"प्रातिशाख्य-शास्त्र : वैदिक उच्चारण-विज्ञान, व्याकरण और निरुक्त की दृष्टि से एक शोधात्मक अध्ययन"
✓•प्रस्तावना: भारतीय ज्ञानपरम्परा में वेदों को अपौरुषेय, नित्य तथा श्रुति कहा गया है। वेद केवल अर्थप्रधान ग्रन्थ नहीं हैं, अपितु ध्वनि, स्वर, मात्रा, बल, विराम तथा उच्चारण की सूक्ष्मतम परम्परा के संरक्षक भी हैं। वैदिक वाङ्मय की रक्षा का प्रश्न केवल पाठ की रक्षा का प्रश्न नहीं था, बल्कि प्रत्येक वर्ण, स्वर और संहितारूप ध्वनि की अक्षुण्णता का प्रश्न था। इसी आवश्यकता से जिस शास्त्र का जन्म हुआ, उसे प्रातिशाख्य कहा जाता है।
प्रातिशाख्य ग्रन्थ वस्तुतः वैदिक शाखाओं के ध्वनिवैज्ञानिक संविधान हैं। वे यह निर्धारित करते हैं कि किसी वैदिक मन्त्र का उच्चारण किस प्रकार किया जाए, संहिता-पाठ और पद-पाठ में क्या भेद है, स्वर कहाँ उदात्त होगा, कहाँ अनुदात्त और कहाँ स्वरित, किस वर्ण का किस वर्ण के समीप आने पर क्या रूप होगा, तथा वैदिक पाठ की शुद्धता कैसे सुरक्षित रखी जाए।
यदि पाणिनि का अष्टाध्यायी संस्कृत भाषा का महान् व्याकरण है, तो प्रातिशाख्य वैदिक भाषा के जीवित ध्वनि-विज्ञान के प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
✓•१. प्रातिशाख्य शब्द की व्युत्पत्ति:
व्याकरण की दृष्टि से प्रातिशाख्य शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—
प्रति + शाखा + यत्
पाणिनीय तद्धितप्रक्रिया के अनुसार—
शाखामधिकृत्य कृतं शास्त्रम् = प्रातिशाख्यम्।
अर्थात् किसी विशिष्ट वेदशाखा से सम्बन्ध रखने वाला शास्त्र।
निरुक्तीय विवेचन
शाखा शब्द का मूल अर्थ वृक्ष की डाली है।
निरुक्त-दृष्टि से—
शाख्यते, विभज्यते, प्रसार्यते इति शाखा।
अर्थात् जो मूल से प्रसारित होकर अनेक रूपों में विभक्त हो, वह शाखा है।
वेद एक मूल तत्त्व है, किन्तु अध्ययन-परम्पराओं के अनुसार उसके अनेक पाठभेद और परम्पराएँ बनीं; इन्हें शाखाएँ कहा गया।
इस प्रकार—
प्रति शाखां प्रवृत्तं शास्त्रं प्रातिशाख्यम्।
✓•२. वैदिक शाखाओं का उद्भव:
वैदिक युग में ज्ञान का सम्पूर्ण आधार श्रुति पर था।
वेदों का संरक्षण—
पुस्तकों से नहीं,
लेखन से नहीं,
बल्कि श्रवण और स्मरण से होता था।
इसलिए प्रत्येक गुरु-परम्परा में मन्त्रों का उच्चारण कुछ सूक्ष्म भेदों सहित सुरक्षित रहा।
महाभाष्य का प्रमाण
पतञ्जलि कहते हैं—
एकशतं अध्वर्युशाखाः।
यजुर्वेद की अनेक शाखाएँ थीं।
इसी प्रकार ऋग्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की भी अनेक शाखाएँ विद्यमान थीं।
चरण परम्परा
पाणिनि (४।३।१०१) में—
चरणशब्दः अध्ययनसमुदायवाचकः।
किसी शाखा के अध्येताओं का समुदाय चरण कहलाता था।
इन चरणों की विद्वत्सभा—
परिषद्
कहलाती थी।
अतः प्रातिशाख्य को कभी-कभी
पार्षदसूत्र
भी कहा गया।
✓•३. प्रातिशाख्यों की आवश्यकता:
वेद की रक्षा के लिए केवल स्मरण पर्याप्त नहीं था।
क्योंकि प्रश्न उठते थे—
उदात्त कहाँ होगा?
स्वरित कहाँ होगा?
संधि कैसे होगी?
पदपाठ में कौन-सा रूप होगा?
संहितापाठ में कौन-सा?
इन प्रश्नों के समाधान हेतु प्रातिशाख्यों की रचना हुई।
✓•४. यास्काचार्य का प्रमाण:
निरुक्त (१।१७) में कहा गया है—
पदप्रकृतिः संहिता। पदप्रकृतिनि सर्वचरणानां पार्षदानि।
अर्थात्—
संहिता पदों पर आधारित होती है और सभी चरणों के पार्षदग्रन्थ (प्रातिशाख्य) पदों को आधार बनाकर संहिता का विवेचन करते हैं।
यह प्रातिशाख्य-शास्त्र का मूल सिद्धान्त है।
✓•५. प्रातिशाख्य और शिक्षा:
बहुधा लोग शिक्षा और प्रातिशाख्य को समान समझ लेते हैं।
किन्तु दोनों में अन्तर है।
शिक्षा
शिक्षा का विषय—
वर्ण
स्वर
मात्रा
बल
साम
सन्तान
है।
तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है—
वर्णः स्वरः मात्रा बलं साम सन्तानः।
प्रातिशाख्य
प्रातिशाख्य का विषय—
संहिता
पदपाठ
संधि
स्वरपरिवर्तन
वर्णविकार
पाठपद्धति
है।
अतः शिक्षा सामान्य ध्वनिशास्त्र है और प्रातिशाख्य शाखाविशेष का ध्वनिशास्त्र।
✓•६. प्रमुख प्रातिशाख्य:
∆(क) ऋग्वेदप्रातिशाख्य:
इसे शौनककृत माना जाता है।
यह उपलब्ध प्रातिशाख्यों में अत्यन्त प्राचीन है।
इसमें—
संहिता
स्वर
संधि
पदपाठ
का विस्तृत विवेचन है।
∆(ख) तैत्तिरीय प्रातिशाख्य:
कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध।
यह ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।
∆(ग) वाजसनेयी प्रातिशाख्य:
शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध।
कात्यायनकृत माना जाता है।
∆(घ) अथर्ववेद प्रातिशाख्य:
जिसे
चतुरध्यायिका
भी कहते हैं।
∆(ङ) सामवेद प्रातिशाख्य:
सामगान की विशेषताओं का विवेचन करता है।
✓•७. संहिता की अवधारणा:
प्रातिशाख्यों का सबसे महत्वपूर्ण विषय है—
संहिता।
ऋग्वेदप्रातिशाख्य में कहा गया—
पदान्तात् पदादारभ्य यः संयोगः सा संहिता।
अर्थात् पदों का परस्पर जुड़ना ही संहिता है।
व्याकरणिक दृष्टि
पाणिनि कहते हैं—
परः सन्निकर्षः संहिता। (अष्टाध्यायी १।४।१०९)
दो वर्णों का अत्यन्त समीप आ जाना संहिता है।
यहीं से संधि उत्पन्न होती है।
✓•८. पदपाठ और संहितापाठ:
उदाहरण—
संहिता रूप—
अग्निमीळे
पदपाठ—
अग्निम् । ईळे ।
प्रातिशाख्य यह बताता है कि—
मूल पद क्या है?
संहिता में क्या परिवर्तन हुआ?
✓•९. वैदिक स्वर-विज्ञान:
प्रातिशाख्यों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान स्वर-विज्ञान है।
तीन मुख्य स्वर—
उदात्त
उच्च स्वर।
अनुदात्त
नीचा स्वर।
स्वरित
मिश्रित स्वर।
ऋग्वेदप्रातिशाख्य में इनका अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन है।
✓•१०. स्वरों का दार्शनिक महत्व:
महाभाष्य में कहा गया—
स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तः।
यदि स्वर या वर्ण में त्रुटि हो जाए तो अर्थ बदल सकता है।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण—
इन्द्रशत्रुः
और
इन्द्रं शत्रुः
का है।
स्वरभेद से अर्थभेद हो जाता है।
✓•११. वर्णविज्ञान:
प्रातिशाख्यों में वर्णों का वर्गीकरण मिलता है।
स्वर
अ, इ, उ, ऋ आदि।
स्पर्श
क-वर्ग, च-वर्ग आदि।
अन्तःस्थ
य र ल व।
ऊष्म
श ष स ह।
यह वर्गीकरण आगे चलकर पाणिनीय व्याकरण का आधार बना।
✓•१२. संधिविज्ञान:
प्रातिशाख्यों में संधियों का अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन मिलता है।
उदाहरण—
तत् + एव = तदेव
यह केवल व्याकरणिक नियम नहीं, अपितु वैदिक ध्वनि-प्रवाह का नियम है।
✓•१३. प्रातिशाख्य और पाणिनि:
एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
क्या पाणिनि प्रातिशाख्यों से प्रभावित थे?
उत्तर—निश्चय ही।
पाणिनि के अनेक नियम प्रातिशाख्य परम्परा से सम्बद्ध प्रतीत होते हैं।
विशेषतः—
संहिता
स्वर
वर्णवर्ग
संधि
आदि विषय।
✓•१४. निरुक्त और प्रातिशाख्य:
निरुक्त अर्थशास्त्र है।
प्रातिशाख्य ध्वनिशास्त्र।
किन्तु दोनों में गहरा सम्बन्ध है।
यास्क कहते हैं—
पदज्ञान के बिना अर्थज्ञान सम्भव नहीं।
और पदज्ञान के लिए—
पदपाठ आवश्यक है।
पदपाठ का आधार—
प्रातिशाख्य।
इस प्रकार निरुक्त का पूर्वाधार प्रातिशाख्य है।
✓•१५. छन्द और प्रातिशाख्य:
कुछ प्रातिशाख्यों में छन्द का भी विवेचन मिलता है।
क्योंकि—
मात्रा,
स्वर,
दीर्घता,
ह्रस्वता
छन्द से जुड़े हुए हैं।
उदाहरण—
गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती आदि छन्दों के पाठ में स्वर और मात्रा की शुद्धता अनिवार्य है।
✓•१६. पाठपद्धतियों का विकास:
वेद-सुरक्षा हेतु अनेक पाठ विकसित हुए—
संहितापाठ
पदपाठ
क्रमपाठ
जटापाठ
घनपाठ
इनकी पृष्ठभूमि में प्रातिशाख्यीय सिद्धान्त कार्यरत हैं।
✓•१७. भाषाविज्ञान में प्रातिशाख्यों का स्थान:
आधुनिक भाषाविज्ञानी स्वीकार करते हैं कि प्रातिशाख्य ग्रन्थ विश्व के प्राचीनतम ध्वनिवैज्ञानिक ग्रन्थों में हैं।
इनमें—
articulation
phonetics
accentology
morphophonemics
के अत्यन्त विकसित सिद्धान्त मिलते हैं।
✓•१८. प्रातिशाख्य और आधुनिक ध्वनिविज्ञान:
आज के भाषाविज्ञान में जिन विषयों पर चर्चा होती है—
phoneme
allophone
assimilation
accent
intonation
उनके बीज प्रातिशाख्यों में उपलब्ध हैं।
इस दृष्टि से प्रातिशाख्य केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि वैज्ञानिक ध्वनि-अध्ययन के प्राचीनतम दस्तावेज हैं।
✓•१९. प्रातिशाख्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि:
भारतीय परम्परा में
शब्द = ब्रह्म
माना गया।
मीमांसक कहते हैं—
नित्यः शब्दः।
वेद का प्रत्येक वर्ण नित्य और अर्थवाहक माना गया।
इसलिए वर्ण की रक्षा ही वेद की रक्षा थी।
प्रातिशाख्य इसी शब्दब्रह्म-साधना का शास्त्रीय रूप है।
✓•२०. उपसंहार: प्रातिशाख्य-शास्त्र भारतीय वैदिक परम्परा की अद्भुत वैज्ञानिक उपलब्धि है। यह केवल उच्चारण-पुस्तिका नहीं, बल्कि वैदिक ध्वनिविज्ञान, स्वरविज्ञान, संहिताशास्त्र, पदपाठ, वर्णविकार, छन्द और भाषावैज्ञानिक चिन्तन का सुव्यवस्थित दर्शन है। यास्क के निरुक्त, पाणिनि के व्याकरण, शिक्षा-ग्रन्थों तथा वैदिक पाठपरम्परा के बीच यह एक सेतु के रूप में कार्य करता है। यदि निरुक्त वेद का अर्थ सुरक्षित रखता है, व्याकरण उसकी संरचना को, तो प्रातिशाख्य उसकी जीवित ध्वनि को सुरक्षित रखता है।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि—
"वेदस्य स्वररूपरक्षणे प्रातिशाख्यानां योगदानं यथा देहस्य प्राणः।"
अर्थात् वेद की स्वर-परम्परा की रक्षा में प्रातिशाख्यों का स्थान उसी प्रकार है जैसे शरीर में प्राण का। भारतीय वाङ्मय के इतिहास में प्रातिशाख्य वेदाङ्गीय परम्परा की वह धुरी हैं, जिनके बिना न वैदिक पाठ की शुद्धता सम्भव है, न वैदिक भाषाविज्ञान की पूर्ण समझ।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्
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