Monday, June 15, 2026

श्रीगायत्री मंत्र

 ।। श्रीगायत्री मंत्र ।।

(परमेश्वर की उपासना और सद्बुद्धि की प्रेरणा का वैदिक मार्ग)


ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।

(यजुर्वेद, अध्याय- ३६, मंत्र- ३)


भावार्थ-

'ओ३म्' यह मुख्य परमेश्वर का नाम है, जिस नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैं। 'भूः' जो प्राण का भी प्राण, 'भुवः' सब दुःखों से छुड़ानेहारा, 'स्वः' स्वयं सुखस्वरूप और अपने उपासकों को सब सुख की प्राप्ति करानेहारा है, 'तत्' उस 'सवितुः' सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले, सूर्यादि प्रकाशकों के भी प्रकाशक, समग्र ऐश्वर्य के दाता, 'देवस्य' कामना करने योग्य, सर्वत्र विजय करानेहारे परमात्मा का जो 'वरेण्यम्' अतिश्रेष्ठ ग्रहण और ध्यान करनेयोग्य 'भर्गः' सब क्लेशों को भस्म करनेवाला, पवित्र शुद्ध स्वरूप है, 'तत्' उसको हम लोग 'धीमहि' धारण करें। 'यः' यह जो परमात्मा 'नः' हमारी 'धियः' बुद्धियों को उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों में 'प्रचोदयात्' प्रेरणा करे। इसी प्रयोजन के लिए इस जगदीश्वर ही की स्तुति- प्रार्थनोपासना करना और इससे भिन्न किसी को उपास्य, इष्टदेव, उस के तुल्य वा उस से अधिक नहीं मानना चाहिए।

(संदर्भ ग्रंथ, महर्षि दयानंद कृत संस्कारविधि, वेदारंभ संस्कार प्रकरण)


अर्थ-चिंतन-

यह महान् वैदिक मंत्र मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्थान, बुद्धि की शुद्धि और परमेश्वर की उपासना का सार्वभौमिक मार्ग दिखाता है। इसका प्रत्येक शब्द अत्यंत गूढ़ और सारगर्भित है, जिसे समझकर मनुष्य अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है।


सबसे पहले “ओ३म्” शब्द आता है। यह परमेश्वर का मुख्य और सर्वश्रेष्ठ नाम है। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर एक है, सर्वरक्षक है, सर्वशक्तिमान् है, और उसी के अंतर्गत उसके सभी अन्य नाम समाहित हो जाते हैं। “ओ३म्” का उच्चारण करते समय साधक उस एक सर्वरक्षक, निराकार, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ परमेश्वर का स्मरण करता है।


इसके बाद “भूः” शब्द आता है, जिसका अर्थ है - जो प्राण का भी प्राण है। अर्थात् परमेश्वर ही सभी जीवों को जीवन देने वाला है। वह हमारे अस्तित्व का आधार है, वही हमें जीवित रखता है। वह हमें हमारे प्राणों से भी अधिक प्यारा होना चाहिए। उसके प्रति हमें इतनी प्रबल प्रीति या आकर्षण होना चाहिए।


“भुवः” का अर्थ है- जो सब दुःखों से छुड़ाने वाला है। परमेश्वर ही वह सत्ता है जो मनुष्य को अज्ञान, पाप, और दुःखों से मुक्त कर सकता है। वह अनेक प्रकार से हमें दुःखों से बचाता है।


“स्वः” का अर्थ है- जो स्वयं सुखस्वरूप है और अपने उपासकों को सुख प्रदान करता है। इससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर स्वयं आनन्दमय है और वही सच्चा सुख देने वाला है। 


अब “तत्” शब्द द्वारा उस परम सत्य परमेश्वर की ओर संकेत किया गया है। “सवितुः” का अर्थ है- जो समस्त जगत् की उत्पत्ति करने वाला है, और सूर्य आदि प्रकाश देने वालों का भी प्रकाशक है। अर्थात् परमेश्वर ही सृष्टि का रचयिता है और वही सबको शक्ति और प्रकाश प्रदान करता है। वह केवल भौतिक प्रकाश का ही नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रकाश का भी आदि स्रोत है।


“देवस्य” शब्द का अर्थ है- जो कामना करने योग्य है और जो सर्वत्र विजय कराने वाला है। इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर ही उपासना के योग्य है, वही मनुष्य को सच्ची सफलता और विजय प्रदान करता है। “वरेण्यम्” का अर्थ है- जो अत्यंत श्रेष्ठ है और ग्रहण करने योग्य है। अर्थात् उस परमेश्वर का ही ध्यान और स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वही सर्वोत्तम है।


“भर्गः” का अर्थ है- ईश्वर का वास्तविक स्वरूप जो सब क्लेशों और पापों को भस्म कर देने वाला, शुद्ध और पवित्र है। परमेश्वर का स्मरण और ध्यान करने से मनुष्य के सभी दोष, पाप और दुःख दूर होते हैं, और उसका जीवन शुद्ध बनता है।


“धीमहि” का अर्थ है- हम उस परमेश्वर को अपने मन में धारण करें, उसका ध्यान करें। यहाँ साधक सामूहिक रूप से कहता है कि हम सब उस परमात्मा का ध्यान करें, उसे अपने जीवन में अपनाएँ। उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें। 


इसके बाद मंत्र का दूसरा भाग प्रार्थना का है- “यः नः धियः प्रचोदयात्।” इसका अर्थ है-  वह परमेश्वर हमारी बुद्धियों को उत्तम गुण, कर्म और स्वभावों की ओर प्रेरित करे। यहाँ मनुष्य परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि उसकी बुद्धि सदैव सही मार्ग पर चले, वह अच्छे विचारों, श्रेष्ठ कर्मों और उत्तम आचरण की ओर प्रवृत्त हो।


इस प्रकार यह मंत्र केवल स्तुति (यथार्थ वर्णन या गुण-कीर्तन) ही नहीं, बल्कि प्रार्थना और उपासना- तीनों का समन्वय है। इसमें पहले परमेश्वर के गुणों का वर्णन है (स्तुति), फिर उसका ध्यान करने का संकल्प है (उपासना), और अंत में उससे सद्बुद्धि की याचना (प्रार्थना) है।


इस मंत्र का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य केवल एक निराकार, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की ही उपासना करे। उसी को अपना इष्ट माने, और किसी अन्य को उसके समान या उससे अधिक न समझे। क्योंकि वही सृष्टि का कर्ता, पालक और संहारकर्ता है, वही सबका आधार है।


जब मनुष्य इस मंत्र का नित्य जप और चिंतन करता है, तो उसकी बुद्धि शुद्ध होती है, जीवन में सद्गुणों का विकास होता है, और वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के योग्य बनता है। उसकी सोच सकारात्मक और सत्यनिष्ठ बनती है, और वह समाज के लिए भी कल्याणकारी कार्य करता है।


अतः गायत्री मंत्र हमें यह शिक्षा देता है कि हम परमेश्वर के गुणों को समझकर, उसका ध्यान करके, और उससे सद्बुद्धि की प्रार्थना करके अपने जीवन को उज्ज्वल और सफल बनाएं। यही इस मंत्र का वास्तविक और व्यावहारिक संदेश है।


                    ।। श्री परमात्मने नमः ।।

No comments:

Post a Comment