Friday, August 21, 2026

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

 पञ्चाङ्ग की उपयोगिता एवं पाँचों अंगों का शास्त्रीय विवेचन

प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट 

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भारतीय सनातन परम्परा में काल का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे यहाँ प्रत्येक धार्मिक, आध्यात्मिक एवं मांगलिक कर्म को उचित काल में करने की परम्परा रही है। इसी काल-विचार को समझने और दैनिक जीवन में उपयोग करने का प्रमुख साधन है—पञ्चाङ्ग।


‘पञ्चाङ्ग’ शब्द दो शब्दों से बना है—‘पञ्च’ अर्थात् पाँच और ‘अङ्ग’ अर्थात् अंग। अर्थात् जिस काल-विधान में पाँच प्रमुख अंगों का विचार किया जाता है, उसे पञ्चाङ्ग कहा जाता है।


पञ्चाङ्ग के पाँच अंग हैं :—

१. तिथि

२. वार

३. नक्षत्र

४. योग

५. करण


इन पाँचों के माध्यम से किसी दिन के काल की प्रकृति, शुभाशुभता तथा विभिन्न कर्मों के लिए उसकी अनुकूलता का विचार किया जाता है।


▪︎ १. तिथि :-

सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर कोणीय अंतर के आधार पर बनने वाली काल-इकाई को तिथि कहा जाता है। सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२ अंश का अंतर होने पर एक तिथि पूर्ण होती है।


एक चन्द्रमास में सामान्यतः ३० तिथियाँ मानी जाती हैं—


शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ तिथियाँ तथा

कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या तक १५ तिथियाँ।


तिथियों के नाम हैं :—

प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा/अमावस्या।


तिथियों की पाँच संज्ञाएँ

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तिथियों को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है—

नन्दा — १, ६, ११

प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी।


भद्रा — २, ७, १२

द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी।


जया — ३, ८, १३

तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी।


रिक्ता — ४, ९, १४

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी।


पूर्णा — ५, १०, १५

पंचमी, दशमी और पूर्णिमा/अमावस्या।


मुहूर्त-विचार में इन तिथि-संज्ञाओं का विशेष महत्व है। प्रत्येक तिथि सभी प्रकार के कार्यों के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन, यात्रा, व्यापारारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान आदि में केवल तिथि देखकर निर्णय न करके सम्पूर्ण पञ्चाङ्ग तथा मुहूर्त का विचार किया जाता है।


▪︎ २. वार :-

एक सप्ताह में सात वार होते हैं :—

रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।


प्रत्येक वार का सम्बन्ध एक-एक ग्रह तथा उससे सम्बद्ध देवता और कर्म-प्रकृति से माना गया है। इसलिए विभिन्न कार्यों के लिए वार का चयन भी मुहूर्त-विचार का महत्वपूर्ण अंग है।


उदाहरण के लिए सोमवार का सम्बन्ध चन्द्रमा से, मंगलवार का मंगल से, बुधवार का बुध से, गुरुवार का बृहस्पति से, शुक्रवार का शुक्र से तथा शनिवार का शनि से माना जाता है।


अतः किसी कार्य की सफलता के लिए केवल दिन देखना पर्याप्त नहीं, बल्कि कार्य के अनुरूप वार की अनुकूलता का विचार भी आवश्यक है।


▪︎ ३. नक्षत्र :-

आकाश में चन्द्रमा की गति के मार्ग को २७ प्रमुख नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।


२७ नक्षत्र हैं—

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती।


कुछ परम्पराओं में अभिजित् को विशेष रूप से २८वें नक्षत्र के रूप में भी स्वीकार किया गया है।


नक्षत्रों की प्रकृति के आधार पर मुहूर्तशास्त्र में इन्हें विभिन्न संज्ञाओं में विभाजित किया जाता है—ध्रुव, चर, उग्र, मिश्र, क्षिप्र, मृदु और तीक्ष्ण।


किस नक्षत्र में कौन-सा कार्य करना चाहिए, इसका निर्णय कार्य की प्रकृति के अनुसार किया जाता है। इसलिए किसी नक्षत्र को मात्र ‘शुभ’ या ‘अशुभ’ कह देना पर्याप्त नहीं है।


▪︎ ४. योग :-

सूर्य और चन्द्रमा की गतियों से प्राप्त विशेष कोणीय सम्बन्ध के आधार पर २७ योगों की गणना की जाती है।


इनके नाम हैं :—

विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान्, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृति।


इनमें कुछ योग सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माने जाते हैं, जबकि विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति को सामान्यतः अशुभ अथवा त्याज्य योगों में गिना जाता है।


विशेष बात यह है कि किसी योग को देखकर ही अंतिम निर्णय नहीं किया जाता। कार्य की प्रकृति, तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न आदि का भी विचार आवश्यक है।


▪︎ ५. करण :-

एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है। इस प्रकार एक तिथि में सामान्यतः दो करण होते हैं।


कुल ११ करण माने गए हैं :—

बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न।


इनमें विष्टि करण को भद्रा भी कहा जाता है। सामान्यतः भद्रा में अनेक मांगलिक कार्यों को करने से बचने की परम्परा है।


करण का विचार विशेष रूप से मुहूर्त-निर्णय में किया जाता है।


पञ्चाङ्ग केवल कैलेंडर नहीं है

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आज के समय में बहुत से लोग पञ्चाङ्ग को केवल तिथि अथवा पर्व बताने वाला कैलेंडर समझते हैं। वास्तव में पञ्चाङ्ग इससे कहीं अधिक व्यापक है।


पञ्चाङ्ग हमें यह समझने में सहायता करता है कि :—

कौन-सा दिन है?

कौन-सी तिथि है?

कौन-सा नक्षत्र चल रहा है?

कौन-सा योग है?

कौन-सा करण है?

और किसी विशेष कर्म के लिए काल की स्थिति कैसी है?


इसीलिए सनातन परम्परा में किसी भी महत्वपूर्ण धार्मिक या मांगलिक कर्म के पूर्व तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का विचार किया जाता है।


चन्द्रमास और बारह मास

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भारतीय चान्द्र परम्परा में वर्ष के बारह प्रमुख मास माने जाते हैं—

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।


इन मासों के नामकरण का सम्बन्ध पूर्णिमा के समय चन्द्रमा की नक्षत्र स्थिति से जोड़ा गया है। जैसे—

चित्रा → चैत्र

विशाखा → वैशाख

ज्येष्ठा → ज्येष्ठ

पूर्वाषाढ़ा/उत्तराषाढ़ा → आषाढ़

श्रवण → श्रावण

पूर्वाभाद्रपदा/उत्तराभाद्रपदा → भाद्रपद

अश्विनी/भरणी आदि से सम्बद्ध परम्पराएँ → आश्विन

कृत्तिका → कार्तिक

मृगशिरा → मार्गशीर्ष

पुष्य → पौष

मघा → माघ

पूर्वाफाल्गुनी/उत्तराफाल्गुनी → फाल्गुन।


यह व्यवस्था भारतीय कालगणना की वैज्ञानिक एवं खगोलीय परम्परा को दर्शाती है।


पञ्चाङ्ग का दैनिक जीवन में महत्व

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सनातन धर्म में प्रातःकाल उठकर तिथि, वार आदि का स्मरण करने की परम्परा रही है। पञ्चाङ्ग के माध्यम से व्यक्ति अपने दिन को धार्मिक एवं व्यवस्थित ढंग से प्रारम्भ कर सकता है।


विशेष रूप से :—

व्रत एवं उपवास,

पूजा-पाठ,

जप एवं अनुष्ठान,

संस्कार,

विवाह,

गृहप्रवेश,

यात्रा,

व्यापारारम्भ,

यज्ञ एवं धार्मिक आयोजन


आदि में पञ्चाङ्ग का विचार किया जाता है।


पञ्चाङ्ग हमें केवल शुभ-अशुभ बताने का साधन नहीं देता, बल्कि काल के प्रति जागरूकता प्रदान करता है।


अतः सनातन परम्परा में पञ्चाङ्ग का अध्ययन केवल ज्योतिषियों तक सीमित विषय नहीं है। प्रत्येक गृहस्थ को कम-से-कम अपने दैनिक जीवन की तिथि, वार, नक्षत्र और प्रमुख पर्व-त्योहारों की जानकारी रखने का प्रयास करना चाहिए।


काल का ज्ञान ही कर्म को उचित समय से जोड़ता है और उचित समय में किया गया कर्म ही मुहूर्त-विचार की मूल भावना है।


इसीलिए पञ्चाङ्ग हमारे लिए केवल एक पंचांग-पुस्तिका नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष-विज्ञान और सनातन जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण आधार है।


॥ श्रीसीतारामाभ्यां नमः ॥

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