Monday, March 30, 2026

स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज

 परम भागवत ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज (अत्यन्त संक्षिप्त परिचय)

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स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज 

        भारतीय पौराणिक साहित्य में जो कुछ भी हिंदी भाषा में उपलब्ध है, उसमें से अधिकांश कार्य स्वामी जी द्वारा ही किए गए हैं। अखंडानन्द जी का जन्म शुक्रवार 25 जुलाई, 1911 को वाराणसी के मेहराई गाँव में पुष्य नक्षत्र श्रावण अमावस्या (हिन्दू पंचांग के अनुसार) सरयूपारीण ब्राह्मण के यहाँ हुआ। जन्म के समय ज्योतिषी ने इनकी आयु 19 वर्ष बतायी थी , उसी डर से भगवत्मार्ग पर निकल पड़े। परिवार ने उसी नाम के देवता के नाम पर उनका नाम शांतनु बिहारी रख दिया। जब अखंडानन्द जी 10 साल के थे तभी उनके दादा ने उन्हें मूल भागवत को संस्कृत में पढ़ना सिखाया था। संन्यास जाने से पहले 1934 से 1942 तक उन्होंने कई किताबें एवं लेख प्रकाशित किए जब वे गीताप्रेस में कल्याण के सम्पादकीय बोर्ड के सदस्य थे। ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद जी से उन्होंने दीक्षा ली थी।

गीताप्रेस में कल्याण की संपादकीय परिषद के कार्यों के साथ ही उन्होंने कई पुराणों, गीता, महाभारत और वाल्मीकि रामायण जैसे ग्रंथों का भी हिंदी में अनुवाद किया। पहले इन ग्रंथों के संस्करणों में गीताप्रेस के प्रकाशनों में स्वामी जी के नाम का उल्लेख होता था। यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि पूज्य स्वामी रामकिंकर जी ने स्वामी जी से ही रामकथा की व्यासदीक्षा ली थी। स्वामी जी ने अपने केवल दस वर्ष की आयु में ही अपने दादा जी को श्रीमद्भागवत सुनाई थी। अपनी माता जी से उन्होंने रामायण का गान सीखा था।


भारत अथवा विश्व में आज भी जितने भी कथा व्यास आचार्य हैं, उनकी कथाओं में बार-बार स्वामी अखंडानंद जी का उल्लेख आ ही जाता है। पूज्य रमेश भाई ओझा, भूपेंद्र भाई पंड्या, मोरारी बापू, राजेंद्र दास जी, जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी, जगद्गुरु स्वामी राघवाचार्य जी, प्रेम मूर्ति प्रेम भूषण जी या राजन जी की कथा हो अथवा परमपूज्य शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी, स्वामी स्वामी गुरुशरणानंद जी, गिरिशानद जी यह अन्य अनेक महाभाग। सभी को स्वामी अखंडानंद जी के साहित्य और संवाद ने प्रेरणा और प्रश्रय अवश्य दिया है।


हनुमान जी द्वारा प्राण रक्षा 


स्वामी अखण्डानन्दजी ने ‘आनन्द-बोध’ पत्रिका में जनवरी 1984 से नवम्बर 1987 तक और उसके बाद भी कुछ लेख लिखे। उन लेखों का संग्रह बाद में ‘पावन प्रसंग ‘ नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ। उस पुस्तक का प्रथम संस्करण फरवरी 1988 में और चतुर्थ संस्करण मई 2012 में प्रकाशित हुआ।


चतुर्थ संस्करण के पृष्ठ संख्या 306-308 पर  आपने  लिखा:

“अत्यंत बाल्यावस्था में ही मुझे उनसे (बाबा से) शिक्षा मिलनी प्रारम्भ हो गई थी। सत्यनारायण कथा, दुर्गापाठ, महूर्त चिंतामणि मुझे कंठस्थ हो गए थे। उनके पास पढ़ने के लिए दूर-दूर से विद्यार्थी आते थे और कुछ मेरे घर पर ही रहते थे। ….. बाबा ज्योतिष  की गणित कितनी सुगमता से कर लेते हैं, कुण्डली कैसे बना देते हैं। यह सब मैं देख-देख कर अनुकरण कर लेता था। यह सब मेरे लिए कोई  कठिन काम नहीं था।“ …

“मेरे गाँव से डेढ़-दो मील दूर धानापुर नाम की एक बस्ती है। वहाँ थे पण्डित प्रह्लाद मिश्र। वे पण्डित तो थे ही, बड़े सज्जन, सदाचारी एवं सौम्य स्वभाव के थे। मैं प्रतिदिन उनके पास विद्याध्ययन के लिए जाता था। वे गंगा-स्नान, सन्ध्या-वन्दन आदि से निवृत होकर गंगाजली हाथ में लिए घर आते थे। चोटी बंधी हुई ललाट पर चन्दन, अध्यापन में बड़े निपुण थे। गायत्री-जप में उनकी दृढ़ निष्ठा थी। …

“एक बार की बात है, मैं दो-तीन दिन पढ़ने के लिए नहीं गया। उनके पिता पण्डित श्रीरघुदत्त मिश्र आयुर्वेद के बड़े विद्वान एवं प्रतिष्ठित चिकित्सक थे, वे मेरे घर आए। वे मेरे पितामह के समकक्ष थे। मुझसे बोले – ‘बेटा, तुम्हें ज़्वर (बुखार) आता है, इसीसे नहीं आए? कल ज्वर आने से पहले मेरे घर आ जाना, मैं ज्वर को रोक दूँगा।‘ उन्होने सिर पर हाथ रखा, पीठ ठोंकी।

“दूसरे दिन ज्वर आने से पूर्व ही मैं उनके पास पहुँच गया। उन्होंने गाय के गोबर से धरती लीप कर कम्बल बिछा रखा था। मुझसे कहा – ‘तुम इस पर बैठ जाओ अथवा लेट ताओ। मैं चारों ओर गाय के गोबर के भस्म से एक मन्त्र लिख देता हूँ, उसके भीतर ज्वर (बुखार) प्रवेश नहीं करेगा। तुम बाहर नहीं निकलना।‘

“मैं पहले तो लेट गया। परन्तु जब वह चले गए, तो उठ बैठा और देखने लगा कि लिखा क्या है। वह हनुमानजी का मंत्र था। उसमें विभिन्न प्रकार के ज्वरों के नाम लेकर कहा गया था कि हे हनुमानजी, इन ज्वरों को नष्ट कर दो।

“सचमुच उस दिन मुझे ज्वर नहीं आया। मैं पूर्ववत अध्ययन के कार्य में लग गया।

“उस मन्त्र पर मेरी बाल सुलभ श्रद्धा ऐसी दृढ़ हो गई कि मैं बिना किसी से पूछे ग्रन्थों में  उसे ढूंढता रहा। ‘कल्याण’ के सम्पादन विभाग में जाने के बाद वह ‘लाड्गूलोपनिषद्’ में मिल गया।“

श्री शान्तनु विहारी  द्विवेदी  ने सन्यास लेने के कुछ वर्ष पहले ‘कल्याण’ गोरखपुर के सम्पादकीय विभाग में काम किया था। उन दिनों भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार (1892-1971) ‘कल्याण’ के सम्पादक थे।  भाईजी ‘कल्याण की स्थापना वर्ष अर्थात सन् 1926 से 1971 तक उस मासिक पत्रिका  के सम्पादक रहे।  भाईजी का प्रेम ही श्री शान्तनु विहारी  द्विवेदी (स्वामी अखण्डानन्दजी)  को ‘कल्याण’ में खींच लाया था।


प्रसंग के बाहर जा कर यह चमत्कार आपको बताना चाहता हूँ कि तबसे अब तक मुझे ज्वर का प्रकोप बहुत कम हुआ है। कभी-कभी एक-दो दिन तक थोड़ा-थोड़ा ज्वर अवश्य रहा है।  बीच में एक बार सन् 1934-35 के आस-पास पित्तज्वर हुआ था। वमन हुआ और मैं बेसुध हो गया।  भाई सुदर्शन सिंहजी चक्र ने मुझे पानी के एक टब में बैठा दिया था और मैंने मूर्छा की दशा में ही देखा कि एक भयंकर राक्षसी, जिसका नाम मृत्यु था, मुझ पर आक्रमण करने दौड़ रही है और श्री हनुमानजी गदा लेकर उसकी ओर दौड़ रहे हैं। राक्षसी भाग गई और मेरा ज्वर गायब हो गया। मन्त्र का चमत्कार हो या न हो, अब तक का मेरा अनुभव यही है।  आगे क्या होगा सो ज्ञात नहीं।“


परवल का गुण


‘पावन प्रसंग’ के पृष्ठ 155 में भिक्षुजी श्रीशंकरानन्दजी महाराज पर भी एक लेख है। सच तो यह है कि स्वामी अखण्डानन्दजी असंख्य साधू, महात्माओं और वैरागियों से मिले। उनसे मिलना उनको पसन्द था। पृष्ठ 155 पर स्वामी अखण्डानन्दजी ने लिखा:


“एक वर्ष बाद, पुन: जब मैं कनखल (हरिद्वार) गया तो वे (श्रीशंकरानन्दजी) उस खण्डहर में नहीं थे।  बड़ी कठिनाई से उनका पता चला। वे बड़ी नहर से निकलने वाले एक बम्बे के पास एक छोटे से बगीचे में रह रहे थे। अत्यन्त कृश एवं रुग्ण थे। उनसे मिलने पर  ज्ञात हुआ कि किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने भिक्षा में उन्हें विष दे दिया था और लोगों ने उनको उस खण्डहर में से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर रख दिया था। वे उसके बाद से छह महीने तक वहीं बगीचे में रहे तथा परवल के अतिरिक्त कुछ खाते नहीं थे। परवल (संस्कृत शब्द पटोल) में विष पचाने की अद्भुत शक्ति है। मैं यथाशक्ति उनकी सेवा करता रहा। धीरे-धीरे वे स्वस्थ होने लगे। …. उस विष-ग्रस्त अवस्था में भी उनका खल्वाट ललाट शीशे की तरह चम-चम चमकता था। मुख पर प्रसन्नता खेलती रहती थी। बात-बात में विनोद करते थे। बाद में उनके पास दूसरे सम्प्रदायों के सन्त भी प्रश्नोत्तर के लिए आया करते थे।


“उसके बाद वाले वर्ष में जब मैं गया तो वे एक झोले में लिखने-पढ़ने की सामग्री लेकर कनखल से दक्षिण दिशा में छोटी नहर के किनारे कहीं मिले। …. अब वे भिन्न-भिन्न वृक्षों  के नीचे रहने लगे थे। कभी कहीं मिले, कभी कहीं। वर्षा हुई, भींग गए। ज्वर चढ़ आया। पर वे अपने हठ पर अडिग थे। जब मूर्छित होने लगे तब उन्हें बलात् उठा कर श्मशान घाट के पास एक बड़े मकान के एक कमरे में लाया गया।  वह मकान बहुत दिनों से खाली पड़ा था। बहुत मजबूत था, सुरक्षित था। उस कमरे में पहुँचने के लिए दो-तीन दरवाजे पार करने पड़ते थे। कमरा हवादार था। दूर-दूर तक गंगाजी का दर्शन होता था। अच्छे हुए, तब उसमें रहना उन्होंने स्वीकार कर लिया। परन्तु उनकी वाणी में व्यंग्य, हंसी, दृढ़ता टपकती रहती थी। भिक्षा भी भक्त लोग वहीं ले आते थे। हम लोगों को भी उससे  प्रसन्नता हुई। मैं ‘कल्याण के सम्पादन विभाग में रहा। बाद में सन्यासी हो गया। परन्तु उनके पास आना-जाना, प्रेम सम्पर्क ज्यों-का-त्यों बना रहा।“


सिद्धि माताजी का गुरु-मन्त्र


‘पावन प्रसंग’ पुस्तक में पृष्ठ संख्या 248 से 258 तक स्वामी अखण्डानन्दजी ने ‘ब्रह्ममयी माँ’ शीर्षक से अपनी माँ के बारे में लिखा: जब मैंने सन्यास नहीं लिया था और अपनी माँ के संग रहता था, तब काशी में मेरी माँ की भेंट एक सिद्धि माताजी से हुई। दो-चार बरस बाद उन्होंने मेरी माताजी को एक मन्त्र भी दिया था। वे मेरी माँ की गुरुमाँ हो गईं थीं। मेरी माँ उस गुरु-मंत्र को मन ही मन स्मरण और जाप करतीं थीं।

अखण्डानन्दजी ने लिखा:

“वह यह समझतीं थीं कि उनके सिवा इस बात को  (उस मन्त्र को) कोई नहीं जानता। एक दिन भोजन के समय महानिर्वाण तन्त्र का वही सप्ताक्षर मन्त्र मैं एकाएक बोलने लगा। तब मेरी माँ को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा – “यह मन्त्र तुमको कैसे मालूम है?” मैंने कहा – “मुझे मालूम है कि तुम इसी का जप करती  हो। तुम्हारे सिर पर जो चमक और रेखाएँ उठ रही हैं, वे इसी मन्त्र से आती हैं।“

पृष्ठ 255 पर स्वामी अखण्डानन्दजी ने लिखा:

“जब मैं कल्याण-परिवार में रह रहा था, भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार ने माताजी को और मुझे भी दो बातों से निश्चिंत कर दिया: एक तो अपने प्रभाव और सहयोग से (मेरी) बेटी कमला का विवाह सन्त साहित्य के प्रसिद्ध लेखक श्री परुशराम चतुर्वेदी के पुत्र श्री धन्नजय चतुर्वेदी से करा दिया और दूसरे  विशम्भर के पढ़ने की व्यवस्था चुरू ऋषिकुल में कर दी।  इससे माताजी निश्चिंत होकर भजन करने लगीं और घर पर चलने वाली पाठशाला के विद्यार्थियों को अपने पुत्र के समान मान कर उन्हें स्नेह देने लगीं। विद्यार्थीगण माताजी के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखते थे। वे उन्हें सदाचार, शिष्टाचार, भगवद्भजन का उपदेश किया करती थीं। …


मेरे सन्यास लेने पर माँ रोई


“सन् बयालीस के आरम्भ में  पण्डित श्री मदनमोहन मालवीयजी को श्रीमद्भागवत सुनाने के बाद मैंने ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीबृह्मानन्द सरस्वती सन्यास-दीक्षा ले ली और दण्डी स्वामी हो कर मध्यप्रदेश की ओर चला गया। इससे माताजी के चित्त को बड़ी चोट लगी। यद्यपि उन्होंने पहले अनुमति दे दी थी … वे दु:खी होकर भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी के पास गईं। उन्होंने माताजी को बहुत समझाया-बुझाया। भाईजी ने कहा की यदि कोई साधारण व्यक्ति सन्यास ग्रहण कर लेता, तो हम उसको आग्रह और प्रायश्चित के द्वारा गृहस्थाश्रम में लौटा भी सकते थे, परन्तु एक तो वह विद्वान हैं, और दूसरे ‘कल्याण’ के द्वारा उनकी विद्या और लेखन की प्रसिद्धि हो चुकी है। अब यदि वह गृहस्थाश्रम में लौट भी आएं, तो उनकी बड़ी बदनामी होगी। बदनामी की बात सुनकर माताजी ने तुरन्त कह दिया कि जिस काम से उनकी बदनामी हो वह करने का आग्रह मैं कदापि नहीं करूंगी। वे जहां रहें जैसे रहें, सुखी रहें। माताजी का आशीर्वाद प्राप्त हो गया। मेरे सन्यास लेने के बाद वह अद्वैत वेदान्त का विचार करने लगीं, गंगा-किनारे विचरते हुए जो महात्मा वहाँ आ जाते, उनका सत्संग करतीं। भगवान की भक्ति तो थी ही, मेरे सन्यासी हो जाने पर उनके मन में भी वैराग्य का उदय हुआ। घर के काम में रुचि लेना कम हो गया।“


माँ का सन्यास और अन्तिम संस्कार


धीरे-धीरे एक दिन वह आया कि माताजी ने भी सिर मुड़वा लिया और सन्यास ले लिया।

स्वामी अखण्डानन्दजी ने पृष्ठ संख्या 258 पर लिखा:

“वृन्दावन में श्री उड़ियाबाबाजी के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में उत्सव चल रहा था। … भण्डारा होने के बाद बाहर से आए हुए लोगों से मिल-जुल कर एक बजे दिन में (माताजी) अपने आसन पर लेट गईं। तीन बजे किसी ने देखा कि माताजी की सांस नहीं चल रही है। मैं गया तो देखा  उनका एक हाथ सिर के नीचे है और एक हाथ कमर पर। करवट से लेटी हुईं थीं। ऐसा लगता था, बिना किसी तकलीफ के, बिना किसी छटपटी के, उनके प्राण शान्त हो गए हों। वायु, वायु से एक तो रहती ही है, केवल बल्ब का फ्यूज उड़ गया था और देह का सम्बन्ध टूट गया था। चेतनात्मा तो सदा शुद्ध-बुद्ध-मुक्त अद्वितीय बृह्म है ही। उनका शरीर यमुना में (प्रवाहित कर) दिया गया। कछुओं का भण्डारा हुआ। उनके पौत्र विश्वम्भरनाथ ने अपने गांव जाकर विधि-पूर्वक श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन कराया। उनके श्रद्धालु भक्तों की संख्या तो वहाँ उस समय भी बहुत थी और अब भी है।“


स्वामी अखण्डानन्दजी की लगभग 120 पुस्तकें लिखीं। वे या तो गीता प्रेस, गोरखपुर ने या फिर सत्साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट, वृन्दावन ने प्रकाशित की हैं। ‘कल्याण’ गीता प्रेस, गोरखपुर  की मासिक पत्रिका है। ‘कल्याण’ के सम्पादकीय विभाग में काम करते हुए स्वामी अखण्डानन्दजी ने  श्रीमद्भागवत-महापुराण का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद किया था तथा अन्य कई पुस्तकें भी लिखीं थीं, जिनमें शामिल हैं: श्री भीष्म पितामह, भक्तराज हनुमान्, महात्मा विदुर, आदि। इनमें से श्री भीष्म पितामह, भक्तराज हनुमान्, महात्मा विदुर गीता सेवा ट्रस्ट के एप (gitaseva.org) को डाउनलोड करके फ्री में पढ़ी जा सकती हैं।(साभार संकलित लेख)

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની 64 કળાઓનું રહસ્ય🌺🌺

 ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની 64 કળાઓનું રહસ્ય🌺🌺


પૌરાણિક કથાઓ -

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ પોતાની શિક્ષા ગ્રહણ કરવા માટે અવંતિપુર (ઉજ્જૈન) સ્થિત ગુરુ સાંદીપનિ ના આશ્રમમાં ગયા હતા, જ્યાં તેઓ માત્ર 64 દિવસ રહ્યા હતા. ત્યાં તેમણે માત્ર 64 દિવસમાં જ પોતાના ગુરુ પાસેથી 64 કળાઓનું જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી લીધું હતું. જોકે શ્રીકૃષ્ણ સ્વયં ભગવાનના અવતાર હતા અને આ કળાઓ તેમને પહેલેથી જ આવડતી હતી, પરંતુ સામાન્ય જનમાનસને સમજાવવા માટે તેમણે મનુષ્ય અવતારમાં આ કળાઓ ફરીથી શીખી હતી.


શ્રીમદ્ ભાગવત પુરાણના દશમ સ્કંધના 45મા અધ્યાય અનુસાર, શ્રીકૃષ્ણ નીચેની 64 કળાઓમાં નિપુણ હતા:


64 કળાઓની યાદી

નૃત્ય – નાચવાની કળા.


વાદ્ય – વિવિધ પ્રકારના વાદ્યો વગાડવા.


ગાયન – સંગીત અને ગાયકી.


નાટ્ય – અભિનય અને વિવિધ હાવભાવ પ્રદર્શિત કરવા.


ઈન્દ્રજાલ – જાદુગરી અને હાથચાલાકી.


નાટક આખ્યાયિકા લેખન – નાટકો અને વાર્તાઓની રચના કરવી.


સુગંધિત દ્રવ્યો બનાવવાની કળા – અત્તર, તેલ વગેરે બનાવવાની વિધિ.


પુષ્પ શૃંગાર – ફૂલોના આભૂષણોથી શણગાર કરવો.


બેતાલ સિદ્ધિ – વેતાળ વગેરેને વશમાં રાખવાની વિદ્યા.


બાળકોની રમત – બાળકોના મનોરંજન માટેની રમતો.


વિજય વિદ્યા – યુદ્ધ કે સ્પર્ધામાં વિજય અપાવનારી વિદ્યા.


મંત્રવિદ્યા – મંત્રોનું જ્ઞાન અને પ્રયોગ.


શકુન-અપશકુન જ્ઞાન – પ્રશ્નોના ઉત્તરમાં શુભાશુભ જણાવવું અને ચિહ્નો સમજવા.


રત્ન કલા – રત્નોને અલગ-અલગ આકારોમાં કાપવા અને ઘડવા.


માતૃકા યંત્ર – વિવિધ પ્રકારના યંત્રો બનાવવાની કળા.


સાંકેતિક ભાષા – ગુપ્ત કે સાંકેતિક ભાષા બનાવવી.


જલ સ્તંભન – જળને બાંધવાની અથવા તેના પર ચાલવાની કળા.


વેલ-બુટ્ટા બનાવવાની કળા – વસ્ત્રો કે વસ્તુઓ પર ફૂલ-વેલની ભાત પાડવી.


અક્ષત-પુષ્પ પૂજન – પૂજા માટે રંગીન ચોખા અને ફૂલોથી સુંદર રચના કરવી.


પુષ્પ શય્યા – ફૂલોની પથારી તૈયાર કરવી.


પક્ષીઓની બોલી – પોપટ-મેના વગેરેની બોલી બોલવી કે તેમને બોલતા શીખવવું.


વૃક્ષ આયુર્વેદ – વૃક્ષો અને વનસ્પતિની ચિકિત્સા કરવાની કળા.


પ્રાણી યુદ્ધ રીત – ઘેટાં, મરઘા, બટેર વગેરેને લડાવવાની પદ્ધતિઓ.


ઉચ્ચાટન વિધિ – મંત્ર દ્વારા શત્રુને દૂર કરવાની કે માનસિક પ્રભાવ પાડવાની રીત.


વાસ્તુ કલા – ઘર કે ભવન બનાવવાની કારીગરી.


ગાલિચા-દરી નિર્માણ – ગાલીચા અને શેતરંજી બનાવવાની કળા.


સુથારી કામ – લાકડાની કારીગરી.


વેતર કામ – નેતર કે વાંસમાંથી આસન, ખુરશી કે પલંગ બનાવવાની કળા.


પાકશાસ્ત્ર – વિવિધ પ્રકારની રસોઈ, શાકભાજી, મિઠાઈ અને પકવાન બનાવવાની કળા.


હસ્ત લાઘવ – હાથની ચપળતાના કામ.


વેષ પરિવર્તન – ઇચ્છા મુજબ વસ્ત્રો અને રૂપ ધારણ કરવું.


પાનક-રસ નિર્માણ – વિવિધ પ્રકારના શરબત અને પીણાં બનાવવાની કળા.


દ્યુત ક્રીડા – જુગાર કે ચોપાટ જેવી રમતોનું જ્ઞાન.


છંદ જ્ઞાન – તમામ છંદો અને કાવ્યશાસ્ત્રનું જ્ઞાન.


વસ્ત્ર ગોપન – વસ્ત્રો છુપાવવા કે બદલવાની વિદ્યા.


આકર્ષણ વિદ્યા – દૂરના મનુષ્યો કે વસ્તુઓને આકર્ષવાની કળા.


પરિધાન – યોગ્ય કપડાં અને ઘરેણાં પહેરવાની પસંદગી.


હાર નિર્માણ – ફૂલહાર અને માળા બનાવવાની કળા.


વિચિત્ર સિદ્ધિ – જડીબુટ્ટીઓ અને મંત્રોથી શત્રુને નબળો પાડવાની ઔષધિ બનાવવી.


કર્ણપત્ર ભંગ – કાન અને ચોટલી માટે ફૂલોના આભૂષણો ગૂંથવા.


કઠપૂતળી કલા – કઠપૂતળી બનાવવી અને નચાવવી.


પ્રતિમા નિર્માણ – મૂર્તિઓ બનાવવાની કળા.


પ્રહેલિકા – ઉખાણાં ઉકેલવા અને પૂછવા.


સોયકામ – સિલાઈ, રફૂકામ અને ભરતકામ કરવાની કળા.


કેશ પ્રસાધન – વાળની સફાઈ અને સજાવટનું કૌશલ્ય.


મુષ્ટિ જ્ઞાન – મુઠ્ઠીમાં રહેલી વસ્તુ કે મનની વાત જાણી લેવી.


ભાષા જ્ઞાન – વિવિધ દેશોની ભાષાઓનું જ્ઞાન.


મ્લેચ્છ-કાવ્ય સમજ – ગુપ્ત સંકેતો કે વિદેશી ભાષાઓને સમજવાની કળા.


ધાતુ-રત્ન પરીક્ષા – સોનું, ચાંદી અને હીરા-પન્નાની પરખ કરવી.


ધાતુ નિર્માણ – કાચી ધાતુમાંથી સોનું-ચાંદી બનાવવાની કળા.


મણિ રંગ જ્ઞાન – રત્નોના રંગ અને ગુણવત્તા ઓળખવી.


ખનિજ જ્ઞાન – ખાણોની ઓળખ કરવાની વિદ્યા.


ચિત્રકલા – ચિત્રો દોરવાની કળા.


અંગ રાગ – નખ, વસ્ત્ર અને અંગોને રંગવાની કળા.


શય્યા રચના – પથારી સજાવવાની રીત.


મણિ ભૂમિકા – ઘરના ભોંયતળિયાને રત્નો અને મોતીઓથી જડવાની કળા.


કૂટનીતિ – રાજનીતિ અને રણનીતિનું જ્ઞાન.


ગ્રંથ પઠન – શાસ્ત્રો અને ગ્રંથો ભણાવવાની ચતુરાઈ.


નવીનતા – નવી નવી વાતો અને વિચારો રજૂ કરવા.


સમસ્યા પૂર્તિ – અધૂરી કાવ્ય પંક્તિઓ કે સમસ્યાઓનો ઉકેલ લાવવો.


કોષ જ્ઞાન – શબ્દભંડોળ અને શબ્દકોષનું જ્ઞાન.


માનસી કાવ્ય – મનમાં ને મનમાં શ્લોક કે કવિતાની રચના પૂર્ણ કરવી.


છલ વિદ્યા – જરૂર પડ્યે યુક્તિ કે છળથી કામ કઢાવવાની કળા.


ભૂષણ રચના – શંખ, હાથીદાંત અને અન્ય વસ્તુઓમાંથી ઘરેણાં બનાવવાની કળા.


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Saturday, March 28, 2026

भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?

 "भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।"भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।

रावण की सोने की लंका किसने जलायी थी ?

 पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने एक बार भगवान शिवसे कहा - प्रभो !यहां हमारे लिए रहनेके लिए घर तो नहीं हे मगर स्नान करनेके लिए एक कुटीयां भी नहीं हे। में स्नान करने जाऊं और कोई आ जाय तो क्या करू ? कम से कम एक मकान तो बनवा दीजिए। भगवान शिवने माता पार्वती के कहनेपर एक सोनेका महल कैलाश पर्वत पर बनवाया था। भगवान शिवने विश्वकर्माको बुलाकर उसके द्वारा निर्माण करवाया था बादमें भगवान शिवने प्रसन्न होकर उस महल श्री कुबेर (इडविडा पुत्र) को भेट दे दिया था और रावण ने  वह महल छल से कुबेर से छीन लिया था।जब माता पार्वतीको पता चला कि रावणने लंका छीन ली उसी समय उनको गुस्सा आया और उसने कहा की तेरी ये लंका तो में एक दिन जलाकर राख कर दूंगी। 


भगवान शिव ने त्रेतायुग में भगवान विष्णु के राम अवतार की सेवा करनेके लिए वानर रूप में हनुमान जी का अवतार लेने का विचार लिया। उस समय भगवान शिव मृत्यु लोक में आनेकी तैयारी कर रहे थे तब माता पार्वती ने पूछा - प्रभो ! कहा जा थे हो। शिवजीने बताया कि में भगवान रामकी सेवा करनेके लिए एक अवतार धारण करके पृथ्वी पर जा रहा हु। माताने कहा - में भी आपकी अर्द्धांगिनी बनकर आऊंगी। प्रभुने कहा मगर इस अवतारमें में ब्रह्मचारी रहूंगा अतः आप आ नहीं सकती। पार्वतिने कहा ठीक हे तो में आपकी पुंछ पर सवार होकर साथ रहूंगी।


भगवान शिव इस तरह रामकी सेवा करनेके लिए अंजनी पुत्र के रूप में अवतरित हुए और माता पार्वती उनकी पूंछ बन गई।


रावणने कुबेर से  लंका छीन ली तब से माता पार्वतिको रावणके प्रति द्वेष हो गया था। एक बार रावणने माता पार्वतिका हरण करने का प्लान बनाया। वह कैलाश पर्वत पर्वत पर गया और माता को उठा के ले जा रहा था। उस समय नारदजी सामने आ गए। उसनेबपूछा अरे रावण ये क्या बोझ उठाके ले जा रहा हे ? रावणने कहा में पार्वतिको उठाकर लंका ले जा रहा हु। नारदजी बोले अरे किसने कहा कि ये पार्वती हे। रावण बोला में खुद कैलाश से ले आया हु। नारदजीने समझाया अरे ये पार्वती नहीं हे ये तो होगी कोई उसकी दासी।

पार्वती के शरीर से तो कितनी मीठी सुगंध आती रहती हे। देख क्या उसके शरीरसे सुगंध आती हे ? बराबर उस समय माता पार्वती ने अपने शरीर से दुर्गंध फैलाना शुरू कर दिया। रावण बोला इसके शरीर से तो दुर्गंध आती हे। तब नारदजी बोले ये ही तो में कह रहा हु कि ये पार्वती नहीं हो सकती। रावणने उसको वही छोड़ दिया और माता वापस कैलाश पहुंच गई।


हनुमानजीने अपनी पुंछ से लंका जलाई थी मगर उस समय माता पार्वती ही अग्नि रूप धारण किये बैठी थी और उसने ही लंका जलाकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

Thursday, May 13, 2021

।।#वैशाख_अक्षय_तृतीया।।

 


मां रेणुका के स्तोत्र पाठ के उपरांत भगवान् परशुरामजी के ध्यान में मन लीन हो गया।

इसी अक्षय तृतीया को ही तो भगवान् परशुराम प्रकट हुए थे।

जो अक्षय रूप में आज भी विद्यमान हैं।

उनकी पूजा स्थली महेंद्र पर्वत का ध्यान आते ही विराट तेज पुंज विलसित हो गया।

दंडवत प्रणाम के उपरांत मैने प्रश्न किया भगवन्! वैशाख मास का महत्व बताएं।

तो भगवान् ने पुरातन इतिहास बताया कि वेद के वैशाख मास को #माधव मास कहते हैं। यह साक्षात् माधवस्वरूप है।

इसमें जप,स्नान होमादि का अनन्त फल है---


#सर्व्वेषामेव मासानां वैशाखः प्रवरः स्मृतः ।  तत्र स्नानं जपो होमः श्राद्धं दानादि यत् कृतम् । तत् सर्व्वं भूपतिश्रेष्ठ सत्यमक्षयमुच्यते ॥ एकतः सर्व्वतीर्थानि सर्व्वे यज्ञाः सदक्षिणाः । भूप वैशाखमासाद्य कोट्यंशेनापि नो समाः ॥ मेरुतुल्यानि हेमानि सर्व्वदानानि चैकतः ।


असंख्य पाप भी माधव पूजा से दूर हो जाते हैं---


 एकतः सर्व्वदा भूप माधवो माधवप्रियः ॥ असंख्यानि च पापानि वहुजन्मार्ज्जितानि च । निमेषार्द्धेन राजेन्द्र विलयं यान्ति माधवे ॥


यह मास में पितृप्रसन्नता के लिए भी विशेष फलदायी है,क्योंकि पितृस्वरूपी जनार्दन भी मैं ही हूँ---

 वैशाखमागतं दृष्ट्वा पितॄणामुत्सवो भवेत् । पुत्त्रो नियममाचर्य्य अस्मभ्यमुद्धरिष्यति ॥


वैशाख मास को आता देखकर पाप कांपने लगते हैं कि अब हमारा सफाया हो जाएगा-


आगतं माधवं दृष्ट्वा कम्पन्ते पापसञ्चयाः । अस्माकं नाशकालोऽयं भूपते ध्रुवमागतः ॥ वैशाखं परमं मासं माधवस्येति ह प्रियम् । नियमेन समाचर्य्य न भूयो जायते नरः ॥ मनसा संस्मरेद्यस्तु नियमं माधवोद्भवम् । पूयते पातकैः सर्व्वैः शक्रेण सह मोदते ॥ वचसा यो वदेद्भूप वैशाखं माधवप्रियम् । अहं समाचरिष्यामि स गच्छेद्ब्रह्मणः पुरम् ॥ यः समाचरते भूप नियमेन तु माधवम् । स विष्णो रूपमासाद्य विष्णुना सह मोदते ॥ नियनेन समाचर्य्य एकाहमपि भूपते । पितरस्तारितास्तेन यास्यन्ति परमां गतिम् ॥ तस्मिन् स्नात्वा विशुद्धात्मा दम्भमात्सर्य्यवर्ज्जितः । ईप्सितान् लभते कामान् श्रीविष्णोर्दयितो भवेत् ॥ ब्रह्मघ्नो वा कृतघ्नो वा मित्रघ्नस्त्रीविघातकः । नियमेन नयेन्मासं स मुक्तः सर्व्वपातकात्


सांख्य और योग क्या करेगा यदि मुक्ति चाहिए तो वैशाख मास में माधव का पूजन करें--


#किं करिष्यति सांख्येन योगेन नरनायक । मुक्तिमिच्छसि चेद्राजन् माधवं माधवेऽर्च्चय ॥


संन्यासी, विधवा,वानप्रस्थी को तो वैशाख मास में कोई न कोई शुभ नियम अवश्य लेना चाहिए अन्यथा नरकवास हो सकता है--


#यतिश्च विधवा चैव विशेषेण वनाश्रमी । वैशाखे नरकं याति ह्यकृत्वा नियमं नरः ॥


इस मास में अणुमात्र दान भी करोडों गुना बढ़ जाता है--


#अणुमात्रन्तु यत्किञ्चिद्यो ददाति च माधवे । काले वा यदि वाकाले कोटिकोटिगुणं भवेत् ॥


इस मास में विष्णु पूजा करने वाले को कोई भय नहीं रहता है--

#न पीडयन्ति ग्रहराक्षसा गणा यक्षाः पिशाचोरगभूतदानवाः । यो माधवे मासि नरेन्द्रवर्य्य ध्रुवं मुरारेर्व्रतमाचरन्ति ह ॥ “


वैशाख शुक्ल तृतीया को सतयुग का आरम्भ हुआ था इसलिए यह तिथि युगादि है--


#वैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीयायां कृतं युगम् ।


अतः इस तिथि में विष्णु याग,स्नान आदि 

यवादि दान , शंकर पूजा,गंगादि स्नान, विष्णु जी को गंधादि से लेपित अवश्य करें--

#तस्यां कार्य्यो यवैर्होमो यवैर्विष्णुं समर्च्चयेत् । यवान् दद्यात् द्बिजातिभ्यः प्रयतः प्राशयेद्यवान् ॥ पूजयेच्छङ्करं गङ्गां कैलासञ्च हिमालयम् । भगीरथञ्च नृपतिं सागराणां सुखावहम् ॥ “  * ॥ स्कान्दे । “ वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयाक्षयसंज्ञिता । तत्र मां लेपयेद्गन्धैर्लेपनैरतिशोभनैः ॥

या शुक्ला नरशार्दूल वैशाखे मासि वै तिथिः तृतीया साक्षया ख्याता गीर्व्वाणैरपि वन्दिता ॥ योऽस्यां ददाति करकान् वारिवाजसमन्वितान् । स याति पुरुषो वीर लोकान् वै हेममालिनः ॥


दुष्ट क्षत्रियों के संहारक और  दशरथ जनकादि सद् क्षत्रियों के पालक भगवान् परशुराम जी को कोटि कोटि प्रणाम।


कृष्ण चंद्र शास्त्री

१३.५.२१

*अक्षय तृतीय का महत्व*

 

*“न क्षयति इति अक्षय” *

अर्थात जिसका कभी क्षय न हो उसे अक्षय कहते हैं और वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। 

इसी दिन भगवान परशुरामका जन्म होनेके कारण इस दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है। अक्षय तृतीया के दिन गंगा-स्नान करने एवं भगवान श्री कृष्ण को चंदन लगाने से है।मान्यता है कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान करने, श्री सूक्त के पाठ के साथ हवन करने का भी विधान है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन माँ लक्ष्मी की पूजा करने से माँ अवश्य ही कृपा करती है जातक को अक्षय पुण्य के साथ उसका जीवन धन-धान्य से भर जाता है।

जानिए क्या है 

अक्षय तृतीया का महत्व, 

अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है,

 *अक्षय तृतीया के दिन क्या करें,*

 जो मनुष्य इस दिन गंगा स्नान/ पवित्र नदियों में स्नान करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यदिघर पर ही स्नान करना पड़े तो सूर्य उदय से पूर्व उठ कर एक बाल्टी में जल भर कर उस में गंगा जल मिला कर स्नान करना चाहिए । इस दिन भगवान श्रीकृष्ण / श्री विष्णु जी की पूजा , होम-हवन, जप, दान करने के बाद पितृतर्पण भी अवश्य ही करना चाहिए। इस दिन जल में तिल, अक्षत, गंगा जल, शहद, तुलसी डाल कर देवताओं और पितरो का तर्पण करने से पितृ अति प्रसन्न होतेहै, उनका आशीर्वाद मिलता है। तिल अर्पण करते समय भाव रखना चाहिए कि ‘हम यह ईश्वर द्वारा सद्बुद्धि देने, कृपा के कारण ही कर पा रहे है। अर्थात तर्पण के समय साधक के मन में किसी भी तरह अहंकार नहीं आना चाहिए।अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु को सत्तूका भोग लगाया जाता हैऔर प्रसाद में इसे ही बांटा जाता है। इस दिन प्रत्येक मनुष्य सत्तू अवश्य खाना चाहिए।आज के दिन भगवान विष्णु को मिश्री और भीगी हुई चने की दाल का भोग लगया जाता है ।इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है।इसी दिन श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं।नर-नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था।श्री परशुरामजी का अवतरण भी इसी दिन हुआ था।हयग्रीव का अवतार भी इसी दिन हुआ था।वृंदावन के श्री बांकेबिहारीजी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण-दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढंके रहते हैं।

शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीय के दिन ही भगवान कृष्ण और सुदामा का मिलन हुआ था और सुदामा का भाग्य बदल गया था।ब्रह्मा जी के पुत्र श्री अक्षय कुमार का आज ही के दिन अवतरण हुआ था ।आज ही के दिन कुबेर देव को अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई थी वह देवताओं के कोषाध्यक्ष बने थे ।इस दिन गंगा-स्नान /नदी सरोवर में स्नान करने तथा भगवान श्री कृष्ण को चंदन लगाने का विशेष महत्व है।अक्षय तृतीया के दिन ही गणेश जी ने भगवान व्यास के साथ इसी दिन से महाभारत लिखना शुरू किया था।इस दिन महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान किये जाते है। इस दिनश्री सूक्त , लक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ करने से माँलक्ष्मी यथाशीघ्र प्रसन्न होती है, जातक धन-धान्य से परिपूर्ण हो ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।शास्त्रों के अनुसार आज अक्षय तृतीय के दिन ही महाभारतका युद्ध समाप्त हुआ था ।शुभ व पूजनीय कार्य इस दिन होते हैं, जिनसे प्राणियों (मनुष्यों) का जीवन धन्य हो जाता है।भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहाहै कि यह तिथि परम पुण्यमय है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है।इस दिन भगवान बद्रीनाथ को अक्षय (साबुत ) चावल चढ़ाने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।इस दिन अपने सामर्थ के अनुसार अपने माता पिता ,बड़े बुजुर्ग और अपने गुरु को उपहार देकर उनका आशीर्वाद अवश्य ही लेना चाहिए ,उनके साथ कुछ समय भी बिताना चाहिए । इस दिन मिला हुआ आशीर्वाद वरदान साबित होता है , और जीवन में सच्चे ह्रदय से मिले आशीर्वाद का कोईभी मोल नहीं है ।

*अक्षय तृतीया पर यह ना करें*

भविष्य पुराण में बताया गया है कि अक्षय तृतीया के दिन व्यक्ति जो भी काम करता है उसका परिणाम इस जन्म में ही नहीं बल्कि कई-कई जन्मों तक प्राप्त होता है।इसलिए अक्षय तृतीया के दिनकुछ भी करने से पहले यह सोच लेंकि आप जो कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा।अक्षय तृतीया के दिन लालच के कारण किसी को आर्थिक नुकसानपहुंचाते हैं,क्रोध या हिंसा करते है किसी का तिरस्कार करतेहै या काम वासना से पीड़ित होकर कोई गलत काम करते है तो इसका कष्टकारी परिणाम भी आपको कई जन्मों तक भुगतना पड़ता है।

श्रीविष्णु भगवान की पूजा और दान का विशेष महत्व है। 🙏🙏

सौजन्य

श्री रसीक दवे, जुनागढ़ गुजरात

🙏🙇‍♂🙏💐💐

Wednesday, May 12, 2021

स्त्रीओ के सोलह श्रृंगार

 #स्त्रियों के #सोलह_श्रृंगार और उनका #महत्व।


दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥

कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥


श्री राम चरित मानस के अनुसार माता अनसूया ने माता जानकी को ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य-नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं और फिर माता अनसूया ने अपने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के गुण धर्म का बखान किया।। 


हिन्दू धर्म में महिलाओं के लिए 16 श्रृंगार का विशेष महत्व है। विवाह के बाद स्त्री इन सभी चीजों को अनिवार्य रूप से धारण करती है। हर एक चीज का अलग महत्व है। हर स्त्री चाहती थी की वे सज धज कर सुन्दर लगे यह उनके रूप को ओर भी अधिक सौन्दर्यवान बना देता है।


यहां इन सोलह श्रृंगार के बार मे विस्तृत वर्णन किया गया है।


पहला श्रृंगार:👉 बिंदी

संस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है। भवों के बीच रंग या कुमकुम से लगाई जाने वाली भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाती है। सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी समझती हैं। इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।


धार्मिक मान्यता

बिंदी को त्रिनेत्र का प्रतीक माना गया है. दो नेत्रों को सूर्य व चंद्रमा माना गया है, जो वर्तमान व भूतकाल देखते हैं तथा बिंदी त्रिनेत्र के प्रतीक के रूप में भविष्य में आनेवाले संकेतों की ओर इशारा करती है।


वैज्ञानिक मान्यता

विज्ञान के अनुसार, बिंदी लगाने से महिला का आज्ञा चक्र सक्रिय हो जाता है. यह महिला को आध्यात्मिक बने रहने में तथा आध्यात्मिक ऊर्जा को बनाए रखने में सहायक होता है. बिंदी आज्ञा चक्र को संतुलित कर दुल्हन को ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है।


दूसरा श्रृंगार: सिंदूर

उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है और विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, सौभाग्यवती महिला अपने पति की लंबी उम्र के लिए मांग में सिंदूर भरती है. लाल सिंदूर महिला के सहस्रचक्र को सक्रिय रखता है. यह महिला के मस्तिष्क को एकाग्र कर उसे सही सूझबूझ देता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, सिंदूर महिलाओं के रक्तचाप को नियंत्रित करता है. सिंदूर महिला के शारीरिक तापमान को नियंत्रित कर उसे ठंडक देता है और शांत रखता है।


तीसरा श्रृंगार: काजल

काजल आँखों का श्रृंगार है. इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन और उसके परिवार को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, काजल लगाने से स्त्री पर किसी की बुरी नज़र का कुप्रभाव नहीं पड़ता. काजल से आंखों से संबंधित कई रोगों से बचाव होता है. काजल से भरी आंखें स्त्री के हृदय के प्यार व कोमलता को दर्शाती हैं।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, काजल आंखों को ठंडक देता है. आंखों में काजल लगाने से नुक़सानदायक सूर्य की किरणों व धूल-मिट्टी से आंखों का बचाव होता है।


चौथा श्रृंगार: मेंहदी

मेहंदी के बिना सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। शादी के वक्त दुल्हन और शादी में शामिल होने वाली परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने पैरों और हाथों में मेहंदी रचाती है। ऐसा माना जाता है कि नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, उसका पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है।


धार्मिक मान्यता

मानयताओं के अनुसार, मेहंदी का गहरा रंग पति-पत्नी के बीच के गहरे प्रेम से संबंध रखता है. मेहंदी का रंग जितना लाल और गहरा होता है, पति-पत्नी के बीच प्रेम उतना ही गहरा होता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार मेहंदी दुल्हन को तनाव से दूर रहने में सहायता करती है. मेहंदी की ठंडक और ख़ुशबू दुल्हन को ख़ुश व ऊर्जावान बनाए रखती है।


पांचवां श्रृंगारः शादी का जोड़ा

उत्तर भारत में आम तौर से शादी के वक्त दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा (घाघरा, चोली और ओढ़नी) पहनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में फेरों के वक्त दुल्हन को पीले और लाल रंग की साड़ी पहनाई जाती है। इसी तरह महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी के वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी मराठी शैली में बांधती हैं।


धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लाल रंग शुभ, मंगल व सौभाग्य का प्रतीक है, इसीलिए शुभ कार्यों में लाल रंग का सिंदूर, कुमकुम, शादी का जोड़ा आदि का प्रयोग किया जाता है।


वैज्ञानिक मान्यता

विज्ञान के अनुसार, लाल रंग शक्तिशाली व प्रभावशाली है, इसके उपयोग से एकाग्रता बनी रहती है. लाल रंग आपकी भावनाओं को नियंत्रित कर आपको स्थिरता देता है।


छठा श्रृंगार: गजरा


दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार फीका सा लगता है।दक्षिण भारत में तो सुहागिन स्त्रियां प्रतिदिन अपने बालों में हरसिंगार के फूलों का गजरा लगाती है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, गजरा दुल्हन को धैर्य व ताज़गी देता है. शादी के समय दुल्हन के मन में कई तरह के विचार आते हैं, गजरा उन्हीं विचारों से उसे दूर रखता है और ताज़गी देता है।


वैज्ञानिक मान्यता

विज्ञान के अनुसार, चमेली के फूलों की महक हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है. चमेली की ख़ुशबू तनाव को दूर करने में सबसे ज़्यादा सहायक होती है।


सातवां श्रृंगार: मांग टीका

मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, मांगटीका महिला के यश व सौभाग्य का प्रतीक है. मांगटीका यह दर्शाता है कि महिला को अपने से जुड़े लोगों का हमेशा आदर करना है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार मांगटीका महिलाओं के शारीरिक तापमान को नियंत्रित करता है, जिससे उनकी सूझबूझ व निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।


आठवां श्रृंगारः नथ

विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि में चारों ओर सात फेरे लेने के बाद देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि सुहागिन स्त्री के नथ पहनने से पति के स्वास्थ्य और धन-धान्य में वृद्धि होती है। उत्तर भारतीय स्त्रियां आमतौर पर नाक के बायीं ओर ही आभूषण पहनती है, जबकि दक्षिण भारत में नाक के दोनों ओर नाक के बीच के हिस्से में भी छोटी-सी नोज रिंग पहनी जाती है, जिसे बुलाक कहा जाता है। नथ आकार में काफी बड़ी होती है इसे हमेशा पहने रहना असुविधाजनक होता है, इसलिए सुहागन स्त्रियां इसे शादी-व्याह और तीज-त्यौहार जैसे खास अवसरों पर ही पहनती हैं, लेकिन सुहागिन स्त्रियों के लिए नाक में आभूषण पहनना अनिर्वाय माना जाता है। इसलिए आम तौर पर स्त्रियां नाक में छोटी नोजपिन पहनती हैं, जो देखने में लौंग की आकार का होता है। इसलिए इसे लौंग भी कहा जाता है।


धार्मिक मान्यता

हिंदू धर्म में जिस महिला का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, उसकी नथ को उतार दिया जाता है। इसके अलावा हिंदू धर्म के अनुसार नथ को माता पार्वती को सम्मान देने के लिये भी पहना जाता है।


वैज्ञानिक मान्यता

जिस प्रकार शरीर के अलग-अलग हिस्सों को दबाने से एक्यूप्रेशर का लाभ मिलता है, ठीक उसी प्रकार नाक छिदवाने से एक्यूपंक्चर का लाभ मिलता है। इसके प्रभाव से श्वास संबंधी रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है। कफ, सर्दी-जुकाम आदि रोगों में भी इससे लाभ मिलते हैं। आयुर्वेद के अनुसार नाक के एक प्रमुख हिस्से पर छेद करने से स्त्रियों को मासिक धर्म से जुड़ी कई परेशानियों में राहत मिल सकती है। आमतौर पर लड़कियां सोने या चांदी से बनी नथ पहनती हैं। ये धातुएं लगातार हमारे शरीर के संपर्क में रहती हैं तो इनके गुण हमें प्राप्त होते हैं। आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म और रजत भस्म बहुत सी बीमारियों में दवा का काम करती है।


नौवां श्रृंगारः कर्णफूल

कान में पहने जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुंदर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है। विवाह के बाद स्त्रियों का कानों में कणर्फूल (ईयरिंग्स) पहनना जरूरी समझा जाता है। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, कर्णफूल यानी ईयररिंग्स महिला के स्वास्थ्य से सीधा संबंध रखते हैं. ये महिला के चेहरे की ख़ूबसूरती को निखारते हैं. इसके बिना महिला का शृंगार अधूरा रहता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार हमारे कर्णपाली (ईयरलोब) पर बहुत से एक्यूपंक्चर व एक्यूप्रेशर पॉइंट्स होते हैं, जिन पर सही दबाव दिया जाए, तो माहवारी के दिनों में होनेवाले दर्द से राहत मिलती है. ईयररिंग्स उन्हीं प्रेशर पॉइंट्स पर दबाव डालते हैं. साथ ही ये किडनी और मूत्राशय (ब्लैडर) को भी स्वस्थ बनाए रखते हैं।


दसवां श्रृंगार: हार या मंगल सूत्र

गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है। हार पहनने के पीछे स्वास्थ्यगत कारण हैं। गले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में कुछ दबाव बिंदु ऐसे होते हैं जिनसे शरीर के कई हिस्सों को लाभ पहुंचता है। इसी हार को सौंदर्य का रूप दे दिया गया है और श्रृंगार का अभिन्न अंग बना दिया है। दक्षिण और पश्चिम भारत के कुछ प्रांतों में वर द्वारा वधू के गले में मंगल सूत्र पहनाने की रस्म की वही अहमियत है।


धार्मिक मान्यता

ऐसी मान्यता है कि मंगलसूत्र सकारात्मक ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित कर महिला के दिमाग़ और मन को शांत रखता है. मंगलसूत्र जितना लंबा होगा और हृदय के पास होगा वह उतना ही फ़ायदेमंद होगा. मंगलसूत्र के काले मोती महिला की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मज़बूत करते हैं।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, मंगलसूत्र सोने से निर्मित होता है और सोना शरीर में बल व ओज बढ़ानेवाली धातु है, इसलिए मंगलसूत्र शारीरिक ऊर्जा का क्षय होने से रोकता है।


ग्यारहवां श्रृंगारः बाजूबंद

कड़े के सामान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चांदी का होता है। यह बाहों में पूरी तरह कसा जाता है। इसलिए इसे बाजूबंद कहा जाता है। पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना

जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती

है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, बाजूबंद महिलाओं के शरीर में ताक़त बनाए रखने व पूरे शरीर में उसका संचार करने में सहायक होता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, बाजूबंद बाजू पर सही मात्रा में दबाव डालकर रक्तसंचार बढ़ाने में सहायता करता है।


बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियां

सोने का कंगन अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से ही सुहाग का प्रतीक माना जाता रहा है। हिंदू परिवारों में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि सास अपनी बड़ी बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुख और सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद के साथ वही कंगन देती थी, जो पहली बार ससुराल आने पर उसे उसकी सास ने उसे दिये थे। इस तरह खानदान की पुरानी धरोहर को सास द्वारा बहू को सौंपने की परंपरा का निर्वाह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। पंजाब में स्त्रियां कंगननुमा डिजाइन का एक विशेष पारंपरिक आभूषण पहनती है, जिसे लहसुन की पहुंची कहा जाता है। सोने से बनी इस पहुंची में लहसुन की कलियां और जौ के दानों जैसे आकृतियां बनी होती है। हिंदू धर्म में मगरमच्छ,हांथी, सांप, मोर जैसी जीवों का विशेष स्थान दिया गया है। उत्तर भारत में ज्यादातर स्त्रियां ऐसे पशुओं के मुखाकृति वाले खुले मुंह के कड़े पहनती हैं, जिनके दोनों सिरे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। पारंपरिक रूप से ऐसा माना जात है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूड़ियों से भरी हानी चाहिए। यहां तक की सुहागन स्त्रियां चूड़ियां बदलते समय भी अपनी कलाई में साड़ी का पल्लू कलाई में लपेट लेती हैं ताकि उनकी कलाई एक पल को भी सूनी न रहे। ये चूड़ियां आमतौर पर कांच, लाख और हांथी दांत से बनी होती है। इन चूड़ियों के रंगों का भी विशेष महत्व है।नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है। होली के अवसर पर पीली या बंसती रंग की चूड़ियां पहनी जाती है, तो सावन में तीज के मौके पर हरी और धानी चूड़ियां पहनने का रीवाज सदियों से चला आ रहा है। विभिन्न राज्यों में विवाह के मौके पर अलग-अलग रंगों की चूड़ियां पहनने की प्रथा है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, चूड़ियां पति-पत्नी के भाग्य और संपन्नता की प्रतीक हैं. यह भी मान्यता है कि महिलाओं को पति की लंबी उम्र व अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमेशा चूड़ी पहनने की सलाह दी जाती है. चूड़ियों का सीधा संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, चूड़ियों से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि महिलाओं की हड्डियों को मज़बूत करने में सहायक होती है. महिलाओं के रक्त के परिसंचरण में भी चूड़ियां सहायक होती हैं।


तेरहवां श्रृंगार: अंगूठी


शादी के पहले मंगनी या सगाई के रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ रामायण में भी इस बात का उल्लेख मिलता है। सीता का हरण करके रावण ने जब सीता को अशोक वाटिका में कैद कर रखा था तब भगवान श्रीराम ने हनुमानजी के माध्यम से सीता जी को अपना संदेश भेजा था। तब स्मृति चिन्ह के रूप में उन्होंनें अपनी अंगूठी हनुमान जी को दी थी।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, अंगूठी पति-पत्नी के प्रेम की प्रतीक होती है, इसे पहनने से पति-पत्नी के हृदय में एक-दूसरे के लिए सदैव प्रेम बना रहता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, अनामिका उंगली की नसें सीधे हृदय व दिमाग़ से जुड़ी होती हैं, इन पर प्रेशर पड़ने से दिल व दिमाग़ स्वस्थ रहता है।


चौदहवां श्रृंगार: कमरबंद

कमरबंद कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती हैं, इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई पड़ती है। सोने या

चांदी से बने इस आभूषण के साथ बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती है। कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने

घर की स्वामिनी है।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, महिला के लिए कमरबंद बहुत आवश्यक है. चांदी का कमरबंद महिलाओं के लिए शुभ माना जाता है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, चांदी का कमरबंद पहनने से महिलाओं को माहवारी तथा गर्भावस्था में होनेवाले सभी तरह के दर्द से राहत मिलती है. चांदी का कमरबंद पहनने से महिलाओं में मोटापा भी नहीं बढ़ता।


पंद्रहवाँ श्रृंगारः बिछुवा

पैरों के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कह जाता है। पारंपरिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण में छोटा सा शीशा लगा होता है, पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में नववधू सबके सामने पति के सामने देखने में भी सरमाती थी। इसलिए वह नजरें झुकाकर चुपचाप आसपास खड़े पति की सूरत को इसी शीशे में निहारा करती थी पैरों के अंगूठे और छोटी अंगुली को छोड़कर बीच की तीन अंगुलियों में चांदी का विछुआ पहना जाता है। शादी में फेरों के वक्त लड़की जब सिलबट्टे पर पेर रखती है, तो उसकी भाभी उसके पैरों में बिछुआ पहनाती है। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि दुल्हन शादी के बाद आने वाली सभी समस्याओं का हिम्मत के साथ मुकाबला करेगी।


धार्मिक मान्यता

महिलाओं के लिए पैरों की उंगलियों में बिछिया पहनना शुभ व आवश्यक माना गया है. ऐसी मान्यता है कि बिछिया पहनने से महिलाओं का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और घर में संपन्नता बनी रहती है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं के पैरों की उंगलियों की नसें उनके गर्भाशय से जुड़ी होती हैं, बिछिया पहनने से उन्हें गर्भावस्था व गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं से राहत मिलती है. बिछिया पहनने से महिलाओं का ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित रहता है।


सोलहवां श्रृंगार: पायल

पैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है। पुराने जमाने में पायल की झंकार से घर के

बुजुर्ग पुरुष सदस्यों को मालूम हो जाता था कि बहू आ रही है और वे उसके रास्ते से हट जाते थे। पायल के संबंध में एक और रोचक बात यह है कि पहले छोटी उम्र में ही लड़िकियों की शादी होती थी। और कई बार जब नववधू को माता-पिता की याद आती थी तो वह चुपके से अपने मायके भाग जाती थी। इसलिए नववधू के पैरों में ढेर सारी घुंघरुओं वाली पाजेब पहनाई जाती थी ताकि जब वह घर से भागने लगे तो उसकी आहट से मालूम हो जाए कि वह कहां जा रही है पैरों में पहने जाने वाले आभूषण हमेशा सिर्फ चांदी से ही बने होते

हैं। हिंदू धर्म में सोना को पवित्र धातु का स्थान प्राप्त है, जिससे बने मुकुट देवी-देवता धारण करते हैं और ऐसी मान्यता है कि पैरों में सोना पहनने से धन की देवी-लक्ष्मी का अपमान होता हैं।


धार्मिक मान्यता

मान्यताओं के अनुसार, महिला के पैरों में पायल संपन्नता की प्रतीक होती है. घर की बहू को घर की लक्ष्मी माना गया है, इसी कारण घर में संपन्नता बनाए रखने के लिए महिला को पायल पहनाई जाती है।


वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, चांदी की पायल महिला को जोड़ों व हड्डियों के दर्द से राहत देती है. साथ ही पायल के घुंघरू से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा घर से दूर रहती है।


जय अंबे जय गुरुदेव।🙏🏻

--- शास्त्री श्री राजेश आचार्य