैं। यह सनातन विज्ञान का वह 'क्वांटम वाई-फाई ट्रांसफर' है, जहाँ जीवित परिजनों की 'श्रद्धा' और 'त्याग' से उत्पन्न होने वाली सात्विक ऊर्जा तरंगें (पुण्य), अंतरिक्ष के किसी भी कोने में भटक रहे उस अदृश्य जीव को मानसिक तृप्ति, संबल और सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं। साथ ही, यह व्यवस्था जीवित परिवार के अंतर्मन से अपराध-बोध (Guilt) को मिटाकर उनकी 'साइकोलॉजिकल हीलिंग' करती है और दान के माध्यम से समाज के अभावग्रस्त तबके तक संसाधनों को पहुंचाकर 'सामाजिक न्याय' सुनिश्चित करती है।


"आत्मा तो अपनी अमर उड़ान पर निकल जाती है और माटी इसी ज़मीन में मिल जाती है; मगर बीच राह में भटकते उस 'मन' के मुसाफ़िर को, आपकी 'श्रद्धा का अन्न' और 'त्याग का पुण्य' ही अगले सफर की मंजिल दिखाता है!"


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज 



असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, पिशाच और बेताल .......

 असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, पिशाच और बेताल .......

   इनमें से एक "असुर" तो एक प्रतीकात्मक शब्द है। "जो सुर नही है वो असुर है।" अर्थात - जो कोई भी देवता नही है वो सभी असुर कहलाते हैं। किंतु इस वाक्य में देवता का अर्थ बहुत व्यापक है। मूल रूप से देवता केवल १२ हैं जिन्हें हम आदित्य कहते हैं। महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री अदिति के गर्भ से उत्पन्न १२ पुत्र ही आदित्य अथवा देवता कहलाते हैं। 


किन्तु यहाँ देवता का अर्थ सभी ३३ कोटि देवता, उप-देवता, यक्ष, गन्धर्व इत्यादि है। ये सभी सम्मलित रूप से "सुर" कहलाते हैं। तो इस प्रकार दैत्य, दानव, राक्षस, पिशाच, बेताल इत्यादि को भी हम असुर कह सकते हैं। सदैव स्मरण रखें कि असुर कोई अलग जाति नही अपितु उन सभी जातियों के लिए एक प्रतीकात्मक शब्द है जो सुर अर्थात देवता नही हैं।


अन्य सभी अलग अलग जातियाँ हैं। इन सभी के पिता मरीचि पुत्र महर्षि कश्यप हैं। महर्षि कश्यप ने ब्रह्मापुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया जिससे समस्त जातियाँ उत्पन्न हुई। ये सभी भी उन्ही में से एक हैं। आइये इनके विषय में संक्षेप में जान लेते हैं।

दैत्य: महर्षि कश्यप और दक्ष की पुत्री दिति के पुत्र दैत्य कहलाये। इस प्रकार ये देवताओं (आदित्यों) के छोटे भाई हुए। कश्यप और दिति के दो पुत्र - हिरण्यकश्यप एवं हिरण्याक्ष हुए जहाँ से दैत्य जाति का आरम्भ हुआ। इन्ही के गुरु भृगु पुत्र शुक्राचार्य थे। इन दोनों की होलिका नामक एक पुत्री भी हुई। हिरण्याक्ष का वध भगवान वाराह ने किया।

हिरण्याक्ष का पुत्र ही कालनेमि था जिसने द्वापर तक श्रीहरि के सभी अवतारों से प्रतिशोध लिया और बार बार उनके हाथों मारा गया। बड़े भाई हिरण्यकशिपु के सबसे छोटे पुत्र प्रह्लाद थे जो महान विष्णु भक्त हुए। उन्ही को मारने के प्रयास में होलिका मारी गयी। होलिका का पुत्र स्वर्भानु था जिसे हम राहु केतु के नाम से जानते हैं। अंत में अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु नारायण ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन हुए और विरोचन के पुत्र दैत्यराज बलि हुए। इन्ही बलि को श्रीहरि ने वामन रूप लेकर पराभूत किया और पाताल का राज्य दे दिया। इन बलि के पुत्र महापराक्रमी बाण हुए जो महान शिवभक्त हुए। कालांतर में इन्हें श्रीकृष्ण ने परास्त किया और इनकी पुत्री उषा श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से ब्याही गयी। बलि की पुत्री वज्रज्वला रावण के भाई कुम्भकर्ण से ब्याही गयी। इनके कुल का भी अनंत विस्तर हुआ।

दानव ......

  ये दैत्यों और आदित्यों के छोटे भाई थे जिनकी उत्पत्ति महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री दनु से हुई। दानवों के ११४ कुल चले जिनमें से ६४ मुख्य माने जाते हैं। ये आकार में बहुत बड़े होते थे और बहुत बर्बर माने जाते थे। ये दैत्य और राक्षसों की भांति उतने सुसंस्कृत नही होते थे। पहली पीढ़ी के दानवों में विप्रचित्ति प्रमुख है जो होलिका का पति था। मय दानव को तो सभी जानते हैं जो असुरों के शिल्पी थे। इन्ही की पुत्री मंदोदरी रावण की पट्टमहिषी थी। इसके अतिरिक्त कालिकेय दानवों का वंश भी बहुत प्रसिद्ध था। कालिकेय कुल में जन्मा विद्युतजिव्ह ही रावण की बहन शूर्पणखा का पति था। बाद में रावण ने युद्ध में उसका वध कर दिया और शूर्पणखा को दंडकवन का राज्य प्रदान किया। दानवों में वृषपर्वा का नाम भी बहुत प्रसिद्ध है जो ययाति की दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के पिता थे।

राक्षस ......

  ये सभी असुरों में सबसे सुसंस्कृत और विद्वान माने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति की दो कथा प्रसिद्ध है। एक कथा के अनुसार महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री सुरसा के पुत्र ही राक्षस कहलाये। हालांकि राक्षसों की उत्पत्ति की दूसरी कथा ही अधिक मान्य है जिसके अनुसार ब्रह्मा जी के क्रोध से हेति और प्रहेति नामक दो असुरों का जन्म हुआ और वही से राक्षस वंश की शुरुआत हुई। प्रहेति तपस्वी बन गया और हेति ने यमराज की बहन भया से विवाह किया जिससे उसे विद्युत्केश नामक पुत्र प्राप्त हुआ। विद्युत्केश की पत्नी सलकंटका थी जिससे उसे सुकेश नामक पुत्र हुआ, जिसे उसने त्याग दिया। तब माता पार्वती ने उसे गोद ले लिया और वो शिव पुत्र कहलाया। सुकेश ने देववती से विवाह किया जिससे उसे तीन पुत्र प्राप्त हुए - माल्यवान, सुमाली एवं माली। सुमाली के १० पुत्र और ४ पुत्रियां हुई जिनमें से एक कैकसी थी। कैकसी ने ब्रह्मा के पौत्र और महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा से विवाह किया जिससे रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण पैदा हुए। रावण की दो पत्नियों - मंदोदरी और धन्यमालिनी से ७ पुत्र हुए जिनमें मेघनाद ज्येष्ठ था। कुम्भकर्ण के वज्रज्वला से कुम्भ एवं निकुम्भ नामक पुत्र हुए। उसनें एक विवाह विराध राक्षस की विधवा कर्कटी से भी किया जिससे भीम नामक पुत्र हुआ। इसी पुत्र को मारकर भगवान शंकर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए। विभीषण की पत्नी सरमा से एक पुत्री त्रिजटा हुई। कैकसी की एक पुत्री शूर्पणखा हुई जो विद्युतजिव्ह से ब्याही जिसका वध रावण ने कर दिया। दुर्भाग्य से विभीषण को छोड़ सभी राक्षसों का वध लंका युद्ध में हो गया। 

पिशाच .......

 इनका वर्णन हिन्दू ग्रंथों में थोड़ा कम मिलता है किन्तु कुछ ग्रंथों के अनुसार पिशाच महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री क्रोधवर्षा के पुत्र माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त सर्पों और अन्य विषैले जीव की उत्पत्ति भी क्रोधवर्षा से ही हुई। पुराणों में इन्हे मांसभक्षी बताया गया है जो रक्त का पान करते हैं। अन्य सभी असुर भी निशाचर होते थे किन्तु पिशाचों को पूर्ण रूप से निशाचर ही माना गया है। ये इच्छाधारी होते थे और किसी भी रूप को धारण कर सकते थे। पश्चिमी संस्कृति में "वैम्पायर" का जो वर्णन किया जाता है वो वास्तव मे पिशाच का ही स्वरुप है। 

बेताल  ....... 

पिशाचों में जो सर्वाधिक शक्तिशाली होते थे उन्हें ही बेताल कहा जाता है। कई स्थानों पर इन्हे पिशाचों का स्वामी भी बताया गया है। शैव धर्म में इन्हे भगवान शंकर का गण और कई स्थानों पर उनका वाहन भी कहा गया है। कुछ स्थानों पर इन्हे माँ शांतादुर्गा का भाई भी माना गया है। ये काल भैरव के भक्त और सेवक के रूप में नियुक्त होते थे। बेतालों में ही एक शाखा "अग्नि बेताल" की मानी गयी है जो माता काली के भक्त थे। गोवा के अमोना गांव में बेताल स्वामी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। 

तो इस प्रकार दैत्य, दानव और राक्षसों के कुल में आपसी विवाह तो हुए ही, साथ ही इनके कुल की कन्याओं ने मानवों से भी विवाह किया। दानवराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने एक मानव ययाति से विवाह किया और उनसे ही समस्त राजवंश चले। राक्षस कुल में जन्मी हिडिम्बा का विवाह भीम से हुआ। श्रीकृष्ण का पड़पोता वज्र भी माता की ओर से दैत्यकुल का ही था। ऐसे ही कई और उदाहरण हमें पुराणों में देखने मिलते हैं।

Tuesday, June 2, 2026

हिंदू_धर्मग्रंथों_का_सार_जानिए_किस_ग्रंथ_में क्या है?

 #हिंदू_धर्मग्रंथों_का_सार_जानिए_किस_ग्रंथ_में क्या है?

 

>अधिकतर हिंदुओं के पास अपने ही धर्मग्रंथ को पढ़ने की समय नहीं है। वेद, उपनिषद पढ़ना तो दूर वे गीता तक को नहीं पढ़ते जबकि गीता को एक घंटे में पढ़ा जा सकता है। हालांकि कई जगह वे भागवत पुराण सुनने या रामायण का अखंड पाठ करने के लिए समय निकाल लेते हैं या घर में सत्यनारायण की कथा करवा लेते हैं। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो वेद ही है। 


शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है:- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है।


वेदों में क्या है?


वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

 

ऋग्वेद :ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।


यजुर्वेद :यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

 

सामवेद : साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसी से शास्त्रिय संगीत और नृत्य का जिक्र भी मिलता है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें संगीत के विज्ञान और मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।


अथर्वदेव :थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है।

 

उपनिषद् क्या है?


उपनिषद वेदों का सार है। सार अर्थात निचोड़ या संक्षिप्त। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ईश्वर है या नहीं, आत्मा है या नहीं, ब्रह्मांड कैसा है आदि सभी गंभीर, तत्व ज्ञान, योग, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि की बातें उपनिषद में मिलेगी। उपनिषदों को प्रत्येक हिन्दुओं को पढ़ना चाहिए। इन्हें पढ़ने से ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और जगत के बारे में सच्चा ज्ञान मिलता है।

 

वेदों के अंतिम भाग को 'वेदांत' कहते हैं। वेदांतों को ही उपनिषद कहते हैं। उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे- 1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि और 12. श्वेताश्वतर।


षड्दर्शन क्या है?


वेद से निकला षड्दर्शन : वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं। दरअसल यह वेद के ज्ञान का श्रेणीकरण है। ये छह दर्शन हैं:- 1.न्याय, 2.वैशेषिक, 3.सांख्य, 4.योग, 5.मीमांसा और 6.वेदांत। वेदों के अनुसार सत्य या ईश्वर को किसी एक माध्यम से नहीं जाना जा सकता। इसीलिए वेदों ने कई मार्गों या माध्यमों की चर्चा की है।

 

गीता में क्या है?


महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता में भी कुल 18 अध्याय हैं। 10 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। वेदों के ज्ञान को नए तरीके से किसी ने व्यवस्थित किया है तो वह हैं भगवान श्रीकृष्ण। अत: वेदों का पॉकेट संस्करण है गीता जो हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र ग्रंथ है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। गीता को बार बार पढ़ने के बाद ही वह समझ में आने लगती है।


गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है।


गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकासक्रम, हिन्दू संदेवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म, कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी, देवता, उपासना, प्रार्थना, यम, नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है।

 

श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। गीता को अर्जुन के अलावा और संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने- 574, अर्जुन ने- 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने- 1 श्लोक कहा है।

 

उपरोक्त ग्रंथों के ज्ञान का सार बिंदूवार :


1.ईश्वर के बारे में :


ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।

 

2.ब्रह्मांड के बारे में :


यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संचालित हो रहे हैं। उसी तरह लाखों महासूर्य उस एक ब्रह्मा की शक्ति से ही जगत में विद्यमान है।

 

3.आत्मा के बारे में :


आत्मा का स्वरूप ब्रह्म (परमात्मा) के समान है। जैसे सूर्य और दीपक में जो फर्क है उसी तरह आत्मा और परमात्मा में फर्क है। आत्मा के शरीर में होने के कारण ही यह शरीर संचालित हो रहा है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि संपूर्ण धरती, सूर्य, ग्रह नक्षत्र और तारे भी उस एक परमपिता की उपस्थिति से ही संचालित हो रहे हैं।


आत्मा का ना जन्म होता है और ना ही उसकी कोई मृत्यु है। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। यह आत्मा अजर और अमर है। आत्मा को प्रकृति द्वारा तीन शरीर मिलते हैं एक वह जो स्थूल आंखों से दिखाई देता है। दूसरा वह जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं जो कि ध्यानी को ही दिखाई देता है और तीसरा वह शरीर जिसे कारण शरीर कहते हैं उसे देखना अत्यंत ही मुश्लिल है। बस उसे वही आत्मा महसूस करती है जो कि उसमें रहती है। आप और हम दोनों ही आत्मा है हमारे नाम और शरीर अलग अलग हैं लेकिन भीतरी स्वरूप एक ही है।

 

4.स्वर्ग और नरक के बारे में :


वेदों के अनुसार पुराणों के स्वर्ग या नर्क को गतियों से समझा जा सकता है। स्वर्ग और नर्क दो गतियां हैं। आत्मा जब देह छोड़ती है तो मूलत: दो तरह की गतियां होती है:- 1.अगति और 2. गति।


1.अगति: अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।


2.गति :गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है या वह अपने कर्मों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।


अगति के चार प्रकार है-1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।


क्षिणोदर्क : क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है।


भूमोदर्क :भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।


अगति :अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।

दुर्गति :दुर्गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।


गति के भी 4 प्रकार :-गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं:- 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।

 

तीन मार्गों से यात्रा :


जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।

 

5.धर्म और मोक्ष के बारे में :


धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का अर्थ है यम और नियम को समझकर उसका पालन करना। नियम ही धर्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य होता है। हिंदु धर्म के अनुसार व्यक्ति को मोक्ष के बारे में विचार करना चाहिए। मोक्ष क्या है? स्थितप्रज्ञ आत्मा को मोक्ष मिलता है। मोक्ष का भावर्थ यह कि आत्मा शरीर नहीं है इस सत्य को पूर्णत: अनुभव करके ही अशरीरी होकर स्वयं के अस्तित्व को पूख्‍ता करना ही मोक्ष की प्रथम सीढ़ी है।


6.व्रत और त्योहार के बारे में :


हिन्दु धर्म के सभी व्रत, त्योहार या तीर्थ सिर्फ मोक्ष की प्राप्त हेतु ही निर्मित हुए हैं। मोक्ष तब मिलेगा जब व्यक्ति स्वस्थ रहकर प्रसन्नचित्त और खुशहाल जीवन जीएगा। व्रत से शरीर और मन स्वस्थ होता है। त्योहार से मन प्रसन्न होता है और तीर्थ से मन और मस्तिष्क में वैराग्य और आध्यात्म का जन्म होता है।

 

मौसम और ग्रह नक्षत्रों की गतियों को ध्यान में रखकर बनाए गए व्रत और त्योहार का महत्व अधिक है। व्रतों में चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा, श्रावण मास और कार्तिक मास के दिन व्रत रखना श्रेष्ठ है। यदि उपरोक्त सभी नहीं रख सकते हैं तो श्रावण के पूरे महीने व्रत रखें। त्योहारों में मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और हनुमान जन्मोत्सव ही मनाएं। पर्व में श्राद्ध और कुंभ का पर्व जरूर मनाएं।

 

व्रत करने से काया निरोगी और जीवन में शांति मिलती है। सूर्य की 12 और 12 चंद्र की संक्रांति होती है। सूर्य संक्रांतियों में उत्सव का अधिक महत्व है तो चंद्र संक्रांति में व्रतों का अधिक महत्व है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। इसमें से श्रावण मास को व्रतों में सबसे श्रेष्ठ मास माना गया है। इसके अलावा प्रत्येक माह की एकादशी, चतुर्दशी, चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या और अधिमास में व्रतों का अलग-अलग महत्व है। सौरमास और चंद्रमास के बीच बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साधुजन चतुर्मास अर्थात चार महीने श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह में व्रत रखते हैं।

 

उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्री, शिवरात्री, होली, ओणम, दीपावली, गणेशचतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।


7.तीर्थ के बारे में :


तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धान है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।

 

8.संस्कार के बारे में :


संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने


की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।

 

9.पाठ करने के बारे में : 


वेदो, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है। वक्त बदला तो लोगों ने पुराणों में उल्लेखित कथा की परंपरा शुरू कर दी, जबकि वेदपाठ और गीता पाठ का अधिक महत्व है।

 

10.धर्म, कर्म और सेवा के बारे में : 


धर्म-कर्म और सेवा का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रिय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।

 

सेव का मतलब यह कि सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन-बेटी, फिर भाई-बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।


11.दान के बारे में : 


दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। देव आराधना का दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है। 


12.यज्ञ के बारे में : 


यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। अग्नि जलाकर होम करना अग्निहोत्र यज्ञ है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। यह यज्ञ पिंडदान, तर्पण और सन्तानोत्पत्ति से सम्पन्न होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ कहलाता है। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।


13.मंदिर जाने के बारे में :


प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए: घर में मंदिर नहीं होना चाहिए। प्रति गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए। मंदिर में जाकर परिक्रमा करना चाहिए। भारत में मंदिरों, तीर्थों और यज्ञादि की परिक्रमा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। मंदिर की 7 बार (सप्तपदी) परिक्रमा करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह 7 परिक्रमा विवाह के समय अग्नि के समक्ष भी की जाती है। इसी प्रदक्षिण को इस्लाम धर्म ने परंपरा से अपनाया जिसे तवाफ कहते हैं। प्रदक्षिणा षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। हिन्दू सहित जैन, बौद्ध और सिख धर्म में भी परिक्रमा का महत्व है। इस्लाम में मक्का स्थित काबा की 7 परिक्रमा का प्रचलन है। पूजा-पाठ, तीर्थ परिक्रमा, यज्ञादि पवित्र कर्म के दौरान बिना सिले सफेद या पीत वस्त्र पहनने की परंपरा भी प्राचीनकाल से हिन्दुओं में प्रचलित रही है। मंदिर जाने या संध्यावंदन के पूर्व आचमन या शुद्धि करना जरूरी है। इसे इस्लाम में वुजू कहा जाता है।

 

14.संध्यावंदनके बारे में :


संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संध्योपासना के चार प्रकार है- 1.प्रार्थना, 2.ध्यान,


3.कीर्तन और 4.पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।

 

15..धर्म की सेवा के बारे में :


धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।

 

16.मंत्र के बारे में :


वेदों में बहुत सारे मंत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन जपने के लिए सिर्फ प्रणव और गायत्री मंत्र ही कहा गया है बाकी मंत्र किसी विशेष अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के लिए है। वेदों में गायत्री नाम से छंद है जिसमें हजारों मंत्र है किंतु प्रथम मंत्र को ही गायत्री मंत्र माना जाता है। उक्त मंत्र के अलावा किसी अन्य मंत्र का जाप करते रहने से समय और ऊर्जा की बर्बादी है। गायत्री मंत्र की महिमा सर्वविदित है। दूसरा मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र, लेकिन उक्त मंत्र के जप और नियम कठिन है इसे किसी जानकार से पूछकर ही जपना चाहिए।

 

17.प्रायश्चित के बार में :-प्राचीनकाल से ही हिन्दु्ओं में मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। प्रायश्‍चित करने के महत्व को स्मृति और पुराणों में विस्तार से समझाया गया है। गुरु और शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं। दुष्कर्म के लिए प्रायश्चित करना , तपस्या का एक दूसरा रूप है।   यह मंदिर में देवता के समक्ष 108 बार साष्टांग प्रणाम , मंदिर के इर्दगिर्द चलते हुए साष्टांग प्रणाम और कावडी अर्थात वह तपस्या जो भगवान मुरुगन को अर्पित की जाती है, जैसे कृत्यों के माध्यम से की जाती है। मूलत: अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरूणदेव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है।

 

18.दीक्षा देने के बारे में :


दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है।  दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं।

 

यह दीक्षा देने की परंपरा जैन धर्म में भी प्राचीनकाल से रही है, हालांकि दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। अलग-अलग धर्मों में दीक्षा देने के भिन्न-भिन्न तरीके हैं।


Arun Dubey Jabalpur 

प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।।

आरती, स्त्रोत्र की महिमा

 ‼️आरती, स्त्रोत्र की महिमा‼️ आरती को आरात्रिक , आरार्तिक अथवा नीराजन भी कहते हैं। पूजा के अंत में आरती की जाती है। जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है‼️

स्कन्द पुराण में कहा गया है-

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरे:।

सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे।

अर्थात - पूजन मंत्रहीन तथा क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है‼️


आरती करने का ही नहीं, देखने का भी बड़ा पूण्य फल प्राप्त होता है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है- 

नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:।

सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम।।

अर्थात - जो भी देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान की आरती देखता है, वह सातों जन्म में ब्राह्मण होकर अंत में परम् पद को प्राप्त होता है ‼️


श्री विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है- 

धूपं चरात्रिकं पश्येत काराभ्यां च प्रवन्देत।

कुलकोटीं समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।।

अर्थात - जो धुप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है‼️


आरती में पहले मूल मंत्र (जिस देवता का, जिस मंत्र से पूजन किया गया हो, उस मंत्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगाड़े, शख्ङ, घड़ियाल आदि महावाद्यो के तथा जय-जयकार के शब्दों के साथ शुभ पात्र में घृत से या कर्पूर से विषम संख्या में अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिए-

ततश्च मुलमन्त्रेण दत्त्वा पुष्पाञ्जलित्रयम्।

महानिराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनैः।।

प्रज्वलेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा।

आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्दिकम्।।

अर्थात - साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे 'पञ्चप्रदीप' भी कहते है। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कर्पूर से भी आरती होती है ‼️


पद्मपुराण में कहा है- 

कुङ्कुमागुरुकर्पुरघृतचंदननिर्मिता:।

वर्तिका: सप्त वा पञ्च कृत्वा वा दीपवर्तिकाम्।।

कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शङ्खघण्टादिवाद्यकै:।

अर्थात - कुङ्कुम, अगर, कर्पूर, घृत और चंदन की पाँच या सात बत्तियां बनाकर शङ्ख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुवे आरती करनी चाहिए‼️


आरती के पाँच अंग होते है - 

पञ्च नीराजनं कुर्यात प्रथमं दीपमालया।

द्वितीयं सोदकाब्जेन तृतीयं धौतवाससा।।

चूताश्वत्थादिपत्रैश्च चतुर्थं परिकीर्तितम्।

पञ्चमं प्रणिपातेन साष्टाङ्गेन यथाविधि।।

अर्थात - प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शङ्ख से, तीसरे धुले हुए वस्त्र से, आम व् पीपल अदि के पत्तों से और पाँचवे साष्टांग दण्डवत से आरती करें ‼️


आदौ चतुः पादतले च विष्णो द्वौं नाभिदेशे मुखबिम्ब एकम्।

सर्वेषु चाङ्गेषु च सप्तवारा नारात्रिकं भक्तजनस्तु कुर्यात्।।

अर्थात - आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाए, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंङ्गो पर घुमाए‼️


यथार्थ में आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। आरती के दो भाव है जो क्रमशः 'नीराजन' और 'आरती' शब्द से व्यक्त हुए है। नीराजन (निःशेषण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेषरूप से, निःशेषरूप से प्रकाशित करना। अनेक दिप-बत्तियां जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का यही अभिप्राय है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे- चमक उठे, अंङ्ग-प्रत्यङ्ग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाये, जिसमें दर्शक या उपासक भलिभांति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके। दूसरा 'आरती' शब्द (जो संस्कृत के आर्ति का प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है अरिष्ट) विशेषतः माधुर्य-उपासना से सम्बंधित है ‼️

आरती-वारना का अर्थ है आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना। इस रूप में यह एक तांत्रिक क्रिया है, जिसमे प्रज्वलित दीपक अपने इष्टदेव के चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्न बधाये टाली जाती है। आरती लेने से भी यही तात्पर्य है कि उनकी आर्ति (कष्ट) को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बली जाना, वारी जाना न्यौछावर होना आदि प्रयोग इसी भाव के द्योतक है। इसी रूप में छोटे बच्चों की माताए तथा बहिने लोक में भी आरती उतारती है। यह आरती मूल रूप में कुछ मंत्रोच्चारण के साथ केवल कष्ट-निवारण के लिए उसी भाव से उतारी जाती रही है ‼️

आज कल वैदिक उपासना में उसके साथ-साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी होता है तथा पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना में उसके साथ सुंदर-सुंदर भावपूर्ण पद्य रचनाएँ भी गायी जाती है। ऋतू, पर्व पूजा के समय आदि भेदों से भी आरती गायी जाती है ‼️


❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Arun Dubey Jabalpur

Saturday, May 30, 2026

પીપળે પાણી શું કામ રેડવુ જોઈએ જાણો🙏

 *પીપળે પાણી શું કામ રેડવુ જોઈએ જાણો🙏*

સમશાનમાં જયારે મહર્ષિ દધીચિના અંતિમ સંસ્કાર થઈ રહ્યા હતા તો એમના પત્નિ વિયોગ સહન ના કરી શક્યા અને  પાસે વિશાળ પીપળાના ઝાડ નીચે તેમના ત્રણ વર્ષના પુત્રને  મુકી ને સળગતી ચિતામાં  બેસીને સતી થઈ ગયા  પીપળાના ઝાડ નીચે ભુખથી રડતુ બાળક પીપળાના નીચે પડેલા  પાન, ને ફળ ખાઈને દિવસો પસાર કરવા લાગ્યુ અને ધીમે ધીમે પીપળાને જ ઘર માની ને મોટુ થવા લાગ્યો,એક દિવસ  દેવર્ષિ નારદ ત્યાથી નિકળા ને બાળકને પુછ્યુ તુ કોણ છો?  બાળક કહે એ જ તો હુ જાણવા માંગુ છુ 

નારદજી:  તારા માતા પિતા કોણ છે?

બાળક કહે એ પણ ખબર નથી  તમે મને કૃપા કરી ને બતાવો  ત્યારે નારદજી એ ધ્યાન ધરી ને  કહ્યુ કે બાળક તુ મહાન દાનવીર મહર્ષિ દધીચિનો પુત્ર છો તારા પિતાની અસ્થીમાંથી જ વ્રજ બનાવીને દેવોએ અસુરો પર વિજય મેળવ્યો હતો તારા પિતાનુ 31 વર્ષની ઉંમર માજ મૃત્યુ થયુ હતુ,

બાળક :  મારા પિતાની મૃત્યુનું કારણ શું હતુ? 

નારદજી:  તારા પિતા પર શનિદેવની મહાદશા હતી જે પણ કઈ તારે સાથે થયુ તે શનિદેવની મહાદશાને કારણે થયુ નારદજીએ બાળકનું નામ  પીપ્લાદ રાખીને જતા રહ્યા પીપ્લાદે નારદજીના કહેવા પ્રમાણે  બ્રહ્માજીનું ઘોર તપ કર્યુ બ્રહ્માજી પ્રસન્ન થયા અને વરદાન માંગવા કહ્યુ પિપ્લાદે પોતાની દ્રષ્ટીથી કોઈ પણ ને ભસ્મીભુત કરવાની શક્તિ માંગી 

હવે વરદાન મળ્યા પછી તરત પિપ્લાદે શનિદેવનું આહ્વવાન કરીને બોલાવ્યા અને પોતાની દ્રષ્ટીથી ભષ્મ કરવાનું ચાલુ કર્યુ 

બ્રહ્માંડમાં હાહાકાર થય ગયો સુર્ય પોતાના પુત્રને સળગતા જોયને બ્રહ્માજી  પાસે ગયા ત્યારે બ્રહ્માજીએ આવીને બાળકને બોવ સમજાવ્યો ને બીજા બે વરદાન માંગવા કહ્યુ ત્યારે બાળકે શનિદેવને મુક્ત કર્યા 

અને પહેલુ વરદાન માગ્યુ કે કોઈ પણ બાળકના જન્મ પછી પાંચ વર્ષ સુધી બાળકની કુંડલીમાં શનિ કોઈ પણ રીતે અસર ના કરવો જોઈએ  જેથી કરીને મારી જેમ બીજા દુખી ના થાય

બીજુ મને પીપળાના ઝાડે જ  મોટો કર્યો છે એટલે જે કોઈ સુર્યોદય પહેલા પીપળાના ઝાડને પાણી ચઢાવશે તેને શનિની મહાદશાની અસર નહી થાય બહ્માજી એ  તથાસ્તુ કહ્યુ

પિપ્લાદે પોતાના બ્રહ્મદંડથી શનિદેવના પગ પર વાર કર્યો અને મુક્ત કર્યા  ત્યારથી  શનિદેવ ની ચાલ ધીમી થઈ ને 

" શનૈ: ચરતિ ય:  શનૈશ્ર્વર: " જે ધીમે ચાલે છે તે  શનેશ્ર્વર કહેવાયા અને આગને લીધે  તેમનું શરીર કાળુ થઈ ગયુ,  શનિદેવની કાળી મૂર્તિ અને પીપળાની પુજાનો ધાર્મિક હેતુ આ છે આગળ જઈ ને પિપ્પ્લાદે  પ્રશ્ર્ન ઉપનિષદની  રચના કરી  જે આજે પણ જ્ઞાનનો ભંડાર  મનાય છે, પીપળો 24 કલાક ઓક્સિજન, પ્રાણવાયુ  આપે છે ભગવાન વિષ્ણુએ વૃક્ષમાં હુ પીપળો છુ એવુ કહ્યુ છે અને આપણે પીપળાને ભુત સાથે જોડી દીધો.🙏🏻

👆🏻 બહુ જ જરૂરી મેસેજ છે.... જે દરેક વ્યક્તિ એ ગ્યાન માટે જરૂર વાંચવો અને ફોરવર્ડ કરવો... 🙏🏻

Friday, May 29, 2026

कर्णवेध संस्कार क्यों ?

 


कर्णवेध संस्कार क्यों?

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इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16 माह तक अथवा 3, 5 आदि विषम वर्षों में या कुल की परंपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है। इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है कि सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज संपन्न बनाती हैं। बालिकाओं के आभूषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरूप एक सशक्त माध्यम भी है।


हमारे शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। 


देवल स्मृति ने स्पष्ट कहा है कि जिस व्यक्ति के कर्णरन्ध्र में सूर्य की किरणें प्रविष्ट नहीं हो पाती, उसको देखते ही सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। यदि कर्णवेध संस्कार न किए गए ब्राह्मण को श्राद्ध में निमन्त्रित कर लिया जाए, तो निमन्त्रित करने वाला व्यक्ति असुर हो जाता है- 


'तस्मै श्राद्धं न दातव्यं, यदि चेदसुरं भवेत्।


ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेध चांदी की सुई से, शुद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरुषों का सोने की सुई से करने का विधान है।


शुभ समय में, पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के पश्चात् सूर्य के सम्मुख बालक या बालिका के कानों को निम्न मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करना चाहिए


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

 स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ -यजुर्वेद 25/21


इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करें उनमें कुंडल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभूषण पहनाने का विधान है।


मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावशील बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है। नाक में नथुनी पहनने से नासिका संबंधी रोग नहीं होते और सर्दी-खांसी में राहत मिलती है। जबकि कानों में सोने की बालियां या झुमके आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है, इससे हिस्टीरिया रोग में लाभ मिलता है।

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Tuesday, May 26, 2026

विश्व के सभी आविष्कार भारतीय ने किए थे।

 


5000 साल पहले ब्राह्मणों ने हमारा बहुत शोषण किया ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने से रोका। यह बात बताने वाले महान इतिहासकार यह नहीं बताते कि,100 साल पहले अंग्रेजो ने हमारे साथ क्या किया। 500 साल पहले मुगल बादशाहों ने क्या किया।। 


हमारे देश में शिक्षा नहीं थी लेकिन 1897 में शिवकर बापूजी तलपडे ने हवाई जहाज बनाकर उड़ाया था मुंबई में जिसको देखने के लिए उस टाइम के हाई कोर्ट के जज महा गोविंद रानाडे और मुंबई के एक राजा महाराज गायकवाड के साथ-साथ हजारों लोग मौजूद थे जहाज देखने के लिए।


उसके बाद एक डेली ब्रदर नाम की इंग्लैंड की कंपनी ने शिवकर बापूजी तलपडे के साथ समझौता किया और बाद में बापू जी की मृत्यु हो गई यह मृत्यु भी एक षड्यंत्र है हत्या कर दी गई और फिर बाद में 1903 में राइट बंधु ने जहाज बनाया।


आप लोगों को बताते चलें कि आज से हजारों साल पहले की किताब है महर्षि भारद्वाज की विमान शास्त्र जिसमें 500 जहाज 500 प्रकार से बनाने की विधि है उसी को पढ़कर शिवकर बापूजी तलपडे ने जहाज बनाई थी।


लेकिन यह तथाकथित नास्तिक लंपट ईसाइयों के दलाल जो हैं तो हम सबके ही बीच से ही लेकिन हमें बताते हैं कि भारत में तो कोई शिक्षा ही नहीं थी कोई रोजगार नहीं था।


अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन 14 दिसंबर 1799 को आये थे। सर्दी और बुखार की वजह से उनके पास बुखार की दवा नहीं थी। उस टाइम भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और अंग्रेज प्लास्टिक सर्जरी सीख रहे थे हमारे गुरुकुल में अब कुछ वामपंथी लंपट बोलेंगे यह सरासर झूठ है।


तो वामपंथी लंपट गिरोह कर सकते है ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन मेलबर्न में ऋषि सुश्रुत ऋषि की  प्रतिमा "फादर ऑफ सर्जरी" टाइटल के साथ स्थापित है।


महर्षि सुश्रुत: ये शल्य चिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।


जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद पथरी हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।


भास्कराचार्य: आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।


आचार्य कणाद: कणाद परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।


उनके अनासक्त जीवन के बारे में यह रोचक मान्यता भी है कि किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते वक्त रास्तों में पड़ी चीजों या अन्न के कणों को बटोरकर अपना जीवनयापन करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद भी प्रसिद्ध हुआ।


गर्गमुनि: गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के बारे में नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।


आचार्य चरक: ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीर विज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर में सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।


पतंजलि: आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को भी रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।


बौद्धयन: भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।


15 साल साल पहले का 2000 साल पहले का मंदिर मिलते हैं जिसको आज के वैज्ञानिक और इंजीनियर देखकर हैरान में हो जाते हैं कि मंदिर बना कैसे होगा अब हमें इन वामपंथी लंपट लोगो से हमें पूछना चाहिए कि मंदिर बनाया किसने 


ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया यह बात बताने वाले महान इतिहासकार हमें यह नहीं बताते कि सन 1835 तक भारत में 700000 गुरुकुल थे इसका पूरा डॉक्यूमेंट Indian house में मिलेगा।


भारत गरीब देश था तो फिर दुनिया के तमाम आक्रमणकारी भारत ही क्यों आए हमें अमीर बनाने के लिए।


भारत में कोई रोजगार नहीं था। भारत में पिछड़े दलितों को गुलाम बनाकर रखा जाता था लेकिन वामपंथी लंपट आपसे यह नहीं बताएंगे कि हम 1750 में पूरे दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा 24 परसेंट था और सन उन्नीस सौ में एक परसेंट पर आ गया आखिर कारण क्या था।


अगर हमारे देश में उतना ही छुआछूत थे हमारे देश में रोजगार नहीं था तो फिर पूरे दुनिया के व्यापार में हमारा 24 परसेंट का व्यापार कैसे था।


यह वामपंथी लंपट यह नहीं बताएंगे कि कैसे अंग्रेजों के नीतियों के कारण भारत में लोग एक ही साथ 3000000 लोग भूख से मर गए कुछ दिन के अंतराल में 


एक बेहद खास बात वामपंथी लंपट या अंग्रेज दलाल कहते हैं इतना ही भारत समृद्धशाली था इतना ही सनातन संस्कृति समृद्ध थी तो सभी अविष्कार अंग्रेजों ने ही क्यों किए हैं भारत के लोगों ने कोई भी अविष्कार क्यों नहीं किया।


उन वामपंथी लंपट लोगों को बताते चलें कि किया तो सब आविष्कार भारत में ही लेकिन उन लोगों ने चुरा करके अपने नाम से पेटेंट कराया नहीं तो एक बात बताओ भारत आने से पहले अंग्रेजों ने कोई एक अविष्कार किया हो तो उसका नाम बताओ और थोड़ा अपना दिमाग लगाओ कि भारत आने के बाद ही यह लोग आविष्कार कैसे करने लगे उससे पहले क्यों नहीं करते थे।

        जय सनातन धर्म की ⛳⛳⛳⛳🌷🌷🌷