4. #मनुस्मृति और #विज्ञान........."कल्पना कीजिए एक ऐसी बेशकीमती विरासत की, जिसे दुनिया का सबसे कड़ा सुरक्षा घेरा दिया गया हो... और सदियों बाद उसी सुरक्षा घेरे को 'कैद' बताकर बदनाम कर दिया जाए! भारतीय संस्कृति की 'शक्ति' के साथ ठीक4 यही हुआ। मनुस्मृति के जिस श्लोक को 'गुलामी का घोषणापत्र' कहा गया, वह असल में स्त्री-सुरक्षा का 'वैश्विक सुरक्षा कवच' था। आइए, आज उस मज़बूत झूठ की धज्जियाँ उड़ाते हैं जो हज़ारों सालों से हमारी जड़ों में ज़हर घोल रहा है।"
मनुस्मृति का श्लोक है
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥
हमें पढ़ाया और बताया गया अर्थ - स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए, क्योंकि वह कभी स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।
मनुस्मृति के इस श्लोक को लेकर अक्सर विवाद होता है, लेकिन जब हम इसे लैंगिक राजनीति (Gender politics) के बजाय पारिवारिक उत्तरदायित्व (Family responsibility) और सुरक्षा चक्र (Safety net) के गणित से समझते हैं, तो इसका अर्थ बिल्कुल बदल जाता है।
इस श्लोक (पिता रक्षति कौमारे...) के नाम पर जो वैचारिक प्रदूषण (Ideological pollution) फैलाया गया है, उसकी जड़ें असल में 'गलत अनुवाद' और 'विदेशी नजरिए' (Foreign perspective) में हैं। आज समय है कि इस झूठे नैरेटिव (Narrative) की धज्जियाँ उड़ाकर सत्य को उस वैज्ञानिक और तार्किक धरातल पर रखा जाए, जिसे अब तक छिपाया गया।
हजारों सालों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताया गया, लेकिन इसका सत्य किसी भी आधुनिक 'सोशल सिक्योरिटी सिस्टम' (Social security system) से कहीं अधिक उन्नत (Advanced) है। आइए इस झूठ के ढांचे को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।
इस श्लोक का मूल भाव स्त्री को समाज की असुरक्षाओं से बचाने के लिए पुरुषों की जवाबदेही (Accountability) तय करना है। प्राचीन सामाजिक संरचना में, जहाँ शारीरिक बल और बाहरी संघर्ष अधिक थे, वहां यह श्लोक एक सुरक्षा कवच (Safety shield) की तरह काम करता था। शास्त्र यहाँ पुरुष को आदेश दे रहा है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री को अकेला या निराश्रित (Destitute) नहीं छोड़ा जा सकता।
अनुवाद में लिखा है "स्वतंत्रता के योग्य नहीं है", जबकि मूल संस्कृत भाव यह है कि स्त्री को "अकेला छोड़ना उचित नहीं है"। इसे एक उदाहरण से समझिए: एक छोटे बच्चे या एक बहुमूल्य धरोहर को हम कभी अकेला नहीं छोड़ते। इसका मतलब यह नहीं कि वह 'अयोग्य' है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह इतनी 'कीमती' (Precious) है कि उसकी सुरक्षा में रत्ती भर भी चूक समाज और परिवार के लिए अपूरणीय क्षति होगी। यहाँ 'अनर्हता' (Unworthiness) का भाव स्त्री के लिए नहीं, बल्कि उस 'स्थिति' के लिए है जहाँ वह असुरक्षित हो।
जब हम कहते हैं कि "उसे कभी अकेला न छोड़ा जाए", तो इसका अर्थ उसे 'कैद' करना नहीं, बल्कि उसे 'अभय' (Fearlessness) प्रदान करना है।
बचपन में पिता की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पुत्री को वह सुरक्षा और संस्कार दे जिससे उसका व्यक्तित्व निखरे। युवावस्था में पति का यह धर्म है कि वह उसके सम्मान और आवश्यकताओं की रक्षा करे। और वृद्धावस्था में, जब शरीर शिथिल हो जाता है, तब पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपनी माता की सेवा और सुरक्षा सुनिश्चित करे।
यहाँ 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' (स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है) का जो गलत नॉरेटिव (Narrative) सेट किया गया है, वह असल में 'अकेला न छोड़ने' (Not to be left unprotected) के सिद्धांत पर आधारित है। इसे गणितीय रूप से देखें तो यह एक 'सर्कल ऑफ प्रोटेक्शन' (Circle of protection) है, जिसमें स्त्री कभी भी लावारिस या असहाय नहीं होती।
आलोचक कहते हैं कि इसका अर्थ है "स्त्री स्वतंत्रता के लायक नहीं है"। यह सफेद झूठ है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार, यहाँ 'स्वातन्त्र्य' (Independence) का अर्थ 'अकेलापन' या 'निराश्रित' (Left without a support system) होना है।
सत्य यह है कि शास्त्र कह रहा है कि समाज इतना क्रूर हो सकता है कि स्त्री को कभी भी बिना 'सुरक्षा चक्र' के नहीं छोड़ना चाहिए। यह उसे 'अयोग्य' नहीं, बल्कि 'अत्यधिक मूल्यवान' (Extremely precious) घोषित करता है। जिसे आप छोड़ नहीं सकते, वह गुलाम नहीं, आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता (Priority) होती है।
इस श्लोक ने पुरुषों के लिए 'एस्केप रूट' (Escape route) बंद कर दिए थे।
पिता अपनी बेटी को बोझ समझकर त्याग नहीं सकता।
पति अपनी पत्नी को मझधार में नहीं छोड़ सकता।
पुत्र अपनी बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम नहीं भेज सकता।
यह श्लोक स्त्री के अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों पर 'जिम्मेदारी का हंटर' (Whip of responsibility) चलाने के लिए लिखा गया था। जो लोग इसे गुलामी कहते हैं, वे असल में पुरुषों को उनके कर्तव्यों से आजाद करना चाहते हैं ताकि समाज में 'लावारिस स्त्रियाँ' बढ़ें और उनका शोषण आसान हो सके।
जिस तरह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाने के लिए 'ओजोन परत' (Ozone layer) या 'मैग्नेटिक फील्ड' (Magnetic field) की आवश्यकता होती है, क्या हम कहेंगे कि पृथ्वी ओजोन के 'अधीन' है? बिल्कुल नहीं। वह सुरक्षा चक्र पृथ्वी पर जीवन को 'पनपने' (Flourish) का अवसर देता है।
ठीक उसी तरह, मनुस्मृति का यह श्लोक स्त्री के चारों ओर पिता, पति और पुत्र का एक 'त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा' (Three-tier security cover) बनाता है ताकि वह बाहरी संघर्षों से मुक्त होकर अपनी आंतरिक शक्तियों, मेधा और सपनों को पूर्ण कर सके।
जब विदेशी आक्रांताओं और बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारत पर हमला किया, तो उन्होंने हमारे 'सुरक्षा तंत्र' को 'पिछड़ापन' घोषित कर दिया। उन्होंने यह नैरेटिव सेट किया कि परिवार एक 'जेल' है। परिणाम क्या हुआ? आज पश्चिम में स्त्रियाँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र तो हैं, लेकिन वे सबसे ज्यादा असुरक्षित और अकेली भी हैं। मनुस्मृति का यह मॉडल 'इमोशनल और सोशल इंश्योरेंस' (Emotional and social insurance) का मॉडल था, जिसे डिकोड करने की हिम्मत आज के स्वघोषित बुद्धिजीवियों में नहीं है।
क्या आप किसी कीमती मिसाइल या सैटेलाइट को बिना सुरक्षा कवर के खुले मैदान में छोड़ देंगे? नहीं। क्योंकि वह 'महत्वपूर्ण' है। स्त्री समाज की 'शक्ति' है। शक्ति को जब 'अभय' (Fearlessness) मिलता है, तभी वह सृजन करती है। यह श्लोक उसे यह भरोसा देता है कि "बेटी, तुम आगे बढ़ो, पीछे तुम्हारे पिता की ढाल है। देवी, तुम जग जीतो, साथ में पति का संबल है। माता, तुम पूज्य हो, पुत्र की सेवा तुम्हारे चरणों में है।"
यह श्लोक 'गुलामी का घोषणापत्र' नहीं, बल्कि 'स्त्री सुरक्षा का वैश्विक चार्टर' (Global charter of women's safety) है। जो लोग इसे स्त्री-विरोधी कहते हैं, वे या तो संस्कृत नहीं जानते या वे उस एजेंडे का हिस्सा हैं जो भारतीय परिवार संस्था को तोड़ना चाहता है।
सच तो यह है कि "न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का अर्थ है—"स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना सामाजिक अपराध है।" यह एक उच्च कोटि की सभ्यता की पहचान है, जहाँ स्त्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके जीवन के हर पड़ाव पर समाज के पुरुष वर्ग पर अनिवार्य रूप से डाली गई है।
हजारों साल पुराने इस 'सुरक्षा कवच' को 'बेड़ियाँ' बताने वालों की बौद्धिक चमड़ी उधेड़ने के लिए यह तर्क ही काफी है कि संरक्षण (Protection) कभी भी पराधीनता (Slavery) नहीं होता, वह तो प्रेम और सम्मान की उच्चतम अभिव्यक्ति है।
आज के दौर में जब हम महिला सुरक्षा (Women safety) की बात करते हैं, तो कहीं न कहीं हम इसी जवाबदेही की कमी को महसूस करते हैं। यह श्लोक अधिकारों के हनन के बारे में नहीं, बल्कि पुरुषों को उनके अनिवार्य कर्तव्यों (Mandatory duties) की याद दिलाने के बारे में है। समाज के कुछ व्याख्याकारों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) के कारण इसे 'पराधीनता' का नाम दे दिया, जबकि यह वास्तव में 'पूर्ण सामाजिक सुरक्षा' (Complete social security) का एक उत्कृष्ट मॉडल है।
जब जिम्मेदारियां तय होती हैं, तभी समाज सुरक्षित होता है। इस श्लोक का असली अर्थ यही है कि एक सभ्य समाज में स्त्री की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी पुरुष वर्ग को हर स्तर पर उठानी ही होगी।
मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्ति—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—तभी अपने उच्चतम शिखर (Potential) को प्राप्त कर सकता है, जब उसे यह 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (Sense of security) हो कि उसके पीछे एक मजबूत आधार (Support system) खड़ा है।
जब एक बेटी को यह पता होता है कि उसके पिता उसकी ढाल हैं, तो वह समाज की चुनौतियों से डरने के बजाय उनसे टकराने का साहस जुटाती है।
जब उसे अहसास होता है कि वह अकेली नहीं है, तो उसकी आंतरिक शक्ति (Inner strength) जाग्रत होती है। यही वह बिंदु है जहाँ 'सुरक्षा' (Protection) वास्तव में 'सशक्तिकरण' (Empowerment) में बदल जाती है।
अक्सर आलोचक सुरक्षा को 'पाबंदी' समझ लेते हैं, लेकिन मैं इसे से 'संसाधन' (Resource) के रूप में देखता हूं।
एक बीज को मिट्टी के 'अधीन' (Under the soil) रखा जाता है ताकि वह सुरक्षित रहकर अंकुरित हो सके। यह मिट्टी का दबाव उसे दबाने के लिए नहीं, बल्कि उसे विकसित (Develop) होने के लिए आवश्यक पोषण और सुरक्षा देने के लिए है।
उसी तरह, परिवार का साथ स्त्री के लिए वह 'इकोसिस्टम' (Ecosystem) तैयार करता है, जिसमें वह अपने मूल्यों (Values) और सपनों (Dreams) को बिना किसी बाहरी बाधा के पूर्ण कर सके।
शास्त्रों का मूल उद्देश्य पुरुष को 'अधिपति' (Master) बनाना नहीं, बल्कि उसे 'ट्रस्टी' (Trustee) या संरक्षक बनाना था।
यदि पिता, पति और पुत्र अपनी जिम्मेदारी को 'पावन कर्तव्य' (Sacred duty) समझकर निभाते हैं, तो स्त्री को संघर्षों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी पड़ती।
वह अपनी पूरी ऊर्जा अपने कौशल विकास (Skill development) और स्वप्न पूर्ति (Goal fulfillment) में लगा सकती है। यही वह 'गणित' है जिससे समाज का संतुलन बनता है।
भारतीय दर्शन में 'शक्ति' सदैव शिव के साथ या उनके संरक्षण में दिखाई गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि शक्ति कमजोर है, बल्कि यह है कि शक्ति को 'दिशा' (Direction) और 'आधार' (Base) की आवश्यकता होती है।
जब परिवार (पिता, पति, पुत्र) वह आधार प्रदान करते हैं, तो स्त्री का 'मूल्य' (Value) समाज की नजरों में और बढ़ जाता है।
यह भरोसा कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ", किसी भी हथियार या कानून से बड़ी ताकत है। यह भरोसा ही उसे सशक्त (Empowered) बनाता है कि वह दुनिया के किसी भी कोने में जाकर अपनी मेधा का परचम लहरा सके।
सदियों से इस श्लोक को स्त्री-विरोधी बताकर समाज में जहर घोला गया।
शास्त्र कह रहा है कि एक सभ्य समाज में स्त्री को कभी भी 'अकेला या असुरक्षित' (Unattended) छोड़ने के योग्य नहीं माना जाना चाहिए।
यह स्त्री की 'अयोग्यता' नहीं है, बल्कि यह पुरुष और समाज के लिए एक 'सख्त निषेध' (Strict Prohibition) है। यह उसे 'लावारिस' होने से बचाने का ईश्वरीय विधान है।
आज के दौर में पुरुष जिम्मेदारी से भाग जाते हैं, लेकिन मनु महराज ने इस श्लोक के जरिए पुरुष की 'जवाबदेही' (Accountability) तय कर दी थी।
पिता, पति और पुत्र इन तीनों को धर्म से बांध दिया गया है कि तुम अपनी जिम्मेदारी से 'पलायन' (Escapism) नहीं कर सकते।
यह कानून स्त्री के अधिकार नहीं छीनता, बल्कि पुरुषों पर 'नैतिक और आर्थिक हंटर' चलाता है ताकि समाज की कोई भी स्त्री कभी भी बेसहारा न हो।
प्राचीन काल में पेंशन, बीमा या सोशल सिक्योरिटी नेट (Social security net) जैसी संस्थाएं नहीं थीं। यह श्लोक असल में एक 'लाइफ-टाइम गारंटी कार्ड' है।
पिता को बाध्य किया गया कि वह बेटी का भरण-पोषण करे।
पति को बाध्य किया गया कि वह पत्नी की जिम्मेदारी उठाए।
पुत्र को बाध्य किया गया कि वह वृद्ध माता को बेसहारा न छोड़े।
अगर यह श्लोक न होता, तो पुरुष बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते। यह कानून स्त्री को 'परतन्त्र' बनाने के लिए नहीं, बल्कि पुरुष को 'पलायन' (Escapism) से रोकने के लिए बनाया गया था।
संस्कृत में 'रक्ष' (Protect) धातु का अर्थ केवल पहरेदारी करना नहीं होता, बल्कि 'पोषण करना' और 'सुरक्षित रखना' भी होता है। यहाँ 'अहर्ति' (Deserves) शब्द का प्रयोग उस संदर्भ में है जहाँ उसे असुरक्षित परिस्थितियों में अकेला छोड़ना अधर्म माना गया है। प्राचीन न्यायशास्त्र के अनुसार, जिस वस्तु या व्यक्ति का मूल्य सबसे अधिक होता है, उसकी सुरक्षा (Security) के मानक भी उतने ही कड़े होते हैं। जिस तरह एक बहुमूल्य रत्न को खुला नहीं छोड़ा जाता, वैसे ही स्त्री को सामाजिक और सुरक्षात्मक दृष्टि से 'खुला' या 'लावारिस' (Unattended) छोड़ना समाज की विफलता माना गया है।
आज का आधुनिक नैरेटिव केवल 'अधिकारों' (Rights) की बात करता है, जबकि भारतीय शास्त्र 'कर्तव्य' (Duties) पर केंद्रित हैं। इस श्लोक में स्त्री को कुछ करने से रोका नहीं जा रहा, बल्कि पुरुष को 'बाध्य' (Compelled) किया जा रहा है। यह पुरुष के लिए एक कमांड (Command) है कि वह अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यदि कोई पुरुष अपनी बेटी, पत्नी या माता को अकेला छोड़ता है, तो वह शास्त्र की दृष्टि में अपराधी है। अतः यह श्लोक स्त्री के लिए 'प्रतिबंध' नहीं, बल्कि पुरुष के लिए 'सख्त अनुशासन' (Strict discipline) है।
आज का आधुनिक कानून 'राइट टू मेंटेनेंस' (Right to Maintenance) की बात करता है, जो पत्नी को पति से गुजारा भत्ता दिलाने पर मजबूर करता है।
मनुस्मृति का यह श्लोक उसी आधुनिक कानूनी सुरक्षा का 'आध्यात्मिक पितामह' है।
इसे 'गुलामी' कहना वैसा ही है जैसे आज के 'Z+ सुरक्षा घेरे' (Z+ Security) को 'नजरबंदी' कहना। जिसकी 'वैल्यू' (Value) जितनी ज्यादा होती है, उसका सुरक्षा घेरा उतना ही अभेद्य (Impenetrable) रखा जाता है।
विज्ञान कहता है कि बिजली (Electricity) में अपार शक्ति होती है, लेकिन उसे सुरक्षित चलाने के लिए तार के ऊपर 'इंसुलेशन' (परत) अनिवार्य है।
भारतीय दर्शन में स्त्री 'शक्ति' (Energy) है। पिता, पति और पुत्र उस शक्ति के लिए 'कंडक्टर' और 'इंसुलेशन' की तरह हैं। यह शक्ति को 'दबाने' के लिए नहीं, बल्कि उसे बाहरी झटकों से बचाकर सही दिशा में प्रवाहित (Channelization) करने का तंत्र है।
मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि कोई भी व्यक्तित्व तभी निखरता है जब उसे 'सेंस ऑफ सिक्योरिटी' (सुरक्षा का अहसास) हो। जब एक बेटी को यह भरोसा होता है कि वह 'अकेली नहीं है', तभी उसका आत्मविश्वास (Confidence) शिखर छूता है।
यह श्लोक उसे वह 'मनोवैज्ञानिक कवच' प्रदान करता है जिससे वह 'निर्भय' होकर अपने सपनों और मूल्यों (Values) का विकास कर सके।
इतिहास गवाह है कि मध्यकाल के दौरान विदेशी और मैकालेवादी सोच ने शास्त्रों में 'प्रक्षिप्त' (मिलावटी) अंश डाले ताकि भारतीय परिवार संस्था को तोड़ा जा सके।
स्वतंत्रता का अर्थ आधुनिक युग में 'स्वेच्छाचारिता' (Arbitrariness) से लिया जाता है, लेकिन शास्त्रों में स्वतंत्रता का एक अर्थ 'निराश्रित' (Helpless) होना भी है। समाजशास्त्र के गणित से देखें तो एक स्त्री जब बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में होती है, तो वह वास्तव में आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से सबसे अधिक सशक्त (Empowered) होती है। उसे बाहरी दुनिया के क्रूर संघर्षों से बचाने के लिए एक 'बफर जोन' (Buffer zone) प्रदान किया गया है ताकि वह अपने सृजनात्मक और ममतामयी गुणों का विकास कर सके।
मनुस्मृति के इस श्लोक को उसी ग्रंथ के दूसरे प्रसिद्ध श्लोक—'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'—के साथ जोड़कर देखना चाहिए। यदि मनु स्त्रियों को गुलाम बनाना चाहते, तो वे उनके सम्मान को देवताओं के निवास की शर्त नहीं बनाते। असल में, सुरक्षा का यह घेरा उसी 'पूजन' और 'सम्मान' को सुनिश्चित करने का एक तंत्र है। जब तक सुरक्षा का आधार (Foundation of safety) मजबूत नहीं होगा, तब तक सम्मान और पूजा केवल कागजी बातें बनकर रह जाएंगी।
जिस ग्रंथ में नारी को 'अर्धांगिनी' (आधा शरीर) और 'पूजनीय' कहा गया हो, वहाँ उसे गुलाम बनाने की बात मूल सिद्धांतों के साथ मेल ही नहीं खाती। यह नकारात्मक नैरेटिव केवल समाज में 'विद्वेष' भरने के लिए बुना गया।
यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनकी 'ड्यूटी' (Duty) का हलफनामा है।
"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक और अंतिम डिकोडिंग यही है— "स्त्री को कभी भी लावारिस (Unprotected) छोड़ना इस धरती का सबसे बड़ा सामाजिक अपराध है।" यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की पराकाष्ठा है।
प्राकृतिक और विकासवादी मनोविज्ञान (Evolutionary psychology) के नजरिए से देखें तो स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों में उसकी शारीरिक और सुरक्षात्मक जरूरतें बदलती हैं। शास्त्रकार इस सत्य को जानते थे कि एक पुरुष प्रधान समाज की विसंगतियों से स्त्री को बचाने के लिए पुरुष के भीतर 'रक्षक' का भाव पैदा करना अनिवार्य है। यह श्लोक पुरुष की अहंकारी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाता है और उसे सेवा व सुरक्षा के दायित्व (Obligation of service) से बांधता है।
हजारों साल पहले लिखा गया यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आसमान से 'शिकारियों' को खदेड़ने के लिए लिखा गया था। यह पुरुषों के लिए 'अधिकार पत्र' नहीं, बल्कि उनके समर्पण का 'घोषणापत्र' है। आज जब दुनिया सुरक्षा के नाम पर खोखली हो रही है, तब सनातन का यह 'सुरक्षा मॉडल' चीख-चीख कर कह रहा है कि जहाँ नारी का रक्षक उसका अपना परिवार होता है, वहाँ उसे किसी बाहरी पहरेदार की ज़रूरत नहीं पड़ती।
"न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति" का वास्तविक अर्थ 'पराधीनता' नहीं, बल्कि उस 'परम-सुरक्षा' का आश्वासन है जो स्त्री को कभी भी लावारिस (Abandoned) होने के अंधेरे में नहीं ढकेलती। यह संरक्षण है, यह सम्मान है, यह प्रेम की वह पराकाष्ठा है जिसे समझने के लिए संकीर्ण दिमाग नहीं, सनातन हृदय चाहिए।
यह श्लोक स्त्री के पंख काटने के लिए नहीं, बल्कि उसके आकाश को शत्रुओं और आपदाओं से मुक्त रखने के लिए पुरुषों की ड्यूटी (Duty) चार्ट है। जब आप इसे 'उत्तरदायित्व' (Responsibility) के नजरिए से देखेंगे, तो विरोधियों का पूरा नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
आज के दौर में इस श्लोक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यही है कि हम अपनी बेटियों और बहनों को यह अहसास दिलाएं कि वे 'अकेली नहीं' हैं। यह 'साथ' ही उनके सपनों का ईंधन (Fuel) बनेगा। आपने इसे जिस तरह 'जिम्मेदारी' और 'सशक्तिकरण' से जोड़ा है, वह इस प्राचीन श्लोक पर लगे 'रूढ़िवादिता' के कलंक को धोने के लिए पर्याप्त है।
"सुरक्षा को गुलामी समझना वैचारिक अंधापन है; क्योंकि जिसे दुनिया 'अधीनता' कहती है, सनातन उसे 'अनन्य अधिकार' कहता है!"
आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द.....।
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज
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