Thursday, August 25, 2016

रीमा एक छोटी बच्ची थी। उसे खाना पकाने का बडा शौख था। जब भी मा खाना पकाती वो आहिस्ते से जाकर देख लेती के मम्मी के हाथ खाना इतना स्विदिष्ट होता था की पिताजी उँगली चाटते रह जाते। जो मेहमान आते वो भी मम्मी के हाथो बने खाने की तारीफ करते है।

रीमा देखती, मम्मी के पास ऐक डीब्बा है। हर बार खाना बनाते समय मम्मी उस डीब्बे से कुछ निकाल कर अवश्य डालती थी। रीमा को लगा जरूर उस डीब्बे मे कुछ है जिसे मिलाने से खानेका स्वाद दुगुना हो जाता है। मा उस डीब्बे को बडा सम्हाल कर रखती थी। रीमाने मा को ऐसा कहते सुना था की यह डीब्बा उसे उसकी मा ने दिया था।

एक दिन रीमा की मम्मी बीमार हो गई। रीमाने हिम्मत कर कहा, कोई तकलीफ नही, अब मम्मी आराम करेगी और खाना खुद रीमा पकायेगी।
जब रीमा कीचन मे खाना बनाने पहोची खानेकी सभी तैयारीया कर लेने बाद उसे याद आया मा के हाथ बनी सभी डीश इतनी स्वादिष्ट बनाने के लिए उपर रखे उस डब्बे से कुछ डालती थी। रीमाने एक टेबल के सहारे से वो डीब्बा उतार लिया। उसने वो स्टीलका छोटासा डीब्बा खोलके देखा तो डीब्बे मे कुछ नही था। बस, पुराने कागज की एक छोटी सी चिठ्ठी रखी थी।

रीमा उस चिठ्ठी को खोले देखा उसमे लिखा था - बेटा तु जो भी कुछ खाना पकाये, उसमे एक चुटकी प्रेम जरूर डालना जिससे तेरे हाथो बना पुरा खाना सबको पसंद आये।
रीमा को यह बात समजते देर नही लगी…
कितनी अच्छी बात है आपके द्वारा किये हर कार्य मे थोडा प्रेम मिला दिया जाये तो वो सामने वाले व्यक्ति को जरूर प्रभावित करता है।
प्रेम हर दर्द की दवा है।

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