Sunday, October 18, 2026

॥ वेदों के उपाङ्ग ॥

 ॥ वेदों के उपाङ्ग ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


🔸️ वेदों के चार उपाङ्ग हैं ---  

पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र।


यहां पर उपपुराणों का भी पुराण में अंतर्भाव हैं। वैशेषिक शास्त्र का न्याय में, वेदान्त शास्त्र का मीमांसा में, महाभारत तथा रामायण आदि इतिहास ग्रन्थ तथा सांख्य, पातन्जल (योग), पाशुपत और वैष्णव आदि का धर्मशास्त्रों में अंतर्भाव है।


▪︎ १ . पुराण :---  पुराण अठारह हैं, जिनके नाम हैं = ब्रह्म-पद्म-विष्णु-शिव-भागवत-नारद-मार्कण्डेय-अग्नि-भविष्य-ब्रह्मवैवर्त-लिंग-वाराह-स्कन्द-कूर्म-गरुड़-मत्स्य-ब्रह्मांड। इसके अतिरिक्त उपपुराण हैं, जिनमें सूर्य- कालिका- नृसिंह- जमदग्नि आदि हैं।


▪︎ २ . न्याय :---   यह दो प्रकार का है, कणाद जी का वैशेषिक व गौतम जी का न्याय दर्शन।


"आन्वीक्षिकी पंचध्याय" नाम वाला शास्त्र गौतम जी का बनाया पांच अध्यायों में है।  

प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टांत-सिद्धांत-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-छल-जाति और निग्रहस्थान --- इन सोलह पदार्थों के उद्द्येश्य, लक्षण और परीक्षा द्वारा तत्त्वज्ञान कराना आन्वीक्षिकी विद्या का प्रयोजन है।


कणाद मुनि ने ६ अध्यायों में वैशेषिक-शास्त्र का निर्माण किया। द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय ---- इन ६ भाव और सातवें अभाव पदार्थ के साधर्म्य और वैधर्म्य का बोध कराना ही इसका प्रयोजन है। न्यायपद से ही इस शास्त्र का भी कथन किया गया है।


▪︎ ३ . मीमांसा :---   कर्ममीमांसा और शारीरिकमीमांसा के भेद से मीमांसा भी दो प्रकार की है।


"अथातो धर्मजिज्ञासा" से आरम्भ करके "अन्वाहार्ये च दर्शनात्" पर्यन्त बारह अध्यायों में भगवान् जैमिनी मुनि ने कर्ममीमांसा की रचना की है। 


उसमें धर्मप्रमाण-धर्मभेदाभेद-शेषशेषिभाव-क्रत्वर्थ पुरुषार्थ भेद से प्रयुक्तिविशेष- श्रुत्यर्थपाठादिक्रमभेद- अधिकारविशेष- सामान्यातिदेश, विशेषातिदेश-ऊह-बाध-तन्त्र और प्रसङ्ग ---


इस क्रम से बारह अध्यायों में बारह पदार्थों का निरूपण किया गया है। ऐसे ही जैमिनी मुनि ने चार अध्यायों में "संकर्षकाण्ड" नामक एक अन्य शास्त्र भी बनाया है, वह यद्यपि "देवताकाण्ड" से ही प्रसिद्ध है, तथापि उपासनारूप कर्म का प्रतिपादक होने से कर्ममीमांसा के ही अंतर्गत आता है। इसे वेद का पूर्वपक्ष होने से पूर्वमीमांसा के नाम से भी जानते हैं।


🔹️ शारीरिकमीमांसा :---   

"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" से आररम्भ करके "अनावृत्ति: शब्दात्" तक चार अध्यायों में शारीरिकमीमांसा नाम से भगवान् बादरायण (व्यास जी) ने एक शास्त्र बनाया है, जिसे उत्तर मीमांसा, ब्रह्मसूत्र, वेदान्त-दर्शन आदि भी कहते हैं। इसपर श्रीकण्ठाचार्य, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य---  इन सभी ने भाष्य किये हैं। 

शांकरभाष्य पर आनन्द गिरि, भामती, वेदान्त-कल्पतरु, वेदान्त-कल्पतरु-परिमल, रत्नप्रभा, प्रभृति आदि संस्कृत टिकाएं हैं।


आनन्द गिरि जी का न्याय निर्णय, वाचस्पति मिश्र की भामती, अप्पयदीक्षित का वेदान्त-कल्पतरु तथा अमलानन्द का वेदान्त-कल्पतरु-परिमल है।


▪️इसमें चार अध्याय हैं ---- 

प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद हैं।


इसके पहले अध्याय के प्रथम पाद में सभी उपनिषदों के वाक्यों का साक्षात् अथवा परम्परा से प्रत्यक् अभिन्न ब्रह्म में तात्पर्य बताया गया है तथा स्पष्ट रूप से ब्रह्मज्ञान कराने वाले वाक्यों पर विचार किया है।


दूसरे अध्याय के पहले पाद में सांख्ययोग, वैशेषिक तथा स्मृतियों में आये हुये विरोधी वचनों का वेदान्त में समन्वय किया है। दूसरे पाद में सांख्यादि अनेक मतों के दोषों को दिखाकर परपक्ष का खण्डन और अपने पक्ष का समर्थंन किया है। 

तीसरे पाद में पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुई सृष्टि के विषय में श्रुतियों के विरोधी वचनों का परिहार किया है। जैसे == छान्दोग्य उपनिषद् में पहले असत् से जगत् की उत्पत्ति पुनः सत् से जगत् की उत्पत्ति कही गई है, किन्तु सामवेद में अग्नि-जल-पृथ्वी--- इन तीन से ही उत्पत्ति कही है, इन सभी शंकाओं का समाधान किया है। तीसरे पाद में जीव विषयक शंकाओं का समाधान है। चौथे पाद में इंद्रियों से सम्बंधित श्रुतियों के विरोध का परिहार है।


तीसरे अध्याय में ब्रह्म प्राप्ति के साधन बताये हैं। प्रथमपाद में जीव के परलोक गमन से स्वर्गादि की प्राप्ति का कथन करके वैराग्य का निरूपण किया है। दूसरे पाद के पूर्व भाग में त्वं पदार्थ का शोधन तथा उत्तर भाग में तत् पदार्थ का शोधन है।  तीसरे पाद में निर्गुण परमात्मा के अनेक वेद की शाखाओं का तात्पर्य बताया है तथा प्रसङ्ग से प्राप्त सगुण ब्रह्मविद्या के विषय में सगुण ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने वाले अन्य साधनों का उपसंहार किया है। चौथे पाद में निर्गुण ब्रह्मविद्या की प्राप्ति कराने वाले बहिरङ्ग साधन वर्णाश्रम धर्म तथा यज्ञदानादि का निरूपण है। इसी पाद के अंत में ब्रह्मज्ञान तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के अन्तरङ्ग साधन शमदमादि सहित श्रवण-मनन-निदिध्यासनादि का निरूपण है।


तीसरे अध्याय में सगुण ब्रह्मविद्या तथा निर्गुण ब्रह्मविद्या के फलविशेष का वर्णन किया गया है। इसके प्रथम पाद में श्रवण-मनन-निदिध्यासन के अभ्यास से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति तथा सगुणोपासना के अभ्यास से इष्ट देव का दर्शन करके जीवन में ही उपासक द्वारा पुण्य-पाप के सम्बंध से रहित होकर मुक्ति की प्राप्ति का वर्णन किया है।

 

दूसरे पाद में जीव एक शरीर से निकलकर अन्य शरीर या अन्य लोक में कैसे जाता है, इसका विचार है। तीसरे पाद में सगुण ब्रह्मवेत्ता के मरने पर उत्तरायण मार्ग से कौन गति की प्राप्ति होती है, इसका वर्णन है। चौथे पाद के आरम्भ में निर्गुण ब्रह्मवेत्ता की विदेह कैवल्य मुक्ति का वर्णन है, इसके अंत में सगुण ब्रह्मवेत्ता की ब्रह्मलोक में कैसी स्थिति होती है , इसका वर्णन है।


यह वेदान्त-दर्शन सभी शास्त्रों का शिरोमणि है, अतः मुमुक्षुओं को इस शास्त्र का श्रवण-मनन-निदिध्यासन अवश्य करना चाहिए ---- 

ऐसा भगवान् शंकराचार्य जी ने कहा है। इसकी प्रशंसा दूसरे आचार्यों ने भी की है।


"कर्मशास्त्रे कुतो ज्ञानं तर्के नैवास्ति निश्चय:।

सांख्य योगो भिदापन्नो- शाब्दिका: शब्द तत्परा:।।

अन्ये पाखण्डिन: सर्वे ज्ञानवार्तासु दुर्बला:।

एकं वेदान्तविज्ञानं स्वानुभूत्या विराजते।।"


अर्थ==  कर्मशास्त्र के पढ़ने से ज्ञान नहीं होता। गौतम तथा कणाद के तर्क से निश्चय नहीं है। सांख्य और योग के भेद से युक्त वैयाकरणी शब्द के पीछे लिंग और विभक्ति की चिन्ता में ही लगे रहते हैं। इन पांचों के अतिरिक्त नास्तिक दर्शन वेद का खण्डन करने वाले पाखंडी हैं, अतः इन ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त नहीं होता, ये ज्ञान-चर्चा में दुर्बल है। एकमात्र वेदान्त-विज्ञान ही ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है।


▪︎ ४ .  धर्मशास्त्र :---  धर्मशास्त्रों में मनु- याज्ञवल्क्य- विष्णु- यम- अंगिरा- वसिष्ठ- दक्ष- संवर्त- शातातप- पराशर- गौतम- शंख- लिखित- हारीत- आपस्तम्ब- उशना (शुक्राचार्य)- व्यास- कात्यायन- वृहस्पति- देवल- नारद-पैठिनसि आदि मुनियों द्वारा निर्मित स्मृतियां कही जाती हैं। इन समस्त स्मृतियों में वर्णाश्रम धर्म के विभागों का निरूपण है। इनके अतिरिक्त वाल्मीकि जी तथा व्यासजी द्वारा रचित रामायण, महाभारत --- ऐतिहासिक ग्रन्थ भी धर्मशास्त्र के अंतर्गत है। सांख्यादि पांच दर्शनों का धर्मशास्त्र के अंतर्गत होने पर भी अलग से निर्देश है।

       

【पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत गुरुवंश पुराण के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के पांचवें अध्याय के आधार पर】

॥ वेदाङ्ग ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


🔸️ वेद के ६ अंग हैं :---

शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और कल्प।


● १. शिक्षा :---  इसमें वेद का शुद्ध पाठ करने के लिये ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त, समाहार, स्वरित्,अनुनासिक आदि भेद से शिक्षा दी गई है, क्योंकि उच्चारणज्ञान के न होने से अनर्थ की प्राप्ति होती है। सर्ववेदों के लिए साधारण शिक्षा को श्री पाणिनी मुनि ने "अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि" इत्यादि से आरंम्भ करके नौ खंडों में प्रकाशित किया है और प्रत्येक वेद के लिए भिन्न-भिन्न शिक्षायें 'प्रातिशाख्य' नाम से अन्यान्य ऋषियों ने बनाई है।


● २. व्याकरण :---  वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये, व्याकरण का मुख्य प्रयोजन है। प्राचीन काल में आठ प्रकार के व्याकरण थे। इनका पाणिनि ऋषि ने सारांश अपने अष्टाध्यायी व्याकरण में दिया है। इसके आरम्भ में भगवान् शङ्कर के डमरू से निकले १४ सूत्रों का वर्णन है। अष्टाध्यायी के सूत्रों पर कात्यायन ऋषि का वार्तिक है तथा पतञ्जलि ऋषि का महाभाष्य है। इन तीनों पर कैय्यट ऋषि ने विस्तार से टीका की है। 


▪️सूत्र, वार्तिक तथा भाष्य के लक्षण इस प्रकार से हैं :---


"अल्पाक्षरसन्दिग्धम् सारवद् विश्वतोमुखम्।

अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः।।"


जिसमें बहुत थोड़े अक्षर हों, किन्तु अर्थ सन्देह रहित हो, विश्वतोमुखी अर्थ (गागर में सागर भरा हुआ) सूत्र के विशेषज्ञों ने उसे सूत्र कहा है।


☆ वार्तिक :---   "उक्तानुक्त दुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते।

तं ग्रँथं वार्तिकं प्राहु: वार्तिकज्ञा: मनीषिणः।।"

मूल में कही हुई बात, न कही हुई बात तथा कठिन कही हुई बात की चिंता जहां होती है, वार्तिक के मर्म जानने वाले विद्वानों ने उसे वार्तिक कहा है।


☆ भाष्य :---  "सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वाक्यै: सूत्रानुकारिभि:।

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदोविदुः।।"

सूत्रकार के वाक्यों के अनुसार जहां अर्थ किया जाता है तथा अपने द्वारा कहे शब्दों की व्याख्या की जाती है, भाष्य के जानने वाले विद्वानों ने उसे भाष्य कहा है।


● ३. निरुक्त :---  शिक्षा, व्याकरण से वर्णों का शुद्ध उच्चारण होने पर भी वैदिक मंत्रों का अर्थ जानने की इच्छा से जो ग्रन्थ रचा जाता है, उसे निरुक्त कहते हैं। भगवान् यास्काचार्य ने १३ अध्यायों में निरुक्त की रचना की है। निरुक्त दो प्रकार का है= लौकिक निरुक्त, वैदिक निरुक्त ;  दोनों रचना इन्ही की है। लौकिक निरुक्त में महाभारत, पुराण, रामायण आती है, वैदिक निरुक्त में वैदिक देवता, द्रव्यपदार्थ के पर्यायवाची शब्दों का निरूपण है, इसको वैदिक निघण्टु भी कहते हैं। यह ५ अध्यायों में है। यास्काचार्य के अतिरिक्त अमरकोष, मेदिनी कोष आदि भी निरुक्त के अंतर्गत ही आते हैं।


● ४. छन्द :---  इसके कर्ता पिंगल ऋषि हैं। यह शास्त्र भी दो प्रकार का है --  लौकिक, वैदिक।

वैदिक छन्दों में गायत्री, उष्णिग्, अनुष्टुप्, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती आदि सात छन्द हैं। लौकिक छन्दों में शार्दूलविक्रीड़ित सृग्धरा, विराट् आदि अनेक छन्द हैं।


● ५. ज्योतिष :---  वैदिक काल के काल ज्ञान के लिए ; गर्गाचार्यादि अनेक ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस शास्त्र से सम्बंधित ग्रन्थ लिखें हैं।


● ६. कल्प :---  शास्त्रीय गुणों के उपसंहार में वैदिक अनुष्ठान का क्रमानुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए कल्प-सूत्रों की रचना हुई है। चारों वेदों के भिन्न-भिन्न कल्पसूत्र हैं। अथर्ववेद से सम्बंधित के लिए बौधायन, आपस्तम्ब, कात्यायन आदि के सूत्र हैं तथा सामवेदी प्रयोगों के लिए लाटायन-ब्रिहियायन आदि सूत्र हैं।


ये वेद के ६ अंग हुये। जैसे हमारे शरीर में मुख, नासिका, नेत्र, पैर, श्रोत्र आदि अंग हैं, वैसे ही व्याकरण भगवान् वेद का मुख, शिक्षा नासिका, निरुक्त चरण, छन्द श्रोत्र, कल्प हाथ, ज्योतिष नेत्र हैं।


----- पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत "गुरुवंश पुराण" के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के चतुर्थ अध्याय के आधार पर

॥ उपवेद ॥

॥ संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत।


ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गान्धर्ववेद, अथर्ववेद का अर्थशास्त्र


▪️आयुर्वेद :--- 

इसके आठ अंग है।


सूत्र-शरीर-इंद्रियां-चिकित्सा-निदान-विमान-कल्प-सिद्धि।

इनके उपदेशक प्रजापति ब्रह्मा, अश्विनी कुमार, धन्वन्तरि, इंद्र, भारद्वाज, आत्रेय, अग्निवेश्य, पतञ्जलि जी हैं।


▪️धनुर्वेद :---

यह चारों पादों से युक्त हैं। इसके कर्ता विश्वामित्र हैं। 


▪️इसके चार पाद हैं :--- दीक्षा पाद, संग्रह पाद, सिद्धि पाद, प्रयोग पाद। पहले पाद में धनुष के लक्षण और अधिकार का निरूपण है। धनुष को आयुध कहते हैं।


▪️धनुर्वेद के चार भेद हैं :---

मुक्त-अमुक्त-मुक्तामुक्त-यन्त्रमुक्त।


▪️मुक्त :---  

जिसका हाथ से प्रहार किया जाता है, जैसे चक्र, हथगोला आदि।


▪️अमुक्त :--- 

जिसको हाथ से नहीं छोड़ा जाता जैसे तलवार आदि।


▪️मुक्तामुक्त :--- शल्य आदि।

▪️यन्त्रमुक्त :--- वाण आदि।


मुक्तों को अस्त्र और अमुक्तों को शस्त्र कहते हैं। 

जैसे-- ब्रह्मास्त्र, वैष्णवास्त्र, पाशुपत अस्त्र।


धनुर्वेद के संग्रह पाद में देवताओं के मंत्रों सहित चारों प्रकार के आयुधों का वर्णन है। इसमें क्षत्रियों का ही अधिकार है।


दीक्षा पाद में शस्त्रों के विशेषण तथा लक्षण दिये हैं।


सिद्धि पाद में गुरु-परम्परा से मन्त्रों की सिद्धि, देवताओं की कृपा तथा अभ्यास का निरूपण है।


प्रयोग पाद में देवताओं की पूजा के अभ्यास से सिद्ध अस्त्र विशेष के प्रयोग का वर्णन है।


इस उपवेद का प्रयोजन दुष्टों का वध तथा प्रजा पालन है।


▪️गान्धर्ववेद :--- 

इस वेद के रचयिता भरतमुनि हैं। इसमें नृत्य, गीत, वाद्यादि के बहुत से भेदों का विस्तार है। इस उपवेद का प्रयोजन देवताओं की आराधना द्वारा निर्विकल्प समाधि से मुक्ति की प्राप्ति है।


▪️अर्थशास्त्र :---  

इसके अनेकों भेद हैं। उनमें से नीति शास्त्र, अश्व शास्त्र, गज शास्त्र, शिल्प शास्त्र, पाक शास्त्र तथा चौसठ कला शास्त्र है।


【पूज्य गुरुदेव भगवान् प्रणीत गुरुवंश पुराण के सत्ययुग खण्ड के प्रथम परिच्छेद के तृतीय अध्याय के आधार पर】

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