Tuesday, March 31, 2026

जप के प्रकार-मंत्र-यंत्र?

 प्रश्न : *जप के प्रकार-मंत्र-यंत्र?*


जप के अनेक प्रकार हैं यथा


१. 'वाचिक', २. 'उपांशु', ३. 'मानस' । नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित, भ्रामरी आदि अनेक जप होते हैं ।


 'मन्त्र' साक्षात् पराशक्तिस्वरूप हैं । पराशक्ति वाणी के रूप में स्फुरित होती है अत: मन्त्रों के द्वारा सूक्ष्मा, सर्वातीता सत्ता या परावाक् (ओंकार) ही व्यक्त होता है इसीलिए मन्त्रों में अचिन्त्यशक्ति मानी जाती है—


'मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।' - परशुरामकल्पसूत्रम्। 


'मन्त्र' किसी वर्ण का उच्चारण मात्र नहीं है प्रत्युत् यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें गुरु, मन्त्र, देवता, मन आत्मा एवं प्राणवायु की एकता स्थापित की जाती है । इस ऐक्य की अवस्था में ही मन्त्रोच्चारण होता है अतः मन्त्र के साथ 'ध्यान' मिला रहता है । यह एकता 'भावना' से सिद्ध होती है । भावना-शून्य मन्त्र जप निष्फल होता है । 'मन्त्र' नादात्मक होता है । इस नाद का अनुसंधान ही शाक्त-साधना का लक्ष्य है । 'यौवनोल्लास' में अजपाजप, 'प्रौढ़ोल्लास' में मानसजप एवं 'तदन्तोल्लास' में (नाम गर्भित)मन्त्र का जप किया जाता है।


मन्त्र के दो भेद हैं-१. 'बीज' २. 'पिण्डात्मक' 


प्रत्येक श्वास के साथ सहजगति से (नाम गर्भित) ही ‘सहजजप' है । यही है —'कालध्वा' या 'प्राणध्वा' एवं यहां यंत्र एवं यंत्रोपासना भी मन्त्र-साधना का एक अङ्ग है । इसके बिना मन्त्र का आराध्य देवता प्रसन्न नहीं होता–

“विना यंत्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति ।


आचार्य अभिनवगुप्त : 

आत्मा न शृणुते यं स मानसो जप उच्यते ।

आत्मना शृणुते यस्य तमुपांशु विजानते ॥” 

- तन्त्रालोक


जय माँ त्रिपुराम्बा 💐

संकलन - पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ

श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात

परमधर्म संसद १००८

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