Monday, October 8, 2012

દીકરી


દીકરી
 દીકરી શબ્દ બોલવામાં ખાલી ત્રણ અક્ષર નો બનેલો છે એનું મહત્વ ખુબ વજનવાળું છે ……
માં -બાપ ને ત્યાં જન્મે ત્યારથી લઇ ને એ ભગવાન પાસે જાય ત્યાં સુધી ની એની યાત્રા કેટલી બધી પીડાઓ ,દુખ , સુખ અને જુદા જુદા આરોહઅવરોહ થી બનેલી છે. છતાં પણ એ હમેશા પોતાના મુખ પર ખુશી લઇ ને ફરે છે ….
બધા ને મારા મારા પોતાના કરીને રાખતી દીકરી નું કોઈ પોતાનું હોઈ છે ખરું ?
માતા- પિતા ના ઘરે જન્મ લે ત્યારે તે ત્યાની આબરુ મન મર્ય

ાદા નો ખયાલ રાખે ,
સાસરે જાઇ ત્યાં સાસરિયાં ને પોતાના કરી લે, લોકો કહે કે દીકરી કેવી “પરાયું ધન “પણ
દીકરી નું પોતાનું કેવાઈ એવું એકેઈ ઘર હોઈ છેખરું ? નથી હોતું …… છે ને સાચી વાત ?
એ જન્મે ત્યારે માં-બાપ ની કેવાઈ તોઈ પછી” પારકી ” તો ખરી જ …….
અને લગ્ન થઇ એટલે સાસરિયાં ની ને પિયર માટે તો પારકી હતી જ અને સસરા માતો નવી હોઈ જ………………
જયારે લગ્ન થઇ ત્યારે ………….
એ એક સરસ મજાની વ્યવસ્થિત આકાર સાથે ખીલેલી કળી પોતે ખુદ મુરજાઇ જઈને ફરીથી પોતાના ના માં પ્રાણ પુરવાની કોશીશ કરે. અને થોડી ઘણી સફળ પણ થઇ હોઈ ત્યાં સંભળાવવામાં આવે કે આ તો “શું વહુ એ તો પારકી દીકરી એને થોડું આપડું દાજે ?”
એટલે એને પોતે કરેલી કોશીશ નાકામ થતી લાગે……….
અને એ કોશીશ માં ને કોશિશ માં એની આખી ઝીંદગી નીકળી જાય છે ….
શું આ જ દીકરી નું જીવન છે ?????

Note 1

तीन आदते जिन्होंने हम भारतीयों को सबसे ज्यादा नुकसान किया:
- सिर्फ पैसा अर्जित करने वाली "शिक्षा" को "ज्ञान" समझकर अपने धर्म, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास और महापुरुषों से दूरी
- "शिक्षा" से अर्जित "सीमित जानकारी" से पैदा हुए अहम् के कारण, आज की "वास्तविकता" को मानने से इनकार
- "चिंतन और मनन" का पूर्णतः त्याग - "चिंतन और मनन" ही हमें अपने स्वं से जोड़ता है और मन को शांति और संतोष प्रदान करता है

और यही कारण है कि आज अधिकाँश लोग अपनी जिम्मेदारियों (Responsibilities) से कहीं अधिक अधिकारों (Rights) कि बातें करते है.
-- हमारी सुरक्षा राष्ट्र और समाज की सुरक्षा में निहित है.

वाराहमिहिर

वाराहमिहिर गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और ज्योतिष शास्त्री थे। इनका जन्म छठी शताब्दी ईसवी में उज्जैन में हुआ। उस समय भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग, गुप्तकाल, चल रहा था। देश वाह्य आक्रमणों से सुरक्षित था और प्रजा सुखी थी। शांति और समृद्धि के समय में विज्ञान, साहित्य और कला के क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। वाराहमिहिर चन्द्रगुप्त के नवरत्नों में से एक थे।
वाराहमिहिर के नाम के बारे में एक कथा प्रचलित है। वाराहमिहिर ने ज्योतिष-शास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उन्हें नव-रत्न की उपाधि दी। राजा विक्रमादित्य के पुत्र-जन्म के समय मिहिर ने भविष्यवाणी की कि अमुक वर्ष के अमुक दिन एक सुअर (वाराह) इस बालक को मार डालेगा। राजा ने अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए बहुत इंतजाम किये लेकिन अंत में मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। तब से मिहिर वाराहमिहिर कहलाये। वाराहमिहिर सूर्य के उपासक थे। यह माना जाता है कि सूर्य के आशीर्वाद से ही उनको ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त हुआ।
वाराहमिहिर ने तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थ, वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका की रचना की।
वृहत्संहिता में प्रकृति की भाषा को समझने और उससे भविष्य का पता लगाने का प्रयास किया गया है। अगर हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि प्रकृति हर पल किसी न किसी रूप में हमें कुछ बताने की कोशिश करती रहती है। प्राचीन समय से ही हिन्दुओं ने प्रकृति की आवाज को सुनने और समझने का प्रयत्न किया है। आज वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि पशु-पक्षी मौसम में होने वाले बदलाव को पहले से भांपकर अपने आचरण में परिवर्तन करते हैं। वृहत्संहिता में पशु-पक्षी इत्यादि के आचरण में होने वाले परिवर्तन का अवलोकन करके भविष्यवाणी करने के तरीके बताये गए हैं। इसमें कृषि विज्ञान की जानकारी भी है। कृषि के लिए जमीन की तैयारी, एक पेड़ की कलम को दूसरे में लगाने, सही मौसम में वृक्षों की सिंचाई करने, वृक्षों के आरोपण की दूरी, वृक्षों में उत्पन्न बीमारियों की चिकित्सा, जमीन में गड्ढ़ा कर बोने के तरीके आदि का भी उल्लेख किया है। वाराहमिहिर ने ज्योतिष के आधार पर नक्षत्रों के अनुसार वर्षा के विषय में विस्तृत विवरण दिया है। उस समय भी वर्षा को मापने के लिए एक विशेष मानक पैमाने का प्रचलन था। बृहत्संहिता में ग्रहण का वास्तविक कारण भी बताया गया है। वाराहमिहिर ने लिखा है - चन्द्रग्रहण में चन्द्र पृथ्वी की छाया में आ जाता है तथा सूर्यग्रहण में चन्द्र सूर्य में प्रविष्ट हो जाता है (अर्थात सूर्य एवं पृथ्वी के बीच में चन्द्र आ जाता है)। ‘वृहत्‌ संहिता‘ में अस्त्र-शस्त्रों को बनाने के लिए अत्यंत उच्च कोटि के इस्पात के निर्माण की विधि का वर्णन किया है। भारतीय इस्पात की गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि उनसे बनी तलवारों के फारस आदि देशों तक निर्यात किये जाने के ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।
वृहज्जातक में वाराहमिहिर ने ज्योतिष विज्ञान विशेषतः यात्रा मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, जन्म-कुंडली आदि का वर्णन किया है।
पंचसिद्धान्तिका में खगोल शास्त्र का वर्णन किया गया है। इसमें वाराहमिहिर के समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में ग्रह और नक्षत्रों का गहन अध्ययन किया गया है। इन सिद्धांतों द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों के समय और स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वाराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि वाराहमिहिर कुछ समय महरौली (मिहिरावली), दिल्ली में भी रहे। इतिहासकारों के अनुसार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा वहां पर 27 मंदिरों का निर्माण कराया गया था। यह कार्य वाराहमिहिर के मार्गदर्शन में किया गया। इन मंदिरों को मुस्लिम शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया। इस स्थान को मिहिरावली यानी वाराहमिहिर (मिहिर) की देखरेख में बने मंदिरों की पंक्ति (अवली) के नाम से जाना गया। जगप्रसिद्ध कुतुबमीनार एक समय में वाराहमिहिर की वेधशाला थी।

Thursday, October 4, 2012

हयग्रीव अवतार -

हयग्रीव विष्णु के अवतार थे। जैसा कि नाम से स्पष्ट है उनका सिर घोड़े का था और शरीर मनुष्य का। वे बुद्धि के देवता माने जाते हैं।पृथ्वी के एकार्णव में विलीन हो जाने पर श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में शेषनाग शय्या पर क्षीर सागर में शयन कर रहे थे। उनकी नाभि से सहस्त्र दल पद्म प्रकट हुआ। उस नाभि कमल पर लोकों के पितामह श्री ब्रह्मा प्रकट हुए। उस सहस्त्र दल पर श्री हरि नारायण की प्रेरणा से पहले से ही रजोगुण व तमोगुण की प्रतीक जल की दो बूंदें पड़ी थी। जब एक बूंद पर श्री हरि की नजर पड़ी तो वह ‘मधु’ नामक दैत्य के रूप में परिणत हो गई। जल की दूसरी बूंद पर उनकी दृष्टि पडऩे से ‘कैटभ’ नामक दैत्य प्रकट हुआ। दोनों दैत्य अत्यंत बलशाली व वीर थे तथा विशालकाय शरीर वाले थे। वे दोनों कमलनाल के सहारे ब्रह्मा जी के समीप पहुंच गये। उस समय ब्रह्मा जी सृष्टि रचना में प्रवृत्त थे। उनके समीप अत्यंत सुन्दर स्वरूप धारण किये चारों वेद थे। दैत्यों ने उन्हें देखा और उनका हरण कर लिया। इस प्रकार श्रुतियों को लेकर वे महासागर में प्रवेश करके रसातल में पहुंच गये।
श्रुतियों को अपने समीप न देखकर विधाता दुखी होकर विलाप करने लगे— ‘वेद ही मेरे नेत्र, अद्भुत शक्ति, परम आश्रय तथा उपास्य देव हैं। उनके नष्ट हो जाने से मुझ पर घोर विपत्ति आ पड़ी है।’ फिर उन्होंने वेदों के उद्धार तथा रक्षा के लिये श्री हरि नारायण से स्तुति पूर्वक प्रार्थना की, ‘हे कमलनयन! आपसे उत्पन्न मैं आपका पुत्र कालातीत अर्थात कालरहित हूं। आपने मुझे वेद रूपी नेत्र प्रदान किये हैं। उनके चले जाने से मैं अंधा हो गया हूं। चारों ओर अंधकार है। मैं अब सृष्टिï-रचना में असमर्थ हो गया हूं। इसलिये हे स्वामी निद्रा त्यागकर मुझे मेरे वेद रूपी नेत्र वापस कीजिए। यह कार्य केवल आप ही कर सकते हैं।’
श्री हरि ने ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर निद्रा का त्याग कर दिया और वे एक कान्तिमय हयग्रीव के रूप में प्रकट हुए। उनकी गर्दन और मुखाकृति घोड़े की सी थी। वे समस्त ब्रह्मांड को अपनी आकृति में समेटे हुए थे। इस प्रकार अत्यंत पराक्रमी, शक्तिशाली, आदि-अंत से रहित भगवान ने श्री हयग्रीव रूप में अवतार ग्रहण किया तत्पश्चात वे महासमुद्र द्वारा रसातल में पहुंच गये। वहां उन्होंने सामगान का सस्वर गान शुरू किया। चारों ओर उनका मधुर गान गूंजने लगा तथा इसने दोनों दैत्यों ‘मधु-कैटभ’ को भी मुग्ध कर दिया। उन दोनों ने वेदों को रसातल में फेंक दिया और उस मधुर ध्वनि की ओर दौड़ पड़े। भगवान ने अवसर पाकर वेदों को रसातल से निकाल लिया और लाकर ब्रह्मा जी को दे दिया। दैत्यों ने पाया कि वहां न कोई गायक और न ही मधुर गान था। वे वापस रसातल में आए किंतु वहां वेदों को न पाकर क्रोध से पागल हो गये। वे दोनों वेदों को वहां से ले जाने वाले अपने शत्रु को ढूंढऩे निकल पड़े। उन्होंने देखा कि महासागर की विशाल लहरों पर भगवान शेषशय्या पर शयन कर रहे हैं। उन दोनों ने भयानक गर्जना की तथा भगवान को जगाया। श्री हरि ने जान लिया कि वे युद्ध करने के लिये तत्पर हैं। भगवान उठे और दैत्यों से भयानक संग्राम छेड़ दिया। यह बाहुयुद्ध था जो पांच सहस्त्र वर्षों तक चलता रहा। इस युद्ध में दैत्यों को हराना असंभव जानकर भगवान ने अपनी महामाया से दोनों की बुद्धि को भ्रमित कर दिया। फिर उन्होंने दोनों से कहा, ‘मैं तुम्हारे पराक्रम से बहुत प्रसन्न हूं। तुम अत्यंत बलशाली व प्रशंसा के पात्र हो। इसलिये कोई भी वर मांग लो।’ किंतु उन दोनों ने भगवान का परिहास किया और उन्हें ही अपने से वर मांगने को कहा। भगवान ने मांगा कि ‘तुम दोनों मेरे हाथ से मारे जाओ।’ वे ठगे से रह गये और प्रभु से कहा कि ‘हम आपसे यह वर मांगते हैं— आवां जहि नयत्तोर्वी सलिलेन परिप्लुता। अर्थात जहां पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहां सूखा स्थान हो वहीं हमारा वध हो।’ फिर भगवान ने जल पर अपनी जांघों को फैलाकर जल पर ही स्थल दिखला दिया और दैत्यों से कहा, ‘इस स्थान पर जल नहीं है, तुम अपना मस्तक रख दो। आज मैं भी सत्यवादी रहूंगा और तुम भी।’ उन्होंने वैसा ही किया। भगवान ने हयग्रीव रूप में ही तीक्ष्ण चक्र से उन्हें काट डाला। इस प्रकार वेदों से सम्मानित और श्री नारायण से सुरक्षित होकर ब्रह्मा जी सृष्टि कार्य में संलग्न हो गये।
दूसरे कल्प में दिति का एक पुत्र बहुत ही बलवान तथा पराक्रमी हुआ जिसका नाम हयग्रीव था। किंतु वह दैत्य आरंभ से ही मां भगवती का भक्त था। उसने एक हजार वर्ष तक मां जगदम्बा की आराधना की। फिर एक दिन सिंहवाहिनी माता उसके सम्मुख प्रकट हुई और कहा, ‘मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं इसलिये तुम वर मांगो।’ दैत्य हयग्रीव ने कहा, ‘हे देवी, मेरी कामना है कि मैं अमर भोगी बन जाऊं।’ देवी ने कहा, ‘जन्म के अनंतर मृत्यु निश्चित है। यह सत्य जानकर कोई अन्य वर मांग लो।’ इस पर दैत्य ने कुछ बुद्धिमानी दिखाते हुए कहा कि ‘मैं हयग्रीव के अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा न मारा जाऊं।’ उसे विश्वास था कि मेरे नाम वाला और कोई व्यक्ति नहीं है और मैं स्वयं को नहीं मार सकता। उधर देवी जानती थी कि भगवान हयग्रीव रूप में पिछले कल्प में प्रकट हो चुके हैं। देवी ने उसे ‘तथास्तु’ कहा और अंतध्र्यान हो गईं।
वर प्राप्त करके उस दैत्य ने उपद्रव करने आरंभ कर दिये। वह ऋषि-मुनियों और वेदों को सताने लगा। सभी उससे त्रस्त व व्याकुल थे। उसे पराजित करना या मारना किसी के वश की बात न थी। वह निश्चिंत, नि:संकोच धर्मध्वंस कर रहा था। पृथ्वी भी अत्यंत भयभीत थी। अंतत: श्री हरि नारायण वेदों, भक्तों, धर्म के त्राण तथा अधर्म का नाश करने के लिये हयग्रीव के रूप में प्रकट हुए क्योंकि दैत्य ने देवी से हयग्रीव के हाथों मारे जाने का वर प्राप्त किया था। भगवान का हयग्रीव रूप अत्यंत तेजस्वी एवं मनोहर था।
उनके अंग-अंग से तेज प्रवाहित हो रहा था। उन्होंने दैत्य हयग्रीव से युद्ध आरंभ किया। दीर्घकाल तक युद्ध करता हुआ वह असुर हयग्रीव परम मंगलमय भगवान के हयग्रीव रूप द्वारा मारा गया। समस्त पृथ्वी के प्राणी भयमुक्त होकर भगवान हयग्रीव की जय-जयकार करते हुए निश्चिंत व सुरक्षित होकर जीवन यापन करने लगे।

Wednesday, October 3, 2012

आहार और विचार

कहते हैं कि हमारे अच्छे विचारों के लिए कुछ हद तक हमारा आहार भी जिम्मेदार होता है। इसलिए मनुष्य यदि अपने आहार को दुरुस्त रखे, तो उसके विचार भी अच्छे होंगे। और अच्छे विचारों से ही हमारी उन्नति संभव है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमारे लिए कौन-सा आहार उचित हो सकता है? दरअसल, मानव शरीर के लिए शाकाहार ही सर्वोत्तम है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारे पाचन तंत्रों की बनावट भी शाकाहार के अनुकूल है। वहीं दूसरी ओर, हमारे वेद, पुराण, गीता, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब और दूसरे धर्म ग्रंथों में हमें दूसरे जीवों के प्रति करुणा और दया का भाव रखने की सलाह दी गई है। सच तो यह है कि परमात्मा की सृष्टि से प्रेम करना परमात्मा से प्रेम करने के समान है। यदि आप चाहते हैं कि ईश्वर हम पर दया और कृपा करता रहे, तो आपको भी उन प्राणियों के प्रति प्रेम और दया की दृष्टि रखनी होगी, जिन्हें परमात्मा ने बनाया है। बहुत पुरानी कहा

वत है-जैसा पिएंपानी, वैसी बने वाणी। जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे मन पर आहार का बहुत प्रभाव पडता है।
सच तो यह है कि मांसाहार का सेवन करने वाले व्यक्ति का मन पवित्र हो ही नहीं सकता है। अथर्ववेदमें कहा गया है कि जीवों के प्राणों का अंत कर उसे खाने वाले मनुष्यों पर ईश्वर की कृपा दृष्टि नहीं होती है। महर्षि दयानंद के अनुसार, मांसाहार से मनुष्य का स्वभाव हिंसक हो जाता है। गीता में भोजन की तीन श्रेणियां बताई गई हैं। सात्विक भोजन- फल, दालें, अनाज, मेवे, दूध, मक्खन आदि। इनसे मनुष्यों में सुख, शांति, दया, अहिंसा और करुणा का भाव बढता है। राजसी भोजन में तीखे, गर्म, कडवे, खट्टे और मिर्च-मसाले वाले भोजन आते हैं। इनसे जलन पैदा होती है। इस तरह का भोजन दुख, रोग और चिन्ता बढाने वाला होता है। तामसिक भोजन- बासी, आधे पके दुर्गध वाले, नशीले, मांसाहार आदि। ऐसे आहार गंदे संस्कारों की तरफ ले जाते हैं। हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, शरीर में अनेक बीमारियां उत्पन्न होती हैं और आलस्य बढता है। इससे यह पता चलता है कि सात्विक आहार ही हमारे लिए सर्वोत्तम है।
महान वैज्ञानिक अल्बर्टआइंसटीनकहते थे कि शाकाहार का हमारी प्रकृति पर गहरा प्रभाव पडता है। यदि दुनिया शाकाहार अपना ले, तो हिंसा होने की गुंजाइश ही खत्म हो जाए। महान दार्शनिक जॉर्जबर्नाडशॉने लिखा है, हम मांस खाने वाले चलती-फिरती कब्रों के समान हैं, जिनमें कई जानवरों की लाशें दफन हैं।
भारत में भी कई संत और दार्शनिक हुए हैं, जिन्होंने मांसाहार को जहरीला या राक्षसी आहार कहा है और उनसे दूर रहने की हिदायत दी है। महान दार्शनिक और संत तिरुवल्लुवरने कहा है कि उस मनुष्य में दया की भावना कैसे आ सकती है, जो अपना मांस बढाने के लिए दूसरे जीव-जंतुओं का मांस खाता है? गुरुनानक देव ने भी मांसाहार को सर्वथा त्याज्य बताया है। इसके अलावा, महाकवि शैले,जो महान शाकाहारी थे, ने कहा है कि इनसान जब जीव-जंतुओं का सेवन करने लगता है, तो वह उन नीच जानवरों की श्रेणी में आ जाता है, जो स्वभावत:मांसाहारी और क्रूर होते हैं। इसलिए मांसाहार को पाप और अपराध के लिए जिम्मेदार बताया गया है। इसके बावजूद भी यदि हम मांस खाते हैं, तो यह हमारी मूर्खता होगी। सच तो यह है कि यदि आप चाहते हैं कि आपका मन पवित्र हो और आपके विचार सर्वोत्तम हों, तो आज से ही मांसाहार का परित्याग कर दें।

ज्ञान की सात भूमिकाएँ .....

1 .. शुभेच्छा -- आत्मकल्याण हेतु श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरु के शरणागत होकर उनके उपदेशानुसार शास्त्रो का अध्ययन करके आत्म विचार और आत्मा साक्षात्कार की उत्कृष्ट इच्छा
2... सुविचारणा - सद्गुरु के उपदेशो तथा मोक्षशास्त्रो का चिन्तन एवं मनन
3... तनुमानसा - श्रवण , मनन , और निदिध्यासन से शब्दादि विषयो के प्रति जो अनासक्ति होती है एवं सविकल्प समाधि मे अभ्यास से बुद्धि की जो तनुता - सूक्ष्मता प्राप्त होती है ,वही तनुमानसा है।
4...
सत्वापत्ति - उपर्युक्त तीन से साक्षात्कार पर्यन्त स्थिति अर्थात् निर्विकल्प समाधिरुप स्थिति ही सत्वापत्ति है ज्ञान की चौथी भूमिका वाला पुरुष ब्रह्मविद कहलाता है
5 ...
असंसक्ति -चित्त-विषयक परमानन्द और नित्य अपरोक्ष ऐसी ब्रह्मात्म भावना का साक्षात्कार रुप चमत्कार असंसक्ति है इसमेँ अविद्या तथा उसकेकार्यो का सम्बन्ध नहीँ होता
6 ..
पदार्थभाविनी - पदार्थो की दृढ अप्रतीति होती है वह पदार्थभाविनी है
7 ..
तुर्यगा - तीनो अवस्था से मुक्त होना तुर्यगा है ब्रह्म को जिस अवस्था मेँ आत्मरुप और अखण्ड जाने वही अवस्था तुर्यगा है
......
प्रथम तीन भूमिकाएँ साधनकोटि की है , और अन्य चार ज्ञानकोटि की है ..
....
तीन भूमिकाओ तक सगुण ब्रह्म का चिन्तन करो ..
.....
ज्ञान की पाँचवी भूमिका तक पहुँचने पर जड चेतन की ग्रन्थि छूट जाती है और आत्मा का अनुभव होने
लगता है .
....
आत्मा शरीर से भिन्न है ..
....
इन भूमिकाओ मेँ उत्तरोत्तर देहभान भूलता हुआ उन्मत्त दशा प्राप्त होती है ..
 

Monday, October 1, 2012

वाराणसी की कथा


     यह कथा द्वापरयुग की है जब भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था। बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह कथा इस प्रकार है
      मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था। उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे। यही कारण था कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे। जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं। उनका विवाह मथ
ुरा के राजा कंस के साथ हुआ था।
      कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था। प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। दामाद की मृत्यु की खबर सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा। प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया। किंतु हर बार श्रीकृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे।
एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया। जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए।
      काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्रीकृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया। वह श्रीकृष्ण की शक्ति जानता था। इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा। भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा। किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा।
तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले-“वत्स! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी। लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना। वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा।” यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए।
      इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्रीकृष्ण सभी मथुरावासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे। काशीराज ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा। काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं। इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई। उल्टे श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया। सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा। प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत होकर काशी की ओर भागी।
      सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा। काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया। किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया।
      कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा। वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया। इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ।