Saturday, March 28, 2026

भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?

 "भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।"भगवान् शंकर का चरणोदक तथा प्रसाद लेना चाहिए या नहीं ?"  ----   इस सम्बंध में कहीं-कहीं ऐसी धारणा बन गई है कि शंकर जी का प्रसाद तथा चरणोदक नहीं ग्रहण करना चाहिए।   हालांकि यह किसी शिवद्रोही द्वारा किया गया दुष्प्रचार मात्र है, फिर भी इसपर एक शास्त्रीय विमर्श की आवश्यकता है :----


भोजन से पहले प्रत्येक द्विजाति तथा संन्यासी को ब्रह्मार्पण करने से पूर्व अन्न दोष की निवृत्ति के लिए यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ~~~


"अन्नं ब्रह्म  रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वर:।

एवं ध्यात्वा द्विजोभुङ्क्ते अन्न दोषैर्न लिप्यते।।"


【चार प्रकार का अन्न ब्रह्मा है,  छः प्रकार का स्वाद विष्णु है, भोग लगाने वाले भोक्ता शिव है,  ऐसे ध्यान करके भोजन करने वाला द्विज अन्न दोष से लिप्त नहीं होता।】


इससे सिद्ध होता है कि भोग लगाने वाले एकमात्र शंकर ही हैं।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में जितने भी जीव है,  समस्त जीव शिव की कृपा से ही अपने-अपने खाद्य एवं पेय पदार्थ खाते-पीते हैं।


शंकर से सब शक्ति प्राप्त करते हैं,   संहार के देवता शंकर हैं,  भोजन भी संहार क्रिया है।


किसी भी देवी-देवता के मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान, भैरव, दुर्गा, महाकाली आदि समस्त देवी-देवता शिव रूप धारण किये बिना भोग नहीं लगाते। 


 वे भोग लगाते समय अपने रूप को त्यागकर शिव रूप धारण करते हैं, इसीलिए मन्दिर के पुजारी भोग लगाते समय पर्दा करते हैं।


इससे सिद्ध हुआ कि प्रत्येक देवता का प्रसाद शिव का ही प्रसाद है,  अतः शंकर के भोग से कोई नहीं बच सकता।


यदि कोई कहे कि शंकर जी के लाट पर चढ़ी जल नहीं ग्रहण करना चाहिए,  तो उनके मस्तक पर तो गंगाजी भी चढ़ी हैं,  फिर तो उसे गोमुख से लेकर गंगासागर तक कहीं भी स्नान आदि नहीं करना चाहिए।


देवताओं का पूजन गंगा जल से न करो तथा गंगाजल से जिन प्रान्तों की सिंचाई होती है, उनमें पैदा होने वाले अन्न, फल का भी सेवन न करो यदि शिव-पादोदक से इतनी ही आपत्ति है तो !


इतना ही नहीं !   भागवत् के आठवें स्कन्ध में समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलने पर जब विष्णु भगवान्  ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया,  असुरों को मोहित किया, फिर भगवान् अंतर्ध्यान हुये।


तब शिवजी की प्रार्थना पर भगवान् ने उनको मोहिनी रूप दिखाया,  उस रूप को देखकर शंकर जी के तेज से खनिज- सोना- चांदी आदि उत्पन्न हुए, उनका भी उपयोग फिर तो नहीं किया जाना चाहिए , क्योंकि ये भी तो शंकर जी से उत्पन्न हुए हैं  !


कुल मिलाकर बात यह कि शंकर जी का चरणोदक तथा प्रसाद का परित्याग करके कोई प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकता।


शिव जी के प्रसाद ग्रहण करने की प्रशंसा शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता का २२वां अध्याय में इस प्रकार किया गया है ~~~


"दृष्टवापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरत:।

भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः।।

अलं याग सहस्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि।

भक्षिते शिव नैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्।।

आगतं शिवनैवेद्य गृहीत्वा शिरसा मुदा।

भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरण पूर्वकम्।।

न यस्य शिव नैवैद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।

स पापिष्ठो गरिष्ठ: स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम्।।"


अर्थ==  शिव प्रसाद देखने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं तथा सेवन से करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।


हजारों तथा करोडों यज्ञादिकों से क्या लाभ है !  भक्त तो एकमात्र शिव प्रसाद के भक्षण से ही शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।


प्राप्त किये हुये शिव-नैवेद्य को प्रसन्नचित्त से सिर झुकाकर शिव का स्मरण करते हुए लेना चाहिए।


जिसकी शिव-प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वह पापियों में महापापी नरक को प्राप्त करता है।

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