Friday, April 10, 2026

पूजा के पांच प्रकार-

 पूजा के पांच प्रकार- 

देवी शिवा की पूजा हो अथवा शिव या हरि की 

शास्त्रों में पूजा के पांच ही प्रकार बताए गये हैं।


1. अभिगमन (देवी के मंदिर की साफ-सफाई)

2. उपादान  ( पुष्प आदि का इकट्ठा करना )

3. योग ( स्वयं में भी वही है जो उसमें है , वही यह है वही मैं हूँ ऐसा एकत्व ही परम योग जानों । शिव गीता में पाँच प्रकार की मुक्ति में कैवल्या ही परम है यही यथार्थ पराविज्ञान और यथार्थ योग। और योग के

 भेद और फल भी अलग अलग ऋषियों ने अलग अलग बताया है। 

4. स्वाध्याय ( सत्य को जानने के लिए महापुरुषों ने जो भी लिखा उसको पढ़ना और चिंतन ही स्वाध्याय कहलाता है यह भी पूजा ही कहलाती है मात्र मूर्ति को स्नान करवाकर, चंदन लगाना तथा मल्लिका व कमल पुष्प अर्पित करके धूप  दीप व  56 भोग अर्पित करना ही पूजा नहीं। यह मूर्ति पूजा स्वाध्याय नामक पूजा की तुलना में गौण फल देती है। इस आवरण पूजा से अनेक वर्ष बाद चित्त की शुद्धि होती है पर  ब्रह्मनिष्ठ संतों के वाक्यों व  अक्षरों का सेवन से तत्काल ही ब्रह्मानंद उत्पन्न हो जाता है। शिव महापुराण के अनुसार शिव जी को अभिषेक व  लाख बिल्वपत्र से भी जो प्रसन्नता नहीं होती वह प्रसन्नता मात्र आधी घड़ी या आधी से आधी घड़ी के स्वाध्याय से हो जाती है। इसी कारण यह अक्षयरुद्र भी अनेक वर्षों से शिव जी की यही आज्ञा में मस्त होकर ब्रह्म सुख भोगने लगा। स्वाध्याय परम सुख का सागर है ।

स्वाध्याय अमृत है। स्वाध्याय ही विकारों के नाश की अतुलनीय औषधी है।

जो महासंत प्राण त्याग चुके उनकी मूर्ति की सेवा से विष्णु मूर्ति की सेवा का फल मिलता है पर वह मूर्ति देवालय के भीतर स्थित न हो अन्यथा उस संत को ही पाप का फल मिलता है यह संत की वाणी के अनुसार 32 अपराध के अंतर्गत है। और इन मूर्ति की तुलना में सहस्र गुना अधिक फल जीवित मौनी संत की पूजा सेवा  से होता है। तथा इसका भी लाख गुना अधिक फल ब्रह्मनिष्ठ वक्ता हो तो उनकी पूजा व सेवा से होता है और इसका भी करोड़ गुना फल उन ब्रह्मनिष्ठ वक्ता की पूजा सेवा के बाद उनकी वाणी सुनने से होता है अथवा वही फल कैवल्यापद देने वाली उपनिषदों के स्वाध्याय से होता है यह ब्रह्म विद्या है जो आत्माराम बनाती हैं इससे आत्मा परिशुद्घ होकर अन्तरात्मा हो जाती है और और भी अभ्यास से तद्भावित होकर परमात्मा ही हो जाती है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि पंचाक्षरी के  3करोड़ जप से महारुद्र बन जाती है और चार कोटी से ईश्वर ( महेश पद पाती है तथा 50000000 बार  नमः शिवाय जप से यह आत्मा सदाशिव जी के समान परमात्मपद पा लेती है। 

 अतः सत्संग या ऐसे अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठों की वाणी या इनके द्वारा रचित ग्रंथ अवश्य पढ़ना ही चाहिए। एक बार तुम भले ही मूर्ति सेवा या तीर्थवास न करो चलेगा पर यदि आपने स्वाध्याय को पकड़कर रखा तो इस ब्रह्माण्ड की सभी मूर्तियाँ तृप्त हो जाती हैं यह शिव पुराण, लिंग पुराण के साथ ऐसे अंशभूतशिव की वाणी है जिसने घने जंगल में अकेले ही मध्य रात्रि में शिव जी से वार्तालाप किया है। 

( नोट - पर जानबूझकर अधिक मूर्तियों के ढेर न लगायें अधिक मूर्ति हो तो आठ अंगुल से बड़ी को मंदिर में दान कर दें या छोटी अधिक हो तो उनको दान करें जिनके पास एक भी मूर्ति न हो ; पर आप अपना अधिकांश समय सत्संग और इससे भी अधिक स्वाध्याय में दो क्योंकि आजकल लोग भगवा की आड़ में यथार्थ पराविज्ञान नहीं परोसते अपितु घर गृहस्थी या राजनीति की बातें अधिक करते हैं या टोटके बताते हैं कि कैसे धन और ऐश्वर्य मिले उन तथाकथित वक्ताओं को कपिल या ऋषभ जी के वैराग्य से मतलब ही नहीं। बस मीठी मीठी बातों से धन बटोरा और पोटली बांधी और चल दिये। आजकल वीतरागी वक्ता अति अल्प बचे हैं और उनसे भी कम ब्रह्मविद् बचे हैं । शिवगीता की माने तो महावाक्यों को पढ़कर या सुनकर उनके चिन्तन से व अभ्यास से अभिन्न भाव आने से कैवल्या मुक्ति मिलती है जो ईश्वरत्व ही है तथा ब्रह्म का ही अनन्तकाल का दिव्य भाव है तद्भावितता यही है। और इससे ही योग की सिद्धि होती है। योग की सिद्धि का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञाननिष्ठता ही है।

यदि योग को  आसन आदि  माने तो ऐसे योग का विशेष फल नहीं बस देह की सुरक्षा है। अथवा योग को जीव और परमात्मा का मिलन समझें तो इष्ट की प्राप्ति इसका फल है। जो सालोक्य देता है। 

5. इज्या (  मूर्ति में आवाहन या प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा अथवा शिवलिंग व शालग्राम पूजा ) 

अब थोड़े-बहुत पुनः विस्तृत वर्णन- 

#अभिगमन-

देवता के स्थान को साफ करना लीपना, निर्माल्या हटाना- ये सब कर्म "अभिगमन" के अन्तर्गत हैं।


#उपादान-

गन्ध, पुष्प आदि पूजा सामग्री का संग्रह "उपादान" है।


#योग-

इष्टदेव की आत्म रूप से भावना करना "योग" है। #स्वाध्याय-

 मन्त्रार्थ का अनुसंधान करते जप करना, सूक्त, स्तोत्र आदि का पाठ करना, गुण नाम, लीला आदि का कीर्तन करना और वेदान्त शास्त्र आदि का अभ्यास करना “स्वाध्याय" है। इससे सायुज्य मुक्ति मिलती है और दुखों का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है संकीर्ण सोच नष्ट होती है व्यापक भाव और करुणा प्राप्त होती है मन तत्काल निश्चित ही पवित्र हो जाता है इसी का एक रूप श्रवण भी है ग्रंथों के ही वाक्यों को किसी से सुनना भी यही फल देता है और कहो तो इसका 100 गुना शीघ्र फल मिलता है। इस कारण मात्र पांच बार ब्रह्मचर्य पूर्वक शिवपुराण सुनने से भोलेनाथ का युगल साक्षात्कार हो जाता है।

अतः जो पति अपनी पत्नि को नित्य दो घंटे की स्वतंत्रता नहीं देता ताकि वह शिव पुराण या श्रीमद्भागवत पढ़ सके 

वह पति निश्चित ही पूर्व जन्म का शत्रु है पति परमेश्वर नाम से वह निश्चित ही पत्नि का शोषण कर रहा है और यही माता पिता भी यदि संतान के साथ कर रहे हैं ( वे न तो अनुष्ठान करने देते न ही शिव पुराण पढ़ने देता डैली) हैं तो वे माता और पिता भी पूर्व जन्म के शत्रु हैं जो साधना में खलल डाल रहे हैं।

और जो पत्नि अपने पति को एक साल तक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करने देती ( ताकि एक वर्ष तक शान्ति से एक महा अनुष्ठान संपन्न हो तो स्वयं सहित परिवार की भी विशेष रक्षा हो ) वह पत्नि भी पूर्व जन्म की शत्रु है और शिव पुराण में वेदव्यास जी ने ऐसी नारी को राक्षसी कहा है जो हर दो तीन दिन में पति का रक्त चूसती है । हाँ यही कहा है पढ़ लेना ( if you don't believe me according this  Anshbhootshiv'spost  ) 

#इज्या-

उपचारों के द्वारा अपनी अराध्य देवी की पूजा "इज्या" है।


ये पांच प्रकार की पूजाएं क्रमशः

सार्ष्टि,

सामीप्य 

सालोक्य, 

सायुज्य 

और

सारूप्य मुक्ति देने वाली है।


नारायण 🙏 


प्रेषक:प़ं० धवलकुमार शास्त्री

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