Monday, June 11, 2012

" पंच यज्ञ का सिद्धान्त "

पंचयज्ञ के सिद्धान्तों में " देवयज्ञ " सर्वप्रथम है , " पितृयज्ञ " द्वितीय है । " ऋषियज्ञ " तृतीय है। जो सत्य का अन्वेषण करते हैं , वे " ऋषि " हैं । वे " द्रष्टा " हैं , जो भविष्य का दर्शन करते हैं । वे अपने दर्शन तथा चिंतन के आधार पर तथ्य का निरूपण करते हैं ।
आहार , निद्रा , भय और मैथुन - संतानेच्छा इन चारों से पशु तृप्त हैं । यह पशु प्रवृत्ति है, परन्तु मनुष्य इन्हींसे तृप्त न होकर अपने लिए धर्म , ज्ञान और संस्कार प्राप्त कर सका है। इतना सब वह ऋषि - मुनियों की कृपा से पा सका है । ऋषि - मुनियों ने मनुष्य को ज्ञान की भिक्षा दी है ।
ऋषियों ने मनुष्य को पशुतुल्य जीवन से बचाया , फिर अपनी प्रबोधात्म दिव्य वाणी से उसको दिव्यत्व के मार्ग पर अग्रसर बनाया । आदि ग्रन्थ वेदों से लेकर अन्य अनेक पुनीत ग्रन्थों के द्वारा , उन तत्त्वदर्शीमनीषियों ने मनुष्य में अनेक संस्कार संस्थापित कर दिये । उनके उपदेशों से मनुष्य न्याय और धर्म को प्राप्त कर सका , फिर अपने परिवार एवं समाज की व्यवस्था को सुस्थिर बना सका । वह अपना गुण - शील भी सम्यक् रूप से निर्दिष्ट बना सका । तात्पर्य यह है कि वह अपने स्वभाव को परिणत कर सका । यह सब जब हुआ , तभी तो आज यह मानव समाज सुव्यवस्थित और प्रतिष्ठित हो सका है । मानव जीवन आनन्ददायक हो सका है । " जिओ और जीने दो " नामक यह सह जीवन सिद्धान्त चरितार्थ और सार्थक होकर ज्ञान और विज्ञान पल्लवित ओर पुष्पित हो सका । इस प्रकार मानव समाज को व्यवस्थित और सुसंस्कृत बनाने में हमारे त्यागी - विरागी ऋषि - मुनियों का अपार योगदान रहा है ।
भारतीय साहित्य में रामायण , महाभारत , भागवत जैसे ग्रन्थ ज्ञान के अपार भण्डार हैं । संगीत , नाट्य शास्त्र आदि ललितकलाओं का सृजन किया गया । वैद्यक शास्त्र का प्रणयन भी हुआ । सदियों से हमें ये ज्ञान की संपदाएँ प्राप्त है । सृष्टि के प्रारम्भ में ही लिपि एवं शिक्षा प्रणाली का आयोजन करके उन कृपालु ऋषियों ने आज हमें इतना ज्ञानवान बनाया है । सच्चे अर्थ में क्या हम इन ऋषि - मुनियों के ऋण से उऋण हो सकते है ?
हमारा कर्तव्य है कि कदापि इन ऋषि - मुनियों - तपस्वियोँ का विस्मरण करेँगे तो हम पर कृतघ्नता का दोष लगेगा ।
हम अनुदिन सद् ग्रन्थों का अध्यन करें , ज्ञान समुपार्जन करें । जो कुछ ज्ञान पा सकते हैं , उस अन्य जिज्ञासी व्यक्तियों को बता दें । सब एक साथ बैठकर विचार - विनिमय भी करें । ऋषि यज्ञ का यही अर्थ है । निरंतर अध्ययन करते रहना ही ऋषि यज्ञ का निर्वहन माना जाता है , जिससे कि ज्ञान की गंगा निरतंर प्रवाहमान हो , कहीं सुख न जाय ।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का संदेश है - " प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखा जाय , कोई दिन ऐसा निरर्थक न जाय , जिसमें कुछ न सीखा हो । ज्ञानतृष्णा और विचार मंथन बुद्धि की तेजस्विता के लिये नितांत आवश्यक है ।
ब्रह्मचर्य आश्रम के तदनंतर जो शिक्षार्थी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने जा रहा हो , उसे लक्ष्य करके गुरुदेव उपदेश देते हैं " स्वाध्यायान्नप्रमदितव्यम् " अध्ययन करने में आलस्य मत आने दो । वेदों का आशय है कि जीवनपर्यन्त अध्ययन किया जाय ।
ऋषि यज्ञ के बाद मनुष्य यज्ञ तृतीय है ।
हमारे जीवन की वृद्धि में असंख्य लोगों ने योगदान किया है । समाज में अनेक लोगों की सहकारिता से ही हमारा दैनंदिन जीवन चल रहा है । किसान अन्न उत्पन्न करता है , जो हम खाते हैं । व्यापारी हमारे लिए आवश्यक वस्तुएँ घर पहुँचाता है । हमारे मित्र समय - समय पर सहायता करते हैं और विपत्ति में प्राण रक्षा भी करते हैं । यह पूरा और सारा जन समाज हमारा सहायक है , जैसे ये मानव सम्बन्ध मनुष्य और मनुष्य के मध्य सेतु बन्धन के समान है । यह स्नेहशील जब प्रसारित होती है , तभी मानव समाज में सेवा की भावना जागृत होती हैं। इस सेवा भावना के कितने ही रूप हैं - जैसे अतिथि पूजा , दान - धर्म आदि के रूप में परस्पर सहकार - भावना की नदी चारों दिशाओं में प्रवाहमान होती है । यही मनुष्य यज्ञ है । समाज के अपने सगे - साथियों के प्रति हमारा यह ऋण है , जिससे हम उऋण होने का सतत प्रयत्न करें ।
अब पाँचवा ऋण भूत यज्ञ है , जिसका अर्थ है , समस्त प्राणियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट किया जाय ।
मनुष्य कहलाने वाले हम सब इस अनंत प्रकृति में एक अंश हैं । हमारे साथ असंख्य प्राणी जीवित हैं । गाय , कुत्ता , भैंस और अन्य पशु । वनस्पति में अनगनित पेड - पौधे हैं । ये सब हमें सहकारिता पहुँचा रहे हैं । अतः पशुओं को घास देकर उनका पालन करें , पेड - पौधों को पानी से सींचकर उनको पल्लवित और पुष्पित बना दें । इस प्रकार गगन में उड़ते हुये पक्षीयों को तथा अपने आंगन में खूँट से बँधे गाय आदि को दाना - पानी देकर उनकी रक्षा करने की उदार और विशाल भावना से हमारी भारतीय संस्कृति परिपुष्ट है ।
ये पाँचों यज्ञ मनुष्य की प्रेम भावना के प्रतीक हैं । व्यक्ति को केन्द्रीभूत मानकर समस्त विश्व में प्रसरित कृतज्ञता की भावना का यह एक उत्कृष्ट और समग्र व्यक्तीकरण है । पाँचों यज्ञों का आचरण करते हुए जीवन को व्यतीत करने का यह एक पुनीत संप्रदाय है। इन पाँचों यज्ञों में गीता का सार है । वेदों का ज्ञान है और भारतीय सनातन धर्म का तत्त्व निक्षिप्त है । अहिंसा और सामाजिक उत्तरदायित्व का यह एक प्रवल दृष्टान्त है ।
यह धार्मिक भावना नहीं है , विश्वात्म भावना व विश्वजनीन भावना है । सब धर्मो और देशों के लिए यह एक अवश्य आचरणीय सिद्धान्त है । अतएव यह विश्वजनीन भावना समस्त विश्व के लिए भारतीय दार्शनिक तत्त्व का एक संदेश माना जाये ।
पराशक्ति के अनेक नाम हैं , उनमें " पंचप्रिया " एक नाम है । इन पाँचो यज्ञों का निर्वहण ईश्वर के लिये बहुत प्रसन्नदायक है ।
श्रीनारायण हरिः

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