Friday, July 20, 2012

स्नान करनेके लाभ

१. स्नानका महत्त्व

        ‘स्नान करनेसे जीवके देहके चारों ओर आए काले आवरणका एवं देहके रज-तमका उच्चाटन होता है तथा देह रोम-रोममें चैतन्य ग्रहण करने योग्य बनता है । मुखशुद्धि तथा शौचक्रियाके कारण भी जीवके देहसे बाहर न निकलनेवाले कष्टदायक घटकोंका स्नानके माध्यमसे विघटन होता है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १९.६.२००७, दोपहर ३.५१)

२. स्नान करनेके लाभ

        ‘स्नानके कारण जीवके देहके रज-तम कणोंकी मात्रा न्यून होती है तथा जीव वायुमंडलमें प्रक्षेपित सत्त्वतरंगें सहजतासे ग्रहण कर सकता है । जीवके बाह्यमंडलमें स्थिरता निर्माण करनेमें स्नान सहायक है । अतएव स्नानके उपरांत देवतापूजन करते समय वृत्ति अंतर्मुख कर जीव वायुमंडलसे शीघ्र एकरूप हो सकता है तथा वायुमंडलकी पोषकताके अनुरूप देवताकी तरंगें ग्रहण कर सकता है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १६.४.२००७, सायं. ६.१३)
प्रातःस्नानके लाभ
अ. प्रातःस्नानसे तेजोबल तथा आयुमें वृद्धि होती है एवं दुःस्वप्नोंका नाश होता है ।
आ. ‘सूर्योदयपूर्व मंगलस्नान करनेसे जीव अंतर्-बाह्य शुद्ध होता है तथा कालकी सात्त्विक तरंगें ग्रहण कर सकता है ।’ - श्री गणपति (कु. मेघा नकातेके माध्यमसे, ११.१०.२००५, दोपहर १२.२५)

३. स्नानके प्रकार

३ अ. ब्राह्ममुहूर्तपर स्नान करना

        सूर्योदयपूर्व २ घटिका (४८ मिनट) ‘उषाकाल’ होता है । उषाकालका अर्थ है अंधकार समाप्त होकर प्रकाश दिखाई देनेका काल । इसीको, ‘पौ फटना’ कहते हैं । उषाकाल पूर्व ३ घटिका (७२ मिनट अर्थात् १ घंटा १२ मिनट) ‘ब्राह्ममुहूर्तकाल’ होता है । सूर्योदयके समयके अनुरूप उषाकाल और ब्राह्ममुहूर्तकालके समयमें भी परिवर्तन होता है ।
        ‘ब्राह्ममुहूर्तपर स्नान करनेका अर्थ है जीवद्वारा देवपरंपराका पालन करना । ब्राह्ममुहूर्तपर किया गया स्नान ‘देवपरंपरा’ की श्रेणीमें आता है । देवपरंपराके कारण जीवको आगे दिए लाभ होते हैं ।
१. जीवपर शुद्धता, पवित्रता और निर्मलताके संस्कार होना : ‘ब्राह्ममुहूर्तके समय जीवका मनोदेह स्थिर-अवस्थामें रहता है । अतएव इस कालावधिमें स्नान करनेसे जीवपर कालके आधारपर शुद्धता, पवित्रता एवं निर्मलताके संस्कार  होते हैं ।
२. ब्राह्ममुहूर्तके समय प्रक्षेपित ईश्वरीय चैतन्य तथा देवताओंकी तरंगें ग्रहण करनेमें जीव समर्थ बनना : ब्राह्ममुहूर्तके समय देवताओंकी तरंगें अन्य कालकी अपेक्षा अनेक गुणा अधिक कार्यरत होती हैं । स्नान करने जैसी प्रत्यक्ष आवाहनदर्शक कृतिके माध्यमसे देवताओंका तत्त्व जीवकी ओर आकृष्ट होता है । इसीके साथ इस कालावधिमें जीवपर स्नानके माध्यमसे हुए स्थूल एवं सूक्ष्म स्वरूपके संस्कारोंके कारण जीव ब्राह्ममुहूर्तपर प्रक्षेपित ईश्वरीय चैतन्य तथा देवताओंकी तरंगें ग्रहण करनेमें समर्थ बनता है ।
३. ईश्वरके पूर्णात्मक चैतन्यसे एकरूप हो पाना : शुद्धता, पवित्रता तथा निर्मलता, इन तीन संस्कारोंके माध्यमसे ईश्वरकी संकल्प, इच्छा तथा क्रिया, यह तीन  शक्तियां एवं इन तीन शक्तियोंके संबंधित ज्ञानशक्ति भी जीव ग्रहण कर पाता है तथा ईश्वरके पूर्णात्मक चैतन्यसे एकरूप हो पाता है ।’
- एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, ७.१०.२००६, दोपहर ५.५९)

३ आ. अभ्यंगस्नान

अर्थ
१. ‘अभ्यंगस्नानका अर्थ है प्रातः उठकर सिर तथा शरीरको तेल लगाकर गुनगुने जलसे स्नान करना
२. पिंडके अभ्युदय हेतु किया गया स्नान, अर्थात् अभ्यंगस्नान
अभ्यंगस्नानमें तेल लगानेका महत्त्व
        अभ्यंगसे, अर्थात् स्नानपूर्व तेल लगानेसे पिंडकी चेतनाके प्रवाहको अभंगत्व, अर्थात् अखंडत्व प्राप्त होता है । स्नानपूर्व देहको तेल लगानेसे कोशिकाएं, स्नायु एवं देहकी रिक्तियां जागृतावस्थामें आकर पंचप्राणोंको कार्यरत करती हैं । पंचप्राणोंकी जागृतिके कारण देहसे उत्सर्जनयोग्य वायु डकार, उबासी इत्यादिके द्वारा बाहर निकलती है । इससे देहकी कोशिकाएं, स्नायु एवं अंतर्गत रिक्तियां चैतन्य ग्रहण करनेमें संवेदनशील बनती हैं । यह उत्सर्जित वायु अथवा देहमें घनीभूत उष्ण उत्सर्जनयोग्य ऊर्जा कभी-कभी तरंगोंके रूपमें आंखों, नाक, कान और त्वचाके रंध्रोंसे बाहर निकलती है । इसलिए तेल लगानेके उपरांत कभी-कभी नेत्र तथा चेहरा लाल हो जाता है ।’ - सूक्ष्म- जगत के एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, १२.९.२००७, दोपहर २.०८)
अनुभूति
स्नानसे पूर्व शरीरपर तेल लगानेपर थकान होना, स्नानके उपरांत उत्साह अनुभव होना तथा भारतीय आचारधर्मकी महानताका बोध होना

‘११.९.२००७ को प्रातः मेरे मनमें विचार आया, ‘आज शरीरको तेल लगानेके उपरांत स्नान करें ।’ इसके अनुरूप सिर तथा हाथ-पैरोंको तेल लगानेपर पहले पांच मिनटोंमें ही मैं थक गया । तदुपरांत शरीरको तेल लगानेसे मुझे और अधिक थकानका अनुभव हुआ । इसके उपरांत गुनगुने जलसे स्नान करनेपर मेरा उत्साह बढ गया । इससे ध्यानमें आया कि, स्नानसे पूर्व तेल लगानेसे शरीरकी काली शक्ति कम होनेपर थकानका अनुभव हआ । इससे भारतीय संस्कृतिद्वारा प्रतिपादित आचारधर्ममें अभ्यंगस्नानके समावेशका कारण और आचारधर्मकी महानताका बोध हुआ ।’ - अधिवक्ता योगेश जलतारे, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
अभ्यंगस्नानके लाभ
१. ‘तेलसे त्वचापर घर्षणात्मक मर्दनसे देहकी सूर्य नाडी जागृत होती है तथा पिंडकी चेतनाको भी सतेज बनाती है । यह सतेजता देहकी रज-तमात्मक तरंगोंका विघटन करती है । यह एक प्रकारसे शुद्धीकरणकी ही प्रक्रिया है । चैतन्यके स्तरपर हुई शुद्धीकरण प्रक्रियासे पिंडकी चेतनाका प्रवाह अखंडित रहता है तथा जीवका प्रत्येक कर्म साधनास्वरूप हो जाता है ।
२. यह कर्म जीवके देहमें सत्त्वगुणकी वृद्धि करनेमें सहायक होता है तथा जीवका अभ्युदय साध्य होता है । अभ्युदय अर्थात् उत्कर्ष । सत्त्वगुण वृद्धिकी ओर जीवकी नित्य यात्रा ही उसका अभ्युदय है । इसलिए अभ्यंगस्नानका अत्यधिक महत्त्व है ।
३. अभ्यंगस्नानसे निर्मित चैतन्यके स्तरपर हुई प्रत्येक कृति, जीवद्वारा साधनास्वरूप होनेके कारण इस कृतिसे वायुमंडलकी भी शुद्धि होती है ।’
- सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, १२.९.२००७, दोपहर २.०८)

३ इ. नैमित्तिक सचैल (वस्त्रसहित) स्नान

        अजीर्ण, उल्टी, श्मश्रूकर्म (बाल काटना), मैथुन, शवस्पर्श, रजस्वलास्पर्श, दुःस्वप्न, दुर्जन, श्वान, चांडाल तथा प्रेतवाहक इत्यादिसे स्पर्शके उपरांत सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करें, जलमें डुबकी लगाएं ।

३ ई. पुण्यप्रद एवं पापक्षय स्नान

        गुरुवारको अश्वत्थ (पीपल) वृक्षतले तथा अमावस्याको जलाशयमें (नदी में) स्नान करनेसे प्रयागस्नानका पुण्य प्राप्त होता है तथा समस्त पापोंका नाश होता है ।
        पुष्यनक्षत्र, जन्मनक्षत्र एवं वैधृती योग इत्यादि समयपर नदीमें स्नान करनेसे सर्व पापोंका क्षय होता है ।

३ उ. काम्यस्नान

        ‘धनप्राप्ति, रोगपरिहार इत्यादि काम्यकर्मनिमित्त, अर्थात् किसी कामनासे धर्मकर्मांतर्गत किया गया स्नान काम्यस्नान है ।’ - गुरुदेव डॉ.काटेस्वामीजी

४. स्नान कहां करें ?

४ अ. नदी अथवा जलाशयमें किया स्नान उत्तम,

कुएंपर किया गया स्नान मध्यम तथा घरमें किया गया स्नान निकृष्ट है ।

१. नदी तथा जलाशयमें किए गए स्नानको  ‘उत्तम’ माननेका कारण : ‘नदी तथा जलाशयका जल प्रवाही होनेके कारण उस जलमें प्रवाहरूपी नादसे सुप्त स्तरपर तेजदायी ऊर्जा निर्माण कर उसे घनीभूत करनेकी क्षमता होती है । इस स्थानपर स्नान करनेसे जलके तेजदायी स्पर्शसे देहकी चेतना जागृत होकर वह देहकी रिक्ततामें संचित एवं घनीभूत रज-तमात्मक तरंगोंको जागृत कर बाहरकी दिशामें ढकेलती है । इस प्रकार यह रज-तमात्मक ऊर्जा जलमें उत्सर्जित होकर उसके तेजमें ही विघटित हो जाती है । इस कारण देह सूक्ष्म-स्तरपर भी शुद्ध एवं पवित्र बनता है तथा यह स्नान ‘उत्तम’ समझा जाता है । जल जितना प्रवाही, उतना ही वह तेजतत्त्वके स्तरपर रज-तमात्मकरूपी कणोंको विघटित करता है ।
२. कुएंमें किए गए स्नानको ‘मध्यम’ माननेका कारण : कुएंके पानीमें अपेक्षाकृत प्रवाह कम होनेके कारण, तेजके स्तरपर ऊर्जा निर्माण करनेकी तथा उसे घनीभूतता प्रदान करनेकी जलकी क्षमता भी क्षीण होती है । प्रवाहके अभावके कारण जलमें एक प्रकारका जडत्व निर्माण होता है । यह जडत्व अनेक रज-तमात्मक जीवजंतुओंको तथा रज-तमात्मकरूपी अनिष्ट शक्तियोंको अपने स्थानपर निवास हेतु आमंत्रित करता है । जलका प्रवाह जितना कम, उतनी ही कष्टदायक तरंगोंको स्वयंमें घनीभूत करनेकी उसकी क्षमता अधिक होती है । जल जीवको शुद्धताके स्तरपर अर्थात् रज-तमात्मक तरंगोंके विघटनके स्तरपर, कम मात्रामें लाभदायक होता है ।
३. घरमें किए गए स्नानको ‘निकृष्ट’ माननेका कारण : घरका वातावरण संकीर्ण, अर्थात् बाह्य वायुमंडलकी व्यापकतासे कम संबंधित होता है । इसलिए वास्तुमें निवासी जीवोंके स्वभावके अनुसार विशिष्ट वास्तुमें विशिष्ट तरंगोंका भ्रमण भी बढ जाता है । ये तरंगें कालांतरसे उसी स्थानपर घनीभूत होती हैं । कलियुगके अधिकांश जीव रज-तमात्मक ही होते हैं । इसलिए इन तरंगोंकी सहायतासे उस स्थानपर अनेक पूर्वजरूपी अतृप्त लिंगदेह रहते हैं । ऐसे कष्टदायक, आघातदायी तथा घर्षणात्मक स्पंदनोंसे आवेशित संकीर्ण वास्तुमें रखे गए जलके पात्रके चारों ओर उससे उत्पन्न वायुमंडलके प्रवाही आपतत्त्वात्मक कोषकी ओर वास्तुकी कष्टदायक तरंगोंका गमन आरंभ होता है । ये तरंगें पात्रके जलमें संक्रमित होती हैं तथा स्नानके माध्यमसे जीवके देहमें संक्रमित होती हैं । इसलिए इस स्नानसे देह अशुद्ध ही बनता है तथा अनिष्ट शक्तियोंके कष्टका कारण बनता है । इसलिए घरकी मर्यादित कक्षामें किया गया स्नान निकृष्ट स्तरका माना जाता है । इस प्रक्रियासे अनिष्ट शक्तियोंकी पीडाकी आशंका अधिक होती है । इसलिए यह प्रक्रिया निकृष्ट समझी जाती है ।’
- सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २५.१२.२००७, रात्रि ८.५६)

४ आ. जलस्रोतके निकट स्नान करनेसे जीवद्वारा पंचतत्त्वकी सहायतासे देह शुद्ध कर पाना

        ‘जहांतक संभव हो, नदी, तालाब, कुएं इत्यादि जलस्रोतके निकट स्नान करें । प्राकृतिक वातावरणमें स्नानद्वारा जीव पंचतत्त्वकी सहायतासे देहकी शुद्धि करता है । इसलिए जीवके देहमें रज-तम कणोंका विघटन अधिक होने लगता है । जीवके प्राणदेह, मनोदेह, कारणदेह तथा महाकारणदेह इत्यादिकी शुद्धि होकर सर्व देह सात्त्विकता ग्रहण करने हेतु तत्पर होते हैं तथा जीव कुछ मात्रामें निर्गुण स्तरकी ऊर्जा और उच्च देवताका तत्त्व ग्रहण कर सकता है । जीवके बाह्य-वायुमंडलका संपर्क ब्रह्मांडवायुमंडलसे भी होता है । परिणामस्वरूप जीव, ब्रह्मांडमें स्थित तत्त्व अल्प मात्रामें पिंडके माध्यमसे ग्रहण कर उसे प्रक्षेपित कर सकता है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १६.४.२००७, सायं. ६.१३)
(इसीलिए जब हम तीर्थस्थानपर धार्मिक विधि करनेके लिए जाते हैं, तब पुरोहित पवित्र नदी अथवा सरोवरमें स्नान करनेके लिए कहते हैं । - श्री. निषाद देशमुख)

५. स्नान कब करें?

        ब्राह्ममुहूर्तपर अथवा प्रातःकाल स्नान करनेका महत्त्व परिच्छेद "ब्राह्ममुहूर्तपर स्नान करना" में दिया है । वह स्नान करनेका आदर्श समय है । वर्तमानकालमें उस समय स्नान करना अधिकांश लोगोंके लिए संभव नहीं होता । ऐसेमें जहांतक संभव हो, सूर्योदय होनेपर शीघ्रातिशीघ्र स्नान करें ।

५ अ. दोपहरको स्नान करनेकी अपेक्षा प्रातःकालमें स्नान करें ।

        प्रातःकाल स्नान करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इस समय वायुमंडल सात्त्विक तरंगोंसे आवेशित होता है । जलके माध्यमसे देहको स्पर्श करनेवाली आपतत्त्वकी तरंगोंकी सहायतासे बाह्य-वायुमंडलकी तरंगें ग्रहण करनेमें देह अतिसंवेदनशील बनता है; जिससे उसकेद्वारा बाह्य-वायुमंडलकी सात्त्विक तरंगें ग्रहणकी जाती हैं । अब कलियुगमें सबकुछ विपरीत दिशामें हो रहा है । पसीना आनेके कारण स्त्रियां घरके काम करनेके उपरांत स्नान करती हैं तथा बाल संवारती हैं । दोपहरके समय वायुमंडलमें रज-तमात्मक तरंगोंका संचार बढ जाता है । स्नानद्वारा देह बाह्य-वायुमंडलकी तरंगें ग्रहण करनेमें संवेदनशील बनता है, इसलिए दोपहरको स्नान करनेसे देह रज-तमात्मक तरंगें ही ग्रहण करता है । देहकी बाह्यशुद्धि तो साध्य होती है; परंतु  अंतःशुद्धि नहीं होती ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

५ आ. रात्रि स्नान करनेकी अपेक्षा प्रातः स्नान करें ।

        ‘प्रातः स्नान करनेपर स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंकी सात्त्विकता अधिक मात्रामें बढकर वह दीर्घकाल स्थिर रहती है । रात्रिका समय तमोगुणी होनेके कारण उस समय स्नान करनेसे स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों देहोंकी सात्त्विकता कम मात्रामें बढती है तथा अल्पकाल स्थिर रहती है । इस कारण उस व्यक्तिको स्नानका लाभ अत्यंत न्यून मात्रामें होता है ।’ - ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, २८.११.२००७, रात्रि ११.१३)

६. स्नान हेतु पूर्वप्रबंध

६ अ. पीढेपर बैठकर शरीरपर तेल लगाएं, तत्पश्चात् स्नान करें ।

        ‘स्नान करनेसे पूर्व पीढेपर बैठकर देहपर तेल लगाकर स्नान करें । पीढेमें सूक्ष्म-अग्नि प्रदीप्त अवस्थामें रहती है । इस अग्निरूपी तेजका देहके चारों ओर सूक्ष्म-वायुमंडल बननेमें सहायता होती है । पीढेके नीचेका निर्गुण रिक्त स्थान पातालसे उत्सर्जित कष्टदायक स्पंदनोंसे देहकी रक्षा करता है । तेल लगानेसे देहकी कोशिकाओंकी चेतना कार्यरत होती है । इस कारण देहकी कोशिकाएं स्नानसे मिलनेवाली चैतन्यमय तरंगोंको ग्रहण करने हेतु योग्य प्रकारसे और उचित मात्रामें सिद्ध होती हैं ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

६ आ. शरीरपर सुगंधित तेल अथवा उबटन लगाएं एवं तत्पश्चात् स्नान करें ।

        ‘अधिकांशतः सुगंधित तेल अथवा उबटन, ये वस्तुएं सात्त्विक होती हैं तथा प्राकृतिक वस्तुओंसे निर्मित होती हैं । उनकी सुगंध भी सात्त्विक होती है । उनमें वायुमंडलकी सात्त्विक तरंगें तथा देवताओंकी तरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता होती है । सुगंधित तेल अथवा उबटन लगाकर स्नान करनेसे शरीरकी रज-तम तरंगें कम होती हैं, उसी प्रकार स्थूल एवं सूक्ष्म देहपर आया हुआ काला आवरण नष्ट होकर शरीर शुद्ध एवं सात्त्विक बननेमें सहायता होती है ।’
१. साबुनसे स्नान करनेके सूक्ष्म दुष्परिणाम : रसायन तथा कृत्रिम पदार्थोंसे बने साबुनकी सुगंध कृत्रिम होती है, इसलिए वह रज-तमयुक्त होता है । ऐसे साबुनके उपयोगसे स्थूलरूपसे तो देह स्वच्छ होता है; परंतु सूक्ष्मरूपसे स्थूल एवं  सूक्ष्म देहपर रजतमात्मक आवरण निर्माण होता  है ।’ - ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, १५.११.२००७, रात्रि ८.२५)
२. उबटन लगाकर स्नान करनेसे कफ एवं वसा (चरबी) न्यून होना
उद्वर्तनं कफहरं मेदसः प्रविलापनम् ।
स्थिरीकरणमड्गानां त्वक्प्रसादकरं परम् ।।
- सार्थ वाग्भट सू. २-१४
अर्थ : शरीरपर उबटन लगानेसे कफ एवं वसा घट जाता है,शरीर सुदृढ होता है तथा त्वचा स्वच्छ होती है ।
३. सनातन उबटनके उपयोगसे हुई अनुभूति
‘सनातन उबटन’ लगानेपर त्वचारोग पूर्णतः ठीक होना : ‘मेरा पुत्र कु. प्रथमेश (आयु ८ वर्ष) त्वचारोगसे पीडित था । त्वचा विशेषज्ञद्वारा सुझाया उपचार करनेपर भी लाभ नहीं हो रहा था । एलोपैथिक डॉक्टरको दिखानेपर उन्होंने विलेप (दग्हूसहू) दिया । वह लगानेपर रोग अस्थायी रूपसे ठीक होता था; परंतु पुनः वह दूसरे स्थानपर उभर आता । ७-८ माह पश्चात् ‘सनातन उबटन’ लगानेपर वह त्वचारोग पूर्णतः ठीक हो गया ।’ - श्रीमती अर्चना अरुण भोईर, पेण, जिला रायगड. (१६.११.२००७)
उबटन लगाने संबंधी नीरस होना तथा उबटन लगानेपर शरीरमें दीप प्रज्वलनकी प्रतीति होकर हिंदुओंकी धार्मिक विधियोंमें विद्यमान अपूर्व शक्तिका तीव्रतासे भान होना : ‘८.११.२००७ को अर्थात् नरकचतुर्दशीको प्रातः आश्रममें सुगंधित उबटन लगानेकी सामूहिक विधिके कार्यक्रममें सहभागी होनेकी मेरी इच्छा नहीं थी; क्योंकि मुझे उस विषयमें जानकारी ही नहीं थी । उस दिन आयुर्वेदिक चूर्ण (पाउडर) लगाकर स्नान करते हैं, इतना ही ज्ञात था । ‘आश्रममें मैं एकमात्र साधिका हूं, जो सहभागी नहीं हो रही’ इस विचारसे तथा मनके न मानते हुए भी मैं अन्य साधिकाओंके साथ उबटन लगानेके लिए कार्यक्रमस्थलपर उपस्थित हुई । सनातन-निर्मित उबटन लगानेके उपरांत मुझे लगा मानो मैं नई हो गई हूं तथा मुझे अपने अंदर दीप प्रज्वलित होनेका भान हुआ । इस अविस्मरणीय अनुभूतिके कारण मुझे वहांसे हटनेकी इच्छा नहीं हो रही थी । उस समय मुझे पहली बार हिंदुओंकी लाभदायक धार्मिक विधियोंकी अपूर्व शक्तिका इतनी तीव्रतासे भान हुआ ।’ - श्रीमती शैरन सिक्वेरा, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा
अन्य उबटन लगानेपर खुजली होना तथा सनातन-निर्मित सात्त्विक उबटन लगानेपर अच्छा लगना : ‘अक्टूबर २००६में मैंने जाननेका प्रयास किया कि सनातन-निर्मित सात्त्विक उबटन एवं अन्य उबटनमें क्या अंतर है । तब मुझे ध्यानमें आया कि अन्य उबटन लगानेसे शरीरपर खुजली होती है तथा सनातन-निर्मित सात्त्विक उबटन लगानेपर अच्छा लगता है ।’ - कु. सोनाली खटावकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
( ‘सनातन उबटन’की निर्मितिमें प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजीकी समष्टिके कल्याणार्थ कार्यरत संकल्पशक्ति है । इसलिए ‘सनातन उबटन’ सात्त्विक है तथा उसका उपयोग करनेवाले अनेक लोगोंको अनुभूति होती है । सनातनके प्रत्येक उत्पादकी निर्मिति ईश्वरकी कृपासे ही होती है, इसलिए वह चैतन्यमय अर्थात् दैवी बनता है । - संकलनकर्ता )
टिप्पणी : उबटन लगाकर स्नान करना संभव न हो, तो आयुर्वेदिक पदार्थोंसे बने साबुनका उपयोग कर सकते हैं । सनातन-निर्मित इस प्रकारका सात्त्विक साबुन उपलब्ध है ।

६ इ. स्नानके लिए तांबेके हंडेमें जल लेकर उसे चूल्हेपर गरम कर, पात्रमें निकालें।

        ‘नहाते समय तांबेके हंडेमें एकत्रित शुद्ध एवं सात्त्विक जल चूल्हेपर तपाकर पात्रमें निकाला जाता है । पात्रका आकार ऊपर चौडा तथा नीचे संकरा होनेके कारण ऊपरी भागमें तपते जलकी सूक्ष्म-वायुतत्त्वात्मक उष्ण ऊर्जा मंद गतिसे कार्यरत स्थितिमें रहती है । वही उष्ण ऊर्जा पात्रके नीचे संकरे आकारमें घनीभूत होती है । वह पातालसे संलग्न जडत्वधारक कष्टदायक ऊर्जासे लड सकती है । इस कारण पात्रके जलकी अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षा होती है ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

६ ई. नहानेके जलमें एक चम्मच खडा नमक डालें ।

        ‘नमकके जलसे स्नान करनेसे संपूर्ण शरीरके १०६ देहशुद्धिकारी चक्रोंपर स्थित काली शक्तियोंका संग्रह नष्ट होता है । परिणामस्वरूप देहशुद्धिकारी चक्र २-३ प्रतिशत जागृत होते हैं एवं काली शक्ति शरीरसे बाहर निकलती है । साथ ही, नमकके जलको आपतत्त्वकी १०० प्रतिशत सहायता मिलनेसे शरीरमें काली शक्तिके संग्रह अधिक मात्रामें नष्ट होते हैं ।’ - श्री गुरुतत्त्व (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १६.४.२००६, रात्रि ९.३३)
अनुभूति
गलेपर उभरी बारीक फुंसियोंकी खुजली औषधियोंसे ठीक न होकर नमकके जलसे स्नान करनेपर ठीक होना : ‘मेरे गलेपर बारीक फुंसियां हो गई थीं तथा अत्यधिक खुजली होती थी । अनेक उपचार करनेपर भी खुजली कम नहीं हो रही थी । कालांतरमें दैनिक ‘सनातन प्रभात’में प्रकाशित सूचना ‘अनिष्ट शक्तियोंसे पीडित साधक नमकके जलसे स्नान करें’ मैंने पढी । पांच-छः दिनतक इसका प्रयोग करनेपर गलेकी खुजली कम हुई ।’ - श्रीमती नीलिमा अनंत बाणे, राजापुर, जिला रत्नागिरी

६ उ. उष्णोदक (गरम जलसे) स्नानके लिए निषिद्ध  घटनाएं, वार एवं तिथि

१. जन्म या मरणके निमित्त किया जानेवाला स्नान; संक्रांतिदिन स्नान तथा श्राद्धदिन स्नान
२. आरोग्येच्छू, पुत्रेच्छू और मित्रेच्छू व्यक्ति रविवार, सप्तमी तथा ग्रहणकालमें उष्णोदकसे स्नान न करें ।
३. पूर्णिमा अथवा अमावस्यापर उष्णोदकसे अर्थात् गरम जलसे स्नान करनेसे गोवधका पाप लगता है ।

७. स्नानपूर्व करने योग्य प्रार्थना तथा स्नान करते समय उपयुक्त श्लोकपाठ

जलदेवतासे प्रार्थना : ‘हे जलदेवता, आपके पवित्र जलसे मेरे स्थूलदेहके चारों ओर निर्माण हुआ रज-तमका काला आवरण नष्ट होने दें । बाह्यशुद्धिके समान ही मेरा अंतर्मन भी स्वच्छ तथा निर्मल बनने दें ।’
नामजप अथवा श्लोकपाठ करते हुए स्नान करनेका महत्त्व : ‘नामजप अथवा श्लोकपाठ करते हुए स्नान करनेसे जलका अंगभूत चैतन्य जागृत होता है । देहसे उसका स्पर्श होकर चैतन्यका संक्रमण रोम-रोममें होता है । इससे देहको देवत्व प्राप्त होता है तथा दिनभरकी कृतियां चैतन्यके स्तरपर करने हेतु देह सक्षम बनता है ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ३०.१०.२००७, दोपहर १.२३)

७ अ. स्नान करते समय उच्चारित किए जानेवाले श्लोक

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।
अर्थ : हे गंगे, यमुने, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदे, सिंधु तथा  कावेरी, आप सब नदियां मेरे स्नानके जलमें आएं ।
गंगा सिंधु सरस्वति च यमुना गोदावरि नर्मदा ।
कावेरि शरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका ।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी ।
पूर्णाःपूर्णजलैःसमुद्रसहिताःकुर्वन्तु मे मंगलम् ।।
अर्थ : गंगा, सिंधु, सरस्वती, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, शरयू, महेन्द्रतनया, चंबल, वेदिका, क्षिप्रा, वेत्रवती (मालवाकी बेतवा नदी), प्रख्यात महासुरनदी, जया तथा गण्डकी नदियां, पवित्र एवं परिपूर्ण होकर समुद्रसहित मेरा कल्याण करें ।
नमामि गंगे तव पाद पंकजं सूरासूरैः वंदित दिव्य रूपम् ।
भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं भावानुसारेण सदा नराणाम् ।
अर्थ : प्रत्येक व्यक्तिके भावानुसार सर्व ऐहिक सुख, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हे गंगामाता, सभी देवता एवं दैत्य आपके चरणकमलोंकी वंदना करते हैं । उन चरणोंकी मैं वंदना करता हूं ।
गंगागंगेति योब्रूयाद् योजनानां शतैरपि ।
मुच्यते सर्व पापेभ्यो विष्णुलोकं सगच्छति ।
तीर्थराजाय नमः ।
अर्थ : सैकडों मील (योजन) दूरसे भी जो ‘गंगा, गंगा, गंगा’, कहते हुए गंगाका स्मरण करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोक प्राप्त करता है ।
पापोहं पाप कर्माहं पापात्मा पाप संभवः ।
त्राहि मां कृपया गंगे सर्व पाप हरा भव ।
अर्थ : मैं अनिष्ट कर्मा हूं । मैं साक्षात् पाप अर्थात् अनिष्टताकी ही मूर्ति हूं । मैं बुराईसे बना हूं । हे गंगामाता, आप मेरे पापोंका हरण कर मेरी रक्षा करें ।

८. स्नान करनेकी पद्धति

८ अ. चोटी (केश) बनानेके उपरांत ही, स्त्रियोंके लिए स्नान करना योग्य

        ‘बाल बिगड जाते हैं, इसलिए अधिकांश स्त्रियां स्नानके उपरांत ही चोटी बनाती हैं । वास्तवमें पहले चोटी बनानेके उपरांत ही स्नान करनेकी पद्धति है । चोटी बनानेकी प्रक्रियासे देहमें जो कुछ रज-तमात्मक तरंगोंका संक्रमण होता है, वह स्नानके माध्यमसे हुई देहकी शुद्धिके कारण नष्ट होता है । इसके विपरीत, स्नानके उपरांत चोटी बनानेसे देह पुनः अशुद्ध होता है । इससे स्पष्ट होता है कि, कलियुगका मनुष्य केवल बाह्य स्वच्छतापर अर्थात् देहके बाह्य सौंदर्यपर ध्यान देता है । इसलिए वह जीवनका अध्यात्मीकरण करनेवाले सिद्धांतोंसे, अर्थात् यथार्थ आचारसे दूर हो गया है ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)
अनुभूति
 ‘बचपनसे ही मुझे स्नानपूर्व चोटी बनानेकी आदत थी । सन् १९९१ मैं महाविद्यालयमें जाने लगी और यह आदत छूट गई । मैं स्नानोपरांत चोटी बनाने लगी । इससे मेरे चेहरेका काला आवरण बढ गया । इसकी तुलनामें स्नानपूर्व चोटी बनानेपर मैंने ऐसा अनुभव किया कि, ‘चेहरेपर आवरण और सिरपर दबाव कम होकर, मुझमें उत्साह अधिक समयतक रहता है ।’ इस कारण गत कुछ माहसे मैंने पुनः स्नानके पूर्व चोटी बनाना आरंभ किया है ।’ - कु. स्वप्ना जोशी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (१२.१२.२००७)

८ आ. नग्न होकर स्नान न करें ।

        ‘नग्नता, देहके छिद्रोंसे सूक्ष्म रज-तमात्मक वायु उत्सर्जन हेतु पूर्णतः पूरक स्थिति है । यह स्थिति वातावरणमें अपना एक रज-तमात्मक वायु-आवेशित मंडल बनाती है । योनिमार्गसे अथवा गुदाद्वारसे त्याज्य वायुका सूक्ष्म-उत्सर्जन, बाह्य वायुमंडलकी रज-तमात्मक तरगोंके स्पर्शके कारण तीव्र गतिसे आरंभ हो जाता है । इसलिए इन मार्गोंकी ओर पातालसे प्रक्षेपित कष्टदायक स्पंदन आकृष्ट होते हैं । इससे संपूर्ण देह रज-तमसे आवेशित हो जाता है । इस स्थितिमें किए गए स्नानसे कोई विशेष लाभ नहीं होता । इसके विपरीत, अंतर्वस्त्रद्वारा कटिबंध क्षेत्रमें दबावदर्शक प्रक्रियाके कारण मणिपूर-चक्र जागृत स्थितिमें रहता है तथा उत्सर्जित वायुओंका अंदर-ही-अंदर रिक्त स्थानमें विघटन करता है । मणिपूर-चक्रकी जागृत स्थितिके कारण स्नानद्वारा प्राप्त सात्त्विक तरंगोंको ग्रहण करनेमें देह संवेदनशील बनता है । इसका लाभ जीवको प्राप्त होता है तथा उसके लिए स्नानका आचार मंगलकारी बनता है ।’ -सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २५.१२.२००७, रात्रि ८)

८ इ. स्नान करते समय पालथी मारकर बैठें ।

         ‘खडे होकर स्नान करनेसे हमारे शरीरके मैलके साथ ही भूमिपर गिरनेवाला जलका प्रवाह भूमिमें काली शक्तिके स्थानोंको जागृत करता है । इससे भूमिसे काली शक्तिका फुवारा उछलकर पुनः हमारे देहको रज-तमयुक्त बनाता है । इसलिए स्नान करते समय पालथी मारकर बैठें ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)
पीढेपर बैठकर स्नान करनेकी कृतिका सूक्ष्म-परीक्षण
१. ‘ब्रह्मरंध्रपर जल प्रवाहित करनेपर ब्रह्मरंध्रद्वारा चैतन्यतरंगें शरीरमें प्रविष्ट हो रही थीं । ब्रह्मरंध्रपर शक्तिकी तरंगें निर्माण हो रही थीं एवं ब्रह्मरंध्रसे शरीरमें चैतन्य नलिका प्रवाहित हो रही थी ।
२. अनाहत-चक्रसे शक्ति तथा चैतन्यके वलय प्रक्षेपित हो रहे थे ।
३. शरीरमें चैतन्यकण निर्माण हो रहे थे ।
४. पालथीमें चैतन्यकी तरंगें संग्रहित होती प्रतीत हुईं ।
ऐसा लगा कि, ‘खडे होकर स्नान करनेसे शरीरमें आपतत्त्वद्वारा निर्मित स्पंदन पैरोंके माध्यमसे निकल जाते हैं, जबकि पीढेपर बैठकर स्नान करनेसे शरीरमें प्रवेश करनेवाले स्पंदन पालथीके कारण शरीरमें बने रहते हैं । शरीरमें निर्मित चैतन्यके कारण शरीरपर आया काला आवरण दूर हो रहा था ।’

८ ई. सिरसे स्नान करें ।

         ‘जीवके देहपर बने आवरणका मूल बिंदु जीवके सहस्रार-चक्र अथवा ब्रह्मरंध्रमें रहता है । सिरसे स्नान करनेसे जीवके देहपर आए आवरणका मूल बिंदुसे विघटन होता है । इस कारण जीवपर आए आवरणका विघटन शीघ्र होता है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १९.६.२००७, दोपहर ३.५१)
अनुभूति
‘२०.१०.२००७ को सवेरे उठते ही मेरे दोनों कान जैसे सुन्न होने लगे । ऐसा लगा, जैसे कानोंपर आवरण आया हो । उसके उपरांत सिरसे स्नान करनेका विचार मनमें आया । पहले ऐसा लगा रहा था कि, ‘सिरपरसे स्नान न करें’; परंतु ‘ईश्वर कह रहे हैं; ऐसा सोचकर मैंने वैसा किया । उस समय मेरे बालोंसे अत्यधिक दुर्गंध आ रही थी । स्नानके उपरांत यह ध्यानमें आया कि, कानोंपर आया आवरण निकल गया है । तब ईश्वरद्वारा सुझाए गए उपायके प्रति कृतज्ञता व्यक्त हुई ।’ - एक साधिका, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल
श्लोकपाठ करते हुए पीतलके रजोगुणी लोटेसे सिरपर पानी डालना
ब्रह्मरंध्र जागृत होकर संपूर्ण देहमें चैतन्यका संक्रमण अल्पावधिमें सहज होना : ‘पीतलके रजोगुणी लोटेकी सहायतासे तांबेके पात्रमेंसे जल निकालकर, विविध श्लोकपाठ करते हुए, जलमें सात्त्विकताका संवर्धन करते हुए, उसे सिरपर डालें । इससे ब्रह्मरंध्र जागृत होकर संपूर्ण देहमें चैतन्यका संक्रमण अल्पावधिमें सहज हो पाता है ।
तांबा और पीतलकी विशेषताएं : जल भरकर रखनेके लिए सत्त्वगुणी तांबेका पात्र एवं जल निकालनेके लिए तथा इस क्रियाको गति देनेके लिए रजोगुणी पीतलके लोटेका उपयोग किया जाता है । इससे स्पष्ट होता है कि, हिंदु धर्ममें प्रत्येक विषयके कार्यकारी तत्त्वरूपी गुणधर्मके अनुसार, विशिष्ट योग्य स्थानपर उसका उपयोग किया गया है ।’
- सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)

८ उ. प्रतिदिन प्रातः स्नानके समय ९ द्वार स्वच्छ करें । - दक्षस्मृति

         ‘(उपर्युक्त) नौ स्थान, देहसे बाह्य वायुमंडलमें उत्सर्जित रज-तमात्मक तरंगोंकी गतिपूर्ण वायुप्रक्षेपण क्रियासे (वायुके आधारसे होनेवाले प्रक्षेपणसे) संबंधित हैं । जलकी सहायतासे, अर्थात् स्पर्शसे इन स्थानों अथवा द्वारोंकी स्वच्छता करनेपर, इनसे निकलनेवाली रज-तमात्मक तरंगोंका जलमें विलीनीकरण होता है । इससे देह यथार्थरूपमें शुद्ध होता है तथा सात्त्विक तरंगें उन द्वारोंसे अंदर लेनेमें समर्थ बनता है । इसीलिए कहा गया है कि, प्रतिदिन प्रातः स्नान करते समय शरीरके चारों ओरके सात्त्विक वायुमंडलके सामर्थ्यपर जलके सर्वसमावेशक स्पर्शसे उन सभी स्थानोंको शुद्ध, अर्थात् स्वच्छ करें ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २५.१२.२००७, रात्रि ८.२८)

९. स्नानके उपरांतकी कृतियां

अ. अपने चारों ओर मंडल बनानेसे स्नानद्वारा हुई देहकी शुद्धीकरण प्रक्रियामें अनिष्ट शक्तियोंके हस्तक्षेपसे बचना : ‘नामजप करते समय नमकमिश्रित जलसे स्नान करनेके उपरांत जलको तीर्थ मानकर अपने चारों ओर जलकी धारासे तीन बार मंडल बनाएं । इससे स्नानद्वारा हुई देहकी शुद्धीकरण प्रक्रियामें अनिष्ट शक्तियोंके हस्तक्षेपसे बच सकते हैं ।’ - सूक्ष्म-जगतके एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २९.१०.२००७, दिन ९.४६)
आ. कृतज्ञता व्यक्त करना : ‘जलदेवताकी कृपासे हमें शुचिर्भूत होनेका अवसर प्राप्त हुआ’, इसके लिए स्नानके उपरांत उनके चरणोंमें कृतज्ञता व्यक्त करें ।
इ. आचमन करना : स्नानके उपरांत आचमन करें । आचमनसे अंतर्शुद्धि होती है ।

१०. ऐसी अनिष्ट कृतियां न करें !

१० अ. ‘सन बाथ’ (सूर्यप्रकाश-स्नान) नहीं; अपितु नामजप करते हुए धूपमें बैठें !

         ‘हलकी धूप शरीरके लिए पोषक एवं लाभदायक होती है; परंतु हलकी धूपमें केवल अंतर्वस्त्र अथवा अल्पवस्त्र धारण कर स्नान (सन बाथ) करनेसे वायुमंडलकी वासनामय अनिष्ट शक्तियोंके लिंगदेह, स्नान करनेवाले जीवकी ओर आकृष्ट होते हैं । उनसे कष्ट होनेकी आशंका अधिक रहती है । सूर्यसे प्रक्षेपित सात्त्विकता एवं चैतन्य सूक्ष्म होता है, इसलिए केवल सूर्यप्रकाशमें बैठनेसे वह ग्रहण नहीं किया जा सकता । ‘सन बाथ’ करनेसे केवल शारीरिक स्तरपर लाभ होता है; आध्यात्मिक स्तरपर कोई लाभ नहीं होता । इसके विपरीत, नामजप करते हुए सूर्यप्रकाशमें बैठनेसे सूर्यसे प्रक्षेपित सात्त्विकता एवं चैतन्य अधिक मात्रामें ग्रहण होते हैं तथा हमें शारीरिक एवं आध्यात्मिक, दोनों स्तरोंपर लाभ होता है ।’ - ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, २८.११.२००७, रात्रि ११.३०)

१० आ. स्नानगृह तथा शौचालयमें अधिक काल न रहें !

         ‘स्नानगृह अर्थात् देहशुद्धिका ही एक स्थान । स्नानगृहमें देहकी शुद्धि होती है तथा देहपर आया रज-तमप्रधान मैल स्नानके जलद्वारा निकल जाता है । इसलिए स्नानगृहका वातावरण रज-तमप्रधान होता है । यहां अधिक समय व्यतीत करनेसे व्यक्तिके सूक्ष्मदेहका रज-तम बढता है तथा उसे कष्ट हो सकता है । यही मुद्दे शौचालयके संदर्भमें भी लागू हैं । इसलिए स्नानगृह तथा शौचालयमें अधिक कालावधि तक न रहें ।’ - ईश्वर (कु. मधुरा भोसलेके माध्यमसे, २८.११.२००७, रात्रि ११.१४)

१० इ. स्नान कौन न करें ?

        अतिवृद्ध व्यक्ति; ज्वर, अपचन, अतिसार, आंख तथा कानमें वेदना, वातवाहिनी तंत्रके (नर्वस सिस्टमके) विकार तथा दृष्टि एवं मुख रोगसे ग्रस्त होनेपर, अत्यधिक भूख लगनेपर तथा भोजनके उपरांत भी स्नान न करें ।

११. वास्तविक स्नान

        अपने शारीरिक स्वास्थ्य हेतु मनुष्य जितने प्रयास करता है, उससे अधिक प्रयास उसे अपने मन तथा बुद्धिको स्वच्छ एवं निर्मल बनानेके लिए करने चाहिए । इसीको यथार्थ ‘स्नान करना’ मानेंगे । ‘जीवके देह और अंतःकरणसे मैलरूपी विकार निकालनेवाली क्रियाको ‘स्नान’ कहते हैं; इसलिए ‘निरंतर साधना करना’ ही वास्तविक स्नान है ।’ - एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुखके माध्यमसे, १६.४.२००७, सायं. ६.१३) 
न उदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नातः इत्यभिधीयते ।
अर्थ : शरीरके अवयवोंको जलसे भिगोनेका अर्थ स्नान नहीं है । इंद्रियनिग्रहरूपी जलसे जिसने स्नान किया है, वही अंतर्बाह्य शुद्ध है ।
‘न हो निर्मल मन । तो क्या करेगा साबुन ।।’

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