Sunday, May 24, 2026

केलेके पेड़की उत्पत्ती।

 केलेके पेड़की उत्पत्ती।   


एक कथा के अनुसार महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे। लेकिन उनके अंदर ऋषि संस्कार बचपन से ही प्रबल थे और जब वह पांच वर्ष की अवस्था आते-आते ध्यान-साधना में लीन रहने लगे थे। दरअसल दुर्वासा खुद महादेव के क्रुद्ध स्वरूप रुद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे। क्रोध ही उनके स्वभाव का मूल था और वह तमाम ज्ञान को पाने के बाद भी इसे नहीं त्याग सके थे। 

आपको ऋषि दुर्वासा और अमरीश की वह कथा तो ज्ञात होगी फिर भी में संक्षिप्त में बता रहा हूं। इसके बाद मुल कथा प्रारंभ करूँगा। 

एक बार जब दुर्वासा ऋषि राजा अमरीश के घर पर आये। राजाने उसको भोजनका निमंत्रण दिया। निमंत्रण स्वीकार करके वह स्नान और संध्या वंदन करने के लिए नदी पर चले गये। उसको वापस आने में बहुत देर हो गई। राजाको अगले दिनकी एकादशिका व्रत था ओर आज पारण करनेका समय बीतता जा रहा था तो सोचने लगे की अब क्या किया जाय। अब तो द्वादशी केवल कुछ ही क्षण शेष रह गयी थी। स्वयं को धर्मसंकट में देख राजा अम्बरीष ब्राह्मणों से परामर्श करते हुए बोले – “मान्यवरों ! ब्राह्मण को बिना भोजन करवाए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते भोजन न करना – दोनो ही मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं। इसलिये इस समय आप मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे कि मैं पाप का भागी न बन सकूँ।”

ब्राह्मण बोले – “राजन ! शास्त्रों मे कहा गया है कि पानी भोजन करने के समान भी है और नहीं भी है। इसलिये इस समय आप जल पी कर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिये।” यह सुनकर अंबरीष ने भगवनका चरणामृत पीकर पारण  कर लिया।  जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने तपोबल से जान लिया कि अंबरीष भोजन कर चुके हैं। अत: वे क्रोधित हो उठे और कटु स्वर में बोले – “ दुष्ट अंबरीष ! तू धन के मद में चूर होकर स्वयं को बहुत बड़ा मानता है। तूने मेरा तिरस्कार किया है। मुझे भोजन का निमंत्रण दिया लेकिन मुझसे पहले स्वयं भोजन कर लिया। अब देख मैं तुझे तेरी दुष्टता का दंड देता हूँ।” उन्होंने सिर के एक बाल से कृत्या नाम की राक्षसी पैदा कर दी, जो राजा अम्बरीष को मारने दौड़ी. तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राक्षसी का वध कर दिया।  इसके बाद सुदर्शन दुर्वासा की ओर दौड़ पड़ा। ये देख दुर्वासा ऋषि देवराज इंद्र, ब्रह्मा व भगवान शंकर के पास आश्रय लेने गये जहां शिवजी ने उन्हें भगवान विष्णु की ही शरण में जाने की सलाह दी। जब विष्णुकी शरणमे गये तो उसने कहा की तुमने मेरे भक्तका द्रोह किया अतः तुम उसकी शरणमे जाओ।

भगवान विष्णुकी सलाह पाकर दुर्वासा अंबरीष के पास पहुँचे और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगे। परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा की यह दुर्दशा देखकर अंबरीष को अत्यंत दुख हुआ। उन्होंने सुदर्शन चक्र की स्तुति की और प्रार्थना पूर्वक आग्रह किया कि वह अब लौट जाय। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र ने अपनी दिशा बदल ली और दुर्वासा ऋषि को भयमुक्त कर दिया।

बड़े होते-होते जब माता-पिता ने देखा कि बालक के अंदर वैराग्य अधिक उत्पन्न हो रहा है और वह समाज की व्यवहारिकता को नहीं समझ रहा है, तब उन्होंने उनका विवाह राजा अंबरीष की कन्या कंदलीसे करा दिया।  ये व ही अंबरीश राजा है जिसका उल्लेख ऊपर किया गयाहै। अंबरीष राजा ने अपनी कन्या के कई गुण बताए और ऋषि दुर्वासा ने माता-पिता की आज्ञा मानकर विवाह कर लिया। ऋषि अंबरीष दुर्वासा की क्रोधाग्नि को जानते थे, इसलिए पुत्री के साथ कोई अनिष्ट न हो इसके लिए भी चिंतित थे। उन्होंने ऋषि दुर्वासा से पत्नी से कोई भूल हो जाए तो उसे क्षमा कर दि जाय ऐसी प्रार्थना की, तब ऋषि ने उन्हें वचन दिया कि वह अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करते रहेंगे। स्वाभाविक है गृहस्थ जीवन में कुछ बातें ऊपर-नीचे तो होती ही रहती हैं। ऋषि दुर्वासा की पत्नी का नाम था कंदली, जो कि स्वभाव से कर्मठ और बहुत समझदार थीं। वह हर एक बात का ख्याल रखती थीं। किन्तु फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ हो ही जाता था, लेकिन ऋषि ने उन पर कभी क्रोध नहीं किया। उनका मूल स्वभाव जानकर ऋषि उन्हें क्षमा कर देते थे। ऐसा होने से धीरे-धीरे कंदली के स्वभाव में भी निश्चिंतता आने लगी। लेकिन एक दिन ऋषि दुर्वासा कहीं से प्रवास कर कुछ देरी से आए। रात में भोजन के बाद उन्होंने विश्राम के लिए कहा साथ ही पत्नी से कहा कि मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूर उठा दे।  मैं खुद भी कोशिश करूंगा, लेकिन थकान के कारण शायद ऐसा संभव न हो।  ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर को जरूरी अनुष्ठान करना था। अगली सुबह कंदली की ब्रह्म मुहूर्त में नींद तो खुली, लेकिन आलस के कारण न तो वह खुद उठीं और न हीं ऋषि को उठाया।  सुबह सूर्योदय के बाद जब ऋषि की आंख खुली तो दिन चढ़ आया था। अपना अनुष्ठान न कर पाने के कारण वह कंदली पर बहुत क्रोधित हुए और उन्हें भस्म हो जाने का श्राप दे दिया। ऋषि के श्राप का तुरंत असर हुआ और देवी कंदली राख बनकर रह गई।  ऋषि को भी इस घटना पर बहुत दुख हुआ, लेकिन अनुशासन स्थापित करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। जब कंदली के पिता ऋषि अंबरीष आए तो अपनी पुत्री को राख बना देखकर बहुत दुखी हुए। तब दुर्वासा ऋषि ने कंदली की राख को पेड़ में बदल दिया और वरदान दिया कि अब से यह हर पूजा व अनुष्ठान में इनका प्रयोग होगा इस तरह से केले के पेड़ का जन्म हुआ और (कदलीफल) यानी केले का फल हर पूजा का प्रसाद बन गया। 

केले के पेड़ का आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व है, इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है, ऋषि दुर्वासा क्रोधी अवश्य थे, किन्तु यह उनके प्रेम की पराकाष्ठा ही थी जो कि देवी कंदली को सदा-सदा के लिए अमर कर दिया।

       ।।। समाप्त ।।।

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