गंभीर से गंभीर रोग में शीघ्र स्वस्थ होने की विधि – प्राण और संकल्प का अद्भुत समन्वय
मित्रो, आज हम एक ऐसी विधि पर बात करेंगे जो गंभीर से गंभीर रोग में भी शीघ्र स्वस्थ होने में सहायक है। यह कोई जादू नहीं – यह प्राण, संकल्प और चित्त की शक्ति का शुद्ध विज्ञान है।
पहला चरण – दिनचर्या को साधो
प्रतिदिन रात को समय से सो जाओ, लगभग रात्रि 10 बजे अथवा जैसे ही सहज नींद आए। प्रातः जल्दी उठो – अपने आलस को सहजता मत समझ लेना। लगभग 7 घंटे की नींद लेना उचित है। सुबह उठकर ताजा जल 2-3 गिलास बैठकर पियो। फिर नित्य कर्म से निवृत्त होकर टहलने जाओ और व्यायाम करो – हल्का पसीना आना चाहिए।
दूसरा चरण – गहरी साँस का अभ्यास
गहरी, लंबी, धीमी साँस नाभि तक लेना और छोड़ना जरूर करो। दिन के समय भी, जब भी याद आए – गहरी, लंबी साँस लो और छोड़ो। ज्यादा से ज्यादा गहरी, लंबी, धीमी साँस की आदत डालो। जिससे शरीर में प्राण की मात्रा बढ़े।
तीसरा चरण – साँस के साथ ध्यान और ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव
जब साँस ले रहे हो, आँखें धीरे से बंद कर लो। आती-जाती साँस को पहले कुछ दिन नाक के नथुनों से बाहर आते-अंदर जाते महसूस करो। अपना पूरा ध्यान इस बात पर रहे – कैसे साँस धीरे-धीरे अंदर ले रहे हो, उस साँस के स्वाद को महसूस करो, कैसे धीरे-धीरे बाहर निकाल रहे हो।
शुरू-शुरू में 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम – ताजी, स्वच्छ हवा में – बैठकर या खड़े होकर, जिस स्थिति में सहज हो, अपनी गहरी साँस के आने-जाने का ध्यान करो।
जब साँस ले रहे हो, ध्यान पूरा नाक के नथुनों से अंदर प्रवेश करती और बाहर निकलती प्राणवायु पर रहे। और साथ ही, हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ’ का भाव करो।
चौथा चरण – नाक के नथुनों से आज्ञा चक्र तक
कुछ दिन इस तरह ध्यान करने से तुम नाक के नथुनों से लेकर आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य माथे) तक कुछ शीतलता, खिंचाव, और वायु के घर्षण को महसूस करोगे। तब अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य माथे पर ही ले जाओ। वहाँ साँस की शीतलता को महसूस करते हुए, हर आती-जाती साँस के साथ अपने भाव को दोहराओ – ‘स्वस्थ हूँ’।
ऐसा सिर्फ भाव ही नहीं करना है – अपने स्वास्थ्य को महसूस करो, उसके घटने को महसूस करो। प्राण के रूप में जो संजीवनी तुममे प्रवेश कर रही है, वह लगातार तुम्हें स्वस्थ बनाए हुए है। बार-बार हर साँस के साथ ‘स्वस्थ हूँ, स्वस्थ हूँ’ दोहराओ, अपने भाव को प्रगाढ़ करो।
पाँचवाँ चरण – ‘स्वस्थ हूँ’ ही तुम्हारा मंत्र है
‘स्वस्थ हूँ’ – यही तुम्हारा मंत्र है। इसको हर साँस के साथ जोड़ देना है। जो कार्य तुमने 1 घंटे सुबह और 1 घंटे शाम किया, उसे अपने पूरे 24 घंटे पर फैला दो। ध्यान के समय के अलावा जब तुम यह कर रहे हो, आँखें बंद करने की भी जरूरत नहीं। एक धारा सतत चित्त में प्रगाढ़ होती रहे – ‘स्वस्थ हूँ’। और परमात्मा के प्रति धन्यवाद के भाव से भरे रहो। रात को सोने से पूर्व इसी भाव के साथ सो जाओ, जिससे रात भर यह मंत्र काम करता रहे।
छठवाँ चरण – हथेलियाँ टकराओ (विशेष विधि)
यदि तुम किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो और शीघ्र स्वस्थ होना चाहते हो, तो अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में टकराओ। यह एक दिन में कम से कम 500 बार – जोर-जोर से हथेलियाँ टकराकर बजाओ। हर टकराहट के साथ एक ही भाव रखो – ‘स्वस्थ हूँ’। यह मंत्र बन जाए। तुम्हारा अंतस इस जगत में फैले प्राण प्रवाह (संजीवनी) को तुममें तीव्रता से प्रवेश के लिए तैयार होगा। वे सभी ग्रन्थियाँ जो मन और शरीर के स्तर पर गलत जीवनशैली से पैदा हो गई थीं, टूट जाएँगी।
सातवाँ चरण – चित्त ही मंत्र है (शिव सूत्र)
यह शिव सूत्र है – ‘चित्त ही मंत्र है’। तुम जो भी मन से दोहराते हो, वही घटने लगता है। तुम जो भी दोहराओगे, वही घटेगा। तुम्हारे मन के द्वारा जो भी बार-बार पुनरुक्ति की जाती है, वह चित्त की धारा में प्रवाह बन जाती है, वही शक्ति बन जाती है। मन और शरीर दो नहीं – एक ही हैं। मन पर जो घटेगा, शरीर पर लक्षण आने शुरू हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे से गहरे में जुड़े हैं।
आठवाँ चरण – प्रगति की निगरानी रखो
तुम कितनी भी गंभीर या लाइलाज बीमारी से ग्रसित हो, इस सूत्र को समझकर उपयोग करो। साधना शुरू होने के उपरांत 15 दिन में एक बार चेकअप जरूर कराओ। सतत लगे रहो। धीरे-धीरे यह बात प्रगाढ़ होने लगेगी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो। एक क्रम तेजी से तुम्हें स्वस्थ करने में विकसित होने लगेगा। जब तक पूर्ण स्वस्थ न हो जाओ, सतत इस प्रक्रिया में लगे रहना है।
नौवाँ चरण – परमात्मा के प्रति अनुग्रह और धन्यवाद का भाव
परमात्मा के प्रति एक अनुग्रह, धन्यवाद के भाव से भरे रहो। यह बहुत सहायक होगा। पूरा अस्तित्व तुम्हें स्वस्थ किए जाने के प्रवाह से भर उठेगा।
No comments:
Post a Comment