Wednesday, June 6, 2012

सनातन धर्म में साधु समाज... उनकी परम्परा... तथा "विभिन्न अखाड़े"...


भारत अपनी धर्म-प्रियता के लिए जाना जाता है... हजारों सालों से भारतवासी धर्म में आस्था रखते आये हैं... मनुष्य ने स्रष्टि के निर्माण एवं विनाश में किसी अदृश्य शक्ति के आस्तित्व को इश्वर के रूप में स्वीकार कर उसके समक्ष अपना सर झुकाया तथा निज कल्याण हेतु ईश्वरीय शक्ति की पूजा अर्चना प्रारंभ की...

आदि जगदगुरु शंकराचार्य का प्रादुर्भाव...

नवी शताब्दी में जगदगुरु आद्य शंकराचार्य जी का प्रादुर्भाव हुआ... इन्होने दो बार पूरे देश का भ्रमण किया... अपने दार्शनिक सिद्धांत "अदैतवाद" का प्रचार किया... इस प्रकार वैदिक सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की... एक विराट भारतीय हिंदू समाज की स्थापना की और जगतगुरु कहलाये... इन्होने लोकहित में वैदिक धर्म की धारा निरंतर बहती रहे, इसे सुनिश्चित करते हुई देश की चारों दिशाओ में चार मठ स्थापित किये...

१) उत्तर में बद्रिकाश्रम में ज्योतिष्पीठ...
२) दक्षिण में रामेश्वर क्षेत्र में श्रृंगेरी पीठ...
३) पूर्व में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठ...
४) और पश्चिम में द्वारिका में शारदा पीठ...

इसके साथ ही सनातन धर्म के सरंक्षण हेतु एवं उसे गतिमान बनाये रखने की दृष्टि से पारिवारिक बंधन से मुक्त, नि:स्वार्थ, निस्पृह नागा साधुओ/ संयासियो का पुनर्गठन किया... इनके संगठनो में व्यापक अनुशासन स्थापित किया और देश में "दशनामी संन्यास प्रणाली" शुरू की... इसका विधान “मठाम्नाय” नाम से अंकित किया...

संयासियो के संघो में दीक्षा के बाद सन्यासी द्वारा जो नाम ग्रहण किये जाते हैं तथा उनके साथ जो शब्द जोड़े जाते है... उन्ही के कारण दशनामी के नाम से सन्यासी प्रसिद्ध हुए और उनके ये दस नाम जिन्हें योग-पट्ट भी कहा जाता है...प्रसिद्ध हुए...

संयासियो के नाम के आगे जोड़े जाने वाले ये "योग-पटट" शब्द ... गिरी, पुरी , भारती, वन , अरण्य, सागर, पर्वत, तीर्थ, आश्रम और सरस्वती...

चारों दिशाओं में स्थापित मठों को जब महाम्नाय अर्थात सनातन हिन्दुत्व की नवोन्मेषी धारा से बांधा गया तो उसे "मठाम्नाय" कहा गया। इन्हीं मठाम्नायों के साथ दशनामी सन्यासी संयुक्त हुए।

* वन, अरण्य नामधारी सन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए...

* पश्चिम में द्वारिकापुरी स्थित शारदपीठ के साथ तीर्थ एवं आश्रम नामधारी सन्यासियों को जोड़ा गया...

* उत्तर स्थित बदरीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी सन्यासी जुड़े...

* सरस्वती, पुरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के शृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया...

आचार्य शंकर द्वारा रचित मठामनाय ग्रन्थ के अनुसार साधु समाज के संघों के पदाधिकारियों की व्यवस्था निम्नअनुसार से की गई है...

१. तीर्थ – "तत्वमसि" आदि महाकाव्य त्रिवेणी – संगम – तीर्थ के सामान है... जो सन्यासी इसे भली–भांति समझ लेते है, उन्हें "तीर्थ" कहते है |

२. आश्रम – जो व्यक्ति सन्यास–आश्रम में पूर्णतया समर्पित है और जिसे कोई आशा अपने बंध में’ नहीं बांध सकती वह व्यक्ति आश्रम है |

३. वन- जो सुन्दर ऐकाकी , निर्जन वन में आशा बंधन से अलग होकर वास करते है, उस सन्यासी को “ वन् “ कहते हैं |

४. गिरी – जो सन्यासी वन में वास करने वाला एवं गीता के अध्ययन में लगा रहने वाला, गंभीर है... ऐसे निश्चल बुद्धि वाले सन्यासी “गिरी” कहलाते हैं |

५. भारती – जो सन्यासी विद्यावान, बुद्धिमान है... जो दुःख कष्ट के बोझ को नहीं जानते है या घबराते नहीं वे संयासी “भारती” कहलाते हैं |

६. सागर – जो सन्यासी समुद्र की गंभीरता एवं गहराई को जानते हुऐ भी उसमे डूबकी लगाकर ज्ञान प्राप्ति का इच्छुक होते हैं... वे सन्यासी सागर कहलाते हैं |

७. पर्वत- जो सन्यासी पहाडो की गुफा में रहकर ज्ञान प्राप्त का इच्छुक होते है... वे सन्यासी “पर्वत" कहलाते हैं |

८. सरस्वती – जो सन्यासी सदैव स्वर के ज्ञान में निरंतर लीन रहते हैं और स्वर के स्वरुप की विशिष्ट विवेचना करते रहते हैं तथा संसाररूपी असारता अज्ञानता को दूर करने में लगे रहते हैं... ऐसे सन्यासी सरस्वती कहलाते हैं |

९. पुरी - जो सन्यासी देह को इश्वर का ही निवास स्थान, इश्वर की पुरी मानते हैं... वे "पुरी" कहलाते हैं |

*** विभिन्न अखाड़े और उनका विधान...

दशनामी साधु समाज के ७ प्रमुख अखाडो का जो विवरण आगे दिया गया है... वह श्री यदुनाथ सरकार द्वारा लिखित पुस्तक "नागे संनासियों का इतिहास" पर आधारित है... इनमे से प्रत्यक अखाड़े का अपना स्वतंत्र संघठन है... जिसमे डंका, भगवा निशान, भाला, छडी, हाथी, घोड़े, पालकी आदि होते है | इन अखाडों की सम्पति का प्रबंध श्री पंच द्वारा निर्वाचित आठ थानापति महंतो तथा आठ प्रबंधक सचिवों के जिम्मे रहती है | इनकी संख्या घट बढ़ सकती है | इनके अखाडों का पृथक पृथक विवरण निम्नअनुसार है-

१. श्री पंच दशनाम जूना अखाडा... दशनामी साधु समाज के इस अखाड़े की स्थापना कार्तिक शुक्ल दशमी मंगलवार विक्रम संवत १२०२ को उत्तराखंड प्रदेश में कर्ण प्रयाग में हुई | स्थापना के समय इसे भैरव अखाड़े के नाम से नामंकित किया गया था | बहुत पहले स्थापित होने के कारण ही संभवत: इसे जूना अखाड़े के नाम से प्रसिद्ध मिली | इस अखाड़े में शैव नागा दशनामी साधूओ की जमात तो रहती ही है परंतु इसकी विशेषता भी है की इसके निचे अवधूतानियो का संघटन भी रहता है इसका मुख्य केंद्र बड़ा हनुमान घाट ,काशी (वाराणसी, बनारस) है | इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी जी हैं | इस अखाड़े के इष्ट देव श्री गुरु दत्तात्रय भगवान है जो त्रिदेव के एक अवतार माने जाते है |

2. श्री पन्च्याती अखाडा महनिर्माणी... दशनामी साधुओ के श्री पन्च्याती महानिर्वाणी अखाड़े की स्थापना माह अघहन शुक्ल दशमी गुरुवार को गढ़कुंडा (झारखण्ड) स्थित श्री बैजनाथ धाम में हुई | इस अखाड़े का मुख्य केंद्र दारा गंज प्रयाग (इलाहाबाद ) में है | इस अखाड़े के इष्ट देव राजा सागर के पुत्रो को भस्म करने वाले श्री कपिल मुनि है | इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री विश्वदेवानंद जी महाराज है | सूर्य प्रकाश एवं भैरव प्रकाश इस अखाड़े की ध्वजाए है... जिन्हें अखाडों के साधु संतो द्वारा देव स्वरुप माना जाता है | इस अखाड़े में बड़े बड़े सिद्ध महापुरुष हुए | दशनामी अखाडों में इस अखाड़े का प्रथम स्थान है |

३. तपो निधि श्री निरंजनी अखाडा पन्च्याती... दशनामी साधुओ के तपोनिधि श्री निरंजनी अखाडा पन्च्याती अखाडा की स्थापना कृष्ण पक्ष षष्टि सोमवार विक्रम सम्वत ९६० को कच्छ (गुजरात) के भांडवी नामक स्थान पर हुई | इस अखाड़े का मुख्य केंद्र मायापूरी हरिद्वार है | इस अखाड़े के इष्ट देव भगवान कार्तिकेय है | इसके आचार्य महामंडलेश्वर श्री पूर्णानन्द गिरी जी महाराज है |

४. पंचायति अटल अखाडा... इस अखाड़े की स्थापना माह मार्गशीर्ष शुक्ल ४ रविवार विक्रम संवत ७०३ को गोंडवाना में हुई | इस अखाडे के इष्टदेव श्री गणेश जी है |

५. तपोनिधि श्री पंचायती आनंद अखाडा... दशनामी तपोनिधि श्री पंचायती आनंद अखाड़े की स्थापना माह शुक्ल चतुर्थी रविवार विक्रम संवत ९१२ कोबरार प्रदेश में हुई | इस अखाड़े के इष्टदेव भगवान श्री सूर्यनारायण है... तथा इसके आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री देवानंद सरस्वती जी महाराज है | इस अखाड़े का प्रमुख केंद्र कपिल धारा काशी (बनारस ) है |

६. श्री पंचदशनाम आह्वान अखाडा... इस अखाड़े की स्थापना माह ज्येष्ट कृष्णपक्ष नवमी शुक्रवार का विक्रम संवत ६०३ में हुई | इस अखाड़े के इष्टदेव सिद्धगणपति भगवान है | इसका मुख्य केंन्द्र दशाशवमेघ घाट काशी (बनारस) है|

७. श्री पंचअग्नि अखाडा... श्री पंच-अग्नि अखाड़े की स्थापना और उसके विकास की एक अपनी गतिशील परम्परा है |

* श्री उदासीन अखाडा... काम , क्रोध पर जीवन में विजय प्राप्त करने वाले माह्नुभाव निश्चय करके अंतरात्मा में ही सुख , आराम और ज्ञान धारण करते हुऐ पूर्ण , एकी भाव से ब्रह्म में लीन रहते है |

उल्लेखनीय यह है है की दशनामी साधु समाज के अखाडों की व्यवस्था में सख्त अनुशासन कायम रखने की दृष्टि से इलाहाबाद कुम्भ तथा अर्धकुम्भ एवं हरिद्वार कुम्भ’ में इन अखाडों में श्री महंतो का नया चुनाव होता है|

धर्म की जय हो... अधर्म का नाश हो... प्राणियो में सद्भावना हो... विश्व का कल्याण हो... गौ-माता की जय हो... भारत माता की जय हो...

हर हर महादेव शम्भो...

श्री गुरुवे नमः ...

---  आदि जगदगुरु शंकराचार्य

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