॥ मोक्ष के दस प्रसिद्ध साधन कौन-से हैं? ॥
संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रस्तुत
मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म
व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्याः ।
प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता
भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥
----- श्रीमद्भागवत महापुराण ७.९.४६
मोक्ष के दस साधन प्रसिद्ध बताए गए हैं—मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-श्रवण, तपस्या, स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन, युक्तिपूर्वक शास्त्रों की व्याख्या, एकान्त-सेवन, जप और समाधि।
ये सभी साधन मनुष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करने, इन्द्रियों को संयमित करने और उसे परम पुरुष की ओर उन्मुख करने वाले हैं। इनका उद्देश्य केवल बाहरी रूप से साधु अथवा साधक दिखाई देना नहीं, बल्कि भीतर से कामना, अहंकार, आसक्ति और विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त करना है।
मौन केवल वाणी को रोक लेना नहीं, बल्कि अनावश्यक एवं अशुद्ध वाणी से निवृत्त होकर मन को भी संयमित करना है।
ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि इन्द्रियों और मन की शक्तियों को ब्रह्म की ओर प्रवाहित करना है।
शास्त्र-श्रवण और स्वाध्याय केवल ज्ञान एकत्र करने के लिए नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने आचरण में उतारने के लिए हैं।
तपस्या शरीर और मन को अनुशासन में रखने का साधन है।
स्वधर्म-पालन अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने की शिक्षा देता है।
शास्त्र-व्याख्या का उद्देश्य तत्त्व को समझना और समझाना है, न कि केवल विद्वत्ता का प्रदर्शन करना।
एकान्त-सेवन आत्मचिन्तन और भगवत्स्मरण के लिए है।
जप चित्त को भगवान के नाम में स्थिर करने का साधन है और समाधि चित्त की उस एकाग्र अवस्था की ओर संकेत करती है, जहाँ साधक का मन बाह्य विषयों से हटकर परम तत्त्व में स्थित होने लगता है।
किन्तु इन सभी साधनों की सफलता का मूल आधार इन्द्रियनिग्रह और अन्तःकरण की शुद्धि है।
यदि इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, तो यही मौन, तप, स्वाध्याय, जप, शास्त्र-चर्चा और समाधि आदि साधन भी केवल जीविका के साधन-व्यापार बनकर रह सकते हैं। बाहर से साधना का स्वरूप दिखाई दे सकता है, परन्तु भीतर यदि विषयासक्ति और वासनाएँ उसी प्रकार बनी हुई हैं, तो साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
और दम्भी व्यक्ति के लिए तो स्थिति और भी गंभीर है। जब साधना आत्मशुद्धि के लिए न होकर प्रतिष्ठा, सम्मान, धन अथवा अपनी श्रेष्ठता दिखाने का माध्यम बन जाती है, तब वही साधन आध्यात्मिक उन्नति के स्थान पर आडम्बर का रूप धारण कर लेते हैं।
इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति कितना मौन रखता है, कितना शास्त्र पढ़ता है, कितनी तपस्या करता है या कितनी बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक बातें करता है। वास्तविक साधना का प्रमाण उसके संयम, आचरण, विनय, निष्कपटता और अन्तःकरण की पवित्रता में दिखाई देता है।
मोक्ष का मार्ग बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि भीतर के परिष्कार से प्रशस्त होता है। साधन वही सार्थक है जो मनुष्य को विषयासक्ति से हटाकर भगवान के चरणों में स्थिर करे।
अतः साधना का उद्देश्य साधक का स्वरूप दिखाना नहीं, बल्कि उसके भीतर के अहंकार और अज्ञान को मिटाना है।
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