Friday, June 22, 2012

हम कौन हैं ?

क्या हम सिर्फ एक भौतिक शरीर हैं ? ये बहुत ही स्पष्ट और ज़ाहिरी प्रतीत होता है जब हम अपने आप को शीशे में देखते है | में टाईप करते हुए अपनी उँगलियाँ देखता हूँ और मेरे वो हाथ जो बाँहों से जुडें हैं और वो पूरा शरीर जिसका संचालन कोई मेरे मस्तिष्क के अन्दर बैठकर कर रहा है जो शायद "मैं" हूँ. ये हम सब लोगों के लिए सही है बशर्ते हमारे शरीर कुछ अन्तर रख सकते हैं | हममे से कुछ ऐसे भी है जो कुछ शारीरिक रूप से कुछ अपूर्णता रखते हैं - जैसे शरीर का कोई अंग-भंग किसी बीमारी, दुर्घटना या जन्म विकार |

Who are we?

Are we just a physical body that we see in a mirror? This appears very obvious as I see my face in mirror. I also watch my finger typing at this keyboard. I also see my hands connected to arms, the arms to the body trunk, and this whole body is guided by an entity known as “me” who seems to reside in my head, or brain. This is true for all of us as well even though our bodies may be different. There may be some with physical deformity – such as part of the body may be missing due to accident, illness or birth defect.

But when our brain is missing, or dead, doctors consider that we are gone also. Brain death is considered as the end of life, even though the lungs, heart and other vital organs are still working. Thus brain is clearly very important part of the human body.

लेकिन हमारे शरीर से अगर मष्तिस्क गायब या मृत हो जाता है तो डॉक्टर समझ लेते हैं कि हम मर चुकें हैं | मस्तिष्क की अपरिवर्तनशील क्षतिग्रस्त अवस्था ज़िंदगी का अंत समझी जाती है चाहे हमारे फेफड़े, दिल और कुछ अहम अंग काम कर रहे हों | इसलिए दिमाग स्पष्टतया शरीर का बहुत ही अहम हिस्सा है |

Now the question is “Are we just physical bodies or made up of anything other than physical matter that constitutes our body? In other words, what produces our ‘humanness’ if that is not physical matter?”

Physical Sciences cannot answer that question, because it takes on face value the evident fact that when a person’s body dies, whatever seemed to inhabit that body also dies. So it appears reasonable to assume that we have no existence apart from our body, which naturally implies that death is to be feared, rather than welcomed.

अब सवाल ये उठता है "क्या हम सिर्फ भौतिक शरीर ही हैं या फिर भौतिक जड़ जिससे हमारा शरीर बना है उससे कुछ और ? दूसरे शब्दों में वह क्या है जो हमें इंसान बनता है जो कि सिर्फ भौतिक जड़ नहीं है अपितु कुछ और ही है |

भौतिक विज्ञान इस प्रश्न का ज़बाब नहीं दे सकता है क्योंकि वो सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण पर जाता है कि जब हम मरते हैं तो शरीर के साथ सब कुछ ही इस धरती से गायब हो जाता है जिसे हम अपना अस्तित्व या वजूद कहते हैं | इसलिए तार्किक दृष्टिकोण से ये सही है कि जब हमारा शरीर नहीं रहता तो हमारी हस्ती नेस्तनाबूद हो जाती है कम से कम इस धरती के सापेक्ष में | फिर तो ये स्वाभाविक है कि हम मौत से डरें और उसका स्वागत न करें |


Fortunately and thankfully, Saints say that we are not just a physical matter or a bunch of chemical elements packaged together in an ingenuous fashion and given the ability to move, sense, and think for seventy eighty years and then disintegrating into nothingness. They say that the reality is that matter, our body, is only a flimsy covering that temporarily encases other conscious realities which possess more permanence and vitality higher than the physical form.


संयोगवश और सौभाग्य से संत कहते हैं कि हम सिर्फ एक भौतिक जड़ या रसयानिक तत्वों का समिश्रण नहीं है जो तरतीबी से जोड़कर हमें चलने, महसूस करने और सोचने की शक्ति एक सीमित अवधि तक देता है और फिर हम शून्य में विलीन हो जाते हैं | वे कहतें है कि हमारा वजूद सिर्फ जड़ पदार्थ नहीं है, ये शरीर तो मात्र अल्पकालिक खोखला आवरण है जो हमें इस संसार में कार्य करने के लिए मिला है | इसके अन्दर बहुत कुछ चेतन सामग्री है जो इस जड़ पदार्थ से ज्यादा स्थायित्व और चैत्यनता रखता है |

After the death of our body, we find ourselves in a more refined state of being that is referred as ‘astral’ world, meaning ‘of the stars’. It is also called this because the astral body is described as sparkling with millions of particles resembling star dust. In some sense it resembles our previous physical form but is more luminous and beautiful. This astral form also does not suffer from any disease or other ailment. However, the mind being still with us though becoming more refined along with mental strengths and weaknesses generally available with human mind. Still, one turns away from this material world. After traversing that place within one’s life time, he feels this material world as toilet place; even the most beautiful female in this material world appear as a reservoir of filth and dirt.

हमारे स्थूल देह के ख़त्म होने के बाद हम सूक्ष्म देह में सूक्ष्म देश में प्रवेश करते हैं | योगी जन इस देश में जीते जी रोज़ आते-जाते हैं | ये देश हमारे स्थूल जगत से बहुत ही उम्दा और लतीफ है | इसमें हमारा वजूद तो हमारी इंसानी शक्ल जैसा ही होता पर उससे ज्यादा चैतन्य, चमकदार और सुन्दर | शरीर वाली गंदगी यहाँ कहाँ और फिर न किसी तरह की बीमारी | पिंडी मन की बजाय अंडी मन यहाँ रहता है | वैसे इस मन में पिंडी मन से ज्यादा निर्मलता होती है पर मन तो मन ही ठहरा, पांच विकार तो अभी भी आत्मा को परेशान करते हैं | हाँ ये ज़रूर है कि अब ये स्थूल जगत से मुहँ मोड़ लेता है | जिसने जीते जी यह देश देख लिया उसे पूरी दुनिया एक शौचालय लगती है और संसार की सुंदर से सुंदर स्त्री अब सिर्फ गंदगी की कोठरी प्रतीत होती है |

After death, we depart to astral world in our astral body but the time that we spend there is only temporary. If our mind reflects strong earthly desires, habits and attachments-which is usually the case-then very shortly we are pushed back to the materialistic plane by reincarnating into another physical body. Life gives us what we deserve through the perfectly just law of karma. For e.g. if one is very fond of sweets and dies. If his destiny karmas are good then he may be born in a business tycoon family and would be finding variety of sweets on his table. If destiny karmas are lower then he may be born in sweet maker’s shop where he will prepare sweet and can eat them also. If karmas are still lower, he may be born as a beggar born near the temple where he can partake bit of sweets in form of offering by devotees. If karmas are still lower, he may be born as a fly that hovers around the sweet. Because most people have worldly leanings than spiritual so in majority of cases they come back after death ‘down’ to earth, or the physical plane. Those, however, who have been able to free their mind significantly-who have spiritual rather than worldly tendencies-may have reached to the level of purity necessary to move ‘up’ to higher regions.

चेतनता की अगली सीढ़ी कारण क्षेत्र है जब हम अपने सूक्ष्म आवरण को उतार देते हैं और कारण शरीर में रह जाते हैं | अब हमारी रूहानियत प्रकृति पर सिर्फ कारण शरीर का आवरण ही सिर्फ शेष रहता है | यह मन की सबसे उच्च और निर्मल अवस्था है जो सार्वभौमिक मन का हिस्सा है जो इस संसार का कारण है और जिसने इस संसार की रचना की है \ यही वह स्रोत या नींव है जिसके द्वारा सब कुछ मनुष्य की ज़िन्दगी में घटित होता है और इसको 'अहम् का कारण' कहा जा सकता है | ये मुकाम सूक्ष्म क्षेत्र से बहुत ही लतीफ़ और उम्दा है जैसे कि सूक्ष्म क्षेत्र स्थूल जगत से बेहतर है | इसके बारे में समझाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि इस स्थूल जगत में ऐसा कुछ है ही नहीं जिससे इसका उदाहरण दिया जा सके, बस ये ही कहा जा सकता है कि ये बहुत ही सूक्ष्म और प्रकाशवान है | हमारे सब संचित कर्म यहाँ जमा होते हैं | ये वो कर्म हैं जो एक सावधि जमा खाते में जमा रहते हैं | उदाहरणत अगर एक आदमी ने एक जन्म में १०० आदमियों को मारा है तो फिर उसे इस कर्म को चुकाने के लिए १०० जन्म लेने पड़ेंगे और तब वो एक सही जन्म ले पायेगा | परमात्मा उसे दया बख्शता है और उसके सारे बुरे कर्म संचित खाते में जमा कर देता है और फिर कुछ मिश्रित कर्मों (कुछ अच्छे और कुछ बुरे ) के साथ फिर से इंसानी देह के साथ भेजता है जिससे वो अपना असली लक्ष्य को पा सके | इसलिए मनुष्य जन्म बहुत ही कीमती है और उसका मुख्य लक्ष्य मोक्ष पाना है | हमें पता नहीं हमारे कितने बुरे कर्म संचित है | अगर परमात्मा हमसे हमारे कर्मों का हिसाब करने लगे तो हम किसी को मुहँ दिखाने के लिए नहीं रहेंगे | इसलिए मालिक से अरदास करनी चाहिए कि मालिक भूलनहार हैं, बख्श ले |

The next stage is on the ascendancy on the chain of consciousness is when one has shed the covering of astral body and exists in the casual body. Our pure spiritual nature is masked then only by this casual body. The highest and most refined level of mind is, in essence, one with the universal mind, which is the cause and origin of all life below it. This state of being is called as the ‘casual body’ or ‘casual self’ simply because it is the starting point, or foundation, of everything that happens in a person’s life. It is said to be much finer than the astral level, just as astral is considerable finer than the physical state. It is very difficult to describe this casual world as there are no examples in this world which can be related to them, other than to say that it is very subtle and bright. All our reserve karmas (sanchit karmas) are stored here. Reserve karmas are those karmas which are stored like a fixed deposit. Suppose a person kills 100 persons in his life then he will have to first take 100 births to repay the sins of killing 100 persons and then will be born with a normal person. In order to give him chance to get redemption in human life, his’ almost all bad karmas are stored as reserve karmas, and he is given a normal human life with mixture of bad and good karmas as an act of mercy. Thus human life is very precious for achieving goal of redemption. We do not know how many reserve bad karmas we have in our fixed deposit in casual region. If God starts taking accounts of our bad deeds then we may not be able to show our face to anyone. Thus we should pray to God that we are big sinners but still your child. Have mercy on us!!!

कारण शरीर को छोड़ कर, मन और आत्मा अलग हो जाते हैं | अब ब्रह्माण्डी मन आत्मा को अलविदा कहता है क्योंकि वो अपने घर पर पहुँच चुका है | आगे आत्मा को अकेले ही सफ़र करना है | अब रूह के अन्दर असली तड़प और विरह जागती है | असली प्यार यहाँ से चालू होता है | अब मन आत्मा का सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है | पहले यह आत्मा का सबसे बड़ा दुश्मन था | अब चैतन्य और निर्मल आत्मा जो हमारा अपने असली स्वरुप और चमक में आती है और इसका अपना प्रकाश बारह सूर्य का होता है जब हमारी चेतनता स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को त्याग चुकी होती है | ये हमारा सनातन और विशुद्ध रूहानियत रूप है | ये हमारा असली अस्तित्व है, एक परम चेतनता की बूँद, विशुद्ध चेतनता, स्वयं आत्मा बिना जड़ और मन के प्रभाव से मुक्त | इसलिए ये ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने निज अस्तित्व को जड़ और मन के आवरण से मुक्त करके ही जान सकते हैं |

After crossing the stage of casual region, mind and soul separates. Now the mind says goodbye to the soul as it has reached its home. Afterwards the soul has to travel alone. The real feelings pangs of separation and yearning to meet the Lord start now. The real love starts at this stage. Now it becomes the best friend of soul, in case the soul wants to come back to lower regions. Earlier it was the biggest enemy of soul. Our pure spirit, soul, regales with its original glory and light equivalent to twelve suns after our consciousness separates from its physical, astral and casual coverings. This is the only eternal and purely spiritual part of us. It is our real entity, a drop of spirit, or pure consciousness, the soul itself exists unsullied by mind or matter. That is why it is necessary to discover our true potential by leaving behind all impressions of mind and matter before the full potential of the soul can be known.

अभी आत्मा कई मोटे आवरणों से ढकी हुई है जैसे एक अन्तरिक्ष यात्री एक मोटी अन्तरिक्ष पोशाक पहनता है और फिर अन्तरिक्ष यान के आवरण से ढका होता है | जब लोग उसको देखते हैं तो वह जानते हैं कि कोई चेतन नाविक इस यान पर सवार है पर धरती से देखने पर ये बस एक निष्क्रिय धातु का एक टुकड़ा सा प्रतीत होता है |

Currently the soul is hidden by the coarser coverings of our other bodies, much as an astronaut is enclosed by its space suit, then by the shell of his space vehicle. When people watch the launch of manned space mission they know that a conscious astronaut is on board, but all that is visible from the earth is a mass of inert metal.

हम साधारणतया इस हकीकत से अनभिज्ञ रहते हैं कि हमारा असली अस्तित्व आत्मा है क्योंकि हमारा ध्यान हमारे शरीर और मन पर केन्द्रित रहता है | संत कहते हैं कि ये आन्तरिक ध्यान ही इस आत्मा का हिस्सा है | हम अक्सर बाहर ढूँढ़ते हैं कि हम क्या हैं , कभी किताब पढ़ कर, कभी दोस्तों से तर्क-वितर्क कर के, कभी धर्म के रीति-रिवाजों को निभा कर | हम समुन्द्र के बीच मैं खड़े होकर पूछ्तें हैं कि पानी कहाँ पर है ? मुझे तो पानी कहीं महसूस ही नहीं होता !

We normally don’t experience our reality as a soul, as our attention focuses on what we think we are – our physical self and mind. Saints say that this inward attention itself is the part of life force that is soul. We are searching outside, reading books, talking with friends, practicing our religion and trying to figure out what we are. Standing inside the ocean, we are asking, “Where is the water? I don’t feel any water!”

दरअसल समस्या यह है कि हमने धातु का गोताखोरी सूट पहन लिया है और सिर पर एक हेलमेट और पुरे पैरों के बूट पहन लिए हैं | अब पानी की ठंडक कैसे महसूस हो ? पानी की ठंडक तो नंगे बदन को महसूस होगी | सिर्फ नंगी आत्मा ही परमेश्वर का सौहार्द और प्यार को महसूस कर सकती है | हम सभी अपने शरीर की चर्बी को कम करने के लिए जिम्नेजियम और तरन ताल जाते हैं, सौना और स्टीम बाथ लेते हैं जिससे से हमारा जिस्म फैशन मॉडल की तरह साइज़ जीरो हो जाए | पर असली चर्बी तो आत्मा की हटानी है उसके विभिन्न आवरण उतार कर | आत्मा रूपी चिड़िया शरीर और मन के पिंजरे से आज़ाद होना चाहती है |

Well the problem is that we have donned a metal diving suit and wearing a helmet along with thick hip boots. We are unable to feel the coolness of water as only naked skin can feel the coolness or wetness of water. Only the naked soul can feel the warmth and love of the Divine. Most of us are concerned with reducing the extra flab from our physical body by going to gym and swimming pool, taking sauna and steam bath and wishing for size zero body, but our real obesity lies with our soul which has to become size zero by removing various coverings. The soul is a bird wishing to be released from the cages of mind and matter.

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