Wednesday, August 19, 2026

ऋष्यशृंग ऋषि (श्रृंगी ऋषि) की संपूर्ण पौराणिक कथा

 *ऋष्यशृंग ऋषि (श्रृंगी ऋषि) की संपूर्ण पौराणिक कथा*


ऋष्यशृंग (श्रृंगी ऋषि) की कथा हिंदू धर्म की अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। इसका वर्णन मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा अनेक पुराणों में मिलता है। यह कथा तप, ब्रह्मचर्य, निष्कपटता, धर्म और लोककल्याण का अद्भुत उदाहरण है।

ऋष्यशृंग का चमत्कारी


*जन्म*

प्राचीन काल में महान तपस्वी महर्षि विभाण्डक घोर तपस्या करते थे। एक दिन उन्होंने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को देखा। उनके मन में क्षणभर के लिए विकार उत्पन्न हुआ और उनके तेज से एक दिव्य गर्भ की उत्पत्ति हुई। पौराणिक कथाओं के अनुसार वह तेज एक हिरणी तक पहुँचा, जिसने एक बालक को जन्म दिया।

उस बालक के माथे पर हिरण के सींग जैसा उभार था। इसी कारण उसका नाम ऋष्यशृंग पड़ा। संस्कृत में "ऋश्य" का अर्थ हिरण और "शृंग" का अर्थ सींग होता है।

वन में पालन-पोषण

महर्षि विभाण्डक ने अपने पुत्र को घने वन में आश्रम बनाकर पाला। उन्होंने निश्चय किया कि पुत्र का मन संसार के मोह से दूर रहेगा।

ऋष्यशृंग ने बचपन से केवल अपने पिता, पशु-पक्षियों, वृक्षों और प्रकृति को ही देखा था। उन्होंने कभी किसी अन्य मनुष्य, विशेषकर किसी स्त्री को नहीं देखा था।

वे अत्यंत सरल, निष्कपट, सत्यवादी और पूर्ण ब्रह्मचारी थे। उनकी तपस्या से देवता भी प्रसन्न रहते थे।


*अंगदेश में भयंकर अकाल*

उसी समय अंगदेश के राजा रोमपाद (जिन्हें लोमपाद भी कहा जाता है) के राज्य में भीषण अकाल पड़ गया।

न वर्षा हो रही थी, न खेतों में अन्न उग रहा था। नदियाँ सूख गईं, पशु-पक्षी मरने लगे और प्रजा भूख से व्याकुल हो उठी।

राजा ने विद्वान ऋषियों और ब्राह्मणों से उपाय पूछा।

उन्होंने कहा—

"यदि पूर्ण ब्रह्मचारी ऋष्यशृंग आपके राज्य में प्रवेश करेंगे, तो उनके तप के प्रभाव से इंद्रदेव प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे।"

ऋष्यशृंग को लाने की योजना

समस्या यह थी कि ऋष्यशृंग कभी आश्रम से बाहर नहीं निकले थे और उनके पिता किसी को भी उनके पास आने नहीं देते थे।

राजा रोमपाद ने बुद्धिमान मंत्रियों से सलाह ली। अंततः यह योजना बनी कि कुछ सुंदर, विनम्र और संगीत-कला में निपुण स्त्रियों को वन में भेजा जाए।

उनका उद्देश्य छल से ऋष्यशृंग को राज्य तक लाना था।


*पहली भेंट*

जब महर्षि विभाण्डक आश्रम से बाहर गए, तब वे स्त्रियाँ वहाँ पहुँचीं।

ऋष्यशृंग ने जीवन में पहली बार किसी स्त्री को देखा। उन्हें लगा कि ये भी किसी अन्य प्रकार के तपस्वी हैं।

उन्होंने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया।

स्त्रियों ने मधुर संगीत गाया, स्वादिष्ट फल और मिठाइयाँ खिलाईं तथा प्रेमपूर्वक उनसे बातें कीं।

ऋष्यशृंग ने पहले कभी ऐसा व्यवहार नहीं देखा था, इसलिए वे अत्यंत प्रसन्न हुए।

कुछ समय बाद वे स्त्रियाँ लौट गईं।

दूसरी बार आगमन

कुछ दिनों बाद वे पुनः आईं और इस बार ऋष्यशृंग को अपने साथ चलने का आग्रह किया।

उनकी सरलता और निष्कपट स्वभाव के कारण वे उनके साथ चल पड़े।

जैसे ही ऋष्यशृंग ने अंगदेश की सीमा में प्रवेश किया, आकाश में बादल घिर आए।

कुछ ही समय में मूसलाधार वर्षा होने लगी।

सूखी धरती हरी-भरी हो गई। नदियाँ भर गईं और पूरा राज्य आनंद से झूम उठा।

प्रजा ने ऋष्यशृंग का भव्य स्वागत किया।


*शान्ता से विवाह*

राजा रोमपाद अपनी भूल और योजना के लिए लज्जित थे। उन्होंने ऋष्यशृंग से क्षमा माँगी।

अपनी पुत्री शान्ता का विवाह ऋष्यशृंग से कर दिया।

अनेक परंपराओं के अनुसार शान्ता, राजा दशरथ की ज्येष्ठ पुत्री थीं, जिन्हें उन्होंने अपने मित्र राजा रोमपाद को गोद दे दिया था।

ऋष्यशृंग और शान्ता ने धर्मपूर्वक गृहस्थ जीवन बिताया।


*पुत्रकामेष्टि यज्ञ*

कुछ समय बाद राजा दशरथ संतान न होने से अत्यंत चिंतित थे।

गुरु वशिष्ठ की सलाह पर ऋष्यशृंग को अयोध्या बुलाया गया।

ऋष्यशृंग ने वैदिक विधि से पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर अग्निदेव प्रकट हुए और दिव्य खीर से भरा स्वर्ण पात्र राजा दशरथ को दिया।

राजा ने वह खीर अपनी रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—को दी।

समय आने पर चार दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ—

श्रीराम

भरत

लक्ष्मण

शत्रुघ्न

इस प्रकार ऋष्यशृंग अप्रत्यक्ष रूप से भगवान श्रीराम के अवतार की कथा के महत्वपूर्ण पात्र बन गए।


*कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ*

सच्चा तप और पवित्र चरित्र समाज के कल्याण का कारण बनता है।

निष्कपटता महान गुण है, लेकिन उसके साथ विवेक भी आवश्यक है।

धर्म और तप की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।

महान ऋषि केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त लोक के कल्याण के लिए जीते हैं।

भगवान की योजना में प्रत्येक पात्र का अपना विशेष महत्व होता है।

ऋष्यशृंग ऋषि की यह कथा हमें बताती है कि तप, ब्रह्मचर्य, विनम्रता और धर्म का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों का कल्याण करता है।


साभार स्वीकृत

~ आराधना कुमारी,

जेहानाबाद

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