Wednesday, September 26, 2012

अभिमान

उज्जैन के महाकवि माघ को अपने पांडित्य का बड़ा अभिमान था ! अधिकतर उनके आचरण से उस अहंकार की झलक भी मिलती रहती थी, पर उनको छेड़ने का किसी को साहस नहीं होता था !
एक बार माघ राजा भोज के साथ वन से लोट रहे थे ! रास्ते मे एक झोपडी पड़ी , एक वृद्धा उसके पास बेठी चरखा काट रही थी ! माघ नें अपने अहंकार को दिखाते हुए पुछा ,' यह रास्ता कहाँ जाता है ? उस वृद्धा ने माघ को पहचान लिया और हंसकर बोली ,'बेटा ,रास्ता कहीं नहीं आता जाता ! उस पर आदमी आया जाया करते हैं ! आप लोग कौन हैं ? ' हम यात्री हैं '- माघ ने कहा !
मुस्कुराते हुए उस वृद्धा ने कहा, यात्री तो सूर्य और चन्द्रमा 2 ही हैं ! आप लोग कौन हैं ? माघ थोडा चिंतित होकर बोले-- ,माता , हम क्षण भंगुर मनुष्य हैं ! वृद्धा थोडा गंभीर होकर बोली -- बेटा ! "यौवन और धन " क्षण भंगुर तो ये ही २ हैं , पुराण कहते हैं , इन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ! माघ की चिंता
थोड़ी और बढ़ी उन्होंने कहा - हम राजा हैं ! उन्हें लगा शायद इससे बुढ़िया डर जाए ! पर उसने बिना डरे उनसे कहा --- नहीं भाई , आप राजा कैसे हो सकते हैं ? शास्त्रों ने तो "यम और इन्द्र" इन दो को ही राजा माना है !
अपनी हेकड़ी छुपाते हुए माघ ने फिर कहा हम तो सब को क्षमा करने वाली आत्मा हैं ! वृद्धा ने कहा -"पृथ्वी और नारी" की क्षमा शीलता की तुलना आप कहाँ कर सकते हैं , आप तो कोई और ही हैं ?
निरुत्तर माघ ने कहा ,--- माँ ,हम हार गए , अब रास्ता बताओ ,
पर वृद्धा इतनी आसानी से उन्हें मुक्त करने वाली नहीं थी , बोलीं--"जो किसी से कर्ज लेता है या अपना चरित्र बल खो देता है" , हारते तो यही २ के श्रेणी लोग हैं !
अब माघ कुछ ना बोले ,सर झुका कर चुपचाप खड़े रहे ! तब वृद्धा ने कहा --- 'महापंडित! मै जानती हूँ की आप माघ हैं , आप महाविद्वान हैं, पर विद्वत्ता की शोभा अहंकार नहीं विनम्रता है ! ये कह कर बुढ़िया चरखा काटने लगी और लज्जित माघ आगे चल पड़े !

No comments:

Post a Comment