Thursday, June 11, 2026

दोहरी घाट

 एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर में सोये थे।  स्वप्न में उन्होंने करोडों चन्द्रमा के तेज से युक्त, त्रिशूल हाथ में लेकर भगवान् शंकर को अपने आगे नाचते देखा।


उनको देखकर भगवान् विष्णु उठ गये तथा शिव का ध्यान करने लगे।


उन्हें ध्यान में देखकर भगवती लक्ष्मी ने पूछा ---  "हे प्रभु !  आप इस प्रकार कैसे बैठे हो ?"


भगवान् ने थोड़ी देर उत्तर नहीं दिया, बाद में बोले---


"देवी !  मैंने स्वप्न में शिव दर्शन किया है।  ऐसा प्रतीत होता है कि शिव ने मेरा स्मरण किया है।  चलो --- कैलाश में चलकर हम दोनों उनका दर्शन करें।"


तब दोनों शंकर जी से मिलने के लिए चल पड़े।


उधर शिवलोक में शंकरजी ने भी भगवान् विष्णु का दर्शन किया।  माता पार्वती के पूछने पर भगवान् शिव ने विष्णु दर्शन की बात कही।   शिव-पार्वती भी विष्णु दर्शन के लिए चले।


आधी दूरी पर विष्णु भगवान् ने देखा कि भगवान् शिव गौरी सहित आ रहे हैं।    दोनों को अपार प्रसन्नता हुई।


दोनों परस्पर ऐसे मिले जैसे दो प्रेम के सागर मिलते हैं,   एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्द के आँसू बहने लगे,  शरीर पुलकित हो गया,   दोनों मूकवत् खड़े रहे।


दोनों ने ही एक-दूसरे को अपने-अपने लोक में ले जाने का हठ किया।   इतना अपूर्व प्रेम था कि निर्णय करना कठिन था। 


इतने में नारद जी वीणा बजाते हुए, हरिहर गुणगान करते आ पहुँचे।  नारद जी ने चारों को प्रणाम किया।  विष्णु तथा शिवजी ने नारद जी से निर्णय करने को कहा।


इनके लोकोत्तर झगड़े का निर्णय करने में असमर्थ हुये नारद जी कुछ नहीं बोल पाये।


निर्णय कौन करे ?  अन्त में सबने उमा से कहा ----  

"आप जो निर्णय देंगी, हम दोनों को स्वीकार है।"


🔹️उमा पहले मौन रही, फिर बोली :---

"यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।

मन्ये तया प्रमाणेन न भिन्नबसती युवाम्।।


यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।

मन्ये तया प्रमाणेन आत्मैकोऽन्यतनुर्मिथ।।


यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।

मन्ये तया प्रमाणेन भार्ये आवां पृथङ्वाम्।।


यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।

मन्ये तया प्रमाणेन वेश एकस्य सद्वयो:।।


यादृशी दर्शिता प्रीतिर्युवाभ्यां नाथ केशव।

मन्ये तया प्रमाणेन अपूज्यैकस्य च द्वयो:।।"

                         --- वृहद्धर्मपुराण पूर्वखण्ड


अर्थ---   हे नाथ !  हे केशव !  आप दोनों में जैसी प्रीति है,  इस प्रमाण से मैं मानती हूं कि आप दोनों का निवास वैकुण्ठ तथा कैलाश ---- ये दोनों भिन्न नहीं है।


हे नाथ !   हे केशव !   आप दोनों में जैसी प्रीति देखी है,  इस प्रमाण से आप दोनों की आत्मा एक शरीर दो हैं।


इतना ही नहीं !  आप दोनों की पत्नियां भी एक है, दो नहीं। 

आप दोनों की प्रीति से ऐसा लगता है कि जो एक से द्वेष करता है, वह दोनों से द्वेष करता है।


एक की जो पूजा करता है, वह दोनों की ही पूजा करता है।

एक को जो पूज्य मानता है, वह दोनों को ही पूज्य मानता है।

आपमें जो भेदबुद्धि करता है, वह नरक प्राप्त करता है।


मैं समझती हूं कि आप दोनों मुझे मध्यस्थ बनाकर ठग रहें हैं।  अब मैं आप दोनों से प्रार्थना करती हूं कि आप दोनों ही अपने-अपने लोक में चले जाएं।


विष्णु यह समझें कि मैं शिव रूप से वैकुण्ठ जा रहा हूँ, महेश्वर यह समझें कि मैं विष्णु रूप से कैलाश जा रहा हूँ।


पद्मपुराण में भी इससे मिलती-जुलती कथा आई है।

       

उसमें पार्वती के निर्णयानुसार भगवान् विष्णु शिव रूप धारण करके , लक्ष्मी उमा का रूप धारण कर कैलाश चली गई तथा भगवान् शंकर विष्णु रूप से, गौरी लक्ष्मी रूप से वैकुण्ठ में प्राप्त हुये।


इस निर्णय को सुनकर दोनों प्रसन्न चित्त से पार्वती की प्रशंसा करते हुए एक दूसरे का आलिंगन करके, अपने-अपने लोक में चले गये।


जब भगवान् विष्णु लक्ष्मी सहित वैकुण्ठ पधारे तब लक्ष्मी जी ने भगवान् के चरण दबाते हुये पूछा ---  "प्रभो !  आपको सबसे अधिक प्रिय कौन है ?"


तब भगवान् विष्णु ने कहा :---

"न मे प्रियतमा: सन्ति शिव एक: प्रियो मम।

अहेतुक: प्रियोऽसौ मे स्वकाय: प्राणिनामिव।।


स एवाहं महादेव: स एवाहं जनार्दन:।

उभयोरन्तरं नास्ति घटस्थ जलयोरिव।।


शिवादन्य: प्रियो मेऽस्ति भक्तो य: शिवपूजक:।

शिवास्यापूजको लक्ष्मी न कदापि प्रियो मम।।"


अर्थ ----

 हे देवी !  जैसे देहधारियों को देह प्रिय है, इसी प्रकार भगवान् शंकर मुझे प्रिय हैं।


मैं ही विष्णु, मैं ही शिव हूँ।   दोनों में दो घड़ों में स्थित जल के समान भेद नहीं है।


शिव के अतिरिक्त शिवभक्त मुझे प्रिय है।  शिव की पूजा न करने वाला मेरा भक्त भी मुझे प्रिय नहीं है।


इन कथाओं से शिवद्रोही वैष्णवों और विष्णुद्रोही शैवों को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।


जिस स्थान पर हरिहर का मिलन हुआ था, वह आजकल सरयू तट पर दोहरी घाट के नाम से विख्यात है।


वहां के लोग कहते हैं कि भगवान् यहां दो रूपों में आकर मिले थे।  वे दो रूप शिव-विष्णु के ही होंगे।


यह स्थान उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में, जिसका प्राचीन नाम अजमीढ़गढ़ था, वहीं पर दोहरी घाट नाम का कस्बा है।


सरयू के उस पार गोरखपुर की सीमा आरम्भ होती है, जिसका प्राचीन नाम गोरक्षपुर था। यह नगर गुरु गोरखनाथ का बसाया हुआ है।🍁

No comments:

Post a Comment