॥ पञ्चाङ्गपूजनम् ॥
सनातन वैदिक परम्परा में किसी भी शुभ संस्कार, मांगलिक अनुष्ठान अथवा धार्मिक कार्य के पूर्व पञ्चाङ्गपूजनम् का विशेष महत्त्व माना गया है। इसके माध्यम से शुद्धि, देवता एवं मातृशक्तियों का पूजन, आयुष्य की मंगलकामना, पितृस्मरण तथा आचार्य एवं ब्राह्मणों का विधिपूर्वक वरण किया जाता है।
१. कलशस्थापनपूर्वक पुण्याहवाचनम्
सर्वप्रथम विधिपूर्वक कलशस्थापन किया जाता है। कलश में पवित्र जल, आम्रपल्लव, नारियल आदि स्थापित कर उसमें देवशक्तियों का आवाहन एवं पूजन किया जाता है। इसके पश्चात् पुण्याहवाचनम् द्वारा स्थान, सामग्री, यजमान एवं सम्पूर्ण वातावरण की मंगलमयता तथा शुद्धि की प्रार्थना की जाती है।
पुण्याहवाचन का भाव है—यह शुभ कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो, समस्त दोषों का निवारण हो तथा यहाँ उपस्थित सभी जनों के लिए मंगल एवं कल्याण की प्राप्ति हो।
२. मातृकापूजनम्
इसके पश्चात् मातृकाओं का पूजन किया जाता है। परम्परा एवं अनुष्ठान के अनुसार षोडश मातृका अथवा सप्तघृतमातृका का पूजन किया जाता है।
मातृकाएँ मातृशक्ति के विभिन्न स्वरूपों की प्रतीक हैं। इनके पूजन का उद्देश्य अनुष्ठान में मातृशक्ति की कृपा प्राप्त करना, विघ्नों का निवारण तथा यजमान एवं परिवार के लिए सुख, शान्ति, समृद्धि और मंगल की प्रार्थना करना है।
३. आयुष्यमन्त्रजपम्
तत्पश्चात् आयुष्यमन्त्रों का जप किया जाता है। इसके द्वारा यजमान तथा परिवार के सदस्यों के लिए दीर्घायु, आरोग्य, बल, तेज एवं मंगलमय जीवन की प्रार्थना की जाती है।
वैदिक परम्परा में आयुष्य केवल दीर्घ जीवन का नाम नहीं, बल्कि स्वस्थ, धर्ममय, सदाचारी एवं सार्थक जीवन की कामना भी है।
४. नान्दीमुखश्राद्धम्
इसके पश्चात् नान्दीमुखश्राद्ध किया जाता है। यह मांगलिक कार्यों से पूर्व पितृगणों के प्रति श्रद्धा एवं कृतज्ञता प्रकट करने की वैदिक परम्परा है।
नान्दीमुखश्राद्ध के माध्यम से अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके आशीर्वाद की प्रार्थना की जाती है, ताकि आगामी शुभ कार्य निर्विघ्न एवं मंगलमय रूप से सम्पन्न हो।
५. पूजनपूर्वक आचार्यादिवरणम्
अन्त में विधिपूर्वक आचार्यादि का वरण किया जाता है। आचार्य एवं योग्य ब्राह्मणों का सम्मानपूर्वक वरण करके उन्हें निर्धारित धार्मिक कर्तव्य एवं अनुष्ठान की जिम्मेदारी प्रदान की जाती है।
आचार्य के मार्गदर्शन में शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण पूजन, संकल्प एवं अनुष्ठान सम्पन्न कराया जाता है।
इस प्रकार पञ्चाङ्गपूजनम् के माध्यम से शुद्धि, देवपूजन, मातृशक्ति का आवाहन, आयुष्य की मंगलकामना, पितृस्मरण तथा आचार्य-वरण—इन सभी का समन्वय होता है और शुभ अनुष्ठान के लिए मंगलमय वातावरण तैयार किया जाता है।
॥ नमः पार्वतीपतये ॥
॥ हर हर महादेव ॥
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