*मंत्रजप करने के कुछ सामान्य नियम*
*१. मन्त्र जप के समय निषिद्ध कार्य -*
आलस्य, जंभाई, निद्रा, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अङ्ग का स्पर्श,क्रोध, मध्य में बातें करना, जप में जल्दीबाजी करना, विलम्बपूर्वक जप, गाकर जप, सिर हिलाना, लिखित मन्त्र पढ़ना, मन्त्र का अर्थ न जानना, बीच-बीच में मन्त्र भूल जाना, इष्ट-देवता-मन्त्र एवं गुरु को पृथक्-पृथक् मानना निषिद्ध कार्य है ।
*२. मन्त्र-जप के समय आवश्यक नियम-*
भूमिशयन, ब्रह्मचर्य, मौन, गुरुसेवन, त्रिकालस्नान, पापकर्म परित्याग, नित्य पूजा, नित्यदान, देवता की स्तुति एवं कीर्तन, नैमित्तिक पूजा, इष्टदेव एवं गुरु में विश्वास, जपनिष्ठा।
*३. मन्त्र-जप के समय त्याज्य -*
कर्मव्रात्य, नास्तिक, पतित आदि से संभाषण, उच्छिष्ट मुख से वार्तालाप,असत्यभाषण, कुटिलभाषण, अनुष्ठान के समय-शपथ लेना, पहनने का वस्त्र ओढ़कर जप करना, बिना आसन के जप करना, बिना माला ढके या सिर ढककर जप करना, चलते या खाते समय जप करना, जूता पहनकर, पैर फैलाकर जप करना आदि निषिद्ध कार्य हैं । शास्त्रकारों ने अन्त में यह निर्णय किया कि-
अशुचिर्वा शुचिर्वा गच्छंस्तिष्ठन स्वपन्नपि।
मन्त्रैकशरणो विद्वान् मनसैव सदाभ्यसेत् ।
न दोषो मानसे जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा ।।
जय माँ त्रिपुराम्बा 💐
संकलन - पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्म संसद १००८
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