Monday, August 13, 2012

ॐकार

अ कार उ कार और म कार ये जो तीन अक्षर हैं ..ये ही तीन मात्राएँ भी हैं .ये क्रमशः सात्विक राजस और तामस हैं . इसके अतिरिक्त एक अर्धमात्रा भी है जो अनुस्वार और विन्दु के रूप उन सबसे ऊपर स्थित है . वह अर्ध मात्रा निर्गुण भी है योगियों को ही उसका ज्ञान हो पाता है .
इसका उच्चारण गांधार स्वर मे होता है इसीलिए उसे गांधारी भी कहते हैं .
जैसे ॐकार उच्चारण किये जाने पर मस्तक के प्रति गमन करता है उसीप्रकार ॐकारमय योगी अक्षर ब्रम्ह मे मिलकर अक्षर रूप हो जाता है .
प्रणव (ॐकार) धनुष है आत्मा वाण है और ब्रम्ह वेधने योग्य उत्तम लक्ष्य है .उस लक्ष्य को सावधानी पूर्वक वेधना चाहिए और वाण की ही भाँती लक्ष्य मे प्रवेश करके तन्मय हो जाना चाहिए .
ॐकार की तीन मात्राओं से तीनो लोक ( अकार भूलोक, उकार भुवर्लोक और मकार स्वर्लोक कहलाता है ) , तीन अग्नि , ब्रम्हा विष्णु व महेश ,आदि का बोध होता है .
अर्धमात्रा वाणी का विषय नहीं है .
इस प्रकार ॐकार परब्रम्ह स्वरुप है जो भी इसे भली भांति जानता है और ध्यान करता है वह इस संसार चक्र का त्याग करके त्रिविध बंधनों से मुक्त होपरब्रम्ह मे लीन हो जाता है .
ओ3म् का उच्चारण है चमत्कारिक !!

* मृत कोशिकाएँ जीवित हो जाती है |

* नकारात्मक  भाव बदलकर सकारात्मक हो जाते है | 
* स्टिरोइड का स्तर कम हो जाता है |
* तनाव से मुक्ति मिलती है |
* चेहरे के भावों (फेसीयल एक्स्प्रेसन) को भी बदल डालता है |
* हमारे आस पासके वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है |
* मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और स्वस्थ हो जाता है।
* पेट की तकलीफ दूर हो जाती है |
* मस्तिष्क व हृदय की कमजोरी यह सब दूर होता है।
आदि अनंत लाभ होते है ,ओ3म् का उच्चारण करते
जाये और रहस्य खोलते जाये |
 

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