जहाँ स्त्री शंख बजाती है।
वहाँ से लक्ष्मी चली जाती है।
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शंखचूढ जो दम्भ नामक दानव का पुत्र व विप्रचिति का पोत्र था - व भगवती तुलसी का पति था - जो भगवती राधा के शाप वश गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के मुख्य आठ सखाओं में से सुदामा नाम का गोप था -
यानि सुदामा नाम का गोलोक में निवास करने वाला गोप ही श्रीराधा जी के शाप वश शंखचूढ नाम का दानव हुआ - जिसकी हड्डियों से शंख व शंखजाति के अन्य शंखों की उत्पत्ति हुई।
" अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव है । "
वह शंख भगवान श्रीहरि का अधिष्ठान स्वरूप है -- वही शंख अनेक प्रकार के रूपों में निरन्तर विराजमान होकर देवताओं की पूजा में पवित्र माना जाता है।
अत्यंत प्रशस्त - पवित्र तथा तीर्थजल स्वरूप शंखजल केवल शंकर भगवान को छोडकर अन्य देवताओं के लिए परम प्रीतिदायक है -- जहाँ शंख ध्वनि होती है - वहाँ लक्ष्मी जी स्थिर रूप से सदा विराजमान रहती है।
प्रशस्तं शंखतोयं च देवानां प्रीतिदं परम् ।
तीर्थतोयस्वरूपं च पवित्रं शम्भुना विना ।।
शंखशब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीं सुसंस्थिरा ।। "
जहाँ शंख रहता है - वहाँ भगवान श्रीहरि विराजमान रहते हैं - वहीं पर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं तथा उस स्थान से सारा अमंगल दूर भाग जाता है - किन्तु स्त्रियों और विशेषरूप से शूद्रों के द्वारा की गई शंख ध्वनियों से भयभीत तथा रूष्ट होकर लक्ष्मी जी अन्य देश को चली जाती हैं।
शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः ।
तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम् ।।
स्त्रीणां च शंखध्वनिभिः शूद्राणां च विशैषतः ।।
भीता रूष्टा याति लक्ष्मीस्तत्स्थलादन्यदेशतः ।।
!! नारायण !!
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