Sunday, June 21, 2026

गणपतिको दादा क्यों कहते हे ?

 आजका प्रश्न : - 

गणपतिको दादा क्यों कहते हे ?

सृष्टि को बनाने वाले, पालन करने वाले और संहारक ब्रह्मा जी विष्णु जी और शिवाजी इन तीनों के पीछे आपने कहीं दादा शब्द लिखा हुआ देखा है ? नहीं न, तो गणपति को गणपति दादा क्यों कहते हैं ? क्योंकि वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनोंका भी बाप है। यकीन न हो तो देख लीजिए गणपति अथर्वशीर्ष।


ॐ नमस्ते गणपतये। 

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।

 त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।

 त्वमेव केवलं धर्तासि।।

 त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।

 त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।

 ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।

अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।

 अव श्रोतारं। अवदातारं।।

 अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं।।

 अव पश्चातात्।। अवं पुरस्तात्।।

 अवोत्तरातात्।। अव दक्षिणात्तात्।।

अव चोर्ध्वात्तात।। अवाधरात्तात।।

 सर्वतो मां पाहिपाहि समंतात्।।

 

त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय।

त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय:।।

त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोऽसि।

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।

सर्व जगदि‍दं त्वत्तो जायते।

सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।

सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।।

सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति।।

त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ:।।

त्वं चत्वारिवाक्पदानी।।5।।

त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।

त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।

त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यं।

त्वं शक्ति त्रयात्मक:।।

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।

त्वं शक्तित्रयात्मक:।।

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।

वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम्।।6।।

इसका अर्थ हैबिस सृष्टिमें जो कुछ भी हे, वह गणपति ही हे।

ये शिवके पुत्र नहीं हे वे साक्षात नारायण ही हे।


सिर्फ शिवजी के पुत्र नहीं हे, इसके बारेमें अलग कथा लिखनी पड़ेगी।

भगवान शिवजी जब तारकासुर के तीनों पुत्रों को मारने के लिए गए थे लेकिन उसको मार नहीं सके। इस पर शिवजी ने ब्रह्माजी और विष्णुजी से पूछा

 : - कि मुझे तीनों तारक असूरों को मारने में सफलता क्यों नहीं मिलती ? तब ब्रह्माजी ने बताया की प्रभु ! आप मारनेके लिए गए थे मगर  प्रस्थान करने से पहले अपने गणपति का स्मरण नहीं किया था। इसलिए जबतक उनका स्मरण नहीं करोगे तबतक तुम उसको मारने के लिए सदा  असमर्थ रहोगे। 


भगवान शिवजी ने ब्रह्माजी को कहा :- लेकिन ये तो मेरा पुत्र हे। ब्रह्माजी ने कहा कि यहां पिता पुत्र कुछ नहीं चलेगा।

में भी किसी का पुत्र हु ओर किसी का बाप भी हु। 


ये सुनकर शिवजी ने गणपति का स्मरण किया और तीनों को मारने के लिए गए। एक ही बाण छोड़ा तो सुवर्ण, चांदी और लोहेसे बनाया हुआ उसका तीनों महल ताश के पत्ते की तरह ध्वस्त हो गए और तारकासुर के तीनों पुत्र भी मर गए। 


एक बार भगवान वेद व्यास शास्त्रों लिखने के लिए गुफा में बैठे थे गणपति तो उसके स्टेनोग्राफर है ही। लेकिन व्यासजी को क्या लिखवाउ यह कुछ याद नहीं आ रहा था। बहुत सोचनेपर भी कुछ याद नहीं आया तो उसने लिखवाने से पहले मेरा स्मरण नहीं किया इसलिए यह संकटआ पड़ा है। तब व्यासजी ने गणपति का स्मरण किया तो उसको सब याद आने लगा। और शास्त्र लिखवानेमें लग गए।


इस तरह गणपति स्वयं श्रीनारायण का रूप ही हे। आदि का अर्थ होता सबसे पहले। या जब से यह सृष्टि उत्पन्न हुई तबसे। तो भगवान नारायण तो तब से हे ओर वे ही  गणपति हे। उसको आदि गणपति भी कहा जाता हे। 

आगे गणपति शिवनंदन क्यों बने ? 

गणपति स्वयं नारायण होते हुए भी भगवान शिव-पार्वती के पुत्र

क्यों बने ?

कार्तिक स्वामी ताड़कासुरको मारकर क्रौंच पर्वत पर चले गये उसके बाद माता पार्वती घरमें अकेली ही थी। भगवान महादेव तो समाधि में बैठ जाते तो छियासी हजार वर्ष बीत जाते। तब पार्वतिको घर में अकेले ही जीवन बिताना पड़ता था। अकेलेपन से तंग आकार एकबार उसने भगवान शिवसे कहा - हे नाथ ! मुझे घर में अकेला रहना पड़ता हे तो मुझे एक ऐसा बेटा चाहिए क्योंकि घर में अकेले सुनापन लगता हम भगवान शिव ने कहा ऐसा बेटा तो आपको  देनेमें में असमर्थ हूं लेकिन भगवान कृष्ण आपको ऐसा बेटा दे सकते हैं, अतः उसकी शरणमें जाओ। तब माता पार्वती ने उसकी शरण ग्रहण कर ली और एक व्रत का अनुष्ठान किया। पूरा व्रत समाप्त होने पर एक दिन जब माता पार्वती स्नान कर रही थी उसी समय उसने अपने हाथ lसे मेल निकाल कर एक पुतला बनाया और जैसे ही उसको जमीन पर रखा तो इसमें जीव आ गया भी नाचने लगा और प्रकट हो गये भगवान गणपति। माता पार्वती ने व्रत किया था, उस समय भगवान कृष्ण ने उसको वचन दिया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनकर आऊंगा। इसलिए भगवान कृष्ण ही नारायण हे ओर वही नारायण स्वयं गौरीनंदन गणेश हे। 

जय गजानन।

         🦣 समाप्त 🦣

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