शंकराचार्य की कश्मीर यात्रा : शारदा पीठ की परीक्षा
— एक ब्रह्मतेजस्वी यति की अद्वैत विजयगाथा —
आचार्य शंकर जब दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत में शास्त्रार्थ कर विजयी हो चुके, तब उत्तर की ओर प्रस्थान करते हैं—कश्मीर की उस दिव्य भूमि की ओर, जहाँ विद्या की अधिष्ठात्री देवी शारदा विराजती हैं, और जहाँ प्रतिष्ठित था — सर्वज्ञ पीठ, वह आसन जिस पर वही विराजमान हो सकता था जो ज्ञान, वैराग्य और चरित्र में अपराजेय हो।
शारदा पीठ : तीर्थ की अवस्थिति
"राजतरंगिणी" और अन्य प्रमाणों के अनुसार:
यह तीर्थ भेदगिरी पर्वत पर स्थित है, जहाँ एक रमणीय सरोवर में हंस क्रीड़ा करते हैं — वही है शारदा देवी का निवास।
मधुमती नदी यहाँ सरस्वती में, फिर कृष्णा और अंततः गंगा में मिलती है।
समीप ही "शारदावन" में शांडिल्य ऋषि का तपोवन है, "शारदी" नामक ग्राम, "अमरकुंड" नामक ताल, और अनेक प्राचीन शिवमंदिर स्थित हैं।
यह मंदिर समुद्र तल से 11,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। अल्बेरुनी (1030 ई.) के अनुसार यहाँ देवी शारदा की काष्ठ-मूर्ति प्रतिष्ठित थी।
कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तपीड के समय में यहाँ शास्त्रार्थ हेतु समस्त भारत से विद्वानों का समागम होता था।
विनायक भट्ट के सांख्य भाष्य और शंकराचार्य के प्रपंचसार में भी शारदा स्तुति प्राप्त होती है।
सर्वज्ञपीठ की परीक्षा
"माधवीय शंकरदिग्विजय" के अनुसार जब आचार्य वहाँ पहुँचे, उन्होंने सर्वज्ञ सिंहासन पर आसीन होने का अधिकार माँगा।
विद्वानों ने शास्त्रार्थ की परीक्षा ली — जिसे आचार्य ने पूर्ण वैदांतिक उत्तरों से संतुष्ट किया।
तब एक आपत्ति उठी — “आपने संन्यासी होकर भी एक बार राजा के शरीर में प्रवेश कर स्त्रियों के गूढ़ रहस्यों को जाना। अतः आप अयोग्य हैं।”
आचार्य का उत्तर — “वह कार्य स्थूल शरीर से नहीं, केवल सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न हुआ।”
विद्वानों ने कहा — “मन और बुद्धि तो उसी सूक्ष्म शरीर में हैं, दोष तो है ही।”
उत्तर मिला — “सूक्ष्म शरीर अनादि है, इसके अवयव भी अनादि हैं। ये स्थूल देह से भिन्न हैं, अतः दोषयुक्त नहीं।”
तब अंतिम आपत्ति आई — “आपने शारदा देवी को प्रणाम नहीं किया। केवल दण्ड का स्पर्श ही कराया।”
आचार्य बोले — “यदि मैं सम्पूर्ण यति-शरीर से प्रणाम करूँ, तो देवी मेरी ब्रह्मतेजस्विता को सह न सकेंगी — मंदिर और मूर्ति दोनों खण्डित हो जाएँगे।
यदि विश्वास न हो तो नवीन मंदिर बनाकर मूर्ति स्थापित करें।”
ऐसा ही किया गया।
जैसे ही आचार्य ने प्रणाम किया — मंदिर और मूर्ति दोनों भस्म हो गए। सभा स्तब्ध रह गई।
फिर सभी विद्वानों ने उन्हें प्रणाम कर स्वीकार किया, और अद्वैत वेदान्त में दीक्षित हुए।
यह थी शारदा पीठ की परीक्षा — ज्ञान, ब्रह्मचर्य, और ब्रह्मतेज की त्रिपक्षीय विजय।
आचार्य ने न केवल तर्क से, वरन् तप और तेज से भी सिद्ध कर दिया कि वे ही “सर्वज्ञपीठ” के योग्य अधिष्ठाता हैं।
जयतु शारदापीठम् जयतु शंकराचार्यः जयतु अद्वैतवेदान्तः
✍️..... संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट
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