Friday, April 3, 2026

जहाँ स्त्री शंख बजाती है। वहाँ से लक्ष्मी चली जाती है।

 जहाँ स्त्री शंख बजाती है।

वहाँ से लक्ष्मी चली जाती है।

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शंखचूढ जो दम्भ नामक दानव का पुत्र व विप्रचिति का पोत्र था - व भगवती तुलसी का पति था - जो भगवती राधा के शाप वश गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के मुख्य आठ सखाओं में से सुदामा नाम का गोप था - 

          यानि सुदामा नाम का गोलोक में निवास करने वाला गोप ही श्रीराधा जी के शाप वश शंखचूढ नाम का दानव हुआ - जिसकी हड्डियों से शंख व शंखजाति के अन्य शंखों की उत्पत्ति हुई।


" अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शंखजातिर्बभूव है । "


वह शंख भगवान श्रीहरि का अधिष्ठान स्वरूप है -- वही शंख अनेक प्रकार के रूपों में निरन्तर विराजमान होकर देवताओं की पूजा में पवित्र माना जाता है।


अत्यंत प्रशस्त  - पवित्र तथा तीर्थजल स्वरूप शंखजल केवल शंकर भगवान को छोडकर अन्य देवताओं के लिए परम प्रीतिदायक है -- जहाँ शंख ध्वनि होती है - वहाँ लक्ष्मी जी स्थिर रूप से सदा विराजमान रहती है।


प्रशस्तं शंखतोयं  च देवानां  प्रीतिदं परम् ।

तीर्थतोयस्वरूपं  च पवित्रं शम्भुना विना ।।

शंखशब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीं सुसंस्थिरा ।। "


जहाँ शंख रहता है  - वहाँ भगवान श्रीहरि विराजमान रहते हैं -  वहीं पर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं तथा उस स्थान से सारा अमंगल दूर भाग जाता है - किन्तु स्त्रियों और विशेषरूप से शूद्रों के द्वारा की गई शंख ध्वनियों से भयभीत तथा रूष्ट होकर लक्ष्मी जी अन्य देश को चली जाती हैं।


शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शंखस्ततो हरिः ।

तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम् ।।

स्त्रीणां च शंखध्वनिभिः शूद्राणां च विशैषतः ।।

भीता रूष्टा याति लक्ष्मीस्तत्स्थलादन्यदेशतः ।। 


       !! नारायण !!

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