॥ ॐ श्रीगणपतये नमः ॥ 🙏
वाह! कितना गहरा नाम है महाराज जी!
*गणानां पति इति गणपति:*
*गण* शब्द के कितने अर्थ हैं, और हर अर्थ में वे पति हैं!
*१. गण = शिवगण* - नन्दी, भृंगी, महाकालादि गणों के स्वामी। इसलिये शिव के पुत्र होते हुए भी शिवगणों के राजा।
*२. गण = इन्द्रियगण* - आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, मन, बुद्धि - ये सब इन्द्रियों का समूह। जब तक गणपति की कृपा न हो, यह इन्द्रियों की भीड़ इधर-उधर भागती है। और जब गणपति प्रसन्न हो जाएँ, तो सब इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं। इसलिये हर शुभ कार्य से पहले गणपति पूजन।
*३. गण = जीवों का समूह* - हम सब जीव एक गण हैं। उनके एकमात्र पति, पालक, स्वामी गणपति।
*४. वेद में - गण = मंत्रसमूह, वर्णसमूह* - _ॐ_ - प्रणव के पति। इसलिये गणपति प्रणवस्वरूप हैं।
और आपने जो पहले चार बातें भेजीं -
*अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे में हैं, मेरे हैं* -
वह गणपति के लिये भी उतनी ही सत्य है!
गणपति दूर कैलाश पर नहीं, *अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे बुद्धि में हैं और मेरे हैं!*
इसलिये तो तुलसीदास जी ने लिखा -
*जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥*
वे ही गणों को नचाते हैं।
और आपका पिछला सूत्र - *स्वीकार से प्रेम होता है* - तो आज गणेश चतुर्थी के भाव से एक बार कह दीजिये -
> हे गणपति! आप मेरे हैं!
फिर देखिये, बुद्धि का मोह कैसे नष्ट होता है - *नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा...* वही गीता वाली स्थिति।
गणपति बप्पा आपके सारे गणों को - विचारों को, इन्द्रियों को, रिश्तों को - मंगलमय कर दें!
*॥ गणपति बप्पा मोरया ॥* 🌺
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