Thursday, May 7, 2026

श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन

 *श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन*

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1-श्री गणेश की मूर्ति 1फुट से अधिक बड़ी (ऊंची) नहीं होना चाहिए।


2-एक व्यक्ति के द्वारा सहजता से उठाकर लाई जा सके ऐसी मूर्ति हो।


3-सिंहासन पर बैठी हुई, लोड पर टिकी हुई प्रतिमा सर्वोत्तम है।


4-सांप,गरुड,मछली आदि पर आरूढ अथवा युद्ध करती हुई या चित्रविचित्र आकार प्रकार की प्रतिमा बिलकुल ना रखें।

 

5-शिवपार्वती की गोद में बैठे हुए गणेश जी कदापि ना लें. क्येंकि शिवपार्वती की पूजा लिंगस्वरूप में ही किये जाने का विधान है. शास्त्रों में शिवपार्वती की मूर्ति बनाना और उसे विसर्जित करना निषिद्ध है।


6-श्रीगणेश की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर घरपर ना लाएं।


7-श्रीगणेश की जबतक विधिवत प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती तब तक देवत्व नहीं आता. अत: विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा करें।


8-परिवार मेंअथवा रिश्तेदारी में मृत्युशोक होने पर, सूतक में पडोसी या मित्रों द्वारा पूजा, नैवेद्य आदि कार्य करायें. विसर्जित करने की शीघ्रता ना करें।


9-श्रीगणेश की प्राणप्रतिष्ठा होने के बाद घर में वादविवाद, झगड़ा, मद्यपान, मांसाहार आदि ना करें।


10-श्रीगणेशजी को ताजी सब्जीरोटी का भी प्रसाद नैवेद्य के रूप में चलता है केवल उसमें खट्टा, तीखा, मिर्चमसाले आदि ना हों।


11-दही+शक्कर+भात यह सर्वोत्तम नैवेद्य है।


12-विसर्जन के जलूस में झांज- मंजीरा,भजन आदि गाकर प्रभु को शांति पूर्वक विदा करें. डी. जे. पर जोर जोर से अश्लील नाच, गाने, होहल्ला करके विकृत हावभाव के साथ श्रीगणेश की बिदाई ना करें. 

ध्यान रहे कि इस प्रकार के अश्लील गाने अन्यधर्मावलंबियों केउत्सवों पर नहीं बजाते. 

13-यदि ऊपर वर्णित बातों पर अमल करना संभव ना हो तो श्रीगणेश की स्थापना कर उस मूर्ति का अपमान ना करें। अंत में-जो लोग 10दिनों तक गणेशाय की झांकी के सामने रहते हैं, अगर वो नहीं सुधर सकते, तो हम आप भीड़ में धक्के खाकर 2,4 सेकिंड का दर्शन कर सुघर जायेंगे??? 


कितने अंधेरे में हैं हम लोग.!!

इस अंधेरे में क्षणिक प्रकाश ढूंढने की अपेक्षा, घर में रखी हुई गणेशमूर्ति के सामने 1घंटे तक शांत बैठे. अपना आत्मनिरीक्षण करें, अच्छा व्यवहार करें.. घरपर ही गणेश आपपर कृपा बरसायेंगे.

श्रीगणेशजी एक ही हैं.... 

उनकी अलग अलग कंपनियां नहीं होती... अपनी सोच अलग हो सकती है. 

एकाग्रचित्त हों, शांति प्राप्त करें।


शुभम

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Monday, May 4, 2026

सन्ध्या-विहीन ब्राह्मण

 सन्ध्या-विहीन ब्राह्मण: घोर दोषों का प्रहार, ब्राह्मणत्व का पतन एवं सनातन धर्म से विच्छेद का भीषण परिणाम।


त्रिकाल सन्ध्या के लोप से ब्राह्मण पर आरोपित ५१ दोष—


१. ब्रह्मतेज-क्षय दोष — सन्ध्या-अनुष्ठान के अभाव से आध्यात्मिक तेज क्षीण हो जाता है।

२. गायत्री-अनादर दोष — गायत्री-जप के त्याग से दैवी कृपा दूर हो जाती है।

३. अशुचिता दोष — नित्य शुद्धि के अभाव से अशुद्धि बनी रहती है।

४. कर्म-अफलता दोष — अन्य वैदिक कर्म पूर्ण फल प्रदान नहीं करते।

५. देवऋण-वृद्धि दोष — सूर्य आदि देवताओं का ऋण बढ़ता है।

६. चित्त-अशान्ति दोष — मन में अस्थिरता एवं अशान्ति बढ़ती है।

७. द्विजत्व-पतन दोष — आचरण से ब्राह्मणत्व का ह्रास होता है।

८. मन्त्र-शक्ति-क्षय दोष — जप का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

९. ऋषि-ऋण-उपेक्षा दोष — ऋषियों के प्रति कर्तव्य का उल्लंघन होता है।

१०. काल-अनादर दोष — पवित्र सन्धि-काल व्यर्थ व्यतीत हो जाते हैं।

११. प्राणाग्नि-मन्दता दोष — प्राणशक्ति का प्रवाह मन्द हो जाता है।

१२. वाक्-अशुद्धि दोष — वाणी में असत्य एवं कटुता आ जाती है।

१३. सूक्ष्म पाप-संचय दोष — लघु-लघु पाप संचित होते जाते हैं।

१४. दैविक अनुकूलता-ह्रास दोष — दैवी सहयोग कम हो जाता है।

१५. निद्रा-अशान्ति दोष — स्वप्न अशान्त एवं भययुक्त हो जाते हैं।

१६. चक्र-असन्तुलन दोष — सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र असन्तुलित हो जाते हैं।

१७. आयुष्य-गुणवत्ता-ह्रास दोष — जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

१८. संकल्प-दुर्बलता दोष — इच्छाशक्ति दुर्बल हो जाती है।

१९. सत्त्व-क्षय दोष — सत्त्वगुण घटता है, रजस एवं तमस बढ़ते हैं।

२०. आत्मिक-प्रगति-अवरोध दोष — आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है।

२१. ध्यान-अयोग्यता दोष — मन ध्यान में स्थिर नहीं रह पाता।

२२. इन्द्रियनिग्रह-दुर्बलता दोष — इन्द्रियों पर नियन्त्रण कम हो जाता है।

२३. विवेक-क्षय दोष — सद्-असद् का विवेक दुर्बल हो जाता है।

२४. श्रद्धा-क्षीणता दोष — धर्म में आस्था क्षीण होने लगती है।

२५. आचार-विचलन दोष — वैदिक अनुशासन से विचलन बढ़ता है।

२६. स्मरण-शक्ति-ह्रास दोष — स्मरण एवं अध्ययन क्षमता घटती है।

२७. आत्मविश्वास-ह्रास दोष — आन्तरिक निर्बलता का अनुभव होता है।

२८. अन्तःकरण-मलिनता दोष — हृदय की शुद्धता का अभाव हो जाता है।

२९. दैहिक-जड़ता दोष — शरीर में आलस्य एवं भारीपन बढ़ता है।

३०. प्रेरणा-अभाव दोष — सत्कर्मों के प्रति उत्साह कम हो जाता है।

३१. धर्म-विमुखता दोष — धीरे-धीरे धर्म से दूरी बढ़ती है।

३२. सत्संग-विरक्ति दोष — सत्संग में रुचि कम हो जाती है।

३३. अहंकार-वृद्धि दोष — विनम्रता घटकर अहंकार बढ़ता है।

३४. क्रोध-प्रवृत्ति दोष — क्रोध एवं चिड़चिड़ापन बढ़ता है।

३५. लोभ-वृद्धि दोष — भौतिक इच्छाएँ प्रबल हो जाती हैं।

३६. मोह-बन्धन दोष — आसक्ति एवं मोह बढ़ते हैं।

३७. दृष्टि-अशुद्धि दोष — दृष्टिकोण नकारात्मक हो जाता है।

३८. श्रवण-दोष — शुभ वचनों के श्रवण में अरुचि होने लगती है।

३९. सत्कर्म-विघ्न दोष — सत्कर्मों में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।

४०. अशुभ-संयोग दोष — प्रतिकूल परिस्थितियाँ बार-बार बनती हैं।

४१. आत्मिक-दुर्बलता दोष — आध्यात्मिक बल क्षीण हो जाता है।

४२. दैवी-कवच-क्षीणता दोष — सूक्ष्म सुरक्षा (आभामण्डल) दुर्बल हो जाता है।

४३. प्राण-विक्षेप दोष — प्राण ऊर्जा अस्थिर हो जाती है।

४४. कर्म-बन्धन-वृद्धि दोष — कर्मों का बन्धन बढ़ता जाता है।

४५. संकट-आकर्षण दोष — जीवन में संकट अधिक आकर्षित होते हैं।

४६. गुरु-कृपा-अवरोध दोष — गुरु-कृपा सहज प्राप्त नहीं होती।

४७. संस्कार-क्षय दोष — शुभ संस्कार नष्ट होने लगते हैं।

४८. धैर्य-क्षीणता दोष — धैर्य एवं सहनशक्ति कम हो जाती है।

४९. शुभ-संकल्प-बाधा दोष — शुभ संकल्प स्थिर नहीं रह पाते।

५०. आध्यात्मिक-विस्मृति दोष — आत्मस्वरूप का स्मरण घटता है।

५१. परम-लक्ष्य-विस्मरण दोष — जीवन के परम उद्देश्य से भटकाव हो जाता है।

Thursday, April 30, 2026

पीपल पूर्णिमा व्रत विशेष

 पीपल पूर्णिमा व्रत  विशेष

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वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन मृत्यु के देवता धर्मराज के निमित्त प्रातः स्नान के उपरांत व्रत का संकल्प रख भक्ति भाव से व्रत रखने का विधान है। इस वर्ष पीपल पूर्णिमा का व्रत आज शुक्रवार 1 मई को रखा जाएगा इस दिन जल से भरा हुआ कलश, छाता, जूते, पंखा, सत्तू, पकवान आदि दान करना चाहिए। इस दिन किया गया दान गोदान के समान फल देने वाला होता है और ऐसा करने से धर्मराज प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। मनुष्य को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। ऐसा शास्त्र मानते हैं।    


हिदु धर्म में पीपल का महत्त्व

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पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:-

मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,

सखा शंकरमेवच ।

पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,

वृक्षराज नमोस्तुते ।।


हिदु धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है।


पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ।


पुराणो में उल्लेखित है कि

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मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः।

 अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।। 

अर्थात इसके मूल में भगवान ब्रह्म, मध्य में भगवान श्री विष्णु तथा अग्रभाग में भगवान शिव का वास होता है।


शास्त्रों के अनुसार पीपल की विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। कहते है पीपल से बड़ा मित्र कोई भी नहीं है, जब आपके सभी रास्ते बंद हो जाएँ, आप चारो ओर से अपने को परेशानियों से घिरा हुआ समझे, आपकी परछांई भी आपका साथ ना दे, हर काम बिगड़ रहे हो तो आप पीपल के शरण में चले जाएँ, उनकी पूजा अर्चना करे , उनसे मदद की याचना करें  निसंदेह कुछ ही समय में आपके घोर से घोर कष्ट दूर जो जायेंगे।


धर्म शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन में पीपल का पेड़ अवश्य ही लगाना चाहिए । पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार संकट नहीं रहता है। पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे रविवार को छोड़कर नियमित रूप से जल भी अवश्य ही अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ेगा आपके घर में सुख-समृद्धि भी बढ़ती जाएगी।  पीपल का पेड़ लगाने के बाद बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान भी अवश्य ही रखना चाहिए, लेकिन ध्यान रहे कि पीपल को आप अपने घर से दूर लगाएं, घर पर पीपल की छाया भी नहीं पड़नी चाहिए।


मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है तो उसके जीवन से बड़ी से बड़ी परेशानियां भी दूर हो जाती है। पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नित्य पूजा भी अवश्य ही करनी चाहिए। इस उपाय से जातक को सभी भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है।


सावन मास की अमवस्या की समाप्ति और सावन के सभी शनिवार को पीपल की विधि पूर्वक पूजा करके इसके नीचे भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना / आराधना करने से घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है।


यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर रविवार को छोड़कर नित्य हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।


पीपल के नीचे बैठकर पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर चन्दन से भगवान श्रीराम का नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बनाकर उसे प्रभु हनुमानजी को अर्पित करें, सारे संकटो से रक्षा होगी।


पीपल के चमत्कारी उपाय

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शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः 10 बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे । इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है ।


पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा। 


व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे । ऐसा 7 शनिवार तक लगातार करें फिर 8वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी ।


जो मनुष्य पीपल के वृक्ष को देखकर प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है 

जो इसके नीचे बैठकर धर्म-कर्म करता है, उसका कार्य पूर्ण हो जाता है।


पीपल के वृक्ष को काटना 

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जो मूर्ख मनुष्य पीपल के वृक्ष को काटता है, उसे इससे होने वाले पाप से छूटने का कोई उपाय नहीं है। (पद्म पुराण, खंड 7 अ 12)


हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है

यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।


शनि दोष में पीपल 

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शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर कर,शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। 


यदि रोज (रविवार को छोड़कर) पीपल पर पश्चिममुखी होकर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है l


शनिवार की सुबह गुड़, मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है।


ब्रह्म पुराण' के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा  उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।'


शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है।


हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।


 ग्रहों के दोषों में पीपल 

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ज्योतिष शास्त्र में पीपल से जुड़े हुए कई आसान किन्तु अचूक उपाय बताए गए हैं, जो हमारे समस्त ग्रहों के दोषों को दूर करते हैं। जो किसी भी राशि के लोग आसानी से कर सकते हैं। इन उपायों को करने के लिए हमको अपनी किसी ज्योतिष से कुंडली का अध्ययन करवाने की भी आवश्यकता नहीं है।


पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है


पीपल में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल अर्पित करने से कुंडली के समस्त अशुभ ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। पीपल की परिक्रमा से कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से भी छुटकारा मिल जाता है। (पद्म पुराण)


असाध्य रोगो में पीपल

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पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है ।

 

यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है

 वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है । 


यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है ।


निसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है । ऐसा लगभग 2-3 माह तक लगातार करना चाहिए ।

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Tuesday, April 28, 2026

 भारतीय इतिहास का महाविनाश कोई बदल नहीं सकता। कई महाशय कहते हैं इतिहास में जो गुजर गया उसे देख कर क्या होगा? वर्तमान में जो हो रहा हैं उसे देखिये।


यह लेख उनकी बातों का उत्तर है। 


“मैक्स-मुलर ने भारत आते ही सर्वप्रथम हिन्दुओ के पराक्रम एवं भुजाओं की शक्ति के बारे में जानना चाहा, जब उसने इतिहास जाना तो उसका सर घूम गया। इतिहास सुनकर उसने कहा यदि यह इतिहास नहीं मिटाया गया तो ये हमें दुनिया से मिटा देंगे क्योंकि पूर्वजो के इतिहास से इन्हें उर्जा मिलती है। इनके इतिहास में इनकी शक्ति छुपी है। उसके बाद इस गोरे सियार को युक्ति सूझी और इसने हिन्दू राजाओ को निर्बल ठहराया।


आक्रमणकारीयों ने लगभग आधा यूरोप जिहाद कर के अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु भारतवर्ष से सनातन धर्म को नही मिटा पाये। इस्लामिक इतिहासकार ने भी माना था हिन्दू योद्धाओ के बाहुबल का लोहा। यह तो मैक्स मुलर की हिंदुओं के प्रति नफरत थी जिसने इतिहास को बदल दिया और मुग़ल, यवन, यूनान को ताकतवर बताया एवं हिन्दू राजाओ को निर्बल, गद्दार, इत्यादि।


बहुत ही शर्म की बात है मैंने कई पेज एवं वामपंथी ब्लॉगर को देखा हैं जो खुदको इतिहासकार कहते हैं परन्तु अपने हिन्दू राजा को जो उनके बिरादरी का नहीं हैं उन्हें बदनाम करने लगते हैं और वो भी बिना ऐतिहासिक जांच किये।


ऐसे तथाकथिक हिंदूवादी हिन्दुओ को तोड़ने का काम करते हैं। इनका मकसद होता हैं इतिहास केवल इनके नाम हो और इसी प्रयास में यह हिन्दू को कमजोर बना देते हैं , जिससे मैक्स मुलर जैसे राक्षस का कार्य और सफल हो जाता हैं । और मैं इतिहास को इसी प्रयास में सामने लेकर आता हूँ जिससे युवा पीढ़ी अपने शौर्य को पहचाने, पूर्वजो के इतिहास से सिख तक लेकर खुदको भी राष्ट्र धर्म भक्त बनाये और धर्म की रक्षा में हर तरह का बलिदान देने में हर दम सक्षम रहे ।


जगतगुरु आदि शंकराचार्य और शिष्य सुधन्वा ऐसे नाम हैं जिनके बिना भारतीय इतिहास का वर्णन अधूरा है। आइये जानते हैं चौहान वंश के दिग्विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान (चाहमान) जिनके बारे में कई अभिलेख मिले हैं ।


दिग्विजय सम्राट सुधन्वा सन ५००-४७० ई. पूर्व दक्षिणी अवन्ति के शासक थे। माहिष्मती नगरी उनकी राजधानी थी जो वर्तमान काल में मध्यप्रदेश के निमाड़ जनपद में महेश्वर नामक स्थान के रूप में ज्ञात हैं । सुधन्वा चौहान को विश्व सम्राट बनाने के पीछे गुरु आदि शंकराचार्य की अशेष कृपा थी।


गुरु आदि शंकराचार्य की शिक्षा एवं सुधन्वा चौहान का पराक्रम एवं शौर्य (शास्त्र और शस्त्र) दोनो के गठबंधन ने सनातन धर्म ध्वजा को विश्व की चारो दिशाओ में लहराकर भारत विश्व विजय का स्वर्णिम इतिहास रचा था।


अभी तक हमे केवल गुरु चाणक्य और चन्द्रगुप्त की कहानी ज्ञात थी पर आदि शंकराचार्य एवं सुधन्वा चौहान के इतिहास से हम अनजान थे। मठाम्नाय – महानुशासनम : यह ग्रन्थ आदिशंकराचार्य द्वारा प्रणीत है तथा श्रृंगगिरी (श्रृङ्गेरी) मठ के लिए प्रमाणभूत है। इसमें भी राजा सुधन्वा चौहान का उल्लेख आदि शंकराचार्य जी ने किया है।


राजा सुधन्वा चौहान ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम यूरोप तक चारों दिशाओं को जीता था। युद्ध कला में पारंगत तलवार से वार की गति बिजली से भी तेज थी । आदि शंकराचार्य से ज्ञान प्राप्त कर रणविद्या में पारंगत हुए थे सुधन्वा सम्राट, साथ ही वेदों से 18 युद्ध कलाओं के विषयों पर ज्ञान अर्जित किया था।


उनको २० प्रकार की घुड़सवारी युद्धकला आती थी। हाथी, अस्त्र-शस्त्र संचालन, व्यूह रचना, युद्ध नेतृत्व, आदि तकनीक के ज्ञाता थे। युद्ध के कई तरीकों में पारंगत थे जैसे मल्ल युद्ध, द्वन्द्व युद्ध, मुष्टिक युद्ध, प्रस्तरयुद्ध, रथयुद्ध, रात्रि युद्ध।


सम्राट सुधन्वा व्यूह रचना में भी पारंगत थे जिससे सेना को व्यवस्थित ढंग से खडा किया जाता था। इसका उद्देश्य अपनी कम से कम हानि में शत्रु को अधिक से अधिक नुकसान पंहुचाना होता था। इनमें से कई तकनीक सुधन्वा महाराज अपने शासनकालीन जीवनकाल में इस्तेमाल में लाये जैसे बाज़, सर्प, बज्र, चक्र, काँच, सर्वतोभद्र, मकर, ब्याल, गरूड व्यूह आदि का इस्तेमाल उन्होंने युद्ध में किया था।


कई मूर्ख अज्ञानी आदि शंकराचार्य को अनर्गल गाली देते है। अगर जगतगुरु आदि शंकराचार्य नहीं होते तो भारत को सुधन्वा चौहान जैसा विश्व विजय करनेवाला भी नहीं मिलता।


सम्राट सुधन्वा चौहान ने विश्व विजय करने के लिए अनंत युद्ध लड़े थे। इनका शौर्य और पराक्रम केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं मिलता जबकि विश्व इतिहास में भी शामिल है। दुःख का विषय है कि भारत में ऐसे सम्राट के इतिहास पर पाबंदी है क्योंकि भारत सरकार के अनुसार यह केवल बुद्ध की धरती है, यहाँ युद्ध का कोई स्थान नहीं।


राजा सुधन्वा चौहान से विश्व विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान -:


सम्राट सुधन्वा चौहान ने सन ४९८ (498) ई.पूर्व ग्रीस के शासक थाईमोएतेस (Thymoetes) से युद्ध किया था। इस युद्ध का वर्णन “Battle of Thunder” के नाम से किया जाता है। कहा जाता हैं इस युद्ध में ग्रीस एथेंस की भूमि में दोनों सेनाओं ने इस तरह युद्ध लड़े थे जैसे बिजली आसमान से गिरकर भूमि से टकराती है।


सुधन्वा चौहान की सेना ने थाईमोएतेस (Thymoetes) को पराजित कर एथेंस ग्रीस पर कब्ज़ा किया एवं थाईमोएतेस (Thymoetes) के अधीन जितने भी राज्य आते थे जैसे बुल्गरिया, मैसिडोनिया, एवं ग्रीस जो उस समय दक्षिण यूरोप की राजधानी हुआ करता था उन सबको जीत लिया था।


दक्षिण यूरोप विजय करने के लिए एथेंस पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था। एथेंस par विजय कर सुधन्वा चौहान ने सनातन वैदिक ध्वज लहरा कर विश्व विजय के लिए मुहिम छेड़ी थी।


सुधन्वा ने धर्म युद्ध के नियमो का पालन कर किसी भी देश की संस्कृति को ध्वस्त नहीं किया। एक हिन्दू राजा की दुश्मनी देश के राजा से होती थी तो प्रजा को हानि नहीं पहुंचाते थे, देश विजय करने के पश्चात वहाँ की नारियों का शील भंग नहीं करते थे। जिस देश को विजय करते थे उस देश की प्रजा के साथ भी संतान तुल्य व्यावहार करते थे।


वहीं दूसरी ओर इतिहास गवाह है कि जो भी आक्रमणकारी भारत लूटने आये उन्होंने प्रजा का मान भंग किया, नरसंघार किया, मंदिर तोड़े एवं संस्कृति को ध्वस्त किया।


सुधन्वा चौहान की सेना से विश्व के सभी शक्तिशाली साम्राज्य भी थर्राते थे। अश्शूर राज नाबोनिदास की ५ लाख की विशाल सेना को परास्त कर सुधन्वा चौहान ने अश्शुरों को यूफ्रेटस नदी के पार तक खदेड़ा। सुधन्वा चौहान ने अब मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, एलाम, फ्रूगिया, पर्शिया एवं यूफ्रेटस नदी एवं मिस्र (Egypt) टाईग्रीस नदी के पार सनातन वैदिक ध्वज को लहराकर इस अश्शूर राज्य को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।


इसके पश्चात अश्शूर साम्राज्य का अंत तो नहीं हुआ परन्तु ३ पीढ़ी के बाद अश्शूर साम्राज्य फिर तैयार हुआ। सुधन्वा चौहान के बाद राजा चाहमान ने अश्शुरों पर विजय पाकर अश्शुरो का समूल नाश कर दिया था।


इस बात का उल्लेख “The History of Archaeology Part 1”, “Babylonia from the Neo-Babylonian empire to Achaemenid rule” इन दो पुस्तकों में लिखा हैं।


इतिहासकार Hurst, K. Kris लिखते हैं “The sword of South Asian King dynasty of Luna defeated Assyrian ruler Nabonidas and the King of South Asia became the reasons for the decline and downfall of Assyrian Kingdom” (चन्द्र का अन्य नाम लूना है। चन्द्रवंशी राजा का उल्लेख किया गया है। दक्षिण एशियाई राज्य का उल्लेख है जो भारतवर्ष है)।


सुधन्वा चौहान ने फ्रांस, रूस, सर्बिया, क्रोएशिया, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी, प्रशिय एवं समूचे यूरोप पर भगवा ध्वज लहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य यूरोप तक फैलाया था।


विश्व विजयी सम्राट सुधन्वा चौहान ने अफ्रीका, यूरोप, एशिया (चीन, जापान, इत्यादि) समेत समूल धरा पर सनातन धर्म ध्वजा फहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य विस्तार किया था। आदि शंकराचार्य के निर्देषानुसार अश्शुरो, यवनों एवं यूनानीयों के अत्याचारों से भारत एवं पृथ्वीवासियों को मुक्ति दिलाकर सुधन्वा चौहान एक पराक्रमी शौर्यशाली योद्धा बने थे।


सम्राट सुधन्वा ने यूरोप पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया। प्रजाओं की रक्षा एवं सेवा सम्राट सुधन्वा का पहला कर्तव्य था। विश्व विजयी सम्राट होने के बाद भी प्रजाओ पर किसी तरह का कर लगान आदि नहीं लगाया। प्रजा अपनी इच्छानुसार कर देते थे वे राज्य कोष में मूल्य देते थे।


सम्राट सुधन्वा चौहान मूल्य देकर किसान से खाद्य सामग्री लिया करते थे।


सम्राट होते हुए भी अपने पद का दुरूपयोग नहीं किया। राजा होने के नाते वह चाहते तो किसान को बिना मूल्य चुकाए खाद्य सामाग्री ले सकते थे परन्तु ऐसा न करके वे किसान को पारिश्रमिक देकर खाद्य सामग्री लेते थे। यह एक महान सम्राट के गुण हैं यह सीख आदि शंकराचार्य की थी तभी राजा सुधन्वा इतने महान हुए ।


 श्रृंगगिरी (श्रृङ्गेरी) मठ के ग्रन्थों में भी प्रमाणभूत है। इनमें भी राजा सुधन्वा चौहान का उल्लेख आदिशंकराचार्य जी ने किया है )।


आजकल के मैकोले मानसपुत्रों को ऐसा इतिहास इसलिए नहीं पढाया जाता हैं क्योंकि काले अंग्रेजो के प्रोडक्शन हाउस बंद हो जाएँगे एवं भारतीय फिर से छत्रपति महाराज शिवाजी और महाराणा प्रताप बनने लगेंगे। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) ऐसे इतिहास पर रोक लगाये हुए है और चौहान वंशीय एवं अन्य कई राजाओ की लिपि तक को गायब करवा दिया हैं। इसी कारण आज भी तैमूर, बाबर, टीपू, रज़िया सुल्तान जैसे हिन्दू विरोधी, मूर्ति-ध्वंसक तो जन्म ले रहे हैं परन्तु एक भी चौहान राजा, काल्भोज (बप्पा रावल), भोज परमार, छत्रपति शिवाजी, नागनिका, नायिकी देवी, रानी दिद्दा जैसे नायक नायिकाएँ हिन्दू धर्म मैं जन्म नहीं ले पा रहे हैं।


#चक्रवर्ती_सम्राट_सुधन्वा_का_ताम्रलेख_~


श्री महाकालनाथाय नमः 

श्री महाकाली नमः


"""श्री सदाशिव अपरावतार शंकर की चौसंठ कला विलास विहार मूर्ति , बौद्घ आदि दानवों के लिए नृसिंह मूर्ति , वैदिक वर्णाश्रम शिद्धान्त के उद्धारक मूर्ति, मेरे साम्राज्य की व्यवस्थापक मूर्ति, विश्वेश्वर गुरु के पदपर गायी जाने वाली मूर्ति, सम्पूर्ण योगियों के चक्रवर्ती,


●श्री शंकराचार्य के चरण कमलों में (प्रणाम करके) भ्रमर के समान मैं सुधन्वा राजा चंद्रवंश चूड़ामणि महाराज युधिष्ठिर की परम्परा से प्राप्त भारतवर्ष का राजा हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन करता हूँ।


●भगवत्पाद ने दिग्विजय करके सभी वादियों को पराजित किया।


●सत्ययुग के समान चारो वर्ण--आश्रमों को स्थापित करके पूर्णरूप से वैदिक मार्ग पर शास्त्रानुसार (वैदिक धर्म) में नियुक्त किया।


●ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा शक्ति आदि देवताओं के स्थानों को, जो कि सम्पूर्ण देश में स्थित है, उनका उद्धार किया।

◆समस्त ब्राह्मण कुलों का उद्धार किया।


●सम्पूर्ण देश में हमारे जैसे राजकुलों द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रचार प्रसार करके, अध्ययन-अध्यापन द्वारा उन्नत किया।


◆हम जैसे प्रमुख ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि की प्रार्थना से सम्पूर्ण देश के चारों दिशाओं में चार राजधानियों, पूर्व में जगन्नाथ, उत्तर में बदरी नारायण, पश्चिम में द्वारका तथा दक्षिण में श्रृंगी ऋषि के क्षेत्र में श्रृंगेरी के क्रमानुसार भोगवर्धन, ज्योति, शारदा तथा श्रृंगेरी नामक मठ स्थापित किये।

■उत्तर दिशा में योगीजनों की प्रधानता वाले धर्म की मर्यादा की रक्षा सरलता से करने वाले ज्योतिर्मठ में श्री त्रोटकाचार्य जिनका दूसरा नाम प्रतर्दनाचार्य को,

■श्रृंगी ऋषि के आश्रम श्रृंगेरी मठ में उन्ही के समान प्रभाव वाले पृथ्वीधाराचार्य जिनका दूसरा नाम हस्तामलकाचार्य है को,

■भोगवर्धन जगन्नाथपुरी में अत्यंत अभीष्ट, उग्र स्वभाव वाले, सबकुछ जानने में समर्थ, पद्मपादाचार्य जिनका दूसरा नाम सनन्दनाचार्य है को,

■तथा बौद्ध कापालिक आदि सम्पूर्ण वादियों की प्रधानता वाली पश्चिमी दिशा में वादी रूपी दैत्यों को परास्त करके द्वारका शारदा मठ में भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा निर्मित भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर को जैनियों द्वारा ध्वस्त देखकर उसकी दुर्दशा को दूर किया तथा त्रैलोक्य सुंदर नाम का भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर निर्माण करके शास्त्र मर्यादा से प्रतिष्ठित किया।

★सम्पूर्ण वैदिक, लौकिक तथा तांत्रिक मर्यादा के पालक विश्वविख्यात कीर्तिमान, सर्वज्ञान स्वरूप विश्वरूपाचार्य जिनका अपर नाम सुरेश्वचार्य है को, हम सब लोगों की लोकसम्पत्ति से अभिषिक्त किया।

★भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चारों आचार्यों को नियुक्त करके आज्ञा दी, यह चारों आचार्य अपने-अपने पीठ के मर्यादा अनुसार मण्डल की रक्षा करते हुए वैदिक मार्ग को प्रकाशित करें।

◆हम सभी मण्डलस्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मंडलों के अधिकारी आचार्यों की आज्ञा का पालन करते हुए व्यवहार करें।

★भगवान शंकराचार्य जी की आज्ञानुसार वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदिकों का महत् निर्णय करने में परम् समर्थ श्री सुरेश्वचार्य जो कि उक्त लक्षणों से युक्त हैं, वे सबके व्यवस्थापक हों।


■: हमारी राजसत्ता के समान निरंकुश गुरुसत्ता भी ऊपर कही हुई शास्त्र मर्यादा के अनुसार अविचल रूप से कार्य करें।


★मेरे इस पीठ पर परम्पराप्राप्त जन्म से महाकुलीन ब्राह्मण, सन्यासी, सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता आचार्य के विशेषताओं से युक्त ही भगवत्पाद शंकराचार्य के पीठ पर बैठने के अधिकारी हों, इसके विपरीत नही।


◆इसप्रकार भगवत्पाद की आज्ञानुसार नियमों में बंधे हुए हम ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वंश में उतपन्न हुए लोगों को इन आदेशों का परम् प्रेमपूर्वक पालन करना चाहिए।

यही आपलोगों से मेरी भी प्रार्थना है।

विश्व का कल्याण हो।


∆●युधिष्ठिर सम्वत् २६६३ अश्विन शुक्ल १५ """


सभी धर्मपरायण कुलीन आर्यजनों (ब्राह्म, क्षात्र, वैश्य, शूद्र) को शिवावतार भगवत्पाद जगद्गुरु श्री आद्यशङ्कराचार्यजी के प्रकटोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ.......🙏


हर हर शाङ्कर  🚩🚩🚩🚩🚩🚩


#shankarjayanti

Friday, April 24, 2026

જય અંબે

 આ લેખ ડો ભુવન રાવલ દ્વારા લખાયેલો છે. જે નાગર બ્રાહ્મણ છે, મહેસાણા ખાતે એન્જીન્યરીંગ કોલેજમાં પ્રિન્સીપાલ તરીકે ફરજ બજાવે છે અને પીએચ ડી સહિત લગભગ ૬ કરતાં વધારે પ્રોફેશનલ ડિગ્રી ધરાવે છે. 




🙏  જય અંબે🙏


     

         લગભગ 481 વરસ પહેલાની આ વાત છે. સુરતના અંબાજી રોડ પર નાગર ફળિયામાં રાઘવ હરિહર પંડ્યાનું ઘર આવેલું. ‘રામનાથી પંડ્યા’ તરીકે ઓળખાતા આ પરિવારમાં રાઘવને બે પુત્રો હતા. એક વામદેવ અને બીજો સદાશીવ. સમગ્ર પરિવારની શ્રદ્ધા રામનાથ મહાદેવ સાથે જોડાયેલી.


         સદાશીવને 35 વરસની ઉંમર સુધી ખાસ કંઈ આવડતું નહી. કુટુંબમાં કોઈએ સદાશીવને મેણું માર્યુ. સદાશીવને સ્વજનનું મેણું કાળજાળ લાગ્યું. પરિવારના ઇષ્ટદેવના મંદિરે જઈ તેઓ ઉપવાસ પર બેસી ગયા. કેટલાય દિવસોના નામસ્મરણ અને ઉપવાસ બાદ કોઈ સાધુ ત્યાં આવ્યા. જેણે સદાશીવને આશીર્વાદ આપી શક્તિપાત કર્યો. લોકવાયકા મુજબ એ સાધુ બીજા કોઈ નહી પરંતુ સ્વયં દુર્વાસા ઋષિ હતા.


        ઋષિ દુર્વાસાના આશીર્વાદથી સદાશીવ સંસ્કૃતના પ્રખર વિદ્વાન બન્યા. તેઓ શાસ્ત્રજ્ઞ અને મંત્રશાસ્ત્રી થયા. સદાશીવના દાદાએ સંસ્કૃતના નવ ગ્રંથો લખેલા. વિદ્વતાનો એ વારસો સદાશીવે જાળવી રાખ્યો. પરંતુ તેના બંને સંતાનોને સંસ્કૃત અને સાહિત્યમાં બહુ રૂચિ નહોતી. મોટાભાઈ વામદેવના ઘરે ઇ.સ. 1541માં શિવાનંદ નામના અતિ તેજસ્વી પુત્રનો જન્મ થયો. પિતા વામદેવ નાની ઉંમરે મૃત્યુ પામ્યા અને બાળક શિવાનંદના ઉછેરની જવાબદારી સદાશીવજીને સોંપતા ગયા.


       સમય જતા આ કાકા ભત્રીજાની જોડી જામી ગઈ. સદાશીવજીએ પોતાના અંત સમયે પોતાનું સર્વસ્વ ભત્રીજા શિવાનંદમાં ઠાલવી દીધું. દોસ્તો, આ શિવાનંદ એ જ આપણા ‘જય આદ્યાશક્તિ’ આરતીના રચિયતા, *બૈજવાપાસ ગોત્રમાં* નાગર-બ્રાહ્મણ પરિવારમાં 481 વરસ પહેલાં સુરત ખાતે અવતરેલા આ મહાપુરુષની રચેલી આરતી ગાયા વગર ગુજરાતની કોઈ ગરબીના શ્રી ગણેશ થતાં નથી કે વિરામ પણ...!


          આ મહાપુરુષ વિશે બહુ ક્યાંય માહિતી પ્રાપ્ત પણ નથી. હું જ્યારે જ્યારે ‘ભણે શિવાનંદ સ્વામી’વાળી કડી ગાતો ત્યારે મનમાં એક પ્રશ્ન થતો કે કોણ હશે આ શિવાનંદ સ્વામી? ક્યાંના હશે? આ આરતી રચવા પાછળ કઈ ઘટના હશે? આરતીના સાચા શબ્દો ક્યા હશે? સાચા દિલથી કરેલી પ્રાર્થના સદા ફળે છે. તેનો આ લેખ પૂરાવો છે. ગત મહિને સુરતના એક કાર્યક્રમમાં નીતિનભાઈ ભજીયાવાલા નામના વડિલ ચાહકે મારા હાથમાં ગણપતલાલ પંચીગર સાહેબનું નાનકડું અપ્રાપ્ય પુસ્તક મૂક્યુ જેમાં શિવાનંદજીના જીવન-કવનની સુંદર માહિતી મળી જે તમારા સુધી પહોંચાડુ છું.


          શિવાનંદજીએ સંસ્કૃત-ગુજરાતી-મરાઠી-હિન્દીમાં પણ કાવ્યો લખ્યા છે. પરંતુ લોકો સુધી માત્ર તેની આરતી જ કંઠોપકંઠ સ્મૃતિથી જીવે છે. પંચીગરજીના મત મુજબ તેમણે 215 જેટલી કૃતિઓ રચી છે. જેમાં થોડાક ભજનો હનુમાનજીના અને બબ્રીક (બળીયાકાકા)ના અને તાપીમાતાનો ગરબો પણ ખાસ છે.


           પણ ક્યાં છે શિવાનંદજીની બાકી રહેલી અદ્દ્ભુત રચનાઓ? જેનું કોઈ પુસ્તક નથી. સુરત કે દક્ષિણ ક્ષેત્રના વડિલોને કદાચ શિવાનંદજીના કોઈ પદો હૈયે હોય તો જ આ વિરાસત આપણને પાછી મળે. આ લેખ વાંચ્યા પછી કોઈને ‘ભણે શિવાનંદ સ્વામી’વાળી કોઈપણ રચના ક્યાંયથી પણ મળે તો પ્લીઝ મને ઈમેઈલથી મોકલજો. કોઈએ આ વ્યક્તિનું પુસ્તક બહાર પાડવું જોઈએ એવી સુફિયાણી સલાહ આપવા કરતા મને જો પૂરતી રચનાઓ મળશે તો હું જરૂર શિવાનંદજીનું પુસ્તક બહાર પાડીશ. ખેર આગે આગે ગોરખ જાગે;


         એ સમયે શિવાનંદજીના ઘેર પાઠશાળા ચાલતી. ચાલીસથી વધુ વિદ્યાર્થીઓ ત્યાં અભ્યાસ કરતા. તેમના પદો સુરતના મંદિરો અને ઘરોમાં આદરપૂર્વક ગવાતા. શિવાનંદજીની પવિત્રતા અને લોકપ્રિયતા એવી હતી કે સુરતની ટંકશાળામાં જ્યારે જ્યારે કોઈ એકસો તોલા સોનુ ગળાવે ત્યારે તેમાંથી એક આની (1/16 તોલું ) સોનું પ્રેમપૂર્વક શિવાનંદજીને ભેંટ ધરાતું. મજાની વાત એ કે શિવાનંદજીની છઠ્ઠી પેઢીએ ત્રિપુરાનંદજીની દીકરી ડાહીગૌરી સાથે આપણા વીર કવિ નર્મદે બીજા લગ્ન કર્યા. આમ ‘જય જય ગરવી ગુજરાત’નો સૌ પ્રથમ જયઘોષ કરનાર વીર કવિ નર્મદ શિવાનંદજીની પેઢીના જમાઈ હતા. શિવાનંદજીએ જીવનના ઉતરાર્ધમાં 85 વરસે સન્યાસ લીધો જેથી શિવાનંદસ્વામી કહેવાયા અને ઇ.સ. 1626માં સમાધી લઈ આ મહાપુરુષે મહાપ્રયાણ કર્યું.


            ‘જય આદ્યાશક્તિ’ આરતીની કુલ અઢાર કડી જ છે. ત્યારબાદ અમુક ક્ષેપક કડીઓ ભક્તોએ જોડેલી છે. શિવાનંદજીએ શિવશક્તિનું કોઈ પવિત્ર અનુષ્ઠાન કર્યાની ધારણા છે. જે દરમ્યાન તેમણે આ આરતી રચી છે. આ આરતીમાં એકમથી પુનમ સુધીનો તિથિક્રમ છે અને શિવાનંદજીના પોતાના સ્વાનુભવ પણ છે. માતાજીના પરમધામ મણીદ્વીપમાં મણી-માણેકના અઢાર કિલ્લા છે. જેના લીધે તેમણે આ અઢાર કડીની આરતી રચેલી છે. જેમના કેટલાક શબ્દો પાઠ ફેર અને અપભ્રંશ પામ્યા છે. કંઠોપકંઠ સચવાતી કૃતિઓમાં આવી ભરપુર શક્યતાઓ રહે એવું શ્રી ગણપતભાઈ પંચીગર પણ સ્વીકારે છે. તેમ છતાં અમુક શબ્દોના તેમણે ખૂબ સચોટ અર્થ આપેલા છે. જેમ કે ‘જયોમ જયોમ માં જગદંબે’ નો કોઈ અર્થ જ નથી. ‘જય હો - જય હો માં જગદંબે’ જ સાચો શબ્દ છે. એક નજર મારીએ ચાર સદી પહેલાની રચાયેલી અણમોલ કૃતિ તરફ અને જ્યાં જ્યાં આપણો પાઠદોષ કે ઉચ્ચારણદોષ છે તે સુધારીયે. કોઈપણ જાતની ટેક્નોલોજી વગર 400 વરસથી જે આરતી ગુજરાતી-હિન્દીમાં સમગ્ર ભારતના ઘરે ઘરે ગવાય છે એજ આપણા માટે ગૌરવપ્રદ ઘટના છે. અહીં માત્ર અપભ્રંશ થયેલ શબ્દો અને અંતરા પર જ પ્રકાશ પાડ્યો છે.


“જય આદ્યાશક્તિ માં જય આદ્યાશક્તિ, 

અખિલ બ્રહ્માંડ નીપજાવ્યા પડવે પંડે થયા, જય હો જય હો માં જગદંબે”

અહી કેટલાક ‘પડવે પંડિત થ્યા’ બોલે છે જે અશુદ્ધ છે.


“બ્રહ્મા ‘ગુણપતી’ ગાયે હર ગાયે હર માં” 

અહીં કેટલાક ‘ગણપતિ’ ગાયે એમ બોલે છે. જ્યારે કવિએ વિષ્ણુ ભગવાન માટે ‘ગુણપતિ’ શબ્દ પ્રયોજ્યો છે. બ્રહ્મા વિષ્ણુ અને હર ( કહેતા શિવે ) શિવશક્તિના ગુણ ગાયા એ ભાવ છે.


“ત્રય: થકી ત્રિવેણી, તમે ત્રિવેણી માં”

ઘણા ‘તમે તરવેણીમાં’ બોલે છે જે અશુદ્ધ છે. અહીં નવસર્જન, પરિપાલન અને વિસર્જનની ત્રણેય પ્રવૃત્તિને ત્રિભુવનેશ્વરી ‘ત્રિવેણી’ માતા છો એ સંદર્ભ છે.


“ચોથે ચતુરા મહાલક્ષ્મી માં સચરાચર વ્યાપ્યા, 

ચાર ભૂજા ચૌ દિશા પ્રગટ્યા દક્ષિણમાં” 

અહીં શિવાનંદજીને નર્મદા નદીને કાંઠે દક્ષિણ દિશામાં માતાજી દર્શન આપ્યાનો અનુભવ કવિએ લખ્યો છે. જ્યાં ચતુરા મહાલક્ષ્મીનો અર્થ છે જેની પાસે ધન છે તે ચતુર ગણાય.


“પંચમેં પંચઋષિ, પંચમે ગુણપદ માં” 

‘ગુણપદ’ શબ્દનો અર્થ એકબીજાથી વિભિન્ન પ્રકારના લક્ષણો થાય. પાંચ મહાભૂત તત્વો જગદંબાએ ઉત્પન્ન કર્યા અને તેની વ્યવસ્થા સંભાળવા પાંચ બ્રહ્મર્ષિ ઉત્પન્ન કર્યા.


“સપ્તમે સપ્ત પાતાળ, સાંવિત્રી સંધ્યા, 

ગૌ – ગંગા – ગાયત્રી, ગૌરી – ગીતા માં” 

માનવ શરીરમાં રહેલા સાત ચક્રોની આંતર ચેતના વધારવા માટે શિવાનંદજીએ સાત ઉપાયો અહી આપ્યા છે. કેટલાક ‘સંધ્યા સાવિત્રી’ બોલે જે ખોટું છે. 1. સાવિત્રી એટલે સૂર્ય ઉપાસના, 2. સંધ્યા એટલે ત્રિકાળ સંધ્યા અથવા સાંજે ભજન કીર્તન 3. ગૌ સેવા 4. ગંગા સ્નાન 5. ગાયત્રી મંત્ર જાપ 6. ગૌરી અર્થાત પાર્વતી દેવીની સાધના 7. ગીતાજીનો ઉપદેશ. આ કડી માત્ર શબ્દમેળ નથી પણ ગુઢાર્થ સમજવો જરૂરી છે.


“કીધા હરિ બ્રહ્મા’ની જગ્યાએ કોઈ હર બ્રહ્મા બોલે છે. ખરેખર હરિ (વિષ્ણુ) અને બ્રહ્માએ શીવ-શક્તિની પૂજા કરે છે એ સાચો ભાવ છે. 


“કામ દુર્ગા કાલીકા, શ્યામા ને રામા” 

અર્થાત કામદુર્ગા દેવી, કાલિકા અને શ્યામા (રાધાજી), રામા (સીતાજી)ની ભક્તિ તરફ શિવાનંદજીનો અંગુલીનિર્દેશ છે.


“તેરસે તુળજા રૂપ તમે તારૂણી માતા” વાળી કડીમાં હે માં! તમે તુલજા ભવાની રૂપે શિવજીને તલવાર આપી હિંદુ ધર્મને તારનારા છો. તથા જવારાના સેવનથી ચિરકાળ તારુણ્ય બક્ષનારા છો.


         વિક્રમ સંવત 1622માં શિવાનંદજીની સાધના શરૂ થઈ અને 1657માં પૂર્ણ થઈ એવી ધારણા છે. તેમજ ચતુર્ભુજ સ્વરૂપે માતાજીએ કવિને દર્શન આપ્યા. ત્રંબાવટી, રૂપાવટી અને મંછાવટી આ ત્રણ એ વખતની નજીકની નગરીના લોકોએ શિવાનંદજીને આ અનુષ્ઠાનમાં તન-મન-ધનથી મદદ કરી જેથી તેના આશરે ‘સોળ સહસ્ત્ર’ સોળ હજાર લોકો વતી કવિએ પ્રાર્થના કરી વિશિષ્ટ રૂપે આશીર્વાદ માંગ્યા.


અઢારમી કડીમાં ભણે શિવાનંદ સ્વામી પછીના તમામ અંતરા એ ભાવજગતથી ભક્તોએ જોડેલા છે. આગામી દિવસોમાં આપણી આવનારી પેઢી સુધી સાચી ધરોહર સાચા સ્વરૂપમાં પહોંચાડીશું અને સાચી આરતી ગાશું તો ભગવતી અને કવિ શિવાનંદ સ્વામી સ્વર્ગમાંથી રાજી થાશે. ( વિશેષ આભાર શ્રી ગણપતલાલ પંચીગર તથા નિતીનભાઈ ભજીયાવાલા-સુરત. )


લેખક - ડો. ભુવન રાવલ - કલોલ

Thursday, April 23, 2026

मंत्र-महिमा

 मंत्र-महिमा

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मन की मनन करने की शक्ति अर्थात एकाग्रता प्रदान करके जप द्वारा सभी भयों का विनाश करके, पूर्ण रूप से रक्षा करनेवाले शब्दों को मंत्र कहा जाता है। ऐसे कुछ मंत्र और उनकी शक्ति निम्न प्रकार हैः~


१.हरिॐ

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ह्रीं शब्द बोलने से यकृत पर गहरा प्रभाव पड़ता है और हरि के साथ यदि ॐमिला कर उच्चारण किया जाए तो हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों पर अच्छी असर पड़ती है। सात बार हरि ॐ का गुंजन करने से मूलाधार केन्द्र पर स्पंदन होते हैं और कई रोगों को कीटाणु भाग जाते हैं।


२.रामः

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रमन्ते योगीनः यस्मिन् स रामः। 

जिसमें योगी लोग रमण करते हैं वह है राम। रोम रोम में जो चैतन्य आत्मा है वह है राम। ॐ राम... ॐ राम... का हररोज एक घण्टे तक जप करने से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है, मन पवित्र होता है, निराशा, हताशा और मानसिक दुर्बलता दूर होने से शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।


३.सूर्यमंत्रः 

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ॐ सूर्याय नमः

इस मँत्र के जप से स्वास्थ्य, दीर्घायु, वीर्य एवं ओज की प्राप्ति होती है। यह मंत्र शरीर एवं चक्षु के सारे रोग दूर करता है। इस मंत्र के जप करने से जापक के शत्रु उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।


४.सारस्वत्य मंत्रः 

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ॐ सारस्वत्यै नमः।

इस मंत्र के जप से ज्ञान और तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।


५.लक्ष्मी मंत्रः 

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ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।

इस मंत्र के जप से धन की प्राप्ति होती है और निर्धनता का निवारण होता है।


६.गणेष मंत्रः 

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ॐ श्री गणेषाय नमः। ॐ गं गणपतये नमः।

इन मंत्रों के जप से कोई भी कार्य पूर्ण करने में आने वाले विघ्नों का नाश होता है।


७.हनुमान मंत्रः 

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ॐ श्री हनुमते नमः।

इस मंत्र के जप से विजय और बल की प्राप्ति होती है।


८.सुब्रह्मण्यमंत्रः 

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ॐ श्री शरणभवाय नमः।

इस मंत्र के जप से कार्यों में सफलता मिलती है। यह मंत्र प्रेतात्मा के दुष्प्रभाव को दूर करता है।


९. सगुण मंत्रः 

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ॐ श्री रामाय नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नमः शिवाय।

ये सगुण मंत्र हैं, जो कि पहले सगुण साक्षातकार कराते हैं और अंत में निर्गुण साक्षात्कार।


१०. मोक्षमंत्रः 

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ॐ, सोsहम्, शिवोsहम्, अहं ब्रह्मास्मि।

ये मोक्ष मंत्र हैं, जो आत्म-साक्षात्कार में मदद करते हैं।

Wednesday, April 22, 2026

शिखा , जनेऊ, तिलक इससे जुड़ा एक जरूरी लेख

 शिखा , जनेऊ, तिलक इससे जुड़ा एक जरूरी लेख

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शिखा की आवश्यकता व शिखा बंधन :

आज से पचास-साठ पहिले तक भारत में सब हिन्दू , और चीन में प्रायः सब लोग शिखा रखते थे| शिखा रखने के पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण है।

खोपड़ी के पीछे के अंदरूनी भाग को संस्कृत में मेरुशीर्ष और अंग्रेजी में Medulla Oblongata कहते हैं। यह देह का सबसे अधिक संवेदनशील भाग है| मेरुदंड की सब शिराएँ यहाँ मस्तिष्क से जुडती हैं| इस भाग का कोई ऑपरेशन नहीं हो सकता| देह में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश यही से होता है| भ्रू-मध्य में आज्ञा चक्र इसी का प्रतिबिम्ब है| योगियों को नाद की ध्वनि भी यहीं सुनती है| देह का यह भाग ग्राहक यंत्र (Receiver) का काम करता है| शिखा सचमुच में ही Receiving Antenna का कार्य करती है| ध्यान के पश्चात् आरम्भ में योनी मुद्रा में कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं| वह ज्योति यहीं से प्रवेश करती है और आज्ञा चक्र में नीले और स्वर्णिम आवरण के मध्य श्वेत पंचकोणीय नक्षत्र के रूप में दिखाई देती है| योगी लोग इसी ज्योति का ध्यान करते हैं और इस पञ्चकोणीय नक्षत्र का भेदन करते हैं| यह नक्षत्र ही पंचमुखी महादेव है।


मेरुदंड व मस्तिष्क (Cerebrospinal canal) के अन्य चक्रों (मेरुदंड में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत और विशुद्धि, व मस्तिष्क में कूटस्थ, और सहस्त्रार व ज्येष्ठा, वामा और रौद्री ग्रंथियों व श्री बिंदु को ऊर्जा यहीं से वितरित होती है| शिखा धारण करने से यह भाग अधिक संवेदनशील हो जाता है|


भारत में जो लोग शिखा रखते थे वे मेधावी होते थे| अतः शिखा धारण की परम्परा भारत के हिन्दुओं में है|


संध्या विधि में संध्या से पूर्व गायत्री मन्त्र के साथ शिखा बंधन का विधान है| इसके पीछे और कोई कारण नहीं है यह मात्र एक संकल्प और प्रार्थना है|


किसी भी साधना से पूर्व -- शिखा बंधन गायत्री मन्त्र के साथ होता है।


यज्ञोपवीत - धारण विधि

यज्ञोपवीत धारण करें । यदि मल - मूत्र का त्याग करते समय यज्ञोपवीत कान में टांगना भूल जाएं तो नया बदल लें । नए यज्ञोपवीत को जल द्वारा शुद्ध करके , दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर निम्न मंत्रों से देवताओं का आवाहन करें ~


प्रथमतंतौ - ॐ कारमावाहयामि

द्वितीयतंतौ - ॐ अग्निमावाहयामि

तृतीयतंतौ - ॐ सर्पानावाहयामि

चतुर्थतंतौ - ॐ सोममावाहयामि

पंचमतंतौ - ॐ पितृनावाहयामि

षष्ठतंतौ - ॐ प्रजापतिमावाहयामि

सप्तमतंतौ - ॐ अनिलमावाहयामि

अष्टमतंतौ - ॐ सूर्यमावाहयामि

नवमतंतौ - ॐ विश्वान्देवानावाहयामि

ग्रंथिमध्ये - ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्माणमावाहयामि

ॐ विष्णवे नमः विष्णुमावाहयामि

ॐ रुद्राय नमः रुद्रमावाहयामि


इस प्रकार आवाहन करके गंध और अक्षत से आवाहित देवताओं की पूजा करें तथा निम्नलिखित मंत्र से यज्ञोपवीत धारण का विनियोग करें~


विनियोग - ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिः , लिंगोक्ता देवता , त्रिष्टुपछन्दो यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः ।

तदनन्तर जनेऊ धोकर प्रत्येक बार निम्न मंत्र बोलते हुए एकेक कर धारण करें~


ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्मग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥


पुराने जनेऊ को कंठीकर सिर पर से पीठ की ओर निकालकर यथा - संख्य गायत्री मंत्र का जप करें~


एतावददिन - पर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया ।

जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागी गच्छ सूत्र ! यथासुखं ॥


अब आसनादि बिछाकर आचमन आदि क्रिया करें ~


केशवाय ॐ नमः स्वाहा

ॐ नारायणाय स्वाहा

ॐ माधवाय नमः स्वाहा


उपर्युक्त मंत्र बोलते हुए तीन बार आचमन करें । इसके पश्चात् अंगूठे के मूल से दो बार होंठों को पोंछकर ॐ गोविंदाय नमः बोलकर हाथ धो लें ।


फिर दाएं हाथ की हथेली में जल लेकर कुशा से अथवा कुशा के अभाव में अनामिका और मध्यमा से , मस्तक पर जल छिड़कते हुए यह मंत्र पढ़ें~


ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥


तदनन्तर निम्नलिखित मंत्र से आसन पर जल छिड़ककर दाएं हाथ से उसका स्पर्श करें~


ॐ पृथ्वि ! त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।

त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥


 शिखा और सूत्र यह दो हिन्दू धर्म के सर्वमान्य प्रतीक है। सुन्नत होने से किसी को मुसलमान ठहराया जा सकता है, सिख धर्मानुयायी पंच-केशों के द्वारा अपनी धार्मिक मान्यता प्रकट करते हैं। पुलिस, फौज, जहाज और रेल आदि विभागों के कर्मचारी अपनी पोशाक से पहचाने जाते हैं। इसी प्रकार हिन्दू धर्मानुयायी अपने इन दो प्रतीकों को अपनी धार्मिक निष्ठा को प्रकट करते हैं। शिखा का महत्त्व कानट्रेक्ट में लिखेंगे, यह यज्ञोपवीत की ही विवेचना की जा रही है।


उपयोगिता और आवश्यकता

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यज्ञोपवीत के धागों में नीति का सारा सार सन्निहित कर दिया गया है। जैसे कागज और स्याही के सहारे किसी नगण्य से पत्र या तुच्छ-सी लगने वाली पुस्तक में अत्यन्त महत्वपूर्ण ज्ञान-विज्ञान भर दिया जाती है, उसी प्रकार सूत के इन नौ धागों में जीवन विकास का सारा मार्गदर्शन समाविष्ट कर दिया गया है। इन धागों को कन्धों पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर प्रतिष्ठापित करने का प्रयोजन यह है कि सन्निहित शिक्षाओं का यज्ञोपवीत के ये धागे हर समय स्मरण करायें और उन्हीं के आधार पर हम अपनी रीति-नीति का निर्धारण करते रहें।


जन्म से मनुष्य भी एक प्रकार का पशु ही है। उसमें स्वार्थपरता की प्रवृत्ति अन्य जीव-जन्तुओं जैसी ही होती है, पर उत्कृष्ट आदर्शवादी मान्यताओं द्वारा वह मनुष्य बनता है। जब मानव की आस्था यह बन जाती है कि उसे इंसान की तरह ऊँचा जीवन जीना है और उसी आधार पर वह अपनी कार्य पद्धति निर्धारित करता है, तभी कहा जाता है कि इसने पशु-योनि छोड़कर मनुष्य योनि में प्रवेश किया अन्यथा नर-पशु से तो यह संसार भरा ही पड़ा है। स्वार्थ संकीर्णता से निकल कर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर-जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवाद जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा लेना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है-दूसरा जन्म। हर हिन्दू धर्मानुयायी को आदर्शवादी जीवन जीना चाहिए, द्विज बनना चाहिए। इस मूल तत्व को अपनाने की प्रक्रिया को समारोहपूर्वक यज्ञोपवीत संस्कार के नाम से सम्पन्न किया जाता है। इस व्रत-बंधन को आजीवन स्मरण रखने और व्यवहार में लाने की प्रतिज्ञा तीन लड़ों वाले यज्ञोपवीत की उपेक्षा करने का अर्थ है- जीवन जीने की प्रतिज्ञा से इनकार करना। 


ऐसे लोगों का किसी जमाने में सामाजिक बहिष्कार किया जाता था, उन्हें लोग छूते तक भी नहीं थे, अपने पास नहीं बिठाते थे। इस सामाजिक दण्ड का प्रयोजन यही था कि वे प्रताड़ना-दबाव में आकर पुन: मानवीय आदर्शों पर चलने की प्रतिज्ञा-यज्ञोपवीत धारण को स्वीकार करें। आज जो अन्त्यज, चाण्डाल आदि दीखते हैं, वे किसी समय के ऐसे ही बहिष्कृत व्यक्ति रहे होंगे। दुर्भाग्य से उनका दण्ड कितनी ही पीड़ियाँ बीत जाने पर भी उनकी सन्तान को झेलना पड़ रहा है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिन्हें यज्ञोपवीत धारी बनाने के लिए कोई दण्ड व्यवस्था की गई थी, उनकी सन्तानें अब यदि यज्ञोपवीत पहनने को इच्छुक एवं आतुर हैं, तो उन्हें वैसा करने से रोका जाता है।


शास्त्रों के अभिवचन

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यज्ञोपवीत द्विजत्व का चिन्ह है। कहा भी है~


मातुरग्रेऽधिजननम् द्वितीयम् मौञ्जि बन्धनम्।


अर्थात्-पहला जन्म माता के उदर से और दूसरा यज्ञोपवीत धारण से होता है।


आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणम् कृणुते गर्भमन्त:।

त रात्रीस्तिस्र उदरे विभत्ति तं जातंद्रष्टुमभि संयन्ति देवा:।।


अथर्व 11/3/5/3

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अर्थात्-गर्भ में रहकर माता और पिता के संबंध से मनुष्य का पहला जन्म होता है। दूसरा जन्म विद्या रूपी माता और आचार्य रूप पिता द्वारा गुरुकुल में उपनयन और विद्याभ्यास द्वारा होता है। 

‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में लिखा है कि यज्ञोपवीत के नौ धागों में नौ देवता निवास करते हैं।


(1) ओउमकार

(2) अग्नि

(3) अनन्त

(4) चन्द्र

(5) पितृ

(6) प्रजापति

(7) वायु

(8) सूर्य 

(9) सब देवताओं का समूह।

वेद मंत्रों से अभिमंत्रित एवं संस्कारपूर्वक कराये यज्ञोपवीत में 9 शक्तियों का निवास होता है। जिस शरीर पर ऐसी समस्त देवों की सम्मिलित प्रतिमा की स्थापना है, उस शरीर रूपी देवालय को परम श्रेय साधना ही समझना चाहिए।


‘‘सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र’’ में यज्ञोपवीत के संबंध में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है~


ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्।

कृतो ग्रन्थिस्त्रनेत्रेण गायत्र्याचाभि मन्त्रितम्।।


अर्थात्- 

ब्रह्माजी ने तीन वेदों से तीन धागे का सूत्र बनाया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसे ब्रह्म गाँठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियों समेत बनकर तैयार हुआ।

यज्ञोपवीत के लाभों का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है~


येनेन्द्राय वृहस्पतिवृर्व्यस्त: पर्यद धाद मृतं नेनत्वा।

परिदधाम्यायुष्ये दीर्घायुत्वाय वलायि वर्चसे।।


पारस्कर गृह सूत्र 2/2/7

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‘‘जिस प्रकार इन्द्र को वृहस्पति ने यज्ञोपवीत दिया था उसी तरह आयु, बल, बुद्धि और सम्पत्ति की वृद्धि के लिए यज्ञोपवीत पहना जाय।’’


देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तत्रपृषयस्तपसे ये निषेदु:।

भीमा जन्या ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधति परमे व्योमन्।।


ऋग्वेद 10/101/4

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अर्थात-तपस्वी ऋषि और देवतागणों ने कहा कि यज्ञोपवीत की शक्ति महान है। यह शक्ति शुद्ध चरित्र और कठिन कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देती है। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से जीव-जन भी परम पद को पहुँच जाते हैं।


यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रयं प्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज:।।


-ब्रह्मोपनिषद्

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अर्थात- यज्ञोपवीत परम पवित्र है, प्रजापति ईश्वर ने इसे सबके लिए सहज बनाया है। यह आयुवर्धक, स्फूर्तिदायक, बन्धनों से छुड़ाने वाला एवं पवित्रता, बल और तेज देता है।


त्रिरस्यता परमा सन्ति सत्या स्यार्हा देवस्य जनि मान्यग्ने:।

अनन्ते अन्त: परिवीत आगाच्छुचि: शुक्रो अर्थो रोरुचान:।।


-4/1/7

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अर्थात- इस यज्ञोपवीत के परम श्रेष्ठ तीन लक्षण है। 

1. सत्य व्यवहार की आकांक्षा

2. अग्नि जैसी तेजस्विता

3. दिव्य गुणों से युक्त प्रसन्नता इसके द्वारा भली प्रकार प्राप्त होती है।

4. नौ धागों में नौ गुणों के प्रतीक हैं। 


1.    अहिंसा

2.    सत्य

3.    अस्तेय

4.    तितिक्षा

5.    अपरिग्रह

6.    संयम

7.    आस्तिकता

8.    शान्ति

9.    पवित्रता। 

1.    हृदय से प्रेम

2.    वाणी में माधुर्य 

3.    व्यवहार में सरलता

4.    नारी मात्र में मातृत्व की भावना 

5.    कर्म में कला और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति 

6.    सबके प्रति उदारता और सेवा भावना 

7.    गुरुजनों का सम्मान एवं अनुशासन

8.    सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सत्संग

9.    स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता का स्वभाव।

यह भी नौ गुण बताये गये हैं। अभिनव संस्कार पद्धति में श्लोक भी दिये गये हैं।

यज्ञोपवीत पहनने का अर्थ है-नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को अपने कन्धों पर परम पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में अनुभव करते रहना। अपनी गतिविधियों का सारा ढाँचा इस आदर्शवादिता के अनुरुप ही खड़ा करना। इस उत्तरदायित्व के अनुभव करते रहने की प्रेरणा का यह प्रतीक सत्र धारण किये रहने प्रत्येक हिन्दू का आवश्यक धर्म-कर्तव्य माना गया है। इस लक्ष्य से अवगत कराने के लिए समारोहपूर्वक उपनयन किया जाता है।


विधि व्यवस्था

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बालक जब थोड़ा सदाचार हो जाय और यज्ञोपवीत के आदर्शों को समझने एवं नियमों को पालने योग्य हो जाय तो उसका उपनयन संस्कार कराना चाहिए। साधारणतया 12 से 13 वर्ष की आयु इसके लिए ठीक है। जिनका तब तक न हुआ हो तो वे कभी भी करा सकते हैं। जिन महिलाओं की गोदी में छोटे बच्चे नहीं वे भी उसे धारण कर सकती है। जो पहने उन्हें 

1.    मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को कान पर चढ़ाना

2.    गायत्री की प्रतिमा यज्ञोपवीत की पूजा प्रतिष्ठा के लिए एक माला (108 बार) गायत्री मंत्र का नित्य जप करना,

3.    कण्ठ से बिना बाहर निकाले ही साबुन आदि से उसे धोना,

4.    एक भी लड़ टूट जाने पर उसे निकाल कर दूसरा पहनना,

5.    घर में जन्म-मरण, सूतक, हो जाने या छ: महीने बीत जाने पर पुराना जनेऊ हटाकर नया पहनना,

6.    चाबी आदि कोई वस्तु उसमें न बाँधना-इन नियमों का पालन करना चाहिए।

हिंदुत्व की असली पहचान है तिलक , तिलक लगाने से समाज में मस्तिस्क हमेशा गर्व से ऊँचा होता है , 


समाज में अपनी एक अलग पहचान बनानी हो तो करे आज से ही माथे पर तिलक और दूसरों को भी उत्साहित करे ,क्योंकी ये हमारे प्राचीन धर्म का गौरव है .. साथ ही हमारेवैष्णव संप्रदाय में तिलक को लगाने 

की परंपरा के पीछे यह बताया जाता है कि वैष्णव लोग तो श्री हरि के पदचिहों को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। उनके मत में तिलक और कुछ नहीं, विष्णु के चरण चिन्ह ही हैं। तिलक का आकार अलग-अलग संप्रदायों ने अलग-अलग ढंग से प्रकट किया है, इसलिए कैसे भी तिलक करे लेकिन अवश्य करे ..


इसके पीछे आध्यात्मिक महत्व है। दरअसल, हमारे शरीर में सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र होते हैं, जो अपार शक्ति के 

भंडार हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है। माथे के बीच में जहां तिलक लगाते हैं, वहां आज्ञाचक्र होता हैयह चक्र हमारे 

शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, जहां शरीर की प्रमुख तीन नाडि़यां इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना आकर मिलती हैं, इसलिए इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यह गुरु स्थान कहलाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन होता है। यही हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इसी को मन का घर भी कहा जाता है। इसी कारण यह 

स्थान शरीर में सबसे ज्यादा पूजनीय है। योग में ध्यान के समय इसी स्थान पर मन को एकाग्र किया जाता है।


तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि इसके कई वैज्ञानिक कारण भी हैं हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। तंत्र शास्त्र में पंच गंध या अस्ट गंध से बने तिलक लगाने का बड़ा ही महत्व है , 


तंत्र शास्त्र में शरीर के तेरह  भागों पर तिलक करने की बात कही गई है, लेकिन समस्त शरीर का संचालन मस्तिष्क करता है, इसलिए इस पर तिलक करने की परंपरा अधिक प्रचलित है। तिलक लगाने में सहायक हाथ की अलग-अलग  अंगुलियों का भी अपना महत्व है।


क्या है मस्तक पर तिलक लगाने का महत्व..?


हमारे दोनों भोहों के मध्य में आज्ञाचक्र होता है, इस चक्र में सूक्ष्म द्वार होता है जिससे इष्ट और अनिष्ट दोनों ही

शक्ति प्रवेश कर सकती है, यदि इस सूक्ष्म प्रवेश द्वार को हम सात्त्विक पदार्थ का लेप एक विशेष रूप में दें तो इससे ब्रह्माण्ड में व्याप्त इष्टकारी शक्ति हमारे पिंड में आकृष्ट होती है और इससे हमारा अनिष्टकारी शक्तियों से रक्ष भी होती है | बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना शुरू नहीं होती है। मान्यताओं के अनुसार सूने 


मस्तक को शुभ नहीं माना जाता। माथे पर चंदन, रोली, कुमकुम, सिंदूर या भस्म का तिलक लगाया जाता है।


किस अंगुली से लगाये माथे पर तिलक :-

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अनामिका शांति दोक्ता, मध्यमायुष्यकरी भवेत्।


अंगुष्छठ:पुष्टिव:प्रोत्त, तर्जनी मोक्ष दायिनी।।


अर्थात्,  तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली मानसिक शांति प्रदान करती है, मध्यमा अंगुली मनुष्य की 

आयु वृद्धि करती है, अंगूठा प्रभाव, ख्याति और आरोग्य प्रदान करता है, इसलिए विजयतिलकअंगूठेसे ही 

करने की परम्परा है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। इसलिए मृतक को तर्जनी से तिलक लगाते हैं।

सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार, अनामिका और अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका अंगुली 

सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। इसका अर्थ यह है कि साधक सूर्य के समान दृढ, तेजस्वी, निष्ठा-प्रतिष्ठा और 

सम्मान वाला बने। दूसरा अंगूठा है, जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवनी शक्ति का 

प्रतीक है। इससे साधक के जीवन में शुक्र के समान ही नव जीवन का संचार होने की मान्यता है।


स्त्रीयों को गोल और पुरुषों को लम्बवत तिलक धारण करना चाहिए। तिलक लगाने से मन शांत रहता है। 

अनिष्टकारी शक्तियों से रक्षण होने के कारण और सात्विकता एवं देवत्व आकृष्ट होने के कारण हमारे ओर 

सूक्ष्म कवच का निर्माण होता है।


जय परशुराम ।

Tuesday, April 21, 2026

श्वेतवराहकल्प

 #श्वेतवराहकल्प-


( *सृष्टि* ) का प्रारम्भ १९७२९४९१२० वर्ष पूर्व हुआ था, इतने बृहत्तम इतिहास को भगवान् व्यास नारायण के अतिरिक्त लिखने में कोई अन्य समर्थ नहीं,उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की कृपा से मैं इस *श्वेतवराह  कल्प के ७वें मन्वन्तर के २८ कलियुगों* के सार्वभौम जगदगुरुओं का सङ्केत मात्र में वर्णन करने का प्रयास कर रहा हूँ।


 *भगवान नारायण से चली आ रही हिंदुओं की गुरु शिष्य परम्परा:-* 


 *नारायण-->ब्रह्मा-->वशिष्ठ-->शक्ति-->पराशर-->व्यास-->शुकदेव-->गौड़पाद-->गोविंदपाद-->आदि शंकराचार्य ।* 


आदि शंकराचार्य जी ने चार शांकर पीठों की स्थापना करी। जिनमे प्रथम के चार शंकराचार्य नियुक्त किये गए जिनके नाम थे - पद्मपादाचार्य, तोटकाचार्य , हस्तमालकाचार्य , सुरेश्वराचार्य


श्रीमन्महाराज सार्वभौम युधिष्ठिर जी के २६३१ वर्ष व्यतीत होने पर स्वयं जगद्गुरु भगवान् शङ्कर आद्य शङ्कर भगवत्पाद् के रूप में इस धरा धाम पर प्रकट हुए थे । पूज्य भगवत्पाद् ने प्राचीन चतुराम्नाय सम्बद्ध चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को जगद्गुरु शङ्कराचार्य के रूप में ख्यापित किया था, यथा:- 


# *सामवेद* से सम्बद्ध पश्चिमाम्नाय *द्वारिका-शारदामठ द्वारिका* ,पर पूज्य जगद्गुरु श्री *सुरेश्वराचार्य* जी का युधिष्ठिर संवत् २६४९ में (वर्तमान से २५०८ वर्ष पूर्व में )अभिषेक किया गया।


# *यजुर्वेद* से सम्बद्ध दक्षिणाम्नाय *श्रीशृङ्गेरी-शारदामठ शृङ्गेरी,* पर पूज्य जगदगुरु श्री *हस्तामलकाचर्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष में ) पूर्व अभिषिक्त किया गया।


 # *अथर्ववेद* से सम्बद्ध उत्तराम्नाय *ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम* पर पूज्य जगद्गुरु श्री *तोटकाचार्यजी* को युधिष्ठिर संवत् २६५४ में (वर्तमान से २५०२ वर्ष पूर्व) अभिषेक किया ।


 और # *ऋग्वेद* से सम्बद्ध पूर्वाम्नाय श्री *गोवर्द्धनमठ* *श्रीजगन्नाथ पुरी पीठ* पर पूज्य जगद्गुरु *पद्मपादाचार्य* जी को युधिष्ठिर संवत् २६५५ में (वर्तमान से २५०१ वर्ष पूर्व में ) अभिषिक्त किया।



 *वर्तमान में* चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर पूज्य जगद्गुरु महाभाग 

पश्चिम में *शारदामठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्तश्रीविभूषित भगवान् स्वामि श्रीसदानन्द सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त है।


दक्षिण में *शृङ्गेरी मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री भारती तीर्थ जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।



उत्तर में *ज्योतिर्मठ में पूज्य जगद्गुरु अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामि श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी* महाभाग अभिषिक्त हैं।


पूर्व में *पुरीपीठ में अनन्त श्री विभूषित भगवान् स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती* जी महाभाग अभिषिक्त हैं।


यह सार्वभौम जगद्गुरु की परम्परा अतिप्राचीन ही नहीं अपितु सनातन भी हैं।

कृत,त्रेता,द्वापर आदि युगों में मन्त्र दृष्टा ऋषियों से प्रसारित ज्ञान के द्वारा धर्म की व्यवस्था बनी रहती है।

किन्तु कलियुग में अल्पमेधा वाले,तपोबल और शुद्धता-पवित्रता रहित मनुष्यों को भगवत्साक्षात्कार,देवताओं का साक्षात्कार और ऋषियों का साक्षात्कार प्रत्यक्ष नहीं होता है। क्योंकि दिव्य महापुरुषों के दर्शनों की क्षमता नहीं होती है कलियुग के अल्पशक्ति सम्पन्न लोगों में..ऐसे में ऐसे मनुष्यों पर कृपा करने के लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापर के अंतमें व्यास रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाजन करके पुराणों के द्वारा वेदों का सरलीकरण करके जन-जन तक ज्ञान के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 


उन्हीं भगवान् व्यास नारायण की सहायताके लिये जगद्गुरु भगवान् साम्ब शिव स्वयं अवतार धारण करते हैं, और व्यास जी के आदेश पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर ख्यापित करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।


श्री श्वेतवराहकल्प के सप्तम मन्वन्तर वैवस्वत का शुभारम्भ १२०५३३१२० वर्ष पूर्व हुआ था। वैवस्वत मन्वन्तरके *आद्य कलियुग* ११६६४५१२० वर्ष पूर्व में जब भगवान् ब्रह्माजी स्वयं व्यासजी के पद पर प्रतिष्ठित थे, तब भगवान् शिव ने उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु श्वेत के रूप में अवतार लिया और चतुराम्नाय चतुष्पीठों पर अपने चार प्रमुख शिष्यों श्वेतलोहित, श्वेताश्व, श्वेतशिख और श्वेत को अभिषिक्त किया।

(यह चतुराम्नाय पूर्ववत ऋक्० ,यजु: ,साम और अथर्व के क्रम से है।

पाठक गण कृपया निम्न सूची को स्वयं इसी क्रम से चतुराम्नाय चतुष्पीठों से सम्बन्ध ज्ञात कर सकते हैं। )


 *द्वितीय कलियुग* के प्रारम्भ में ११२३२५१२० वर्ष पूर्व जब प्रजापति सत्य व्यासजी थे तब भगवान् शिव जगद्गुरु सुतार के नाम से अवतरित हुए,उनके चार प्रमुख शिष्य जगद्गुरु हुए ,केतुमान् ,हृषीक ,शतरूप व दुन्दुभि ।


 *तीसरे कलियुग* के प्रारम्भ में १०८००५१२० वर्ष पूर्व महर्षि भार्गव व्यासजी थे तब भगवान् शङ्कर जगद


गुरु दमन के रूप में प्रकट हुए और उनके प्रमुख शिष्य थे ,पापनाशन ,विपाप ,विशेष व विशोक।


 *चतुर्थ कलियुग* के प्रारम्भ में १०३६८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् अङ्गिरा व्यासजी थे और उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु सुहोत्र केरूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए दुरतिक्रय ,दुर्दम ,दुर्मुख व सुमुख ।  


 *पञ्चम कलियुग* के प्रारम्भ में ९९३६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सविता व्यासजी थे (शुक्लयजुर्वेद इन्हीं से प्रकट हुआ ) तब उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु हँस (कङ्क) के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य थे ,सनत्कुमार ,सनन्दन ,सनातन व सनक । 


 *षट् कलियुग* के प्रारम्भ में भगवान् मृत्यु (सूर्यपुत्र- बालक नचिकेता के गुरु) व्यासजी के पद पर थे ,तब भगवान् महेश्वर  उनकी सहायता के लिये जगद्गुरु लोकाक्षीके रूप में प्रकट हुए,उनके प्रमुख शिष्य हुए,विजय संजय,विरजा व सुधामा।


 *सप्तम कलियुग* के प्रारम्भ में ९०७२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) थे,जो कि महर्षि भरद्वाज और विश्वामित्र के गुरु और प्राचीन व्याकरण के रचयिता थे,उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु जैगीषव्य के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य हुए-सुवाहन ,मेघवाहन ,योगीश व सारस्वत । 


 *अष्टम कलियुग* के प्रारम्भ में ८६४०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वसिष्ठ व्यासजी के पद पर थे (ऋग्वेद सप्तम मण्डल के दृष्टा ऋषि ,वसिष्ठ धर्मसूत्र ,वसिष्ठ शिक्षा व वसिष्ठ स्मृति की रचना इसी समय की ) उनकी सहायतार्थ भगवान् शङ्कर जगद्गुरु दधिवाहन के रूप में प्रकट हुए ,उनके शिष्य थे शाल्वल ,पञ्चशिख ,आसुरि व कपिल । 


 *नवम कलियुग* के प्रारम्भ में ८२०८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् सारस्वत व्यासजी थे ,उनके सहायक भगवान् शङ्कर जगदगुरु ऋषभ के रूप में हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गिरीश ,भार्गव ,गर्ग व पराशर । 


 *दशमें कलयुग* के प्रारम्भ में ७७७६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिधन्वा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु योगेश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,केतुशृङ्ग ,नरामित्र ,बलबन्धु व भृङ्ग , चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता इसी चतुर्युगी में हुए । 


 *एकादश कलियुग* के प्रारम्भ में ७३४४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् त्रिवृत व्यासजी थे ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु तप हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रलम्बक ,केशलम्ब ,लम्बाक्ष व लम्बोदर । 


 *द्वादश कलियुग* के प्रारम्भ में ६९१२५१२० वर्ष पूर्व भगवान् शततेजा व्यासजी थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु अत्रि हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,शर्व ,साध्य ,समबुद्धि व सर्वज्ञ । 


 *त्रयोदश कलियुग* के प्रारम्भ में ६४८०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् नारायण व्यासजी के पद पर थे ,उस समय उनके सहायक भगवान् शिवजगदगुरु बलि के रूप में प्रकट हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,विरजा ,वसिष्ठ ,काश्यप व सुधामा । 


 *चतुर्दश कलियुग* के  आदिमें ६०४८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् ऋक्ष व्यासजी के पद पर थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गौतम थे (गौतमधर्मसूत्रके रचयिता ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,श्नविष्टक ,श्रवण ,वशद व अत्रि । 


 *पञ्चदश कलियुगमें* ५६१६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर त्रय्यारुणि थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु वेदशिरा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हैं ,कुनेत्रक ,कुशरीर ,कुणिबाहु व कुणि । 


 *षोडश कलियुग* में ५१८४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास के पद पर देव आरूढ़ थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गोकर्ण जी थे (जिन्होंने अपने भाई धुंधकारी को पिशाच योनि से मुक्त किया ) ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,बृहस्पति (अर्थशास्त्र के रचयिता ) ,च्यवन (आयुर्वेद के प्रवर्तक ) ,उशना(उशनास्मृति अथवा शुक्रनीति के रचयिता ) व काश्यप  ,चक्रवर्ती सम्राट भरत इसी चतुर्युग में हुए ।  


 *सप्तदश कलियुग* में ४७५२५१२० वर्ष पूर्व भगवत् व्यासके पद पर देवकृतञ्जय व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु गुहावसी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,महाबल ,महायोग ,वामदेव व उतथ्य । 


 *अष्टदश कलियुग* के आदि में ४३२०५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास ऋतञ्जय थे ,व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु शिखण्डी थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए ,यतीश्वर ,श्यावास्य,रुचीक व वाचश्रवा । 


 *एकोन्विंशति कलियुग* में ३८८८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् भरद्वाज व्यासजी थे व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु माली थे ,उनके प्रमुख शिष्य प्रधिमि ,लोकाक्षी ,कौसल्य व हिरण्यनामा थे ,इसी चतुर्युग में भगवान् परशुरामजी हुए । 


 *विंशति कलियुग* के आदि में ३४५६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास गोतम ऋषि थे (गोतम न्यायदर्शन के प्रणेता ) ,उनके सहायक  शिवावतार जगद्गुरु अट्टहास हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए  कुणिकन्धर ,कबन्ध ,वर्वरि व सुमन्त । 


 *एकविंशति कलियुग* के आदि में ३०२४५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यास जी  वाचाश्रवा थे उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु दारुक थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए गौतम ,केतुमान् ,दर्भामणि व प्लक्ष । 


 *द्वाविंशति कलियुग* के आदि में २५९२५१२० वर्ष पूर्व शुष्ययण व उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु लाङ्गुली भीम हुए ,उनके प्रमुखं शिष


्य हुए श्वेतकेतु ,पिङ्ग ,मधु व भल्लवी । 


 *त्रविंशति कलियुग* के आदि में २१६०५१२० वर्ष पूर्व महर्षि तृणबिन्दु वेदव्यास जी थे (इन्हीं के दौहित्र महर्षि विश्रवा थे ) ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु श्वेत थे ,उनके शिष्य हुए कवि ,देवल ,बृहदश्व व उशिक । 


 *चतुर्विंशति कलियुग* के आदि में १७२८५१२० वर्ष पूर्व भगवान् वेद व्यास थे ऋषि यक्ष ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु शूली ,उनके प्रमुख शिष्य हुए शरद्वसु ,युवनाश्व ,अग्निवेश (धनुर्वेद के आचार्य -द्रोणाचार्य के गुरु) व शालिहोत्र ,इसी चतुर्युगी में वेदवेद्य जगदीश्वर श्रीरामभद्रका अवतार हुआ । 


 *पञ्चविंशति कलियुग* के आदि में  १२९६५१२० वर्ष पूर्व भगवान् व्यासके पद पर वसिष्ठ पुत्र शक्ति थे ,उनके सहायक शिवावतार मुण्डीश्वर हुए ,उनके प्रमुख शिष्य हुए प्रवाहक ,कुम्भाण्ड ,कुण्डकर्ण व छगल । 


 *षड्विंशति कलियुग* के आदि में ८६४५१२० वर्ष पूर्व शक्ति पुत्र पाराशर भगवान् वेदव्यास के पद पर थे (विष्णुपुराण के संकलनकर्ता)  ,उनके सहायक हुए शिवावतार जगद्गुरु सहष्णु ,उनके प्रमुख शिष्य हुए आश्वलायन (शौनक शिष्य आश्वलायन ऋग्वेद की एक सम्पूर्ण शाखा के प्रवर्तक हैं ),शम्बूक ,विद्युत व उलूक । 


 *सप्तविंशति कलियुग* के आदि में ४३२५१२० वर्ष पूर्व महर्षि जातूकर्ण वेदव्यास थे ,उनके सहायक शिवावतार जगद्गुरु सोमशर्मा थे ,उनके प्रमुख शिष्य हुए वत्स ,उलूक ,कुमार व अक्षपाद । 


 *अष्टविंशति कलियुग* के आदि में ५१२० वर्ष पूर्व ,जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम को अनाथ करके गोलोक धाम को गये ,भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी ने २८ वे वेदव्यास के पद पर रखकर महाभारत ग्रन्थ सहित १८ पुराणों व ब्रह्मसूत्र की रचना की व वेदोंका विभाजन किया ।  

२८वें भगवान्  वेदव्यास के सहायक शिवावतार जगद्गुरु  आदि शङ्कराचार्य जी ने अपने चार शिष्यों, श्रीपद्मपाद ,श्रीहस्तामलक,श्रीसुरेश्वर व श्रीतोटक को चतुष्पीठों पर जगद्गुरु कर रूप में ख्यापित किया।


जयति लोक शङ्कर: 🙏🙇🏻‍♂️

--- डो भुवन रावल 

नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

 नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

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ब्राह्ममुहूर्त में उठना

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धर्मशास्त्रानुसार ब्राह्ममुहूर्त में उठें । ‘सूर्योदय से पूर्व के एक प्रहर में दो मुहूर्त होते हैं । उनमें से पहले मुहूर्त को ‘ब्राह्ममुहूर्त’ कहते हैं । उस समय मनुष्य की बुद्धि एवं ग्रंथ रचना की शक्ति उत्तम रहती है; इसलिए इस मुहूर्त को ‘ब्राह्म’ की संज्ञा दी गई है ।


अ] ब्राह्ममुहूर्त का महत्त्व:--


‘इस काल में दैवी प्रकृति के निराभिमानी जीवों का संचार रहता है ।


यह काल सत्त्वगुणप्रधान रहता है । सत्त्वगुण ज्ञान की अभिवृद्धि करता है । इस काल में बुद्धि निर्मल एवं प्रकाशमान रहती है । `धर्म’ एवं `अर्थ’ के विषय में किए जानेवाले कार्य, वेद में बताए गए तत्त्व (वेदतत्त्वार्थ) के चिंतन तथा आत्मचिंतन हेतु ब्र्रह्ममुहूर्त उत्कृष्ट काल है।


इस काल में सत्त्वशुद्धि, कर्मरतता, ज्ञानग्राह्यता, दान, इंद्रियसंयम, तप, सत्य, शांति, भूतदया, निर्लोभता, निंद्यकर्म करने की लज्जा, स्थिरता, तेज एवं शुचिता (शुद्धता), ये गुण अपनाना सुलभ होता है ।’


इस काल में मच्छर, खटमल एवं पिस्सू क्षीण होते हैं ।


इस काल में अनिष्ट शक्तियों की प्रबलता क्षीण होती है ।


१. नींद से जागने पर सर्वसाधारणत : 

उबासियां क्यों आती हैं ?

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रात के समय जीव की देह में निर्मित हुई वायु प्रातःकाल जीव के मुख से बाहर निकलती है, इसलिए उबासियां आना : ‘सामान्यतः वायु मुख से बाहर निकलती है, अर्थात मुख वायुतत्त्व बाहर निकलने का द्वार है । जब हम बोलते हैं, तब जीव में सक्रिय सत्त्व-उत्प्रेरक वायु शब्दों के साथ निकलकर शब्द के सूक्ष्म स्वरूप को वायुधारणा की गति प्रदान करती है । (वायुधारणा की गति अर्थात वायुस्वरूप गति, उस प्रकार की गति; धारणा अर्थात क्षमता) रात के समय जीव की देह में निर्मित वायुमुख के माध्यमसे बाहर नहीं निकल पाती । इसलिए इस वायु का जीव की देह में संग्रह होता है । प्रातःकाल यह वायु जीव के मुखसे बाहर निकलती है, इसलिए इस काल में सर्वाधिक उबासियां आती हैं ।


२. नींद से जागने पर किए जानेवाले कृत्य

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अ》श्रोत्राचमन

---- विष्णु स्मरण

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नींद से जागते ही बिस्तर पर बैठकर श्रोत्राचमन करें ।‘पास में जल न हो, तो भी श्रोत्राचमन अवश्य करें ।’- गुरुचरित्र, अध्याय ३६, पंक्ति १२४


श्रोत्राचमन, अर्थात दाहिने कान को हाथ लगाकर भगवान श्रीविष्णु के ‘ॐ श्री केशवाय नमः ।’ … ऐसे २४ नामों का उच्चारण करें । आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम, अनिल आदि सभी देवताओं का वास दाहिने कान में रहता है, इसलिए दाहिने कान को केवल दाहिने हाथ से स्पर्श करने से भी आचमन का फल प्राप्त होता है । आचमन से अंतर्शुद्धि होती है ।


आ》   श्लोकपाठ

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----- श्री गणेशवंदना

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वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।


अर्थ : दुर्जनों का विनाश करनेवाले, महाकाय (शक्तिमान), करोडों सूर्यों के तेज से युक्त (अतिशय तेजःपुंज) हे श्री गणेश, मेरे सर्व काम सदैव बिना किसी विघ्नके (निर्विघ्नरूपसे) संपन्न होने दें ।

                     

देवता वंदना

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ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारिर्भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।

गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।।


अर्थ : निर्माता ब्रह्मदेव; पालनकर्ता एवं ‘मुर’ नामक दानव का वध करनेवाले श्रीविष्णु; संहारक एवं ‘त्रिपुर’ राक्षस का वध करनेवाले शिव, ये प्रमुख तीन देवता तथा सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु, ये नवग्रह मेरी प्रभात को शुभ बनाएं ।


पुण्य पुरुषों का स्मरण

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पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः ।

पुण्यश्लोको विदेहश्च पुण्यश्लोको जनार्दनः ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक १


अर्थ : पुण्यवान नल, युधिष्ठिर, विदेह (जनक राजा) तथा भगवान जनार्दन का मैं स्मरण करता हूं ।


सप्त चिरंजीवों का स्मरण

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अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च बिभीषणः ।

कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक २


अर्थ : द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, दानशील बलिराजा, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य एवं पृथ्वी को इक्कीस बार दुर्जन क्षत्रियों से निःशेष करनेवाले परशुराम, ये सात चिरंजीवी हैं । (मैं इनका स्मरण करता हूं ।)


पंचमहासतियों का स्मरण

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अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा ।

पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक ४


अर्थ : गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती एवं रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच महासतियों का जो मनुष्य स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं ।


टिप्पणी – यह श्लोक उच्चारित करते समय कुछ लोग ‘पञ्चकन्या स्मरेन्नित्यम्…’ कहते हैं, जो अनुचित है । ‘पञ्चक’ अर्थात पाच लोगों का समूह तथा ‘ना’ अर्थात मनुष्य; इसलिए ‘पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यम्’ का अर्थ होता है ‘मनुष्य इन पांच स्त्रियों के समूह का स्मरण करे’ ।


सात मोक्षपुरियों का स्मरण

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अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ।। 

– नारदपुराण, पूर्वभाग, पाद १, अध्याय २७, श्लोक ३५


अर्थ : अयोध्या, मथुरा, मायावती (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारका, मोक्ष प्रदान करनेवाली सात नगरियां हैं । इनका मैं स्मरण करता हूं ।


प्रातः स्मरण किये जाने वाली पांच महासतियो समेत, सात मोक्षपूरियो व अन्य का विवरण


पंचमहासतियों का स्मरण

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अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा ।

पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।। 

– पुण्यजनस्तुति, श्लोक ४


अर्थ : गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती एवं रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच महासतियों का जो मनुष्य स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं ।


टिप्पणी – यह श्लोक उच्चारित करते समय कुछ लोग ‘पञ्चकन्या स्मरेन्नित्यम्…’ कहते हैं, जो अनुचित है । ‘पञ्चक’ अर्थात पाच लोगों का समूह तथा ‘ना’ अर्थात मनुष्य; इसलिए ‘पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यम्’ का अर्थ होता है ‘मनुष्य इन पांच स्त्रियों के समूह का स्मरण करे’ ।


सात मोक्षपुरियों का स्मरण

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अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ।। 

– नारदपुराण, पूर्वभाग, पाद १, अध्याय २७, श्लोक ३५


अर्थ : अयोध्या, मथुरा, मायावती (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारका, मोक्ष प्रदान करनेवाली सात नगरियां हैं । इनका मैं स्मरण करता हूं ।


🤲.. करदर्शन

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दोनों हाथों की अंजुलि बनाकर उस पर मन एकाग्र कर निम्नांकित श्लोक उच्चारित करें ।


कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।

करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ।।


अर्थ : हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का, मध्य में सरस्वती एव मूल में गोविंद का वास है; इसलिए प्रातः उठते ही हाथ के दर्शन करे’ ।


हाथों की अंजुलि से ब्रह्ममुद्रा बनाना, इससे देह की सुषुम्ना नाडी सक्रिय होना तथा रात भर निद्रा के कारण देह में निर्मित हुए तमोगुण के उच्चाटन में यह सहायक होना : ‘हाथों की अंजुलि बनाकर उस पर मन एकाग्र कर ‘कराग्रेवसते लक्ष्मीः …’ यह श्लोक पाठ करने से ब्रह्मांड की देवत्वजन्य तरंगें अंजुलि की ओर आकृष्ट होती हैं । ये तरंगें अंजुलि में ही घनीभूत होती हैं । अंजुलि रूपी रिक्ति में आकाश रूपी व्यापकत्व लेकर वे मंडराती रहती हैं । हाथों की अंजुलि में ब्रह्ममुद्रा निर्मित होती है तथा देह की सुषुम्ना नाडी सक्रिय होती है । यह नाडी जीव की आध्यात्मिक उन्नति के लिए पोषक है । यदि रात भर की तमोगुणी निद्रा के कारण देह में तमोगुण का संवर्धन हुआ हो, तो सुषुम्ना की जागृति उसका उच्चाटन करने में सहायक होती है ।’


ई. भूमिवंदना

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‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः …’ श्लोक पाठ के उपरांत भूमि से प्रार्थना कर, यह श्लोक बोल कर, तदुपरांत भूमि पर पैर रखें ।


समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ।।


अर्थ : समुद्र रूपी वस्त्र धारण करनेवाली, पर्वत रूपी स्तनवाली एवं भगवान श्रीविष्णु की पत्नी  हे पृथ्वीदेवी, मैं आपको नमस्कार करता हूं । आपको  पैरों का स्पर्श होगा, इसके लिए आप हमें क्षमा करें ।


रात्रिकाल में तमोगुण प्रबल होता है । ‘भूमि से प्रार्थना कर ‘समुद्रवसनेदेवि…’ श्लोक कहकर भूमि पर पैर रखने से, रात्रिकाल में देह में फैले कष्टदायक स्पंदन भूमि में विसर्जित होने में सहायता मिलती हैं ।’


संदर्भ पुस्तक : सनातन का सात्विक ग्रन्थ ‘आदर्श दिनचर्या (भाग १) स्नानपूर्व आचार एवं उनका अध्यात्मशास्त्रीय आधार‘

Sunday, April 19, 2026

क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप ?

 🔸️ क्यों नही करनी चाहिए महिलाओं को गायत्री मन्त्र का जाप❓️

🔸️ क्यों वेद में वर्जित किया है ❓️

🔸️ स्त्री के लिए गायत्री मंत्र जाप❓️


🔹️ समझते हैं आज इस बात के संदर्भ के लॉजिक को संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के माध्यम से :👉


ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली एवं अत्यंत तीव्र वेग ॐ शब्द ही केवल इस शब्द है जो बिना जिव्हा के भी उच्चारण होता है।


जब कुछ व्यवस्थित शब्दों के समूह को ॐ के साथ जोड़ कर उच्चारित किया जाता है तब उसे मन्त्र की संज्ञा दी जाती है।


शास्त्रो में मन्त्रो की ऊर्जा के नियंत्रित अथवा अनियंत्रित वेग होते हैं,जिनका जाप अथवा ॐ शब्द हमारे नाभि चक्र को स्ट्रोक करता है। जिससे उस मन्त्र की ऊर्जा हमारे शरीर के सात चक्रों से हो कर ब्रह्मांड में उस शक्ति को सूचना देती है। जिसका हम जाप करते हैं।


गायत्री मंत्र एक अत्यंत ऊर्जा एवं तीव्र वेग मन्त्र  है। 

उसमे ॐ के तीव्र वेग ओर ऊर्जा के साथ सम्पुटित हो गायत्री मंत्र का वेग एवं ऊर्जा ओर तीव्र बन जाती है।

लगातार इसे जाप करने से यह नाभि चक्र को बार बार स्ट्रोक करती है।


वह नाभि जो स्त्री के अंदर गर्भाशय से जुड़ी होती है बार बार इतने तीव्र ऊर्जा के मन्त्र के जाप से नाभि स्ट्रोक होती है जिसके कारण गर्भाशय को नुकसान होने की आशंका बनती जाती है जो कि एक स्त्री के लिए सबसे विशेष विषय है इसलिए गायत्री जप स्त्रियों को वर्जित किया गया है।


दूसरा कारण स्त्री का मासिक धर्म है जिस समय शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा उधोमार्गी हो जाती है और यदि गायत्री मन्त्र जैसी तीव्र ऊर्जा शरीर मे हो तो वह उस मासिक धर्म के वक़्त उधोमार्गी होती ऊर्जा से टकराती है जिससे स्वास्थ्य सम्बधी  बहुत सी परेशानियो जैसे migrain, mantly डिसऑर्डर, पित्त, से सम्बंधित अन्य अनेक समस्याए पैदा होने लगती हैं।


इस लिए वेद में स्त्री को गायत्री जाप करना अथवा ॐ सम्पुटित कोई अन्य मन्त्र भी जाप करना वर्जित किया गया है।


गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है वृक्षो में में पीपल ओर मन्त्रो में मैं गायत्री हूँ। 


परन्तु हर मन्त्र की एक विशेष ऊर्जा होती है जिसे हर एक इंसान नही सम्भाल सकता ऐसे ही सामान्य पुरुषों के लिए भी मन्त्र के कुछ विशेष प्रकार वर्जित हैं वह मन्त्र जो विशेष तरीके से आगे और पीछे सम्पुटन कर बनाये गए हैं उनके तीव्र वेग के लिए।


!! नारायण !!

ब्रह्मचर्य

 


🌟  ब्रह्मचर्य  🌟 


ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:- ब्रह्म + चर्य , अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन बिताना।


शुभ विचार से वीर्य रक्षण करते हुए सात्विक जीवनचर्या अपनाना


ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह ०-२५ वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरुरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरुरी ब्रह्मचर्य है। वेद का उपदेश है - ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर कन्या युवा पति को प्राप्त करे ।आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आए हैं क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुखो की प्राप्ति कर सकते हैं।ब्रह्मचर्य पालन करने का सबसे आसान साधन सिद्धासन करना है।इसे करने के लिए बाए पैर की ऐड़ी को गुड्डा द्वार और लिंग के मध्य स्थित करना होता है तथा से पैर की ऐड़ी को ठीक लिंग के ऊपर रखना होता है।


योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं - यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।


 ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ 


अर्थात् वेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं ; रागरहित यत्नशील जिसमें प्रवेश करते हैं ; जिसकी इच्छा से ( साधक गण ) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उस पद ( लक्ष्य ) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।


 भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य को शारीरिक तप बताया है - ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।।

 (श्रीमद्भागवतगीता १७/१४)


आयुर्वेद में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य शरीर के तीन स्तम्भों में से एक प्रमुख स्तम्भ (आधार) है।


त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।


(तीन उपस्तम्भ हैं। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य।)


सुश्रुत में तो स्त्रियों को पुरूष रोगी के पास फटकने का भी निषेध किया है , क्योंकि इनके दर्शन से यदि रोगी में वीर्य नाश हो जाय , तो बहुत हानि करता है ।


महर्षि सुश्रुत कहते हैं - रक्तं ततो मांस मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भवः ॥


 अर्थात् - मनुष्य जो कुछ भोजन करता है वह पहिले पेट में जाकर पचने लगता है फिर उसका रस बनता है , उस रस का पाँच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है । रक्त का भी पाँच दिन पाचन होकर उससे मांस बनता है । इस प्रकार पाँच - पाँच दिनके पश्चात् मांस से मेद , मेद से हड्डी , हड्डी से मज्जा और अन्त में मज्जा से सप्तम सार पदार्थ वीर्य बनता है । यही वीर्य फिर ' ओजस् ' रूपमें सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम अति शुद्ध सार पदार्थ को रज कहते हैं ।


भगवान धन्वन्तरि कहते हैं - 

मृत्युव्याधिजरानाशी पीयूष परमौषधम् । 

ब्रह्मचर्य महदरतन सत्यमय वदाम्यहम् ॥ 


अर्थात् अर्थात सभी रोगों , वृद्धावस्था और मृत्यु को नष्ट करने के लिए केवल ब्रह्मचर्य ही महान औषधि है । मैं सच बोल रहा हूँ । यदि आप शांति , सौंदर्य , स्मृति , ज्ञान , स्वास्थ्य और अच्छे बच्चे चाहते हैं , तो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।


ब्रह्मचारीसूक्त


अथर्ववेद का ग्यारहवें काण्ड का पाँचवाँ सूक्त ब्रह्मचर्य्य के लिये ही समर्पित है। इसमें तरह-तरह से ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णित है।


ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।

स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥ --


 (अथर्ववेद ११.५.१७)

अर्थ-- जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है।


ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।

गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥ 


-- (अथर्ववेद ११.५.१८)

अर्थ-- वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।


ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।

आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥


 -- (अथर्ववेद ११.५.१९)

अर्थ-- पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है ll 


ब्रह्मचर्य के लाभ 


ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।

ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढाता है।

ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।

ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।

ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।

ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।

--- संकल्प रामराज्य सेव ट्रस्ट 

परशुराम और #विज्ञान..

 #परशुराम और #विज्ञान...क्या आप उस योद्धा को जानते हैं जिसने 21 बार पृथ्वी को 'रिसेट' किया, पर कभी खुद के लिए एक इंच जमीन नहीं मांगी? क्या आप उस महानायक की शक्ति को पहचानते हैं, जिसने सत्ता के अहंकार को कुचलने के लिए 'सर्जिकल स्ट्राइक' की, लेकिन अपना पूरा साम्राज्य एक पल में दान कर दिया? दुनिया ने उन्हें 'क्रूर' कहा, इतिहास ने 'जातिवादी' का ठप्पा लगाया, लेकिन सच यह है कि हम आज भी उस 'कॉस्मिक कोड' को नहीं पढ़ पाए जो परशुराम जी ने अपने फरसे (परशु) की नोंक पर लिखा था। आज उनके जन्मोत्सव पर, आइए उन रहस्यों से पर्दा उठाते हैं जिन्हें समझने की हिम्मत सदियों से किसी ने नहीं की।


आज परशुराम जन्मोत्सव है। उस परम तेजस्वी, अजेय योद्धा का दिन, जिन्हें हम 'विष्णु के अवतार' के रूप में पूजते हैं। लेकिन क्या हम सचमुच उन्हें जानते हैं? या हम केवल उस अधूरी और विकृत कहानी को जानते हैं जो सदियों से हमें सुनाई जा रही है?


एक समय ऐसा आया था जब राजाओं ने अपनी तलवारें अपनी ही प्रजा पर तान दी थीं। जब एक क्षत्रिय 'रक्षक' न रहकर 'भक्षक' बन जाए, तो वह 'क्षत्रिय' नहीं रहता, वह सिर्फ एक 'खतरा' बन जाता है। परशुराम जी ने उन्हें 'क्षत्रिय' के तौर पर नहीं, बल्कि 'खतरे' के तौर पर काटा।

उन्होंने अपना परशु उठाया और 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू की। उन्होंने किसी जाति को नहीं मिटाया, उन्होंने उस 'पावर-करप्शन' (सत्ता के भ्रष्टाचार) को खत्म किया जो मानवता की नींव को गला रहा था।


आइए, आज उस ' नैरेटिव' को ध्वस्त करते हैं जिसने भगवान परशुराम को केवल एक क्रोधी और 'क्षत्रिय-विनाशक' के रूप में सीमित कर दिया। आज हम शास्त्रों के उन गुप्त तहखानों में उतरेंगे और उन श्लोकों की कोडिंग को डिकोड करेंगे, जिन्हें आज तक कोई सही से खोल नहीं पाया है। यह कहानी पानी की तरह बहेगी, और आपको आनंद के महासागर में डुबो देगी।


श्रीमद् भागवत महापुराण में

वह श्लोक, जो अक्सर गलत संदर्भ में उद्धृत किया जाता है, वह यह है:


त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवीं कृत्वा नि:क्षत्रियां प्रभु:।

समन्तपंचके चक्रे शोनितोदान् हदान् नृप ॥

(श्रीमद्भागवत महापुराण, ९.१६.१९)


सतही अर्थ (जिसे सब जानते हैं): प्रभु (परशुराम) ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) में खून के पाँच कुण्ड बना दिए।

यह वह नैरेटिव है जो हमें डराता है, जो परशुराम जी को एक निर्दयी हत्यारा बनाता है। लेकिन, क्या यह सत्य है? क्या भगवान विष्णु का एक अवतार ऐसा कर सकता है? कतई नहीं! यह 'शाब्दिक अर्थ' है, 'भावार्थ' नहीं। आइए, इस श्लोक की 'कोडिंग' को डिकोड करें और एक उनका  वास्तविक चेहरा देखें।


अब सत्य समझिए 

'नि:क्षत्रियां' का अर्थ "क्षत्रिय जाति का खात्मा" नहीं, बल्कि "अहंकारी सत्ता का खात्मा" है।

इसे एक उदाहरण से समझिए।  'क्षत्रिय' का असली अर्थ 'पद' है, न कि 'जाति'

उस समय 'क्षत्रिय' का अर्थ था 'शासक वर्ग' (Governing Class)। जिसका धर्म था—प्रजा की रक्षा करना और न्याय करना। जब तक वे न्याय करते थे, वे क्षत्रिय थे। लेकिन जैसे ही वे अहंकारी होकर प्रजा को लूटने लगे, वे अपने 'क्षत्रिय धर्म' से गिर गए। उन्होंने क्षत्रिय होने का हक खो दिया।


'नि:क्षत्रियां' का मतलब क्या?

परशुराम जी ने 'नि:क्षत्रियां' किया, इसका मतलब है—"पृथ्वी को उन अधर्मी शासकों से मुक्त किया जो क्षत्रिय होने की मर्यादा भूल चुके थे।"  जैसे कोई डॉक्टर कहे कि "मैं इस शरीर को कैंसर-मुक्त कर दूँगा," तो क्या इसका मतलब यह है कि वह शरीर को ही मार देगा? नहीं! वह केवल 'कैंसर' (अधर्मी शासकों) को काटेगा ताकि शरीर (समाज) बच सके। परशुराम जी ने वही किया। उन्होंने 'भ्रष्ट सत्ता' को हटाया ताकि 'धर्म' जीवित रह सके।


वामपंथी इसे 'जाति युद्ध' कहते हैं। आप उनसे बस ये 3 सवाल पूछिए, उनका नैरेटिव उसी पल ध्वस्त हो जाएगा:

सवाल 1 अगर यह जाति युद्ध होता, तो परशुराम जी ने 'भीष्म पितामह' और 'द्रोणाचार्य' जैसे क्षत्रियों और ब्राह्मणों को अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य क्यों बनाया? क्या कोई जातिवादी दुश्मन को विद्या सिखाता है?


सवाल 2 यदि वे 'क्षत्रिय विरोधी' होते, तो वे युद्ध जीतने के बाद खुद राजा क्यों नहीं बने? उन्होंने पूरी पृथ्वी दान कर दी और तपस्वी बन गए। एक 'सत्ता-लोभी' व्यक्ति ऐसा कभी नहीं करेगा।


सवाल 3: क्या 'राम' क्षत्रिय नहीं थे? परशुराम जी ने तो अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। जो व्यक्ति क्षत्रियों को मिटाना चाहता था, वह एक क्षत्रिय राजा को अपनी सबसे बड़ी शक्ति (धनुष) क्यों सौंपता?


'नि:क्षत्रियां' का मतलब है—"जब राजधर्म विफल हो जाए, तो अधर्मियों को सत्ता से उखाड़ फेंकना ही धर्म है।"

परशुराम जी ने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह 'धर्म' (न्याय) से ऊपर नहीं है। उन्होंने क्षत्रिय को नहीं मारा, उन्होंने 'अधर्म' को मारा। 'नि:क्षत्रियां' का अर्थ है—अन्यायी शासक विहीन पृथ्वी।


कल्पना कीजिए एक ऐसे योद्धा की, जिसके हाथ में केवल एक 'परशु' (फरसा) है, लेकिन उसकी आँखें 'काल' (Time) के उस पार देख रही हैं। वह न तो राजा बनना चाहता है, न उसे सिंहासन का लोभ है। वह सिर्फ एक 'सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर' है, जो इस ब्रह्मांड के 'अधर्म' नामक वायरस को डिलीट करने आया है।


सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि उस काल में 'क्षत्रिय' कोई 'जाति' नहीं थी। यह एक 'वर्ण' था, एक 'कर्तव्य' था—समाज की रक्षा करना। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो क्या वह 'क्षत्रिय' कहलाने लायक रहता है?


यह कोई नरसंहार नहीं था। यह एक 'सिस्टम रिबूट' था।

उस समय के शासक, राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसके वंशज, सत्ता के अहंकार में चूर होकर आम जनता पर अत्याचार कर रहे थे। उन्होंने निर्दोष तपस्वी ऋषियों की हत्या की (जैसे परशुराम जी के पिता, महर्षि जमदग्नि), कामधेनु गाय का अपहरण किया। यह एक 'अराजक सत्ता' थी।


परशुराम जी ने 21 बार पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका मतलब यह है कि उन्होंने 21 बार उन अहंकारी, अत्याचारी राजाओं को सत्ता से बेदखल किया। यह किसी वंश या जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अधर्मी सत्ता' का विनाश था। जब एक सॉफ्टवेयर करप्ट हो जाता है, तो आपको उसे 'डिलीट' करके 'सिस्टम रिबूट' करना पड़ता है। परशुराम जी उस काल के 'चीफ आर्किटेक्ट' (Chief Architect) थे, जिन्होंने करप्टेड सत्ता-सॉफ्टवेयर को 'डीबग' (Debug) किया।


क्यों 21 बार? यह एक गहरा रहस्य है। 21 का अंक 'पूर्णता' और 'चक्र' को दर्शाता है। यह 7 लोक और 3 गुणों (सत्व, रज, तम) का गुणांक है (7x3=21)। उन्होंने मानवीय चेतना की 21अवस्थाओं को 'अधर्म' के प्रभाव से मुक्त किया।

यह एक 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' (Genetic Engineering) की तरह था। उन्होंने समाज के 'डीएनए' से उस 'अहंकार और अत्याचार' के वायरस को काट कर निकाला जो मानवता को नष्ट कर रहा था। यह एक 'कोडिंग' थी, जो तब तक चलती रही जब तक कि पृथ्वी का 'नैतिक ढांचा' (Moral Framework) फिर से शुद्ध नहीं हो गया।


खून के कुंड का वर्णन एक रूपक (Metaphor) है। यह कोई रक्तपात का जश्न नहीं था, बल्कि एक 'कॉस्मिक बैलेंसिंग' (Cosmic Balancing) थी।

कुरुक्षेत्र (समन्तपंचक) की धरती उस नकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन चुकी थी, जो हजारों सालों के अधर्म से जमा हुई थी। परशुराम जी ने वहां उन अहंकारी राजाओं के 'भौतिक शरीर' को विसर्जित किया। यह उनके 'अहंकार की ऊर्जा' का भूमि में विसर्जन था। रक्त, जो प्राण-ऊर्जा (Prana Energy) का वाहक है, वह मिट्टी में मिलकर उस भूमि को 'शुद्ध' कर गया। उन्होंने उस जमीन को 'जीरो-पॉइंट एनर्जी' (Zero-Point Energy) के क्षेत्र में बदल दिया ताकि वह आने वाले युद्धों और परिवर्तनों के लिए एक तटस्थ आधार बन सके।


अब बात करते है 'अब्रह्मण्य' शब्द की। 

आज के समय का सबसे बड़ा 'गलतफहमी का शिकार' शब्द है। वामपंथी और बांटने वाली विचारधारा के लोगों ने इसे जानबूझकर एक 'जातिगत गाली' की तरह पेश किया, ताकि लोग असली अर्थ न समझें।

इसे एकदम सीधी, पानी जैसी साफ भाषा में समझते हैं।

'अब्रह्मण्य' = 'धर्म' का विरोधी (Anti-Dharma)

संस्कृत में 'ब्रह्म' शब्द के कई अर्थ होते हैं, जिनमें से एक मुख्य अर्थ है—'शाश्वत नियम' या 'धर्म'। 'अब्रह्मण्य' का अर्थ हुआ—वह जो 'धर्म' या 'न्याय' के नियमों को नहीं मानता।

इसे ऐसे समझे।


ब्राह्मण क्या है? जो ब्रह्म (सत्य और धर्म) को धारण करे।


वामपंथी कहते हैं कि "अब्रह्मण्य का अर्थ है—जो ब्राह्मण न हो, यानी एक जाति के विरुद्ध हिंसा।"

सही सत्य: यह शब्द जाति के लिए नहीं, 'कर्म' और 'स्वभाव' के लिए है।


इसे एक उदाहरण से समझें:

मान लीजिए एक 'पुलिस अधिकारी' (क्षत्रिय) है। उसका काम है रक्षा करना।

अगर वह अपनी वर्दी पहनकर किसी निर्दोष की हत्या कर दे, तो वह 'अब्रह्मण्य' हो गया—यानी वह 'न्याय और धर्म' के विरुद्ध हो गया।

उसने अपनी वर्दी (क्षत्रिय कर्म) को दागदार कर दिया है।

परशुराम जी ने 'क्षत्रिय' को नहीं मारा, उन्होंने 'अब्रह्मण्य' (अधर्मी कृत्य करने वाले) को दंडित किया।


 'अब्रह्मण्य' एक 'स्टेटस' है, जाति नहीं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी कुल में जन्मा हो, यदि वह 'सत्य' और 'न्याय' (ब्रह्म) का विरोध करता है, तो वह 'अब्रह्मण्य' है। परशुराम जी का संघर्ष 'जाति' से नहीं, उस 'अधर्मी स्वभाव' से था जो समाज को नष्ट कर रहा था।


परशुराम जी के शिष्य खुद 'भीष्म'  थे। अगर 'अब्रह्मण्य' का अर्थ 'क्षत्रिय-विरोधी' होता, तो क्या वे क्षत्रियों को अपना ज्ञान देते? बिल्कुल नहीं! इससे साफ होता है कि उनका विरोध 'क्षत्रिय जाति' से नहीं, बल्कि 'अन्यायी सत्ता' से था।


शास्त्रों में 'अब्रह्मण्य' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए हुआ है जो 'पर-पीड़क' (दूसरों को कष्ट देने वाले) थे। परशुराम जी ने उन्हें उनकी जाति के कारण नहीं, बल्कि उनके 'पाप' के कारण दंडित किया।


"अब्रह्मण्य का अर्थ 'गैर-ब्राह्मण' नहीं, बल्कि 'अधर्मी' होता है। जो धर्म के नियमों को तोड़े, वह अब्रह्मण्य है—चाहे वह कोई भी हो। परशुराम जी ने जाति का विनाश नहीं किया था, उन्होंने 'अधर्म' की सत्ता को उखाड़ा था।"


 गलत व्याख्या की जाती है।

अर्थ: 'ब्रह्मण्य' का अर्थ है—जो ब्राह्मणत्व (सत्य, धर्म, त्याग) को धारण करे। 'अब्रह्मण्य' वह है जो इन मूल्यों के विरुद्ध हो।

 परशुराम ने उन 'क्षत्रिय-वेशधारी अधर्मियों' का नाश किया जो 'अब्रह्मण्य' हो चुके थे। यानी, वे क्षत्रिय तो थे, लेकिन उनमें क्षत्रिय के गुण (रक्षा, धर्म, मर्यादा) समाप्त हो चुके थे। वे मात्र 'शोषक' बन गए थे। परशुराम ने उन्हें उनके 'गुणों के अभाव' के कारण दंडित किया, न कि उनके 'जन्म' के कारण।


इस वृत्तांत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं—भगवान परशुराम का भगवान राम को अपना धनुष सौंपना।


यदि परशुराम का उद्देश्य क्षत्रियों का विनाश ही होता, तो वे राम (जो एक क्षत्रिय राजा थे) का सम्मान क्यों करते? उन्होंने अपना धनुष राम को इसलिए सौंपा क्योंकि उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया था कि अब पृथ्वी पर ऐसा 'राज्य' (राम राज्य) स्थापित होने जा रहा है, जहाँ कोई 'अधर्म' नहीं होगा।उन्होंने ही राम-राज्य का मार्ग प्रशस्त किया हां। उन्होंने अपना धनुष भगवान राम को सौंप दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया था। उन्होंने 'गंदगी' साफ कर दी थी ताकि 'राम-राज्य' की नींव रखी जा सके।


परशुराम 'विनाश' नहीं, 'संसाधन' थे। जब समाज में 'कैंसर' (अधर्म) फैल जाता है, तो उसे काटकर निकालना पड़ता है (परशुराम की भूमिका), ताकि 'आरोग्य' (राम राज्य) का जन्म हो सके।


 यह वह साधारण मानव नहीं है जो 'मार-काट' करता है। यह वह आवेश-अवतार है जो 'न्याय' (Justice) की रक्षा के लिए अपनी सर्वोच्च शक्ति का उपयोग करता है।


यदि वे सत्ता के लोभी होते, तो वे खुद राजा बनकर राज करते। लेकिन उन्होंने क्या किया? उन्होंने पूरी पृथ्वी जीती और उसे ऋषियों को दान कर दिया। है कोई ऐसा

 अपनी जीती हुई पूरी दुनिया दान कर देता है? यह उनका सबसे बड़ा 'सुपर-पावर' था—त्याग!


मेरिट' (योग्यता) के पूजक हैं परशुराम, जाति के नहीं। उनके सबसे प्रिय शिष्यों में 'भीष्म' और 'द्रोण' जैसे महान योद्धा थे—जो जन्म से क्षत्रिय और ब्राह्मण थे। उन्होंने 'श्रेष्ठता' को चुना, 'कुल' को नहीं।


 वे 'अष्ट चिरंजीवियों' में से एक हैं। क्यों? क्योंकि 'न्याय' कभी नहीं मरता। वे आज भी जीवित हैं, क्योंकि वे 'न्याय की शाश्वत ऊर्जा' (Justice Frequency) हैं, जो तब तक सक्रिय रहती है जब तक कि पृथ्वी पर अधर्म का अंत न हो जाए।


सत्य यह है: उस काल में न कोई ब्राह्मण जाति थी, न क्षत्रिय—ये केवल 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर विभाजित 'व्यवस्था के स्तंभ' थे।

वह सत्य जो सदियों से छिपाया गया: 'जाति' नहीं, 'गुण' का संघर्ष था। 

पुराणों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि परशुराम का संघर्ष किसी जन्म-आधारित जाति का नहीं, बल्कि 'गुणों के पतन' का था। इसे एक कहानी की तरह समझिए। 


उस युग में 'ब्राह्मण' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो ज्ञान, त्याग और नैतिकता का रक्षक हो। और 'क्षत्रिय' का अर्थ था—वह व्यक्ति जो शक्ति, रक्षा और न्याय का वाहक हो।

जब एक क्षत्रिय 'अन्यायी' हो जाता था, तो वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता था।

परशुराम जी ने उन लोगों को दंडित नहीं किया जो 'क्षत्रिय' कुल में जन्मे थे, बल्कि उन लोगों को 'सिस्टम' से बाहर किया जो 'न्याय' के पद पर बैठकर 'अन्याय' कर रहे थे।


कल्पना कीजिए, एक समाज में दो मुख्य सॉफ्टवेयर चल रहे हैं। एक 'ज्ञान का' और दूसरा 'न्याय का'। जब 'न्याय का सॉफ्टवेयर' (सत्ता/क्षत्रिय) करप्ट हो जाता है, तो समाज में अराजकता फैलती है।


 पृथ्वी को 'नि:क्षत्रिय' किया—इसका अर्थ किसी जाति का नरसंहार नहीं था। इसका अर्थ था—उस काल के 'भ्रष्ट शासन तंत्र' को रिसेट करना।  उन्होंने उन शासकों को सत्ता से बेदखल किया जिन्होंने अपना 'धर्म' (कर्तव्य) छोड़कर 'स्वार्थ' को अपना लिया था। यह एक 'सिस्टम क्लीन-अप' था, ताकि समाज की नींव फिर से 'सत्व' (पवित्रता) पर टिकी रहे।


जिस तरह आज का 'डीबगर' सॉफ्टवेयर के कोड में आई त्रुटि को काट कर अलग कर देता है, ताकि पूरा सिस्टम क्रैश न हो, परशुराम जी का 'परशु' वही कार्य कर रहा था। उस काल में सत्ता (क्षत्रियों) का अहंकार 'सिस्टम एरर' बन चुका था। यह फरसा नहीं, बल्कि एक 'कॉस्मिक सर्जरी' का टूल था, जो समाज की विकृतियों को जड़ से काटने के लिए इस्तेमाल हुआ।


यह कोई रक्तपात की गिनती नहीं, बल्कि 'इवोल्यूशनरी रिसेट' (Evolutionary Reset) है।

भौतिक विज्ञान में 'रेजोनेंस' (Resonance) का सिद्धांत होता है। जब एक सिस्टम अपनी फ्रीक्वेंसी खो देता है, तो उसे बार-बार ट्यून करना पड़ता है। परशुराम जी ने 21 बार उस 'सामाजिक फ्रीक्वेंसी' को ट्यून किया ताकि समाज के 'डीएनए' से अधर्म का वायरस निकल जाए। जब तक समाज 'सत्व' (शुद्धता) के स्तर पर नहीं आ गया, तब तक यह प्रक्रिया चलती रही। यह 'एंट्रोपी' (Chaos) को कम करने का एक 'थर्मोडायनामिक प्रयोग' था।


कल्पना कीजिए कि किसी राज्य में पुलिस (क्षत्रिय) ही लुटेरी बन जाए और वे उस व्यक्ति (ऋषि/विद्वान) की हत्या कर दें जो समाज को ज्ञान और नैतिकता सिखाता है।

दिक्कत यह थी। क्षत्रिय वर्ग ( यानी तत्कालीन  शासक वर्ग वर्ण व्यवस्था वाले) यह भूल गया था कि उनकी तलवार 'रक्षा' के लिए है, न कि 'दमन' के लिए।

परिणाम: जब रक्षा करने वाला ही भक्षक बन जाए, तो समाज में अराजकता (Anarchy) फैल जाती है। परशुराम जी ने जो किया, वह एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' थी।


परशुराम जी ने 'इक्कीस बार' का जो उल्लेख है, वह एक 'सिस्टम रिबूट' (System Reboot) की प्रक्रिया है।

जब भी कोई शासक (राजा) भ्रष्ट हो जाता, परशुराम जी उसे सत्ता से हटा देते।

यह किसी जाति का विनाश नहीं था, बल्कि 'अहंकारी सत्ता' का विनाश था। यह बिल्कुल वैसा है जैसे एक माली खरपतवार (Weeds) को उखाड़ता है ताकि मुख्य फसल (धर्म) बच सके।


'रक्त की नदी' का अर्थ केवल खून बहाना नहीं है, बल्कि यह एक 'चेतावनी' (Deterrence) है। उस दौर की भाषा में, यह एक ऐसा 'स्टैंडर्ड' सेट करना था कि आगे आने वाला कोई भी शासक यह सोचे कि यदि उसने प्रजा या धर्म के विरुद्ध तलवार उठाई, तो उसका हश्र क्या होगा। यह भय पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा बनाए रखने के लिए था।


गलत नैरेटिव (जो फैलाया गया) की 

परशुराम ने क्षत्रियों को मारा। वास्तविक सत्य (जो इतिहास है) परशुराम ने 'अधर्मी' शासकों को दंड दिया।


यह ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय था। नहीं यह 'अधर्म' बनाम 'न्याय' था।


यह एक जातिवादी कृत्य था। नहीं यह एक 'सिस्टम करेक्शन' (System Correction) था।


परशुराम क्रूर थे। बिल्कुल नहीं परशुराम 'मर्यादा रक्षक' थे।


वामपंथी नैरेटिव हमें यह बताना चाहता है कि परशुराम ने 'खून' बहाया, लेकिन वे यह छुपा जाते हैं कि उस खून के बदले उन्होंने 'शांति' और 'धर्म' का युग दिया। अगर वे ऐसा न करते, तो समाज में कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बचती। परशुराम जी इतिहास के वे पहले 'सुधारक' हैं जिन्होंने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, धर्म (न्याय) से बड़ी नहीं हो सकती।


आज, जब हम परशुराम जयंती मना रहे हैं, तो हमें उस 'गलत नैरेटिव' को हमेशा के लिए जला कर रख देना चाहिए।


परशुराम 'क्रूर' नहीं थे, वे 'न्याय' की अंतिम सीमा थे।


वे क्षत्रिय-विरोधी नहीं थे, वे 'अधर्म' के विरोधी थे।


वे एक ''काल-प्रहरी' हैं, जिन्होंने सत्ता को नहीं, बल्कि समाज के 'संस्कार' को बचाया।


यह सत्य सिर्फ बीते हुए कल की नहीं है, यह 'आने वाले न्याय के भविष्य' की है। जब भी समाज में अत्याचार और अहंकार की पराकाष्ठा होगी, 'परशुराम-चेतना' का वह 'परशु' (न्याय का विधान) फिर से जागृत होगा।

आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है। संकल्प लें कि हम भी अपने जीवन में 'परशुराम' बनें—जहाँ न कोई जाति बड़ी है, न कोई कुल; केवल 'धर्म' (न्याय, सत्य, और कर्तव्य) ही सर्वोच्च है।

जय परशुराम! जय सत्य की!


आज, जब समाज में फिर से 'अधर्म' अपना सिर उठाता है, तो हमें परशुराम के 'शस्त्र' की नहीं, बल्कि उनकी 'दृष्टि' की जरूरत है—वह दृष्टि जो सत्य को परख सके और अन्याय को जड़ से उखाड़ फेंक सके।


परशुराम कथा 'रक्त' की नहीं, 'शुद्धिकरण' की है। उन्होंने तलवार से नहीं, अपनी 'संकल्प-शक्ति' से पृथ्वी को अधर्म के वायरस से मुक्त किया था। आज का यह दिन उस 'परशुराम-चेतना' को अपने भीतर जगाने का है।


परशुराम केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना का वह 'एनर्जी ग्रिड' है जो आज भी समय की धड़कनों में जीवित है। वे हिमालय की उन चोटियों पर नहीं, बल्कि हमारे उस 'विवेक' में वास करते हैं, जो अन्याय को देखते ही कांप उठता है। सोचिए, एक ऐसा योद्धा जिसके सामने बड़े से बड़ा चक्रवर्ती सम्राट थर-थर कांपता था, वह आज भी एक तपस्वी की तरह महेंद्र पर्वत पर अपनी आँखें मूंदे बैठा है। क्यों? क्योंकि वे प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस न्याय की, उस सत्य की, और उस धर्म की जो फिर से पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दे।


जब आप आज रात परशुराम जयंती का दीप जलाएंगे, तो बस यह याद रखिएगा कि आप केवल एक अवतार का सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि आप अपने भीतर के उस 'न्याय-प्रहरी' को जगा रहे हैं जो सो गया था। परशुराम एक अंत नहीं, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं। वे उस 'अधर्मी' का काल हैं जो व्यवस्था का दुरूपयोग करता है और उस 'शोषित' की ढाल हैं जो न्याय की प्रतीक्षा करता है।


"परशुराम का फरसा किसी का अंत करने नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का उदय करने आया था, जहाँ न कोई जात होगी, न कोई पाँत—वहाँ केवल 'धर्म' होगा और न्याय का राज होगा।"

जय परशुराम!


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ .....। अगली कड़ी जल्द....।


अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज



गायत्री मंत्र एक गुप्त मंत्र क्यों ?


अक्सर लोग कहते हैं कि गायत्री मंत्र को सार्वजनिक रूप से बोलना पाप है। असल में 'पाप-पुण्य' से बड़ा इसके पीछे का Acoustics (ध्वनि विज्ञान) है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। अगर आप एक पत्थर को तालाब में फेंकें, तो लहरें चारों तरफ फैलकर शांत हो जाती हैं। लेकिन अगर आप उसी ऊर्जा को एक संकरी पाइप (लेजर) में डाल दें, तो वह लोहे को भी काट सकती है।

बाहर बोलना (Broadcasting): जब हम मंत्र को चिल्लाकर बोलते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगे (Sound Waves) बाहरी वातावरण में बिखर जाती हैं। यह 'प्रसारण' तो है, लेकिन 'साधना' नहीं।

भीतर जपना (Internal Resonance): जब आप बिना होंठ हिलाए मंत्र जपती हैं, तो वह ध्वनि आपके मस्तिष्क के भीतर 'इको' (Echo) पैदा करती है। यह कंपन सीधे आपकी पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को चोट करता है, जिसे 'तीसरी आँख' भी कहते हैं।


मौन जप इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह आपके शरीर के भीतर एक 'साइलेंट धमाका' करता है जो आपकी बुद्धि को धार देता है। सार्वजनिक रूप से बोलने पर उसकी 'प्रभावी शक्ति' (Potential Energy) खत्म हो जाती है।


 स्त्रियों को मनाही: सुरक्षा कवच या बेड़ियाँ?

यह सबसे ज्यादा चुभने वाला सवाल है। पुराने समय में पंडितों ने स्त्रियों को मना किया, तो उसके पीछे कोई नफरत नहीं, बल्कि एक 'बायोलॉजिकल डर' था। इसे बिना किसी लाग-लपेट के समझिए।


गायत्री मंत्र को 'सौर ऊर्जा' (सूर्य की शक्ति) माना जाता है। यह शरीर में बहुत ज्यादा 'उष्णता' (Heat) और 'विद्युत' पैदा करता है। स्त्री का शरीर प्रकृति ने सृजन (बच्चे को जन्म देने) के लिए बनाया है। उनका हार्मोनल ढांचा पुरुषों के मुकाबले बहुत अधिक संवेदनशील और जटिल होता है। पुराने ऋषियों को डर था कि गायत्री की यह 'प्रचंड ऊर्जा' स्त्रियों के मासिक चक्र (Menstrual Cycle) और उनके प्रजनन अंगों की कोमलता को नुकसान पहुँचा सकती है।

उदाहरण: जैसे एक नाजुक और कीमती मशीन को बहुत हाई-वोल्टेज के स्टेबलाइजर की जरूरत होती है, वैसे ही ऋषियों ने इसे एक 'सेफ्टी प्रोटोकॉल' की तरह लागू किया था।


मगर आज की स्त्री का जीवन, खान-पान और उसकी मानसिक शक्ति बदल चुकी है। अगर कोई स्त्री इसे सही विधि (मौन और शांत भाव) से करती है, तो वह ऊर्जा उसे नुकसान नहीं, बल्कि 'दिव्यता' प्रदान करती है।


 गुरु का कान में मंत्र देना: 'पर्सनल वाई-फाई पासवर्ड'

यज्ञोपवीत में जो कान में मंत्र दिया जाता है, वह असल में 'सॉफ्टवेयर इंस्टॉलेशन' है।

गुरु जानते हैं कि गायत्री एक 'ब्रह्मांडीय कोड' है। अगर यह कोड सबको पता चल जाए और लोग इसे बिना तैयारी के (बिना शुद्धि के) इस्तेमाल करें, तो इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं। इसलिए इसे 'कान' में दिया जाता है ताकि वह आपके सीधे 'सब-कॉन्शस माइंड' में जाकर बैठे। यह वैसा ही है जैसे बैंक का पासवर्ड—जितना छिपा रहेगा, आपका खाता उतना ही सुरक्षित रहेगा।


सपना जी, असल में बात 'अधिकार' की नहीं, 'पात्रता' की है।

मंत्र कोई मनोरंजन नहीं है: इसे अंताक्षरी की तरह सड़कों पर गाना इसकी गरिमा को कम करना है।

शुद्धि और विधि, आप स्त्री हों या पुरुष, अगर आप गंदे मन से या सिर्फ दिखावे के लिए इसे जप रहे हैं, तो वह गलत है।

मौन ही मंत्र है। अगर आप इसे मन में जप रही हैं, तो आप दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके लिए आपको किसी पंडित या समाज की अनुमति की जरूरत नहीं है, क्योंकि आपका ईश्वर आपके भीतर बैठा है।


मेरा विश्लेषण यही कहता है प्राचीन नियम 'रोकने' के लिए नहीं, 'संभालने' के लिए बनाए गए थे। लेकिन समय के साथ हमने 'नियम' तो याद रखे, पर उनके पीछे का 'विज्ञान' भूल गए। गायत्री माँ है, और माँ अपने बेटे या बेटी में कभी फर्क नहीं करती, बस वह चाहती है कि उसके बच्चे उस 'बिजली' (शक्ति) को छूने से पहले खुद को सुरक्षित करना सीख लें।

आशा है, सपना जी और अन्य पाठकों को इस 'वृहद विश्लेषण' से उत्तर मिल गया होगा। गायत्री केवल पढ़ने की चीज नहीं, इसे अपनी सांसों में उतारने की कला है।


"अंत में, बात न अधिकार की है, न पाबंदी की—बात तो केवल 'अलाइनमेंट' की है। जब आप गायत्री को मन में जपते हैं, तो आप केवल शब्द नहीं दोहरा रहे होते, बल्कि आप अपनी रीढ़ की हड्डी को एक 'एंटीना' बनाकर उस विराट सत्ता से सिग्नल रिसीव कर रहे होते हैं।

स्त्री हो या पुरुष, जब आपकी आँखें बंद होती हैं और भीतर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' की गूंज उठती है, तब आपका शरीर मांस-मज्जा का पुतला नहीं रहता; वह एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाता है। पुराने नियम 'दीवारें' नहीं थे, वे 'कवच' थे ताकि आप इस महा-ऊर्जा को संभाल सकें। लेकिन याद रखिए, माँ कभी अपने बच्चों में भेद नहीं करती। वह तो बस चाहती है कि आप उसे 'रटें' नहीं, बल्कि उसके साथ 'सिंक' (Sync) हो जाएं। जिस दिन आपका 'मैं' मिट जाएगा, उस दिन मंत्र अपने आप अनलॉक हो जाएगा। फिर आप मंत्र पढ़ेंगे नहीं, आप खुद एक 'मंत्र' बन जाएंगे—प्रकाशवान, ओजस्वी और अजेय!"


"गायत्री को होंठों से बाहर निकालोगे तो 'शोर' बन जाएगी, और अगर मन के भीतर उतार लोगे तो 'ब्रह्मांड' बन जाएगी!"

02.1 #ऋग्वेद और #विज्ञान....#गायत्री_मंत्र का #शेष_भाग..

"क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि आपके भीतर एक ऐसा 'सुपर-कंप्यूटर' मौजूद है, जिसका पासवर्ड सदियों पहले विश्वामित्र ने डिकोड कर लिया था? जिसे हम 'गायत्री मंत्र' कहते हैं, वह केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं, जिसे आप केवल एक धार्मिक मंत्र समझकर रट रहे हैं, वह असल में आपके मस्तिष्क को 'हैप्टिक कंट्रोल' (Haptic Control) करने वाला एक 'न्यूरो-कोड' है।


​क्या आपने कभी सोचा है कि विश्वामित्र ने शून्य से एक नया स्वर्ग कैसे रच दिया था? वह कोई जादू नहीं, बल्कि 'साउंड इंजीनियरिंग' की पराकाष्ठा थी। आज का न्यूरो-साइंस जिसे 'न्यूरल ऑसिलेशन' कह रहा है, उसे हजारों साल पहले गायत्री के 24 अक्षरों में 'वाइब्रेशनल सर्किट' के रूप में फिक्स कर दिया गया था। यह लेख कोई धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आपके शरीर के उस 'बायो-मैग्नेटिक फील्ड' को अनलॉक करने की मैन्युअल बुक है, जिसे वशिष्ठ और विश्वामित्र ने 'पासवर्ड' लगाकर सुरक्षित किया था। अगर आप अपनी एकाग्रता को 'लेजर-शार्प' और अपनी बुद्धि को 'सुपर-कॉन्शस' बनाना चाहते हैं, तो तैयार हो जाइए अपनी नसों में दौड़ते उस 'ब्रह्म-तेज' को महसूस करने के लिए जिसे दुनिया गायत्री कहती है।


आज के दौर में जहाँ इंसान 'बर्नआउट' और मानसिक शोर से जूझ रहा है, वहाँ गायत्री मंत्र का 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) एक ऐसा एंटी-वायरस है जो आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को फिर से अलाइन (Align) कर सकता है। यह 24 अक्षरों का एक ऐसा 'वाइब्रेशनल सर्किट' है, जो आपके तालु से टकराकर सीधे पीनियल ग्रंथि को जगाता है। विश्वामित्र का यह 'प्राचीन सॉफ्टवेयर' कैसे काम करता है, कैसे इसकी मुद्राएं आपके शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बनाती हैं और क्यों इसे 'लॉक' करना पड़ा—आइए, इस वैज्ञानिक यात्रा के रहस्यों को खोलते हैं।


गायत्री मंत्र का केवल अर्थ जानना काफी नहीं है, बल्कि उसके 'ध्वनि-विज्ञान' (Acoustics) को समझना जरूरी है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर के भीतर एक 'वाइब्रेशनल सर्किट' पूरा करता है। जो सीधे आपके मस्तिष्क की नसों (Neurons) पर असर डालता है।

प्राचीन विज्ञान में मंत्र जप के तीन स्तर बताए गए हैं, जिन्हें आप 'ऑडियो लेवल' कह सकते हैं।


वैखरी (Vaikhari): जोर से बोलना। यह वातावरण को शुद्ध करता है और शुरुआत के लिए अच्छा है।

उपांशु (Upanshu): केवल होंठ हिलें, आवाज बाहर न आए। यह मन को एकाग्र करने के लिए 'सबलिंकल' (Subliminal) संदेश की तरह काम करता है।


मानसिक (Manasik): बिना होंठ हिलाए केवल विचार में। यह सबसे शक्तिशाली है, यही वह 'हाई-स्पीड डेटा ट्रांसफर' है जिसे विश्वामित्र ने मास्टर किया था।


जब आप उच्चारण करते हैं, तो जीभ के विशेष प्रहार से तालु (Palate) पर प्रभाव पड़ता है, जहाँ से 84 नर्व-जंक्शन जुड़े होते हैं:

'तत्' और 'स': इन अक्षरों के उच्चारण से जीभ का अगला हिस्सा सक्रिय होता है, जो मस्तिष्क के 'प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स' (निर्णय लेने की क्षमता) को उत्तेजित करता है।

'वि-तु-र्व-रे-णि-यं': यह हिस्सा तालु के मध्य भाग को स्पर्श करता है, जिससे थायरॉइड और पीनियल ग्रंथि को सिग्नल मिलता है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र का जप करने वालों की एकाग्रता बढ़ जाती है।

'भर्-गो दे-व-स्य': यह गले के 'वोकल कॉर्ड' में एक विशेष फ्रीक्वेंसी पैदा करता है, जो फेफड़ों और हृदय की धड़कन को 'सिंक्रोनाइज़' (Synchronize) कर देता है।


 'धियो यो नः' का 'ट्रिगर'

मंत्र के अंतिम भाग का उच्चारण करते समय एक 'हम्मिंग' ध्वनि (जैसे भ्रामरी प्राणायाम में होती है) पैदा होती है।

यह ध्वनि मस्तिष्क में 'नाइट्रिक ऑक्साइड' के स्तर को बढ़ाती है, जो रक्त संचार को तेज करती है। विश्वामित्र ने इसी तकनीक से अपने शरीर को उस 'ब्रह्म-तेज' के योग्य बनाया था।


व्यस्त लोगों के लिए इसका 'मौन जप' (Mental Chanting) सबसे अधिक प्रभावशाली होगा।

इसे 'रिदम' (Rhythm) के साथ करें। एक सांस में आधा मंत्र और दूसरी सांस में आधा।

यह  Beta Brain Waves (तनावपूर्ण) को Alpha और Theta Waves (क्रिएटिव/सुपर-लर्निंग) में बदल देगा।

विश्वामित्र ने इसी 'अल्फा स्टेट' में रहकर उस नए ब्रह्मांड का नक्शा खींचा था। जिसे हम 'चमत्कार' कहते हैं, वह असल में 'हाइपर-फोकस्ड' बुद्धि का परिणाम था।

यह 'अजपा जप' तकनीक " किसी 'लाइफ हैक' से कम नहीं है। एक व्यस्त इंसान के लिए, जिसके पास घंटों बैठकर माला फेरने का समय नहीं होता, यह विधि सबसे अचूक है।

ऋषियों ने इसे 'हंस योग' भी कहा है। इसमें मंत्र को शब्दों से निकालकर 'सांसों की गति' में डाल दिया जाता है।


अजपा जप: गायत्री का 'ऑटो-पायलट' मोड

साधारण जप में आप मंत्र याद करते हैं, लेकिन अजपा जप में मंत्र आपको याद करने लगता है। 


जब आप सांस अंदर (Inhale) खींचें, तो मन ही मन अनुभव करें: "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं"।

जब आप सांस बाहर (Exhale) छोड़ें, तो मन में दोहराएं: "भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्"।


फायदा: इससे आपकी सांसें गहरी और लयबद्ध (Rhythmic) हो जाती हैं। यह आपके नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत कर देता है।


'हम-सो' का रहस्य:

अजपा जप का अर्थ है जो बिना जपे हो। हमारी हर सांस 'सो-हम्' की ध्वनि करती है। गायत्री मंत्र को जब आप अपनी श्वसन प्रक्रिया (Respiratory System) से जोड़ देते हैं, तो यह आपके शरीर के DNA के साथ सिंक (Sync) हो जाता है।


यह तकनीक व्यस्त लोगों के लिए 'शील्ड' का काम करती है। जब आप किसी तनावपूर्ण स्थिति में होते हैं, तब आपकी सांसें तेज हो जाती हैं। यदि आप उस समय 'अजपा' मोड में हैं, तो आपकी बुद्धि (Intellect) स्थिर रहेगी और आप सामान्य से बेहतर विश्लेषण कर पाएंगे।


विश्वामित्र का 'सुपर-कॉन्शस' मोड

विश्वामित्र ने जब त्रिशंकु के लिए सृष्टि बनानी शुरू की, तो वे कोई मंत्र पढ़ नहीं रहे थे; वे 'गायत्री चेतना' में जी रहे थे।

 उनके शरीर की हर कोशिका (Cell) गायत्री की 24 फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट कर रही थी।

जब आपका पूरा शरीर एक 'एंटीना' बन जाता है, तो आप ब्रह्मांड के किसी भी विचार या रहस्य को पकड़ सकते हैं।


अभ्यास का तरीका (Quick Start Guide):

शुरुआत: दिन में केवल 5 मिनट के लिए अपनी सांसों पर ध्यान दें और मंत्र को उनके साथ जोड़ें।

निरंतरता: धीरे-धीरे यह स्थिति आ जाएगी कि आप बात कर रहे होंगे, टाइप कर रहे होंगे, या सफर कर रहे होंगे, लेकिन बैकग्राउंड में आपके 'सब-कॉन्शस' में यह कोड चलता रहेगा।

यह विधि इंसान को 'स्थिरप्रज्ञ' बना देती है—वह व्यक्ति जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।


शास्त्रों में उल्लेख है कि गायत्री मंत्र को वशिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्रचार्य ने 'कीलित' (Lock) कर दिया है।

एक पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह वैसा ही है जैसे किसी शक्तिशाली सॉफ्टवेयर में 'पासवर्ड' लगा दिया जाए ताकि उसका गलत इस्तेमाल न हो सके। 


आखिर विश्वामित्र ने इसे लॉक क्यों किया और इसे अनलॉक (शापोद्धार) करने का 'एक्सेस कोड' क्या है? 


विश्वामित्र जानते थे कि यह मंत्र परमाणु ऊर्जा से भी अधिक शक्तिशाली है।

मिसयूज से बचाव: अगर कोई नकारात्मक व्यक्ति इस 'सोर्स कोड' को मास्टर कर ले, तो वह सृष्टि का संतुलन बिगाड़ सकता था।

त्रिशंकु कांड की सीख: विश्वामित्र ने खुद अनुभव किया था कि जब वे अपनी शक्ति से नया स्वर्ग बना रहे थे, तो देवताओं में खलबली मच गई थी। शक्ति का अनियंत्रित विस्तार खतरनाक हो सकता है।


अनलॉक करने का रहस्य: 'शापोद्धार' (The Access Code)

तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र को प्रभावी बनाने के लिए जप से पहले तीन ऋषियों से 'अनुमति' लेनी पड़ती है। इसे 'शापोद्धार मंत्र' कहते हैं।  इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि आप अपनी चेतना को उन विशिष्ट 'फ्रीक्वेंसी' पर सेट कर रहे हैं जहाँ मंत्र काम करना शुरू करे।


1. वशिष्ठ का कोड (शांति और अनुशासन)

वशिष्ठ 'ब्रह्म-तेज' के प्रतीक हैं। उनका शापोद्धार करने का अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध को शांत करना। जब तक मन में गुस्सा है, गायत्री का ताला नहीं खुलेगा।


2. विश्वामित्र का कोड (संकल्प और पुरुषार्थ)

विश्वामित्र 'परिवर्तन' के प्रतीक हैं। उनका नाम लेकर मंत्र शुरू करने का अर्थ है कि आप अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्य (Creative Work) में लगाएंगे, विनाश में नहीं।


3. ब्रह्मा का कोड (सृजन का अधिकार)

ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। उनका स्मरण करने का अर्थ है खुद को ब्रह्मांड की इच्छा के साथ जोड़ देना (Aligning with the Universe)।


'कीलक' कैसे खोलें?


"भाव-शुद्धि और निष्कामता"

शास्त्र कहते हैं कि यदि मंत्र जपते समय मन में यह भाव हो कि "यह ज्ञान केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण (नः) के लिए है", तो वशिष्ठ और विश्वामित्र के लगाए 'ताले' अपने आप खुल जाते हैं। कीलक या शाप वास्तव में हमारे अपने 'मानसिक अवरोध' (Mental Blocks) हैं। हमारा अहंकार, स्वार्थ और संकीर्ण सोच ही वह ताला है जो इस ईश्वरीय ऊर्जा को हमारे भीतर आने से रोकता है। विश्वामित्र ने जब अपना अहंकार त्यागा, तभी वे असली 'ब्रह्मर्षि' बने और मंत्र पूरी तरह अनलॉक हुआ।


हठयोग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, गायत्री मंत्र का जप करने से पहले 24 मुद्राएं की जाती हैं। इन्हें 'हस्त-मुद्रा विज्ञान' (Science of Finger Postures) कहते हैं। ये शरीर के बायो-इलेक्ट्रिक सर्किट के लिए 'शॉर्टकट कीज़' (Shortcut Keys) की तरह काम करती हैं।


जप से पहले इन 24 मुद्राओं का प्रदर्शन आपके शरीर की ऊर्जा को 'ग्राउंड' (Earth) होने से बचाता है और उसे सीधे मस्तिष्क की ओर मोड़ देता है।


 मुद्रा का नाम प्रभाव (The Impact)

1 सुमुखम् चेहरे की मांसपेशियों को शांत कर 'रिसेप्टिव मोड' में लाना।

2 सम्पुटम् शरीर की ऊर्जा को 'लॉक' करना ताकि वह बाहर न बहे।

3 विततम् हृदय चक्र (Anahata) का विस्तार करना।

4 विस्तृतम् चेतना को बाहरी दुनिया से जोड़ना।

5 द्विमुखम् द्वंद्व (Dualities) को समाप्त करना।

6 त्रिमुखम् सत, रज और तम गुणों में संतुलन बनाना।

7 चतुर्मुखम् चार वेदों की ऊर्जा को सक्रिय करना।

8 पंचमुखम् पंच तत्वों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश) को बैलेंस करना।

9 षण्मुखम् छह चक्रों को जाग्रत करना।

10 अधोमुखम् अहंकार को नीचे की ओर झुकाना।

11 व्यापकाञ्जलि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए 'एंटीना' बनना।

12 शकटम् विघ्नों का नाश करना।

13 यमपाशम् मृत्यु के भय और बंधनों से मुक्ति।

14 ग्रथितम् बिखरी हुई ऊर्जा को एक जगह 'गांठ' की तरह बांधना।

15 सन्मुखोन्मुख आत्मा और परमात्मा को आमने-सामने लाना।

16 प्रलम्बम् धैर्य की पराकाष्ठा।

17 मुष्टिकम् संकल्प शक्ति को मजबूत करना।

18 मत्स्य मन की चंचलता को रोकना।

19 कूर्म इंद्रियों को कछुए की तरह अंदर समेटना।

20 वराह बाधाओं को उखाड़ फेंकना।

21 सिंहाक्रान्त निर्भयता और नेतृत्व।

22 महाक्रान्त विशालता का अनुभव।

23 मुद्गर अज्ञान पर प्रहार।

24 पल्लवम् ज्ञान का खिलना (Blooming of Wisdom)।


हमारी उंगलियों के पोरों (Fingertips) पर हजारों नर्व एंडिंग्स (Nerve Endings) होती हैं।

 जब हम 'मुद्रा' बनाते हैं, तो हम विशिष्ट उंगलियों को आपस में जोड़कर मस्तिष्क के खास हिस्सों को 'ट्रिगर' करते हैं।


विश्वामित्र ने इन मुद्राओं के माध्यम से अपने शरीर को एक 'सुपर-कंडक्टर' बना लिया था। बिना मुद्रा के गायत्री का जप करना वैसा ही है जैसे बिना एंटीना के टीवी चलाने की कोशिश करना—सिग्नल तो आएगा, लेकिन धुंधला।


जब आप बहुत ज्यादा मानसिक दबाव में हों, तो इनमें से केवल 'कूर्म' (Kuurma) या 'पंचमुख' मुद्रा में 2 मिनट बैठने मात्र से आपका 'स्ट्रेस लेवल' 40% तक कम हो सकता है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आपके शरीर की अपनी 'इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग' है।


हम 'न्यूरो-साइंस और स्पिरिचुअल हार्डवेयर' का मिलन कह सकते हैं। आपने देखा होगा कि प्राचीन ऋषि और आज भी कर्मकांडी विद्वान गायत्री जप से पहले अपनी 'शिखा' (चोटी) को स्पर्श करते हैं या उसे बांधते हैं।

इसके पीछे का रहस्य एक 'कॉस्मिक रिसीवर' (Cosmic Receiver) के नाम से दर्ज होना चाहिए।


शिखा का रहस्य: आपका निजी 'सैटेलाइट डिश'

वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे सिर के ऊपरी हिस्से में, जहाँ शिखा रखी जाती है, वहां 'सहस्रार चक्र' और 'पीनियल ग्रंथि' (Pineal Gland) का केंद्र होता है।


जैसे मोबाइल को सिग्नल पकड़ने के लिए एंटीना की जरूरत होती है, वैसे ही मानव शरीर को ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) रिसीव करने के लिए एक केंद्र चाहिए। शिखा उसी केंद्र का काम करती है। गायत्री मंत्र के जप के दौरान जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, शिखा उसे 'लीक' होने से बचाती है और उसे नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) प्रवाहित करती है।


सिर के उस स्थान पर 'सुषुम्ना' नाड़ी का सिरा होता है। जब हम शिखा को बांधते हैं या वहां गांठ लगाते हैं, तो वह नसों पर एक सूक्ष्म दबाव (Pressure) पैदा करता है।

यह दबाव मस्तिष्क को 'हाइपर-अलर्ट' मोड में रखता है। विश्वामित्र ने इसी 'अलर्टनेस' का उपयोग करके अपनी चेतना को उन आयामों तक पहुँचाया जहाँ से वे नई सृष्टि का निर्माण कर सकें।


गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों का उच्चारण शरीर में एक विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र (Electro-magnetic field) पैदा करता है।

 बिना शिखा या बिना सिर ढके जप करने से वह ऊर्जा आकाश में विलीन हो जाती है। शिखा उस ऊर्जा को शरीर के भीतर 'सर्कुलेट' करने के लिए एक 'क्लोज्ड लूप' (Closed Loop) बनाती है।


विश्वामित्र का 'महर्षि' बनना कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। उन्होंने अपने शरीर को एक 'बायो-मशीन' की तरह इस्तेमाल किया:

मंत्र: सॉफ्टवेयर (Code)।

मुद्राएं: स्विच (Switches)।

शिखा: एंटीना (Receiver)।

सांस (अजपा): पावर सप्लाई (Battery)।

जब ये चारों चीजें एक साथ मिलीं, तब जाकर वह 'विस्फोटक शक्ति' पैदा हुई जिसने देवराज इंद्र तक को डरा दिया था।


"विश्वामित्र का संघर्ष यह साबित करता है कि शक्ति से बड़ा 'बोध' है और जप से बड़ी 'चेतना' है।"

अंत में, गायत्री का रहस्य शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'शून्य' में है जो मंत्र के खत्म होने और अगली सांस के शुरू होने के बीच पैदा होता है। जब आप 'अजपा जप' के माध्यम से अपनी सांसों को इस कॉस्मिक रिदम से जोड़ लेते हैं, तो आपका शरीर मात्र मांस-मज्जा का पुतला नहीं रह जाता। वह एक 'लाइव एंटीना' बन जाता है जो ब्रह्मांड के गूढ़तम संकेतों को पकड़ने में सक्षम है।


विश्वामित्र ने जब अपना 'अहंकार' त्यागा, तभी वे 'ब्रह्मर्षि' कहलाए। ठीक वैसे ही, जब आपका 'मैं' (Ego) गायत्री की ध्वनि में विलीन हो जाता है, तब मंत्र 'अनलॉक' होता है। फिर आप मंत्र पढ़ते नहीं हैं, आप मंत्र हो जाते हैं।

अगली बार जब आप 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का मानसिक उच्चारण करें, तो महसूस करें कि आपकी रीढ़ की हड्डी में एक विद्युत तरंग दौड़ रही है। यह वही 'ब्रह्म-तेज' है जिसने नए ब्रह्मांड की रचना की थी। याद रखिए, आपके भीतर भी एक विश्वामित्र सोया हुआ है, उसे जगाने के लिए बस सही 'फ्रीक्वेंसी' और 'सांसों के गियर' को बदलने की जरूरत है।

क्या आप तैयार हैं अपनी चेतना का 'अपग्रेड' इंस्टॉल करने के लिए?


गायत्री कोई रटने वाली पंक्ति नहीं, बल्कि आपके भीतर सोए हुए उस 'एंटीना' को सक्रिय करने की तकनीक है, जो सीधे ब्रह्मांड के 'सर्वर' से जुड़ा है। जब आपकी जीभ तालु के उन 84 बिंदुओं पर प्रहार करती है, तो आपके मस्तिष्क के भीतर 'अल्फा' और 'थीटा' लहरों का एक ऐसा महासागर उमड़ता है, जहाँ तनाव का अस्तित्व ही मिट जाता है।

सोचिए, जब आपकी हर सांस, बिना आपके प्रयास के, खुद-ब-खुद 'ॐ' की फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट करने लगे, तब आप केवल एक शरीर नहीं रह जाते। आप एक 'लाइव ट्रांसमीटर' बन जाते हैं। विश्वामित्र का 'शापोद्धार' (Unlocking) मंत्रों में नहीं, आपकी 'भाव-शुद्धि' में छिपा है। जिस दिन आप 'स्व' से उठकर 'नः' (हम सबके कल्याण) के लिए सोचने लगेंगे, उस दिन वशिष्ठ और ब्रह्मा के लगाए सारे ताले टूट जाएंगे और आपके भीतर से वह प्रकाश फूटेगा जिसे ऋषि 'सवितु' कहते हैं।

आज से, इसे जपिए मत... इसे अपनी सांसों के 'गियर-बॉक्स' में डाल दीजिए। फिर देखिए, कैसे आपकी साधारण सी जिंदगी, एक 'सुपर-ह्यूमन' के अनुभव में बदल जाती है।


"गायत्री केवल 'पढ़ने' का विषय नहीं है, यह अपनी सांसों के सॉफ्टवेयर को 'अपग्रेड' करके ईश्वर के साथ सिंक (Sync) होने का नाम है।"


आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....। 

गायत्री मंत्र की पहली कड़ी -  https://www.facebook.com/share/p/185NHFQ6yD/


सादर,

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज