Tuesday, August 18, 2026

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है साल में सिर्फ एक दिन

 उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है साल में सिर्फ एक दिन

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हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। 


इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि  नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।


नागचंद्रेश्वर मंदिर में  11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।


पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

 

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। 


लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 


यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

 

नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए रविवार रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। सोमवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे। 


नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। 

 

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।

 

नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करते है। यह सरकारी पूजा होती है। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा।

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Monday, August 17, 2026

रुद्राक्ष के एक-मुख आदि के नाम और उनका फल-:

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*🔱ॐ दुं दुर्गायै नमः।।🔱*

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*✨रुद्राक्ष के एक-मुख आदि के नाम और उनका फल-:✨*

🪷श्लोक के पश्चात हिन्दी अनुवाद किया हुआ है।🪷

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*एकवक्त्रः शिवः साक्षाद् ब्रह्महत्यां व्यपोहति।*

*अवध्यत्वं प्रतिस्त्रोतो वह्निस्तम्भं करोति च।।*

*द्विवक्त्रो हरगौरी स्याद् गोवधाद्यघनाशकृत्।*

*त्रिवक्त्रो ह्यग्निजन्माथ पापराशिं प्रणाशयेत्।।*

*चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति।*

*पञ्चवक्त्रस्तु कालाग्निरगम्याभक्ष्यपापनुत्।।*

*षड्वक्त्रस्तु गुहो ज्ञेयो भ्रुणहत्यादि नाशयेत्।*

*सप्तवक्त्रस्त्वनन्तः स्यात् स्वर्णस्येयादिपापह्रत्।।*

*विनाययकोऽष्टवक्त्रः स्यात् सर्वानृतविनाशकृत्।*

*भैरवो नववक्त्रस्तु शिवसायुज्यकारकः।*

*दशवक्त्रः स्मृतो विष्णुर्भूतप्रेतभयापहः।*

*एकादशमुखो रुद्रो नानायज्ञफलप्रदः।*

*द्वादशास्यस्तथादित्यः सर्वरोगनिबर्हणः।।*

*त्रयोदशमुखः कामः सर्वकामफलप्रदः।*

*चतुर्दशास्यः श्रीकण्ठो वंशोद्धारकरः परः।।*

(शिवरहस्य)

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*एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् 'शिव' है, जो ब्रह्महत्या को दूर करता है और समस्त स्त्रोतोंको अवध्य तथा अग्नि को रोकता है। दो मुखवाला रुद्राक्ष 'हरगौरी' (शिव-पार्वती) है, जो गोहत्या आदि पापों को दूर करता है। तीन मुखवाला रुद्राक्ष 'अग्निजन्मा' है, जो पाप-समूहों को दूर करता है। चार मुखवाला रुद्राक्ष 'ब्रह्मा' है, जो मनुष्यकी हत्या के पाप को नष्ट करता है। पाँच मुखवाला रुद्राक्ष 'कालाग्नि' है, जो अगम्य स्त्रीके साथ गमन तथा अभोज्य के भोजन करने के पाप को नष्ट करता है। छः मुखवाला रुद्राक्ष 'गुह' है, जो भ्रुण-हत्या के पाप को नष्ट करता है। सात मुखवाला रुद्राक्ष 'अनन्त' है, जो सुवर्ण की चोरी के पाप को नष्ट करता है। आठ मुखवाला रुद्राक्ष 'विनायक' है, जो समस्त प्रकार के असत्यों का नाश करता है। नौ मुखवाला रुद्राक्ष 'भैरव' है, जो शिवसायुज्य (मोक्ष) को देता है। दश मुखवाला रुद्राक्ष 'विष्णु' है, जो भूत एवं प्रेत के भय को हरण करता है। ग्यारह मुखवाला रुद्राक्ष 'रुद्र' है, जो अनेक प्रकार के यज्ञों के फल को देता है। बारह मुखवाला रुद्राक्ष 'आदित्य' है, जो समस्त प्रकार के रोगों को दूर करता है। तेरह मुखवाला रुद्राक्ष 'काम' है, जो समस्त कर्मो में सफलता देता है और चौदह मुखवाला रुद्राक्ष 'श्रीकण्ठ' है , जो वंश का उद्धार करता है।*

-- शास्त्री धवलकुमार दवे

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महामृत्युंजय/रुद्राभिषेक कामना परकअनुष्ठान विना शिववासके अधूरा''

 ''महामृत्युंजय/रुद्राभिषेक कामना परकअनुष्ठान विना शिववासके अधूरा'' #शिववास ~शिव वास देखने का सूत्र  :--- #शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियोंकी कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखनेके लिए 1 से 30 तक की संख्याको ही लेना चाहिए ।।

~~~~~शिव वास ज्ञान : 

तिथिकी गणना शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से करनी चाहिए. शिवार्चनके लिए शुभ तिथियाँ शुक्ल पक्ष में २,५,६,७,९,१२,१३,१४ और कृष्ण पक्ष में १,४,५,६,८,११,१२,१३,३० 


तिथिको दुगुना करें,उसमे पांचको जोड़ देना चाहिए, 

कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है, शिववास अच्छा बनता है । बाकि

 बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।

इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...

१.कैलाश अर्थात = सुख,

२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति, 

३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि

४.सभा = सन्ताप,

५.भोजन = पीड़ा, 

६.क्रीड़ा = कष्ट, 

७.श्मशाने = मरण ।।


##शिव-वास:--

#'1) यह ध्यान रहे कि शिव-वासका विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है...

#2)  निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है..

#3) ज्योतिíलंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, सावनके सोमवार आदि पर्वो में शिव-वासका विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है... 

#4) वस्तुत:शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिवको शीघ्र प्रसन्न करके साधकको उनका कृपापात्र बना देता है और तब उसकी (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी )  समस्याएं स्वत:समाप्त हो जाती हैं..

#5) दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से सारे (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) पाप-ताप-शाप धुल जाते हैं.


#6) कृष्णपक्षकी सप्तमी (7), चतुर्दशी (14) तथा शुक्लपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), पूíणमा (15) में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं अतएव इन तिथियों में किसी कामनाकी पूर्तिके लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होगी. इससे यजमान पर विपत्ति आ सकती है.


#7) कृष्णपक्षकी द्वितीया (2), नवमी (9) तथा शुक्लपक्षकी तृतीया (3) व दशमी (10) में महादेवजी देवताओंकी सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं. इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप (दुख) मिलेगा. 


#8)कृष्णपक्षकी तृतीया (3), दशमी (10) तथा शुक्लपक्षकी चतुर्थी (4) व एकादशी (11) में नटराज क्रीडारत रहते हैं.इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतानको कष्ट दे सकता है. 


#9)कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेव भोजन करते हैं.


--- इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक ठीक नहीं माना जाता है लेकिन निष्काम ठीक हैं।


#10) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) अवश्य सफल होता है 

और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.


#11) प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), अमावस्या तथा शुक्लपक्षकी द्वितीया (2) व नवमी (9) के दिन भगवान शिव माता गौरीके साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है.


#12) कृष्णपक्षकी चतुर्थी (4), एकादशी (11) तथा शुक्लपक्षकी पंचमी (5) व द्वादशी (12) तिथियों में भगवान शंकर कैलास पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है.


#13)कृष्णपक्षकी पंचमी (5), द्वादशी (12) तथा शुक्लपक्षकी षष्ठी (6) व त्रयोदशी (13) तिथियों में भगवान शंकर नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं… अत:इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है… 


#14) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में न्यूनाधिक्य) अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.

~~~~~~ नित्य/ नैमित्तिक मे आवश्यक नहीं होता..!! 

विशेष... सोसल मीडिया के किसी भी लेख की पुष्टि अपने आचार्य पुरोहित से अवश्य करना चाहिए..!!


शिववास ज्ञान

तिथिं च द्विगुणी कृत्य बाणैः संयोजये ततः ।

सप्तभिश्च हरेत् भागःशिववासः प्रकीर्तितः ॥


एकेन वासः कैलाशे द्वितीयं गौरी सन्निधौ । 

तृतीयं वृषभारुढ़ः सभायां च चतुर्थके  । 

पंचमे भोजने चैव क्रीड़ायां च रसात्मके । 

श्मशाने सप्तशेषे च शिववासः उदीरितः ।।  

कैलासे लभते सौख्यं  गौर्या च सुख सम्पदः । 

वृषभेऽभीष्टसिद्धिः स्यात् सभा संतापकारिणी । 

भोजने च भवेत् पीड़ा  क्रीडायां कष्टमेव च । 

श्मशाने मरणं ज्ञेयं फलमेवं विचारयेत्  ॥

वैसे ये सभी काम्यप्रयोगों के लिये है । निष्काम पूजा में कुछ भी देखनें की आवश्यकता नहीं है


Arun Dubey Jabalpur

 ❗ शिवार्चनसृति ❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️


प्र०-  शिववास का विचार कब-कब करना आवश्यक नहीं होता❓ लोग इसे परिहार के रूप में देखते हैं..?

उत्तर:- शास्त्रीय प्रमाण:- इन सभी ग्रंथों में (निर्णय सिंधु, शिवमहापुराण, नारद संहिता, शिवार्चनम्, मुहुर्त कल्पद्रुम)

श्रावणेऽधिकमासे च आर्द्रायाश्च गते रवौ।

शिवभेन्दुगते योगे, शुक्ले च व्यतिपातके॥

हरानङ्गहरीणाञ्च तिथिषु करणे चतुष्पदे।

सोमवारे शुभे ब्राह्मे प्रदोषाख्येऽभिजित्क्षणे॥

शिवरात्र्यादि पर्वेषु उत्सवेषु निमित्तके।

नित्याराधनकाले  च  शिववासं न चिन्तयेत्॥

👉अर्थात्:-  श्रावणमास में, अधिकमास (मलमास) में, जब सूर्य आर्द्रा में रहे तब, शुक्ल और व्यतिपात योगों में अष्टमी, त्रयोदशी तिथियों में,सोमवार, प्रदोष तिथि व प्रदोष काल में, अभिजित मुहूर्त में, शिवरात्रि में व नित्य आराधना में शिववास के विचार की आवश्यकता नहीं होती।

Friday, August 14, 2026

माँ विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण के बीच का संबंध??

 माँ विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण के बीच का संबंध??

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भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो हर तरह से पूर्ण हैं और जो पूर्णत: विष्णु ही है। भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में सैंकड़ों रहस्य है लेकिन बहुत कम लोग ही उन सभी रहस्यों को जानते होंगे।एक रहस्य यह भी है कि माता विंध्यवासिनी भगवान श्रीकृष्ण की क्या लगती थीं?

 

भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था।भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं।इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी।


श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया थातथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा।उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे।हालांकि गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था।इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे।श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है।

 

भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है।प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है।यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है।शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं,लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है।मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं।

Thursday, August 13, 2026

श्रीपद्मनाभ स्वामी मंदिर में दर्शन तीन द्वारों से क्यों होते हैं..?

 श्रीपद्मनाभ स्वामी मंदिर में दर्शन तीन द्वारों से क्यों होते हैं..?

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आज भी केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर को लेकर एक ऐसी अद्भुत मान्यता सुनाई जाती है, जिसे जानकर भक्तों के मन में भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और भी गहरी हो जाती है। कहा जाता है कि यहां गर्भगृह में विराजमान भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप इतना विशाल है कि भक्त एक ही स्थान से उनके संपूर्ण दर्शन नहीं कर सकते। भगवान के मुख, नाभि और चरणों के दर्शन के लिए तीन अलग-अलग द्वारों का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन सबसे रहस्यमय बात यह है कि इस विशाल स्वरूप को किसी साधारण मूर्तिकार की बनाई हुई प्रतिमा नहीं, बल्कि भगवान का स्वयंभू और दिव्य स्वरूप माना जाता है। आखिर भगवान विष्णु ने अपने एक वृद्ध भक्त के लिए इतना विराट रूप क्यों धारण किया और तीन अलग-अलग द्वारों से दर्शन की यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इसके पीछे एक बेहद भावपूर्ण कथा सुनाई जाती है।


कहा जाता है कि बहुत समय पहले विल्व मंगलम स्वामियार नाम के भगवान विष्णु के एक महान भक्त हुआ करते थे। उनका जीवन पूरी तरह भगवान की भक्ति और साधना में समर्पित था। उम्र बढ़ती गई और शरीर कमजोर होता गया, लेकिन भगवान के प्रति उनका प्रेम और विश्वास कभी कम नहीं हुआ। वे दिन-रात अपने आराध्य का स्मरण करते और मन ही मन यही इच्छा रखते कि जीवन के अंतिम समय में उन्हें भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त हो जाएं। उनकी इसी अटूट भक्ति को देखकर भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त पर विशेष कृपा करने का निश्चय किया। प्रभु ने सोचा कि इस भक्त के प्रेम को केवल दूर से देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वयं उसके पास जाकर उसकी भक्ति का आनंद लेना चाहिए।


एक दिन भगवान विष्णु ने एक छोटे, मासूम और बेहद चंचल बालक का रूप धारण किया और विल्व मंगलम स्वामियार के पास पहुंच गए। बालक के चेहरे पर ऐसी मासूम मुस्कान थी कि वृद्ध स्वामी का मन तुरंत उसकी ओर आकर्षित हो गया। बालक ने बड़ी सरलता से कहा कि वह उनकी पूजा में सहायता करना चाहता है। वह उनके लिए फूल लाएगा, पूजा की सामग्री सजाएगा और उनके छोटे-बड़े कामों में हाथ बंटाएगा। लेकिन उसने एक शर्त भी रखी कि स्वामी उसे कभी डांटेंगे नहीं। वृद्ध भक्त ने बालक की बात स्वीकार कर ली। उन्हें क्या पता था कि उनके सामने खड़ा यह साधारण सा बालक कोई और नहीं, बल्कि स्वयं उनके आराध्य भगवान विष्णु थे।


इसके बाद भगवान की अद्भुत लीला शुरू हुई। वह बालक कभी पूजा के फूलों से खेलने लगता, कभी स्वामी की साधना के बीच शरारत करता और कभी उनके ध्यान में बैठते ही उन्हें हंसाने की कोशिश करता। वृद्ध स्वामी पहले तो उसकी शरारतों को मुस्कुराकर सहन करते रहे, क्योंकि उन्हें बालक से विशेष स्नेह हो गया था। लेकिन धीरे-धीरे बालक की चंचलता बढ़ती गई। एक दिन जब स्वामी गहरी साधना में बैठे थे, तब बालक ने फिर उनकी साधना भंग कर दी। बार-बार ध्यान टूटने से वृद्ध स्वामी स्वयं को रोक नहीं पाए और क्रोध में उन्होंने उस बालक को कठोर शब्द कह दिए। जैसे ही उनके मुख से वे शब्द निकले, बालक उसी क्षण वहां से गायब हो गया।


बालक के अचानक गायब होते ही स्वामी को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे व्याकुल होकर उसे चारों ओर खोजने लगे। तभी उन्हें एक दिव्य संकेत मिला कि यदि वे अपने प्रभु के दर्शन करना चाहते हैं तो उन्हें जंगल की ओर जाना होगा। वृद्ध भक्त समझ गए कि जिस बालक को उन्होंने साधारण समझकर डांट दिया था, उसके पीछे कोई गहरा रहस्य अवश्य है। उनकी आंखों से आंसू निकल आए। उन्होंने मन ही मन भगवान से क्षमा मांगी और बिना देर किए घने जंगल की ओर निकल पड़े। उम्र अधिक थी, शरीर कमजोर था, रास्ता कठिन था, लेकिन भक्ति के आगे कोई कठिनाई बड़ी नहीं लग रही थी।


कहा जाता है कि वे कई दिनों तक जंगल में अपने प्रभु की खोज करते रहे। न भोजन की चिंता थी, न पानी की और न ही अपने शरीर की। उनके मन में केवल एक ही इच्छा थी कि किसी भी तरह उस दिव्य बालक को फिर से देख सकें। तीसरे दिन उनकी दृष्टि एक विशाल वृक्ष के पास पहुंची, जहां उन्हें वही बालक दिखाई दिया। वृद्ध स्वामी उसे देखकर आनंद से भर उठे और उसकी ओर बढ़ने लगे। लेकिन जैसे ही वे उसके पास पहुंचने वाले थे, वह बालक अचानक उसी विशाल वृक्ष के भीतर समा गया। स्वामी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही पूरा वातावरण दिव्य ऊर्जा से भर उठा और देखते ही देखते वह विशाल वृक्ष अद्भुत तरीके से फट गया।


वृक्ष के भीतर से जो स्वरूप प्रकट हुआ, उसे देखकर वृद्ध स्वामी की आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं। उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु का विराट स्वरूप प्रकट हो चुका था। प्रभु अनंत शेषनाग पर विराजमान थे और उनका दिव्य स्वरूप इतना विशाल था कि वृद्ध भक्त के लिए उसे एक ही दृष्टि में देख पाना संभव नहीं था। चारों ओर मानो दिव्य प्रकाश फैल गया था। स्वामी की आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगे। जिस भगवान के दर्शन के लिए उन्होंने वर्षों तक भक्ति की थी, आज वही भगवान उनके सामने साक्षात खड़े थे। लेकिन प्रभु का विराट स्वरूप इतना विशाल था कि उनके लिए संपूर्ण रूप को एक साथ देखना कठिन हो गया।


वृद्ध भक्त ने हाथ जोड़कर भगवान से विनम्र प्रार्थना की कि प्रभु, मेरी आंखें आपके इस अनंत स्वरूप का पूर्ण दर्शन करने में समर्थ नहीं हैं। मैं आपके मुख का दर्शन करूं तो आपके चरण मेरी दृष्टि से दूर हो जाते हैं और चरणों को देखूं तो आपका मुख दिखाई नहीं देता। कृपा करके अपने इस विराट स्वरूप को मेरे लिए छोटा कर दीजिए, ताकि मैं अपने आराध्य के संपूर्ण स्वरूप का दर्शन कर सकूं। अपने भक्त की यह करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना विराट स्वरूप छोटा कर लिया। लेकिन भगवान का स्वरूप फिर भी इतना विशाल रहा कि भक्त एक ही स्थान से उनका संपूर्ण दर्शन नहीं कर सकता था।


कहा जाता है कि इसी दिव्य स्वरूप की स्मृति से आगे चलकर तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर की महान परंपरा जुड़ी। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु अनंत शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान माने जाते हैं और भक्तों को उनके दर्शन तीन अलग-अलग द्वारों से करने पड़ते हैं। पहले द्वार से भगवान के दिव्य मुख और ऊपरी स्वरूप के दर्शन होते हैं, दूसरे द्वार से उनके नाभि प्रदेश के दर्शन किए जाते हैं, जहां से कमल पर विराजमान ब्रह्मा का दर्शन माना जाता है, और तीसरे द्वार से भगवान के चरणों के दर्शन होते हैं। इस प्रकार भक्त तीनों द्वारों से भगवान के विराट स्वरूप को अलग-अलग भागों में निहारते हैं।


इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यही है कि भगवान अपने भक्त की भावना के सामने स्वयं को सीमित करने में भी संकोच नहीं करते। जिस प्रभु का स्वरूप अनंत है, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, वही अपने भक्त की छोटी सी प्रार्थना पर अपना विराट रूप छोटा कर लेते हैं। विल्व मंगलम स्वामियार ने भगवान से धन, राज्य या सांसारिक सुख नहीं मांगा था। उन्होंने केवल अपने आराध्य के दर्शन मांगे थे और उनकी इसी निष्कलुष भक्ति ने भगवान को उनके सामने प्रकट होने के लिए विवश कर दिया। इसलिए भक्तों के लिए यह कथा केवल एक मंदिर की रहस्यमयी कहानी नहीं, बल्कि भक्ति और भगवान के बीच के उस अद्भुत संबंध का प्रतीक है, जहां सच्चे प्रेम के सामने स्वयं भगवान भी अपने भक्त के अनुरूप हो जाते हैं। आज भी जब भक्त श्री पद्मनाभ स्वामी के गर्भगृह में उन तीनों द्वारों से दर्शन करते हैं, तो उनके मन में यही भावना होती है कि वे केवल एक प्रतिमा के नहीं, बल्कि उस अनंत भगवान के दर्शन कर रहे हैं, जिनके विराट स्वरूप को देखने के लिए स्वयं एक भक्त ने कभी प्रेम से प्रार्थना की थी। यही कारण है कि श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर की यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के लिए रहस्य, आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम बनी हुई है।

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Friday, August 7, 2026

ब्रह्मा जी की रहस्यमयी रचना तिलोत्तमा

 ब्रह्मा जी की रहस्यमयी रचना तिलोत्तमा

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क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहास में एक ऐसी अप्सरा भी हुई, जिसने बिना धनुष उठाए, बिना तलवार चलाए और बिना एक भी युद्ध लड़े दो ऐसे राक्षसों का अंत कर दिया जिन्हें देवता भी पराजित नहीं कर सके थे? एक ऐसा दिव्य सौंदर्य जिसके दर्शन मात्र से स्वयं भगवान शिव ने चार दिशाओं में चार मुख प्रकट कर लिए और देवराज इंद्र ने अपने शरीर पर हजारों नेत्र धारण कर लिए। यह केवल किसी रूपवती स्त्री की कथा नहीं, बल्कि बुद्धि, सौंदर्य और दिव्य योजना की वह अद्भुत गाथा है जिसने तीनों लोकों को विनाश से बचाया। यह कथा है ब्रह्मा जी की सबसे रहस्यमयी और अद्वितीय रचना—तिलोत्तमा की।


महाभारत के आदि पर्व में वर्णन मिलता है कि प्राचीन काल में सुंद और उपसुंद नाम के दो असुर भाई रहते थे। दोनों में ऐसा प्रेम था जिसे देखकर लोग आश्चर्य करते थे। वे साथ खाते, साथ सोते, साथ युद्ध करते और एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रहते थे। उनका विश्वास था कि संसार की कोई भी शक्ति उन्हें अलग नहीं कर सकती। इसी अटूट प्रेम और एकता के बल पर उन्होंने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।


दोनों भाई वर्षों तक घोर तप करते रहे। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। दोनों असुरों ने अमरत्व की इच्छा प्रकट की, लेकिन ब्रह्मा जी ने स्पष्ट कहा कि जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। तब दोनों ने अत्यंत चतुराई से दूसरा वरदान मांगा—तीनों लोकों में कोई भी देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य या किसी भी प्रकार का प्राणी उनका वध न कर सके। यदि मृत्यु आए भी, तो केवल एक-दूसरे के हाथों आए।


ब्रह्मा जी जानते थे कि यही वरदान भविष्य में उनके विनाश का कारण बनेगा। उन्होंने वरदान प्रदान कर दिया। वरदान मिलते ही सुंद और उपसुंद का अहंकार आसमान छूने लगा। वे स्वयं को अजेय समझने लगे। उन्होंने धरती पर आतंक मचाना शुरू कर दिया। नगर जलने लगे, ऋषियों के आश्रम नष्ट होने लगे, यज्ञ बाधित होने लगे और निर्दोष लोगों का जीवन संकट में पड़ गया। धीरे-धीरे उन्होंने स्वर्ग पर भी आक्रमण कर दिया। देवताओं की सेनाएं बार-बार पराजित होने लगीं। देवराज इंद्र का सिंहासन डगमगाने लगा और देवताओं के मन में भय घर कर गया।


सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और विनती की कि अब केवल आप ही इस संकट का समाधान कर सकते हैं। ब्रह्मा जी कुछ क्षण ध्यानमग्न रहे। फिर उन्होंने देव शिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया और कहा—ब्रह्मांड के प्रत्येक रत्न, प्रत्येक पुष्प, प्रत्येक नदी, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक किरण और प्रत्येक सुंदर वस्तु का तिल-तिल अंश लेकर ऐसी दिव्य स्त्री का निर्माण करो जिसकी सुंदरता के सामने स्वयं स्वर्ग की अप्सराएं भी फीकी पड़ जाएं।


विश्वकर्मा ने दिव्य शक्तियों से एक अद्भुत रूप की रचना की। उसके नेत्र कमल की पंखुड़ियों जैसे, मुख पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा, केश वर्षा की काली घटाओं जैसे और तेज हजारों सूर्य के समान था। क्योंकि उसके निर्माण में संसार की प्रत्येक सुंदर वस्तु का तिल-तिल अंश लिया गया था, इसलिए उसका नाम रखा गया—तिलोत्तमा।


जब तिलोत्तमा पहली बार देवसभा में आई, तो पूरा स्वर्ग उसकी दिव्य आभा से आलोकित हो उठा। सभी देवता कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए। कहा जाता है कि जब वह भगवान शिव की परिक्रमा करने लगी, तब शिवजी ने मर्यादा का पालन करते हुए अपना मुख नहीं घुमाया। किंतु उसकी दिव्यता का दर्शन करने के लिए उनके चारों दिशाओं में चार मुख प्रकट हो गए। वहीं देवराज इंद्र ने उसके प्रत्येक रूप को देखने की इच्छा से अपने शरीर पर हजारों नेत्र धारण कर लिए। पूरा देवलोक उस अद्भुत दृश्य का साक्षी बन गया।


इसके बाद ब्रह्मा जी ने तिलोत्तमा को एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य सौंपा। उन्होंने कहा—तुम्हें किसी युद्ध में नहीं उतरना है। तुम्हें केवल उन दोनों भाइयों के भीतर छिपे अहंकार और वासना को जगाना है। वही उनके विनाश का कारण बनेगी।


तिलोत्तमा विंध्याचल पर्वत की ओर चली, जहां सुंद और उपसुंद विजय का उत्सव मना रहे थे। मदिरा के नशे में चूर दोनों भाई हंसी-ठिठोली कर रहे थे। तभी अचानक उनकी दृष्टि तिलोत्तमा पर पड़ी। जैसे ही उन्होंने उस अलौकिक रूप को देखा, दोनों की सांसें थम गईं। जो भाई आज तक किसी वस्तु के लिए नहीं लड़े थे, वे पहली बार एक ही स्त्री को पाने की इच्छा से बेचैन हो उठे।


सुंद तुरंत आगे बढ़ा और बोला—यह मेरी होगी। उसी क्षण उपसुंद ने उसका दूसरा हाथ पकड़ लिया और कहा—नहीं, यह मेरी पत्नी बनेगी। दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। तिलोत्तमा शांत खड़ी रही। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, मानो उसे पहले से पता हो कि आगे क्या होने वाला है।


कुछ देर बाद उसने मधुर स्वर में कहा—मैं किसी कायर या दुर्बल पुरुष की पत्नी नहीं बन सकती। मैं उसी का वरण करूंगी जो संसार में सबसे अधिक बलवान और श्रेष्ठ योद्धा होगा। यदि तुम दोनों में से कोई स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, तो पहले यह सिद्ध कर दो।


बस यही वह क्षण था जिसका ब्रह्मा जी को इंतजार था। दोनों भाइयों का विवेक समाप्त हो चुका था। उन्होंने गदा उठाई और एक-दूसरे पर टूट पड़े। वह युद्ध इतना भयंकर था कि पर्वत कांप उठे, वृक्ष उखड़ गए और धरती थर्रा गई। घंटों तक चलता रहा यह भीषण संघर्ष। अंततः दोनों ने एक-दूसरे पर अंतिम प्रहार किया और उसी क्षण दोनों धराशायी हो गए। ब्रह्मा जी का वरदान सत्य हुआ। जिन्हें कोई देवता नहीं मार सकता था, वे अपने ही हाथों मारे गए।


युद्ध समाप्त होते ही तिलोत्तमा ने शांत भाव से दोनों के निर्जीव शरीरों की ओर देखा। उसने कोई विजय का उत्सव नहीं मनाया, क्योंकि उसका उद्देश्य किसी का अपमान नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करना था। उसी समय आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा की। ऋषियों ने राहत की सांस ली। स्वर्ग में फिर से शांति लौट आई और तीनों लोकों में धर्म की पुनः स्थापना हुई।


तिलोत्तमा ने संसार को यह संदेश दिया कि हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता। कई बार बुद्धि, धैर्य और सही समय पर लिया गया निर्णय सबसे बड़े योद्धा से भी अधिक शक्तिशाली होता है। जिस कार्य को देवताओं की सेनाएं नहीं कर सकीं, उसे एक दिव्य नारी ने अपनी बुद्धिमत्ता से पूरा कर दिखाया। यही कारण है कि तिलोत्तमा का नाम केवल अद्वितीय सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में आज भी सनातन इतिहास में अमर है।


हर हर महादेव 

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Saturday, July 11, 2026

भगवान् के नाम

 भगवान् के नाम

१. सहस्रनाम-

वेद तथा पुराणों में ब्रह्म या भगवान् के अनेक नाम हैं। सहस्र नामों का संग्रह महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय १४९ में है, जिसे विष्णु सहस्रनाम कहते हैं। ये ऋषियों द्वारा गुणों के अनुसार कहे गये हैं। इसका अर्थ मध्व सम्प्रदाय के राघवेन्द्र स्वामी ने किया है कि ऋग्वेद के १००० सूक्तों के प्रतीक १००० नाम हैं। 

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।

ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१३॥

गीता में भी कहा है कि वेद में भगवान् का ही वर्णन है-वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यं, वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् (गीता, १५/१५)

बलदेव विद्याभूषण (ओड़िशा में बालेश्वर जिला में रेमुना ग्राम में जन्म-रमना शक्तिपीठ-देवी भागवत पुराण, ७/३०/६७) ने अर्थ किया है कि इससे ४ प्रकार के पुरुषार्थ (भूति) की सिद्धि होती है। विष्णु सहस्रनाम के अन्त में स्पष्ट लिखा है कि इसके पाठ से कोई अशुभ नहीं होता, ब्राह्मण को वेद का ज्ञान होता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन से समृद्ध होता है, शूद्र सुखी होता है, वाञ्छित फल, यश, समाज में मुख्य स्थान, परम श्रेय मिलता है (सहस्रनाम, १२२-१३२)।

विष्णु सहस्रनाम मन्त्र मे वेदव्यास ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द, कृष्ण देवता हैं, अमृतांशूद्भव बीज, कृष्ण शक्ति हैं, त्रिसामा (विष्णु सहस्रनाम का एक नाम) हृदय है, जिसकी शान्ति इसका विनियोग (उद्देश्य) है।

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः।

छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥

अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकीनन्दनः।

त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते॥

इसकी भूमिका के अनुसार वेद के ३ अर्थ, महाभारत के १० अर्थ, तथा विष्णु सहस्रनाम के १०० अर्थ हैं।

त्रयार्थाः सर्व वेदेषु दशार्थाः सर्व भारते। विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तर शतार्थकम्॥

सहस्रनाम या वेद में कई नाम एक से अधिक बार हैं, उनके भिन्न अर्थ हैं। प्रति सन्दर्भ कुछ मुख्य अर्थों की चर्चा की जाती है।

२. विविध ब्रह्म-इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)

यहां अग्नि तथा गरुड के २-२ उल्लेख हैं।

(१) अग्नि १-अग्रि या अग्रणी- आगे चलने वाला, नेता-

स यत् अस्य सर्वस्य अग्रं असृज्यत, तस्मात् अग्रिः, अग्रिः ह वै तं अग्निः इति आचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११, २/२/४२)

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् (ईशावास्य उपनिषद्, १८, ऋक्, १/१८९/१, वाज. यजु, ५/३६, ७/४३, ४०/१६ आदि)  

= हे अग्रणी या नेता, हमें अच्छे मार्ग से ले चलो।

अग्निं ईळे पुरोहितम् (ऋक्, १/१/१) = सामने या आगे हित के लिए स्थित अग्नि की उपासना करते हैं। (पुरोहित = सामने रह कर हित करे, वकील, प्रतिनिधि आदि)।

लोकभाषा में इसे अग्रसेन कहते थे। भारत के शासक या नेता को अग्नि कहते थे। वह विश्व का भरण पोषण करता था, अतः इस अग्नि को भरत कहते थे, जिससे इस देश का नाम भारत हुआ। 

अग्नेर्महाँ ब्राह्मण भारतेति । एष हि देवेभ्य हव्यं भरति । (तैत्तिरीय संहिता २/५/९/१, तैत्तिरीय ब्राह्मण३/५/३/१,  शतपथ ब्राह्मण १/४/१/१) 

= ब्रह्मा ने अग्नि को महान् कहा था क्योंकि यह देवों को भोजन देता है।

(२) अग्नि २-सघन ऊर्जा या पदार्थ-आग, वह्नि-धूः असि, धूर्वं तं योऽस्मान् धूर्वति (वाज. यजु, १/८, तैत्तिरीय सं, १/१/४/१ आदि) = धू धू शब्द कर जलना, ध्वस्त करना।

अग्निः वै ज्योति रक्षोहा (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/३४)

अग्निः वा अर्कः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/४, १०/६/२/५)

तेज रूप में सभी देवता अग्नि हैं-

सर्व देवत्यो अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/२८)

पृथ्वी (घनीभूत पदार्थ या ऊर्जा)-

इयं पृथिवी हि अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/१४, ६/१/१/२९ आदि)

(३) इन्द्र-सर्वव्यापी-नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६) 

यह शून्य में भी वर्तमान है, अतः इसे शुनः इन्द्र कहते हैं इस इन्द्र से इद्दर, ईथर (Ether) हुआ है, जो शून्य में भी वर्तमान है। 

शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम्। (ऋक्, ३/३०/२२)। 

जैसे इन्द्र शून्य में भी है उसी प्रकार कुत्ता खाली घर देख कर उसमें घुस जाता है, अतः उसे श्वान (शुनः) कहते हैं। अकेली स्त्री को देखकर युवक (युवन्) भी उसके पीछे लग जाता है, जैसे इन्द्र गौतम पत्नी को अकेले देख कर उनके घर में घुस गये थे। अतः श्वन्, युवन्, मघवन्-इन ३ शब्दों के रूप एक जैसे चलते हैं- श्वयुवमघोनामतद्धिते (पाणिनि अष्टाध्यायी, ६/१/३३) 

सरिस श्वान मघवान जुबानू॥ (रामचरितमानस, २/३०१/८)

शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्षिता गौतमधर्मपत्नी।

विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह॥

इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है।

(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)

इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)

(३-४) मित्र-वरुण-इनके कई अर्थ हैं। जिस ऊर्जा से निर्माण होता है वह मित्र है, जिससे निर्माण नहीं होता वह वरुण है। वरुण वाः (वारि) का क्षेत्र है जहां जल जैसा बहुत विरल पदार्थ फैला हुआ है। उसके कुछ भाग में निर्माण होता है, वह मित्र है। आकाश में ब्रह्माण्ड के अप् का क्षेत्र वरुण है। सौर मण्डल के भीतर ऊर्जा का प्रसार मित्र है। आकाश के ३ धामों में मूल स्वरूप अन्तरिक्ष में दीखता है। मूल रूप से आदि हुआ था, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। ब्रह्माण्ड में १०० अरब ताराओं के बीच का स्थान वरुण है। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है। ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्ड में तारा संख्या की गणना शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) में है।

ब्रह्मैव मित्रः (शतपथ बाह्मण, ४/१/४/१, ५/३/२/४)

मित्रः (एवैनं) सत्यानां (सुवते(। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/४/१)

क्रिया भाग दक्षिण तथा निष्क्रिय भाग वाम हस्त है। अतः मित्र को दक्षिण और वरुण को वाम कहा है।

मैत्रो वै दक्षिणः। वरुणः सव्यः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/१०/१)

अप्सु वै वरुणः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/५/६) 

आभिर्वा अहमिदं सर्वं आप्स्यामि यदिदं किं चेति। तस्मादापोऽभवन्। तदपामप्त्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२)

ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वातिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त। तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते। ता भीता अब्रुवन्। भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति। यच्च वृत्वातिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्। तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/७)

सबसे ऊपर अर्यमा-एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेः दिक् तदेष उपरिष्टाद् अर्यम्णः पन्थाः। (शतपथ ब्राह्मण, ५/५/१/१२)

तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।

ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)

(५-६) सुपर्ण-गरुत्मान्-इनका प्रायः एक साथ प्रयोग है। सुपर्ण इसके अंगों का समन्वय है, गरुत्मान् इसकी क्रिया है।

सुपर्ण चिति मूल बलों के मिलन से बना रूप है। विश्व के ४ मूल बल पक्षी के शरीर कहे गये हैं। इसके २ पक्ष (पंख) साम्य हैं। विषमता पुच्छ है। 

त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त। स एतान् सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्-यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्, यदवाङ् नाभेस्तौ द्वौ। पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः। प्रतिष्ठैक आसीत्। अथ या एतेषां पुरुषाणां श्रीः, यो रस आसीत्-तमूर्ध्व समुदौहन्। तदस्य शिरोऽभवत्। स एवं पुरुषः प्रजापतिरभवत्। स यः सः पुरुषः-प्रजापतिरभवत्, अयमेव सः, योऽयमग्निश्चीयते(कायरूपेण-शरीररूपेण-मूर्त्तिपिण्डरूपेण-भूतपिण्डरूपेण)। स वै सप्तपुरुषो भवति। सप्तपुरुषो ह्ययं, पुरुषः-यच्चत्वार आत्मा, त्रयः पशुपुच्छानि। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/२-६)

विश्व में ३ प्रकार के ७ लोकों का मिलन भी सुपर्ण के २१ पर्ण हैं। 

एकविंशतिः हि इमानि प्रत्यञ्चि सुपर्णस्य पत्त्राणि भवन्ति। (ऐतरेय आरण्यक, १/४/२)

ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः॥ (अथर्व, शौनक संहिता, १/१/१)

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्। (पुरुष सूक्त, यजुर्वेद, ३१/१५)

सुपर्ण रूप १, २ या ३ हैं-

एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे । (ऋक्, १०/११४/४)

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥

(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)

(इनमें एक सुपर्ण निर्विशेष ब्रह्म है, अन्य कर्त्ता ब्रह्म है। व्यक्ति स्तर पर ये आत्मा-जीव हैं।

ऋग्वेद (१०/११४) त्रिसुपर्ण सूक्त है। तैत्तिरीय आरण्यक, अनुवाक् (३८-४०) भी त्रिसुपर्ण सूक्त है।तीन सुपर्ण गायत्री मन्त्र के ३ पादों की तरह हैं। प्रथम पाद में सृष्टि होती है, जो ७ अंगों वाले गरुड़ के विभिन्न स्तरों द्वारा होता है। द्वितीय पाद में युग्म सुपर्णों द्वारा सृष्टि क्रिया चलती है, वह पालनकर्ता विष्णु का वाहन हुआ। तृतीय पाद आकाश की सृष्टि तथा उसकी क्रियाओं का मनुष्य पर प्रभाव है। यह प्रभाव पहले मन पर होता है जिसे वेद में धीयोग कहा गया है। मन से बाकी शरीर नियन्त्रित होता है। यह त्रिसुपर्ण है, जिसका मेधा जनन के लिये प्रयोग होता है। मेधा के ३ स्तर हैं-मन, बुद्धि तथा उसका स्थान चित्त आकाश।

गरुड गतिशील रूप है, जिसे विष्णु का वाहन कहा गया है। इसकी गति को छन्द कहा गया है-

छन्दोमयेन गरुड़ेन समुह्यमानश्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, ८/३/३१)

छन्द रूपी गरुड़ को वयः छन्द या मूर्धा वयः छन्द कहा गया है (वाजसनेयि संहिता, १५/४-५)। छन्द माप है। काव्य में अक्षर माप, दूरी, गति या काल की माप तथा मात्रा की माप भी छन्द हैं। गायत्री पृथ्वी तथा उससे बड़े लोकों की माप है, जो मनुष्य से आरम्भ कर क्रमशः १-१ कोटि अर्थात् २ घात २४ गुणा  बड़े हैं (गायत्री २४ अक्षर का छन्द है)। एक सामान्य समुद्र में जल विन्दुओं की संख्या १० घात १४ है, अतः इस संख्या को समुद्र या समुद्रिय छन्द कहते हैं। मनुष्य की तुलना में पृथ्वी का भार २ घात ८० है, अतः अशीति का अर्थ ८० तथा भोजन है। काल माप-महिदास ऐतरेय को उद्धृत कर छान्दोग्य उपनिषद् (३/१६/१-७) में कहा है कि जीवन यज्ञ को उसने ३ सवन में विभाजित कर ११६ वर्ष की आयु प्राप्त की। (१) प्रथम सवन गायत्री के २४ अक्षर अनुसार २४ वर्ष तक प्राण का विकास किया, (२) द्वितीय माध्यन्दिन सवन त्रिष्टुप् (११ x ४ अक्षर) में प्राणों से परिश्रम कर रोया, रोने वाला रुद्र = ११। (३) तृतीय सवन जगती (१२ x ४ = ४८ अक्षर) ६८ वर्ष के बाद आदित्य (१२) रूपी प्राणों का रक्षण करता है। 

गरुड़ का प्रभाव क्षेत्र तथा उससे प्राप्त बुद्धि वाक् सुपर्णी है-सुपर्णी (माया) वागेव सुपर्णी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/२) 

महर्षि दैवरात् ने वाक् सुधा (पृष्ठ २९०) में सुपर्णी वाक् के ३ खण्ड कहे हैं जो त्रिसुपर्ण का एक अर्थ है-

सौपर्णी परसंज्ञया सुरसरित् सा वाक् सुपर्णी त्रिधा, वर्णाभ्यां डयते सुपर्ण इव सा माता सुपर्णाभिधा।

चिज्ज्योतिः सुहिरण्यरूपतनुभृत् सत्त्वात्मसौपर्णिका, पञ्चाशीह षडुत्तराऽतति मनःप्राणात्मचित्कर्षिका॥२६॥

(७) मातरिश्वा-मातरिश्वा-अप् में पदार्थों के मिश्रण के लिए गति आवश्यक है, जिससे नया निर्माण है। इस गति या वायु से माता जैसा निर्माण होता है, अतः इसे मातरिश्वा वायु कहते हैं।

तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (वाज. यजु, ४०/४, ईशावास्य उपनिषद्, ४)

यावन् मात्रं उषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो वसते मातरिश्वः (ऋक्, १०/८८/१९)

(८) यम-विष्णु सहस्रनाम में यम (१६२) नियम (८६४) तथा अयम (८६६) नाम हैं। ऋग्वेद में यम सूक्त (१०/१४), तथा पितर सूक्त (१०/१५) हैं। अथर्व वेद, काण्ड १८ में ४ बड़े सूक्त पितृमेध हैं, जिनमें २८३ मन्त्र हैं।

पृथ्वी पर विवस्वान् (सूर्य,११वें व्यास) के २ वंशज थे-भारत के सूर्य वंशी तथा भारत के वरुण खण्ड (इराक-अरब) की पश्चिम सीमा पर यम थे (यमन, अम्मान, सना-संयमनी आदि-मत्स्य पुराण, १२४/२०-३२)। वहां के यम के पास नचिकेता ज्ञान के लिए गया था (कठोपनिषद्, वल्ली १/१)। ब्रह्म रूप में अर्थ-

(क) सृष्टि का लय रूप-जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्म सूत्र, १/१/२)-जिससे जगत् का जन्म, वृद्धि, क्षरण, मृत्यु आदि हो वह यम है। सृष्टि के आरम्भ में एक ही ऋषि था जिसे पूषा (पोषण करने वाला) या अत्रि (जिसका ३ में विभाजन नहीं हुआ है) कहते थे। स्रोत रूप ब्रह्म सूर्य है (विष्णु सहस्रनाम, ८८३), परिणति या अन्त रूप यम है। सूर्य से यम रूप तक की सृष्टि क्रिया (प्राजापत्य) एकर्षि पूषा से होती है।

पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह। (ईशावास्य उपनिषद्, १६)

सौर मण्डल में सौर वायु इषा है (वाज. यजु, १/१), इषा-दण्ड की परिधि ९,००० योजन या सौर व्यास है (यूरेनस कक्षा तक- विष्णु पुराण, २/८/३)। वह अन्धकार भाग यम है। प्रकाशित भाग शनि धर्म है। शनि वलय के ३ क्षेत्रों को पीलुमती, उदन्वती तथा प्रद्यौ कहा गया है-उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा। तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते॥ (अथर्व १८/२/४८)।

(ग) नियन्ता-नियन्ता (ऽ) नियमो (७) यमः (सहस्रनाम, १०५)। ब्रह्म का ईश्वर रूप सभी भूतों के हृदय में रह कर नियन्त्रण करता है-

ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता, १८/६१)

नियन्त्रण के नियम भी वही बनाते हैं। विकल्प से अनियम का अर्थ है कि वह स्वयं किसी नियम से बन्धे नहीं है। योग सूत्र (२/३०-३४) के अनुसार ५ यम निषेध रूप हैं, १० नियम पालन रूप हैं।

(घ) पितर रूप-पितर का सामान्य अर्थ है माता-पिता। व्यापक अर्थ में सभी पूर्वज पितर हैं। सभी भूतों के उत्पत्ति स्रोत पितर हैं जो ५० से अधिक प्रकार के हैं। 

ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देव-दानवाः (मनु स्मृति, ३/२०१)।

(ङ) मृत पितर-मृत्यु के बाद कई प्रकार के पितर होते हैं, उन्हीं से पुनः जन्म होता है। उदाहरण-

अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः।

तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥६॥

प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।

उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्॥७॥ (ऋक्, १०/१४)

३. जगन्नाथ रूप-

तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०) 

इसमें ४ नाम हैं-जगन्नाथ, वासुदेव, वृषाकपि, पुरुष।

(१-२) जगन्नाथ-विष्णु-सुप्त रूप विष्णु तथा जाग्रत रूप जगन्नाथ है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय १-

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥

विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥

विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥

जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥

प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥

सूर्य जीवन का आधार रूप में विष्णु का रूप है। यह आकर्षण द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में धारण किये हुए है। यह विष्णु रूप है। उससे जो किरण तथा तेज निकलता है, वह इन्द्र है। किरणों द्वारा यह जीवन का पालन करता है वह जाग्रत रूप या जगन्नाथ है। 

(३) विश्वनाथ-लोकभाषा में जगत् तथा विश्व समान हैं। किन्तु विष्णु को जगन्नाथ, तथा शिव को विश्वनाथ कहते हैं। वेद विज्ञान में इनके अलग अर्थ हैं। विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। इसका संचालक चेतन तत्त्व जगत् है जो अव्यक्त या अदृश्य है। 

जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद् ४/५०)

वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)

अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । 

विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)

(४) वासुदेव-सूर्य सिद्धान्त (१२/१२-२५) में पाञ्चरात्र, सांख्य, पुराण तथा वेद समन्वित सृष्टि क्रम है। हिरण्यगर्भ से पहले वासुदेव हुए। उसके बाद क्रम से संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध हुए। यह भागवत पुराण में भगवान कृष्ण, उनके भाई, पुत्र तथा पौत्र के भी नाम हैं। पर इस वर्णन से लगता है कि सृष्टि का आधार प्रथम उत्पन्न आकाश ही वासुदेव रूप है। वास = रहने का स्थान। संकर्षण = परस्पर आकर्षण। आकर्षण के केन्द्र के रूप में स्वयं वासुदेव ही कृष्ण हैं। पर सम् उपसर्ग का अर्थ है सभी पिण्डों के आकर्षण का योग। परस्पर आकर्षण द्वारा ही ब्रह्माण्ड, ग्रह, नक्षत्र आदि रूपों में पदार्थ एक सीमा के भीतर गठित हुआ। प्रद्युम्न = प्रकाशित या तेज का स्रोत। यह स्पष्ट रूप से सूर्य को कहा गया है जो तेज के कारण संसार की आत्मा है और त्रयी रूप में ऋक् (पिण्ड), यजु (जीवन), साम (तेज) तथा आधार (अथर्व) है। उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है जो अनन्त प्रकार की है। इसका विभाजन १२ प्रकार के आदित्यों से हुआ। 

(५) वृषाकपि- पण्डित मधुसूदन ओझा ने इन्द्र विजय, अध्याय ३ में वृषाकपि को इन्द्र का मित्र असुर राज कहा है, जो एक साथ मद्यपान करते थे (ऋक् सूक्त, १०/८६)। ब्रह्म रूप में वृषा को इन्द्र, सूर्य, हिङ्कार या व्यक्ति रूप में मन, आत्मा कहा है।

इन्द्रो वृषा (शतपथ ब्राह्मण, १/४/१/३३)

समग्निरिध्यते वृषा (ऋक्, ३/२७/१३)-शतपथ ब्राह्मण (१/४/१/२९)

वृषा अग्नि रूप स्रष्टा है, उसका स्थान या वेदी योषा (स्त्री) है-

योषा वै वेदिः वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)

वृषा हि मनः (शतपथ ब्राह्मण, १/४/४/३)

वृषा हिङ्कारः (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, ३/२३)-सृष्टि का आरम्भ ब्रह्म के विभिन्न रूपों द्वारा होता है-कामना (निर्विशेष ब्रह्म-सो अकामयत्-तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/४), ईक्षा (सृष्टि इच्छा-स इक्षांचक्रे-प्रश्नोपनिषद्, ६/३, स ईक्षत-ऐतरेय उपनिषद्, १/३), हिङ्कार (कार्य आरम्भ या प्रस्ताव-छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय २ में विविध हिङ्कार)।

सृष्टि का आरम्भ जल जैसे विरल पदार्थ से हुआ, जिसका मूल रूप रस या आनन्द था। उसमें तरंग होने से सलिल् हुआ, उसका आकार ग्रहण करने से सरिर् (शरीर) हुआ। उसमें द्रप्स (अंग्रेजी में ड्रॉप्स, drops) अलग (स्कन्न) हुए। प्रथम स्तर के द्रप्स ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी), उसमें तारा रूप द्रप्स हुए। ब्रह्माण्ड में फैला पदार्थ अप् था, उसमें तरंग होने से अम्भ हुआ, अम्भ सहित साम्भ या साम्ब सदाशिव हुआ। सौर मण्डल में अप् का रूप मर है, जिसमें सूर्य मरीची है। 

 यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७) 

वेदिर्वै सलिलम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/५) 

अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/३)

स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद्, १/१/२)

कर्म के आरम्भ रूप अप् के सभी रूप ’क’ हैं। ’क’ का पान करने वाला कपि, उसके बाद ब्रह्माण्ड रूपी विन्दुओं की वर्षा करने वाला वृषाकपि है।

तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। ... आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१२) 

द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)

यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२) 

एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूपो इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः (ऋक्, ६/४१/३)

यह सृष्टि सदा पहले जैसी होती है, अतः अनुकरण करने वाले जीव को कपि (अंग्रेजी में कॉपी, copy) कहते हैं। 

सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋक्, १०/१९०/३)

(६) पुरुष-(क) सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का चेतन तत्त्व पुरुष है, निर्माण सामग्री प्रकृति है, जिसके २४ भेद हैं।

(ख) गीता के अनुसार सभी भूत पुरुष हैं, जिसके ४ प्रकार हैं। उनमें ३ का वर्णन हो सकता है। सभी का बाह्य रूप क्षर पुरुष है, उनका परिचय या कार्य रूप अक्षर पुरुष है, समष्टि के अंग रूप अव्यय पुरुष है।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥ 

उतमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्यव्यय ईश्वरः॥१७॥

समष्टि रूप में व्यय या कमी नही होती है, जिसे आधुनिक भौतिक विज्ञान में ५ प्रकार के संरक्षण सिद्धान्त कहा गया है। (Conservation of mass, energy, momentum, angular momentum, electric charge)

अति सूक्ष्म या अति विस्तृत रूप में भेद नहीं दीखता या अनुभव नही होता है (भागवत पुराण, ३/११/३-५), वह परात्पर पुरुष है। इसका वर्णन सम्भव नहीं है, उपवर्णन होता है।

अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठोपनिषद्, २/२०)

स वै न देवासुर मर्त्य तिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्, निषेधशेषो, जयतादशेषः॥

एवं गजेन्द्रमुपवर्णित निर्विशेषं (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, अध्याय, ८/३)

(ग) पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष-दृश्य पिण्डों के बीच का विरल पदार्थ जो उनका ३ गुणा है,  (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।

पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-

पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।

पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।

यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।

पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त, ११/१७२-१७४) 

४. स्रष्टा और सृष्टि रूप

यह रूप दारु ब्रह्म भी कहा गया है। भगवान् सृष्टि क्रम रूप में वृक्ष का मूल, शाखा और पत्र हैं, निरपेक्ष द्रष्टा हैं, विश्व निर्माण की सामग्री हैं, सृष्टि चक्र या संकल्प-कर्म-फल का चक्र हैं, कई चक्रों के समन्वय रूप में वन तथा विश्व के आधार भी हैं। 

ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।

मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ 

(तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६)

= ब्रह्म ही वह वन और वृक्ष है जिसे काट कर जगत् का निर्माण हुआ। मनीषी चिन्तन कर कहते हैं कि ब्रह्म ने ही भुवनों का धारण किया। 

यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।

वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९) 

= पूर्ण पुरुष वृक्ष के जैसा आकाश में स्तब्ध हो कर देख रहा है। इससे परे कुछ नहीं है, इससे सूक्ष्म नहीं है न इसके अतिरिक्त कुछ है। 

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। 

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता, १५/१) 

= जिसका मूल ऊपर है तथा शाखा नीचे है वह अविनाशी अश्वत्थ है। छन्द इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेद जान सकता है।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। 

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। 

अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥

= संकल्प, क्रिया, फल के चक्र रूपी वृक्ष का जो बन्धन है, उसे काटने पर ही मनुष्य मुक्त हो सकता है। 

अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्। 

तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥ 

(ऋक् , शाकल्य शाखा, १०/१५५/३)

= यह समुद्र (विश्व विस्तार) के पार जो अपौरुषेय दारु (काठ) तैर रहा है, उसकी शरण में जाने से ही समुद्र को पार कर सकते हैं। 

५. गायत्री मन्त्र-

एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् (सहस्रनाम, ९१)

गायत्री प्रथम पाद में सविता = स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता जैसा है। उसका निर्माता ब्रह्माण्ड पितामह है, उसका भी निर्माता स्वयम्भू ब्रह्म प्रपितामह, या तत् सविता है।

गायत्री मन्त्र तृतीय पाद में यत् = स्वयं, व्यक्ति। उसकी बुद्धि को प्रेरित करने वाला ब्रह्म।

मध्यम पाद में भर्गः भी ब्रह्म का वाचक है, जो शिव का एक नाम है (अमरकोष, १/१/३३)

एको नैकः(देव्यथर्वशीर्ष, २३)

कः = कर्ता रूप या स्रष्टा-कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्, १०/१२१/१)

कं = क्रिया रूप, सृष्टि-कं लोकं अनुप्राविशत् (अथर्व, ११/८/११)