Thursday, May 14, 2026

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।

 “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता” — एक शास्त्रीय, व्याकरणिक एवं निरुक्तपरक अध्ययन


✓•प्रस्तावना: हनुमान चालीसा में वर्णित प्रसिद्ध पंक्ति—


“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।”


भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की अत्यन्त गूढ़ एवं रहस्यपूर्ण अवधारणा को अभिव्यक्त करती है। सामान्यतः भक्तजन इसे केवल भक्ति-भाव से ग्रहण करते हैं, परंतु यदि इस चौपाई का अध्ययन व्याकरण, निरुक्त, योगशास्त्र, पुराण, रामायण, तंत्र तथा वेदान्त के आलोक में किया जाए तो यह सम्पूर्ण भारतीय दार्शनिक चेतना का संक्षिप्त सूत्र प्रतीत होती है।


यह चौपाई केवल हनुमानजी की स्तुति नहीं, अपितु शक्ति और चेतना, सिद्धि और संपदा, भक्ति और ब्रह्मविद्या, शब्द और अर्थ—इन सभी के अद्वैत संबंध की उद्घोषणा है।


✓•पाठ-विश्लेषण:


"अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥"


∆इसमें मुख्य शब्द हैं—

•१. अष्ट

•२. सिद्धि

•३. नव

•४. निधि

•५. दाता

•६. अस

•७. बर

•८. दीन

•९. जानकी

•१०. माता


इन सभी शब्दों की व्युत्पत्ति, व्याकरणिक सिद्धि एवं निरुक्तीय अर्थ का अध्ययन आवश्यक है।


✓•“अष्ट” शब्द की व्याकरणिक सिद्धि:


“अष्ट” संख्या-वाचक शब्द है।


पाणिनीय परंपरा में संख्या शब्दों की गणना “संख्यायाम्” अधिकार में की गई है। “अष्ट” संस्कृत का प्राचीन वैदिक शब्द है।


∆निरुक्तीय अर्थ:


निरुक्त के अनुसार संख्या शब्द केवल गणना के लिए नहीं, बल्कि दार्शनिक संकेत भी हैं।


“अष्ट” के अनेक प्रतीकार्थ हैं—

•अष्टदिक्

•अष्टप्रकृति

•अष्टाङ्गयोग

•अष्टलोकपाल

•अष्टभैरव

•अष्टमूर्ति शिव

अतः “अष्ट” पूर्णता एवं समग्र शक्ति का सूचक है।


✓•“सिद्धि” शब्द की व्युत्पत्ति:


“सिद्धि” शब्द “सिध्” धातु से बना है।


∆धातु:


"सिधँ संसिद्धौ।"


•अर्थात् — सफल होना, पूर्ण होना, प्राप्त होना।


∆व्याकरणिक सिद्धि:


सिध् + क्तिन् = सिद्धि


यहाँ “क्तिन्” प्रत्यय भाववाचक स्त्रीलिंग शब्द बनाता है।


∆अतः—


 “सिध्यते अनया” इति सिद्धिः।


•जिससे कार्य सिद्ध हो जाए वह सिद्धि है।


∆निरुक्तीय अर्थ:


निरुक्त परंपरा में “सिद्धि” का अर्थ है—

•पूर्णता

•उपलब्धि

•योगबल

•आत्मशक्ति

•चित्तविजय

योगशास्त्र में सिद्धि का अर्थ अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि चेतना की उन्नत अवस्था है।


✓•अष्ट सिद्धियाँ — शास्त्रीय विवेचन:

भागवत पुराण तथा योगग्रंथों में अष्ट सिद्धियों का वर्णन प्राप्त होता है।


∆वे हैं—

•१. अणिमा

•२. महिमा

•३. गरिमा

•४. लघिमा

•५. प्राप्ति

•६. प्राकाम्य

•७. ईशित्व

•८. वशित्व


✓•१. अणिमा:


“अणु” + “इमनिच्” = अणिमा


अत्यन्त सूक्ष्म होने की शक्ति।


∆दार्शनिक अर्थ:


अहंकार का सूक्ष्मीकरण।


हनुमानजी ने लंका प्रवेश करते समय यही शक्ति धारण की—


 “मसक समान रूप कपि धरी।”


✓•२. महिमा:


“महत्” से “महिमा”


विशाल होने की शक्ति।


यह केवल शरीर-वृद्धि नहीं, चेतना की विराटता है।


✓•३. गरिमा:


“गुरु” धात्वर्थ से सम्बद्ध।


अत्यन्त भारी होने की क्षमता।


आध्यात्मिक रूप में—गंभीरता एवं स्थिरता।


✓•४. लघिमा:


“लघु” से लघिमा।


अत्यन्त हल्का होने की शक्ति।


∆योग में इसका अर्थ है—


मनोभार से मुक्ति


आसक्ति-शून्यता


✓•५. प्राप्ति:


“प्र + आप् (लाभे)” धातु।


इच्छित वस्तु की प्राप्ति।


यह बाह्य नहीं, अन्तःचेतना की उपलब्धि भी है।


✓•६. प्राकाम्य:


कामना की पूर्ण सिद्धि।


यहाँ कामना लौकिक नहीं, दिव्य संकल्प है।


✓•७. ईशित्व:


“ईश” से ईशित्व।


स्वामीभाव।


स्वयं पर शासन।


✓•८. वशित्व:


“वश” धातु से।


वशीकरण नहीं, अपितु—


इन्द्रियनिग्रह


चित्तसंयम


✓•“नव निधि” का शास्त्रीय अध्ययन:


“निधि” शब्द—


नि + धा + कि


 “निधीयते अस्मिन्” इति निधिः।


जिसमें संपदा रखी जाए।

नव निधियाँ


∆विष्णु पुराण तथा तांत्रिक ग्रंथों में नौ निधियों का उल्लेख मिलता है—

•१. पद्म

•२. महापद्म

•३. शंख

•४. मकर

•५. कच्छप

•६. मुकुन्द

•७. नन्द

•८. नील

•९. खर्व


✓•निधियों का आध्यात्मिक अर्थ:


∆१. पद्म:

•कमल।

•आध्यात्मिक जागरण।


∆२. महापद्म:

•परम वैभव।

•ब्रह्मज्ञान।


✓•३. शंख:

•नादब्रह्म।

•प्रणवध्वनि।


✓•४. मकर:

•जलतत्त्व।

•अवचेतन शक्ति।


✓•५. कच्छप:

•स्थिरता।

•योग में प्रत्याहार।


✓•६. मुकुन्द:

•मोक्षदायक संपदा।


✓•७. नन्द:

•आनन्दस्वरूप धन।


✓•८. नील:

•गूढ़ तांत्रिक शक्ति।

•अनन्त आकाशतत्त्व।


✓•९. खर्व:

•सूक्ष्म छिपी हुई संपत्ति।

•कुण्डलिनी का प्रतीक।


✓•“दाता” शब्द का व्याकरण:


“दा” धातु से “तृच्” प्रत्यय।


दा + तृ = दाता


 “ददाति इति दाता।”

जो प्रदान करे।

यहाँ हनुमानजी केवल भौतिक दाता नहीं, आध्यात्मिक अनुग्रहदाता हैं।


✓•“अस बर दीन” का विश्लेषण:

“अस”

अयम् अर्थे अवधी-प्रयोग।

अर्थात् — ऐसा।


✓•“बर”:

संस्कृत “वर” का अपभ्रंश।


"वृञ् वरणे।"


जो वरण करने योग्य हो।

वर = अनुग्रह।


✓•“दीन”:


“दा” धातु से क्त।

दत्तवान्।


∆यहाँ अर्थ—

प्रदान किया।


✓•“जानकी माता” — निरुक्तीय विवेचन:


∆जानकी:

•जनकस्य अपत्यम् = जानकी


∆पाणिनि सूत्र—


 “तस्य अपत्यम्”


जनक की पुत्री।


✓•माता:


“मा” धातु (माने — पोषण) से।


मानयति, पोषयति इति माता।


जो पालन करे।


∆दार्शनिक अर्थ:


∆सीता केवल स्त्री पात्र नहीं, अपितु—

•आदिशक्ति

•करुणा

•भक्ति

•श्रीविद्या

•प्रकृति


✓•सीता द्वारा हनुमान को वरदान:

•रामचरितमानस में वर्णित है कि अशोकवाटिका में हनुमानजी की भक्ति से प्रसन्न होकर सीताजी ने उन्हें वर प्रदान किया।

•यह वर केवल शक्ति का नहीं, दिव्य कृपा का प्रतीक है।

•शक्ति बिना शिव शव है।

सीता बिना राम लीलारहित हैं।

•अतः सीता का वरदान हनुमान को “शक्ति-तत्त्व” से संपन्न करता है।


✓•योगदृष्टि से अष्ट सिद्धि:

पतञ्जलि योगसूत्र में सिद्धियाँ चित्त की उच्च अवस्थाएँ मानी गई हैं।


∆योगसूत्र में कहा गया—


“जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः।”


∆अर्थात् सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं—

•जन्म से

•औषध से

•मन्त्र से

•तप से

•समाधि से

हनुमानजी में ये सभी तत्त्व विद्यमान थे।


✓•वेदान्तीय अर्थ:

अष्ट सिद्धियाँ वास्तव में आत्मा की शक्तियाँ हैं।


नव निधियाँ चित्त की सम्पन्न अवस्थाएँ हैं।


∆हनुमानजी—

•भक्ति के शिखर

•ज्ञान के भास्कर

•योग के आचार्य

•शक्ति के केंद्र

हैं।


✓•तांत्रिक व्याख्या:


∆तंत्रशास्त्र में—

•अष्ट सिद्धियाँ = अष्टचक्रों की जागृति

•नव निधियाँ = नवशक्तियाँ

मानी गई हैं।

•सीता = कुण्डलिनी शक्ति।

•हनुमान = प्राणशक्ति।

•जब प्राण और शक्ति का संयोग होता है तब सिद्धियाँ प्रकट होती हैं।


✓•भक्ति-दर्शन में अर्थ:

•भक्ति में “सिद्धि” गौण है।


∆हनुमानजी स्वयं कहते हैं—


“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”


•अतः उनका लक्ष्य सिद्धि नहीं, सेवा है।


•यही कारण है कि सिद्धियाँ उनके पीछे चलती हैं।


✓•व्याकरणिक सौन्दर्य:

•इस चौपाई में अनुप्रास, लय और ध्वनि अत्यन्त अद्भुत है—

•अष्ट — सिद्धि

•नव — निधि

•दाता — माता

यह ध्वनिसाम्य अर्थ को प्रभावशाली बनाता है।


✓•तुलसीदास की काव्यप्रतिभा:

गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यल्प शब्दों में सम्पूर्ण योग, तंत्र, वेदान्त और भक्ति को समाहित कर दिया।

यह चौपाई केवल स्तुति नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिकता का सूत्रग्रंथ है।


✓•निष्कर्ष:

“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता” यह चौपाई भारतीय संस्कृति की बहुआयामी चेतना का अद्भुत संक्षेप है।


∆इसमें—

•योग है,

•वेदान्त है,

•तंत्र है,

•भक्ति है,

•व्याकरण है,

•निरुक्त है,

•शक्ति है,

•रामभक्ति है।

व्याकरण की दृष्टि से प्रत्येक शब्द अत्यन्त सारगर्भित है।

निरुक्त की दृष्टि से प्रत्येक पद गहन दार्शनिक अर्थ रखता है।

योग की दृष्टि से यह चेतना-विकास का सूत्र है।

भक्ति की दृष्टि से यह पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।


हनुमानजी की महिमा इसी में है कि वे सिद्धियों के स्वामी होकर भी स्वयं को केवल “रामदूत” कहते हैं।


अतः इस चौपाई का वास्तविक संदेश है—


"सच्ची सिद्धि शक्ति में नहीं, सेवा में है।

सच्ची निधि धन में नहीं, भक्ति में है।"

*#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्*

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