Friday, September 25, 2026

ऋग्वेद और #विज्ञान

 #ऋग्वेद और #विज्ञान ...क्या कभी सोचा है कि जिस मंत्र के एक उच्चारण से हज़ारों साल पहले ब्रह्मांड का मौसम बदल जाता था, उसी मंत्र को आज तुम एक लाख बार भी रट लो, तो सिर का दर्द तक गायब नहीं होता?

दोष मंत्र में है ?

या  उस खोपड़ी में, जिसे तुमने सूचनाओं और वासनाओं का डस्टबिन बना रखा है? रुकिए, रीढ़ सीधी कीजिए और सांस थामकर प्रयाग फ़ाइल्स पढ़िए—क्योंकि जो सच आज आप जानने वाले हैं, वह सनातन विज्ञान के प्रति आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल देगा!

कल्पना कीजिए… आज से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व का आर्यावर्त। त्रिवेणी के पावन तट पर सूर्य की पहली लालिमा फूटी है। न कोई कंक्रीट का जंगल, न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का अदृश्य ज़हर, न मोबाइल स्क्रीन्स की नीली रोशनी से अंधी होती आँखें, और न ही प्रति सेकंड हज़ारों व्यर्थ सूचनाओं से हांफता हुआ कोई मस्तिष्क!

वहाँ शांत, निष्कंप बैठे हैं एक ऋषि। आँखें बंद हैं, लेकिन अंतर्चक्षु खुले हैं। वायुमंडल इतना पवित्र और संतुलित कि प्रकृति का एक-एक परमाणु 'होमियोस्टैसिस' के शिखर पर कंपित हो रहा है।

ऋषि के कंठ से कोई साधारण शब्द नहीं निकलता। उनकी नाभि के गहन अंधकार से एक विस्फोट होता है—नाद का विस्फोट! वह कम्पन रीढ़ के भीतर सुप्त सुषुम्ना को छूता है, हृदय-आकाश में आलोकित होता है और जब ओष्ठों से बाहर फूटता है, तो ब्रह्मांड के कण-कण की फ्रीक्वेंसी से एकाकार हो जाता है। बादलों की गति ठहर जाती है, अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, और मृत्यु तक अपने पाँव पीछे खींच लेती है!


वह ऋग्वेद का युग था। वह सतयुगी चेतना थी!


और आज?


आज उसी त्रिवेणी की पावन माटी पर बैठा आधुनिक मानव, कान में ईयरफोन ठूँसे, सोशल मीडिया के विषैले कचरे को निगलते हुए, मंत्र की किताबें खोलकर रट रहा है—और फिर झुंझलाकर पूछता है:


"ऋग्वेद के मंत्र आज काम क्यों नहीं करते? क्या विज्ञान बड़ा है या वेद?"


सुनिए आधुनिक विज्ञान के दंभी कर्णधारों! वेद कोई काल्पनिक पोथी नहीं, इस ब्रह्मांड का परम क्वांटम कोड है। समस्या कोड में नहीं है, समस्या तुम्हारे सड़े हुए, जंग खाए रिसीवर में है!

यह विज्ञान है, जादू नहीं: जब एंटीना ही पिघल चुका हो!

भौतिकी का अकाट्य नियम है—'नो रेजोनेंस, नो एनर्जी ट्रांसफर' (No Resonance, No Energy Transfer)।

हवा में सैंकड़ों उपग्रहों की अल्ट्रा-हाई-डेफिनिशन 4K तरंगे तैर रही हैं। ब्रह्मांडीय नाद का लाइव प्रसारण हर पल, इसी क्षण तुम्हारे कमरे में, तुम्हारी छाती के आर-पार गुज़र रहा है।


आपके मन में अब एक सवाल होगा कि मनीष जी इसे कोई अगर साधारण उदाहरण से समझाएं तो अधिक समझ में आएगा तो परेशान ना हो इसे एक सीधे उदाहरण से समझिए—मान लीजिए आपके कमरे में 5G की सुपर-फास्ट स्पीड तैर रही है, हवा में 8K का डेटा उड़ रहा है। लेकिन आपके हाथ में बीस साल पुराना 2G का ऐसा फोन है जिसकी स्क्रीन चटक चुकी है, बैटरी फूलकर फटने को है और एंटीना भीतर से गल चुका है। 


क्या उस फोन पर 5G चलेगा? 

कभी नहीं! 

अब क्या आप नेटवर्क प्रोवाइडर को गाली देंगे? 

गलती उस 5G सिग्नल की नहीं है, उस कबाड़ हो चुके मोबाइल की है!

मंत्र वही 5G कॉस्मिक डेटा हैं, और तुम्हारा शरीर वही जंग लगा फोन! अगर तुम्हारे पास रखा टीवी फूटा हो और उसका सर्किट बोर्ड धूल-पानी से शॉर्ट हो चुका हो, तो स्क्रीन पर 4K मूवी नहीं, केवल 'खर-खर' का भयानक, सिरदर्द करने वाला शोर ही दिखेगा।

तुम वही टीवी हो! तुम्हारी नाड़ियों में जंक फूड, केमिकल युक्त तामसिक अन्न और बासी भोजन का ज़हरीला 'आम' (Cellular Toxins) जमा है। तुम्हारा नर्वस सिस्टम, जो कभी ब्रह्मांड के सूक्ष्म इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक संकेतों को पकड़ने वाला 'सुपरकंडक्टर' था, आज तनाव और उत्तेजना के शॉर्ट-सर्किट से जल चुका है।


छान्दोग्य उपनिषद ने कहा है:

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः!

(जब तक हार्डवेयर शुद्ध नहीं होगा, तब तक चेतना का सिग्नल-प्रोसेसर कभी स्थिर नहीं हो सकता!)


प्रयाग फाइल्स को बढ़ाते हुए एक बात आप समझ लीजिए उबलते पानी में आसमान नहीं दिखता: सॉफ्टवेयर की विकृति समझिए।

जरा सोचिए, अगर किसी चौड़े बर्तन में पानी खौल रहा हो, आग पर उबल रहा हो, और आप उसमें अपना चेहरा देखने की कोशिश करें


—तो क्या दिखेगा? 

केवल धुआँ, बुलबुले और विकृत लकीरें! 

जैसे ही आप आग बुझाते हैं, पानी शांत, निष्कंप और स्थिर होता है, तो उसमें आसमान का सबसे छोटा तारा भी आईने की तरह साफ़ झलकने लगता है।

दिनभर ईर्ष्या, तनाव, क्रोध और सोशल मीडिया की आग पर खौलता हुआ तुम्हारा मन वही उबलता हुआ पानी है। जब अंतःकरण की सतह ही उबल रही हो, तो ब्रह्मांडीय सत्य का प्रतिबिंब उसमें कैसे उतरेगा?

और दूसरा सच यह है कि मंत्र केवल अक्षरों का खेल नहीं, भाव का पासवर्ड है!

आप अपने बैंक खाते का पासवर्ड टाइप कर रहे हों; एक-एक स्पेलिंग सही है, संख्या सही है, लेकिन अगर की-बोर्ड का 'Caps Lock' ऑन रह गया, तो क्या सिस्टम आपको लॉगिन करने देगा? कभी नहीं! स्क्रीन पर तुरंत 'Access Denied' का एरर आ जाएगा।


अगर आपके मन में अब सवाल यह है कि मनीष जी क्या मंत्र का भी यही नियम है। तुम्हें हर बार वही कहूंगा कि बिल्कुल हां....।

महामृत्युंजय या गायत्री 'केस-सेंसिटिव पासवर्ड' हैं। जब होंठों से मंत्र सही निकल रहा हो, लेकिन भीतर ईर्ष्या, वासना या अहंकार का 'कैप्स लॉक' ऑन हो—तो पासवर्ड मिसमैच हो जाता है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पोर्टल खुलता ही नहीं! भीतर केवल मानसिक धुआँ उठता है, कोई दिव्य चमत्कार नहीं!


प्रयाग फाइल्स को पढ़ाते हुए अब तक कई लोगों को लगा होगा कि पता नहीं क्या बड़ी-बड़ी बातें मनीष जी कर रहे हैं जिसका कोई लेना-देना आज के समय से नहीं है। उसमें कई वैचारिक रूप से संपन्न लोग भी हो सकते हैं। 

तो क्या तुम्हें लगता है कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे जो इन रहस्यों को पत्थरों में नहीं, ध्वनियों में छुपा गए? नासा आज जिस ध्वनि को अंतरिक्ष में खोज रहा है, उसे हमारे ऋषियों ने हज़ारों साल पहले कागज़ तक पर नहीं, सीधे चेतना के डीएनए में कोड कर दिया था! अब जो श्लोक तुम पढ़ने जा रहे हो, उसे पढ़कर विज्ञान भी नतमस्तक होकर हाथ जोड़ लेगा!


आज से सहस्रों वर्ष पूर्व, जब आधुनिक विज्ञान घुटनों के बल चलना भी नहीं सीखा था, तब ऋग्वेद के द्रष्टा ने मनुष्य जाति के इसी दिवालियापन को देख लिया था। उन्होंने आने वाले युगों के अहंकार पर हँसते हुए वह ऋचा लिखी, जिसे पढ़कर आज भी क्वांटम भौतिकविदों के माठे पर पसीना आ जाए। आई प्रयाग फाइल्स में अब ऋग्वेद की उसे ऋचा को खोलते हैं। 


 उ॒त त्वः॒ पश्य॒न् न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्वः॑ शृ॒ण्वन् न शृ॑णोत्ये॒नाम्।

उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१ वि स॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑॥

 (ऋग्वेद — मण्डल 10, सूक्त 71, मन्त्र 4)


अपनी साँसें रोककर इस ऋचा के एक-एक शब्द के महाविस्फोट को अपनी आत्मा पर उतरते महसूस कीजिए:

  उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचम्:

   "अरे, यह संसार अंधों की भीड़ है! लाखों-करोड़ों लोग आँखों से इस वेद-वाणी के अक्षरों को घूर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, पोथियों के पन्ने पलट रहे हैं—किंतु वे इसे रत्ती भर भी 'देख' नहीं पा रहे हैं!"

   (क्योंकि लिपि दिख रही है, उसके पीछे का ब्रह्मांडीय डायमेंशन बंद है!)


  उत त्वः शृण्वन् न शृणोत्येनाम्:

   "वे कानों से इन मंत्रों के उच्च-स्वर नाद को सुन रहे हैं, लाउडस्पीकरों पर बजा रहे हैं, जीभ से दोहरा रहे हैं—किंतु वे धिक्कार के पात्र हैं, क्योंकि वे इसके असली मर्म, इसके जीवित कंपन को रंच मात्र भी 'सुन' नहीं पा रहे हैं!"

   (स्थूल कान केवल हवा के धक्के सुनते हैं, चेतना की गहराई नहीं!)


और अब… ऋचा के दूसरे चरण पर आइए, जहाँ ऋषि ने ऐसा रहस्योद्घाटन किया है कि चेतना सुन्न हो जाए।


  उतो त्वस्मै तन्वं वि सस्रे जायेव पत्ये उशती सुवासाः:


   "किंतु… इस अनंत ब्रह्मांड में उस विरले, शुद्ध, निष्काम और तपस्वी साधक के सम्मुख—यह परा-वाणी, यह महाशक्ति अपना घूँघट स्वयं हटा देती है! वह अपना संपूर्ण दिव्य, नग्न और परा-ऊर्जा स्वरूप ठीक उसी प्रकार उसके सामने अनावृत कर देती है, जैसे कोई रूपवती, सती, प्रेम से उत्कंठित नववधू एकांत कक्ष में अपने प्राणप्रिय पति के सामने अपने सारे सुंदर वस्त्र उतारकर स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देती है!"


ठहरिए! और इस उपमा की दिव्यता को अपनी रीढ़ में उतरने दीजिए!

वेद-वाणी कोई निर्जीव शब्द नहीं है; वह एक सजीव, चैतन्य, कॉस्मिक सत्ता है! वह बाज़ारू नहीं है कि किसी भी कामुक, लंपट या अहंकारी के सामने अपनी शक्ति लुटा दे। वह केवल उसी के सामने अपनी ऊर्जा का अनंत द्वार खोलती है, जिसका अंतःकरण उसकी तरह ही निष्पाप, समर्पित और पवित्र हो चुका है!

वाणी की वह यात्रा, जो नाभि से ब्रह्मांड तक जाती है

मंत्र कोई गले की कसरत नहीं है। जब एक शुद्ध चेतना वाला साधक बैठता है, तो नाद चार स्तरों पर यात्रा करता है।


 *वैखरी: जो जिह्वा और होंठों से स्थूल ध्वनि बनकर फूटती है (जो दुनिया सुनती है)।


 मध्यमा: जो कंठ और मस्तिष्क में विद्युत-तरंगों की तरह दौड़ती है।


  पश्यन्ती: जो हृदय में आकर 'भाव' का, एक दिव्य प्रकाश का रूप ले लेती है।


 और अंत में 'परा': जहाँ शब्द मिट जाते हैं, ध्वनि शून्य हो जाती है, और केवल नाभि के केंद्र से उठने वाला वह 'महा-स्पंदन' बचता है, जो सीधे परब्रह्म के सर्वर से कनेक्ट होता है!

जब तुम्हारी चेतना 'वैखरी' से फिसलकर 'परा' के उस अथाह शून्य में गिरती है—उस क्षण तुम मनुष्य नहीं रहते; तुम साक्षात वह मंत्र बन जाते हो! उस क्षण यदि तुम 'महामृत्युंजय' का एक स्पंदन भी छोड़ोगे, तो काल का सीना दहल जाएगा!


अब आपके मन में एक बहुत बड़ा प्रश्न होगा कि मनीष जी कलियुग में यह संभव है? 

हाँ, धड़कनें थामिए और प्रयाग फाइल्स में आगे सुनिए, पढ़िए और देखिए!

महर्षि अरविंद ने इस युग के काँपते हुए मनुष्यों को अभयदान दिया था। निराश मत होइए।

यदि तुम्हारा रेडियो धूल और जंग से अटा पड़ा है, तो हताश होकर फेंक मत दो। यह ऋग्वैदिक मंत्र केवल सिद्धों का ऐश्वर्य नहीं, यह तुम्हारे सड़े हुए अंतःकरण का परम डिटॉक्सिफायर (महा-शोधक) भी है!

शुरुआत में जब तुम निष्काम भाव से बैठोगे, तो यह मंत्र तुम्हारे भीतर जमी हज़ारों जन्मों की काई को अपनी प्रचंड फ्रीक्वेंसी से काटना शुरू करेगा। न्यूरॉन्स के टूटे पुल जुड़ेंगे, रीढ़ में फंसी ऊर्जा उर्ध्वगामी होगी, मस्तिष्क की भटकी हुई तरंगें अल्फा और थीटा के महा-सागर में विलीन होने लगेंगी।


उठो! अपने भीतर के उस 'ऋषि' को पुनर्जीवित करो!

काट दो इस डिजिटल कचरे के बंधनों को! फेंक दो उस तामसिक आहार को जो तुम्हारी दिव्यता को पशु बना रहा है!


जप से पहले दस मिनट उस शांत नीरवता में उतरो, जहाँ कोई स्क्रीन नहीं, कोई विचार नहीं। अपने फेफड़ों में उस सनातन प्राणवायु को भरो। और जब उस परम भाव से भरकर तुम्हारे ओंठ कंपित हों

—

तो याद रखना, तुम आज के इस युग के लाचार कीड़े नहीं हो! तुम्हारे भीतर वही रक्त, वही चेतना और वही ऋग्वैदिक डीएनए धड़क रहा है जो विश्वामित्र, वशिष्ठ और भारद्वाज के भीतर धड़कता था।


प्रयाग फाइल्स के हर एक अध्याय का आभार जताते हुए स्क्रीन बंद करो और अपनी आँखें मूँद लो… क्या तुम्हें अपनी रीढ़ के निचले छोर पर एक हल्की सी सिहरन महसूस हो रही है? वह कोई साधारण धड़कन नहीं है—वह 5,000 साल पुरानी उस ऋचा की गूंज है, जो तुम्हारे भीतर जागने के लिए छटपटा रही है! फैसला तुम्हारा है: जिंदगी भर इस जंग लगे रिसीवर में खर-खर सुनते हुए मर जाना है, या इस ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली सर्वर से जुड़कर कालजयी बन जाना है?


 "ब्रह्मांड कभी म्यूट नहीं होता साहब; बस तुम्हारी चेतना ने गलत चैनल ट्यून कर रखा है!"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द.....। 

— अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



जब एक मनुष्य अपनी अंतिम साँस लेता है,

 अपनी उंगली को स्क्रीन से हटा लीजिए। रुक जाइए। अगले तीन मिनट के लिए इस दुनिया के सारे काम छोड़ दीजिए, क्योंकि यदि आपने यह पन्ना पलट दिया, तो आप उस परम सत्य को जानने से चूक जाएँगे जो पिछले पाँच हज़ार वर्षों से समय की गहरी परतों में दबाकर रखा गया था।

क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक मनुष्य अपनी अंतिम साँस लेता है, जब अस्पताल की स्क्रीन पर हृदय की धड़कन एक सपाट, सीधी रेखा बनकर अंतहीन सीटी बजाने लगती है—उस अंतिम शून्य के क्षण में आत्मा के साथ क्या घटित होता है?

विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क की बत्तियाँ एक-एक करके बुझ जाती हैं और केवल सन्नाटा छा जाता है। परंतु सनातन की गुप्त संहिताएँ कहती हैं कि ठीक उसी अंतिम सेकंड में, जब देह का हर दरवाज़ा बंद हो रहा होता है, तब भी चेतना के कमरे की एक गुप्त खिड़की खुली रह जाती है।

और ठीक उसी खिड़की पर आकर खड़े होते हैं स्वयं देवाधिदेव महादेव शिव।

वे उस मरणासन्न आत्मा के दाहिने कान की ओर झुकते हैं। श्मशान की ठंडी राख हवा में उड़ रही होती है। चिता की लपटों के बीच महाकाल उस प्राणी के कान में केवल दो अक्षरों का एक ऐसा पासवर्ड फूँकते हैं, जिसे सुनते ही आत्मा जन्म-मरण के खरबों सालों के चक्रव्यूह को एक झटके में तोड़कर सीधे परब्रह्म के आयाम में विलीन हो जाती है।

वह पासवर्ड कोई रहस्यमयी लंबा अनुष्ठान नहीं, बल्कि वही मंत्र है जिसे आप अब तक केवल पूजा की एक साधारण पंक्ति समझ रहे थे।


‘राम रामेति रमेति, रमे रामे मनोरमे। 

सहस्त्र नाम तत्तुल्यं, राम नाम वरानने॥’

परंतु रुकिए... यहीं से शुरू होता है वह खौफनाक और विस्मयकारी सस्पेंस, जो आपकी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जैसी ठंडी सिहरन दौड़ा देगा:

महादेव ने उस अंतिम विदाई के लिए पूरे ब्रह्मांड के लाखों वेदों, हज़ारों उपनिषदों और स्वयं अपने पंचाक्षरी मंत्र 'नमः शिवाय' को छोड़कर केवल 'राम' नाम को ही क्यों चुना?

आखिर उस दाहिने कान के भीतर वह कौन सा गुप्त न्यूरोलॉजिकल और क्वांटम तार छिपा है, जिसे यह एक नाद छूते ही मस्तिष्क के भीतर 'टाइम डाइलेशन' (समय का रुक जाना) पैदा कर देता है?

और सबसे बड़ा रहस्य—जिसे सुनकर आधुनिक भौतिकी के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों के माथे पर पसीना आ गया है—जब 1000 महा-मंत्रों की आवृत्ति केवल तीन शब्दों में टकराती है, तो वह मानव शरीर के 37 ट्रिलियन सेलों के भीतर किस अदृश्य प्रकाश को विस्फोटित करती है, जो साक्षात् मृत्यु के पंजे को भी निष्प्रभावी कर देता है?

अपनी साँसों को बिल्कुल धीमा कर लीजिए। अपनी आँखें स्क्रीन पर गड़ा लीजिए। क्योंकि जो विच्छेदन अब आप पढ़ने जा रहे हैं, वह आपके अस्तित्व, आपकी मृत्यु और आपके भीतर धड़कती हर एक साँस के ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा...

रहस्य 1: मणिकर्णिका की धधकती चिता और अंतिम द्वार (The Final Frequency)

श्लोक के अंतिम पाद को फिर से देखिए: ‘...राम नाम वरानने॥’

अधिकांश लोग 'वरानने' को केवल एक काव्यात्मक संबोधन समझ लेते हैं कि शिव ने पार्वती को "सुंदर मुख वाली" कहकर पुकारा। परंतु काशी खंड और तंत्र-शास्त्र में 'वरानने' का अर्थ केवल बाह्य सौंदर्य नहीं, बल्कि 'वर' अर्थात् श्रेष्ठतम और 'आनने' अर्थात् मुख-द्वार और संवेदी तंत्रिकाओं का सर्वोच्च शिखर है।

दृश्य की कल्पना कीजिए। अर्धरात्रि का सन्नाटा है। गंगा की काली लहरों के किनारे मणिकर्णिका की चिताएँ धू-धू कर जल रही हैं। हवा में भस्म उड़ रही है। एक देह अपने अंतिम संधिकाल पर है। आधुनिक न्यूरो-क्रिटिकल साइंस और रिससिटेशन बायोलॉजी (Resuscitation Biology) का यह सिद्ध नियम है कि जब किसी मनुष्य की मृत्यु (Clinical Death) होती है, तो शरीर के सभी अंग एक साथ नहीं मरते। सबसे पहले स्वाद की ग्रंथि शिथिल होती है। फिर दृष्टि का पर्दा गिरता है। फिर त्वचा का स्पर्श शून्य होता है। परंतु मस्तिष्क का जो हिस्सा सबसे अंत तक बाहर की दुनिया से संकेत ग्रहण करता रहता है, वह है—ऑडिटरी कॉर्टेक्स (Auditory Cortex—श्रवण तंत्रिका)। जब ईसीजी की रेखा सीधी होने लगती है, तब भी कानों का तंत्र मस्तिष्क के स्टेम तक अंतिम स्पंदन पहुँचा रहा होता है।

अब आपके मन में विचार आ रहा होगा कि मनीष जी ने कोई उदाहरण दिया ही नहीं तो समझ में कैसे आए तो परेशान मत होइए इसे हम सबसे पहले  गहरी नींद में बच्चे को पुकारती माँ के उदाहरण से समझते हैं। ‌

 कभी घर में सोए हुए किसी छोटे बच्चे या दिनभर के थके हुए इंसान को देखिए। आप उसके सामने हाथ हिलाइए—उसे नहीं दिखेगा क्योंकि आँखें बंद हैं। आप उसके ओंठों पर चम्मच से खीर लगाइए—उसे स्वाद नहीं आएगा। आप कमरे की बत्ती बुझा दीजिए—उसे कोई होश नहीं होगा। परंतु जैसे ही माँ उसके सिरहाने जाकर धीमी आवाज़ में फुसफुसाती है—'बेटा, उठो'...


वह तुरंत करवट बदलता है और आँखें खोल देता है! पाँचों इंद्रियों में केवल कान ही वह खिड़की है जिसका पर्दा सोने के बाद भी कभी नहीं गिरता। मृत्यु भी एक महा-निद्रा है। जब शरीर के सारे दरवाज़े एक-एक कर बंद हो चुके होते हैं, तब भी आत्मा के कक्ष की केवल 'कान' रूपी खिड़की खुली रहती है। और महादेव ठीक उसी खुली खिड़की पर आकर खड़े होते हैं!


दाहिना कान क्यों?

 मानव न्यूरोलॉजी के अनुसार, दायाँ कान सीधे मस्तिष्क के बाएँ गोलार्ध (Left Hemisphere) से जुड़ा होता है, जहाँ भाषा और तार्किक चेतना (Wernicke's & Broca's Area) स्थित होती है। मृत्यु के समय जब मस्तिष्क अत्यधिक ऑक्सीजन-विहीनता (Anoxia) के कारण भयंकर भय और पैनिक में डूब रहा होता है, तब कान में गूँजने वाला यह नाद

—‘राम’

—मस्तिष्क के पूरे न्यूरोनल नेटवर्क को भय से खींचकर एक सेकंड में डीप डेल्टा (Deep Delta Transcendence) की परम समाधि में स्थिर कर देता है। शिव ने पार्वती को 'वरानने' कहकर यही समझाया था कि यह ध्वनि कपाल की अंतिम जीवित नस को सीधे मोक्ष के आयाम से जोड़ देती है!

रहस्य 2: 'रा' और 'म' के बीच का 0.01 सेकंड (The Quantum Singularity)

अब अपनी बुद्धि को उस स्थान पर ले आइए जहाँ भौतिकी का हर समीकरण मौन हो जाता है। श्लोक के केंद्र में स्थित नाद को अत्यंत धीमे मोशन में देखिए: ‘रा...’ और ‘...म’।

  'रा' — यह अग्नि है। यह बाहर की ओर फेंका गया प्रस्फोट है, चेतना का विस्तार है।

  'म' — यह जल है। यह होंठों का बंद होना है, महा-विश्रांति है और ऊर्जा का भीतर की ओर खिंचाव है।

परंतु क्या आपने कभी अनुभव किया है कि जब 'रा' का स्वर समाप्त होता है और 'म' के लिए होंठ मिलने वाले होते हैं, उन दोनों के ठीक बीच में एक सेकंड के सौवें हिस्से का एक मूक अंतराल (Silent Gap) आता है?

क्वांटम भौतिकी में इसे ‘ज़ीरो-पॉइंट फील्ड’ (Zero-Point Field) या 'क्वांटम वैक्यूम' कहा जाता है। यह वह शून्य है जहाँ न कोई पदार्थ है, न कोई तरंग, न कोई समय।

अब आप फिर कहेंगे कि मनीष जी पहले कोई उदाहरण तो दे दो तो बिल्कुल लिए हम इसे धड़कनों के बीच का मौन और कैमरे का शटर से समझते हैं। ‌

 अपनी कलाई पर उँगली रखिए। नाड़ी कैसे चलती है? 'धक'... फिर एक छोटा सा ठहराव... फिर 'धक'। कभी सोचा है कि दो धड़कनों के बीच में जो आधा सेकंड का सन्नाटा आता है, उस पल क्या होता है? यदि दिल बिना रुके लगातार धड़कता रहे, तो फट जाएगा। उस दो धड़कनों के बीच के मौन में ही दिल को विश्राम और नई उम्र मिलती है। ठीक वैसे ही, जैसे कैमरे से फोटो खींचते समय 'शटर' एक मिलीसेकंड के लिए गिरता है और लेंस के आगे अंधेरा छा जाता है, पर वही क्षण उस तस्वीर को हमेशा के लिए अमर कर देता है। 'रा' और 'म' के बीच का वह 0.01 सेकंड चेतना का वही शटर है—जहाँ संसार का वीडियो रुकता है और परमात्मा की तस्वीर खिंच जाती है!


प्रयाग फाइल्स में एक और उदाहरण लेते हैं और आसमान में ठहरता झूला से इसको आसानी से समझते हैं। ‌

जब आप किसी बड़े झूले पर झूलते हैं, तो झूला पूरी ताकत से आगे जाता है। फिर जब वह अपनी सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचता है, तो पीछे मुड़ने से ठीक पहले—एक पल के लाखवें हिस्से के लिए—वह हवा में पूरी तरह ठहर जाता है। उस एक सूक्ष्म क्षण में न झूला आगे जा रहा होता है, न पीछे। गति शून्य हो जाती है। 'रा' और 'म' के बीच का वह छोटा सा शून्य वही ठहराव है। उस 0.01 सेकंड के शून्य में उतरने वाला व्यक्ति साक्षात् समय (Time) की परिधि से बाहर छलांग लगा देता है!


रहस्य 3: ध्वनि से पदार्थ का झुकना (Acoustic Radiation Pressure & Cymatics)

अब आइए उस रहस्य पर जिसे हमारे इतिहास में 'पत्थरों का जल पर तैरना' कहा गया। सदियों तक इसे केवल एक चमत्कार मानकर पन्नों में समेट दिया गया।

परंतु आधुनिक भौतिकी के सिद्धांतों को देखिए जहाँ उच्च-तीव्रता वाली पराश्रव्य ध्वनि-तरंगें (Acoustic Standing Waves) जब किसी माध्यम से टकराती हैं, तो वे एक ठोस भौतिक दबाव पैदा करती हैं, जिसे 'एकॉस्टिक रेडिएशन प्रेशर' (Acoustic Radiation Pressure) कहा जाता है। आधुनिक प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक इसी सिद्धांत से ध्वनि-तरंगों के जोर से तरल बूंदों और सूक्ष्म कणों को बिना छुए हवा में स्थिर कर रहे हैं (Acoustic Levitation)। वैज्ञानिक हैंस जेनी (Hans Jenny) का 'साइमैटिक्स' (Cymatics) विज्ञान सिद्ध करता है कि जब किसी माध्यम पर एक विशिष्ट ध्वनि-आवृत्ति छोड़ी जाती है, तो वह माध्यम के सतही तनाव (Surface Tension) और उसकी आंतरिक आणविक ज्यामिति को पूरी तरह पुनर्गठित कर देती है।


मुझे लगता है कि प्राइवेट फाइल्स में अब वक्त हो गया है एक और उदाहरण का। आइये डीजे का लाउडस्पीकर और सीने पर धमक से इसको समझते हैं।

जब किसी सड़क से बड़ा डीजे या ढोल-नगाड़ों का जुलूस गुज़रता है और उसमें गहरा बेस (Bass) बजता है, तो क्या होता है? आप लाउडस्पीकर को छूते भी नहीं हैं, हवा खाली दिखती है, फिर भी आपके सीने की पसलियों में एक धमक महसूस होती है! खिड़कियों के काँच थरथराने लगते हैं, मेज पर रखा खाली गिलास हिलने लगता है। क्यों? क्योंकि आवाज़ केवल सुनाई नहीं देती; आवाज़ में 'वज़न' होता है, आवाज़ में धक्का देने का एक अदृश्य 'हाथ' होता है!

 जब एक सामान्य लाउडस्पीकर काँच कंपा सकता है, तो सोचिए—परब्रह्म के नाद की वह महा-आवृत्ति जब एक लय में टकराई होगी, तो क्या वह जल के सतही तनाव को एक ठोस आधार नहीं दे सकती थी? 'राम' नाम केवल अक्षरों का समूह नहीं था; यह उस विशिष्ट नाद-दबाव की ज्यामिति थी जिसने उस कालखंड में जल के घनत्व को साध दिया था। जब चेतना इस नाद से भरती है, तो मन का भारीपन और अवसाद का बोझ ऐसे ही हल्का हो जाता है जैसे जल की सतह पर संतुलित होता कोई भार!


रहस्य 4: सूर्य-चंद्र नाड़ियों का संतुलन (The Bi-Hemispheric Laser)

मानव शरीर ऊर्जा का एक जटिल डायनेमो है। श्लोक के पहले हिस्से को ध्यान से सुनिए।

 ‘राम रामेति रमेति, रमे रामे मनोरमे...’

यहाँ 'रमे' (अग्नि का वेग) और 'रामे' (शीतलता का ठहराव) का जो द्वैत है, वह सीधे शरीर की दो मुख्य नाड़ियों को साधता है:

 रीढ़ के दाहिने भाग में बहती है—पिंगला (सूर्य नाड़ी), जो ताप, पराक्रम और तार्किकता का संचालन करती है।

 रीढ़ के बाएँ भाग में बहती है—इड़ा (चंद्र नाड़ी), जो शीतलता, विश्रांति और अंतर्ज्ञान का संचालन करती है।

आम मनुष्य के जीवन में या तो सूर्य नाड़ी बहुत उत्तेजित होती है (क्रोध, तनाव, अनिद्रा) या चंद्र नाड़ी बहुत सुस्त (आलस्य, अवसाद, भ्रम)। दोनों कभी एक साथ संतुलित नहीं होते।

'रा' का प्रहार सीधे पिंगला (सूर्य) को जाग्रत करता है। 'म' का अनुनाद तत्काल इड़ा (चंद्र) को सक्रिय कर शांति का आवरण चढ़ा देता है। और जैसे ही साधक कहता है—‘मनोरमे’, ये दोनों विपरीत ऊर्जा-धाराएं रीढ़ के मध्य में स्थित ‘सुषुम्ना नाड़ी’ के मुहाने पर आकर विलीन हो जाती हैं!

प्रयाग फाइल्स के  सरल उदाहरण की कड़ी में आई है साइकिल के दो पैडल सही से बहुत सरल भाषा में समझते हैं।

अगर आप साइकिल चला रहे हों और केवल दायाँ पैडल दबाते रहें, तो साइकिल आगे नहीं बढ़ेगी, बल्कि गिर जाएगी। यदि केवल बायाँ दबाएंगे, तब भी गिर जाएगी। गति तब बनती है जब दायाँ नीचे जाए तो बायाँ ऊपर आए—एक सटीक तालमेल! हमारा शरीर वही साइकिल है। 'रा' दायाँ पैडल है और 'म' बायाँ पैडल। दिनभर हम केवल चिंताओं का एक ही पैडल दबाते-दबाते हाँफ जाते हैं। यह मंत्र दोनों पैडल को एक साथ साध देता है, और जीवन की गाड़ी बिना किसी झटके के अपने-आप सरकने लगती है।


आपको लग रहा होगा कि मनीष जी ने कुछ बेहतर और सरलतम उदाहरण अभी तक नहीं दिया तो गर्म और ठंडे पानी का सटीक मिश्रण आपके इस समस्या को भी हल कर देगा।

यदि आप अत्यधिक खौलते पानी से नहाएंगे तो त्वचा झुलस जाएगी। यदि अत्यधिक बर्फ जैसे ठंडे पानी में उतरेंगे तो शरीर अकड़ जाएगा। परंतु जब गीज़र का गर्म पानी और टंकी का ठंडा पानी एक बराबर अनुपात में मिलकर गिरता है, तो वह समशीतोष्ण जल शरीर के एक-एक रोम की थकान को एक झटके में मिटा देता है। 'रमे' और 'रामे' शरीर का वही आंतरिक थर्मोस्टेट हैं जो प्राण-ऊर्जा को सीधे सुषुम्ना के केंद्रीय मार्ग पर चढ़ा देते हैं।


रहस्य 5: कोशिकाओं से फूटता प्रकाश (Biophotons & Epigenetics)

अब आइए श्लोक की उस पंक्ति पर, जहाँ यह महामंत्र संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी लपेट में ले लेता है।


‘सहस्त्र नाम तत्तुल्यं...’

जर्मन बायो-फिजिसिस्ट फ्रिट्ज़-अल्बर्ट पॉप (Fritz-Albert Popp) ने प्रयोगशाला में सिद्ध किया कि मानव शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका के केंद्रक (DNA Nucleus) से प्रकाश के अत्यंत सूक्ष्म पैकेट लगातार बाहर निकलते हैं, जिन्हें ‘बायोफोटॉन्स’ (Biophotons) कहा जाता है।

 जब कोई व्यक्ति गहरे तनाव, भय या मानसिक विकृति में होता है, तो उसकी कोशिकाओं से निकलने वाला यह प्रकाश असंबद्ध (Incoherent) होकर बिखर जाता है—जैसे किसी टूटे हुए लैंप से टिमटिमाती, बेतरतीब रोशनी छूट रही हो।

 परंतु जब व्यक्ति एक निश्चित लयबद्ध, अनुष्टुप छंद की ज्यामितीय ध्वनि में प्रवेश करता है, तो कोशिकाओं का यह प्रकाश बिखरने के बजाय एक सीधी, सुसंगत लेज़र-बीम (Coherent Light) की तरह प्रवाहित होने लगता है।


सरल उदाहरण के तौर पर हम साधारण टॉर्च बनाम लेज़र लाइट सही से समझने का प्रयास करते हैं।

रात के अंधेरे में एक साधारण टॉर्च जलाइए। उसकी रोशनी पूरे कमरे में फैल जाती है, लेकिन 100 मीटर दूर जाते-जाते दम तोड़ देती है। वह एक कागज़ का टुकड़ा भी नहीं जला सकती। परंतु उसी रोशनी की बिखरी हुई किरणों को जब वैज्ञानिक एक सीधी, केंद्रित रेखा में बाँध देते हैं, तो वह 'लेज़र' बन जाती है—जो लोहे की मोटी चादर को भी मक्खन की तरह चीर देती है! हमारा मन और हमारे शरीर की कोशिकाएँ बिखरी हुई टॉर्च की तरह थीं—कमज़ोर और भटकी हुई। 'सहस्त्र नाम तत्तुल्यं' उन 1000 बिखरी हुई किरणों को एक बिंदु पर लाकर लेज़र बना देता है। फिर कोई मानसिक रोग या कोई भय आपके सामने टिक ही नहीं सकता!


और अंत में, अनुष्टुप छंद के उस 32वें अक्षर की समाप्ति पर ध्यान दीजिए। 'वरानने' का अंतिम स्वर जैसे ही विसर्जित होता है, मुख-गुहा के 32 दाँतों और रीढ़ की 32 संधियों में उत्पन्न हुआ कंपन शांत होकर 'म' की उस अंतिम बिंदु (Singularity) में सिमट जाता है। आधुनिक भौतिकी की 'स्ट्रिंग थ्योरी' (String Theory) मानती है कि यह समूचा ब्रह्मांड सूक्ष्म तारों के कंपन से बना है। जब इस श्लोक का 32वाँ अक्षर पूरा होकर मौन में डूबता है, तो वह मौन साधारण सन्नाटा नहीं होता; वह उस बहु-आयामी ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश-द्वार बन जाता है जहाँ चेतना शरीर की सीमा से ऊपर उठकर साक्षी-भाव में प्रतिष्ठित हो जाती है।

अपने अस्तित्व का साक्षात्कार करिए महाराज। 

अब उस मटमैले कागज़ के टुकड़े को अपने अंतःकरण में देखिए।

वह कोई सामान्य धार्मिक श्लोक नहीं है। वह देवाधिदेव शिव द्वारा माता पार्वती के माध्यम से समूची मानवता को सौंपा गया वह अचूक तांत्रिक ब्लूप्रिंट है, जिसे:

 *गणित ने 10 \times 10 \times 10 = 1000 के संपीड़न के रूप में सिद्ध किया...

  न्यूरोलॉजी ने 43 मांसपेशियों और फेज़-इन्वर्जन के रूप में प्रमाणित किया...

 भौतिकी ने एकॉस्टिक तरंगों और ज़ीरो-पॉइंट फील्ड के रूप में स्वीकारा...

 और अध्यात्म ने जन्म-मरण के पार ले जाने वाले 'तारक नाद' के रूप में अमर कर दिया!

हज़ारों वर्ष पूर्व कैलाश के निर्जन सन्नाटे में महाकाल ने जिस सत्य को समाधि से निकाला था, आज आधुनिक विज्ञान सदियों की ठोकरें खाकर उसी सत्य की दहलीज पर आकर खड़ा हो गया है। जीवित रहिए तो इस नाद के साथ, ताकि संसार की कोई चिंता आपकी आत्मा को छू न सके। और जब कभी यह देह अपनी अंतिम सांस ले, तो भीतर केवल यही गूँज शेष रहे, क्योंकि जिसके अंतःकरण में यह कोड सक्रिय है, उसके लिए न कोई मृत्यु है, न कोई भय।

“ब्रह्मांड की हर आकाशगंगा जिस आधार पर टिकी है, विज्ञान की हर सीमा जहाँ आकर नतमस्तक हो जाती है, और मृत्यु का संताप जहाँ आकर स्वयं भस्म हो जाता है—उस आदि, अनादि और कालजयी महा-ऊर्जा का सनातन नाम केवल एक है


... ‘राम’!”


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ ....। अगली कड़ी जल्द....। 


 अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



Thursday, September 24, 2026

मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन

 ॥ मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन ॥

संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट प्रस्तुत   


मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन बताए गए हैं—मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-श्रवण, तपस्या, स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन, युक्तिपूर्वक शास्त्रों की व्याख्या, एकान्त-सेवन, जप और समाधि।


अब इन दसों साधनों का क्रमशः विचार करते हैं—


❗️१. मौनव्रत 


मौन का सामान्य अर्थ है—वाणी का त्याग। परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से मौन केवल इतना नहीं कि मनुष्य बोलना बंद कर दे। वास्तविक मौन तब है, जब वाणी के साथ-साथ मन भी अनावश्यक विषयों से निवृत्त होने लगे।


मनुष्य की वाणी अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न करती है—असत्य, निन्दा, चुगली, कठोर वचन, व्यर्थ की चर्चा और दूसरों के दोषों का वर्णन। इनसे बचने के लिए मौन एक अत्यन्त उपयोगी साधन है।


परन्तु यदि मुख मौन है और भीतर मन निरन्तर विषयों, क्रोध, ईर्ष्या और वासनाओं में बोलता रहता है, तो ऐसा मौन केवल बाहरी मौन है।


इसलिए मौन का उद्देश्य वाणी को रोककर मन को भगवान के चिन्तन में लगाना है।


❗️२. ब्रह्मचर्य 


ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल इन्द्रिय-विषयों से दूर रहना नहीं, बल्कि अपनी समस्त शक्तियों को ब्रह्म की ओर अभिमुख करना है।


मनुष्य की इन्द्रियाँ निरन्तर विषयों की ओर दौड़ती हैं। यदि उन पर संयम न हो तो साधना की शक्ति धीरे-धीरे विषयभोग में ही समाप्त होती रहती है।


ब्रह्मचर्य साधक को यह स्मरण कराता है कि जीवन की अमूल्य शक्ति केवल इन्द्रिय-सुख के लिए नहीं है। उस शक्ति का संरक्षण और उसका सदुपयोग ज्ञान, भक्ति, तप और आत्मचिन्तन में होना चाहिए।


अतः ब्रह्मचर्य केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि विचार, दृष्टि, व्यवहार और जीवनचर्या में संयम का नाम है।


❗️३. श्रुत — शास्त्र-श्रवण 


मोक्षमार्ग पर चलने के लिए केवल अपनी बुद्धि पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। शास्त्रों और सद्गुरुओं से तत्त्व का श्रवण आवश्यक है।


मनुष्य संसार को ही सत्य मानकर उसके सुख-दुःख में उलझा रहता है। शास्त्र उसे उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराते हैं और बताते हैं कि जीवन का परम लक्ष्य केवल भौतिक सुख की प्राप्ति नहीं है।


श्रवण का अर्थ केवल कथा सुन लेना नहीं है। जिस बात को सुना जाए, उस पर मनन हो और जीवन में उसका प्रभाव दिखाई दे, तभी श्रवण सार्थक होता है।


❗️४. तपस्या 


तपस्या का अर्थ है—अपने जीवन को अनुशासन में रखना और सुख-सुविधाओं की अनिवार्यता से स्वयं को मुक्त करना।


मनुष्य सामान्यतः उसी कार्य को करना चाहता है जिसमें उसे सुख मिले और कष्ट से बचना चाहता है। तपस्या उसे सिखाती है कि प्रत्येक इच्छा की पूर्ति आवश्यक नहीं है।


भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य, सुविधा और इन्द्रिय-सुख पर उचित संयम रखते हुए अपने कर्तव्य और साधना में स्थिर रहना तप का अंग है।


तपस्या का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना मात्र नहीं, बल्कि इच्छाओं पर विवेक का शासन स्थापित करना है।


❗️५. अध्ययन — स्वाध्याय 


स्वाध्याय का अर्थ है—अपने कल्याण के लिए शास्त्रों का नियमित अध्ययन और साथ ही अपने जीवन का भी अध्ययन।


केवल ग्रन्थ पढ़ते जाना स्वाध्याय की पूर्णता नहीं है। प्रश्न यह है कि पढ़े हुए ज्ञान ने हमारे जीवन में क्या परिवर्तन किया?


यदि हम प्रतिदिन शास्त्र पढ़ें, परन्तु क्रोध, लोभ, अहंकार, द्वेष और विषयासक्ति पहले जैसी ही बनी रहे, तो अध्ययन अभी आत्मसात् नहीं हुआ।


सच्चा स्वाध्याय मनुष्य को बार-बार अपने भीतर देखने के लिए प्रेरित करता है—मैं क्या पढ़ रहा हूँ और मैं वास्तव में क्या बन रहा हूँ?


❗️६. स्वधर्म-पालन 


स्वधर्म का अर्थ है अपने उचित कर्तव्य और उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक पालन करना।


मोक्ष की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपने सांसारिक कर्तव्यों से पलायन करके ही साधक बने, ऐसा आवश्यक नहीं। अपने जीवन में प्राप्त कर्तव्यों को ईमानदारी, निष्ठा और आसक्ति-रहित भाव से करना भी साधना का महत्वपूर्ण अंग है।


अपने कर्तव्य से विमुख होकर केवल बाहरी धार्मिक रूप धारण करना साधना की पूर्णता नहीं है।


कर्तव्य का पालन करते हुए मन को परमात्मा में लगाना—यही साधना को जीवन से जोड़ता है।


❗️७. व्याख्या — शास्त्रों का युक्तिपूर्वक निरूपण 


शास्त्रों को पढ़ना और सुनना एक बात है, और उनके तत्त्व को समझकर उचित प्रकार से समझाना दूसरी बात।


शास्त्र-व्याख्या का उद्देश्य अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि तत्त्व को स्पष्ट करना और श्रोता के संशय का निवारण करना है।


युक्तिपूर्वक व्याख्या वही है जिसमें शास्त्रीय वचन का अर्थ उसके उचित संदर्भ में समझाया जाए और उसे अपनी इच्छा के अनुसार मोड़कर प्रस्तुत न किया जाए।


इस साधन में विनय अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि शास्त्र-ज्ञान यदि अहंकार बढ़ा दे तो वही ज्ञान आत्मकल्याण के स्थान पर आत्मप्रदर्शन का साधन बन सकता है।


❗️८. रहः — एकान्त-सेवन 


एकान्त का अर्थ केवल ऐसी जगह चले जाना नहीं जहाँ कोई दूसरा मनुष्य न हो। वास्तविक एकान्त वह है जहाँ साधक को आत्मचिन्तन और भगवत्स्मरण का अवसर मिले।


संसार के निरन्तर शोर, विषयों और सामाजिक व्यस्तताओं से कुछ समय अलग होकर अपने भीतर देखना आवश्यक है।


एकान्त में मनुष्य अपने वास्तविक दोषों और अपनी आन्तरिक स्थिति को अधिक स्पष्ट रूप से देख सकता है।


परन्तु यदि एकान्त में जाकर भी मन संसार के विषयों में ही भटकता रहे, तो केवल स्थान बदलने से साधना पूर्ण नहीं होती।


❗️९. जप 


जप का अर्थ है—भगवान के नाम या मन्त्र का श्रद्धापूर्वक पुनः-पुनः स्मरण और उच्चारण।


मन अत्यन्त चंचल है। वह एक क्षण में एक विषय पर और दूसरे क्षण में दूसरे विषय पर चला जाता है। जप मन को बार-बार एक ही पवित्र आश्रय की ओर वापस लाने का साधन है।


जप केवल माला फेरने की क्रिया नहीं है। नाम के साथ मन का जुड़ना, श्रद्धा का जागना और जीवन में उसके प्रभाव का प्रकट होना जप की वास्तविक दिशा है।


जब जप केवल संख्या पूरी करने का कार्य बन जाता है, तब उसका आन्तरिक उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।


❗️१०. समाधि 


समाधि साधना की अत्यन्त गहन अवस्था है, जिसमें चित्त की चंचलता अत्यन्त क्षीण होकर एकाग्रता की उच्च अवस्था को प्राप्त होती है।


साधक का मन सामान्यतः विषयों में भटकता रहता है। साधना के क्रम में जब मन बाहरी विषयों से हटकर परम तत्त्व में स्थिर होने लगता है, तब समाधि की दिशा प्रशस्त होती है।


समाधि केवल आँखें बन्द करके बैठ जाने का नाम नहीं है। यह चित्त की गहन एकाग्रता और आध्यात्मिक स्थिरता से सम्बन्धित अवस्था है।


🔅इन दसों साधनों का सार🔅


इन दसों साधनों को अलग-अलग समझना आवश्यक है, परन्तु इनका लक्ष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।


मौन वाणी को संयमित करता है।

ब्रह्मचर्य इन्द्रिय-शक्ति को संयमित करता है।

श्रवण सही ज्ञान देता है।

तपस्या इच्छाओं पर नियंत्रण सिखाती है।

स्वाध्याय ज्ञान को भीतर उतारता है।

स्वधर्म जीवन को कर्तव्यनिष्ठ बनाता है।

शास्त्र-व्याख्या समझ को स्पष्ट करती है।

एकान्त आत्मचिन्तन का अवसर देता है।

जप मन को भगवन्नाम में लगाता है।

और समाधि चित्त को परम तत्त्व में स्थिर करने की दिशा में ले जाती है।


किन्तु इन सबके ऊपर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सावधानी भी है—साधन बाहरी प्रदर्शन न बन जाएँ।


यदि इन्द्रियाँ अनियन्त्रित हैं और भीतर विषयासक्ति बनी हुई है, तो मौन, तप, स्वाध्याय, शास्त्र-चर्चा, जप और अन्य साधन भी केवल आजीविका के साधन बन सकते हैं। और यदि साधना के साथ दम्भ जुड़ जाए, तो आध्यात्मिक साधन भी प्रतिष्ठा और प्रदर्शन का माध्यम बन सकते हैं।


इसलिए साधना की वास्तविक कसौटी यह नहीं कि हम कितने साधन करते हैं, बल्कि यह है कि उन साधनों के कारण हमारे भीतर कितना संयम, कितना वैराग्य, कितनी विनम्रता और कितना भगवत्स्मरण उत्पन्न हुआ है।


मोक्ष का मार्ग साधनों की संख्या से नहीं, साधना की सत्यता से प्रशस्त होता है।


॥ हरिः ॐ ॥

मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन कौन-से हैं?

 ॥ मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन कौन-से हैं? ॥

संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत


मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म

व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्याः ।

प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता

भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥

----- श्रीमद्भागवत महापुराण ७.९.४६


मोक्ष के दस साधन प्रसिद्ध बताए गए हैं—मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-श्रवण, तपस्या, स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन, युक्तिपूर्वक शास्त्रों की व्याख्या, एकान्त-सेवन, जप और समाधि।


ये सभी साधन मनुष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करने, इन्द्रियों को संयमित करने और उसे परम पुरुष की ओर उन्मुख करने वाले हैं। इनका उद्देश्य केवल बाहरी रूप से साधु अथवा साधक दिखाई देना नहीं, बल्कि भीतर से कामना, अहंकार, आसक्ति और विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त करना है।


मौन केवल वाणी को रोक लेना नहीं, बल्कि अनावश्यक एवं अशुद्ध वाणी से निवृत्त होकर मन को भी संयमित करना है।

ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि इन्द्रियों और मन की शक्तियों को ब्रह्म की ओर प्रवाहित करना है।

शास्त्र-श्रवण और स्वाध्याय केवल ज्ञान एकत्र करने के लिए नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने आचरण में उतारने के लिए हैं।

तपस्या शरीर और मन को अनुशासन में रखने का साधन है।

स्वधर्म-पालन अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने की शिक्षा देता है।

शास्त्र-व्याख्या का उद्देश्य तत्त्व को समझना और समझाना है, न कि केवल विद्वत्ता का प्रदर्शन करना।

एकान्त-सेवन आत्मचिन्तन और भगवत्स्मरण के लिए है।

जप चित्त को भगवान के नाम में स्थिर करने का साधन है और समाधि चित्त की उस एकाग्र अवस्था की ओर संकेत करती है, जहाँ साधक का मन बाह्य विषयों से हटकर परम तत्त्व में स्थित होने लगता है।


किन्तु इन सभी साधनों की सफलता का मूल आधार इन्द्रियनिग्रह और अन्तःकरण की शुद्धि है।


यदि इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, तो यही मौन, तप, स्वाध्याय, जप, शास्त्र-चर्चा और समाधि आदि साधन भी केवल जीविका के साधन-व्यापार बनकर रह सकते हैं। बाहर से साधना का स्वरूप दिखाई दे सकता है, परन्तु भीतर यदि विषयासक्ति और वासनाएँ उसी प्रकार बनी हुई हैं, तो साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।


और दम्भी व्यक्ति के लिए तो स्थिति और भी गंभीर है। जब साधना आत्मशुद्धि के लिए न होकर प्रतिष्ठा, सम्मान, धन अथवा अपनी श्रेष्ठता दिखाने का माध्यम बन जाती है, तब वही साधन आध्यात्मिक उन्नति के स्थान पर आडम्बर का रूप धारण कर लेते हैं।


इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति कितना मौन रखता है, कितना शास्त्र पढ़ता है, कितनी तपस्या करता है या कितनी बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक बातें करता है। वास्तविक साधना का प्रमाण उसके संयम, आचरण, विनय, निष्कपटता और अन्तःकरण की पवित्रता में दिखाई देता है।


मोक्ष का मार्ग बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि भीतर के परिष्कार से प्रशस्त होता है। साधन वही सार्थक है जो मनुष्य को विषयासक्ति से हटाकर भगवान के चरणों में स्थिर करे।


अतः साधना का उद्देश्य साधक का स्वरूप दिखाना नहीं, बल्कि उसके भीतर के अहंकार और अज्ञान को मिटाना है।

शाक्त-अद्वैत की विशिष्टता — ज्ञान, भक्ति और शिव-शक्ति-सामरस्य

 ॥ शाक्त-अद्वैत की विशिष्टता — ज्ञान, भक्ति और शिव-शक्ति-सामरस्य ॥


संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत

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शाक्त परंपरा में अद्वैत का स्वरूप केवल निषेधात्मक ज्ञान तक सीमित नहीं रहता। यहाँ परम तत्त्व को चेतना और उसकी स्वाभाविक शक्ति से अभिन्न रूप में देखा जाता है। इसी कारण शाक्त-दृष्टि में ज्ञान, उपासना, भक्ति, मन्त्र, ध्यान और शक्ति-साधना परस्पर विरोधी न होकर साधना के विभिन्न आयाम बन जाते हैं।


यहाँ एक बात विशेष रूप से समझने योग्य है कि ‘शाक्त-अद्वैत’ कोई एकमात्र, सर्वत्र समान रूप से व्यवस्थित दार्शनिक प्रणाली का नाम नहीं है। श्रीविद्या, त्रिक, प्रत्यभिज्ञा तथा अन्य तांत्रिक परंपराओं में शब्दावली और दार्शनिक प्रतिपादन में भिन्नताएँ हैं। फिर भी शिव-शक्ति की अभिन्नता, चेतना की पूर्णता और शक्ति को परम तत्त्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानने की प्रवृत्ति इन परंपराओं में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।


❗️अद्वैत और भक्ति का प्रश्न


अद्वैत वेदान्त में परमार्थतः ब्रह्म ही एकमेव सत्य है। साधना के स्तर पर ईश्वर-उपासना और भक्ति का महत्त्व स्वीकार किया जाता है, किन्तु ब्रह्मज्ञान की चरम अवस्था में ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय का भेद अतिक्रमित हो जाता है।


यहीं से तांत्रिक अद्वैत की एक विशिष्ट व्याख्या सामने आती है। तांत्रिक परंपराएँ केवल इस बात पर बल नहीं देतीं कि द्वैत का ज्ञानात्मक अतिक्रमण हो, बल्कि वे उस परम चेतना की स्वप्रकाशता, स्वविमर्शिता, स्वातन्त्र्य और आनन्दमय अभिव्यक्ति को भी महत्त्व देती हैं।


विशेषतः कश्मीर की त्रिक-प्रत्यभिज्ञा परंपरा में परम चैतन्य को प्रकाश और विमर्श के रूप में समझाया जाता है। प्रकाश वह स्वप्रकाश चेतना है जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है, जबकि विमर्श उसी चेतना का अपने स्वरूप का आत्मबोध अथवा स्व-परामर्श है। प्रकाश और विमर्श को पृथक् दो परम तत्त्व नहीं माना जाता; वे परम चैतन्य की अभिन्न पूर्णता के दो पक्ष हैं।


❗️शिव और शक्ति — दो नहीं, एक परम तत्त्व


इसी सिद्धान्त को शिव और शक्ति के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।


शिव — प्रकाश।

शक्ति — विमर्श।


शिव को चेतना का स्वप्रकाश स्वरूप और शक्ति को उसी चेतना की स्वाभाविक शक्ति, आत्म-विमर्श तथा अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाता है। इसलिए शक्ति शिव से बाहर कोई दूसरी सत्ता नहीं है।


शक्ति शिव की शक्ति मात्र नहीं, बल्कि शिव की चेतनात्मक पूर्णता की अभिव्यक्ति है। इसी कारण त्रिक परंपरा में शिव और शक्ति का सम्बन्ध केवल स्वामी और सामर्थ्य का सम्बन्ध नहीं, बल्कि अभिन्नता और सामरस्य का सम्बन्ध है। कश्मीर शैव दर्शन के विवेचनों में शिव-शक्ति के सम्बन्ध को तादात्म्य तथा सामरस्य की दृष्टि से समझाया गया है।


इसका अत्यन्त सुंदर काव्यात्मक प्रतिपादन सौन्दर्यलहरी के प्रसिद्ध प्रथम श्लोक में मिलता है—


शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं

न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।


अर्थात् शक्ति से संयुक्त होकर ही शिव सृष्टि आदि कार्यों में समर्थ होते हैं; शक्ति से रहित शिव के लिए स्पन्दन भी सम्भव नहीं कहा गया है।


यहाँ ‘शिव’ और ‘शक्ति’ को दो स्वतंत्र परम सत्ताओं के रूप में स्थापित करना उद्देश्य नहीं है; बल्कि उनकी अविच्छिन्न एकता को सूचित करना है। इसी कारण शाक्त दृष्टि में शक्ति की उपासना अन्ततः परम चैतन्य से ही सम्बन्ध स्थापित करने वाली साधना बनती है।


❗️प्रकाश, विमर्श और स्पन्द


त्रिक दर्शन में इस विचार को और सूक्ष्म रूप से समझने के लिए प्रकाश, विमर्श और स्पन्द की अवधारणाएँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।


प्रकाश है—स्वयं प्रकाशित चैतन्य।


विमर्श है—उस चैतन्य का अपने ही स्वरूप का आत्मबोध।


और स्पन्द है—उस परम चेतना की स्वाभाविक स्फुरणशीलता अथवा गतिशील अभिव्यक्ति।


यह स्पन्द किसी जड़ पदार्थ की भौतिक गति मात्र नहीं है। यह उस परम चेतना की स्वातन्त्र्य-शक्ति का स्फुरण है, जिसके द्वारा एक ही चैतन्य अनन्त नाम-रूपों में स्वयं को अभिव्यक्त करता है। त्रिक की इस दृष्टि में विश्व परम चेतना से बाहर कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि उसी चेतना की शक्ति का वास्तविक प्रकाशन है।


यही कारण है कि तांत्रिक अद्वैत में संसार को केवल त्याज्य या असत् मानकर उससे निवृत्त होने पर ही बल नहीं दिया जाता; बल्कि उसके भीतर व्याप्त चैतन्य-तत्त्व को पहचानना भी साधना का अंग बनता है।


❗️प्रत्यभिज्ञा — अपने ही शिवस्वरूप की पहचान


त्रिक-प्रत्यभिज्ञा दर्शन में मुक्ति को केवल किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा—अर्थात् पुनः पहचान—के रूप में समझाया जाता है।


जीव अपने वास्तविक स्वरूप से पृथक् कोई सत्ता नहीं है; उसकी चेतना उसी परम चैतन्य से सम्बद्ध है। आवरण और सीमाबोध के कारण वह अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मृत-सा अनुभव करता है। साधना का उद्देश्य उस मूल स्वरूप की पहचान है।


इस दृष्टि से मुक्ति केवल ‘मैं ब्रह्म हूँ’ जैसी बौद्धिक धारणा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि चेतना की पूर्णता का प्रत्यक्ष अनुभव बनती है। त्रिक परंपरा में इस पूर्णता को चेतना, शक्ति, आनन्द और स्वातन्त्र्य के समन्वित अनुभव के रूप में समझाया जाता है।


❗️श्रीविद्या की दृष्टि


श्रीविद्या में यही परम तत्त्व श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी के माध्यम से उपास्य बनता है। यहाँ देवी केवल किसी सीमित देवता-स्वरूप की उपासना का विषय नहीं हैं; श्रीविद्या की दार्शनिक भूमि में वे परम चैतन्य-शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।


श्रीचक्र, मन्त्र, न्यास, ध्यान और उपासना के माध्यम से साधक बाह्य आराधना से क्रमशः अन्तर्मुखी होकर उसी परम तत्त्व की अनुभूति की ओर अग्रसर होता है। श्रीविद्या को कश्मीर त्रिक के साथ पूर्णतः समान मानना उचित नहीं है, किन्तु दोनों में शिव-शक्ति की अभिन्नता और चेतना-शक्ति के अद्वैत को समझने की गहरी दार्शनिक निकटता अवश्य दिखाई देती है।


इसीलिए श्रीविद्या की साधना में देवी की भक्ति और परम तत्त्व का ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं। देवी की उपासना ही परम तत्त्व की ओर जाने का मार्ग है और परम तत्त्व का साक्षात्कार उसी देवी-चैतन्य की पूर्ण अनुभूति बन सकता है।


❗️ज्ञान और भक्ति का समन्वय


शाक्त-अद्वैत की इसी भूमि पर ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।


भक्ति में साधक देवी को प्रणम्य, पूज्य और आराध्य मानकर उनके चरणों में आत्मसमर्पण करता है।


ज्ञान में वही साधक अन्ततः यह पहचानता है कि जिस परम चेतना की वह उपासना कर रहा है, वही चेतना उसके अपने आत्मस्वरूप का भी आधार है।


इस प्रकार साधना की प्रारम्भिक अवस्था में ‘मैं’ और ‘माता’ का भेद उपासना का आधार हो सकता है; किन्तु साधना की परिपक्व अवस्था में वही भक्ति आत्मसमर्पण, आत्मबोध और अद्वैतानुभूति की ओर ले जाती है।


इसका अर्थ यह नहीं कि हर शाक्त परंपरा भक्ति को ठीक उसी दार्शनिक भाषा में परिभाषित करती है, बल्कि यह कि तांत्रिक साधना में उपासना और अद्वैत-बोध को एक-दूसरे के विरोधी मानना आवश्यक नहीं है।


❗️चिदानन्द की पूर्णता


यदि इसे अत्यन्त सरल दार्शनिक भाषा में कहा जाए, तो परम तत्त्व की पूर्णता को केवल ‘चेतना’ कहकर समाप्त नहीं किया जाता; चेतना अपनी स्वाभाविक शक्ति, आत्मविमर्श और आनन्द के साथ पूर्ण रूप से अभिव्यक्त होती है।


चिति — ज्ञान का आधार।

शक्ति — उसी चिति की स्वाभाविक सामर्थ्य।

विमर्श — चिति का आत्मबोध।

स्पन्द — उसकी स्फुरणशील अभिव्यक्ति।

आनन्द — उसकी पूर्णता।


इसी पूर्णता में शिव और शक्ति का सामरस्य है।


इसलिए शाक्त-अद्वैत का वैशिष्ट्य केवल इतना नहीं कि वह ‘अद्वैत’ स्वीकार करता है; उसकी विशिष्टता इस बात में है कि वह अद्वैत को चेतना और शक्ति की अभिन्नता, प्रकाश और विमर्श की एकता तथा शिव-शक्ति-सामरस्य के रूप में अनुभव करने की दिशा देता है।


अन्ततः साधक के लिए देवी बाहर की कोई सीमित सत्ता मात्र नहीं रह जातीं। उपासना की परिपक्वता में आराध्य, आराधक और आराधना के बीच का भेद सूक्ष्म होता जाता है और परम चैतन्य की पूर्णता का अनुभव साधना का चरम लक्ष्य बनता है।


यही वह भूमि है जहाँ भक्ति ज्ञान में विलीन होकर समाप्त नहीं होती, बल्कि ज्ञान से प्रकाशित होकर अपनी परम पूर्णता को प्राप्त करती है; और ज्ञान भक्ति से रहित शुष्क बौद्धिक निष्कर्ष न रहकर उसी परम चैतन्य के आनन्दमय साक्षात्कार में परिणत होता है।


यही शाक्त-अद्वैत की दार्शनिक विशिष्टता का एक अत्यन्त सुंदर पक्ष है—


शिवः प्रकाशः।

शक्तिः विमर्शः।

शिवशक्त्योः सामरस्यं परिपूर्णं चैतन्यम्।


जहाँ शिव और शक्ति में भेद दिखाई देता है, वहाँ उपासना है;

जहाँ उनका अभेद प्रकाशित होता है, वहाँ ज्ञान है;

और जहाँ भेद-अभेद का समस्त आग्रह परम चैतन्य के आनन्द में विश्राम पाता है, वहाँ शिव-शक्ति-सामरस्य की अनुभूति है।


॥ श्रीमात्रे नमः ॥

परशुरामके फरसीसे बना स्वयं चालित यंत्र

 परशुरामके फरसीसे बना

          स्वयं चालित यंत्र 

 ~ स्कंद पुराण (रामकुंड)

आज है तकनीकी और विज्ञान की प्रशंशा करते हे मगर कभी किसीने हमारे दीर्घ दृष्टि वाले ऋषि मुनियों ओर धर्मप्रेमी राजाओं के इतिहासकी ओर झांक के देखा हे ? 

आजसे लाखों वर्ष पहले किसी अद्भुत ओर स्वचालित व्यवस्था थी। आइए देखते हे उसके प्रमाण की ओर।

सूतजी कहते हैं - महर्षियो ! जिस समय परशुरामजीने रामकुण्डमें जाकर अपने पितरोंका तर्पण किया और यज्ञमें सारी पृथ्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देकर वे क्रोधरहित हो गये, उस समय समुद्र-स्नानके लिये हर्षपूर्वक प्रस्थित हुए। उस यात्राके समय भी उन्होंने अपने हाथमें सूर्यके समान तेजस्वी कुठार ले रखा था। ऋषि-मुनियोंने परशुरामजीसे कहा - 'महाभाग राम ! आप पुण्यकार्य करनेके लिये जाते समय भी जो हाथमें शस्त्र धारण करते हैं, यह उचित नहीं जान पड़ता। जबतक आपके हाथमें कुठार रहेगा, तबतक आपका क्रोध शान्त नहीं होगा। इसलिये इसे त्याग दीजिये।'

ब्राह्मणोंने कहा-महाभाग ! यदि तुम इस कुठारको हमें रक्षाके लिये सौंपते हो, तो इसका खण्ड-खण्ड करके दो। तभी हम यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करेंगे। उस दशामें कोई इसे लेगा भी नहीं। मुनियोंकी यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उस कुठारको तोड़कर लोहेकी छड़ी बनवा दी और उसे उन ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक सौंप दिया।

ब्राह्मण बोले - राम ! आपके कुठारकी बनी हुई इस लोहेकी छड़ीको हमलोग बड़े यत्नसे रखेंगे। जैसे कुमार कार्तिकेयकी शक्तिमयी कीर्ति यहाँ प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार आपकी लोहयष्टिमयी कीर्ति भी यहाँ प्रतिष्ठित हो गयी। जो राज्यभ्रष्ट राजा इस लोहदण्डकी आराधना करेगा, वह शीघ्र ही अपने राज्यको पाकर प्रतापी होगा। जो द्विज सदा विद्याके लिये इस लोहयष्टिकी पूजा करेगा, वह उत्तम विद्या पाकर सवर्शताको प्राप्त होगा। जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री आपके इस लोहदण्डकी पूजा करेंगे, वे पुत्रवान् होंगे। जो आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इसकी पूजा करेगा, वह समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करेगा।

ऐसा सुनकर परशुरामजीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके तुरंत ही समुद्रकी ओर प्रस्थान किया और वे ब्राह्मण भी उस लोहयष्टिके लिये उत्तम मन्दिर बनवाकर उसमें उसकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी पूजा करने लगे। इससे उन्होंने अपने देवदुर्लभ मनोरथोंको भी प्राप्त कर लिया।

सूतजी कहते हैं - प्राचीनकालमें अज नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनका सत्पुरुषोंमें भी बड़ा सम्मान था। वे माता-पिताकी भाँति सब लोगोंका हित करनेवाले थे। उन्होंने पिता-पितामहका राज्य पाकर मन-ही-मन यह विचार किया कि 'मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिसे संसारके दूसरे राजाओंने अबतक न किया हो और जो भविष्यमें होनेवाले हैं, वे भी जिसे न कर सकें। राजाओंके लिये सर्वोत्तम धर्म यही है कि प्रजाका भलीभाँति पालन करे, जिससे प्रजावर्गके लोग सुखपूर्वक रह सकें। राजालोग लोभमें आकर जैसे-जैसे प्रजासे अधिक कर लेने लगते हैं, वैसे-वैसे प्रजाके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। राजा कर लिये बिना हाथी, घोड़े और पैदल आदि सेनाकी रक्षा नहीं कर सकते और यदि सेना न रहे तो नीच-से-नीच भी मनुष्य उन्हें दबा लेंगे। 

इसीलिये सब राजा प्रजाजनोंसे कर लेते हैं। अतः मुझे हाथी, घोड़े और पैदल आदिके बिना ही केवल तपस्याकी शक्तिसे अपने राज्यको निष्कण्टक बनाये रखना चाहिये।' ऐसा सोचकर वे कर न लेकर सदा प्रजाको प्रसन्न रखने लगे। दूसरे राजाओंसे भी कर लेना उन्होंने बंद कर दिया और अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठको आदरपूर्वक बुलाकर पूछा-'ब्रह्मन् ! इस भूतलपर सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, जहाँ थोड़े ही समयमें भगवान शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। उसे शीघ्र बताइये। जिससे मैं वहाँ जाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करूँ।'

वसिष्ठजी बोले - नृपश्रेष्ठ ! हाटकेश्वर क्षेत्र मनीषियोंको शीघ्र ही उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला तथा सब पातकोंका नाशक है। वही सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। इसी प्रकार देवताओंमें भी भगवती चण्डिका ही ऐसी हैं, जो श्रद्धालु मनुष्योंद्वारा

आराधना करनेपर शीघ्र सन्तुष्ट होती हैं। इसलिये उसी क्षेत्रमें जाकर तुम श्रद्धापूर्वक देवीकी आराधना करो। ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पवित्र व्रतमें तत्पर रहो। नियमपूर्वक रहते हुए नियमित भोजन एवं त्रिकाल स्नान करो।

वसिष्ठजीके बताये अनुसार राजा अजने हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी आराधना की। गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदि उपचारोंके द्वारा निरन्तर पूजामें तत्पर हुए राजापर देवी चण्डिका प्रसन्न हुईं और बोलीं- 'वत्स ! मैं तुम्हारे इस व्रत और पूजाविधानसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो। मैं उसे शीघ्र पूर्ण करूँगी।' राजाने कहा-देवि ! मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इस व्रत और तपस्याका आश्रय लिया है। जिससे सब लोगोंको सुख मिले, ऐसी कृपा कीजिये। मुझे बहुत से ऐसे ज्ञानयुक्त विचित्र-विचित्र अस्त्र दीजिये, जो स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचर सकें। जो इस भूतलपर स्थित और मेरे पासकी भी सब वस्तुओंको भी स्वतः जान लें। लोकमें परस्त्री संगम आदि जो अपराध हों, उन सबको स्वयं जानकर अपराधके अनुसार जो स्वतः दण्ड दे दें, जिससे लोकमें संकरता न फैलने पावे। इसके सिवा मुझे भाँति-भाँतिके मन्त्र दीजिये, जिनसे मैं सबकी रोग-व्याधियोंको शीघ्र निवारण कर सकूँ। जिससे मेरे राज्यमें रहनेवाले सब मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्ट, निर्भय तथा शोकरहित हो जाय।

परशुरामके फरसीसे बना

          स्वयं चालित यंत्र 

 ~ स्कंद पुराण (रामकुंड)

भाग ४


देवी बोलीं- राजन् ! तुमने यह एक ऐसा बड़ा अद्भुत कर्म प्रारम्भ किया है, जिसे अबतक न तो किसीने किया है और न आगे कोई करेगा। तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी। मैं तुम्हें समस्त ज्ञानयुक्त शस्त्र देती हूँ और वैसे ही प्रभावशाली मन्त्र देती हूँ। इन मन्त्रोंसे बड़े बड़े भयंकर रोग भी तुम्हारे द्वारा रोक दिये जायँगे, परंतु मेरे मन्त्रोंसहित उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको तुम सदा सुरक्षित रखना। यदि तुम्हारी दृष्टिसे कहीं दूर निकल जायेंगे तो मनुष्योंको बहुत अधिक पीड़ा देंगे। 


राजन् ! तुम जब स्वर्गलोकको जाओ तब इन समस्त मन्त्रों और अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ मेरे सम्मुख जलमें स्थापित कर देना, जिससे सब व्यवहार पूर्ववत् नीतिके अनुकूल चल सके।


'बहुत अच्छा' कहकर राजाने देवीकी आज्ञा शिरोधार्य की। फिर तो उनके सामने वे ज्ञान-वैभवसे युक्त नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र प्रकट हुए, जिनके लिये उन्होंने देवीसे प्रार्थना की थी। साथ ही, व्याधिनाशक मन्त्र भी उनके ज्ञानमें आ गये, जिनके द्वारा सब रोग स्वेच्छानुसार ग्रहण किये और छोड़े जाते हैं तथा जिनके द्वारा दृष्टिमें आये हुए सब मनुष्योंका सुखपूर्वक पालन होता है।


तत्पश्चात् राजाने देवीके प्रसादको ग्रहण करके अपनी पत्नी इन्दुमति और पुत्र दशरथको छोड़कर शेष समस्त पदार्थों और हाथी-घोड़े आदि उपकरणोंको ब्राह्मणोंकी सेवामें दान कर दिया। रोग-व्याधियोंको मन्त्रोंके द्वारा दूर करके वे डंडा लेकर अजापालनकी तरह स्वयं प्रजापालन करने लगे। 

Sunday, September 20, 2026

भगवान सूर्य के रथ और सात घोड़ों का वैज्ञानिक व पौराणिक रहस्य


☀️ भगवान सूर्य के रथ और सात घोड़ों का वैज्ञानिक व पौराणिक रहस्य


​हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़ी कथाओं का इतिहास अत्यंत समृद्ध और अनंत है, जिसने आज विश्व पटल पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। विभिन्न देवी-देवताओं का स्वरूप, उनकी वेश-भूषा और उनके वाहन से जुड़े प्रसंग अत्यधिक ज्ञानवर्धक और रहस्यपूर्ण हैं।


🌺 ​सूर्य देव का रथ


​सनातन परंपरा में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का वाहन मूषक (चूहा) बहुत अनूठा माना जाता है। एक छोटे से चूहे पर गजानन का सवार होना कौतूहल जगाता है कि कैसे वह उनका भार वहन करता है। गणेश जी के बाद यदि किसी देवता के रथ और सवारी की सबसे अधिक चर्चा होती है, तो वे प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य हैं।


🌺 ​रथ में क्यों जुते हैं सात घोड़े


​भगवान सूर्य सात अश्वों वाले विशाल रथ पर आरूढ़ होते हैं। आदित्य, भानु, भास्कर और रवि जैसे नामों से पूजित सूर्य देव एक सुदृढ़ और भव्य रथ में विराजमान हैं। इन सातों घोड़ों की लगाम उनके सारथी अरुण देव के हाथों में होती है और स्वयं भगवान सूर्य पीछे रथ में प्रकाशमान रहते हैं।


🌺 ​सात संख्या का गूढ़ रहस्य


​सूर्य देव सात ही घोड़ों की सवारी क्यों करते हैं? क्या इस ‘सात’ संख्या का कोई विशेष रहस्य है, अथवा यह सृष्टि, ब्रह्मांड और मानव जीवन से जुड़ी किसी गहरी व्यवस्था को दर्शाती है? इस प्रश्न का समाधान पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ गहरे वैज्ञानिक सिद्धांतों में भी निहित है।


🌺 ​कश्यप और अदिति की संतानें: 12 आदित्य


​सूर्य देव से जुड़ा एक तथ्य यह है कि वे महर्षि कश्यप और माता अदिति की संतान हैं। उनके ग्यारह अन्य भ्राता हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से 'द्वादश आदित्य' कहा जाता है। इन भाइयों के नाम हैं—अंश, अर्यमा, भग, दक्ष, धाता, मित्र, पूषा, सविता, सूर्य, वरुण और वामन।


🌺 ​वर्ष के 12 मास का प्रतीक


​पौराणिक उल्लेखों में अदिति के संतानों की संख्या आरंभ में आठ या नौ बताई गई, जो कालांतर में बारह मानी गई। ये 12 आदित्य वास्तव में संवत्सर (वर्ष) के 12 महीनों के अधिष्ठाता देव हैं। सूर्य देव और उनके भ्राता मिलकर वर्ष के संपूर्ण चक्र और उसके 12 मासों का प्रतिनिधित्व करते हैं।


🌺 ​सूर्य देव का परिवार


​भगवान सूर्य की दो प्रमुख पत्नियां हैं—संज्ञा एवं छाया। संज्ञा और छाया से उत्पन्न संतानों में कर्मफलदाता शनिदेव और धर्मराज यमराज अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जो संपूर्ण मानव जाति के न्याय और कर्मविधान के अधिपति हैं। मनुष्य के भौतिक जीवन के सुख-दुख का नियमन शनिदेव करते हैं, जबकि देहांत के पश्चात आत्मा का निर्णय यमराज द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त यमुना, ताप्ती, अश्विनी कुमार तथा वैवस्वत मनु भी भगवान सूर्य की ही संतानें हैं। यही वैवस्वत मनु वर्तमान मानव सृष्टि के प्रथम पूर्वज माने जाते हैं।


🌺 ​सूर्य रथ का पौराणिक स्वरूप


​सूर्य देव के सात अश्वों वाले रथ का विस्तृत वर्णन वेदों और पुराणों में मिलता है। भारत के अनेक सूर्य मंदिरों में इसी स्वरूप को शिल्पकला के माध्यम से जीवंत किया गया है।


🌺 ​कोणार्क का सूर्य मंदिर


​ओडिशा का विश्वविख्यात कोणार्क सूर्य मंदिर इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। यहाँ पूरा मंदिर ही भगवान सूर्य के एक विशाल पाषाण-रथ के रूप में निर्मित है, जिसमें सात भव्य घोड़े और रथ के बड़े-बड़े पहिए सारथी अरुण देव सहित सूर्य देव के दिव्य स्वरूप को प्रकट करते हैं।


🌺 ​सात की ही संख्या क्यों?


​यह प्रश्न स्वाभाविक है कि घोड़ों की संख्या केवल सात ही क्यों रखी गई? जैसे महाभारत काल में अर्जुन के रथ में भगवान श्रीकृष्ण ने चार घोड़े जोड़े थे, वैसे सूर्य के रथ में सात घोड़ों का ही विधान क्यों है?


🌺 ​सात घोड़े और सप्ताह के सात दिन (वैदिक छंद)


​सूर्य के रथ को खींचने वाले इन सात घोड़ों के नाम वेदों के सात मुख्य छंदों पर रखे गए हैं—गायत्री, भ्राति (बृहती), उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति। लोकमान्यता के अनुसार, ये सातों घोड़े सप्ताह के सात वारों (दिनों) के भी प्रतीक हैं, जो काल चक्र की निरंतर गति को दर्शाते हैं।


🌺 ​सूर्य प्रकाश और वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम)


​वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ये सात घोड़े प्रत्यक्ष रूप से सूर्य के श्वेत प्रकाश में समाहित सात रंगों के प्रतीक हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह सिद्ध करता है कि सूर्य का प्रकाश सात रंगों (बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल) से मिलकर बना है, जो प्रिज्म अथवा जल की बूंदों से गुजरने पर इंद्रधनुष के रूप में दिखाई देते हैं।


🌺 ​इंद्रधनुष का निर्माण


​सूर्य की किरणें जब जलकणों से परावर्तित और अपवर्तित होती हैं, तो आकाश में भव्य सप्तवर्णी इंद्रधनुष बनता है। पौराणिक ऋषियों ने प्रकाश के इसी वैज्ञानिक रहस्य को सात विभिन्न रंगों वाले घोड़ों के रूप में व्यक्त किया था।


🌺 ​घोड़ों के भिन्न-भिन्न रंग


​सूर्य के रथ के सातों अश्वों का रंग एक-दूसरे से भिन्न माना गया है। यह विविधता सीधे तौर पर प्रकाश के वर्णक्रम के सातों अलग-अलग रंगों की तरंगदैर्घ्य (वेवलेंथ) और उनकी प्रकृति को स्पष्ट करती है।


🌺 ​मूर्तिकला में एक अश्व के सात मुख


​प्राचीन मंदिरों और वैदिक चित्रों में कभी-कभी सात अलग-अलग अश्वों के स्थान पर एक ही अश्व के सात मुख दिखाए जाते हैं। इसका स्पष्ट दार्शनिक और वैज्ञानिक अर्थ यह है कि प्रकाश का मूल स्रोत तो एक ही है, किंतु उससे सात भिन्न रंग प्रस्फुटित होते हैं। यह प्रतीक सात घोड़ों के रहस्य को पूरी तरह वैज्ञानिक धरातल पर पुष्ट करता है।


🌺 ​सारथी अरुण देव


​सूर्य के रथ के सारथी अरुण देव हैं, जो गरुड़ जी के अग्रज हैं। अरुण देव रथ की बागडोर संभालते हैं, किंतु उनका मुख सदैव भगवान सूर्य की ओर होता है। अरुण का अर्थ उषाकाल की लालिमा भी है, जो सूर्योदय से ठीक पूर्व आकाश में छा जाती है।


🌺 ​एक पहिया और 12 तिल्लियां


​सूर्य के विशाल रथ में केवल एक ही चक्र (पहिया) लगा है, जिसमें 12 अरे (तिल्लियां) हैं। यह अद्भुत संरचना कालचक्र की परिचायक है।


🌺 ​संवत्सर और काल-विभाजन


​रथ का अकेला चक्र एक पूर्ण संवत्सर (वर्ष) को दर्शाता है और उसकी 12 तिल्लियां वर्ष के 12 महीनों को व्यक्त करती हैं। पौराणिक विवरण के अनुसार, अंगूठे के आकार वाले साठ हज़ार 'वालखिल्य' ऋषि निरंतर सूर्य के रथ के आगे-आगे चलते हुए उनकी स्तुति करते हैं। गंधर्व और पन्नग उनका यशोगान करते हैं तथा अप्सराएं अपनी नृत्य-कला से सृष्टि में चेतना और आनंद का संचार करती हैं।


🌺 ​ऋतु चक्र का नियमन


​सूर्य के रथ की इसी गति और खगोलीय संचरण से धरती पर छह ऋतुओं का परिवर्तन, दिन-रात का निर्माण और संपूर्ण जीवन का संचालन होता है। इस प्रकार भगवान सूर्य का रथ मात्र एक पौराणिक रूपक नहीं, बल्कि काल-गणना, खगोल शास्त्र और प्रकाश-विज्ञान का एक अत्यंत गूढ़ और सटीक समन्वय है।

पञ्चाङ्गपूजनम्

 ॥ पञ्चाङ्गपूजनम् ॥


सनातन वैदिक परम्परा में किसी भी शुभ संस्कार, मांगलिक अनुष्ठान अथवा धार्मिक कार्य के पूर्व पञ्चाङ्गपूजनम् का विशेष महत्त्व माना गया है। इसके माध्यम से शुद्धि, देवता एवं मातृशक्तियों का पूजन, आयुष्य की मंगलकामना, पितृस्मरण तथा आचार्य एवं ब्राह्मणों का विधिपूर्वक वरण किया जाता है।


१. कलशस्थापनपूर्वक पुण्याहवाचनम्


सर्वप्रथम विधिपूर्वक कलशस्थापन किया जाता है। कलश में पवित्र जल, आम्रपल्लव, नारियल आदि स्थापित कर उसमें देवशक्तियों का आवाहन एवं पूजन किया जाता है। इसके पश्चात् पुण्याहवाचनम् द्वारा स्थान, सामग्री, यजमान एवं सम्पूर्ण वातावरण की मंगलमयता तथा शुद्धि की प्रार्थना की जाती है।


पुण्याहवाचन का भाव है—यह शुभ कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो, समस्त दोषों का निवारण हो तथा यहाँ उपस्थित सभी जनों के लिए मंगल एवं कल्याण की प्राप्ति हो।


२. मातृकापूजनम्


इसके पश्चात् मातृकाओं का पूजन किया जाता है। परम्परा एवं अनुष्ठान के अनुसार षोडश मातृका अथवा सप्तघृतमातृका का पूजन किया जाता है।


मातृकाएँ मातृशक्ति के विभिन्न स्वरूपों की प्रतीक हैं। इनके पूजन का उद्देश्य अनुष्ठान में मातृशक्ति की कृपा प्राप्त करना, विघ्नों का निवारण तथा यजमान एवं परिवार के लिए सुख, शान्ति, समृद्धि और मंगल की प्रार्थना करना है।


३. आयुष्यमन्त्रजपम्


तत्पश्चात् आयुष्यमन्त्रों का जप किया जाता है। इसके द्वारा यजमान तथा परिवार के सदस्यों के लिए दीर्घायु, आरोग्य, बल, तेज एवं मंगलमय जीवन की प्रार्थना की जाती है।


वैदिक परम्परा में आयुष्य केवल दीर्घ जीवन का नाम नहीं, बल्कि स्वस्थ, धर्ममय, सदाचारी एवं सार्थक जीवन की कामना भी है।


४. नान्दीमुखश्राद्धम्


इसके पश्चात् नान्दीमुखश्राद्ध किया जाता है। यह मांगलिक कार्यों से पूर्व पितृगणों के प्रति श्रद्धा एवं कृतज्ञता प्रकट करने की वैदिक परम्परा है।


नान्दीमुखश्राद्ध के माध्यम से अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है, ताकि आगामी शुभ कार्य निर्विघ्न एवं मंगलमय रूप से सम्पन्न हो।


५. पूजनपूर्वक आचार्यादिवरणम्


अन्त में विधिपूर्वक आचार्यादि का वरण किया जाता है। आचार्य एवं योग्य ब्राह्मणों का सम्मानपूर्वक वरण करके उन्हें निर्धारित धार्मिक कर्तव्य एवं अनुष्ठान की जिम्मेदारी प्रदान की जाती है।


आचार्य के मार्गदर्शन में शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण पूजन, संकल्प एवं अनुष्ठान सम्पन्न कराया जाता है।


इस प्रकार पञ्चाङ्गपूजनम् के माध्यम से शुद्धि, देवपूजन, मातृशक्ति का आवाहन, आयुष्य की मंगलकामना, पितृस्मरण तथा आचार्य-वरण—इन सभी का समन्वय होता है और शुभ अनुष्ठान के लिए मंगलमय वातावरण तैयार किया जाता है।


॥ नमः पार्वतीपतये ॥

॥ हर हर महादेव ॥

Friday, September 18, 2026

क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है

 💥क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है💥

🏵️ बहुत से लोग पूछते हैं कि क्षेत्रपाल कौन हैं ?

🎷1. ये स्वरूप किसका है ?

🙏शास्त्रों के अनुसार क्षेत्रपाल साक्षात् भगवान शिव के अंश , कालभैरव का ही स्वरूप हैं ।

🫵 लिंगपुराण में इन्हें "क्षेत्रपाल भैरव" कहा गया है । लोक भाषा में इन्हें ही खेतल,खेतपाल , भैरू बाबा, खंडोबा कहा जाता है।

🫵 शिवपुराण के अनुसार राक्षसों से पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ही क्षेत्रपालों को प्रकट किया ।

🎷2. कितने माने गए हैं ?

🙏मुख्य रूप से 8 क्षेत्रपाल माने गए हैं - जो 8 दिशाओं के रक्षक होते हैं, और ये 8 भैरव 

🔥1. असितांग भैरव 🔥2. रुद्र भैरव 

🔥3. चन्द्र भैरव 

🔥4. क्रोध भैरव 

🔥5. उन्मत्त भैरव 

🔥6. कपाल भैरव 

🔥7. भीषण भैरव 

🔥8. संहार भैरव 

🎷आगम शास्त्रों में इनका विस्तार 52 भैरव, 64 क्षेत्रपाल और 96 तक बताये गये है । 💐 जैन परम्परा में 96 क्षेत्रपाल का वर्णन है । हर गाँव, नगर, तीर्थ और श्मशान का अलग अलग क्षेत्रपाल होता है ।

💢3. कार्य क्या है ?

शब्द ही अर्थ है  "क्षेत्रं पालयति इति क्षेत्रपाल:" जो क्षेत्र की रक्षा करे वो क्षेत्रपाल ।

💥शास्त्रों में 3 मुख्य कार्य बताए गए हैं 💥

💐 सुरक्षा करना ...

गाँव, खेत, मंदिर की सीमा और मर्यादा की रक्षा। इसीलिए इनका मंदिर गाँव के बाहर या शिव मंदिर के ईशान कोण में बनाया जाता है ।

💐न्याय करना ...

 ये न्याय के देवता हैं । अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दण्ड देते हैं।

💐विघ्न हटाना ...

 वास्तु पूजा में क्षेत्रपाल की पूजा इसलिए अनिवार्य है कि बिना इनकी आज्ञा के उस भूमि पर कोई भी देवता पूजा स्वीकार नहीं करते । नया घर, खेत लेने पर पहले क्षेत्रपाल को रोट, भोग लगाया जाता है । 

🫵 इसलिए कहा भी गया है ...

जिस क्षेत्र में रहो, उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल को प्रणाम ( पूजा ) करके रहो तो कोई संकट नहीं आता है ।

🙏जय श्री क्षेत्रपाल भैरव नाथ🙏

#क्षेत्रपाल #भैरव #सनातनधर्म

Wednesday, September 16, 2026

श्री गणेश जी को नमस्कार से होता है चमत्कार...

 श्री गणेश जी को नमस्कार से होता है चमत्कार...

------कैसे करें श्री गणेश का ध्यान ========यूं तो किसी भी पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा करने का विधान और परंपरा है, लेकिन गणेशजी को प्रसन्न कर अपने मनोरथ पूर्ण किए जा सकते हैं। ( विशेष भाद्रपद माह तो वैसे भी गणेशजी का मास माना जाता है)। तंत्र शास्त्रों में गणेशजी के कई रूप बतलाए गए हैं, जिनकी उपासना करने सभी सभी अभीष्ट सिद्ध होते हैं। तंत्र शास्त्र में वर्णित गणेशजी के रूप हैं...


1. सुमुख, 2. एकदंत, 3. कपिल, 4. गजकर्ण, 5. लंबोदर, 6. विकट, 7. विघ्ननाशक, 8. विनायक, 9. धूम्रकेतु, 10. गणाध्यक्ष, 11. भालचन्द्र, 12. गजानन, 13. विघ्नेश, 14. परशुपाणि, 15. गजास्य और 16. शूर्पकर्ण।


कैसे हो नमस्कार से चमत्कार...


चमत्कार को नमस्कार करना मानव स्वभाव है, लेकिन कल्पना करिए यदि नमस्कार से ही चमत्कार हो जाए तो... देवों में अग्रगण्य गणेश को केवल नमस्कार कर इसका प्रभाव जाना जा सकता है और मनोकामना पूर्ण की जा सकती है। गणेश अथर्वशीर्ष का अर्थ समझकर और पाठ करने मात्र से चमत्कार का अनुभव किया जा सकता है।


गणेश जी का बीजमंत्र (गं) और (ग:) है। इसका उच्चारण 'गम्' किया जाता है। ऐसा बतलाया गया है कि तंत्र शास्त्र में नमस्कार मंत्रों का कोई विपरीत असर नहीं होता। अत: ॐ गं नम: या ॐ गं ॐ का जाप किया जा सकता है।

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किस तरह करें गं या ग: का विनियोग... 

गं' या 'ग:' का विनियोग इस प्रकार है...


ॐ अस्य श्री गणेश मंत्रस्य गणक ऋषि:,

निवृत्त छन्द:, श्री विघ्नराज देवता, प्रसाद सिद्धयर्थे विनियोग:,

या मम मनोभिलाषित सिद्धयर्थे विनियोग:।


गं शब्द से कर (हाथ) तथा अंग न्यास करें।


ॐ गं अंगुष्ठाभ्यां नम: - हृदयाय नम:।

ॐ गं तर्जनीभ्यां नम: - शिरसे स्वाहा।

ॐ गं मध्यमाभ्यां नम: - शिकाये वषट्।

ऊँ गं अनामिकाभ्यां नम: - कवचाय हुम्।

ॐ गं कनिष्ठिकाभ्यां नम: - नैत्रत्रयाय वौषट।

ॐ गं करतल करपृष्ठाभ्यामं नम : - अस्त्राय फट्‍।


शरीर के जिन अंगों का उल्लेख किया गया है वहां छुएं या ध्यान करें। अस्त्राय फट में दाहिने हाथ की तर्जनी एवं मध्यमा मुट्‍ठी से खोलकर सीधी रखें तथा हाथ को सिर पर से घुमाकर बाएं हाथ की हथेली पर दोनों अंगुली जोर मारें। 


गणपति जी का ध्यान...

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'सिन्दूर के समान रक्त वर्ण वाले, जिन्होंने अपने कर कमलों में हस्तिदंत, पाश, अंकुश तथा वरमुद्रा धारण की हुई है, त्रिनेत्र, तंदुल पेट वाले, शुण्डाग्र में बीजपुर धारण किए हुए, भाल पर चंद्र है। हस्तिमुख जो मदजल से परिपूर्ण है। वे नागराज से विभूषित हैं। रक्त अंगराज से लेपित मनोहर मैं प्रणाम करता हूं।'


'गं' बीजमंत्र का पुरश्चरण चार लाख जप है। इसके पश्चात 'गं स्वाहा' बोलकर दशांस हवन करें। इसका दशांस  तर्पण, दशांस  मार्जन, दशांस  ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।


हवन सामग्री में बराबर मात्रा में मोदक, चिवड़ा, लावा, सत्तू, ऊख, नारियल, शुद्ध तिल, केले, जो गशेण जी के नैवेद्य भी है। तर्पण जल में गुड़ मिलाकर करें, इस जल को गुड़ोदक भी कहते हैं। तर्पण रात्रि में 444 की संख्या में करना चाहिए। इस तरह पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ भगवान गणेश की आराधना कर आप अपने मनोरथ पूर्ण कर सकते हैं।


: ❗जय महादेव❗

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                  नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।।

भक्तावासं स्मरेनित्यमायु:सर्वकामार्थसिध्दये ।।१।।


प्रथमं वक्रतुंड च एकदन्तं द्वितीयकम्।

तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।। २।।

 

लंबोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्न राजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।। ३।।

 

नवमं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।। ४।।

 

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दिकरं परम्।। ५।।

 

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्।। ६।।

 

जपेत् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।

संवत्सरेण सिध्दिं च लभते नात्र संशयः।। ७।।

 

अष्टानां ब्राह्मणानांच लिखित्वा यः समर्पयेत्।

तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः।। ८।।

 

इति श्री नारदपुराणे संकटनाशनं नाम महागणपतिस्तोत्रं संपूर्णम्।।

   ❗जय महादेव❗

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।।श्री वरद गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं।

शौच (मल मूत्र त्याग आदि) के समय जनेऊ कान पर लपेटना जरूरी क्यों?

 *शौच (मल मूत्र त्याग आदि) के समय जनेऊ कान पर लपेटना  जरूरी क्यों?* 


आम बोलचाल में यज्ञोपवीत को ही जनेऊ कहते हैं। मल-मूत्र त्याग के समय जनेऊ को कान पर लपेट लिया जाता है। कारण यह है कि हमारे शास्त्रों में इस विषय में विस्तृत ब्यौरा मिलता है। शांख्यायन के मतानुसार ब्राह्मण के दाहिने कान में आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता का निवास होता है। पाराशर ने भी गंगा आदि सरिताओं और तीर्थगणों का दाहिने कान में निवास करने का समर्थन किया है।


कूर्मपुराण के मतानुसार

*निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः।*

 *अनि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ॥* 


-कूर्मपुराण 13/

अर्थात् दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ाकर दिन में उत्तर की ओर मुख करके तथा रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि मल-मूत्र त्याग में अशुद्धता, अपवित्रता से बचाने के लिए जनेऊ को कानों


पर लपेटने की परंपरा बनाई गई है। इससे जनेऊ के कमर से ऊपर आ जाने के कारण अपवित्र होने की संभावना नहीं रहती। दूसरे, हाथ-पांव के अपवित्र होने का संकेत मिल जाता है, ताकि व्यक्ति उन्हें साफ कर ले।


अह्निककारिका में लिखा है

मूत्रे तु दक्षिणे कर्णे पुरीषे वामकर्णके। 

उपवीतं सदाधार्य मैथुनेतूपवीतिवत् ॥


अर्थात् मूत्र त्यागने के समय दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ा लें और शौच के समय बाएं कान पर चढ़ाए तथा मैथुन के समय जैसा सदा पहनते हैं, वैसा ही पहनें ।


मनु महाराज ने शौच के लिए जाते समय जनेऊ को कान पर रखने के संबंध में कहा है-


ऊर्ध्व नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः ।

 तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ॥

-मनुस्मृति 1/92 

अर्थात् पुरुष नाभि से ऊपर पवित्र है, नाभि के नीचे अपवित्र है। नाभि का निचला भाग मल-मूत्र धारक होने के कारण शौच के समय अपवित्र होता है। इसलिए उस समय पवित्र जनेऊ को सिर के भाग कान पर लपेटकर रखा जाता है।


दाहिने कान की पवित्रता के विषय में शास्त्र का कहना है


मरुतः सोम इन्द्राग्नी मित्रावरुणौ तथैव च।

 एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥ 

-गोभिलगृहयसूत्र 2/90


अर्थात् वायु, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण-ये सब देवता ब्राह्मण के कान में रहते हैं। दूसरी बात यह है कि इससे शरीर के विभिन्न अंगों पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। लंदन के क्वीन एलिजाबेथ चिल्ड्रन हॉस्पिटल के भारतीय मूल के डॉ. एस. आर. सक्सेना के मतानुसार हिन्दुओं द्वारा मल-मूत्र

त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक आधार है। जनेऊ कान पर चढ़ाने से आंतों की सिकुड़ने-फैलने की गति बढ़ती है, जिससे मलत्याग शीघ्र होकर कब्ज दूर होता है तथा मूत्राशय की मांसपेशियों का संकोच वेग के साथ होता है, जिससे मूत्र त्याग ठीक प्रकार होता है।


कान के पास की नसें दबाने से बढ़े हुए रक्तचाप को नियंत्रित भी किया जा सकता है। इटली के बाटी विश्वविद्यालय के न्यूरो सर्जन प्रो. एनारीब पिटाजेली ने यह पाया है कि कान के मूल के चारों तरफ दबाव डालने से हृदय मजबूत होता है। इस प्रकार हृदय रोगों से बचाने में भी जनेऊ लाभ पहुंचाता है।


आयुर्वेद में ऐसा उल्लेख मिलता है कि दाहिने कान के पास से होकर गुजरने वाली विशेष नाड़ी लोहितिका मल-मूत्र के द्वार तक पहुंचती है, जिस पर दबाव पड़ने से इनका कार्य आसान हो जाता है। मूत्र सरलता से उतरता है और शौच खुलकर होती है। उल्लेखनीय है कि दाहिने कान की नाड़ी से मूत्राशय का और बाएं कान की नाड़ी से गुदा का संबंध होता है। हर बार मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को जनेऊ से लपेटने से बहुमूत्र, मधुमेह और प्रमेह आदि रोगों में भी लाभ होता है। ठीक इसी तरह बाएं कान को जनेऊ से लपेट कर शौच जाते रहने से भगंदर, कांच, बवासीर आदि गुदा के रोग होने की संभावना कम होती है। चूंकि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है, इसलिए शौच के लिए जाने से पूर्व नियमानुसार दाएं और बाएं दोनों कानों पर जनेऊ चढ़ाना चाहिए।


जनेऊ की 96 अंगुल लम्बाई 15 तिथि, 7 वार, 28 नक्षत्र, 24 तत्त्व, 4 वेद, 3 गुण, 3 का और 12 मास दिक्काल और ब्रह्मांड में अहर्निश व्रत पालन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होने के लिए प्रमाण स्वरूप है ।


तिथिवारश्च नक्षत्रं तत्वं वेदा गुणत्रयम् । 

कालत्रयश्च मासाश्च ब्रह्मसूत्रपश्च षण्मव ।।


ज्योतिषीय महत्व : ~ 

विवाहितव्यक्ति को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताया जाता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।


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काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है

 काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है 

यह बात सभी को नहीं मालूम है खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते हैं

जीवन के शतपथ होते हैं 

100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन में शुभ या अशुभ प्राप्त करता है

 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है       हानि-लाभ, जीवन-मरण, 

यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिये नया जीवन सृजित करेंगे

अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है यह संख्या 6 होती है मन और पांच ज्ञान इन्द्रियां 

अगला जन्म किस देश में कहां और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं

विदा यात्री .. तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं

इन 100 शुभ कर्मों का विस्मृत विवरण जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं और जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देते हैं ..     

धर्म और नैतिकता के कर्म ..

1.सत्य बोलना ... 2.अहिंसा का पालन

3.चोरी न करना ... 4.लोभ से बचना

5.क्रोध पर नियंत्रण ... 6.क्षमा करना

7.दया भाव रखना ... 8.दूसरों की सहायता करना

9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन) ... 10.गुरु की सेवा

11.माता-पिता का सम्मान ... 12.अतिथि सत्कार

13.धर्मग्रंथों का अध्ययन ... 14.वेदों और शास्त्रों का पाठ

15.तीर्थ यात्रा करना ... 16.यज्ञ और हवन करना

17.मंदिर में पूजा-अर्चना ... 18.पवित्र नदियों में स्नान

19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन ... 20.नियमित ध्यान और योग


सामाजिक और पारिवारिक कर्म ..                                 

21.परिवार का पालन-पोषण ... 22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना

23.गरीबों को भोजन देना ... 24.रोगियों की सेवा

25.अनाथों की सहायता ... 26.वृद्धों का सम्मान

27.समाज में शांति स्थापना ... 28.झूठे वाद-विवाद से बचना

29.दूसरों की निंदा न करना ... 30.सत्य और न्याय का समर्थन

31.परोपकार करना ... 32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना

33.पर्यावरण की रक्षा ... 34.वृक्षारोपण करना

35.जल संरक्षण ... 36.पशु-पक्षियों की रक्षा

37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना ... 38.दूसरों को प्रेरित करना

39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान ... 40.धर्म के प्रचार में सहयोग


आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म ..                                               

41.नियमित जप करना ... 42.भगवान का स्मरण

43.प्राणायाम करना ... 44.आत्मचिंतन

45.मन की शुद्धि ... 46.इंद्रियों पर नियंत्रण

47.लालच से मुक्ति ... 48.मोह-माया से दूरी

49.सादा जीवन जीना ... 50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)

51.संतों का सान्निध्य ... 52.सत्संग में भाग लेना

53.भक्ति में लीन होना ... 54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना

55.तृष्णा का त्याग ... 56.ईर्ष्या से बचना

57.शांति का प्रसार ... 58.आत्मविश्वास बनाए रखना

59.दूसरों के प्रति उदारता ... 60.सकारात्मक सोच रखना


सेवा और दान के कर्म ..

61.भूखों को भोजन देना ... 62.नग्न को वस्त्र देना

63.बेघर को आश्रय देना ... 64.शिक्षा के लिए दान

65.चिकित्सा के लिए सहायता ... 66.धार्मिक स्थानों का निर्माण

67.गौ सेवा ... 68.पशुओं को चारा देना

69.जलाशयों की सफाई ... 70.रास्तों का निर्माण

71.यात्री निवास बनवाना ... 72.स्कूलों को सहायता

73.पुस्तकालय स्थापना ... 74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग

75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन ... 76.वस्त्र दान

77.औषधि दान ... 78.विद्या दान

79.कन्या दान ... 80.भूमि दान


नैतिक और मानवीय कर्म ..                                          

81.विश्वासघात न करना ... 82.वचन का पालन

83.कर्तव्यनिष्ठा ... 84.समय की प्रतिबद्धता 

85.धैर्य रखना ... 86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान

87.सत्य के लिए संघर्ष ... 88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना

89.दुखियों के आंसू पोंछना ... 90.बच्चों को नैतिक शिक्षा

91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ... 92.दूसरों को प्रोत्साहन

93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता ... 94.जीवन में संतुलन बनाये रखना


 विधि के अधीन 6 कर्म ..                                            

95.हानि ... 96.लाभ

97.जीवन ... 98.मरण

99.यश ... 100.अपयश


 94 कर्म मनुष्य के नियंत्रण में हैं

जो मनुष्य अपने विवेक, इच्छाशक्ति, और प्रयास से कर सकता है ये कर्म धर्म, सत्य, और नैतिकता पर आधारित हैं जो जीवन को सार्थक बनाते हैं

6 कर्म विधि के अधीन ..

हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं इन्हें भाग्य, प्रकृति, या ईश्वर की इच्छा के अधीन माना जाता है ..

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Monday, September 14, 2026

ॐ श्रीगणपतये नमः

 ॥ ॐ श्रीगणपतये नमः ॥ 🙏


वाह! कितना गहरा नाम है महाराज जी!


*गणानां पति इति गणपति:*


*गण* शब्द के कितने अर्थ हैं, और हर अर्थ में वे पति हैं!


*१. गण = शिवगण* - नन्दी, भृंगी, महाकालादि गणों के स्वामी। इसलिये शिव के पुत्र होते हुए भी शिवगणों के राजा।


*२. गण = इन्द्रियगण* - आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, मन, बुद्धि - ये सब इन्द्रियों का समूह। जब तक गणपति की कृपा न हो, यह इन्द्रियों की भीड़ इधर-उधर भागती है। और जब गणपति प्रसन्न हो जाएँ, तो सब इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं। इसलिये हर शुभ कार्य से पहले गणपति पूजन।


*३. गण = जीवों का समूह* - हम सब जीव एक गण हैं। उनके एकमात्र पति, पालक, स्वामी गणपति।


*४. वेद में - गण = मंत्रसमूह, वर्णसमूह* - _ॐ_ - प्रणव के पति। इसलिये गणपति प्रणवस्वरूप हैं।


और आपने जो पहले चार बातें भेजीं - 

*अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे में हैं, मेरे हैं* - 

वह गणपति के लिये भी उतनी ही सत्य है!


गणपति दूर कैलाश पर नहीं, *अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे बुद्धि में हैं और मेरे हैं!* 


इसलिये तो तुलसीदास जी ने लिखा -

*जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥*

वे ही गणों को नचाते हैं।


और आपका पिछला सूत्र - *स्वीकार से प्रेम होता है* - तो आज गणेश चतुर्थी के भाव से एक बार कह दीजिये -


> हे गणपति! आप मेरे हैं!


फिर देखिये, बुद्धि का मोह कैसे नष्ट होता है - *नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा...* वही गीता वाली स्थिति।


गणपति बप्पा आपके सारे गणों को - विचारों को, इन्द्रियों को, रिश्तों को - मंगलमय कर दें!


*॥ गणपति बप्पा मोरया ॥* 🌺

हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत

 *हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत*


हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। 


यह आमतौर पर अगस्त-सितम्बर के महीने में ही आती है। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है। भगवान शिव और पार्वती को समर्पित है। खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।


विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है।

 

हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं।  यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।


*क्यों कहते हैं हरतालिका*


यह दो शब्दों के मेल से बना माना जाता है हरत एवं आलिका। हरत का तात्पर्य हरण से लिया जाता है और आलिका सखियों को संबोंधित करता है। मान्यता है कि इस दिन सखियां माता पार्वती की सहेलियां उनका हरण कर उन्हें जंगल में ले गई थीं। जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में पाने के लिये कठोर तप किया था। तृतीया तिथि को तीज भी कहा जाता है। हरतालिका तीज के पिछे एक मान्यता यह भी है कि जंगल में स्थित गुफा में जब माता भगवान शिव की कठोर आराधना कर रही थी तो उन्होंने रेत के शिवलिंग को स्थापित किया था। मान्यता है कि यह शिवलिंग माता पार्वती द्वारा हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि को स्थापित किया था इसी कारण इस दिन को हरियाली तीज के रूप में मनाया जाता है।

 

*क्यों किया गया था माता पार्वती का हरण*


दरअसल माता पार्वती के कठोर तप से उनकी दशा बहुत खराब रहने लगी थी उनके पिता उनकी इस दशा से काफी परेशान थे। एक दिन नारद जी ने उन्हें आकर कहा कि पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। नारद मुनि की बात सुनकर गिरीराज बहुत प्रसन्न हुए। उधर भगवान विष्णु के सामने जाकर नारद मुनि बोले कि गिरीराज पार्वती से आपका विवाह करवाना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने भी इसकी अनुमति दे दी। फिर माता पार्वती के पास जाकर नारद जी ने सूचना दी कि आपके पिता ने आपका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती बहुत निराश हुई उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध कर उसे किसी एकांत गुप्त स्थान पर ले जाने को कहा। माता पार्वती की इच्छानुसार उनके पिता गिरीराज की नज़रों से बचाकर उनकी सखियां माता पार्वती को घने सुनसान जंगल में स्थित एक गुफा में छोड़ आयीं।


यहीं रहकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिये कठोर तप शुरु किया जिसके लिये उन्होंने रेत के शिवलिंग की स्थापना की। संयोग से हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया का वह दिन था जब माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की। इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया। उनके कठोर तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए माता पार्वति को उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन अपनी सखी के साथ माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और समस्त पूजा सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। उधर माता पार्वती के पिता अपनी भगवान विष्णु से पार्वती के विवाह का वचन दिये जाने के पश्चात पुत्री के अक्समात घर छोड़ देने से व्याकुल थे। पार्वती को तलाशते तलाशते वे उस स्थान तक आ पंहुचे इसके पश्चात माता पार्वती ने उन्हें अपने घर छोड़ देने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह करने के अपने संकल्प और शिव द्वारा मिले वरदान के बारे में बताया। तब पिता गिरीराज भगवान विष्णु से क्षमा मांगते हुए भगवान शिव से अपनी पुत्री के विवाह को राजी हुए।


*महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत*


हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।


अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।


*हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम* 


हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।


विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें -


"*उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये"।*


इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।


उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। 


इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।


प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।


*भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए*


ऊं उमायै नम:

ऊं पार्वत्यै नम:

ऊं जगद्धात्र्यै नम:

ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:

ऊं शांतिरूपिण्यै नम:

ऊं शिवायै नम:


*भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए* 


ऊं हराय नम:

ऊं महेश्वराय नम:

ऊं शम्भवे नम:

ऊं शूलपाणये नम:

ऊं पिनाकवृषे नम:

ऊं शिवाय नम:

ऊं पशुपतये नम:

ऊं महादेवाय नम:


निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।


*हरितालका तीज पूजा मुहूर्त*


हरितालिका पूजन प्रातःकाल ना करके प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त में किया जाना ही शास्त्रसम्मत है।


प्रदोषकाल निकालने के लिये आपके स्थानीय सूर्यास्त में आगे के 96 मिनट जोड़ दें तो यह एक घंटे 36 मिनट के लगभग का समय प्रदोष काल माना जाता है।


तृतीया तिथि प्रारम्भ  13 सितम्बर को प्रातः 07:07 बजे से।

तृतीया तिथि समाप्त 14 सितम्बर को प्रातः 07:06 तक।


प्रात:काल पूजा समय

सुबह 06 बजकर 05 मिनट से सुबह 07 बजकर 06 मिनट तक।


प्रदोष काल मुहूर्त  सायं 06:50 से 07:55 तक 


पारण अगले दिन 16 सितम्बर के सूर्योदय से पहले स्नान करने के बाद सूर्योदय के बाद करना उत्तम रहेगा।


*हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री* 


1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।


2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।


3- केले का पत्ता।


4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।


5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।


6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।


7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।


8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।


9- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।


*हरतालिका तीज व्रत कथा*


भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।


श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।


तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।


नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।


नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।


तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा। 


तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। 


उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।


तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।


इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।


तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।


तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।


तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।


गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया। 


हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।


*हर‍तालिका व्रत के विशेष सरल उपाय*


1 देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती का अभिषेक आम अथवा गन्ने के रस से किया जाए तो लक्ष्मी और सरस्वती ऐसे भक्त का घर छोड़कर कभी नहीं जातीं। वहां नित्य ही संपत्ति और विद्या का वास रहता है।


2  शिवपुराण के अनुसार लाल व सफेद आंकड़े के फूल से शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।


3 माता पार्वती को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा वह निरोगी होता है।


4 माता पार्वती को शक्कर का भोग लगाकर उसका दान करने से भक्त को दीर्घायु प्राप्त होती है। दूध चढ़ाकर दान करने से सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलती है। मालपूआ चढ़ाकर दान करने से सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती है।


5 हरतालिका व्रत के दिन शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को चमेली के फूल चढ़ाने से वाहन सुख मिलता है। अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।


6 भगवान शिव की शमी पत्रों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। बेला के फूल से पूजन करने पर शुभ लक्षणों से युक्त पत्नी मिलती है। धतूरे के पुष्प के पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।


7 भगवान शिव पर ईख (गन्ना) के रस की धारा चढ़ाई जाए तो सभी आनन्दों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।


8 देवी भागवत के अनुसार वेद पाठ के साथ यदि कर्पूर, अगरु (सुगंधित वनस्पति), केसर, कस्तूरी व कमल के जल से माता पार्वती का अभिषेक करने से सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाता है तथा साधक को थोड़े प्रयासों से ही सफलता मिलती है।


9 जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है। कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नवीन वस्त्रों की प्राप्ति होती है। हरसिंगार के पुष्पों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।


10 देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती को केले का भोग लगाकर दान करने से परिवार में सुख-शांति रहती है। शहद का भोग लगाकर दान करने से साधक को धन प्राप्ति के योग बनते हैं। गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाकर दान करने से दरिद्रता का नाश होता है।


11 भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।


12  द्राक्षा (दाख) के रस से यदि माता पार्वती का अभिषेक किया जाए तो भक्तों पर देवी की कृपा बनी रहती है।


13 शिवपुराण के अनुसार जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। भगवान शिव को गेंहू चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।


14  देवी भागवत के अनुसार माता पार्वती को नारियल का भोग लगाकर उसका दान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाकर गरीबों को दान करने से लोक-परलोक में आनंद व वैभव मिलता है।


15 माता पार्वती का अभिषेक दूध से किया जाए तो व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-समृद्धि का स्वामी बनता है।

Friday, September 11, 2026

वेदवती का रावण को श्राप

 वेदवती ने रावण को इसलिए श्राप दिया था क्योंकि रावण ने उनकी पवित्रता और तपस्या को भंग करने का दुर्व्यवहार किया था।


रामायण की कथा असुरों के राजा रावण के विनाश के इर्द गिर्द ही घूमती है. सब जानते हैं कि देवी सीता ही रावण की मृत्यु का कारण बनी थीं, लेकिन क्या आप यह जानते है कि यह सब पहले से ही सुनिश्चित था. जी हां, रावण का अंत श्री राम के हाथों होना पहले से ही तय था. हालांकि, इसकी वजह देवी सीता बनी जो देवी वेदवती का ही पुनर्जन्म था और वेदवती के श्राप के कारण ही रावण का विनाश हुआ था. चलिए आपको बताते हैं रावण का अंत कैसे बना वेदवती का श्राप.


कौन थी वेदवती?

दरअसल, वेदवती देवी लक्ष्मी का ही एक अवतार थी, जिन्हें सीता जी का भी एक रूप माना जाता है. रावण के साथ जो कुछ भी घटित हुआ वह सब उन्हीं के श्राप के कारण हुआ था. एक कथा के अनुसार, एक बार वेदवती नामक एक युवती वन में अपने ध्यान में लीन थी. वेदवती ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री थी. कुशध्वज को बृहस्पति का पुत्र कहा जाता है. कहते हैं अपने जन्म के कुछ समय बाद ही वेदवती को वेदों का ज्ञान हो गया था, इसलिए इनका नाम वेदवती रखा गया. वेदवती एक बहुत ही सुन्दर कन्या थी, जो भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी. जैसे-जैसे वह बड़ी हुई उसकी भक्ति के साथ भगवान के लिए उसका प्रेम भी बढ़ता गया. वेदवती विष्णु जी से विवाह करना चाहती थी, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए उसने कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया.


वेदवती अपने इरादों की पक्की थी वह निर्णय कर चुकी थी कि उसे विष्णु जी से ही विवाह करना है. किन्तु उसके परिवार वालों ने उसका साथ देने से साफ इंकार कर दिया, इसलिए विवश होकर वेदवती को अपना घर छोड़ना पड़ा और वह वन में चली गई. बाद में उसके परिवार ने उसे अपना लिया और वापस आश्रम ले आए. एक दिन जब वेदवती अपने ध्यान में लीन थी तब एक असुर उसके पास आया और उससे विवाह करने के लिए कहने लगा. जब वेदवती ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया, तब उस राक्षस ने उसके माता पिता का वध कर दिया, जिसके बाद वेदवती आश्रम में एकदम अकेली पड़ गई.


वेदवती की उपासना से विष्णु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और एक दिन वे उसके समक्ष प्रकट हुए. भगवान ने उससे इतनी कठोर तपस्या का कारण पूछा तब वेदवती ने उन्हें बताया कि वह उन्हें पति के रूप में प्राप्त करना चाहती है. हालांकि, विष्णु जी ने उसे बताया कि इस जन्म में यह मुमकिन नहीं है, लेकिन अगले जन्म में वह जरूर उनकी अर्धांगिनी बनेंगी. वेदवती ने विष्णु जी से विवाह करने के लिए समस्त संसार को त्याग दिया था, किन्तु उसकी इच्छा पूरी न होने पर भी भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा कम नहीं हुई और वह लगातार उनकी आराधना करती रही.


वेदवती ने रावण को श्राप क्यों दिया?

एक दिन जब वेदवती एकांत में अपनी तपस्या में मग्न थी, तभी उस समय का सबसे शक्तिशाली और खतरनाक असुर रावण वहां से गुजर रहा था. जब उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी तो वह उसकी सुंदरता को देख सम्मोहित हो गया. रावण ने वेदवती से विवाह की इच्छा जताई. जब उसने विवाह के लिए मना कर दिया, तब रावण वेदवती के केश पकड़ कर उसे घसीटता हुआ ले जाने लगा. इस बात से क्रोधित होकर वेदवती ने अपने केश काट दिए साथ ही उसकी पवित्रता को भंग करने की कोशिश करने पर उसने रावण को श्राप दिया कि एक दिन वह उसकी मृत्यु कारण बनेगी. इसके बाद स्वयं को रावण से बचाने के लिए वेदवती ने अग्नि में कूद कर खुद को भस्म कर लिया.


वेदवती का श्राप खाली नहीं जा सकता था, इसलिए उसने अपना अगला जन्म मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री देवी सीता के रूप में लिया. जैसा कि विष्णु जी ने वेदवती को वचन दिया था कि अगले जन्म में वे उसके पति बनेंगे इसलिए देवी सीता का विवाह विष्णु जी के सातवें अवतार श्री राम के साथ हुआ. जब रावण ने छल से सीता जी का अपहरण किया था, तब श्री राम ने उसका वध करके अपनी पत्नी को छुड़ाया था. इस प्रकार वेदवती के श्राप के अनुसार देवी सीता के रूप में वह खुद रावण के विनाश का कारण बनीं.

Saturday, September 5, 2026

जयंती" और "जन्माष्टमी" में अंतर एवं उपाय

 *“जयंती" और "जन्माष्टमी" में अंतर एवं उपाय*

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जयन्ती का अर्थ क्या होता है?

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जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः ।

स्कन्दमहापुराण,तिथ्यादितत्त्व,


जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयन्ती कहते हैं। कृष्णजन्माष्टमी से भारत का प्रत्येक प्राणी परिचित है। इसे कृष्णजन्मोत्सव भी कहते हैं। किन्तु जब यही अष्टमी अर्धरात्रि में पहले या बाद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो जाती है तब इसकी संज्ञा “कृष्णजयन्ती” हो जाती है।


रोहिणीसहिता कृष्णा मासे च श्रावणेSष्टमी ।

अर्द्धरात्रादधश्चोर्ध्वं कलयापि यदा भवेत् ।

जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी ।।


और इस जयन्ती व्रत का महत्त्व कृष्णजन्माष्टमी अर्थात् रोहिणीरहित कृष्णजन्माष्टमी से अधिक शास्त्रसिद्ध है। इससे यह सिद्ध हो गया कि जयन्ती जन्मोत्सव ही है।


अन्तर इतना है कि योगविशेष में जन्मोत्सव की संज्ञा जयन्ती हो जाती है । यदि रोहिणी का योग न हो तो जन्माष्टमी की संज्ञा जयन्ती नहीं हो सकती


चन्द्रोदयेSष्टमी पूर्वा न रोहिणी भवेद् यदि ।

तदा जन्माष्टमी सा च न जयन्तीति कथ्यते ॥–नारदीयसंहिता


कहीं भी किसी मृत व्यक्ति के मरणोपरान्त उसकी जयन्ती नहीं अपितु पुण्यतिथि मनायी जाती है।


भगवान् की लीला का संवरण होता है मृत्यु या जन्म सामान्य प्राणी का होता है। भगवान् और उनकी नित्य विभूतियाँ अवतरित होती हैं और उनको मनाने से प्रचुर पुण्य का समुदय होने के साथ ही पापमूलक विध्नों किम्वा नकारात्मक ऊर्जा का संक्षय होता है। इसलिए हनुमज्जयन्ती नाम शास्त्रप्रमाणानुमोदित ही है।


”जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः” –स्कन्दमहापुराण, तिथ्यादितत्त्व


जैसे कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता मात्र रोहिणी विरहित अष्टमी से बढ़ जाती है। और उसकी संज्ञा जयन्ती हो जाती है। ठीक वैसे ही कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से स्वाती नक्षत्र तथा चैत्र मास में पूर्णिमा से चित्रा नक्षत्र का योग होने से कल्पभेदेन हनुमान जन्मोत्सव की संज्ञा ” हनुमान जयन्ती” होने में क्या सन्देह है ??


एकादशरुद्रस्वरूप भगवान् शिव ही हनुमान् जी महाराज के रूप में भगवान् विष्णु की सहायता के लिए चैत्रमास की चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा को अवतीर्ण हुए हैं।


” यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः। 

अवतीर्ण: सहायार्थं विष्णोरमिततेजस: ॥"

–स्कन्दमहापुराण,माहेश्वर खण्डान्तर्गत, केदारखण्ड-८/१००


पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्रसंयुते ॥


चैत्र में हनुमान जयन्ती मनाने की विशेष परम्परा भारत में प्रचलित है और कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता है। 


जन्माष्टमी के उपाय

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तंत्र शास्त्र के अनुसार किसी भी सिद्धि या मनोकामना को पूरा करने के लिए चार रात्रियां सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इनमें पहली कालरात्रि है, जिसे नरक चतुर्दशी या दीपावली भी कहा जाता है। दूसरी अहोरात्रि या शिवरात्रि है। तीसरी दारुणरात्रि या होली है। चौथी मोहरात्रि या जन्माष्टमी है।


शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी माँ लक्ष्मी का अवतार थी अत: अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं तो माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। यदि आप जन्माष्टमी के दिन ये उपाय पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से करेंगे तो आपको अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी।


1👉🏻 यदि आपकी आमदनी में कोई वृद्धि नही हो रही हो और नौकरी में प्रमोशन भी नहीं हो रहा हो तो जन्माष्टमी के दिन सात कन्याओं को घर बुलाकर खीर खिलाएं। यह काम पांच शुक्रवार तक लगातार करें।


2👉🏻 आर्थिक संकट के निवारण और धन लाभ के लिए जन्माष्टमी के दिन प्रात: स्नान आदि करने के बाद किसी भी राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर प्रभु श्रीकृष्ण जी को पीले फूलों की माला अर्पण करें। इससे आर्थिक संकट दूर होने लगते है और धन लाभ के योग प्रबल बनते है ।


3👉🏻 जन्माष्टमी के दिन प्रात: दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें । इसके बाद यह उपाय हर शुक्रवार को करें । इस उपाय को करने वाले जातक से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इस उपाय को करने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।


4👉🏻 जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को सफेद मिठाई, साबुतदाने अथवा चावल की खीर यथाशक्ति मेवे डालकर बनाकर उसका भोग लगाएं उसमें चीनी की जगह मिश्री डाले , एवं तुलसी के पत्ते भी अवश्य डालें। इससे भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ऐश्वर्य प्राप्ति के योग बनते है।


5👉🏻 भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहलाते हैं, पीतांबर धारी का अर्थ है जो पीले रंग के वस्त्र पहनने धारण करता हो। इसलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किसी मंदिर में भगवान के पीले रंग के कपड़े, पीले फल, पीला अनाज व पीली मिठाई दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न रहते हैं, उस जातक को जीवन में धन और यश की कोई भी कमी नहीं रहती है ।


6👉🏻 जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण जी के मंदिर में जटा वाला नारियल और कम से कम 11 बादाम चढ़ाएं । ऐसी मान्यता है कि जो जातक जन्माष्टमी से शुरूआत करके कृष्ण मंदिर में लगातार सत्ताइस दिन तक जटा वाला नारियल और बादाम चढ़ाता है उसके सभी कार्य सिद्ध होते है, उसको जीवन में किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है।


7👉🏻 जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता अर्पित करें फिर उसके बाद उस पत्ते पर रोली से श्री मंत्र लिखकर उसे अपनी तिजोरी में रख लें। इस उपाय से लगातार धन का आगमन होता रहता है ।


8👉🏻 जन्माष्टमी की रात को 12 बजे भगवान श्री कृष्ण का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करने से जीवन में स्थाई रूप से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।


9👉🏻 अपने जीवन में सभी तरह की सुख समृद्धि प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन पीले चंदन, केसर, गुलाबजल मिलाकर माथे पर टीका-बिंदी लगाएं। यह काम हर गुरुवार को करें।


10👉🏻 अगर क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हो तो श्मशान के कुएं का जल लाकर पीपल के वृक्ष पर जन्माष्टमी से लेकर नियमित रूप से छह शनिवार तक चढ़ाएं।


11👉🏻 लक्ष्मी कृपा पाने के लिए जन्माष्टमी पर कहीं केले के दो पौधे लगा दें। बाद में उनकी नियमति देखभाल करते रहें। जब पौधे फल देने लगे तो इनका दान करें, स्वयं न खाएं।


12👉🏻 जन्माष्टमी के दिन कृष्ण मंदिर जाकर तुलसी की माला से नीचे लिखे मन्त्र की 11 माला जाप करें। इस उपाय से आपकी हर समस्या का समाधान हो सकता है। मंत्र- क्लीं कृष्णाय वासुदेवाय हरी: परमात्मने प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः


13👉🏻 जन्माष्टमी को शाम के समय तुलसी को गाय के घी का दीपक लगाएं और ॐ वासुदेवाय नमः मंत्र बोलते हुए तुलसी की 11 परिक्रमा करे।

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