Sunday, June 17, 2012

पारम्परिक रीति-रिवाजोंसे विवाह

पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकताके माहौलमें पारम्परिक रीति-रिवाजोंसे विवाह करना भले ही दकियानूसी माना जाता हो; किन्तु वैज्ञानिक दृष्टिसे स्वास्थ्य के लिए यही उचित है. वैज्ञानिकोंने अन्तरजातीय विवाह प्रथाको मानव-स्वास्थ्यके लिये हानिकारक बताया है. वैज्ञानिकोंका कहना है की समुदायसे बाहर शादी करनेवालोंकी सन्तानोंके शरीरपर बाल तथा अंगुलियोंमें नाखून नहीं आनेकी शिकायत हो सकती है और मस्तिष्क कैंसरकी सम्भावना बढ़ जाती है.

इण्डियन सायंस कांग्रेसके चौरासीवें वार्षिक सम्मेलनमें वैज्ञानिकोंने उक्त रहस्योद्घाटन किया. वैज्ञानिकों एवं मानवशास्त्रियोंने कहा की भारतकी पारम्परिक वैवाहिक व्यवस्थासे छेडछाड करनेके जनस्वास्थ्यपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेंगे. विशेषज्ञोंने सदियों पुरानी वैवाहिक व्यवस्थाओंको विकृत करनेके जैविक दुष्परिणामोंके लिये आगाह किया. कलकत्ता विश्वविद्यालयमें मानव-विज्ञान-विभागमें मानव-जीन विषयके प्रोफ़ेसर डॉ. देवप्रसाद मुखर्जीने अन्तरजातीय विवाह प्रथाके स्वास्थ्यपर प्रतिकूल प्रभावोंकी चर्चा करते हुए कहा की हमें अपने समुदायके भीतर ही विवाह करनेको प्रोत्साहित करना चाहिए, अन्यथा मानव-जीनकी भयंकर क्षतिके दुष्परिणाम भुगतनें होंगे. उन्होंने कहा की जीन-विकृतिसे शरीरमें सिकल सेल एनीमिया एवं जे-सिक्स पी.डी. की कमी हो जाती है. वैसे सिकल जींस दक्षिण भारतीय कबिलोमें ही पाए जाते थे; किन्तु अब इनका प्रसार चुनिन्दा उत्तरी एवं मध्य भारतके राज्योंतक हो गया है. डॉ. मुखर्जीने कहा की वैज्ञानिक निष्कर्षोंको रूढ़िवादी कहकर उनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये....

डॉ. मुखर्जीने बताया की वैज्ञानिकोंने अन्तरजातीय विवाह करनेवाले कुछ लोगोंका अध्ययनके आधारपर 'प्रायवेट जींस' के पहचान की है. उन्होंने बताया कि भारतमे इस जींससे पीड़ित व्यक्तियोंके शरीरपर बाल तथा अंगुलियोंमें नाखून नहीं पाये जाते हैं. पश्चिम बंगालके चौबीस परगना क्षेत्रमें वैज्ञानिकोंने अन्तरजातीय विवाह करनेवाले कबिलोमें मस्तिष्क कैंसरकी शिकायत पाई. वैज्ञानिकोंका कहना है कि अध्ययनसे पता चलता है कि एक समुदायमें अहानिकारक रहनेवाले जींसके दूसरे समुदायमें अत्यन्त हानिकारक प्रभाव हो सकते है....

अंग्रेज़ी समाचार-पत्र THE TIMES OF INDIA (07.01.1999) में यह समाचार प्रकाशित हुआ है -

CHENNAI: Noble Laureate James Watson considered to be the father of DNA technique, has provided a shot in the arm of traditionalists. According to him, gene pools get better in arranged marriage. Easily the most sought after participant at the 86th Indian Science Congress currently
on here, Dr.Watson told the Times of India that he supported Indian research on caste based DNA. “Genetics is not the root cause of racism. Racism existed before casteism", he said. He was responding to recent researches in Hyderabad and West Bengal which highlighted patterns of diseases and similar DNA pattern in various caste group in India. These researches have, however been opposed by certain quarters who say that they reinforce the Varna System with genetic evidence. ‘I am excited about the history of India and the study of people with Biotechnology, said Dr. Watson', he said while comparing genes and DNA to caste group," we must recognize that human beings are different. it is interesting to study how similar group adopt to diseases, how isolated group have greater probability of similar disease and what is so unique about such groups."

He said, "There has been so much discrimination against the so called untouchables, but genetics shows that they have differing genes. Let us not have opposition to human diversity in any form." Dr. Watson said that only time will tell, by studying the uniqueness of each caste group, how each 'tackled its particular problems'

[डी. एन. ए. तकनीके जनक कहलानेवाले नोबेल-पुरस्कार -विजेता जेम्स वॉटसनने पारम्परिक विवाह-प्रथक समर्थन करते हुए का है की इससे (अपनी जतिमें विवाह करनेसे) जीन-समूह अधिक लाभप्रद होते हैं.

इण्डियन सायंस कांग्रेसके ८६ वें सम्मेलनमें महत्त्वपूर्ण भाग लेनेवाले डॉ. वॉटसनने 'द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' को बताया की वे जातिपर आधारित डी. एन. ए की भारतीय खोजका समर्थन करते हैं. उन्होंने कहा कि 'जैनेटिक्स (उत्पत्ति विषयक शास्त्र) वंश परम्पराका मूल कारण नहीं है. वंश-परम्परा तो जतिवाद्से भी बहुत पहलेसे विद्यमान थी. उन्होंने भाग्यनगर (हैदराबाद) और पश्चिम बंगालमें हुए उन अनुसन्धानोंका समर्थन किया, जो भारतकी भिन्न भिन्न जातियोंके समूहकी बीमारियों तथा डी. एन. ए. के नमूनोंपर प्रकाश डालते है. डॉ. वॉटसनने कहा कि, 'मैं भारतकी इतिहास एवं भारतीय लोगोंके जीव-विज्ञान-तकनीकके अध्ययनसे प्रभावित हूँ' उन्होंने जीन्स और डी. एन. ए. की विभिन्न जतियोंसे तुलना करते हुए कहा कि, 'हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि मनुष्य जातियाँ अलग-अलग हैं. यह अध्ययन रोचक है कि एक जातिके लोगोंपर बीमारीका प्रभाव नहीं पड़ता, जबकी दूसरी जातिके लोगोंपर उस बीमारीकी अधिक सम्भावना रहती है, न जाने उन जातियोंमें ऐसी क्या विशेषता है!

उन्होंने कहा कि, 'अछूत कहे जाने वाले लोगोंके प्रति भेद-भाव रहा है; परन्तु जैनेटिक्स बताता है कि उनमें अलग जीन्स हैं. अत: हमें किसी भी प्रकारसे मनुष्योंकी इस भिन्नताका विरोध नहीं करना चाहिये.']

डॉ. वॉटसनने कहा कि प्रत्येक जातिकी विशेषताओंका अध्ययन करनेपर यह तो समय ही बतायेगा कि प्रतयेक जातिके लोगोंने अपनी विशिष्ट समस्याओंका समाधान कैसे किया.

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