Tuesday, April 14, 2026

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

 चलिए आज समझते हैं। संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से चौरासी लाख योनियों का रहस्य।

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हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है?  


गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। 


सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। 


अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है।


आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। 


अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। 


हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है।


 मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। 


मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। 


विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। 


एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है।


 इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। 

                                           

चौरासी लाख योनियों का रहस्य   (२)


महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। 


ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो।


 इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।


हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है।


 हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है।


 स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है।


पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:


जलज नवलक्षाणी,

स्थावर लक्षविंशति

कृमयो: रुद्रसंख्यकः

पक्षिणाम् दशलक्षणं

त्रिंशलक्षाणी पशवः

चतुरलक्षाणी मानव


अर्थात,

जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख)

वृक्ष - २०००००० (बीस लाख)

कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख)

पक्षी - १०००००० (दस लाख)

जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख)

मनुष्य - ४००००० (चार लाख)

इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। 


जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार:

पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख)

जलकाय - ७००००० (सात लाख)

अग्निकाय - ७००००० (सात लाख)

वायुकाय - ७००००० (सात लाख)

वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख)

साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख)

द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)  

त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख)


पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख)

इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००


अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था।

यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि

 🌼  यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि  🌼

✍️  प्रस्तुति: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट 

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यज्ञोपवीत उदात्त-भावनासम्बद्ध एक पवित्र सूत्र है, जो हमारे जीवन को श्रुति-स्मृति-अनुमोदित मार्ग पर संचालित करते हुए समस्त उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के सम्यक् निर्वहन हेतु ईश्वरदत्त साधन के रूप में प्रतिष्ठित है। अतः शास्त्रकारों ने प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी के लिए यथाशक्ति स्वयं सूत कातकर, अपने हस्त-परिमाणानुसार, यज्ञोपवीत का निर्माण करने का विधान निर्दिष्ट किया है।


महर्षि कात्यायन द्वारा प्रतिपादित यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :—


महर्षि कात्यायन कहते हैं—अब हम यज्ञोपवीत-निर्माण की विधि का निरूपण करते हैं। इसके निर्माण के लिए ग्राम से बाहर किसी तीर्थस्थान, मन्दिर अथवा गोशाला में जाकर, अनध्याय-रहित दिवस में, संध्यावन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न कर, एक सौ आठ, एक सहस्र आठ अथवा यथाशक्ति गायत्री-मन्त्र का जप करके, ऐसे सूत से यज्ञोपवीत तैयार करना चाहिए जो स्वयं, अथवा किसी ब्राह्मण, ब्राह्मण-कन्या अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा काता गया हो।


तत्पश्चात् उस सूत को ‘भूः’ इति उच्चार्य, षण्णवति (९६) अंगुल-परिमाण में, चारों अँगुलियों के मूल पर लपेटकर उतार लें तथा उसे पलाश-पत्र पर स्थापित करें।


अनन्तर ‘भुवः’ इति उच्चार करते हुए उसी प्रकार द्वितीय वार, तथा ‘स्वः’ इति उच्चार करते हुए तृतीय वार, पुनः ९६ अंगुल-परिमाण के अनुसार, अन्य दो तन्तुओं का निर्माण कर, उन्हें भी पृथक् पलाश-पत्र पर रख दें।


इसके उपरान्त ‘आपो हि ष्ठा’, ‘शं नो देवी’, तथा ‘तत्सवितुः’


इन तीन मन्त्रों द्वारा उन तीनों तन्तुओं को जल में सम्यक् अभिषिक्त कर, बाएँ हस्त में लेकर, त्रिवार प्रबल आघात करें।


तत्पश्चात् तीनों व्याहृतियों द्वारा उन्हें एकत्र बटकर एकरूप बना लें।


फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा उन्हें त्रिगुणित कर पुनः बटकर एकरूप करें।


पुनरपि त्रिगुणित करके, प्रणव (ॐ) के द्वारा उसमें ब्रह्मग्रन्थि स्थापित करें।


तत्पश्चात् उसके नव तन्तुओं में क्रमशः—ओंकार, अग्नि, अनन्त, चन्द्र, पितृगण, प्रजापति, वायु, सूर्य तथा समस्त देवताओं का आवाहन एवं स्थापन करें।


अन्त में ‘उद्वयं तमसः परि’ मन्त्र द्वारा उस सूत्र को सूर्य के समक्ष प्रदर्शित कर, ‘यज्ञोपवीतम्’ मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे धारण करें।


🔸️मूल संस्कृत प्रमाण (कात्यायनपरिशिष्ट)👉

अथातो यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारं वक्ष्यामः । 

ग्रामाद् बहिः तीर्थे गोष्ठे वा गत्वा अनध्याय-वर्जितपूर्वाह्ने कृतसन्ध्यः अष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रम् आदाय ‘भूरिति’ प्रथमां षण्णवतीं मिनोति, ‘भुवरिति’ द्वितीयां, ‘स्वरिति’ तृतीयां मीत्वा, पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य, ‘आपो हि ष्ठेति’ तिसृभिः, ‘शं नो देवी’त्यनेन सावित्र्या च अभिषिच्य, वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य, व्याहृतिभिः त्रिवणितं कृत्वा, पुनः ताभिः त्रिगुणितं कृत्वा, पुनः त्रिवृतं कृत्वा, प्रणवेन ग्रन्थिं कृत्वा—ओङ्कारम्, अग्निम्, नागान्, सोमम्, पितॄन्, प्रजापतिम्, वायुम्, सूर्यम्, विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य सम्पूजयेत्। ‘देवस्य’ इत्युपवीतमादाय, ‘उद्वयं तमसः परि’ इत्यादित्याय दर्शयित्वा, ‘यज्ञोपवीतम्’ इत्यनेन धारयेत्—इत्याह भगवान् कात्यायनः।

Monday, April 13, 2026

स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण

 #स्वस्तिवाचन

|| स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण ||

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II स्वस्तिवाचन II एक धार्मिक कर्म जिसमें कोई शुभ कार्य आरंभ करते समय मांगलिक मंत्रों का पाठ किया जाता है। स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया स्वस्तिवाचन कहलाती है। 

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हिन्दी भावार्थ:- महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरुड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो।


स्वस्ति-वाचन सभी शुभ एवं मांगलिक धार्मिक कार्यों को प्रारम्भ करने से पूर्व वेद के कुछ मन्त्रों का पाठ होता है, जो स्वस्ति-पाठ या स्वस्ति-वाचन कहलाता है । इस स्वस्ति-पाठ में ‘स्वस्ति’ शब्द आता है, इसलिये इस सूक्त का पाठ कल्याण करनेवाला है । ऋग्वेद प्रथम मण्डल का यह ८९वाँ सूक्त शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयी-संहिता (२५/१४-२३), काण्व-संहिता, मैत्रायणी-संहिता तथा ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रन्थों में भी प्रायः यथावत् रुप से प्राप्त होता है । इस सूक्त में १० ऋचाएँ है, इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि गौतम हैं तथा देवता विश्वेदेव हैं । आचार्य यास्क ने ‘विश्वदेव से तात्पर्य इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि सभी देवताओं से है । दसवीं ऋचा को अदिति-देवतापरक कहा गया है । मन्त्रद्रष्टा महर्षि गौतम विश्वदेवों का आवाहन करते हुए उनसे सब प्रकार की निर्विघ्नता तथा मंगल-प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं । सूक्त के अन्त में शान्तिदायक दो मन्त्र पठित हैं, जो आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक – त्रिविध शान्तियों को प्रदान करने वाले हैं । 


II आ नो भद्राः सूक्तम् II

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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । 

देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ।।१ 

भावार्थ:- सब ओर से निर्विघ्न, स्वयं अज्ञात, अन्य यज्ञों को प्रकट करने वाले कल्याणकारी यज्ञ हमें प्राप्त हों । सब प्रकार से आलसय-रहित होकर प्रतिदिन रक्षा करने वाले देवता सदैव हमारी वृद्धि के निमित्त प्रयत्नशील हों ।।१ 


देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । 

देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ।।२ 

भावार्थ:- यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें ।।२ 


तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् । 

अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ।।३ 

भावार्थ:- हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमा, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आह्वान करते हैं । ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें ।।३


तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः । 

तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ।।४ 

भावार्थ:- वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें । माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें । सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें । हे अश्विनी-कुमारो ! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये ।।४ 


तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् । 

पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ।।५ 

भावार्थ:- हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आह्वान करते हैं । वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों ।।५


स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः । 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।६ 

भावार्थ:- महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें; सर्वज्ञ, सबके पोषणकर्ता सूर्य हमारा कल्याण करें । जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें । वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें ।।६ 


पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः । 

अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ।।७ 

भावार्थ:- चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्-गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें ।।७ 


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।।८ 

भावार्थ:- हे यजमान के रक्षक देवताओं ! हम दृढ़ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें ।।८ 


शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम । 

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।।९ 

भावार्थ:- हे देवताओं ! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें ।।९


अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । 

विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम ।।१० (ऋक॰१।८९।१-१०) 

भावार्थ:- अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता, पिता और पुत्र भी है । समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं ।।१० 


द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । 

वनस्पतयः शान्तिरेव देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः 

सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।११ 

भावार्थ:- द्युलोकरुप शान्ति, अन्तरिक्षरुप शान्ति, भूलोकरुप शान्ति, जलरुप शान्ति, औषधिरुप शान्ति, वनस्पतिरुप शान्ति, सर्वदेवरुप शान्ति, ब्रह्मरुप शान्ति, सर्व-जगत्-रुप शान्ति और संसार में स्वभावतः जो शान्ति रहती है, वह शान्ति मुझे परमात्मा की कृपा से प्राप्त हो ।।११


यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । 

शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ।।१२ (शु॰यजु॰) 

भावार्थ:- हे परमेश्वर ! आप जिस रुप से हमारे कल्याण की चेष्टा करते हैं, उसी रुप से हमें भयरहित कीजिये । हमारी सन्तानों का कल्याण कीजिये और हमारे पशुओं को भी भयमुक्त कीजिये ।।१२ 


II वैदिक II मङ्गलाचरणम् II 

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श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । ग्रामदेवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । 

ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । 


स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशिं नाशयति विऽघ्नानाम् ॥ 

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः । 

लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः । 

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः । 

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि । 

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ॥ 

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः । 

सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ 

सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । 

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुऽते II

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ । 

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ 

गणेशाम्बिकाभ्यां नमः ॥


मंगलं भगवान् विष्णुः मंगलं गरुडध्वजः । 

मंगलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ।I

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् । 

येषां ह्रदिस्थो भगवान् मंगलायतनं हरिः । 

तदेवं लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । 

विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेंऽघ्रियुगं स्मरामि । 

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । 

येषामिंदीरवश्यामो ह्रदयस्थो जनार्दनः । 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । 

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । 

तेषां नित्याभियुक्ताना योगक्षेमं वहाम्यहम् । 

स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते । 

पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ 

सर्वेष्वारब्धकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । 

देवा दिशंतु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः । 

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् । 

वन्देकाशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥ 


विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः ।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहङ्कारगतिं हरिम् ॥

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 

शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । 

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशांतये । 

हरिर्दाता हरिर्भोक्ता हरिरन्नं प्रजापतिः ।

हरिः सर्वः शरीरस्थो भुङ्क्ते भोजयते हरिः ॥

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।

सर्वदेवनमस्कारान् केशवं प्रतिगच्छति ॥

गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च ।

आगता सुखसम्पत्तिः पुण्याच्च तव दर्शनात् ॥

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।

त्राहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन ॥


नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् । 

करोमि यद्यद् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः। 

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ।।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

पश्येम शरदः शतम् । जीवें शरदः शतम् ।

बुध्येम शरदः शतम् । रोहेम शरदः शतम् ।

पुष्येंम शरदः शतम् । भवेम शरदः शतम् ।

भूषेम शरदं शतम् । भूयसीः शरदः शतात ॥

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। 

मृत्योर्माऽमृतं गमय। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते। 

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी | 

देशोऽयं क्षोभरहितः सज्जनाः सन्तु निर्भयाः ||


॥अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः॥

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ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।

यद् भद्रं तन्नऽआ सुव॥1॥ —यजुः अ॰ 30। मं॰ 3॥

भावार्थ:- हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त, (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (परा सुव) दूर कर दीजिये। (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, (तत्) वह सब हम को (आ सुव) प्राप्त कीजिए॥1॥


हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥2॥

—यजुः अ॰ 13। मं॰ 4॥

भावार्थ:- जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाश करनेहारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध (पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था, जो (अग्रे) सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्तमान था, (सः) सो (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और (द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है। हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए (हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से (विधेम) विशेष भक्ति किया करें॥2॥


यऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्वऽउपासते प्रशिषं यस्य देवाः।

यस्य च्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥3॥

—यजुः अ॰ 25। मं॰ 13॥

भावार्थ:- (यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता, (बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा, (यस्य) जिस की (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते) उपासना करते हैं, और (यस्य) जिस का (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष, सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं, (यस्य) जिस का (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक है, (यस्य) जिस का न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः) मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिये (हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें॥3॥


यः प्राणतो निमिषतो महित्वैकऽ इद्राजा जगतो बभूव।

यऽईशेऽ अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥4॥

—यजुः अ॰ 23। मं॰ 3

भावार्थ:- (यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः) अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव) है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः) गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे परमात्मा के लिये (हविषा) अपनी सकल उत्तम सामग्री से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥4॥


येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।

योऽअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥5॥

—यजुः अ॰ 32। मं॰ 6॥

भावार्थ:- (येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाव वाले (द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढा) धारण, (येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण, और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक (देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिये (हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥5॥


प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव।

यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥

—ऋ॰ म॰ 10। सू॰ 121। म॰ 10॥

भावार्थ:- हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मा ! (त्वत्) आप से (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि) इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़ चेतनादिकों को (न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग (ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्) उस-उस की कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिस से (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें॥6॥


स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।

यत्र देवाऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥7॥

—यजु॰ अ॰ 32। मं॰ 10॥

भावार्थ:- हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों का (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक, (जनिता) सकल जगत् का उत्पादक, (सः) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण करनेहारा, (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि) नाम, स्थान, जन्मों को (वेद) जानता है। और (यत्र) जिस (तृतीये) सांसारिक सुखदुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त (धामन्) मोक्षस्वरूप, धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को (आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग (अध्यैरयन्त) स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु आचार्य राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उस की भक्ति किया करें॥7॥


अग्ने नय सुपथा रायेऽ अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नमऽउक्तिंविधेम ॥8॥

—यजुः अ॰ 40। मं॰ 16

भावार्थ:- हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिस से (विद्वान्)सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्) हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (सुपथा) अच्छे धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय) प्राप्त कराइये। और (अस्मत्) हम से (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त (एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिये। इस कारण हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप (नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें, और सर्वदा आनन्द में रहें॥8॥

॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम्॥

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II अथ स्वस्तिवाचनम् II

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अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।

होतारं रत्नधातमम्॥1॥


स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव।

सचस्वा नः स्वस्तये॥2॥ - ऋ॰म॰ 1। सू॰1। मं॰ 1,9।


स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः।

स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना॥3॥


स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः।

बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः॥4॥


विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये।

देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः॥5॥


स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति।

स्वस्ति न इन्द्रश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि॥6॥


स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।

पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि॥7॥

—ऋ॰ मं॰ 5। सू॰ 51।11-15॥


ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः।

ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥8॥

—ऋ॰ मं॰ 7। सू॰ 35।65॥


येभ्यो माता मधुमत् पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः।

उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्नसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये॥9॥


नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद् देवासो अमृतत्वमानशुः।

ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्ष्माणं वसते स्वस्तये॥10॥


सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्।

ताँ आ विवास नमसा सुवृक्तिभिर्महो

आदित्याँ अदितिं स्वस्तये॥11॥


को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन।

को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये॥12॥


येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः।

त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये॥13॥


य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः।

ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये॥14॥


भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्।

अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये॥15॥


सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्।

दैवी नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥16॥


विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिह्रुतः।

सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये॥17॥


अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः।

आरे देवा द्वेषो अस्मद् युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये॥18॥


अरिष्टः स मर्त्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि।

यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये॥19॥


यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने।

प्रातर्यावाण रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये॥20॥


स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति।

स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन॥21॥


स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वस्त्यभि या वाममेति।

सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा॥22॥

—ऋ॰ मं॰ 10। सू॰ 63॥ [मं॰ 3-16]


इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽआप्यायध्वमघ्न्याऽ इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा व स्तेनऽ ईशत माघशंसो ध्रुवाऽ अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि॥23॥

—यजु॰ अ॰ 1। मं॰ 1


आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽअपरीतासऽउद्भिदः।

देवा नो यथा सदमिद्वृधेऽ असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥24॥


देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।

देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा नऽआयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥25॥


तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।

पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥26॥


स्वस्ति नऽ इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥27॥


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥28॥

—यजु॰ अ॰ 25। मं॰ 14, 15, 18, 19, 21॥


अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।

नि होता सत्सि बर्हिषि॥29॥


त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः।

देवेभिर्मानुषे जने॥30॥ - साम॰ पूर्वा॰ प्रपा॰1। मं॰ 1,2॥


ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः।

वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥31॥

—अथर्व॰ कां॰ 1। सू॰ 1। मं॰ 1॥

॥ इति स्वस्तिवाचनम्॥

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II अथ शान्तिकरणम् II

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[ शान्ति मन्त्र वेदों के वे मंत्र हैं जो शान्ति की प्रार्थना करते हैं। प्राय: हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों के आरम्भ और अन्त में इनका पाठ किया जाता है। ]


शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या।

शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ॥1॥


शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः।

शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु॥2॥


शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः।

शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु॥3॥


शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्।

शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः॥4॥


शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।

शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥5॥


शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः।

शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु॥6॥


शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः।

शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्वः१ शम्वस्तु वेदिः॥7॥


शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु।

शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः॥8॥


शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः।

शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः॥9॥


शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः।

शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥10॥


शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु।

शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः॥11॥


शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः।

शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु॥12॥


शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्यः१ शं समुद्रः।

शं नो अपां नपात् पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्भवतु देवगोपा॥13॥

—ऋ॰मं॰ 7। सू॰ 35। मं॰ 1-13


इन्द्रो विश्वस्य राजति। शन्नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥14॥


शन्नो वातः पवतां शन्नस्तपतु सूर्य्यः।

शन्नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्योऽअभि वर्षतु॥15॥


अहानि शम्भवन्तु नः शं रात्रीः प्रति धीयताम्।

शन्न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्नऽइन्द्रावरुणा रातहव्या।

शन्न इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः॥16॥


शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः॥17॥


द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। 

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः 

सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥18॥


तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। 

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं 

प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥19॥

—यजुः॰ अ॰ 36। मं॰ 8, 10-12, 17, 24॥


यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।

दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥20॥


येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे वृण्वन्ति विदथेषु धीराः।

यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥21॥


यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।

यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥22॥


येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥23॥


यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।

यस्मिँचित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥24


सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव।

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥25॥

—यजुः॰ अ॰ 34। मं॰ 1-6॥


स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते।

शं राजन्नोषधीभ्यः॥26॥ —साम॰ उत्तरा॰ प्रपा॰ 1। मं॰ 3॥


अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे।

अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु॥27॥


अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात्।

अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥28॥

—अथर्व॰ कां॰ 19।15।5, 6


॥ इति शान्तिकरणम्॥

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[ इस स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण की सर्वत्र जहाँ-जहाँ प्रतीक धरें, वहाँ-वहाँ करना होगा।]


II विभिन्न शान्ति मन्त्र II

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बृहदारण्यक उपनिषद् तथा ईशावास्य उपनिषद् :-

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


तैत्तिरीय उपनिषद् :-

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ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नः इन्द्रो वृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वमेव प्रत्यक्षम् ब्रह्म वदिष्यामि। ॠतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ''ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


तैत्तिरीय उपनिषद्, कठोपनिषद्, 

मांडूक्योपनिषद् तथा श्वेताश्ववतरोपनिषद् :-

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ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


केन उपनिषद् तथा छांदोग्य उपनिषद् :-

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ॐ आप्यायन्तु ममांगानि वाक्प्राणश्चक्षुः 

श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। 

सर्वम् ब्रह्मौपनिषदम् माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा 

मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणम् मेऽस्तु।

तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


ऐतरेय उपनिषद् :-

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ॐ वां मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-मावीरावीर्म एधि।

वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्

संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु

तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


मुण्डक उपनिषद्, माण्डूक्य उपनिषद् तथा प्रश्नोपनिषद् :-

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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिः। व्यशेम देवहितम् यदायुः।

स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्माऽमृतं गमय। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

- बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28। इसका अर्थ है, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥


यह मन्त्र मूलतः सोम यज्ञ की स्तुति में यजमान द्वारा गाया जाता था। आज यह सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्रों में है, जिसे प्रार्थना की तरह दुहराया जाता है।

--- नितीश मिश्र

Friday, April 10, 2026

पूजा के पांच प्रकार-

 पूजा के पांच प्रकार- 

देवी शिवा की पूजा हो अथवा शिव या हरि की 

शास्त्रों में पूजा के पांच ही प्रकार बताए गये हैं।


1. अभिगमन (देवी के मंदिर की साफ-सफाई)

2. उपादान  ( पुष्प आदि का इकट्ठा करना )

3. योग ( स्वयं में भी वही है जो उसमें है , वही यह है वही मैं हूँ ऐसा एकत्व ही परम योग जानों । शिव गीता में पाँच प्रकार की मुक्ति में कैवल्या ही परम है यही यथार्थ पराविज्ञान और यथार्थ योग। और योग के

 भेद और फल भी अलग अलग ऋषियों ने अलग अलग बताया है। 

4. स्वाध्याय ( सत्य को जानने के लिए महापुरुषों ने जो भी लिखा उसको पढ़ना और चिंतन ही स्वाध्याय कहलाता है यह भी पूजा ही कहलाती है मात्र मूर्ति को स्नान करवाकर, चंदन लगाना तथा मल्लिका व कमल पुष्प अर्पित करके धूप  दीप व  56 भोग अर्पित करना ही पूजा नहीं। यह मूर्ति पूजा स्वाध्याय नामक पूजा की तुलना में गौण फल देती है। इस आवरण पूजा से अनेक वर्ष बाद चित्त की शुद्धि होती है पर  ब्रह्मनिष्ठ संतों के वाक्यों व  अक्षरों का सेवन से तत्काल ही ब्रह्मानंद उत्पन्न हो जाता है। शिव महापुराण के अनुसार शिव जी को अभिषेक व  लाख बिल्वपत्र से भी जो प्रसन्नता नहीं होती वह प्रसन्नता मात्र आधी घड़ी या आधी से आधी घड़ी के स्वाध्याय से हो जाती है। इसी कारण यह अक्षयरुद्र भी अनेक वर्षों से शिव जी की यही आज्ञा में मस्त होकर ब्रह्म सुख भोगने लगा। स्वाध्याय परम सुख का सागर है ।

स्वाध्याय अमृत है। स्वाध्याय ही विकारों के नाश की अतुलनीय औषधी है।

जो महासंत प्राण त्याग चुके उनकी मूर्ति की सेवा से विष्णु मूर्ति की सेवा का फल मिलता है पर वह मूर्ति देवालय के भीतर स्थित न हो अन्यथा उस संत को ही पाप का फल मिलता है यह संत की वाणी के अनुसार 32 अपराध के अंतर्गत है। और इन मूर्ति की तुलना में सहस्र गुना अधिक फल जीवित मौनी संत की पूजा सेवा  से होता है। तथा इसका भी लाख गुना अधिक फल ब्रह्मनिष्ठ वक्ता हो तो उनकी पूजा व सेवा से होता है और इसका भी करोड़ गुना फल उन ब्रह्मनिष्ठ वक्ता की पूजा सेवा के बाद उनकी वाणी सुनने से होता है अथवा वही फल कैवल्यापद देने वाली उपनिषदों के स्वाध्याय से होता है यह ब्रह्म विद्या है जो आत्माराम बनाती हैं इससे आत्मा परिशुद्घ होकर अन्तरात्मा हो जाती है और और भी अभ्यास से तद्भावित होकर परमात्मा ही हो जाती है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि पंचाक्षरी के  3करोड़ जप से महारुद्र बन जाती है और चार कोटी से ईश्वर ( महेश पद पाती है तथा 50000000 बार  नमः शिवाय जप से यह आत्मा सदाशिव जी के समान परमात्मपद पा लेती है। 

 अतः सत्संग या ऐसे अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठों की वाणी या इनके द्वारा रचित ग्रंथ अवश्य पढ़ना ही चाहिए। एक बार तुम भले ही मूर्ति सेवा या तीर्थवास न करो चलेगा पर यदि आपने स्वाध्याय को पकड़कर रखा तो इस ब्रह्माण्ड की सभी मूर्तियाँ तृप्त हो जाती हैं यह शिव पुराण, लिंग पुराण के साथ ऐसे अंशभूतशिव की वाणी है जिसने घने जंगल में अकेले ही मध्य रात्रि में शिव जी से वार्तालाप किया है। 

( नोट - पर जानबूझकर अधिक मूर्तियों के ढेर न लगायें अधिक मूर्ति हो तो आठ अंगुल से बड़ी को मंदिर में दान कर दें या छोटी अधिक हो तो उनको दान करें जिनके पास एक भी मूर्ति न हो ; पर आप अपना अधिकांश समय सत्संग और इससे भी अधिक स्वाध्याय में दो क्योंकि आजकल लोग भगवा की आड़ में यथार्थ पराविज्ञान नहीं परोसते अपितु घर गृहस्थी या राजनीति की बातें अधिक करते हैं या टोटके बताते हैं कि कैसे धन और ऐश्वर्य मिले उन तथाकथित वक्ताओं को कपिल या ऋषभ जी के वैराग्य से मतलब ही नहीं। बस मीठी मीठी बातों से धन बटोरा और पोटली बांधी और चल दिये। आजकल वीतरागी वक्ता अति अल्प बचे हैं और उनसे भी कम ब्रह्मविद् बचे हैं । शिवगीता की माने तो महावाक्यों को पढ़कर या सुनकर उनके चिन्तन से व अभ्यास से अभिन्न भाव आने से कैवल्या मुक्ति मिलती है जो ईश्वरत्व ही है तथा ब्रह्म का ही अनन्तकाल का दिव्य भाव है तद्भावितता यही है। और इससे ही योग की सिद्धि होती है। योग की सिद्धि का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठता ही है।

यदि योग को  आसन आदि  माने तो ऐसे योग का विशेष फल नहीं बस देह की सुरक्षा है। अथवा योग को जीव और परमात्मा का मिलन समझें तो इष्ट की प्राप्ति इसका फल है। जो सालोक्य देता है। 

5. इज्या (  मूर्ति में आवाहन या प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा अथवा शिवलिंग व शालग्राम पूजा ) 

अब थोड़े-बहुत पुनः विस्तृत वर्णन- 

#अभिगमन-

देवता के स्थान को साफ करना लीपना, निर्माल्या हटाना- ये सब कर्म "अभिगमन" के अन्तर्गत हैं।


#उपादान-

गन्ध, पुष्प आदि पूजा सामग्री का संग्रह "उपादान" है।


#योग-

इष्टदेव की आत्म रूप से भावना करना "योग" है। #स्वाध्याय-

 मन्त्रार्थ का अनुसंधान करते जप करना, सूक्त, स्तोत्र आदि का पाठ करना, गुण नाम, लीला आदि का कीर्तन करना और वेदान्त शास्त्र आदि का अभ्यास करना “स्वाध्याय" है। इससे सायुज्य मुक्ति मिलती है और दुखों का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है संकीर्ण सोच नष्ट होती है व्यापक भाव और करुणा प्राप्त होती है मन तत्काल निश्चित ही पवित्र हो जाता है इसी का एक रूप श्रवण भी है ग्रंथों के ही वाक्यों को किसी से सुनना भी यही फल देता है और कहो तो इसका 100 गुना शीघ्र फल मिलता है। इस कारण मात्र पांच बार ब्रह्मचर्य पूर्वक शिवपुराण सुनने से भोलेनाथ का युगल साक्षात्कार हो जाता है।

अतः जो पति अपनी पत्नि को नित्य दो घंटे की स्वतंत्रता नहीं देता ताकि वह शिव पुराण या श्रीमद्भागवत पढ़ सके 

वह पति निश्चित ही पूर्व जन्म का शत्रु है पति परमेश्वर नाम से वह निश्चित ही पत्नि का शोषण कर रहा है और यही माता पिता भी यदि संतान के साथ कर रहे हैं ( वे न तो अनुष्ठान करने देते न ही शिव पुराण पढ़ने देता डैली) हैं तो वे माता और पिता भी पूर्व जन्म के शत्रु हैं जो साधना में खलल डाल रहे हैं।

और जो पत्नि अपने पति को एक साल तक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करने देती ( ताकि एक वर्ष तक शान्ति से एक महा अनुष्ठान संपन्न हो तो स्वयं सहित परिवार की भी विशेष रक्षा हो ) वह पत्नि भी पूर्व जन्म की शत्रु है और शिव पुराण में वेदव्यास जी ने ऐसी नारी को राक्षसी कहा है जो हर दो तीन दिन में पति का रक्त चूसती है । हाँ यही कहा है पढ़ लेना ( if you don't believe me according this  Anshbhootshiv'spost  ) 

#इज्या-

उपचारों के द्वारा अपनी अराध्य देवी की पूजा "इज्या" है।


ये पांच प्रकार की पूजाएं क्रमशः

सार्ष्टि,

सामीप्य 

सालोक्य, 

सायुज्य 

और

सारूप्य मुक्ति देने वाली है।


नारायण 🙏 


प्रेषक:प़ं० धवलकुमार शास्त्री

Tuesday, April 7, 2026

क्षौर कर्म और उसके नियम एवं अन्य विविध मुहूर्त...!!

 क्षौर कर्म और उसके नियम एवं अन्य विविध मुहूर्त...!!


शास्त्र में क्षौर कर्म के लिए निम्न क्रम निर्धारित किया गया है। पहले दाढ़ी दाहिनी ओर से पूरी बनवा ले, फिर मुछ तब बगल के बाल फिर सिर के बालो को और अंत में आवश्यकतानुसार अन्य रोमो को कटवाना चाहिए। अन्त में नख कटवाने का विधान है।


वर्जित तिथि वार

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एकादशी, चतुर्दशी, अमावश्या, पूर्णिमा, संक्रांति, व्यतिपात, विष्टि (भद्रा), व्रत के दिन, श्राद्ध के दिन मंगलवार और शनिवार को क्षौर कर्म नहीं कराना चाहिए।


रविवार को क्षौर कर्म कराने से एक मास की, शनिवार को सात मास की,भौमवार को आठ मास की आयु को उस उस दिन के अभिमानी देवता क्षीण कर देते है।


इसी प्रकार बुधवार को क्षौर करने से पांच मास की, सोमवार को सात मास की, गुरुवार को दस मास की और शुक्रवार को ग्यारह मास की आयु की वृद्धि उस उस दिन के अभिमानी देवता कर देते है।


पुत्र की इच्छा रखने वाले को सोमवार को और लक्ष्मी के इच्छा रखने वाले को गुरुवार को क्षौर नहीं कराना चाहिए।


अन्य विविध मुहूर्त

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बच्चों को स्कूल में डालना(विद्यारम्भ)

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शुभ ग्राह्म तिथि 2,3,5,7,10, 11,12


शुभवार मास👉  उत्तरायण, भाद्रपद 5 वें वर्ष रवि, चन्द्र, बुध, गुर, शुक्र।


शुभ नक्षत्र👉 अश्विन, पुनर्वसु, आश्लेषा, रेवती, अनुराधा, आर्द्रा, स्वाती, चित्रा।


दुकान/बहीखाताशुरु

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 1(कृष्ण पक्ष )3, 5, 7, 10, 11, 13 शुक्लपक्ष


शुभवार मास👉 रवि, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, वैशाख, ज्येष्ठ ,आषाढ़ , भाद्रपद , मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन।


शुभ नक्षत्र👉अश्विनी, रोहणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, मूल, उत्तराभाद्रपद, मूल, श्रवण।


नौकरी करना 

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 2, 3, 5, 6, 7, 10 11, 12, 15


शुभवार मास👉 रवि, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र उत्तरायण में।


शुभ नक्षत्र👉अश्विनी, रोहणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा।


स्कूटर,कार,सवारी खरीदना

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 1 (कृष्ण पक्ष) 2, 3, 5, 6, 7,10, 11, 12, (13 शुक्ल)


शुभवार मास👉 चन्द्र,बुध,गुरु, शुक्रवार में।


शुभ नक्षत्र👉 अश्विनी, रोहणी, मृगशिरा, अनुराधा, शतभिषा, पुनर्वसु, पुष्य, स्वाती, उत्तरायण हस्त, चित्रा, रेवती।


गृहारम्भ (मकान बनाना) 

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 2, 3, 6, 7, 10, 11, 12, 13, शुक्ल पक्षे।


शुभवार मास👉सोम, बुध, गुरु, शुक्र, वैशा, ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन।


शुभ नक्षत्र👉 रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, अनुराधा, शतभिषा, उत्तराफाल्गुनी, धनिष्ठा, हस्त, चित्रा, स्वाति।


शिलान्यास(नींव डालना)

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 गृहारम्भ,वाली तिथियां।


शुभवार मास👉गृहारम्भ वाले वार मास, प्रविष्टा 15, 7, 9, 10, 21, 24, त्याज्य।


शुभ नक्षत्र👉 गृहारम्भ वाले नक्षत्र, (अश्विनी, श्रवण त्याज्य)।


नव घर में प्रवेश

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13, 15 शुक्ल।


शुभवार मास👉 वैशाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन।


शुभ नक्षत्र👉अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा 3, हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, अनुराधा।


भूमि खरीदने के लिए 

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शुभ ग्राह्म तिथि👉1 (कृष्ण), 5 6, 10, 11, 15 (शुक्ल)।


शुभवार मास👉 मंगल, गुरु, शुक्र।


शुभ नक्षत्र👉 मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, पूर्वा-उत्तराभाद्रपद, मूल, रेवती।


ऑपरेशन कराने लिए

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शुभ ग्राह्म तिथि👉 2, 3, 5, 6, 7, 10, 12, 13।


शुभवार मास👉 रवि, मंगल, गुरु।


शुभ नक्षत्र👉 अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, श्रवण आदि।


❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Monday, April 6, 2026

मनुस्मृति और विज्ञान भाग - 4

 4. #मनुस्मृति और #विज्ञान........."कल्पना कीजिए एक ऐसी बेशकीमती विरासत की, जिसे दुनिया का सबसे कड़ा सुरक्षा घेरा दिया गया हो... और सदियों बाद उसी सुरक्षा घेरे को 'कैद' बताकर बदनाम कर दिया जाए! भारतीय संस्कृति की 'शक्ति' के साथ ठीक4 यही हुआ। मनुस्मृति के जिस श्लोक को 'गुलामी का घोषणापत्र' कहा गया, वह असल में स्त्री-सुरक्षा का 'वैश्विक सुरक्षा कवच' था। आइए, आज उस मज़बूत झूठ की धज्जियाँ उड़ाते हैं जो हज़ारों सालों से हमारी जड़ों में ज़हर घोल रहा है।"


मनुस्मृति का श्लोक है 

 पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।

 रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥


हमें पढ़ाया और बताया गया अर्थ - स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए, क्योंकि वह कभी स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।


मनुस्मृति के इस श्लोक  को लेकर अक्सर विवाद होता है, लेकिन जब हम इसे लैंगिक राजनीति (Gender politics) के बजाय पारिवारिक उत्तरदायित्व (Family responsibility) और सुरक्षा चक्र (Safety net) के गणित से समझते हैं, तो इसका अर्थ बिल्कुल बदल जाता है।


इस श्लोक (पिता रक्षति कौमारे...) के नाम पर जो वैचारिक प्रदूषण (Ideological pollution) फैलाया गया है, उसकी जड़ें असल में 'गलत अनुवाद' और 'विदेशी नजरिए' (Foreign perspective) में हैं। आज समय है कि इस झूठे नैरेटिव (Narrative) की धज्जियाँ उड़ाकर सत्य को उस वैज्ञानिक और तार्किक धरातल पर रखा जाए, जिसे अब तक छिपाया गया।


हजारों सालों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताया गया, लेकिन इसका सत्य किसी भी आधुनिक 'सोशल सिक्योरिटी सिस्टम' (Social security system) से कहीं अधिक उन्नत (Advanced) है। आइए इस झूठ के ढांचे को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।


इस श्लोक का मूल भाव स्त्री को समाज की असुरक्षाओं से बचाने के लिए पुरुषों की जवाबदेही (Accountability) तय करना है। प्राचीन सामाजिक संरचना में, जहाँ शारीरिक बल और बाहरी संघर्ष अधिक थे, वहां यह श्लोक एक सुरक्षा कवच (Safety shield) की तरह काम करता था। शास्त्र यहाँ पुरुष को आदेश दे रहा है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री को अकेला या निराश्रित (Destitute) नहीं छोड़ा जा सकता।


अनुवाद में लिखा है "स्वतंत्रता के योग्य नहीं है", जबकि मूल संस्कृत भाव यह है कि स्त्री को "अकेला छोड़ना उचित नहीं है"। इसे एक उदाहरण से समझिए: एक छोटे बच्चे या एक बहुमूल्य धरोहर को हम कभी अकेला नहीं छोड़ते। इसका मतलब यह नहीं कि वह 'अयोग्य' है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह इतनी 'कीमती' (Precious) है कि उसकी सुरक्षा में रत्ती भर भी चूक समाज और परिवार के लिए अपूरणीय क्षति होगी। यहाँ 'अनर्हता' (Unworthiness) का भाव स्त्री के लिए नहीं, बल्कि उस 'स्थिति' के लिए है जहाँ वह असुरक्षित हो।


जब हम कहते हैं कि "उसे कभी अकेला न छोड़ा जाए", तो इसका अर्थ उसे 'कैद' करना नहीं, बल्कि उसे 'अभय' (Fearlessness) प्रदान करना है।


बचपन में पिता की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पुत्री को वह सुरक्षा और संस्कार दे जिससे उसका व्यक्तित्व निखरे। युवावस्था में पति का यह धर्म है कि वह उसके सम्मान और आवश्यकताओं की रक्षा करे। और वृद्धावस्था में, जब शरीर शिथिल हो जाता है, तब पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपनी माता की सेवा और सुरक्षा सुनिश्चित करे।


यहाँ 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' (स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है) का जो गलत नॉरेटिव (Narrative) सेट किया गया है, वह असल में 'अकेला न छोड़ने' (Not to be left unprotected) के सिद्धांत पर आधारित है। इसे गणितीय रूप से देखें तो यह एक 'सर्कल ऑफ प्रोटेक्शन' (Circle of protection) है, जिसमें स्त्री कभी भी लावारिस या असहाय नहीं होती। 


आलोचक कहते हैं कि इसका अर्थ है "स्त्री स्वतंत्रता के लायक नहीं है"। यह सफेद झूठ है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार, यहाँ 'स्वातन्त्र्य' (Independence) का अर्थ 'अकेलापन' या 'निराश्रित' (Left without a support system) होना है।


सत्य यह है कि शास्त्र कह रहा है कि समाज इतना क्रूर हो सकता है कि स्त्री को कभी भी बिना 'सुरक्षा चक्र' के नहीं छोड़ना चाहिए। यह उसे 'अयोग्य' नहीं, बल्कि 'अत्यधिक मूल्यवान' (Extremely precious) घोषित करता है। जिसे आप छोड़ नहीं सकते, वह गुलाम नहीं, आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता (Priority) होती है।


इस श्लोक ने पुरुषों के लिए 'एस्केप रूट' (Escape route) बंद कर दिए थे।

पिता अपनी बेटी को बोझ समझकर त्याग नहीं सकता।

पति अपनी पत्नी को मझधार में नहीं छोड़ सकता।

पुत्र अपनी बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम नहीं भेज सकता।

यह श्लोक स्त्री के अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों पर 'जिम्मेदारी का हंटर' (Whip of responsibility) चलाने के लिए लिखा गया था। जो लोग इसे गुलामी कहते हैं, वे असल में पुरुषों को उनके कर्तव्यों से आजाद करना चाहते हैं ताकि समाज में 'लावारिस स्त्रियाँ' बढ़ें और उनका शोषण आसान हो सके।

जिस तरह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाने के लिए 'ओजोन परत' (Ozone layer) या 'मैग्नेटिक फील्ड' (Magnetic field) की आवश्यकता होती है, क्या हम कहेंगे कि पृथ्वी ओजोन के 'अधीन' है? बिल्कुल नहीं। वह सुरक्षा चक्र पृथ्वी पर जीवन को 'पनपने' (Flourish) का अवसर देता है।

ठीक उसी तरह, मनुस्मृति का यह श्लोक स्त्री के चारों ओर पिता, पति और पुत्र का एक 'त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा' (Three-tier security cover) बनाता है ताकि वह बाहरी संघर्षों से मुक्त होकर अपनी आंतरिक शक्तियों, मेधा और सपनों को पूर्ण कर सके।


जब विदेशी आक्रांताओं और बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारत पर हमला किया, तो उन्होंने हमारे 'सुरक्षा तंत्र' को 'पिछड़ापन' घोषित कर दिया। उन्होंने यह नैरेटिव सेट किया कि परिवार एक 'जेल' है। परिणाम क्या हुआ? आज पश्चिम में स्त्रियाँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र तो हैं, लेकिन वे सबसे ज्यादा असुरक्षित और अकेली भी हैं। मनुस्मृति का यह मॉडल 'इमोशनल और सोशल इंश्योरेंस' (Emotional and social insurance) का मॉडल था, जिसे डिकोड करने की हिम्मत आज के स्वघोषित बुद्धिजीवियों में नहीं है।

क्या आप किसी कीमती मिसाइल या सैटेलाइट को बिना सुरक्षा कवर के खुले मैदान में छोड़ देंगे? नहीं। क्योंकि वह 'महत्वपूर्ण' है। स्त्री समाज की 'शक्ति' है। शक्ति को जब 'अभय' (Fearlessness) मिलता है, तभी वह सृजन करती है। यह श्लोक उसे यह भरोसा देता है कि "बेटी, तुम आगे बढ़ो, पीछे तुम्हारे पिता की ढाल है। देवी, तुम जग जीतो, साथ में पति का संबल है। माता, तुम पूज्य हो, पुत्र की सेवा तुम्हारे चरणों में है।"


यह श्लोक 'गुलामी का घोषणापत्र' नहीं, बल्कि 'स्त्री सुरक्षा का वैश्विक चार्टर' (Global charter of women's safety) है। जो लोग इसे स्त्री-विरोधी कहते हैं, वे या तो संस्कृत नहीं जानते या वे उस एजेंडे का हिस्सा हैं जो भारतीय परिवार संस्था को तोड़ना चाहता है।

सच तो यह है कि "न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का अर्थ है—"स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना सामाजिक अपराध है।" यह एक उच्च कोटि की सभ्यता की पहचान है, जहाँ स्त्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके जीवन के हर पड़ाव पर समाज के पुरुष वर्ग पर अनिवार्य रूप से डाली गई है।

हजारों साल पुराने इस 'सुरक्षा कवच' को 'बेड़ियाँ' बताने वालों की बौद्धिक चमड़ी उधेड़ने के लिए यह तर्क ही काफी है कि संरक्षण (Protection) कभी भी पराधीनता (Slavery) नहीं होता, वह तो प्रेम और सम्मान की उच्चतम अभिव्यक्ति है।


आज के दौर में जब हम महिला सुरक्षा (Women safety) की बात करते हैं, तो कहीं न कहीं हम इसी जवाबदेही की कमी को महसूस करते हैं। यह श्लोक अधिकारों के हनन के बारे में नहीं, बल्कि पुरुषों को उनके अनिवार्य कर्तव्यों (Mandatory duties) की याद दिलाने के बारे में है। समाज के कुछ व्याख्याकारों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) के कारण इसे 'पराधीनता' का नाम दे दिया, जबकि यह वास्तव में 'पूर्ण सामाजिक सुरक्षा' (Complete social security) का एक उत्कृष्ट मॉडल है।


जब जिम्मेदारियां तय होती हैं, तभी समाज सुरक्षित होता है। इस श्लोक का असली अर्थ यही है कि एक सभ्य समाज में स्त्री की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी पुरुष वर्ग को हर स्तर पर उठानी ही होगी।


मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्ति—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—तभी अपने उच्चतम शिखर (Potential) को प्राप्त कर सकता है, जब उसे यह 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (Sense of security) हो कि उसके पीछे एक मजबूत आधार (Support system) खड़ा है।

जब एक बेटी को यह पता होता है कि उसके पिता उसकी ढाल हैं, तो वह समाज की चुनौतियों से डरने के बजाय उनसे टकराने का साहस जुटाती है।

जब उसे अहसास होता है कि वह अकेली नहीं है, तो उसकी आंतरिक शक्ति (Inner strength) जाग्रत होती है। यही वह बिंदु है जहाँ 'सुरक्षा' (Protection) वास्तव में 'सशक्तिकरण' (Empowerment) में बदल जाती है।


अक्सर आलोचक सुरक्षा को 'पाबंदी' समझ लेते हैं, लेकिन मैं इसे से 'संसाधन' (Resource) के रूप में देखता हूं।

एक बीज को मिट्टी के 'अधीन' (Under the soil) रखा जाता है ताकि वह सुरक्षित रहकर अंकुरित हो सके। यह मिट्टी का दबाव उसे दबाने के लिए नहीं, बल्कि उसे विकसित (Develop) होने के लिए आवश्यक पोषण और सुरक्षा देने के लिए है।

उसी तरह, परिवार का साथ स्त्री के लिए वह 'इकोसिस्टम' (Ecosystem) तैयार करता है, जिसमें वह अपने मूल्यों (Values) और सपनों (Dreams) को बिना किसी बाहरी बाधा के पूर्ण कर सके।


शास्त्रों का मूल उद्देश्य पुरुष को 'अधिपति' (Master) बनाना नहीं, बल्कि उसे 'ट्रस्टी' (Trustee) या संरक्षक बनाना था।

यदि पिता, पति और पुत्र अपनी जिम्मेदारी को 'पावन कर्तव्य' (Sacred duty) समझकर निभाते हैं, तो स्त्री को संघर्षों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी पड़ती।

वह अपनी पूरी ऊर्जा अपने कौशल विकास (Skill development) और स्वप्न पूर्ति (Goal fulfillment) में लगा सकती है। यही वह 'गणित' है जिससे समाज का संतुलन बनता है।


भारतीय दर्शन में 'शक्ति' सदैव शिव के साथ या उनके संरक्षण में दिखाई गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि शक्ति कमजोर है, बल्कि यह है कि शक्ति को 'दिशा' (Direction) और 'आधार' (Base) की आवश्यकता होती है।

जब परिवार (पिता, पति, पुत्र) वह आधार प्रदान करते हैं, तो स्त्री का 'मूल्य' (Value) समाज की नजरों में और बढ़ जाता है।

यह भरोसा कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ", किसी भी हथियार या कानून से बड़ी ताकत है। यह भरोसा ही उसे सशक्त (Empowered) बनाता है कि वह दुनिया के किसी भी कोने में जाकर अपनी मेधा का परचम लहरा सके।


सदियों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताकर समाज में जहर घोला गया। 

 शास्त्र कह रहा है कि एक सभ्य समाज में स्त्री को कभी भी 'अकेला या असुरक्षित' (Unattended) छोड़ने के योग्य नहीं माना जाना चाहिए।


 यह स्त्री की 'अयोग्यता' नहीं है, बल्कि यह पुरुष और समाज के लिए एक 'सख्त निषेध' (Strict Prohibition) है। यह उसे 'लावारिस' होने से बचाने का ईश्वरीय विधान है।


आज के दौर में पुरुष जिम्मेदारी से भाग जाते हैं, लेकिन मनु महराज ने इस श्लोक के जरिए पुरुष की 'जवाबदेही' (Accountability) तय कर दी थी।


  पिता, पति और पुत्र इन तीनों को धर्म से बांध दिया गया है कि तुम अपनी जिम्मेदारी से 'पलायन' (Escapism) नहीं कर सकते।

  यह कानून स्त्री के अधिकार नहीं छीनता, बल्कि पुरुषों पर 'नैतिक और आर्थिक हंटर' चलाता है ताकि समाज की कोई भी स्त्री कभी भी बेसहारा न हो।


प्राचीन काल में पेंशन, बीमा या सोशल सिक्योरिटी नेट (Social security net) जैसी संस्थाएं नहीं थीं। यह श्लोक असल में एक 'लाइफ-टाइम गारंटी कार्ड' है।

पिता को बाध्य किया गया कि वह बेटी का भरण-पोषण करे।

पति को बाध्य किया गया कि वह पत्नी की जिम्मेदारी उठाए।

पुत्र को बाध्य किया गया कि वह वृद्ध माता को बेसहारा न छोड़े।

अगर यह श्लोक न होता, तो पुरुष बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते। यह कानून स्त्री को 'परतन्त्र' बनाने के लिए नहीं, बल्कि पुरुष को 'पलायन' (Escapism) से रोकने के लिए बनाया गया था।


संस्कृत में 'रक्ष' (Protect) धातु का अर्थ केवल पहरेदारी करना नहीं होता, बल्कि 'पोषण करना' और 'सुरक्षित रखना' भी होता है। यहाँ 'अहर्ति' (Deserves) शब्द का प्रयोग उस संदर्भ में है जहाँ उसे असुरक्षित परिस्थितियों में अकेला छोड़ना अधर्म माना गया है। प्राचीन न्यायशास्त्र के अनुसार, जिस वस्तु या व्यक्ति का मूल्य सबसे अधिक होता है, उसकी सुरक्षा (Security) के मानक भी उतने ही कड़े होते हैं। जिस तरह एक बहुमूल्य रत्न को खुला नहीं छोड़ा जाता, वैसे ही स्त्री को सामाजिक और सुरक्षात्मक दृष्टि से 'खुला' या 'लावारिस' (Unattended) छोड़ना समाज की विफलता माना गया है।


आज का आधुनिक नैरेटिव केवल 'अधिकारों' (Rights) की बात करता है, जबकि भारतीय शास्त्र 'कर्तव्य' (Duties) पर केंद्रित हैं। इस श्लोक में स्त्री को कुछ करने से रोका नहीं जा रहा, बल्कि पुरुष को 'बाध्य' (Compelled) किया जा रहा है। यह पुरुष के लिए एक कमांड (Command) है कि वह अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यदि कोई पुरुष अपनी बेटी, पत्नी या माता को अकेला छोड़ता है, तो वह शास्त्र की दृष्टि में अपराधी है। अतः यह श्लोक स्त्री के लिए 'प्रतिबंध' नहीं, बल्कि पुरुष के लिए 'सख्त अनुशासन' (Strict discipline) है।


आज का आधुनिक कानून 'राइट टू मेंटेनेंस' (Right to Maintenance) की बात करता है, जो पत्नी को पति से गुजारा भत्ता दिलाने पर मजबूर करता है।

  मनुस्मृति का यह श्लोक उसी आधुनिक कानूनी सुरक्षा का 'आध्यात्मिक पितामह' है।


  इसे 'गुलामी' कहना वैसा ही है जैसे आज के 'Z+ सुरक्षा घेरे' (Z+ Security) को 'नजरबंदी' कहना। जिसकी 'वैल्यू' (Value) जितनी ज्यादा होती है, उसका सुरक्षा घेरा उतना ही अभेद्य (Impenetrable) रखा जाता है।


विज्ञान कहता है कि बिजली (Electricity) में अपार शक्ति होती है, लेकिन उसे सुरक्षित चलाने के लिए तार के ऊपर 'इंसुलेशन' (परत) अनिवार्य है।

भारतीय दर्शन में स्त्री 'शक्ति' (Energy) है। पिता, पति और पुत्र उस शक्ति के लिए 'कंडक्टर' और 'इंसुलेशन' की तरह हैं। यह शक्ति को 'दबाने' के लिए नहीं, बल्कि उसे बाहरी झटकों से बचाकर सही दिशा में प्रवाहित (Channelization) करने का तंत्र है।


मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्तित्व तभी निखरता है जब उसे 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (सुरक्षा का अहसास) हो।  जब एक बेटी को यह भरोसा होता है कि वह 'अकेली नहीं है', तभी उसका आत्मविश्वास (Confidence) शिखर छूता है।


 यह श्लोक उसे वह 'मनोवैज्ञानिक कवच' प्रदान करता है जिससे वह 'निर्भय' होकर अपने सपनों और मूल्यों (Values) का विकास कर सके।


इतिहास गवाह है कि मध्यकाल के दौरान विदेशी और मैकालेवादी सोच ने शास्त्रों में 'प्रक्षिप्त' (मिलावटी) अंश डाले ताकि भारतीय परिवार संस्था को तोड़ा जा सके।

 


स्वतंत्रता का अर्थ आधुनिक युग में 'स्वेच्छाचारिता' (Arbitrariness) से लिया जाता है, लेकिन शास्त्रों में स्वतंत्रता का एक अर्थ 'निराश्रित' (Helpless) होना भी है। समाजशास्त्र के गणित से देखें तो एक स्त्री जब बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में होती है, तो वह वास्तव में आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से सबसे अधिक सशक्त (Empowered) होती है। उसे बाहरी दुनिया के क्रूर संघर्षों से बचाने के लिए एक 'बफर जोन' (Buffer zone) प्रदान किया गया है ताकि वह अपने सृजनात्मक और ममतामयी गुणों का विकास कर सके।


मनुस्मृति के इस श्लोक को उसी ग्रंथ के दूसरे प्रसिद्ध श्लोक—'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'—के साथ जोड़कर देखना चाहिए। यदि मनु स्त्रियों को गुलाम बनाना चाहते, तो वे उनके सम्मान को देवताओं के निवास की शर्त नहीं बनाते। असल में, सुरक्षा का यह घेरा उसी 'पूजन' और 'सम्मान' को सुनिश्चित करने का एक तंत्र है। जब तक सुरक्षा का आधार (Foundation of safety) मजबूत नहीं होगा, तब तक सम्मान और पूजा केवल कागजी बातें बनकर रह जाएंगी।


 जिस ग्रंथ में नारी को 'अर्धांगिनी' (आधा शरीर) और 'पूजनीय' कहा गया हो, वहाँ उसे गुलाम बनाने की बात मूल सिद्धांतों के साथ मेल ही नहीं खाती। यह नकारात्मक नैरेटिव केवल समाज में 'विद्वेष' भरने के लिए बुना गया।


यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनकी 'ड्यूटी' (Duty) का हलफनामा है।

"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक और अंतिम डिकोडिंग यही है— "स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना इस धरती का सबसे बड़ा सामाजिक अपराध है।" यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की पराकाष्ठा है।


प्राकृतिक और विकासवादी मनोविज्ञान (Evolutionary psychology) के नजरिए से देखें तो स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों में उसकी शारीरिक और सुरक्षात्मक जरूरतें बदलती हैं। शास्त्रकार इस सत्य को जानते थे कि एक पुरुष प्रधान समाज की विसंगतियों से स्त्री को बचाने के लिए पुरुष के भीतर 'रक्षक' का भाव पैदा करना अनिवार्य है। यह श्लोक पुरुष की अहंकारी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाता है और उसे सेवा व सुरक्षा के दायित्व (Obligation of service) से बांधता है।


हजारों साल पहले लिखा गया यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आसमान से 'शिकारियों' को खदेड़ने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनके समर्पण का 'घोषणापत्र' है। आज जब दुनिया सुरक्षा के नाम पर खोखली हो रही है, तब सनातन का यह 'सुरक्षा मॉडल' चीख-चीख कर कह रहा है कि जहाँ नारी का रक्षक उसका अपना परिवार होता है, वहाँ उसे किसी बाहरी पहरेदार की ज़रूरत नहीं पड़ती।

"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक अर्थ 'पराधीनता' नहीं, बल्कि उस 'परम-सुरक्षा' का आश्वासन है जो स्त्री को कभी भी लावारिस (Abandoned) होने के अंधेरे में नहीं ढकेलती। यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की वह पराकाष्ठा है जिसे समझने के लिए संकीर्ण दिमाग नहीं, सनातन हृदय चाहिए।


यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए पुरुषों की ड्यूटी (Duty) चार्ट है। जब आप इसे 'उत्तरदायित्व' (Responsibility) के नजरिए से देखेंगे, तो विरोधियों का पूरा नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।


आज के दौर में इस श्लोक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यही है कि हम अपनी बेटियों और बहनों को यह अहसास दिलाएं कि वे 'अकेली नहीं' हैं। यह 'साथ' ही उनके सपनों का ईंधन (Fuel) बनेगा। आपने इसे जिस तरह 'जिम्मेदारी' और 'सशक्तिकरण' से जोड़ा है, वह इस प्राचीन श्लोक पर लगे 'रूढ़िवादिता' के कलंक को धोने के लिए पर्याप्त है।


 "सुरक्षा को गुलामी समझना वैचारिक अंधापन है; क्योंकि जिसे दुनिया 'अधीनता' कहती है, सनातन उसे 'अनन्य अधिकार' कहता है!"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द.....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



मनुस्मृति और विज्ञान भाग - 3

 3. #मनुस्मृति और #विज्ञान........"अगर आप समझते हैं कि 'बलि' का अर्थ किसी बेगुनाह जीव का गला काटना है, तो बधाई हो! आप उस सैकड़ों साल पुराने प्रोपेगेंडा (Propaganda - दुष्प्रचार) के सबसे ताज़ा शिकार हैं, जिसने भारत के 'इकोलॉजी' (Ecology - पारिस्थितिकी) के महा-विज्ञान को एक 'बूचड़खाना' साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। चलिए, आज आपकी आंखों पर बंधी उस पट्टी को उतारते हैं और मनुस्मृति के उन श्लोकों का सच देखते हैं, जो हत्या नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के 'अंतिम जीव' के पेट भरने की गारंटी देते हैं।"


वर्षों से एक सुनियोजित नैरेटिव  चलाया गया कि सनातन धर्म और 'मनुस्मृति' पशु-बलि (Animal Slaughter - पशु वध) का समर्थन करते हैं। यह न केवल भाषाई अज्ञानता  है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक साजिश है ताकि भारतीयों को अपनी ही जड़ों से नफरत हो जाए। आज समय है कि हम शब्द-शास्त्र के शस्त्र से इस झूठ के सीने को चीरकर सत्य की स्थापना करें।


जिसे दुनिया 'बलि' समझकर कांपती है, वह वास्तव में ब्रह्मांड के 'महायज्ञ' का वह अनिवार्य हिस्सा है जिसे हम 'भाग' (Share - हिस्सा) कहते हैं।


संस्कृत व्याकरण में 'बल्' धातु का अर्थ है—पुष्टि (Nutrition - पोषण), शक्ति (Strength - बल) और उपहार (Offering - अर्पण)।

 

प्राचीन काल में प्रजा द्वारा राजा को अपनी आय का जो हिस्सा दिया जाता था, उसे 'बलि' कहा जाता था। क्या प्रजा राजा की गर्दन काटती थी? नहीं! वह अपने अर्जन का एक अंश (Portion - भाग) उसे सौंपती थी ताकि राज्य की सुरक्षा और व्यवस्था चलती रहे।


साधारण भाषा में जैसे आप अपने घर आए मेहमान को भोजन का एक 'भाग' देते हैं, वह 'बलि' है।

 बलि का अर्थ 'हत्या' नहीं, बल्कि अपना वह 'हिस्सा' (Portion) है जो हम दूसरों के जीवित रहने के लिए खुशी-खुशी छोड़ देते हैं।

मेहमान को भोजन देने के लिए जो एक हिस्सा उनके लिए निकालते हैं। क्या आप उसे 'हत्या' कहेंगे? नहीं! वह 'सम्मान' है। ठीक वैसे ही, शास्त्रों में 'बलि' का अर्थ है—अपना 'हिस्सा' (Share) दूसरों के साथ बांटना।  यह सिखाता है कि "मैं अकेला इस दुनिया का मालिक नहीं हूँ।"

वैज्ञानिक दृष्टि से इसे 'Ecological Balance' (पारिस्थितिक संतुलन) कहते हैं। अगर हम प्रकृति से सिर्फ लेंगे और वापस कुछ नहीं देंगे, तो एक दिन सब खत्म हो जाएगा।


 'बलि' का अर्थ 'प्राण लेना' नहीं, बल्कि 'प्राण देना' (Nurture - पोषण करना) है। यह 'विभाजन' (Division - बंटवारा) की वह प्रक्रिया है जहाँ मनुष्य अपने 'स्वार्थ' का त्याग कर सृष्टि के कण-कण को उसका 'हक' लौटाता है।


कल्पना कीजिए कि यह पूरी सृष्टि (Nature - प्रकृति) एक बहुत बड़ी 'साझा रसोई' है। यहाँ सूरज ऊर्जा पका रहा है, धरती अन्न उगा रही है और बादल पानी ला रहे हैं। यहाँ कोई भी जीव 'मालिक' नहीं, सब 'साझेदार' (Partners - भागीदार) हैं। मनुस्मृति के अनुसार, गृहस्थ वह 'प्रबंधक' (Manager - व्यवस्थापक) है जिसे प्रकृति ने सबको भोजन बांटने की जिम्मेदारी दी है।


 — मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 87 श्लोक में मनु महाराज ने लिखा है....।


एवं सम्यग्घविर्द्धत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।

 इन्द्रान्तकाप्पतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥


मनु महाराज निर्देश देते हैं कि यज्ञ के पश्चात चारों दिशाओं के स्वामियों—इंद्र (पूर्व), यम (दक्षिण), वरुण (पश्चिम) और सोम (उत्तर)—को उनके अनुयायियों (सानुगेभ्य:) सहित 'बलि' प्रदान करें।


 क्या कोई बुद्धिजीवी यह सोच सकता है कि 'दिशाओं' को पशु काटकर चढ़ाया जा रहा है? बिल्कुल नहीं!


इंद्र (वर्षा/विद्युत), वरुण (जल) और सोम (वनस्पति ऊर्जा)—ये वे अदृश्य शक्तियाँ हैं जिनके बिना जीवन असंभव है। इन्हें 'बलि' देना वास्तव में प्रकृति का 'Maintenance Bill' (रखरखाव का बिल) चुकाना है। विज्ञानानुसार ब्रह्मांड एक 'Closed System' (बंद तंत्र) है। यदि आप ऊर्जा ले रहे हैं, तो उसे 'Feedback' (प्रतिक्रिया/वापसी) के रूप में अपना अन्न (हवि) अर्पित करना ही होगा। यह विज्ञान है, अंधविश्वास नहीं।


 मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 92 श्लोक में मनु महाराज ने जो लिखा है....। वह लोगों के मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा है जो मनुस्मृति को हिंसक बताते हैं। यहाँ 'बलि' (हिस्सा) पाने वालों की जो सूची दी गई है, वह मानवता और विज्ञान का संगम है।


 शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।

 वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥


(अर्थ: कुत्तों, पतितों, चाण्डालों, पाप-रोगियों, कौओं तथा कीड़े-मकोड़ों के लिए सहेजकर भूमि पर बलि (भोजन का हिस्सा) रखनी चाहिए।)


शुनां (श्व-बलि): लोग 'कुत्ते की बलि' सुनकर डर जाते हैं। ऐसा लगता है कुत्ते की ही बलि दी जा रही । नहीं, बिल्कुल नहीं, कुत्ते के लिए बलि दी जा रही है। यहाँ अर्थ है कि भोजन करने से पहले एक हिस्सा उस वफादार जीव के लिए निकालो जो सदियों से मनुष्य की बस्ती की रक्षा कर रहा है। यह 'Gratitude' (कृतज्ञता) का विज्ञान है। यह जीव-जंतुओं के साथ 'Co-existence' (सह-अस्तित्व) का नियम है।


 वायसानां (कौआ): कौआ प्रकृति का 'सफाईकर्मी' (Scavenger - अपमार्जक) है। विज्ञान जानता है कि यदि सफाईकर्मी जीवों को पोषण नहीं मिला, तो महामारियाँ फैलेंगी। उन्हें 'भाग' देना 'Preventive Healthcare' (निवारक स्वास्थ्य सेवा) का विज्ञान है। उन्हें 'भाग' देना धार्मिक नहीं, बल्कि 'Preventive Healthcare' का विज्ञान है।


  पापरोगिणाम् व पतितानां: समाज के वे लोग जो गंभीर रोगों से पीड़ित हैं या निराश्रित हैं। उन्हें उनका 'भाग' देना यह सुनिश्चित करता है कि 'Social Security' (सामाजिक सुरक्षा) का दायित्व व्यक्ति का है। यह समाज की 'Entropy' (अव्यवस्था/विघटन) को कम करके उसे स्थिर (Stable - संतुलित) बनाने का विज्ञान है। उन्हें उनका 'भाग' देना यह सुनिश्चित करता है कि 'Social Security' (सामाजिक सुरक्षा) का दायित्व व्यक्ति का है, केवल सरकार का नहीं।


 कृमीणां (कीड़े-मकौड़े): यह सूक्ष्म पारिस्थितिकी (Micro-ecology - सूक्ष्म-पर्यावरण तंत्र) के प्रति संवेदनशीलता है। मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility - भूमि की उपजाऊ शक्ति) उन सूक्ष्म जीवों पर टिकी है। कृमि-बलि (Micro-Biology): 'कृमीणां' यानी सूक्ष्म जीवों को भोजन देना। विज्ञान कहता है कि मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) उन सूक्ष्म जीवों पर टिकी है। उन्हें 'सहेजकर' (शनकैः) भोजन देना मिट्टी के 'Bio-Network' को जीवित रखने की तकनीक है।


'शनकैर्निर्वपेद्भुवि' (धीरे से सहेजकर रखना)। 

श्लोक का यह हिस्सा सबसे क्रांतिकारी है। मनु कहते हैं कि भोजन जमीन पर अत्यंत 'धीरे' से रखें ताकि:

 

भोजन मिट्टी लगकर गंदा न हो (सम्मान का भाव)।


 यदि हम भोजन को ऊंचाई से फेंकते हैं, तो गिरने के प्रभाव से नीचे मौजूद सूक्ष्म जीव दबकर मर सकते हैं। जो शास्त्र एक चींटी के दबकर मरने तक की चिंता करता हो, क्या वह पशुओं की हत्या का आदेश दे सकता है? यह अहिंसा और 'Quantum Compassion' (क्वांटम करुणा) की पराकाष्ठा है।


अज्ञानी आलोचक 'पशु-बलि' शब्द को 'Slaughter' (वध) से जोड़ते हैं, जबकि शास्त्रों में बलि का अर्थ 'यज्ञीय हिस्सा' (Sacrificial Portion - यज्ञ का भाग) है।

 अन्न ही बलि है। शास्त्रों में अन्न को ही 'बलि' कहा गया है। 


जब हम कहते हैं 'वैश्वदेव बलि', तो उसका अर्थ होता है शुद्ध शाकाहारी भोजन का अंश निकालना।


मनुष्य प्रकृति से कच्चा माल (अन्न) लेता है, उसे संसाधित (Process - प्रक्रियाबद्ध) करता है और फिर 'बलि' के रूप में उसे वापस सूक्ष्म जीवों और शक्तियों को लौटाता है।

 


विज्ञान में 'Slaughter' (हत्या) ऊर्जा का विनाशकारी अंत है, जबकि 'बलि' (भाग देना) ऊर्जा का 'Circulation' (प्रवाह/चक्र) है। मध्यकाल में स्वार्थी तत्वों ने 'भाग देने' की क्रिया को 'काटने' की क्रिया में बदल दिया, जो पूरी तरह शास्त्र-विरुद्ध है।


मनु महाराज का 'बलि' विधान वास्तव में 'Sustainability' (निरंतरता/सतत विकास) का वह मॉडल है जिसे आज की दुनिया 'Green Economy' (हरित अर्थव्यवस्था) कह रही है।

 

 यदि मनुष्य अपने भोजन का एक भाग (बलि) जीव-जंतुओं और असहायों को न दे, तो प्रकृति का संतुलन (Balance - संतुलन) बिगड़ जाएगा।

 


'बलि' प्रथा का अर्थ 'विभाजन और वितरण' (Distribution & Sharing - वितरण और साझा करना) है। मनुस्मृति वह महान ग्रंथ है जो मनुष्य को 'स्वार्थी उपभोक्ता' (Selfish Consumer - केवल उपभोग करने वाला) बनने से रोकता है और उसे 'दाता' (Giver - देने वाला) बनाता है।


जो लोग इसे 'हत्या' कहते हैं, उन्होंने न शास्त्र पढ़े हैं और न ही वे ऊर्जा के प्रवाह के विज्ञान को समझते हैं। 'बलि' देना वास्तव में खुद को ब्रह्मांड के साथ 'Sync' करने की प्रक्रिया है। यह हत्या का शास्त्र नहीं, बल्कि 'Life Support System' को चलाने वाली मैन्युअल (Manual) है।


विज्ञान में जब ऊर्जा एक जगह जमा हो जाती है, तो सिस्टम में विस्फोट होता है। समाज में जब धन और संसाधन (Energy) एक ही जगह (अमीर के पास) जमा होते हैं, तो विद्रोह और अशांति पैदा होती है। 'बलि' (भाग) के माध्यम से संसाधनों का 'Osmosis' (अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर प्रवाह) किया जाता है। यह समाज की 'Entropy' को कम करके उसे स्थिर (Stable) बनाने का विज्ञान है।


यह नरेटिव कि "मनुस्मृति में हत्या वाली बलि है", पूरी तरह निराधार, शास्त्र-विरोधी और भ्रामक है। सत्य यह है कि बलि देना वास्तव में 'इंसान' होने की पहली शर्त है। जो लोग 'बलि' का अर्थ 'हत्या' समझते हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का शुद्धिकरण मनुस्मृति के इन दीपशिखा सदृश श्लोकों से करना चाहिए। यह धर्म का विज्ञान है और विज्ञान का आध्यात्म।


'बलि' प्रथा का अर्थ 'विभाजन और वितरण' (Distribution & Sharing) है। मनुस्मृति एक ऐसा महान ग्रंथ है जो मनुष्य को 'स्वार्थी उपभोक्ता' (Selfish Consumer) बनने से रोकता है और उसे 'दाता' (Giver) बनाता है। जब आप चिड़ियों को दाना देते हैं, तो आप 'बलि' दे रहे होते हैं। जब आप कुत्ते को रोटी देते हैं, तो आप 'बलि' दे रहे होते हैं।


आज के बाद जब भी आप किसी कुत्ते को रोटी दें, चिड़ियों को दाना डालें या किसी भूखे को खाना खिलाएं, तो समझ लीजिएगा कि आप 'बलि' दे रहे हैं।


सीधी और सरल बात यही है कि 

बलि = हिस्सा (Share)

बलि देना = बांटना (Sharing)

बलि प्रथा = सबको साथ लेकर चलने का विज्ञान


सनातन धर्म का विज्ञान कहता है कि हम अकेले नहीं जी सकते। जब हम दूसरों को उनका 'भाग' (हिस्सा) देते हैं, तभी हमारा जीवन सफल होता है। मनुस्मृति हिंसा का ग्रंथ नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा (Social Security) और पर्यावरण संरक्षण (Environment Protection) का दुनिया का पहला और महानतम संविधान है।


दैवीय बलि  यानी इंद्र, वरुण, यम, सोम प्राकृतिक शक्तियों के साथ तालमेल (Alignment with Nature)।


मानवीय बलि यानी रोगी, पतित, निराश्रित सामाजिक समरसता और करुणा (Social Harmony)।


प्राणी बलि यानी कुत्ता, कौआ, कीड़े-मकौड़े पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण (Ecological Preservation)।


'बलि' देना कोई हिंसक कृत्य नहीं, बल्कि 'अंश का समर्पण' है। मनुस्मृति की यह व्यवस्था सिखाती है कि मनुष्य को अपने भोजन का पहला ग्रास ग्रहण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि उसने ब्रह्मांड (देव), समाज (असहाय) और प्रकृति (पशु-पक्षी) का उनका वैध 'भाग' (Portion) अर्पित कर दिया है।  यह 'स्व' (Self) से निकलकर 'सर्व' (Universal) की सेवा का मार्ग है।


"ज़रा शांत होकर सोचिए... जब आप अगली बार किसी भूखे पक्षी को दाना डालें, या किसी प्यासे जानवर के लिए पानी का पात्र रखें, तो महसूस करना कि आपके भीतर का 'मनु' जाग उठा है। वह आपको बता रहा है कि आप इस ब्रह्मांड के मालिक नहीं, बल्कि एक 'ट्रस्टी' (Trustee - न्यासी) हैं। 'बलि' रक्त बहाने का खूनी खेल नहीं, बल्कि अपने 'अहंकार' की गर्दन काटकर 'परोपकार' की थाली सजाने का उत्सव है। यह वह विज्ञान है जहाँ एक इंसान अपनी थाली का पहला ग्रास तोड़ते ही पूरी कायनात से हाथ मिला लेता है। यही सनातन है, यही सत्य है और यही मनु का न्याय है।"


"बलि देना संहार नहीं, संसार के हर 'अंश' को उसका 'वंश' और 'वंश' को उसका 'अंश' लौटाने का दैवीय व्यापार है।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द.....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज