🌼 यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि 🌼
✍️ प्रस्तुति: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट
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यज्ञोपवीत उदात्त-भावनासम्बद्ध एक पवित्र सूत्र है, जो हमारे जीवन को श्रुति-स्मृति-अनुमोदित मार्ग पर संचालित करते हुए समस्त उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों के सम्यक् निर्वहन हेतु ईश्वरदत्त साधन के रूप में प्रतिष्ठित है। अतः शास्त्रकारों ने प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी के लिए यथाशक्ति स्वयं सूत कातकर, अपने हस्त-परिमाणानुसार, यज्ञोपवीत का निर्माण करने का विधान निर्दिष्ट किया है।
महर्षि कात्यायन द्वारा प्रतिपादित यज्ञोपवीत-निर्माण-विधि का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है :—
महर्षि कात्यायन कहते हैं—अब हम यज्ञोपवीत-निर्माण की विधि का निरूपण करते हैं। इसके निर्माण के लिए ग्राम से बाहर किसी तीर्थस्थान, मन्दिर अथवा गोशाला में जाकर, अनध्याय-रहित दिवस में, संध्यावन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न कर, एक सौ आठ, एक सहस्र आठ अथवा यथाशक्ति गायत्री-मन्त्र का जप करके, ऐसे सूत से यज्ञोपवीत तैयार करना चाहिए जो स्वयं, अथवा किसी ब्राह्मण, ब्राह्मण-कन्या अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा काता गया हो।
तत्पश्चात् उस सूत को ‘भूः’ इति उच्चार्य, षण्णवति (९६) अंगुल-परिमाण में, चारों अँगुलियों के मूल पर लपेटकर उतार लें तथा उसे पलाश-पत्र पर स्थापित करें।
अनन्तर ‘भुवः’ इति उच्चार करते हुए उसी प्रकार द्वितीय वार, तथा ‘स्वः’ इति उच्चार करते हुए तृतीय वार, पुनः ९६ अंगुल-परिमाण के अनुसार, अन्य दो तन्तुओं का निर्माण कर, उन्हें भी पृथक् पलाश-पत्र पर रख दें।
इसके उपरान्त ‘आपो हि ष्ठा’, ‘शं नो देवी’, तथा ‘तत्सवितुः’
इन तीन मन्त्रों द्वारा उन तीनों तन्तुओं को जल में सम्यक् अभिषिक्त कर, बाएँ हस्त में लेकर, त्रिवार प्रबल आघात करें।
तत्पश्चात् तीनों व्याहृतियों द्वारा उन्हें एकत्र बटकर एकरूप बना लें।
फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा उन्हें त्रिगुणित कर पुनः बटकर एकरूप करें।
पुनरपि त्रिगुणित करके, प्रणव (ॐ) के द्वारा उसमें ब्रह्मग्रन्थि स्थापित करें।
तत्पश्चात् उसके नव तन्तुओं में क्रमशः—ओंकार, अग्नि, अनन्त, चन्द्र, पितृगण, प्रजापति, वायु, सूर्य तथा समस्त देवताओं का आवाहन एवं स्थापन करें।
अन्त में ‘उद्वयं तमसः परि’ मन्त्र द्वारा उस सूत्र को सूर्य के समक्ष प्रदर्शित कर, ‘यज्ञोपवीतम्’ मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे धारण करें।
🔸️मूल संस्कृत प्रमाण (कात्यायनपरिशिष्ट)👉
अथातो यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारं वक्ष्यामः ।
ग्रामाद् बहिः तीर्थे गोष्ठे वा गत्वा अनध्याय-वर्जितपूर्वाह्ने कृतसन्ध्यः अष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा ब्राह्मणेन तत्कन्यया सुभगया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रम् आदाय ‘भूरिति’ प्रथमां षण्णवतीं मिनोति, ‘भुवरिति’ द्वितीयां, ‘स्वरिति’ तृतीयां मीत्वा, पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य, ‘आपो हि ष्ठेति’ तिसृभिः, ‘शं नो देवी’त्यनेन सावित्र्या च अभिषिच्य, वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य, व्याहृतिभिः त्रिवणितं कृत्वा, पुनः ताभिः त्रिगुणितं कृत्वा, पुनः त्रिवृतं कृत्वा, प्रणवेन ग्रन्थिं कृत्वा—ओङ्कारम्, अग्निम्, नागान्, सोमम्, पितॄन्, प्रजापतिम्, वायुम्, सूर्यम्, विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य सम्पूजयेत्। ‘देवस्य’ इत्युपवीतमादाय, ‘उद्वयं तमसः परि’ इत्यादित्याय दर्शयित्वा, ‘यज्ञोपवीतम्’ इत्यनेन धारयेत्—इत्याह भगवान् कात्यायनः।

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