Tuesday, March 31, 2026

जप के प्रकार-मंत्र-यंत्र?

 प्रश्न : *जप के प्रकार-मंत्र-यंत्र?*


जप के अनेक प्रकार हैं यथा


१. 'वाचिक', २. 'उपांशु', ३. 'मानस' । नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित, भ्रामरी आदि अनेक जप होते हैं ।


 'मन्त्र' साक्षात् पराशक्तिस्वरूप हैं । पराशक्ति वाणी के रूप में स्फुरित होती है अत: मन्त्रों के द्वारा सूक्ष्मा, सर्वातीता सत्ता या परावाक् (ओंकार) ही व्यक्त होता है इसीलिए मन्त्रों में अचिन्त्यशक्ति मानी जाती है—


'मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।' - परशुरामकल्पसूत्रम्। 


'मन्त्र' किसी वर्ण का उच्चारण मात्र नहीं है प्रत्युत् यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें गुरु, मन्त्र, देवता, मन आत्मा एवं प्राणवायु की एकता स्थापित की जाती है । इस ऐक्य की अवस्था में ही मन्त्रोच्चारण होता है अतः मन्त्र के साथ 'ध्यान' मिला रहता है । यह एकता 'भावना' से सिद्ध होती है । भावना-शून्य मन्त्र जप निष्फल होता है । 'मन्त्र' नादात्मक होता है । इस नाद का अनुसंधान ही शाक्त-साधना का लक्ष्य है । 'यौवनोल्लास' में अजपाजप, 'प्रौढ़ोल्लास' में मानसजप एवं 'तदन्तोल्लास' में (नाम गर्भित)मन्त्र का जप किया जाता है।


मन्त्र के दो भेद हैं-१. 'बीज' २. 'पिण्डात्मक' 


प्रत्येक श्वास के साथ सहजगति से (नाम गर्भित) ही ‘सहजजप' है । यही है —'कालध्वा' या 'प्राणध्वा' एवं यहां यंत्र एवं यंत्रोपासना भी मन्त्र-साधना का एक अङ्ग है । इसके बिना मन्त्र का आराध्य देवता प्रसन्न नहीं होता–

“विना यंत्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति ।


आचार्य अभिनवगुप्त : 

आत्मा न शृणुते यं स मानसो जप उच्यते ।

आत्मना शृणुते यस्य तमुपांशु विजानते ॥” 

- तन्त्रालोक


जय माँ त्रिपुराम्बा 💐

संकलन - पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ

श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात

परमधर्म संसद १००८

Monday, March 30, 2026

*दक्षिणा निर्णय*

 *दक्षिणा निर्णय*


किसी एक ही कर्मकी दक्षिणा देनेमें— दाताके वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) भेदसे दक्षिणामें शास्त्रानुसार अंतर होता है।


*#ब्राह्मण_यजमानको—*

शास्त्रोक्त नियत दक्षिणा ही देनी चाहिए।


*#क्षत्रिय_यजमानको—*

 दुगुनी दक्षिणा देनी चाहिए।


*#वैश्य_यजमान—*

 तीनगुनी दक्षिणा देवे,और 


*#शूद्र_यजमान—*

(जिनके यहां कुछ शास्त्रीय कर्म करनेका अधिकार है ऐसे सत्शूद्रों) को चौगुनी दक्षिणा देनी चाहिए।


*यथोक्तां दक्षिणां दद्याद् ब्राह्मण: क्षत्रियस्तथा।*

*द्विगुणां वैश्यवर्यस्तु त्रिगुणां शूद्रसत्तम:।*

*चतुर्गुणां प्रयच्छेत मन्त्रसिद्धिविधीच्छया।।*             

            (#सिद्धान्तसारसंग्रहे)


इस श्लोकमें कही गई दक्षिणा साधारण यजमानोंके लिए है। यदि यजमान धनाढ्य या निर्धन है तो उनकी व्यवस्था इस प्रकार है—


*धनिको द्विगुणं दद्यात् त्रिगुणन्तु महाधन:।*

*यवार्द्धं तु दरिद्रेण दातव्यं पुण्यलब्घये।।  दद्यान्महादरिद्रस्तु तदर्द्ध शुल्कमेव तु।।*

                   (#वाराहपुराण)


*#धनिक_यजमान—*

अपने वर्णके अनुसार नियत दक्षिणाको दुगुनी देवें।


*#महाधनिक_यजमानको—*

अपने वर्णके अनुसार कही गई दक्षिणाको तिगुना करके देना चाहिए।


*#दरिद्र_यजमानको—*

पहले वाले श्लोकमें कही गई साधारण दक्षिणाको अपने वर्णके अनुसार आधी दक्षिणा ही देनी चाहिए।


*#महादरिद्र_यजमानको—* पुण्यफलकी प्राप्तिके लिए अपने वर्णके अनुसार निर्णीत दक्षिणाका चौथाई भाग ही देना चाहिए।


*यदि इसप्रकार शास्त्रद्वारा कथित दक्षिणा देनेका किसीके पास धन या मन नहीं है, तो उस व्यक्तिको यज्ञादि कर्म नहीं कराना चाहिए


क्योंकि अल्प दक्षिणा देनेसे कर्मका फल प्राप्त नहीं होता,  ऐसे व्यक्तियोंको भगवान्नाम संकीर्तन आदि पुण्य कार्य करना चाहिए—


*पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रिय:।*

*न त्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते ह कथञ्चन।।*

          (#मनुस्मृति:- 11/39)


*#दक्षिणाहीन_यज्ञ_शत्रु_है—


*अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विज:।*

*यष्टारं दक्षिणाहीनं नास्ति यज्ञसमो रिपु:।।*


*#अर्थ—* यज्ञमें अन्नकी ( हवन, दान या भोजनके रूपमें) कमी होनेपर यज्ञ संपूर्ण राष्ट्रको पीड़ा देता है।


मंत्रसे हीन (अशुद्धमंत्र, कम मंत्र या ठीक विधि न होने) पर यज्ञ ऋत्विजों (ब्राह्मणों) को पीडा दायक होता है। 


और शास्त्रके द्वारा निर्णीत दक्षिणामें कमी करनेपर यज्ञ यजमानका नाश करता है।


 *अतः विधिविहीन यज्ञके समान कोई प्रबल शत्रु नहीं है।*


 इसलिए यज्ञका संपूर्ण फल प्राप्त करनेके लिए हमें शास्त्रोक्त विधिसे ही यज्ञ करना चाहिए, अन्यथा विधिविहीन यज्ञको तामसयज्ञ कहा गया है—


*विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।*

*श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।*

 (#श्रीमद्भागवतगीता-17/13)


*#अर्थ—* शास्त्रीय विधि रहित, शुद्ध हवि रहित, मंत्रहीन, श्रद्धा और उचित दक्षिणा रहित यज्ञ तामसयज्ञ कहे गए हैं।


अधिक से अधिक दक्षिणा देनेसे कर्मका फल भी अधिक से अधिक प्राप्त होता है ।


और अल्प से अल्प दक्षिणा देने पर कर्मका फल भी अल्प होता जाता है।


 इसलिए पर्याप्त दक्षिणा देनी चाहिए—


*यथा यथा बहुं दद्यात्तथा तथा फलं लभेत्।*

*यथा यथा स्वल्पं दद्यात्तथा तथा फलं लभेत्।।*

(#यज्ञमीमांसायां_स्वयंभूपुराणे)


*#यज्ञाचार्यकी दूनीदक्षिणा—

*सर्वत्र द्विगुणां दद्यादाचार्याय तु दक्षिणाम्।*

*बहुपूरुषनिष्पाद्ये उत्तमा प्रतिपूरुषम्।।*                   

               (#यज्ञमीमांसायाम्) 


*#दक्षिणा_तत्काल_देवें—


*#अर्थ—* दक्षिणा देने में एक मुहूर्तका विलंब करने पर दक्षिणा दुगुनी हो जाती है 


एक रात बीतने पर 6 गुनी 


तीन रात बीतने पर 10 गुनी 


1 सप्ताह व्यतीत होने पर 20 गुनी


 एक महीना बीतने पर लाख गुनी 


1 वर्ष व्यतीत होने पर करोड़ गुनी दक्षिणा हो जाती है।

जिसे यजमान कभी भी नहीं दे सकता।


इस प्रकार यजमानके द्वारा कराया गया कर्म भी निष्फल हो जाता है।


और वह यजमान दक्षिणा न देनेके पातकसे ब्रह्मस्वापहारी (ब्राह्मणका धन अपहरण करने वाला), कर्मका नाश करने वाला, अपवित्र, दरिद्र, व्याधि युक्त हो जाता है।


उसके घरसे लक्ष्मीजी भी कठिन शाप देकर अन्यत्र चली जाती हैं।

पितृगण भी उसके दिए हुए श्राद्ध, तर्पण आदिको ग्रहण नहीं करते।

और देवगण उसकी पूजा तथा आहुति स्वीकार नहीं करते।


 और अंतमें वह ब्रह्मस्वापहारी 

कुंभीपाक नामक नरकमें जाता है—


*मुहूर्ते समतीते च द्विगुणा सा भवेद् ध्रुवम्।*

*एकरात्रे व्यतीते तु भवेद्र सगुणा च सा।।*


*त्रिरात्रे वै दशगुणं सप्ताहे द्विगुणा तत:।*

*मासे लक्षगुणा प्रोक्ता ब्रह्मणानां च वर्द्धते।।*


*संवत्सरे व्यतीते तु सा त्रिकोटिगुणा भवेत्।*

*कर्म तद् यजमानानां सर्वं वै निष्फलं भवेत्।।*


*तद् गृहाद्याति लक्ष्मीश्च शापं दत्वा सुदारुणम्।*

*पितरो नैव गृह्णन्ति तद्दत्तं श्राद्धतर्पणम्।।*


#दक्षिणा_जरूर_लेवें—


*दाता ददाति नो दानं ग्रहीता तन्न याचते।*

*उभौ तौ नरकं यातश्छिन्नरज्जुर्यथा घट:।।*


#अर्थ— देने वाला यदि दक्षिणा न देवे और ग्रहण करने वाला यदि दक्षिणा आदि न मांगे तो - ऐसी स्थितिमें दोनों ही नर्कके अधिकारी होते हैं।


जिस प्रकार रस्सी टूट जाने पर भरे हुए घटके साथ  उतनी भी जल में डूब जाता है उस घटके साथ उससे बंधी हुई उतनी रस्सी भी जाती है।


ऐसा नहीं है कि ये नियम अन्यों पर ही लागू होंगे, यदि कोई ब्राह्मण भी यज्ञ करवाता है तो उसे भी दक्षिणा देनेमें ये ही नियम पालन करना चाहिए


*पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात*

स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज

 परम भागवत ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज (अत्यन्त संक्षिप्त परिचय)

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स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज 

        भारतीय पौराणिक साहित्य में जो कुछ भी हिंदी भाषा में उपलब्ध है, उसमें से अधिकांश कार्य स्वामी जी द्वारा ही किए गए हैं। अखंडानन्द जी का जन्म शुक्रवार 25 जुलाई, 1911 को वाराणसी के मेहराई गाँव में पुष्य नक्षत्र श्रावण अमावस्या (हिन्दू पंचांग के अनुसार) सरयूपारीण ब्राह्मण के यहाँ हुआ। जन्म के समय ज्योतिषी ने इनकी आयु 19 वर्ष बतायी थी , उसी डर से भगवत्मार्ग पर निकल पड़े। परिवार ने उसी नाम के देवता के नाम पर उनका नाम शांतनु बिहारी रख दिया। जब अखंडानन्द जी 10 साल के थे तभी उनके दादा ने उन्हें मूल भागवत को संस्कृत में पढ़ना सिखाया था। संन्यास जाने से पहले 1934 से 1942 तक उन्होंने कई किताबें एवं लेख प्रकाशित किए जब वे गीताप्रेस में कल्याण के सम्पादकीय बोर्ड के सदस्य थे। ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद जी से उन्होंने दीक्षा ली थी।

गीताप्रेस में कल्याण की संपादकीय परिषद के कार्यों के साथ ही उन्होंने कई पुराणों, गीता, महाभारत और वाल्मीकि रामायण जैसे ग्रंथों का भी हिंदी में अनुवाद किया। पहले इन ग्रंथों के संस्करणों में गीताप्रेस के प्रकाशनों में स्वामी जी के नाम का उल्लेख होता था। यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि पूज्य स्वामी रामकिंकर जी ने स्वामी जी से ही रामकथा की व्यासदीक्षा ली थी। स्वामी जी ने अपने केवल दस वर्ष की आयु में ही अपने दादा जी को श्रीमद्भागवत सुनाई थी। अपनी माता जी से उन्होंने रामायण का गान सीखा था।


भारत अथवा विश्व में आज भी जितने भी कथा व्यास आचार्य हैं, उनकी कथाओं में बार-बार स्वामी अखंडानंद जी का उल्लेख आ ही जाता है। पूज्य रमेश भाई ओझा, भूपेंद्र भाई पंड्या, मोरारी बापू, राजेंद्र दास जी, जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी, जगद्गुरु स्वामी राघवाचार्य जी, प्रेम मूर्ति प्रेम भूषण जी या राजन जी की कथा हो अथवा परमपूज्य शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी, स्वामी स्वामी गुरुशरणानंद जी, गिरिशानद जी यह अन्य अनेक महाभाग। सभी को स्वामी अखंडानंद जी के साहित्य और संवाद ने प्रेरणा और प्रश्रय अवश्य दिया है।


हनुमान जी द्वारा प्राण रक्षा 


स्वामी अखण्डानन्दजी ने ‘आनन्द-बोध’ पत्रिका में जनवरी 1984 से नवम्बर 1987 तक और उसके बाद भी कुछ लेख लिखे। उन लेखों का संग्रह बाद में ‘पावन प्रसंग ‘ नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ। उस पुस्तक का प्रथम संस्करण फरवरी 1988 में और चतुर्थ संस्करण मई 2012 में प्रकाशित हुआ।


चतुर्थ संस्करण के पृष्ठ संख्या 306-308 पर  आपने  लिखा:

“अत्यंत बाल्यावस्था में ही मुझे उनसे (बाबा से) शिक्षा मिलनी प्रारम्भ हो गई थी। सत्यनारायण कथा, दुर्गापाठ, महूर्त चिंतामणि मुझे कंठस्थ हो गए थे। उनके पास पढ़ने के लिए दूर-दूर से विद्यार्थी आते थे और कुछ मेरे घर पर ही रहते थे। ….. बाबा ज्योतिष  की गणित कितनी सुगमता से कर लेते हैं, कुण्डली कैसे बना देते हैं। यह सब मैं देख-देख कर अनुकरण कर लेता था। यह सब मेरे लिए कोई  कठिन काम नहीं था।“ …

“मेरे गाँव से डेढ़-दो मील दूर धानापुर नाम की एक बस्ती है। वहाँ थे पण्डित प्रह्लाद मिश्र। वे पण्डित तो थे ही, बड़े सज्जन, सदाचारी एवं सौम्य स्वभाव के थे। मैं प्रतिदिन उनके पास विद्याध्ययन के लिए जाता था। वे गंगा-स्नान, सन्ध्या-वन्दन आदि से निवृत होकर गंगाजली हाथ में लिए घर आते थे। चोटी बंधी हुई ललाट पर चन्दन, अध्यापन में बड़े निपुण थे। गायत्री-जप में उनकी दृढ़ निष्ठा थी। …

“एक बार की बात है, मैं दो-तीन दिन पढ़ने के लिए नहीं गया। उनके पिता पण्डित श्रीरघुदत्त मिश्र आयुर्वेद के बड़े विद्वान एवं प्रतिष्ठित चिकित्सक थे, वे मेरे घर आए। वे मेरे पितामह के समकक्ष थे। मुझसे बोले – ‘बेटा, तुम्हें ज़्वर (बुखार) आता है, इसीसे नहीं आए? कल ज्वर आने से पहले मेरे घर आ जाना, मैं ज्वर को रोक दूँगा।‘ उन्होने सिर पर हाथ रखा, पीठ ठोंकी।

“दूसरे दिन ज्वर आने से पूर्व ही मैं उनके पास पहुँच गया। उन्होंने गाय के गोबर से धरती लीप कर कम्बल बिछा रखा था। मुझसे कहा – ‘तुम इस पर बैठ जाओ अथवा लेट ताओ। मैं चारों ओर गाय के गोबर के भस्म से एक मन्त्र लिख देता हूँ, उसके भीतर ज्वर (बुखार) प्रवेश नहीं करेगा। तुम बाहर नहीं निकलना।‘

“मैं पहले तो लेट गया। परन्तु जब वह चले गए, तो उठ बैठा और देखने लगा कि लिखा क्या है। वह हनुमानजी का मंत्र था। उसमें विभिन्न प्रकार के ज्वरों के नाम लेकर कहा गया था कि हे हनुमानजी, इन ज्वरों को नष्ट कर दो।

“सचमुच उस दिन मुझे ज्वर नहीं आया। मैं पूर्ववत अध्ययन के कार्य में लग गया।

“उस मन्त्र पर मेरी बाल सुलभ श्रद्धा ऐसी दृढ़ हो गई कि मैं बिना किसी से पूछे ग्रन्थों में  उसे ढूंढता रहा। ‘कल्याण’ के सम्पादन विभाग में जाने के बाद वह ‘लाड्गूलोपनिषद्’ में मिल गया।“

श्री शान्तनु विहारी  द्विवेदी  ने सन्यास लेने के कुछ वर्ष पहले ‘कल्याण’ गोरखपुर के सम्पादकीय विभाग में काम किया था। उन दिनों भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार (1892-1971) ‘कल्याण’ के सम्पादक थे।  भाईजी ‘कल्याण की स्थापना वर्ष अर्थात सन् 1926 से 1971 तक उस मासिक पत्रिका  के सम्पादक रहे।  भाईजी का प्रेम ही श्री शान्तनु विहारी  द्विवेदी (स्वामी अखण्डानन्दजी)  को ‘कल्याण’ में खींच लाया था।


प्रसंग के बाहर जा कर यह चमत्कार आपको बताना चाहता हूँ कि तबसे अब तक मुझे ज्वर का प्रकोप बहुत कम हुआ है। कभी-कभी एक-दो दिन तक थोड़ा-थोड़ा ज्वर अवश्य रहा है।  बीच में एक बार सन् 1934-35 के आस-पास पित्तज्वर हुआ था। वमन हुआ और मैं बेसुध हो गया।  भाई सुदर्शन सिंहजी चक्र ने मुझे पानी के एक टब में बैठा दिया था और मैंने मूर्छा की दशा में ही देखा कि एक भयंकर राक्षसी, जिसका नाम मृत्यु था, मुझ पर आक्रमण करने दौड़ रही है और श्री हनुमानजी गदा लेकर उसकी ओर दौड़ रहे हैं। राक्षसी भाग गई और मेरा ज्वर गायब हो गया। मन्त्र का चमत्कार हो या न हो, अब तक का मेरा अनुभव यही है।  आगे क्या होगा सो ज्ञात नहीं।“


परवल का गुण


‘पावन प्रसंग’ के पृष्ठ 155 में भिक्षुजी श्रीशंकरानन्दजी महाराज पर भी एक लेख है। सच तो यह है कि स्वामी अखण्डानन्दजी असंख्य साधू, महात्माओं और वैरागियों से मिले। उनसे मिलना उनको पसन्द था। पृष्ठ 155 पर स्वामी अखण्डानन्दजी ने लिखा:


“एक वर्ष बाद, पुन: जब मैं कनखल (हरिद्वार) गया तो वे (श्रीशंकरानन्दजी) उस खण्डहर में नहीं थे।  बड़ी कठिनाई से उनका पता चला। वे बड़ी नहर से निकलने वाले एक बम्बे के पास एक छोटे से बगीचे में रह रहे थे। अत्यन्त कृश एवं रुग्ण थे। उनसे मिलने पर  ज्ञात हुआ कि किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने भिक्षा में उन्हें विष दे दिया था और लोगों ने उनको उस खण्डहर में से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर रख दिया था। वे उसके बाद से छह महीने तक वहीं बगीचे में रहे तथा परवल के अतिरिक्त कुछ खाते नहीं थे। परवल (संस्कृत शब्द पटोल) में विष पचाने की अद्भुत शक्ति है। मैं यथाशक्ति उनकी सेवा करता रहा। धीरे-धीरे वे स्वस्थ होने लगे। …. उस विष-ग्रस्त अवस्था में भी उनका खल्वाट ललाट शीशे की तरह चम-चम चमकता था। मुख पर प्रसन्नता खेलती रहती थी। बात-बात में विनोद करते थे। बाद में उनके पास दूसरे सम्प्रदायों के सन्त भी प्रश्नोत्तर के लिए आया करते थे।


“उसके बाद वाले वर्ष में जब मैं गया तो वे एक झोले में लिखने-पढ़ने की सामग्री लेकर कनखल से दक्षिण दिशा में छोटी नहर के किनारे कहीं मिले। …. अब वे भिन्न-भिन्न वृक्षों  के नीचे रहने लगे थे। कभी कहीं मिले, कभी कहीं। वर्षा हुई, भींग गए। ज्वर चढ़ आया। पर वे अपने हठ पर अडिग थे। जब मूर्छित होने लगे तब उन्हें बलात् उठा कर श्मशान घाट के पास एक बड़े मकान के एक कमरे में लाया गया।  वह मकान बहुत दिनों से खाली पड़ा था। बहुत मजबूत था, सुरक्षित था। उस कमरे में पहुँचने के लिए दो-तीन दरवाजे पार करने पड़ते थे। कमरा हवादार था। दूर-दूर तक गंगाजी का दर्शन होता था। अच्छे हुए, तब उसमें रहना उन्होंने स्वीकार कर लिया। परन्तु उनकी वाणी में व्यंग्य, हंसी, दृढ़ता टपकती रहती थी। भिक्षा भी भक्त लोग वहीं ले आते थे। हम लोगों को भी उससे  प्रसन्नता हुई। मैं ‘कल्याण के सम्पादन विभाग में रहा। बाद में सन्यासी हो गया। परन्तु उनके पास आना-जाना, प्रेम सम्पर्क ज्यों-का-त्यों बना रहा।“


सिद्धि माताजी का गुरु-मन्त्र


‘पावन प्रसंग’ पुस्तक में पृष्ठ संख्या 248 से 258 तक स्वामी अखण्डानन्दजी ने ‘ब्रह्ममयी माँ’ शीर्षक से अपनी माँ के बारे में लिखा: जब मैंने सन्यास नहीं लिया था और अपनी माँ के संग रहता था, तब काशी में मेरी माँ की भेंट एक सिद्धि माताजी से हुई। दो-चार बरस बाद उन्होंने मेरी माताजी को एक मन्त्र भी दिया था। वे मेरी माँ की गुरुमाँ हो गईं थीं। मेरी माँ उस गुरु-मंत्र को मन ही मन स्मरण और जाप करतीं थीं।

अखण्डानन्दजी ने लिखा:

“वह यह समझतीं थीं कि उनके सिवा इस बात को  (उस मन्त्र को) कोई नहीं जानता। एक दिन भोजन के समय महानिर्वाण तन्त्र का वही सप्ताक्षर मन्त्र मैं एकाएक बोलने लगा। तब मेरी माँ को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा – “यह मन्त्र तुमको कैसे मालूम है?” मैंने कहा – “मुझे मालूम है कि तुम इसी का जप करती  हो। तुम्हारे सिर पर जो चमक और रेखाएँ उठ रही हैं, वे इसी मन्त्र से आती हैं।“

पृष्ठ 255 पर स्वामी अखण्डानन्दजी ने लिखा:

“जब मैं कल्याण-परिवार में रह रहा था, भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार ने माताजी को और मुझे भी दो बातों से निश्चिंत कर दिया: एक तो अपने प्रभाव और सहयोग से (मेरी) बेटी कमला का विवाह सन्त साहित्य के प्रसिद्ध लेखक श्री परुशराम चतुर्वेदी के पुत्र श्री धन्नजय चतुर्वेदी से करा दिया और दूसरे  विशम्भर के पढ़ने की व्यवस्था चुरू ऋषिकुल में कर दी।  इससे माताजी निश्चिंत होकर भजन करने लगीं और घर पर चलने वाली पाठशाला के विद्यार्थियों को अपने पुत्र के समान मान कर उन्हें स्नेह देने लगीं। विद्यार्थीगण माताजी के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखते थे। वे उन्हें सदाचार, शिष्टाचार, भगवद्भजन का उपदेश किया करती थीं। …


मेरे सन्यास लेने पर माँ रोई


“सन् बयालीस के आरम्भ में  पण्डित श्री मदनमोहन मालवीयजी को श्रीमद्भागवत सुनाने के बाद मैंने ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीबृह्मानन्द सरस्वती सन्यास-दीक्षा ले ली और दण्डी स्वामी हो कर मध्यप्रदेश की ओर चला गया। इससे माताजी के चित्त को बड़ी चोट लगी। यद्यपि उन्होंने पहले अनुमति दे दी थी … वे दु:खी होकर भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी के पास गईं। उन्होंने माताजी को बहुत समझाया-बुझाया। भाईजी ने कहा की यदि कोई साधारण व्यक्ति सन्यास ग्रहण कर लेता, तो हम उसको आग्रह और प्रायश्चित के द्वारा गृहस्थाश्रम में लौटा भी सकते थे, परन्तु एक तो वह विद्वान हैं, और दूसरे ‘कल्याण’ के द्वारा उनकी विद्या और लेखन की प्रसिद्धि हो चुकी है। अब यदि वह गृहस्थाश्रम में लौट भी आएं, तो उनकी बड़ी बदनामी होगी। बदनामी की बात सुनकर माताजी ने तुरन्त कह दिया कि जिस काम से उनकी बदनामी हो वह करने का आग्रह मैं कदापि नहीं करूंगी। वे जहां रहें जैसे रहें, सुखी रहें। माताजी का आशीर्वाद प्राप्त हो गया। मेरे सन्यास लेने के बाद वह अद्वैत वेदान्त का विचार करने लगीं, गंगा-किनारे विचरते हुए जो महात्मा वहाँ आ जाते, उनका सत्संग करतीं। भगवान की भक्ति तो थी ही, मेरे सन्यासी हो जाने पर उनके मन में भी वैराग्य का उदय हुआ। घर के काम में रुचि लेना कम हो गया।“


माँ का सन्यास और अन्तिम संस्कार


धीरे-धीरे एक दिन वह आया कि माताजी ने भी सिर मुड़वा लिया और सन्यास ले लिया।

स्वामी अखण्डानन्दजी ने पृष्ठ संख्या 258 पर लिखा:

“वृन्दावन में श्री उड़ियाबाबाजी के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में उत्सव चल रहा था। … भण्डारा होने के बाद बाहर से आए हुए लोगों से मिल-जुल कर एक बजे दिन में (माताजी) अपने आसन पर लेट गईं। तीन बजे किसी ने देखा कि माताजी की सांस नहीं चल रही है। मैं गया तो देखा  उनका एक हाथ सिर के नीचे है और एक हाथ कमर पर। करवट से लेटी हुईं थीं। ऐसा लगता था, बिना किसी तकलीफ के, बिना किसी छटपटी के, उनके प्राण शान्त हो गए हों। वायु, वायु से एक तो रहती ही है, केवल बल्ब का फ्यूज उड़ गया था और देह का सम्बन्ध टूट गया था। चेतनात्मा तो सदा शुद्ध-बुद्ध-मुक्त अद्वितीय बृह्म है ही। उनका शरीर यमुना में (प्रवाहित कर) दिया गया। कछुओं का भण्डारा हुआ। उनके पौत्र विश्वम्भरनाथ ने अपने गांव जाकर विधि-पूर्वक श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन कराया। उनके श्रद्धालु भक्तों की संख्या तो वहाँ उस समय भी बहुत थी और अब भी है।“


स्वामी अखण्डानन्दजी की लगभग 120 पुस्तकें लिखीं। वे या तो गीता प्रेस, गोरखपुर ने या फिर सत्साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट, वृन्दावन ने प्रकाशित की हैं। ‘कल्याण’ गीता प्रेस, गोरखपुर  की मासिक पत्रिका है। ‘कल्याण’ के सम्पादकीय विभाग में काम करते हुए स्वामी अखण्डानन्दजी ने  श्रीमद्भागवत-महापुराण का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद किया था तथा अन्य कई पुस्तकें भी लिखीं थीं, जिनमें शामिल हैं: श्री भीष्म पितामह, भक्तराज हनुमान्, महात्मा विदुर, आदि। इनमें से श्री भीष्म पितामह, भक्तराज हनुमान्, महात्मा विदुर गीता सेवा ट्रस्ट के एप (gitaseva.org) को डाउनलोड करके फ्री में पढ़ी जा सकती हैं।(साभार संकलित लेख)

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની 64 કળાઓનું રહસ્ય🌺🌺

 ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની 64 કળાઓનું રહસ્ય🌺🌺


પૌરાણિક કથાઓ -

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ પોતાની શિક્ષા ગ્રહણ કરવા માટે અવંતિપુર (ઉજ્જૈન) સ્થિત ગુરુ સાંદીપનિ ના આશ્રમમાં ગયા હતા, જ્યાં તેઓ માત્ર 64 દિવસ રહ્યા હતા. ત્યાં તેમણે માત્ર 64 દિવસમાં જ પોતાના ગુરુ પાસેથી 64 કળાઓનું જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી લીધું હતું. જોકે શ્રીકૃષ્ણ સ્વયં ભગવાનના અવતાર હતા અને આ કળાઓ તેમને પહેલેથી જ આવડતી હતી, પરંતુ સામાન્ય જનમાનસને સમજાવવા માટે તેમણે મનુષ્ય અવતારમાં આ કળાઓ ફરીથી શીખી હતી.


શ્રીમદ્ ભાગવત પુરાણના દશમ સ્કંધના 45મા અધ્યાય અનુસાર, શ્રીકૃષ્ણ નીચેની 64 કળાઓમાં નિપુણ હતા:


64 કળાઓની યાદી

નૃત્ય – નાચવાની કળા.


વાદ્ય – વિવિધ પ્રકારના વાદ્યો વગાડવા.


ગાયન – સંગીત અને ગાયકી.


નાટ્ય – અભિનય અને વિવિધ હાવભાવ પ્રદર્શિત કરવા.


ઈન્દ્રજાલ – જાદુગરી અને હાથચાલાકી.


નાટક આખ્યાયિકા લેખન – નાટકો અને વાર્તાઓની રચના કરવી.


સુગંધિત દ્રવ્યો બનાવવાની કળા – અત્તર, તેલ વગેરે બનાવવાની વિધિ.


પુષ્પ શૃંગાર – ફૂલોના આભૂષણોથી શણગાર કરવો.


બેતાલ સિદ્ધિ – વેતાળ વગેરેને વશમાં રાખવાની વિદ્યા.


બાળકોની રમત – બાળકોના મનોરંજન માટેની રમતો.


વિજય વિદ્યા – યુદ્ધ કે સ્પર્ધામાં વિજય અપાવનારી વિદ્યા.


મંત્રવિદ્યા – મંત્રોનું જ્ઞાન અને પ્રયોગ.


શકુન-અપશકુન જ્ઞાન – પ્રશ્નોના ઉત્તરમાં શુભાશુભ જણાવવું અને ચિહ્નો સમજવા.


રત્ન કલા – રત્નોને અલગ-અલગ આકારોમાં કાપવા અને ઘડવા.


માતૃકા યંત્ર – વિવિધ પ્રકારના યંત્રો બનાવવાની કળા.


સાંકેતિક ભાષા – ગુપ્ત કે સાંકેતિક ભાષા બનાવવી.


જલ સ્તંભન – જળને બાંધવાની અથવા તેના પર ચાલવાની કળા.


વેલ-બુટ્ટા બનાવવાની કળા – વસ્ત્રો કે વસ્તુઓ પર ફૂલ-વેલની ભાત પાડવી.


અક્ષત-પુષ્પ પૂજન – પૂજા માટે રંગીન ચોખા અને ફૂલોથી સુંદર રચના કરવી.


પુષ્પ શય્યા – ફૂલોની પથારી તૈયાર કરવી.


પક્ષીઓની બોલી – પોપટ-મેના વગેરેની બોલી બોલવી કે તેમને બોલતા શીખવવું.


વૃક્ષ આયુર્વેદ – વૃક્ષો અને વનસ્પતિની ચિકિત્સા કરવાની કળા.


પ્રાણી યુદ્ધ રીત – ઘેટાં, મરઘા, બટેર વગેરેને લડાવવાની પદ્ધતિઓ.


ઉચ્ચાટન વિધિ – મંત્ર દ્વારા શત્રુને દૂર કરવાની કે માનસિક પ્રભાવ પાડવાની રીત.


વાસ્તુ કલા – ઘર કે ભવન બનાવવાની કારીગરી.


ગાલિચા-દરી નિર્માણ – ગાલીચા અને શેતરંજી બનાવવાની કળા.


સુથારી કામ – લાકડાની કારીગરી.


વેતર કામ – નેતર કે વાંસમાંથી આસન, ખુરશી કે પલંગ બનાવવાની કળા.


પાકશાસ્ત્ર – વિવિધ પ્રકારની રસોઈ, શાકભાજી, મિઠાઈ અને પકવાન બનાવવાની કળા.


હસ્ત લાઘવ – હાથની ચપળતાના કામ.


વેષ પરિવર્તન – ઇચ્છા મુજબ વસ્ત્રો અને રૂપ ધારણ કરવું.


પાનક-રસ નિર્માણ – વિવિધ પ્રકારના શરબત અને પીણાં બનાવવાની કળા.


દ્યુત ક્રીડા – જુગાર કે ચોપાટ જેવી રમતોનું જ્ઞાન.


છંદ જ્ઞાન – તમામ છંદો અને કાવ્યશાસ્ત્રનું જ્ઞાન.


વસ્ત્ર ગોપન – વસ્ત્રો છુપાવવા કે બદલવાની વિદ્યા.


આકર્ષણ વિદ્યા – દૂરના મનુષ્યો કે વસ્તુઓને આકર્ષવાની કળા.


પરિધાન – યોગ્ય કપડાં અને ઘરેણાં પહેરવાની પસંદગી.


હાર નિર્માણ – ફૂલહાર અને માળા બનાવવાની કળા.


વિચિત્ર સિદ્ધિ – જડીબુટ્ટીઓ અને મંત્રોથી શત્રુને નબળો પાડવાની ઔષધિ બનાવવી.


કર્ણપત્ર ભંગ – કાન અને ચોટલી માટે ફૂલોના આભૂષણો ગૂંથવા.


કઠપૂતળી કલા – કઠપૂતળી બનાવવી અને નચાવવી.


પ્રતિમા નિર્માણ – મૂર્તિઓ બનાવવાની કળા.


પ્રહેલિકા – ઉખાણાં ઉકેલવા અને પૂછવા.


સોયકામ – સિલાઈ, રફૂકામ અને ભરતકામ કરવાની કળા.


કેશ પ્રસાધન – વાળની સફાઈ અને સજાવટનું કૌશલ્ય.


મુષ્ટિ જ્ઞાન – મુઠ્ઠીમાં રહેલી વસ્તુ કે મનની વાત જાણી લેવી.


ભાષા જ્ઞાન – વિવિધ દેશોની ભાષાઓનું જ્ઞાન.


મ્લેચ્છ-કાવ્ય સમજ – ગુપ્ત સંકેતો કે વિદેશી ભાષાઓને સમજવાની કળા.


ધાતુ-રત્ન પરીક્ષા – સોનું, ચાંદી અને હીરા-પન્નાની પરખ કરવી.


ધાતુ નિર્માણ – કાચી ધાતુમાંથી સોનું-ચાંદી બનાવવાની કળા.


મણિ રંગ જ્ઞાન – રત્નોના રંગ અને ગુણવત્તા ઓળખવી.


ખનિજ જ્ઞાન – ખાણોની ઓળખ કરવાની વિદ્યા.


ચિત્રકલા – ચિત્રો દોરવાની કળા.


અંગ રાગ – નખ, વસ્ત્ર અને અંગોને રંગવાની કળા.


શય્યા રચના – પથારી સજાવવાની રીત.


મણિ ભૂમિકા – ઘરના ભોંયતળિયાને રત્નો અને મોતીઓથી જડવાની કળા.


કૂટનીતિ – રાજનીતિ અને રણનીતિનું જ્ઞાન.


ગ્રંથ પઠન – શાસ્ત્રો અને ગ્રંથો ભણાવવાની ચતુરાઈ.


નવીનતા – નવી નવી વાતો અને વિચારો રજૂ કરવા.


સમસ્યા પૂર્તિ – અધૂરી કાવ્ય પંક્તિઓ કે સમસ્યાઓનો ઉકેલ લાવવો.


કોષ જ્ઞાન – શબ્દભંડોળ અને શબ્દકોષનું જ્ઞાન.


માનસી કાવ્ય – મનમાં ને મનમાં શ્લોક કે કવિતાની રચના પૂર્ણ કરવી.


છલ વિદ્યા – જરૂર પડ્યે યુક્તિ કે છળથી કામ કઢાવવાની કળા.


ભૂષણ રચના – શંખ, હાથીદાંત અને અન્ય વસ્તુઓમાંથી ઘરેણાં બનાવવાની કળા.


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Saturday, March 28, 2026

भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?

 "भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।"भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।

रावण की सोने की लंका किसने जलायी थी ?

 पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने एक बार भगवान शिवसे कहा - प्रभो !यहां हमारे लिए रहनेके लिए घर तो नहीं हे मगर स्नान करनेके लिए एक कुटीयां भी नहीं हे। में स्नान करने जाऊं और कोई आ जाय तो क्या करू ? कम से कम एक मकान तो बनवा दीजिए। भगवान शिवने माता पार्वती के कहनेपर एक सोनेका महल कैलाश पर्वत पर बनवाया था। भगवान शिवने विश्वकर्माको बुलाकर उसके द्वारा निर्माण करवाया था बादमें भगवान शिवने प्रसन्न होकर उस महल श्री कुबेर (इडविडा पुत्र) को भेट दे दिया था और रावण ने  वह महल छल से कुबेर से छीन लिया था।जब माता पार्वतीको पता चला कि रावणने लंका छीन ली उसी समय उनको गुस्सा आया और उसने कहा की तेरी ये लंका तो में एक दिन जलाकर राख कर दूंगी। 


भगवान शिव ने त्रेतायुग में भगवान विष्णु के राम अवतार की सेवा करनेके लिए वानर रूप में हनुमान जी का अवतार लेने का विचार लिया। उस समय भगवान शिव मृत्यु लोक में आनेकी तैयारी कर रहे थे तब माता पार्वती ने पूछा - प्रभो ! कहा जा थे हो। शिवजीने बताया कि में भगवान रामकी सेवा करनेके लिए एक अवतार धारण करके पृथ्वी पर जा रहा हु। माताने कहा - में भी आपकी अर्द्धांगिनी बनकर आऊंगी। प्रभुने कहा मगर इस अवतारमें में ब्रह्मचारी रहूंगा अतः आप आ नहीं सकती। पार्वतिने कहा ठीक हे तो में आपकी पुंछ पर सवार होकर साथ रहूंगी।


भगवान शिव इस तरह रामकी सेवा करनेके लिए अंजनी पुत्र के रूप में अवतरित हुए और माता पार्वती उनकी पूंछ बन गई।


रावणने कुबेर से  लंका छीन ली तब से माता पार्वतिको रावणके प्रति द्वेष हो गया था। एक बार रावणने माता पार्वतिका हरण करने का प्लान बनाया। वह कैलाश पर्वत पर्वत पर गया और माता को उठा के ले जा रहा था। उस समय नारदजी सामने आ गए। उसनेबपूछा अरे रावण ये क्या बोझ उठाके ले जा रहा हे ? रावणने कहा में पार्वतिको उठाकर लंका ले जा रहा हु। नारदजी बोले अरे किसने कहा कि ये पार्वती हे। रावण बोला में खुद कैलाश से ले आया हु। नारदजीने समझाया अरे ये पार्वती नहीं हे ये तो होगी कोई उसकी दासी।

पार्वती के शरीर से तो कितनी मीठी सुगंध आती रहती हे। देख क्या उसके शरीरसे सुगंध आती हे ? बराबर उस समय माता पार्वती ने अपने शरीर से दुर्गंध फैलाना शुरू कर दिया। रावण बोला इसके शरीर से तो दुर्गंध आती हे। तब नारदजी बोले ये ही तो में कह रहा हु कि ये पार्वती नहीं हो सकती। रावणने उसको वही छोड़ दिया और माता वापस कैलाश पहुंच गई।


हनुमानजीने अपनी पुंछ से लंका जलाई थी मगर उस समय माता पार्वती ही अग्नि रूप धारण किये बैठी थी और उसने ही लंका जलाकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।