[ अन्नप्राशन संस्कार : ]
शिशु जीवन में सात्विकता का प्रथम प्रवेश
प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट
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शिशु जब माता के गर्भ से बाहर आता है, तब वह केवल शरीर से ही नहीं, अपितु गर्भकाल के पोषण से भी प्रभावित होता है। गर्भ में ग्रहण किया गया आहार शुद्ध न हो, तो उसका प्रभाव बालक के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। अतः शिशु के जीवन में शुद्धता और सात्विकता का प्रथम संस्कार है।--अन्नप्राशन संस्कार।
▪︎ संस्कार का हेतु
जब शिशु छह से सात माह का होता है, तब उसकी पाचन शक्ति सुदृढ़ होने लगती है और दांत निकलने का प्रारंभ होता है। इसी समय उसे यज्ञ-शुद्ध अन्न का प्रथम सेवन कराया जाता है। यह केवल भोजन देना नहीं, अपितु एक वैदिक अनुष्ठान होता है, जिससे बालक का शरीर, मन और बुद्धि सात्विक दिशा में विकसित हो।
▪︎ शास्त्र प्रमाण
"आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।" ---- छान्दोग्य उपनिषद् 7.26.2
जिसका आहार शुद्ध है, उसका चित्त भी शुद्ध होता है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने अन्न को देवतुल्य मानते हुए पहले यज्ञ में अर्पित कर, फिर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने की परंपरा बनाई।
▪︎ वेदों की वाणी में आशीर्वचन
शिवौ ते स्तां ब्रीहियवावबलासावदोमघी।
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुंचतो अंहसः॥
----- अथर्ववेद 8.2.18
अर्थात् :-- हे बालक! जौ और चावल तेरे लिए बलवर्धक और पापनाशक हों। ये तुझे रोगों से मुक्त करें और तेरा जीवन पुष्ट करें।
▪︎ एक रोचक प्रसंग -- अन्न की महिमा
महाभारत में एक प्रसंग आता है ।--जब भीष्म पितामह युद्धभूमि में पांडवों को धर्मोपदेश दे रहे थे, तो द्रौपदी सहसा मुस्कुरा उठीं। कारण पूछने पर उन्होंने कहा। "पितामह! जब दुर्योधन की सभा में मेरे वस्त्र हरने का प्रयास हो रहा था, तब आप मौन क्यों रहे?"
इस पर भीष्म ने उत्तर दिया। "बेटी, उस समय मैं दुर्योधन का अन्न खाता था। उसी अन्न ने मेरी बुद्धि को बांध रखा था। अब जब अर्जुन के बाणों ने उस अन्न के प्रभाव को मेरे शरीर से बाहर निकाल दिया है, मेरी अंतरात्मा अब धर्म की ओर प्रवृत्त हो सकी है।"
●निष्कर्ष●
शिशु को प्रथम अन्न खिलाते समय केवल पोषण नहीं, अपितु संस्कार भी प्रदान किया जाता है। इसीलिए अन्न को देवतुल्य मानकर, यज्ञपूर्वक उसे शिशु को प्रदान करना। यही अन्नप्राशन संस्कार का उद्देश्य है।
यह केवल भोजन नहीं, ब्रह्म के बीज का प्रथम सिंचन है।
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