Saturday, April 4, 2026

जगन्नाथ रथयात्रा

 अरे जगन्नाथ जी किसके गंदे कपड़े धो रहे हैं? आइए देखते हैं इस कथा में। बहुत साल पहले पूरी के एक गांव में रहते थे हमारे माधवदास जी। एकदम अकेले ना आगे नाथ ना पीछे पग। बस दिन रात जगन्नाथ जगन्नाथ। समुद्र के किनारे परे रहते थे और मंदिर के सिंह द्वार पर घंटों खड़े होकर बस टुकुर टुर महाप्रभु को देखते रहते। अरे प्रभु आप ही माई हो। आप ही बाप हो। लेकिन हमारे जगन्नाथ जी को भक्तों की परीक्षा लेने में उन्हें थोड़ा सताने में बड़ा आनंद आता है। बैठे-बैठे सोचा माधव का प्रेम तो पक्का है लेकिन थोड़ा और पकाते हैं और दे दी माधवदास जी को भयंकर बीमारी। ऐसी वैसी बीमारी नहीं सीधा अतिसार। अब माधवदास जी अपनी झोपड़ी में पड़े हैं ना हिल पा रहे हैं ना डुल पा रहे हैं। हालत यह हो गई कि जहां लेटे हैं वहीं कपड़े गंदे हो रहे हैं। आसपास के लोग जो कल तक बाबा जी बाबा जी करते थे वह अब नाक पर कपड़ा रख के निकल रहे हैं। बोले अरे राम राम कितनी बदबू आ रही है। उधर मत जाना। माधवदास जी लेटे रो रहे हैं। हे प्रभु अब तो उठा लो। यह शरीर अब चलता नहीं और यह गंदगी मुझसे देखी नहीं जाती और दर्द के मारे एक दिन माधवदास जी बेहोश हो गए। जैसे ही माधवदास जी बेहोश हुए हमारे ठाकुर जी का आसन डोल गया। बोले अरे मेरा माधव बुला रहा है और तुरंत जगन्नाथ जी जो सोने के पलंग पर सोते हैं वो एक सेवक का भेष बना के कमर पर गमछा कस के पहुंच गए माधवदास की झोपड़ी में। और वहां जाकर क्या देखते हैं? माधवदास गंदगी में सने पड़े हैं। जगन्नाथ जी को घिन आएगी। अरे सवाल ही नहीं। उन्होंने अपने पीतांबर को ऊपर खौसा और लग गए काम पे। जिन हाथों से पूरी दुनिया का चक्कर चलता है, उन हाथों से माधवदास के गंदे कपड़े धो रहे हैं। समुद्र से दौड़-दौड़ के पानी ला रहे हैं। झोपड़ी साफ कर रहे हैं। माधवदास को नहला रहे हैं। और तो और जब माधवदास को होश आता तो पूछने लगते। अरे भाई तुम कौन हो? इतनी बदबू में मेरी सेवा क्यों कर रहे हो? ठाकुर जी मंदमंद मुस्कुरा के बोले। अरे बाबा हम तो सेवक हैं। पता चला तुम बीमार हो तो चले आए। तुम चुपचाप पड़े रहो। माधवदास जी सोचे बड़ा भला आदमी है। एक दिन माधवदास जी को थोड़ा आराम मिला तो देखा वो सेवक पैर दबा रहा है। लेकिन उस सेवक के शरीर से जो खुशबू आ रही थी तुलसी, चंदन और कपूर की। माधवदास जी का माथा ठनका। बोले यह खुशबू तो मेरे मंदिर वाले की है। ध्यान से देखा तो वो बड़ी-बड़ी आंखें वही मंद मुस्कान। माधवदास जी ने झट से हाथ पकड़ लिया। बोले पकड़े गए प्रभु यह आप हैं। और फूट-फूट के रोने लगे। हे नाथ आपको शर्म नहीं आती। आप त्रिभुवन के मालिक होके मेरे गंदे कपड़े धो रहे हो। मेरी गंदगी साफ कर रहे हो। मुझे नरक में डाल देते। पर यह पाप क्यों चढ़ा रहे हो मेरे सर पे? जगन्नाथ जी हंस के बोले अरे माधव भक्त और भगवान में काहे का ऊंचनीच? जहां मेरा भक्त वहां मैं। माधवदास जी बोले वो सब तो ठीक है पर आप तो सर्वशक्तिमान हैं। चाहते तो एक चुटकी बजाते मेरी बीमारी गायब हो जाती। खुद गंदे कपड़े धोने की क्या जरूरत थी? अब जगन्नाथ जी बोले अरे माधव तुम नहीं समझोगे। यह कर्म का नियम है। मैंने सृष्टि बनाई है तो नियम तो मुझे भी मानना पड़ेगा। यह तुम्हारे पिछले जन्म का कोई पाप था जो इस बीमारी के रूप में कट रहा है। माधवदास बोले तुम मिटा देते इसे। ठाकुर जी बोले अरे मिटा तो देता पर फिर यह उधारी रह जाती और इस उधारी को चुकाने के लिए तुम्हें फिर से जन्म लेना पड़ता। फिर से मां के पेट में उल्टा लटकना पड़ता और मैं नहीं चाहता कि मेरा भक्त जिसने मुझे इतना प्रेम किया वो सिर्फ एक बीमारी भोगने के लिए फिर से जन्म ले। इसलिए सोचा चलो मैं ही सेवा कर देता हूं। तुम्हारा हिसाब किताब यही बराबर कर देते हैं। माधवदास जी सुन के सन्न रह गए। बोले प्रभु आप मेरे लिए इतना कष्ट सह रहे हैं। नहीं नहीं अब आप यहां नहीं आएंगे। अब आप सेवा नहीं करेंगे। मुझसे यह पाप और नहीं होगा। जगन्नाथ जी बोले, लेकिन माधव, अभी तुम्हारे कर्म के 15 दिन और बचे हैं। 15 दिन तो भुगतना ही पड़ेगा। माधवदास जी जिद पर अड़ गए। 15 दिन क्या? 15 युग भुगत लूंगा। पर आपसे पैर नहीं दबवाऊंगा। अब जाओ यहां से। ठाकुर जी बोले, "अच्छा, बड़ी ज़िद है तुम्हारी।" ठीक है। तुम मेरी सेवा नहीं लेना चाहते ना तो एक काम करते हैं। तुम्हारी 15 दिन की बीमारी हम ले लेते हैं। खुश। इससे पहले कि माधवदास कुछ बोलते ठाकुर जी वहां से गायब और इधर माधवदास के शरीर में बिजली दौड़ी। एकदम चंगे हो गए। खड़े होके नाचने लगे। अरे मैं तो ठीक हो गया। दौड़े-दौड़े मंदिर गए कि प्रभु को धन्यवाद करूं। मंदिर पहुंचे तो देखा सन्नाटा है। पंडा पुजारी मुंह लटकाए बैठे हैं। माधवदास बोले अरे दरवाजा क्यों बंद है? दर्शन करने दो। पुजारी बोले क्या दर्शन करोगे माधव? महाप्रभु को 104 डिग्री बुखार चढ़ गया है। अभी राजा को सपना आया है कि प्रभु ने अपने भक्त की बीमारी ले ली है। अब वह 15 दिन तक रजाई ओढ़ के सोएंगे, काढ़ा पिएंगे। माधवदास जी वहीं सिंह द्वार पर पछाड़ खा के गिर पड़े। हां राम मेरी बला अपने सर ले ली और तभी से यह नियम बन गया। आज भी साल में एक बार स्नान यात्रा के बाद जगन्नाथ जी बीमार पड़ते हैं। इसे अंसर कहते हैं। 15 दिन तक मंदिर बंद रहता है। भगवान को बुखार आता है। वैद्य आते हैं। काढ़ा पिलाया जाता है। फलों का रस भोग लगता है और 15 दिन बाद जब ठाकुर जी ठीक होते हैं तो अंगराई लेकर कहते हैं। अरे बहुत दिन हो गए कमरे में पड़े पड़े। बड़ा मन ऊब गया है। चलो अब रथ निकालो। हम घूमने जाएंगे। और तब निकलती है जगन्नाथ रथ यात्रा। जैसे ही यह उद्घोष होता है पूरी नगरी शंखनाद और जय जगन्नाथ के जयकारों से गूंज उठती है। कहानी का असली रोमांच तब शुरू होता है जब पहांडी रस्म के जरिए तीनों भारी विग्रहों को झूमते हुए मंदिर से बाहर लाया जाता है। राजा द्वारा रास्ते की सफाई करने के बाद लाखों भक्त दीवाने होकर उन विशाल रस्सियों को थाम लेते हैं। रास्ते में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। कोई रथ को छूने की कोशिश करता है तो कोई बस एक झलक पाने को तरसता है। मान्यता है कि इन रथों के पहियों की धूल भी अगर माथे पर लग जाए तो जीवन सफल हो जाता है। जगन्नाथ जी का रथ नंदी घोष सबसे अंत में चलता है। जैसे वह अपने भक्तों की भीड़ को निहारते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हो। बीच रास्ते में भगवान अपनी मौसी के घर के पास रुककर विशेष पोड़ा पीठा का भोग लगाते हैं। 9 दिनों तक मौसी के घर गुंडीचा मंदिर में उत्सव का माहौल रहता है। जहां वे अपने भाई-बहन के साथ विश्राम करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भगवान और भक्त के अटूट मिलन की एक जीवंत दास्तान है। 

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