''महामृत्युंजय/रुद्राभिषेक कामना परकअनुष्ठान विना शिववासके अधूरा'' #शिववास ~शिव वास देखने का सूत्र :--- #शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियोंकी कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखनेके लिए 1 से 30 तक की संख्याको ही लेना चाहिए ।।
~~~~~शिव वास ज्ञान :
तिथिकी गणना शुक्लपक्षकी प्रतिपदा से करनी चाहिए. शिवार्चनके लिए शुभ तिथियाँ शुक्ल पक्ष में २,५,६,७,९,१२,१३,१४ और कृष्ण पक्ष में १,४,५,६,८,११,१२,१३,३०
तिथिको दुगुना करें,उसमे पांचको जोड़ देना चाहिए,
कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है, शिववास अच्छा बनता है । बाकि
बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।
इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...
१.कैलाश अर्थात = सुख,
२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति,
३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि
४.सभा = सन्ताप,
५.भोजन = पीड़ा,
६.क्रीड़ा = कष्ट,
७.श्मशाने = मरण ।।
##शिव-वास:--
#'1) यह ध्यान रहे कि शिव-वासका विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है...
#2) निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है..
#3) ज्योतिíलंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, सावनके सोमवार आदि पर्वो में शिव-वासका विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है...
#4) वस्तुत:शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिवको शीघ्र प्रसन्न करके साधकको उनका कृपापात्र बना देता है और तब उसकी (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी ) समस्याएं स्वत:समाप्त हो जाती हैं..
#5) दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से सारे (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) पाप-ताप-शाप धुल जाते हैं.
#6) कृष्णपक्षकी सप्तमी (7), चतुर्दशी (14) तथा शुक्लपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), पूíणमा (15) में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं अतएव इन तिथियों में किसी कामनाकी पूर्तिके लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होगी. इससे यजमान पर विपत्ति आ सकती है.
#7) कृष्णपक्षकी द्वितीया (2), नवमी (9) तथा शुक्लपक्षकी तृतीया (3) व दशमी (10) में महादेवजी देवताओंकी सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं. इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप (दुख) मिलेगा.
#8)कृष्णपक्षकी तृतीया (3), दशमी (10) तथा शुक्लपक्षकी चतुर्थी (4) व एकादशी (11) में नटराज क्रीडारत रहते हैं.इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतानको कष्ट दे सकता है.
#9)कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेव भोजन करते हैं.
--- इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक ठीक नहीं माना जाता है लेकिन निष्काम ठीक हैं।
#10) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में कम बेशी) अवश्य सफल होता है
और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.
#11) प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), अमावस्या तथा शुक्लपक्षकी द्वितीया (2) व नवमी (9) के दिन भगवान शिव माता गौरीके साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है.
#12) कृष्णपक्षकी चतुर्थी (4), एकादशी (11) तथा शुक्लपक्षकी पंचमी (5) व द्वादशी (12) तिथियों में भगवान शंकर कैलास पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है.
#13)कृष्णपक्षकी पंचमी (5), द्वादशी (12) तथा शुक्लपक्षकी षष्ठी (6) व त्रयोदशी (13) तिथियों में भगवान शंकर नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं… अत:इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है…
#14) किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वासका विचार करने पर अनुष्ठान (अपनी श्रद्धा और विधिके आधार में न्यूनाधिक्य) अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.
~~~~~~ नित्य/ नैमित्तिक मे आवश्यक नहीं होता..!!
विशेष... सोसल मीडिया के किसी भी लेख की पुष्टि अपने आचार्य पुरोहित से अवश्य करना चाहिए..!!
शिववास ज्ञान
तिथिं च द्विगुणी कृत्य बाणैः संयोजये ततः ।
सप्तभिश्च हरेत् भागःशिववासः प्रकीर्तितः ॥
एकेन वासः कैलाशे द्वितीयं गौरी सन्निधौ ।
तृतीयं वृषभारुढ़ः सभायां च चतुर्थके ।
पंचमे भोजने चैव क्रीड़ायां च रसात्मके ।
श्मशाने सप्तशेषे च शिववासः उदीरितः ।।
कैलासे लभते सौख्यं गौर्या च सुख सम्पदः ।
वृषभेऽभीष्टसिद्धिः स्यात् सभा संतापकारिणी ।
भोजने च भवेत् पीड़ा क्रीडायां कष्टमेव च ।
श्मशाने मरणं ज्ञेयं फलमेवं विचारयेत् ॥
वैसे ये सभी काम्यप्रयोगों के लिये है । निष्काम पूजा में कुछ भी देखनें की आवश्यकता नहीं है
Arun Dubey Jabalpur
❗ शिवार्चनसृति ❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️
प्र०- शिववास का विचार कब-कब करना आवश्यक नहीं होता❓ लोग इसे परिहार के रूप में देखते हैं..?
उत्तर:- शास्त्रीय प्रमाण:- इन सभी ग्रंथों में (निर्णय सिंधु, शिवमहापुराण, नारद संहिता, शिवार्चनम्, मुहुर्त कल्पद्रुम)
श्रावणेऽधिकमासे च आर्द्रायाश्च गते रवौ।
शिवभेन्दुगते योगे, शुक्ले च व्यतिपातके॥
हरानङ्गहरीणाञ्च तिथिषु करणे चतुष्पदे।
सोमवारे शुभे ब्राह्मे प्रदोषाख्येऽभिजित्क्षणे॥
शिवरात्र्यादि पर्वेषु उत्सवेषु निमित्तके।
नित्याराधनकाले च शिववासं न चिन्तयेत्॥
👉अर्थात्:- श्रावणमास में, अधिकमास (मलमास) में, जब सूर्य आर्द्रा में रहे तब, शुक्ल और व्यतिपात योगों में अष्टमी, त्रयोदशी तिथियों में,सोमवार, प्रदोष तिथि व प्रदोष काल में, अभिजित मुहूर्त में, शिवरात्रि में व नित्य आराधना में शिववास के विचार की आवश्यकता नहीं होती।
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