Monday, September 14, 2026

ॐ श्रीगणपतये नमः

 ॥ ॐ श्रीगणपतये नमः ॥ 🙏


वाह! कितना गहरा नाम है महाराज जी!


*गणानां पति इति गणपति:*


*गण* शब्द के कितने अर्थ हैं, और हर अर्थ में वे पति हैं!


*१. गण = शिवगण* - नन्दी, भृंगी, महाकालादि गणों के स्वामी। इसलिये शिव के पुत्र होते हुए भी शिवगणों के राजा।


*२. गण = इन्द्रियगण* - आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, मन, बुद्धि - ये सब इन्द्रियों का समूह। जब तक गणपति की कृपा न हो, यह इन्द्रियों की भीड़ इधर-उधर भागती है। और जब गणपति प्रसन्न हो जाएँ, तो सब इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं। इसलिये हर शुभ कार्य से पहले गणपति पूजन।


*३. गण = जीवों का समूह* - हम सब जीव एक गण हैं। उनके एकमात्र पति, पालक, स्वामी गणपति।


*४. वेद में - गण = मंत्रसमूह, वर्णसमूह* - _ॐ_ - प्रणव के पति। इसलिये गणपति प्रणवस्वरूप हैं।


और आपने जो पहले चार बातें भेजीं - 

*अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे में हैं, मेरे हैं* - 

वह गणपति के लिये भी उतनी ही सत्य है!


गणपति दूर कैलाश पर नहीं, *अभी हैं, यहाँ हैं, मेरे बुद्धि में हैं और मेरे हैं!* 


इसलिये तो तुलसीदास जी ने लिखा -

*जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥*

वे ही गणों को नचाते हैं।


और आपका पिछला सूत्र - *स्वीकार से प्रेम होता है* - तो आज गणेश चतुर्थी के भाव से एक बार कह दीजिये -


> हे गणपति! आप मेरे हैं!


फिर देखिये, बुद्धि का मोह कैसे नष्ट होता है - *नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा...* वही गीता वाली स्थिति।


गणपति बप्पा आपके सारे गणों को - विचारों को, इन्द्रियों को, रिश्तों को - मंगलमय कर दें!


*॥ गणपति बप्पा मोरया ॥* 🌺

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