Monday, June 4, 2012

भारतीय तत्व ज्ञान का शिव भाव (Shiva sense of Indian philosophy)

 



भारतीय संस्कृति का यह शिव 

दरअसल उस तत्व की ओर इशारा करता है, जो स्थायी है, स्वयंभू है, अनिर्मित है, क्योंकि उसे बनाया नहीं गया। स्वयंभू होने के कारण उसे मिटाया भी नहीं जा सकता। उपनिषद् इसे ही आत्म तत्व नाम देते हैं, जो शुभ व सर्वज्ञ हैं और सभी के लिए कल्याणकारी हैं, वही जिसे श्यति पापम्-शे वन् कहा गया है। शिव शब्द का अर्थ है- शुभ, मांगलिक, कल्याणकारी आदि। शिव भाव उतना ही पवित्र और निश्छल है, जितना भारतीय दर्शन, कला, साहित्य और लोक परंपरा में सुगंध की तरह घुले शिव, जिनके ईशान, रुद्र, आशुतोष, केशी, पशुपति आदि न जाने कितने नाम हैं।
अगर हम शिव के स्वरूप के विभिन्न पहलुओं पर विचार करें, तो पाएंगे कि शिव की कल्पना का एक दार्शनिक आधार है, जिसके बीज वैदिक युग में ही पड़ने लगे थे। ऋग्वेद में शिव से प्रार्थना की गई है कि वह अपने आयुधों को दूर रखें। यहां उनका नाम रुद्र है। अथर्ववेद तक आते-आते रुद्र को महादेव कहा जाने लगा। श्वेताश्वेतर उपनिषद् तक उनके ईश, महेश्वर, शिव और ईशान नाम हो गए। उनका उल्लेख एक सजर्न शक्ति के रूप में होने लगा, जिसे सांख्य दर्शन के पुरुष का पर्याय भी माना जा सकता है और जो तीन गुण वाली माया से सन्नद्ध हैं। काश्मीर के शैव दर्शन में प्रकृति तत्व ‘माया’ नाम से जाना जाता है। इस माया के पांच कंचुक हैं, जिन्हें पुरुष (शिव) के निर्देश बिना खोल पाना लगभग असंभव है।
वैदिक आर्यों और सिंधु घाटी में विद्यमान सभ्यता के मिलन से रुद्र का अंबिका के साथ तालमेल हुआ। इस तरह इस देश में शक्ति साधना का प्रादुर्भाव हुआ। पाणिनी की अष्टाध्यायी में रुद्र अपनी उपाधियों के साथ तो विद्यमान हैं ही, भक्त और भक्ति भी है, जिसका विवरण माहेश्वर सूत्र में मिलता है। अष्टाध्यायी के बाद कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शिव अन्य देवी-देवताओं के साथ जनमानस में और गहरे उतरते हैं, क्योंकि यहां दुर्गों के भीतर बने मंदिरों में उनका स्पष्ट उल्लेख है।
इस देश के दो महाख्यान रामायण और महाभारत में शिव की उपासना उनके रौद्र रूप से सौम्य रूप की ओर मुड़ती है, यहां शिव (त्र्यम्बक) प्राणियों की ऊर्जा बन जाते हैं। यही नहीं, उन्हें भावी को बदलने में सक्षम तक मान लिया जाता है (भावी मेटि सकहिं त्रिपुरारी)। शिव का केशी नाम श्रमण संस्कृति से आया। जैनों के प्रथम र्तीथकर जिन्हें ऋषभदेव कहा जाता है और जो आदिनाथ माने जाते हैं, अन्य कोई नहीं शिव ही हैं।
पतंजलि ने अपनी कृति में शिव को कई नामों से पुकारा है। रामायण में तो शिव को योगाभ्यास करते हुए भी दिखाया गया है। केन उपनिषद की उमा यहां आते-आते रुद्रपत्नी की जगह उमा यहीं बनीं, जो सब जीवों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। महाभारत के द्रोण और कर्ण पर्व में शिव वरदायी देवता के रूप में चित्रित हैं। अर्जुन ने तप करके शिव से ही पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था। माधव ने अपने सर्वदर्शन संग्रह में पशुपत मत को ‘नकुलीश पाशुपत’ कहा है, साथ ही उसके पांच सिद्धांतों की व्याख्या भी की है। शिव को केंद्र में रखकर प्रतिपादित शैव सिद्धांत में चार पादों और पदार्थों का जिक्र किया गया है- विद्या, क्रिया, योग और चर्या तथा तीन पदार्थ हैं पति, पशु और पाश। ब्रह्मसूत्र के अपने भाष्य में रामानुज ने कापालिक संप्रदाय का जिक्र किया है, जिसके केंद्र में भी शिव हैं।
काश्मीरी शैव मत अधिक मानवीय है। यहां का दर्शन दो शाखाओं में विभक्त है। पहला है स्पंदशास्त्र और दूसरा प्रत्यभिज्ञा दर्शन। स्पंदशास्त्र के कर्ता वसुगुप्त माने जाते हैं, जबकि प्रत्यभिज्ञा दर्शन की सर्वाधिक प्रभावी टीका अभिनवगुप्त ने की। इस दर्शन का मानना है कि प्रत्येक जीव में रहने वाला शिव तत्व ही आत्म तत्व है। यह चैतन्य रूप है, इसे ही परासंवित् या परमशिव कहते हैं। यह तत्व न केवल जीवधारियों में, बल्कि जिन्हें हम जड़ पदार्थ कहते हैं, उनमें भी है। यह अनंत वस्तुओं में रहकर भी एक है। यह देश काल से अतीत है, फिर भी सभी देशों सभी कालों में एक ही रूप में है। कभी ऐसा नहीं था कि वह नहीं था, कभी भी ऐसा नहीं होगा कि वह नहीं होगा। वह सब कहीं है, मगर कोई उसे जानता नहीं।
लिंगायत अथवा वीर शैव सिद्धांत को वसव ब्राह्मण से जोड़ा जाता है। डॉ. फ्लीट के अभिलेखों के अनुसार, लिंग साक्षात शिव है- जिसके तीन भेद हैं भावलिंग, प्राणलिंग और इष्टलिंग। भावलिंग कलाओं से रहित है। प्राणलिंग मनोग्राह्य है, जबकि इष्टलिंग चक्षुग्राह्य है। इसके अतिरिक्त गाणपत्य व स्कंद कार्तिकेय आदि संप्रदायों में भी शिव ही हैं।
साहित्य में सबसे पहले अश्वघोष के बुद्धचरित में शिव का उल्लेख है। रामायण, महाभारत का जिक्र हो ही चुका है। भर्तृहरि ने थोड़ा तिर्यक ढंग से शिव को याद किया है। भरत के नाट्यशास्त्र व वात्स्यायन के कामसूत्र में भी शिव का नाम मिलता है। कालिदास की रघुवंश, विक्रमोर्वशीय तथा मालविकाग्निमित्र आदि कृतियों में जगह-जगह शिव स्तुति है। कुमारसंभव में शिव-पार्वती परिणय, मदन दहन और स्कंद जन्म की कहानी विस्तृत ढंग से लिखी गई है। मेघदूत में तो शिवोपासना विधि भी बताई गई है। दंडी के दशकुमार चरित व बाणभट्ट की कादंबरी में भी शिव हैं।।

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